लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
आयुष के आने की खबर ने घर में एक विचित्र हलचल पैदा कर दी. माँ ने शगुन से पूछा कि क्या वह कमरे को तैयार कर लेगी जिससे आयुष को कोई परेशानी न हो. शगुन ने माँ को आश्वस्त कर दिया. फिर भी आयुष के आने के दिन सुबह माँ ने हर एक चीज जाँची कि सब कुछ ठीक है या नहीं. हर रोज सुबह चाय पर चाचा अखबार पढ़ते हुए चाची को कहना नहीं भूलते कि, "अब सब संभल जाएगा. लड़की को मर्द की नज़र चाहिए." चाची बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुप ही रहती, लेकिन सजग बनी रहती.
एक शाम रसोई में चाची ने शगुन को अकेले पाकर कहा, "तू डरना मत... पर लड़ना भी मत. समझाना. हमें तो समझाने का मौका भी नहीं मिला." यह चाची की शगुन से पहली सीधी बात थी. शगुन ने देखा, उनकी आँखों में उम्मीद थी, जैसे वे अपनी ज़िंदगी की लड़ाई शगुन के माध्यम से लड़ रही हों.
शगुन ने फैसला किया, वह आयुष का स्वागत अपने तरीके से करेगी. उसने कमरे में आयुष के बिस्तर के पास की मेज पर दो चीज़ें रखीं; एक साइकिल की चाबी, और पुस्तकालय से लाई गई किताब "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप"; जो पारंपरिक मर्दानगी के मनोवैज्ञानिक ख़तरों पर थी.
सुबह चाचा स्टेशन गए. शगुन साइकिल लेकर बाज़ार गई, आयुष के लिए उसकी पसंद का समोसा लाने. यह उसकी शांत चुनौती थी, “मैं अकेले आ-जा सकती हूँ, और तुम्हारी पसंद का ख़्याल भी रख सकती हूँ.”
सुबह के साढ़े दस बजने को थे, टैक्सी के रुकने की आवाज आई. शगुन ने दरवाजा खोला. आयुष टैक्सी के बाहर कदम रख रहा था. वह कैजुअल्स में था, चेहरा एक दम सख्त, आँखों के नीचे गहरे घेरे उसकी थकान बता रहे थे. उसकी नज़र पहले शगुन पर पड़ी, फिर उसकी जेब से झाँक रही साइकिल की चाबी पर. चाचा ने आयुष का बैग टैक्सी से बाहर निकाला, टैक्सी वाले को भाड़ा दिया. आयुष ने चाचा से बैग लेने की जहमत नहीं उठाई, वह दरवाजे से घर के अंदर आया और सीधे लिविंग रूम में आ बैठा. शगुन भी उसके पीछे पास ही आ बैठी. उसके चेहरे पर न मुस्कान थी, न डर, बस एक स्थिरता थी.
“सफर कैसा रहा?” उसने आयुष से पूछा.
“सफर जैसा सफर, बस वहाँ से बैठे, यहाँ आकर उतर गये.” उसके स्वर में हलका अहंकार था.
"तू..." आयुष ने शुरू किया, आवाज़ में एक खिंचाव.
"सफ़र लंबा तो था ही," शगुन उठी और डाइनिंग पर रखे पैकेट को खोल कर समोसों से प्लेट सजाई और लाकर आयुष को देते हुए बोली, तेरा मनपसंद नाश्ता... लाई हूँ.
आयुष ने प्लेट हाथ में ली. अब उसकी नजरें समोसों पर थीं. लेकिन, सवाल शगुन से किया “तेरे को अकेले जाना जरूरी था?
"आते ही भाई का मनपसंद नाश्ता जरूरी क्यों नहीं था? और मैं अकेली नहीं थी, मेरी साइकिल साथ थी.” जवाब देते हुए शगुन अपनी जेब से साइकिल की चाबी निकाल कर दाएँ हाथ की तर्जनी में घुमाने लगी थी.
तभी चाचा आयुष का बैग कमरे में रख कर लिविंग में पहुँच गए.
“तो तू समोसे लेने चली गयी?” चाचा ने सोफे पर टिकते हुए शगुन से ऐसे कहा जैसे उसने कोई गलती कर दी हो.
“आपके लिए भी हैं.” शगुन तब तक दूसरी प्लेट में समोसे सजा चुकी थी. उसने दूसरी प्लेट चाचा के आगे बढ़ा दी. आयुष समोसा खाते हुए शगुन की ओर देखता रह गया उससे कुछ कहते नहीं बना.
नाश्ते के बाद आयुष कमरे में आया उसका बिस्तर कायदे से सजा हुआ था. वह अपने बिस्तर पर बैठा. उसके दायें ओर दोनों के बिस्तरों के बीच खिड़की के पास रखी मेज पर एक किताब रखी थी, "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप". आयुष ने उसे उठा लिया. किताब तहसील पुस्तकालय से लायी हुई थी. वह समझ गया कि शगुन की पुस्तकालय तक नियमित दौड़ है.
रात के भोजन पर चाचा शुरू हो गए, "अब भाई आ गया है, शगुन. तू भी समझदार हो जा. साइकिल से इधर उधर घूमना छोड़ घर के काम सीखने पर ध्यान दे.”
शगुन रोटी से कौर तोड़ते हुए मुस्कुराकर बोली, "मैं पढ़ाई में अव्वल हूँ, चाचा. और साइकिल से ही समय बचता है."
आयुष चुप था, पर उसकी नज़रें शगुन के हाथों पर थीं. जवाब देते हुए उसके हाथों में कोई कंपन नहीं था. माँ ने चाचा की प्याली में सब्ज़ी परोसते हुए कहा, "पहले खाना खा लो, बातें बाद में कर लेना."
चाची ने रसोई में रोटी बेलते हुए लिविंग में एक निगाह डाली, उनके चेहरे पर मुस्कान थी.
आयुष को रात में ठीक से नींद नहीं आई. वह उठकर बहार बरामदे में आया. शगुन की साइकिल वहाँ टिकी थी. उसके पहियों की रिमें और हैंडल चाँदनी में चमक रहे थे. उसने अनजाने में एक पहिए को हाथ से घुमा दिया.
"तू भी कुछ कहना चाहता है, पर डर रहा है न?" पीछे से चाची की आवाज़ आई. आयुष चौंका. चाची पानी पीने आई थीं. "शगुन डरपोक नहीं है, बेटा. वह सिर्फ़ इंसान है; जैसे तू है. और तेरा डर... वह तेरी ताकत नहीं, तेरी कैद है." इतना कहकर चाची चली गईं, पर उनके शब्द हवा में लटक गए.
आयुष कमरे में लौटा. शगुन गहरी नींद में थी. उसने टेबल लैंप का स्विच ऑन करके इस तरह रखा जिससे शगुन के बिस्तर पर रोशनी न जाए. वह मेज पर पड़ी किताब "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप" उठा कर देखने लगा. किताब में कवर के बाद ही एक कागज लगा था. जिस पर उसके लिए लिखा था;
"आयुष, इसे तुम भी पढ़ लेना. बस यह जान लो, मैंने इसे पढ़ चुकी हूँ. और अब मैं वह नहीं, जो तुम्हारे जाने के पहले थी.” – शगुन"
आयुष ने किताब बंद की. उसकी नज़र मेज के पार खिड़की पर गई. वहाँ शगुन ने एक छोटा सा पौधा रखा था, जिसके गमले पर एक कागज़ चिपका था: "इसे धूप और पानी दोनों चाहिए."
उसे अचानक एनसीसी कैंप की याद आई; वह कमजोर कैडेट जिसे धूप में खड़ा किया गया था. उसके हाथ काँप उठे थे. बाहर, रात का अंधेरा था. घर के भीतर, दो दिलों के बीच एक नए संघर्ष की तैयारी थी. वह सोच रहा था; शगुन बहुत आगे बढ़ गयी है.
क्रमशः .....
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