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सोमवार, 29 दिसंबर 2025

एकता

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी

मदुरा नगर निगम के एयरकंडीशंड बैठक कक्ष की शीतलता और बाहर की चिपचिपी गर्मी के बीच, पंखे की आवाज़ के सिवा कोई आवाज़ नहीं थी. आयुक्त श्रीवास्तव ने निविदा के कागजात पर नज़र दौड़ाई. "मिलाप तेवटिया, तुम्हारी दर राज्य की न्यूनतम मजदूरी दर से भी पाँच प्रतिशत कम है. यह कैसे?"

मिलाप तेवटिया, जिसकी आँखों में तीस साल के अनुभव की चालाकी थी, मुस्कुराया. "सर, मैनेजमेंट है. हम स्मार्ट तरीके से काम करेंगे."

मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. चौधरी ने चश्मा सहलाते हुए कहा, "यह धार्मिक नगर है, तेवटिया. तीर्थयात्री देश-विदेश से आते हैं. सफाई पर कोई समझौता नहीं."

"डॉक्टर साहब," तेवटिया आगे झुका, "आप लोग बस अपना कमीशन समय पर पहुँचने की चिंता करें. बाकी मैं संभाल लूँगा. पर व्यापार में दिल नहीं, दिमाग चलता है, सर!"


आयुक्त और डॉक्टर की नज़रें मिलीं. साल भर के लिए नगर की सफाई का ठेका मिलाप तेवटिया को मिल गया.

अगले सोमवार सुबह, मधुवन रोड के कूड़ा संग्रहण केंद्र पर पचास मजदूर इकट्ठे थे. तेवटिया ने ऊँची आवाज़ में कहा, " वेतन मिलेगा, रोज दो सौ, जो काम बताया जाए उसे करना होगा, चाहे चार घंटे में करो या छह घंटे में या आठ घंटे में. जो माने ठीक, जो नहीं माने, आज ही जाए."

रामलाल, जिसकी बेटी बुखार से तप रही थी, आगे बढ़ा. "साहब, आधे दिन की मजदूरी में..."

"तुझे पता है बाहर कितने लोग बेरोजगार हैं?" तेवटिया ने उसे घूरकर देखा. रामलाल पीछे हट गया. दो सौ रुपये में दवाई तो मिल जाएगी.

दो महीने बाद, मदुरा की गलियों में यत्र-तत्र कूड़े के ढेर दिखने लगे. आराम घाट पर बदबू, मंदिर के सामने उड़ता प्लास्टिक. शिकायतें पार्षद शर्मा तक पहुँचीं.

"तेवटिया, मेरे वार्ड में शिकायतें हैं."

"चिंता मत कीजिए, साहब." तेवटिया ने लिफाफा आगे बढ़ाया. "यह इस महीने का. और आपके भतीजे की नौकरी लग गई है."

शर्मा ने लिफाफा ड्रॉयर में रख लिया. "पर सफाई का ध्यान रखना. चुनाव दूर नहीं."

रामलाल और साथियों की हालत खराब हो रही थी. एक दिन, जब तेवटिया ने डाँटा, तो रामलाल ने हिम्मत करके कहा, "साहब, पूरा काम करेंगे, पर पूरी मजदूरी चाहिए."

"कल से तेरी जरूरत नहीं." तेवटिया बोला.

उस शाम, बीस मजदूर नगर निगम के सामने धरने पर बैठ गए. मोहन ने रामलाल से कहा, "मेरे बाप का ऑपरेशन टल गया इस कम मजदूरी में."

"मेरी बेटी की दवाई..." रामलाल ने जवाब दिया.

स्थानीय अखबार ने खबर छापी: "पवित्र नगर में अशुद्ध व्यवहार."

मोहन ने सुझाव दिया, "चलो स्थायी कर्मचारियों की यूनियन से मिलते हैं."

नगर निगम कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह ने उनकी बात सुनकर कहा, "तुम ठेकेदार के गुलाम बन गए हो. हमें एक साथ लड़ना होगा."

जब तेवटिया ने माँगें नहीं मानीं, तो सभी ने हड़ताल कर दी.

तीन दिन में मदुरा की स्थिति भयावह हो गई. जैसे पवित्र नगर ने अपनी पवित्रता उतार फेंकी हो.

नागरिक समूहों की आपात बैठक में समाजसेवी डॉ. मेहता, जो पहले भी श्रमिक हकों के लिए लड़ चुके थे, बोले, "यह मजदूरों के शोषण और नागरिकों से लगातार किए जा रहे छल की समस्या है. वे मजदूरों के शोषण के साथ साथ हम नागरिकों से जुटाए गए कोष का भी दुरुपयोग कर रहे हैं. हमें एकजुट होना होगा."

नगर निगम बोर्ड की आपात बैठक में, जब महापौर ने तेवटिया का ठेका रद्द करने का प्रस्ताव रखा, तो पार्षद शर्मा भड़क गए.

तभी सुरेंद्र सिंह ने कक्ष में प्रवेश किया, हाथ में दस्तावेज.

"महोदय, यह रजिस्टर है जिसमें कमीशन का हिसाब है: आयुक्त साहब को पचास हज़ार, डॉ. चौधरी को तीस हज़ार, पार्षदों को दस-दस हज़ार."

कमरा सन्नाटे में डूब गया.

अगले दिन, कलेक्ट्रेट के सामने पांच हज़ार नागरिक और सभी मजदूर इकट्ठे हुए. रामलाल ने माइक पकड़ा.

"हम मदुरा को स्वच्छ रखना चाहते हैं. पर हमें इंसान की तरह जीने का अधिकार चाहिए."

डॉ. मेहता बोले, "यह संघर्ष हर मदुरावासी का है."

समाचार राजधानी तक पहुँचा. मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश आया: नगर निगम बोर्ड भंग, तेवटिया का ठेका रद्द, आयुक्त और स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित, नई निविदा प्रक्रिया शुरु होगी तब तक मजदूरों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन पर नगर निगम काम कराएगा.

मजदूरों ने विजय जलूस निकाला. जलूस के बाद सुरेंद्र सिंह ने मजदूरों से बात की, "साथियों, आज हमने एक लड़ाई जीती है. पर असली लड़ाई अब शुरू होगी. नया ठेकेदार आएगा, वह भी शोषण से नहीं चूकेगा."

रामलाल ने पूछा, "तो फिर हमने क्या जीता?"

"हमने एकता सीखी," सुरेंद्र ने कहा. "और याद रहे, जब मजदूर और नागरिक एक साथ खड़े हों, तो एकता से ज्यादा मजबूत कुछ नहीं होता. यह एकता... यही इस संघर्ष की असली कमाई है."

रामलाल ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसकी बेटी अब ठीक थी - न सिर्फ बुखार से, बल्कि उस डर से भी जो तेवटिया की आवाज़ में था. और आज, उसे लगा कि नगर की स्वच्छता का रास्ता न केवल गलियों की सफाई से, बल्कि इस एकता से भी गुज़रता है.

रविवार, 28 दिसंबर 2025

घिरनियाँ

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

तीन साल की कोचिंग, दो बार ड्रॉप, और अंततः आईआईटी दिल्ली का ऐतिहासिक गेट. कौशिक के कदम भारी थे – न सिर्फ बैग के बोझ से, बल्कि उस अदृश्य उम्मीद से भी जो पूरे मोहल्ले, स्कूल और कोचिंग के दोस्तों ने उस पर लाद दी थी. उम्र बीस साल, मन पचास साल का अनुभवी, और डर सत्रह साल के नए बैचमेट जैसा. उसका रूममेट राजीव अभी सत्रह का ही था – गाँव से आया हुआ, चेहरे पर एक निश्चल उत्सुकता, जैसे किसी नई दुनिया को टटोल रहा हो.

पहली मैकेनिकल लैब. प्रोफेसर ने एक सरल गियर सिस्टम टेबल पर रखा. और नए छात्रों से पूछा, “बताओ, यह कैसे काम करता है?”

कौशिक की नज़रें तुरंत ब्लैकबोर्ड पर टिक गईं. उसके दिमाग में फ़ॉर्मूले की लाइनें दौड़ने लगीं – वेलोसिटी रेशियो, टॉर्क ट्रांसमिशन, मेकेनिकल एडवांटेज… सब कुछ याद था, सब याद था. उसने सूत्र लिखने के लिए कलम उठाई.

तभी राजीव ने आगे बढ़कर गियर के एक पहिये को हल्के से छुआ. फिर घूम कर मुस्कराया. “सर, यह तो हमारे गाँव के कुएँ की घिरनी जैसा है. वहाँ कुएँ की जगत पर एक बड़ी घिरनी होती है जो कुएँ की ओर झुकी होती है, जिस पर रस्सी चलती है. जब हम रस्सी के एक सिरे को खींचते हैं, तो दूसरे सिरे पर बँधी बाल्टी, ऊपर आती है. यह गियर भी वैसा ही है – एक पहिया घूमता है, तो दूसरा उसकी गति और दिशा के हिसाब से चलता है. बस यहाँ लकड़ी की घिरनी की जगह धातु के पहिये पर दाँत हैं, जो दूसरे दाँत वाले पहिए को गति देते हैं.”

प्रोफेसर की आँखों में एक चमक आ गई. “ठीक कहा, राजीव. तुमने सिद्धांत को छूकर भौतिक रूप से महसूस किया. तुम्हारे लिए सिद्धांत केवल विचार नहीं रहा, बल्कि वह भौतिक यथार्थ से निकला. सारे विचार ऐसे ही भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं.”

कौशिक अवाक रह गया. उसने सोचा था कि उसके पास तीन साल का अतिरिक्त ज्ञान है, पर राजीव के पास तो सत्रह साल का वास्तविक जीवन का अनुभव था – वास्तविक दुनिया का अनुभव, जहाँ सिद्धांत सिर्फ किताबों में नहीं होते, खेतों, कुओं और घिरनियों से जन्म लेते हैं.

शाम को कमरे में, कौशिक ने पूछा, “तुमने इतनी स्पष्ट तुलना कैसे की? क्या तुमने कोई खास किताब पढ़ी है?”

राजीव ने अपना साधारण सा सूटकेस खोला. उसमें कोई किताब नहीं थी, बस कुछ पुराने टूल्स थे – एक छोटा सा स्क्रूड्राइवर, दो-तीन तरह के प्लायर्स, और एक लोहे का छल्ला. “मेरे पिता कारीगर हैं, सर. मैं बचपन से मशीनों के बीच बड़ा हुआ हूँ. मैंने पढ़ा ही नहीं, पर खुद देखा है. और जो देखा, उस पर विश्वास किया.”

वह सोचने लगा, जब भी खाली समय में वह घर के बाहर जाना चाहता तभी उसके मम्मी-पापा उससे कहते –फालतू समय मत व्यर्थ करो. तुम्हें आईआईटियन बनना है. समय व्यर्थ करने के बजाय किताबों में मन लगाओ. तुम्हारा अध्ययन ही तुम्हें वैसा बना सकता है. अब उसकी समझ में आया कि मम्मी-पापा पूरी तरह सही नहीं थे. अध्ययन केवल किताबों और सिद्धान्तों में नहीं होता बल्कि वह व्यवहारिक दुनिया से प्रत्यक्ष होता है.

अगले दिन, कौशिक अकेला लैब में लौटा. उसने प्रोफेसर से वही गियर सिस्टम माँगा. इस बार उसने कॉपी-पेन नहीं उठाया. उसने धीरे से गियर के दाँतों को अपनी उँगलियों से छुआ. एक पहिये को घुमाया, दूसरा अपने आप चल पड़ा.

उसकी आँखों के सामने कोचिंग के वो बोर्ड नहीं, बल्कि राजीव के गाँव का कुआँ घूम गया – रस्सी, घिरनी, पानी की बाल्टी, और एक साधारण सिद्धांत जो पीढ़ियों से चला आ रहा था.

प्रोफेसर ने पूछा, “क्या तुम्हें अब समझ आया?”

कौशिक ने सिर उठाया. “नहीं सर… अभी महसूस किया है.”

...और उस पल कौशिक ने जाना कि शिक्षा सिर्फ परीक्षा पास करने का रास्ता नहीं है – यह उस रास्ते पर चलने का साहस है जहाँ किताबें और प्रत्यक्ष ज्ञान साथ जलते हैं. और सच्ची समझ की शुरुआत होती है. उसने पहली बार महसूस किया कि ज्ञान की सब से बड़ी घिरनी – विचार और अनुभव का संगम – अब घूम चुकी थी.

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

कच्ची ईंटें

'लघुकथा'

- दिनेशराय द्विवेदी
सूरज के उगने से पहले ही रामलाल के हाथ चिपचिपी मिट्टी में डूबे थे. हर ईंट को साँचे में ढालते हुए उसकी उँगलियों के छाले पुराने पड़ चुके थे, पर मन अब भी कोमल था. एक ईंट रखते हुए अचानक मुन्नी का चेहरा आँखों में तैर गया—कल ही उसने टूटी स्लेट पर कोयले से लिखा था, “बाबूजी, देख लेना, एक दिन मैं भी बड़ी मास्टरनी बनूँगी.”

उसका सपना रामलाल की रगों में खून बनकर दौड़ता, तभी भट्ठा मालिक की आवाज़ कोड़े सी बरसी -
“ऐ रामलाल! हाथ चला, दिमाग नहीं. कल भट्ठा लगाना है.”

रामलाल ने गर्दन झुका ली. ज़बान खोलने की कीमत मज़दूरी कटने से चुकानी पड़ती थी.

एक तपती दोपहरी में अचानक धड़ाम की आवाज़ हुई. ईंटों की कच्ची दीवार ढह गई थी, और रामलाल उसके नीचे दबा था. उसे बाहर निकाला गया तो पैर लहूलुहान था. मालिक ने आकर घड़ी देखी और चिल्लाया-
“मरा तो नहीं! काम रुकना नहीं चाहिए.”

उस रात रामलाल की झुग्गी में दर्द से ज्यादा एक दबी हुई आग धधक रही थी. डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ाया था और आराम करने को कहा था. पर जब मुन्नी ने पूछा, “बाबूजी, फिर स्कूल कब जाऊँगी?” तो रामलाल को लगा जैसे उसकी चुप्पी ही उस स्लेट को हमेशा के लिए तोड़ देगी.

देर रात, जब भट्ठे का धुआँ आसमान को काला कर रहा था, रामलाल लंगड़ाता हुआ सुक्खू, गफूर और चंदर के पास पहुँचा.

“मित्रो,” उसकी आवाज़ में दर्द से ज्यादा आग थी, “आज मेरा पैर दबा, कल किसी का सपना दबेगा. क्या हमारे बच्चे भी इसी भट्ठे में ईंट बनकर पकेंगे?”

सुक्खू डरा हुआ था, “बोलेंगे तो भूखे मरेंगे.”

रामलाल की आँखों में बिजली कौंधी, “साथ बोलेंगे तो मालिक का गुरूर मरेगा. ये ईंटें हमारे पसीने से पकती हैं. हमें जीने लायक मज़दूरी चाहिए.”

त हवा से फैली. अगले कई दिनों तक, रामलाल के पैर से प्लास्टर कटने तक, अंधेरी रातों में मजदूर उसकी झोंपड़ी में जुटते रहे. उन्हें समझ आने लगा—उनकी आपबीती एक ही दास्तान है.

जिस दिन रामलाल काम पर लौटा, उस रात उसने कोयले से एक फटे बोरे पर लिखा: 'मजदूर यूनियन'. अगली शाम, काम खत्म होते ही सभी मजदूर शिव मंदिर के लॉन में इकट्ठे हुए. रामलाल ने कहा, “हम एक होकर लड़ेंगे. पहला कदम—यूनियन बनाएँगे. जो शामिल नहीं होना चाहते, वे हाथ ऊपर उठाएँ.”

चारों तरफ सन्नाटा छा गया. केवल भट्ठे की चिमनी से उठता काला धुआँ हवा में लहरा रहा था, मानो स्वयं आकाश सुन रहा हो. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

रामलाल की आवाज़ गूँजी, “इंकलाब जिन्दाबाद!”

नारे से हवा काँप उठी. और उसी क्षण मुन्नी ने, जो एक कोने में खड़ी सब देख रही थी, अपनी टूटी स्लेट पर फिर से कोयले से कुछ लिखना शुरू किया—शायद अपना नाम, शायद एक नई शुरुआत.

भट्ठे से उठता धुआँ अब केवल कालिख नहीं, एक संकल्प बनकर फैल रहा था. कच्ची ईंटें अब सिर्फ दीवारें नहीं, एक नई नींव की पहली परत थीं.

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बेनकाब उजाले

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
महानगर की उमस भरी नसों में आज एक अजीब सी बेचैनी थी। एक तरफ कई सौ एकड़ में फैला वह महलनुमा आवास था, जो आज पूरी दुनिया की चकाचौंध को खुद में समेटे हुए था। अरबपति के बेटे की शादी थी। सड़कों पर गाड़ियों का हुजूम नहीं, बल्कि सत्ता और संपत्ति का प्रदर्शन रेंग रहा था।

महल के भीतर बने आधुनिक ऑडिटोरियम में संगीत की थाप तेज हुई। नर्तकियां मंच पर थीं। दर्शक दीर्घा में देश के सबसे रसूखदार चेहरे बैठे थे। जैसे-जैसे नर्तकियों के बदन से कपड़े कम हो रहे थे, हॉल में तालियों का शोर और सिगार का धुआँ घना होता जा रहा था। जब मुख्य नर्तकी के साथ केवल उसकी दो सहायिकाएँ रह गईं, तो एक रईस ने जाम छलकाते हुए कहा, "यही तो असली विकास है, जहाँ मर्यादा की बेड़ियाँ टूट रही हैं।"


उसी जगमगाते महल की ऊँची दीवारों के साये में 'नील गगन' झुग्गी बस्ती थी, जहाँ नाम के उलट आसमान भी काला और धुएँ भरा था।

श्यामू रिक्शा चालक अपनी फटी हुई बनियान से पसीना पोंछते हुए बैठा था। उसका छोटा बेटा सुबक रहा था, "पापा, वहाँ से हलवे की खुशबू आ रही है। क्या हम जा सकते हैं?"

श्यामू की पत्नी राधिका ने पास पड़े खाली मटके को पटकते हुए कहा, "वहाँ जाने की कीमत हमारी जान से ज्यादा है बेटा। वहाँ पहरे नहीं, लोहे की दीवारें हैं। सुना है आज पी.एम. साहब भी आए हैं आशीर्वाद देने। हमारी भूख उनके कैमरों के फ्लैश में कहीं खो गई है।"


ऑडिटोरियम में अब केवल मुख्य नर्तकी बची थी। रोशनी मद्धम हुई और उसके बदन से एक और वस्त्र सरक गया।

"शानदार!" एक अफसर ने फुसफुसाया। तभी कोने में खड़े एक पत्रकार ने अपनी डायरी में लिखा— 'उतरते हुए वस्त्र केवल नग्नता नहीं, इस लोकतंत्र की उतरती हुई खाल हैं। व्यवस्था आज स्टेज पर नंगी नाच रही है और रक्षक तालियाँ बजा रहे हैं।'

अचानक, आसमान में एक जोरदार धमाका हुआ। आतिशबाजी का एक बड़ा गोला फटा और उसकी रंगीन रोशनी ने झुग्गियों के अंधेरे को एक पल के लिए चीर दिया।

श्यामू चौंक कर खड़ा हो गया। उसे लगा जैसे आसमान से आग के गोले गिर रहे हों। उसने गुस्से में चिल्लाकर कहा, "देख राधिका! ये रोशनी नहीं है। ये हमारी बेबसी का जश्न है। वो आसमान में बारूद नहीं, हमारे हिस्से की रोटियाँ जला रहे हैं।"


मंच पर अब अंतिम दृश्य था। मुख्य नर्तकी ने अपना अंतिम वस्त्र भी त्याग दिया। संगीत रुक गया, रोशनी मद्धम होकर शून्य हो गई। मदहोश दर्शकों के गले से एक सामूहिक चीख निकली—उत्साह की या हवस की, यह तय करना मुश्किल था।

तभी पी.एम. की आवाज गूँजी, "आज दुनिया के सबसे अमीर लोगों में हमारा नाम है। यह नया भारत है, यह नग्न सत्य है!"

पत्रकार ने अपनी कलम बंद की और बुदबुदाया, "हाँ, नग्न और बेनकाब। सत्य भी और सत्ता भी।"


झुग्गी में अंधेरा फिर लौट आया था। बिजली का बिल न भर पाने की वजह से कटा कनेक्शन अब एक स्थायी सन्नाटा बन चुका था।

बच्चा फिर रोया, "पापा, दूध..."

श्यामू ने आतिशबाजी से चमकते उस महल की ओर देखा और मुट्ठियाँ भींच लीं। उसने अपने पास पड़े खाली पीपे को जोर से लात मारी। आवाज़ गूँजी और बस्ती के दूसरे घरों से भी सिसकियों की जगह अब गुस्से की सुगबुगाहट आने लगी।

"हमें तुम्हारी ये झूठी रोशनी नहीं चाहिए साहब," बस्ती के कोने से एक बुजुर्ग की आवाज आई, "हमें तो बस हाथ को काम और पेट को रोटी चाहिए।"

आसमान में आखिरी पटाखा फटा और उसकी राख धीरे से श्यामू के खाली हाथ पर आकर गिरी। वह रोशनी नहीं, ठंडी पड़ चुकी एक चिंगारी थी।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

उम्मीद

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

मॉल रोशनियों से नहाया हुआ था. लाल-सुनहरी गेंदें और टिमटिमाते सितारे हर किसी को अपनी ओर खींच रहे थे. बाहर लॉन में हजारों बल्बों से सजा क्रिसमस ट्री किसी सजीली दुल्हन की तरह मुस्करा रहा था. सड़क पार फुटपाथ पर राघव सुबह से अपने ठेले पर बच्चों के लिए सांताक्लॉज की लाल ड्रेसें बेच रहा था. उसकी अधिकांश ड्रेसें बिक चुकी थीं. बस चार-पाँच बची थीं. वह सोच रहा था कि ये भी बिक जाएँ तो सुकून से घर जाए; दो ड्रेसें तो वह अपने बच्चों, श्याम और सरिता के लिए ले ही जाएगा.

तभी एक स्कूटर वाला आकर रुका और ड्रेसें देखने लगा. राघव उम्मीद से बोला, “देख क्या रहे हैं बाबूजी, ले लीजिए. बस यही पाँच-छह बची हैं, आधी दर पर दे दूंगा.”

राघव आगे कुछ बोल पाता, तभी एक आटो रिक्शा उसके सामने आकर धीमा हुआ और ड्राइवर चिल्लाया— “सामान समेटो और भागो राघव! गुंडों की फौज आ रही है!”

राघव ने मुड़कर देखा, पंद्रह-बीस लोगों का हुजूम लाठी-डंडे लिए चीखता-चिल्लाता चला आ रहा था. ये वही लोग थे जो अक्सर त्यौहारों का उल्लास बिगाड़ने को ही अपना धर्म समझते थे. राघव ने फुर्ती से सांताक्लॉज की ड्रेसें चादर में लपेटकर गठरी बाँधी और ठेले को गली में धकेल दिया. स्तब्ध खड़ा स्कूटर वाला भी अपनी गाड़ी स्टार्ट कर राघव के पीछे उसी गली में घुस गया.

गली के सुरक्षित कोने से उन्होंने देखा—भीड़ मॉल में घुस चुकी थी. उन्होंने सजावटी ट्री को पीट-पीटकर गिरा दिया और उसमें आग लगा दी. गार्ड्स, जो सांता की ड्रेस में थे, उनके कपड़े फाड़ दिए गए. दस मिनट के तांडव में मॉल के शीशे चकनाचूर हो गए. कुछ लोग हाथों में कीमती सामान दबाए बाहर निकले और शोर मचाते हुए आगे बढ़ गए.
सन्नाटा छाने पर ग्राहक ने पूछा, “ये ड्रेसें कितने में दे रहे हो?” राघव की आवाज काँप रही थी, “सौ की एक है बाबूजी, आप जो दे दें. अब बस घर जाना चाहता हूँ.” “सौ में दो दोगे? मेरे पास पैसे कम हैं, बाकी से बच्चों के लिए कुछ मीठा लेना है,” ग्राहक ने मोल भाव किया. राघव ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “ले जाइए बाबूजी, कम से कम आपके बच्चे तो खुश होंगे.”

राघव ने नोट जेब में रखा और खाली सड़क को देखा. ग्राहक बोला, “मॉल में बहुत नुकसान कर गए ये लोग.” राघव ने लंबी सांस ली, “ये हर त्यौहार पर यही करते हैं. पुलिस भी सब बरबाद होने के बाद जमीन पर लाठियाँ बजाने आती है.”

राघव ठेला लुढ़काते हुए अपनी बस्ती की ओर चला, जो चर्च के पीछे नाले के किनारे थी. चर्च के पास पहुँचते ही उसके पैर ठिठक गए. तीन दिन से जगमगाती रोशनियाँ बुझ चुकी थीं. चर्च के एक कोने से धुआँ उठ रहा था. पता चला कि भीड़ ने पादरी जॉन साहब पर हमला किया, उनका सिर फट गया है और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. राघव की रूह काँप उठी— "क्या ईश्वर इतना कमजोर है कि उसे बचाने के लिए खुशियों का कत्ल करना जरूरी है?"

बस्ती पहुँचा तो देखा, अनीता की झुग्गी राख के ढेर में बदल चुकी थी. अनीता एक पुराने बक्से पर बैठी शून्य में ताक रही थी. उसका पति और बेटा पहले ही एक हादसे में गुजर चुके थे. पादरी  जॉन साहब की मदद से वह फिर से खड़ी हो सकी। उनकी सहृदयता को देख उसने ईसाई धर्म अपनाया था, और आज शायद इसी की कीमत उसने अपना आशियाना खोकर चुकाई थी. सलीम उसके पास खड़ा उसे ढाढ़स बँधा रहा था.

सलीम ने राघव को देखते ही बुझी हुई आवाज में कहा, "वाह! धर्म बच गया! किसी का सिर झुकाकर, किसी की छत छीनकर और किसी के दिल में नफरत भरकर... उन्होंने अपने भगवानों को खुश कर दिया." सलीम की आँखों में आक्रोश से ज्यादा शर्मिंदगी थी.

राघव ने आगे बढ़कर अनीता के सिर पर हाथ रखा और पूरी दृढ़ता से बोला, “अनीता बहन! घर लकड़ी और ईंटों का था, जो टूट गया. पर हम जो साथ खड़े हैं, वह 'विश्वास' है, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता. हम सिर्फ ईंटें नहीं जोड़ेंगे, हम टूटे हुए भरोसे को भी जोड़ेंगे. अदालत से लेकर सड़क तक, तुम अकेली नहीं हो. यह देश नफरत की आग में जलने के लिए नहीं बना है.”

अनीता ने सिर उठाकर दोनों भाइयों को देखा और खड़ी होकर बोली, “उन्होंने नफरत को धर्म मान लिया है, पर तुम दोनों ने प्यार का धर्म नहीं छोड़ा. वे कितना भी तोड़ें, मैं अपना विश्वास नहीं खोऊँगी.”

सलीम और राघव ने अनीता को सहारा दिया. जलते हुए चर्च की लपटें अब शांत हो रही थीं, लेकिन उस ढहे हुए घर के पास तीन दिलों की धड़कनें एक सुर में थीं. वहां न कोई हिंदू था, न मुसलमान, न ईसाई—वहां सिर्फ तीन 'इंसान' थे, जो एक नए सवेरे की नींव रख रहे थे.

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

दीवार

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
गाँव के चौक में बड़ी हलचल थी. गाँव की बहू, सत्या, ने राज्य स्तर पर अवॉर्ड जीता था. पंचायत भवन में उसके सम्मान में एक समारोह रखा गया था. लोग इकट्ठा हुए थे, ढोल-नगाड़े बज रहे थे.

सत्या मंच पर पहुँची. सिर पर घूंघट था. साथ में उसकी ननद राधा भी थी.
 
सत्या को घूंघट में देख कर भीड़ में खुसर-फुसर होने लगी. तभी एक नौजवान ने जोर से कह दिया ...
“देखो, इतनी पढ़-लिख कर भी घूंघट में आई है!”

“चुप्प¡ तुम्हें तमीज भी नहीं, भरी सभा में चिल्ला रहे हो. यही तो असली संस्कार है. बड़े पद पर है, अवार्ड जीता है, फिर भी घमंड नहीं. अपनी परंपरा को कैसे अच्छे से निबाह रही है.” पास ही बैठे बुजुर्ग ने नौजवान को डाँट पिलाई. कुछ लोग ताली बजाने लगे तो कुछ हँस पड़े.

तभी पास खड़ी सत्या की ननद राधा, जो कॉलेज में पढ़ रही थी, आगे बढ़ कर माइक पर आ गयी और सहज स्वर में बोली...
“इसे मेरी गुस्ताखी कहें कि मैं बिना बुलाए भाभी के साथ मंच पर आई और यहाँ अपनी बात कह रही हूं. आप खुद देखें यह संस्कार है? या बाध्यता? अगर सच में हमारी शिक्षा ने आज़ादी दी होती, तो सत्या भाभी को घूंघट की ज़रूरत ही न पड़ती. कोई स्त्री घूंघट में नहीं रहना चाहती. आप लोग समझ ही नहीं सकते कि यह घूंघट एक स्त्री को कैसी कैसी तकलीफें देता है.”

उसकी बात सुनकर बुज़ुर्गों में खुसर-फुसर शुरू हो गई. एक बुजुर्ग ने जोर से कहा...
“लड़कियाँ अब बहुत बोलने लगी हैं. “ये सब पढ़ाई का असर है. अंग्रेजी पढ़ाई बदतमीजी सिखाती है.”

अचानक मंच पर खड़ी सत्या ने अपनी ननद राधा को एक ओर किया और माइक पर खुद बोलने लगी. उसका स्वर धीमा था, लेकिन शब्दों में आग थी...
“आप कहते हैं कि घूंघट संस्कार है. लेकिन जब कोई पुरुष किसी स्त्री का घूंघट उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक स्थान पर हटाने की कोशिश करता है, तब वह किस तरह का संस्कार है?
आप कहते हैं कि हम पढ़-लिख कर भी आगे नहीं बढ़ पाए. लेकिन सच यह है कि शिक्षा का दरवाज़ा ही आधा खुला रखा गया है.
और जब हम बड़े पद पर पहुँचते हैं, तब भी आप हमें घूंघट में देखना चाहते हैं, ताकि आपके गर्व का झूठा आईना चमकता रहे.”

सभा में सन्नाटा छा गया. किसी नौजवान ने सन्नाटे को चीर कर जोर से कहा हिप हिप हुर्रे. कुछ लड़के लड़कियों ने उसके जवाब में फिर से हिप हिप हुर्रे को दोहराया.

तभी, सत्या ने आहिस्ता से घूंघट हटाया. उसकी आँखों में डर नहीं था, बल्कि दृढ़ता थी. वह फिर बोलने लगी...
“बदलाव की शुरुआत पुरुषों से होनी चाहिए. जब आप हमें सहजता और सम्मान देंगे, तब हम बिना डर के चल पाएंगी. और अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो कम से कम हमसे सवाल करने का अधिकार मत छीनिए.”

भीड़ में खामोशी थी. कुछ चेहरों पर शर्म थी, कुछ पर सोच.

राधा ने ताली बजाई. धीरे-धीरे और लोग भी ताली बजाने लगे. भीड़ में उपस्थित अनेक स्त्रियों ने जो घूंघट किए हुए थीं, अपना-अपना घूंघट हटाना शुरू किया. एक- एक कर पर्दों में कैद सभी चेहरे आजाद हो गए

गाँव में घूंघट की दीवार टूट चुकी थी.

ट्रेन में बहस

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
यह कोई 45-47 साल पहले का वाक़या है। मुझे अपने नगर से कोटा आना था. जनरल क्लास का कोच खचाखच भरा था, खिड़की के पास बैठा यात्री मेरा परिचित था वह उतरने वाला था. उसने मेरा बैग ले कर अपनी जगह रख दिया. मैं जैसे तैसे उस जगह जा कर बैठा. एक सफेद झक्क कुर्ता पायजामा पहने गोल टोपी लगाए गोरे सज्जन ठीक मेरे सामने वाली सीट पर खिड़की से दूसरे स्थान पर बैठे थे. अपने लिबास से वे सबसे अलग ही दिखाई दे रहे थे.
मैंने उन सफेदपोश सज्जन से पूछ लिया, “ जनाब कहाँ से तशरीफ ला रहे हैं?”

“यहीं से बैठा हूँ.”

"जनाब, सफ़र कहाँ तक है?"

“फिलहाल तो ट्रेन कोटा तक ही है, वैसे लखनऊ जाना है? उन्होंने बताया. आगे बातचीत से पता लगा वे मुफ्ती हैं. उन दिनों मोबाइल तो हुआ नहीं करते थे. ट्रेन में आसपास के यात्रियों से बातचीत या कोई किताब हो तो उसे पढ़ते जाना ही यात्रा का वक्त बिताने के तरीके हुआ करते थे. मैंने इसीलिए मुफ्ती साहब को छेड़ा...

“मुफ्ती साहब आप तो धार्मिक इंसान हैं, और आपने मजहबी तालीम भी हासिल की है. मेरे जेहन में बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या कोई ईश्वर है?”

"बिलकुल है. जो कुछ भी इस कायनात में है, उसका बनाने वाला ख़ुदा ही है."

सुन कर मैं मुस्कराने से खुद को रोक नहीं सका. मैंने बात आगे बढ़ाई...

“लेकिन जनाब, कायनात मतलब पूरा यूनिवर्स है. अभी तक तो हमें यह भी नहीं पता कि यह कायनात कितनी विशाल है. अरबों खरबों तारे, उनके गिर्द चक्कर काटते ग्रह, उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, पुच्छल तारे वगैरा-वगैरा. अरबों खरबों तारों बनी अरबों खरबों गैलेक्सियाँ. यह यूनिवर्स तो बहुत विशाल है. अभी तक जितनी इंसान जितनी क्षमता की दूरबीनें बना सका है उनसे यूनिवर्स का केवल हमारी धरती के गिर्द वाला हिस्सा ही हम ऑब्जर्व कर पाते हैं. उसके अलावा उसका कितना हिस्सा शेष है, उसका विस्तार कहाँ तक है, हम नहीं जान पाए हैं. हम जितना ऑब्ज़र्व कर सकते हैं, उतना ही देख पाते हैं. तो इतना बड़ा यूनिवर्स किसी ख़ुदा ने बनाया है.”

“यक़ीनन उसी ने बनाया है. आखिर हम देखते हैं कि बिना बनाए कुछ नहीं बनता है, तो जो बना बनाया है उसे ख़ुदा ने ही बनाया है. उन तमाम चीजों का होना ही तो ख़ुदा के होने का सबूत है.” मुफ्ती साहब बोले. अब वे मंद-मंद मुस्करा रहे थे.


“यानी ख़ुदा का होना यक़ीनन है?”

“जी बिलकुल यक़ीनन है.” मुफ्ती साहब ने फिर से ख़ुदा के होने की ताईद की.

“ग़र ख़ुदा है तो फिर उसको बनाने वाला भी होना चाहिए?” मैंने अपना नया सवाल दागा.

“देखिए ख़ुदा ऑब्जर्वेबल नहीं है, इसलिए हम कहते हैं कि वह खुद-ब-खुद है. वह खुद-ब-खुद है इसीलिए ख़ुदा है.”

“यानी पहले हम यह मानें कि इस यूनिवर्स को बनाने वाला कोई है, फिर यह मानें कि वह अनऑब्जर्वेबल है. इसके बाद यह मानें कि वह खुद-ब-खुद बना है. बड़ा झंझट है. हमें तीन-तीन चीजें मानें तब ख़ुदा सिद्ध हो. आपका ये ख़ुदा तो तीन-तीन बातों पर डिपेंडेबल है. इससे बेहतर तो यह है कि हम इस यूनिवर्स को ही ख़ुदा मान लें. कम से कम वह ऑब्जर्वेबल तो है और सिर्फ एक बात मानने पर डेपेंडेबल है कि आखिर कोई चीज तो है जो खुद-ब-खुद है.”

मेरा तर्क सुन कर मुफ्ती साहब की भौंहें चढ़ गईं. कहने लगे...
“यह यूनिवर्स ख़ुदा कैसे हो सकता है? यह तो ऑब्जर्वेबल है.”

“फिर तो ख़ुदा को मानने वालों और न मानने वालों में यही फर्क रहा कि ख़ुदा मानने वालों को तीन चीजें माननी पड़ेंगी. जब कि न मानने वालों को एक ही चीज माननी पड़ेगी.” यात्री अब तक मुस्करा रहे थे अब उनमें से किसी की हँसी भी फूट पड़ी और मुफ्ती साहब की भौंहें और चढ़ गयीं. मैंने अपना कहना जारी रखा...

“तो फिर बेहतर तो वह हुआ न जो एक ही चीज को मान लेता है.” इससे ख़ुदा का होना भी उसने मान लिया. बस वह मानता है कि यह यूनिवर्स ही ख़ुदा है. कोई ईश्वर, अल्लाह, गॉड वगैरा नहीं जो अक्सर ख़ुदाई किताबों में होना बताया जाता है.”

“नहीं जनाब, यह फेयर प्ले नहीं है. हमने जब बात शुरू की तो पहले ही कह दिया था कि जो ऑब्जर्वेबल नहीं है वह ख़ुदा है. चूंकि यूनिवर्स पूरा नहीं थोड़ा ही सही पर ऑब्जर्वेबल है, इसलिए ख़ुदा नहीं हो सकता.” मुफ्ती साहब ने अपनी आपत्ति पेश की.

“यह बात तो आपने कही थी, हमने मानी थोड़े ही थी. ये तो वही हुआ कि खुद ही नियम तय कर लें और खुद ही जीत की घोषणा कर दें. यह तो कोई बात नहीं हुई. मतलब तर्क का खात्मा और आस्था की शुरूआत.”

तब तक अगला स्टेशन आ चुका था. कोच में उतरने चढ़ने वालों में हलचल मच चुकी थी. वह बहस वहीं खत्म हो गयी. ट्रेन दुबारा चली तो बातचीत के दूसरे मुद्दे उठ गए.