@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: बेटा

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बेटा

लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी

आठ साल का आयुष अपनी बहन शगुन की पीठ पर सवार होकर घोड़ा-घोड़ा खेल रहा था. शगुन दस साल की थी, पर आयुष के मुकाबले हड्डियों में हल्की-सी थी. फिर भी वह अपने भाई को पीठ पर लादकर पूरे कमरे का चक्कर लगा रही थी, और दोनों के खिलखिलाहट से कमरा गूंज रहा था.

"घोड़ा रुक! अब मैं राजा बनूंगा!" आयुष ने कहा और शगुन की पीठ से कूदकर बिस्तर पर चढ़ गया. उसने चादर को कंधों पर लपेटा और माथे पर कागज़ का ताज रख लिया. शगुन ने अपनी चुनी हुई गुड़िया को गोद में उठा ली. वह रानी बनी.

तभी दरवाज़ा खुला और उनके चाचा अनिल अंदर आए. उनकी नज़र सबसे पहले आयुष पर पड़ी, जो चादर ओढ़े खड़ा था, फिर शगुन पर जो गुड़िया को सुला रही थी.


चाचा का चेहरा कड़क हो गया. "आयुष! लड़के चादर नहीं ओढ़ते. लड़के घोड़ा-घोड़ा नहीं खेलते. तुम्हें पढ़ना चाहिए, क्रिकेट खेलना चाहिए."

आयुष स्तब्ध रह गया. "और तुम, शगुन, भाई को पीठ पर लादती हो? लड़कियाँ इतना शोर नहीं करतीं. जाओ, माँ के पास रसोई में मदद करो."

शगुन ने गुड़िया वहीं छोड़ी और बिना एक शब्द कहे कमरे से बाहर चली गई. आयुष ने देखा कि उसकी आँखें नम थीं.

"चाचा, हम तो बस खेल रहे थे," आयुष ने कहा, उसकी आवाज़ में एक कंपन था.

"खेल भी सीखना पड़ता है, बेटा," चाचा ने कहा, "तुम लड़के हो. तुम्हें मज़बूत बनना है. लड़के रोते नहीं, लड़के डरते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."



चाचा के जाने के बाद, आयुष अकेला कमरे में खड़ा रहा. उसने चादर उतारकर बिस्तर पर फेंक दी. फिर उसने शगुन की छोड़ी हुई गुड़िया उठाई.

वह गुड़िया लेकर रसोई में गया. शगुन बर्तन साफ़ कर रही थी, उसकी आँखें अब भी लाल थीं.

"यह लो," आयुष ने गुड़िया बढ़ाते हुए कहा.

शगुन ने गुड़िया ले ली, पर उसने आयुष की आँखों में नहीं देखा.

"चाचा ने कहा लड़के रोते नहीं," आयुष ने कहा, "पर तुम रो सकती हो, है न?"

शगुन ने सिर हिलाया, "लड़कियाँ रो सकती हैं. पर खेल नहीं सकतीं."



अगली सुबह, शगुन ने फिर से अपना खिलौना लेकर आयुष के कमरे में दस्तक दी. "चलो, आज मैं राजा बनूँगी!" वह बोली.

आयुष ने उसे देखा. फिर अचानक उसकी नज़र दरवाज़े पर गई—जहाँ कल चाचा खड़े थे. एक क्षण के लिए, उसके मन में चाचा की आवाज़ गूँज उठी. उसने शगुन की ओर हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया.

"नहीं... मुझे पढ़ना है," आयुष ने कहा, और किताबें लेकर बैठ गया.

शगुन कुछ पल वहीं खड़ी रही, फिर धीरे से चली गई. आयुष किताब की ओर देखता रहा, पर अक्षर धुंधले पड़ गए थे.



चार साल बाद, आयुष बारह साल का हो गया.

स्कूल की क्रिकेट टीम के चयन में उसका नाम नहीं आया. वह पूरा दिन मैदान में बैठा रहा, टीम की प्रैक्टिस देखता रहा. घर लौटते हुए, उसकी आँखों में पानी भर आया. गले में एक गाँठ सी बन गई, जो साँस लेने में रुकावट डाल रही थी.

वह बाथरूम में गया और शीशे के सामने खड़ा हो गया. आँखें लाल थीं, गाल गीले हो रहे थे. तभी उसके कानों में अपने चाचा की आवाज गूंजी, साफ़ और कठोर: "लड़के रोते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."

उसने अपने सब ओर देखा, चाचा कहीं नहीं थे. पर कानों में उनकी आवाज गूंज रही थी.

आयुष ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं. नाखून हथेलियों में चुभने लगे. उसने अपना सिर ऊपर उठाया, आँखें फैलाकर ताका जिससे आँसू बहने न पाएँ और एक गहरी, कँपकँपी भरी साँस ली.

फिर उसने नल खोला और ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया. पानी और आँसू एक हो गए. जब वह बाहर आया, तो उसके चेहरे पर कोई नमी नहीं थी. केवल एक खालीपन था, जैसे किसी ने उसके भीतर का एक कोना साफ़ कर दिया हो.



उस रात खाने की मेज़ पर शगुन ने पूछा, "टीम में चुन लिए?"

आयुष ने सिर हिलाया, "नहीं. कोई बात नहीं."

उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो. शगुन ने उसे देखा, उसकी पीठ एकदम सीधी थी और होंठ जैसे हिले ही न हों. वह कुछ कहना चाहती थी, पर चुप रही. उसे पता था, आयुष अब वह बच्चा नहीं रहा जो गुड़िया वाली बात करता था.

आयुष ने अपनी प्लेट साफ़ की. उस दिन वह रोया नहीं था, और उस दिन के बाद भी वह कभी नहीं रोया.

लड़के रोते नहीं.

और उसने सीख लिया था.

और शगुन समझ गयी थी कि अब वह और आयुष अपने माता पिता के बच्चे होते हुए भी बेटी और बेटे हो गए हैं.

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