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गुरुवार, 12 मार्च 2026

रूपांतरण

पिंजरा और पंख-55

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

श्रृंखला फाइनल- अन्तिम कड़ी

शगुन का नियुक्ति पत्र देखने के बाद अनिल चाचा अवाक रह गए थे. उनकी पितृसत्ता वाली कंडीशनिंग को चोट लगी थी. वे एक-दो दिन मौन रहे, कुछ नॉर्मल हुए तो उन्होंने शगुन और आयुष से बात करना शुरू किया. वे शगुन से बनस्थली के बारे में और आयुष से आईआईटी गुवाहाटी के बारे में सवाल करने लगे. कई बार उनकी प्रतिक्रिया होती, “अच्छा ऐसा भी है?” ... “मतलब हम तो कुएँ के मेंढक ही रह गए" ... हमने जाना ही नहीं कि दुनिया कितनी बड़ी और विविध है, ... कहाँ थी और कहाँ जा रही है?” ... “हम तो सरकारी दफ्तरों में अपनी जान पहचान, कुछ व्यापारियों और कुछ नेताओं से रसूख को ही दुनिया समझे बैठे थे. तुमसे पता लगा कि वास्तविक ज्ञान के सामने वह सब महत्वहीन है.”  इस बातचीत से चाचा की ग्रंथियाँ शनै-शनै खुलने लगीं. अब वे शगुन और आयुष से अभिभावक जैसा नहीं, बल्कि दोस्तों जैसा व्यवहार कर रहे थे. देखते-देखते जून की बीस तारीख आ गई.

शगुन का सत्र 27 जून से आरंभ होना था. उस दिन उसे ‘टीचिंग असिस्टेंट’ के पद पर जॉइन भी करना था. वह चाहती थी कि 25 को ही बनस्थली पहुँच जाए. जिससे वह अपने एडमिशन और होस्टल आवंटन का काम पूरा कर सके. उसने पैकिंग शुरू कर दी थी. इस बार उसे नया होस्टल मिलने वाला था और जरूरत का सारा सामान ले जाना था. दो दिन वह चाची के साथ बाजार जाकर स्त्रियों के लिए जरूरी वस्त्र और दूसरे सामान खरीद लाई थी.

जाने के तीन दिन पहले रात को डिनर के बाद, जब चाचा पान खाने के लिए बाज़ार चले गए और गुप्ताजी ड्राइंग रूम में आकर बैठे, तभी शगुन उनके पास आकर बैठी और बतियाने लगी. करीब आधे घंटे इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने कहा.

“पापा, आप दिल पर न लें तो एक बात कहूँ?”

“बोल ना, कभी तेरी बात को दिल पर लिया है मैंने?”

 “सोचती हूँ कि मैं 25 जून को सुबह पाँच बजे वाली जयपुर एक्सप्रेस बस पकड़ूँ, वह 9:30 बजे मुझे निवाई उतारेगी. वहाँ से ऑटो रिक्शा लेकर मैं बनस्थली पहुँच जाऊंगी.”

गुप्ताजी ने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा दिए.

“अच्छा तुझे नौकरी मिल गयी तो इत्ती बड़ी हो गई है, अब हम तुझे बनस्थली छोड़ने भी नहीं जा सकते. तुझे हमारे छोड़ने आने से कोई तकलीफ है?”

“नहीं पापा, मुझे कोई तकलीफ नहीं है. पर आप जाते हैं, रात गेस्ट हाउस में रुकते हैं और अगले दिन वापस लौटते हैं. इतनी दूर कार चलाने से थकान भी तो होती है. फिर मैं सोच रही थी कि इस बार मैं अपना पहला जॉब शुरू करने जा रही हूँ... तो आत्मनिर्भर होने का अहसास घर से ही क्यों न शुरू करूँ?”

गुप्ता जी की आँखों में हल्की चमक, थोड़ा गर्व और थोड़ी शरारत थी. उन्होंने शगुन के कंधे पर हाथ रखा.

"शगुन, तुम एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हो, यह तुम साबित कर चुकी हो. लेकिन अभी तुमने नौकरी जॉइन नहीं की है. अभी तुम जॉइन करोगी, अगस्त के पहले सप्ताह में तुम्हारा पहला वेतन तुम्हारे हाथ में आएगा. उस दिन मैं मानूँगा कि मेरी बेटी सचमुच अपने पैरों पर खड़ी हो गई है. उसके बाद तुम अपनी फीस खुद भरना, अपनी पसंद के कपड़े खरीदना और शायद हमारे लिए भी कुछ लाना. पर अभी? अभी तो हम ही तुझे छोड़ने चलेंगे."

“पापा, आपने तो मेरा सारा प्लान ही ध्वस्त कर दिया.” शगुन हल्की मुस्कान के साथ बोली.

“अच्छा शगुन मेरी बात सुन.” अनिल चाचा की आवाज सुन कर शगुन चौंक कर आश्चर्य से उन्हें देखा. उसे इस बात का अहसास ही नहीं था कि वे वहाँ आ बैठे थे और उनकी बातें सुन रहे थे.

“चाचा, आप?

“शगुन मैं तो बहुत देर से तेरी और भाई साहब की बातें सुन रहा हूँ. अब मेरी बात सुन. आज मेरी 26 से 1 जुलाई तक की छुट्टी मंजूर हो गयी है, 2 को रविवार है. मेरे पास पूरे आठ दिन हैं. तेरी चाची भी जयपुर घूमना चाहती है. तो भाभी और भाई साहब की जगह तुझे छोड़ने मैं और चाची जा रहे हैं, साथ में मुक्ति भी होगी. आयुष से भी पूछेंगे, वह भी हमारे साथ घूम आएगा. कैसा रहेगा?”   

शगुन चाचा के इस प्रस्ताव से चकित थी. यह तो उसे पता था कि चाचा का रूपांतरण (Transformation) तेजी हो रहा है. लेकिन उसे यह अहसास नहीं था कि वे इस स्तर तक पहुँच जाएंगे. उसने पापा की ओर देखा तो वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे.

“मतलब पापा, ये बात आपको भी पता थी.” शगुन ने रुआँसा होने का अभिनय करते हुए कहा.

“मुझे भी अनिल ने शाम को ही बताया. मुझे प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा तो मैंने तुरन्त हाँ कर दी. तुझे मंजूर न हो तो यह नहीं जाएगा.”

“नहीं पापा, चाचा-चाची मुक्ति के साथ मुझे छोड़ने जाएँ, वहाँ दो-तीन दिन रुकें, सब कुछ देखें. इससे अच्छा क्या हो सकता है? आखिर कभी तो उन्हें भी मुक्ति के भविष्य के बारे में सोचना होगा.”

“मुक्ति की मुझे अब कोई चिन्ता नहीं. उसकी सोचने वाले यहाँ तुम और आयुष हो तो.” चाचा ने कहा.

 

25 जून की सुबह.

गुप्ता निवास के बाहर सुबह से ही चहल-पहल थी. हवा में रामगंजमंडी की वही परिचित महक थी, लेकिन शगुन को आज सब कुछ नया लग रहा था. गुप्ताजी की कोरल रेड मारूति-800 बनस्थली जाने को तैयार खड़ी थी.

चाचा ड्राइविंग सीट पर थे, शगुन आगे बैठी, पीछे चाची और आयुष, आयुष की गोद में थी मुक्ति. मम्मा-पापा ने उन्हें हाथ हिलाकर विदा किया. कार धीरे-धीरे गली से बाहर निकलने लगी. ताई-ताऊ की ओर देखते हुए मुक्ति उत्साह से हवा में हिला रही थी.

शगुन ने भी खिड़की से पीछे देखा कि उसका घर छोटा होता जा रहा है, लेकिन उसके अपने भीतर का आसमान बड़ा होता जा रहा था. उसने अपने छोटे बैग से अपनी ‘संबल’ नोटबुक निकाली और लिखना शुरू किया:

"स्वतंत्रता का अर्थ रिश्तों को तोड़ना नहीं, बल्कि रिश्तों में अपनी पहचान को ढूँढना है. संबल केवल सहारा नहीं, बल्कि वह विश्वास है जो आपको तब भी उड़ने की शक्ति देता है जब हवाएँ खिलाफ बह रही हों.

आज मेरे लिए पिंजरे का दरवाज़ा खुल चुका है…     अब सारा आसमान मेरा है."

 (समाप्त)

बुधवार, 11 मार्च 2026

रिजेक्शन?

पिंजरा और पंख-54

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

श्रृंखला फाइनल-4
मेहमानों की कार मुख्य सड़क पर जाकर मुड़ी और ओझल हो गयी. अनिल चाचा को ध्यान आया कि मेहमान होटल से रवाना हों उससे पहले उनसे मिल लेना चाहिए. उन्होंने जल्दी में घर के बाहर खड़ा अपना स्कूटर स्टार्ट किया और गुप्ताजी को कहा, “भाई साहब¡ मैं मेहमानों को छोड़ कर होटल का हिसाब करके आता हूँ.”

शगुन अपने कमरे में थी, लेकिन उसकी नज़रें सीढ़ियों की ओर थीं. वह जानती थी कि कुछ देर में कोई तो आने वाला है. तभी चाची कमरे में आईं. पूछने लगी, “शगुन ऐसा क्या हुआ जो वे अचानक चले गए.”

“कुछ नहीं चाची, बस हमारे बीच नॉर्मल बातें ही हुई थीं, वे और उनके परिवार को मुझ से क्या अपेक्षा है, और मैं क्या करना चाहती हूँ.”

“कोई बात नहीं शगुन, वे इन्दौर पहुँच कर जवाब दे देंगे. हमें कौन सी जल्दी है?”

“हाँ चाची, बस अनिल चाचा के सिवा किसी को जल्दी नहीं.”

“उनका तो तू कुछ मत कह, उन सा बिरला तो कोई नहीं.”

तब तक मुक्ति को गोद में उठाए आयुष भी आ गया.

“मैं नीचे चलूँ, बहुत कुछ समेटना है.” चाची इतना कह कर वापस नीचे चल दीं.

चाचा शाम को देर से लौटे. उन्होंने उस दिन किसी से कोई बात नहीं की.

सोमवार की शाम तूफान आया.

अनिल चाचा ऑफिस से लौटे. सीधे लिविंग रूम में आकर बैठ गए. उनका चेहरा गुस्से से लाल था. श्रीमती गुप्ता पानी का गिलास लेकर गयीं.

"देख लिया भाभी! हो गई न थू-थू? अभी दफ्तर से निकलने के पहले इंदौर वालों का फोन आया था. विवेक के पापा कह रहे थे कि 'लड़की हमारे घर में एडजस्ट नहीं कर पाएगी, हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं.' उन्होंने साफ़ कहा कि 'विवेक कह रहा है कि लड़की को अपनी पढ़ाई पर बहुत घमंड है, बहुत बोलती है, आपसी बातचीत में उसे तो बोलने ही नहीं दिया.' हमारी सात पुश्तों में आज तक किसी ने 'रिजेक्ट' होने का दाग नहीं सहा था, और आज मेरी भतीजी ने ही यह तोहफा दे दिया है.”

तब तक शगुन भी वहाँ आ गयी थी.

“शगुन! क्या कहा था तुमने उस लड़के से?"

चाचा चिल्ला रहे थे. मम्मा रसोई के दरवाज़े पर खड़ी होकर रोने लगीं.

तभी आयुष नीचे उतर कर आया और अनिल चाचा के सामने खड़ा हो गया. चाचा ने देखा कि वह शगुन के आगे एक कवर की तरह खड़ा है.

"चाचा जी, किसी की औकात नहीं कि दीदी को रिजेक्ट कर दें. असली रिजेक्शन तो उनके उस खोखले अहंकार का हुआ है जिसे वे 'संस्कार' और 'परंपरा' कहते हैं. वे रिजेक्ट हुए हैं, वह पूरा परिवार ही दीदी के काबिल नहीं!"

अनिल चाचा आयुष को घूरने लगे. वे उसे डांटने ही वाले थे कि अचानक अपने आँसू पोंछते हुए मम्मा सामने आ गयीं. उन्होंने अनिल चाचा के चेहरे की ओर देखा, “बस देवर जी, बहुत हो गया. बच्चे अब जवान हो गए हैं, आयुष तो आपके कंधे से ऊपर है, दोनों समझदार हैं. अपना भला बुरा समझते हैं. उन्हें भी बोलने का हक है. हमें उनकी बात सुननी चाहिए. उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते."

अनिल चाचा हक्के-बक्के रह गए. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि भाभी ऐसा बोल सकती हैं. उन्होंने एक बार आयुष और शगुन की ओर देखा और चुपचाप उठकर ऊपर अपने कमरे की और चल दिए.

चाची तब तक रोज की तरह सबके लिए चाय बना लायी थी और मिसेज गुप्ता के पीछे खड़ी थीं.

“भाभी, आयुष और शगुन सब बैठिए और चाय पी लीजिए. उनकी चाय मैं कमरे में दे आती हूँ.”

“अभी, इस वक्त, तू देवर जी को चाय देकर आएगी? सारा गुस्सा तुझपर निकल जाएगा.”

“नहीं निकलेगा भाभी, मुक्ति कमरे में ही सो रही है. उसके सामने कुछ नहीं कहेंगे. बस मुक्ति ही तो है जिसके सामने वे कुछ नहीं कह सकते.” इतना कहकर चाची मुस्कुराते हुए ट्रे में दो चाय लेकर जीना चढ़ने लगी.

शाम को डाइनिंग टेबल पर सब साथ थे. चाची रसोई में फुलके उतार रही थीं और श्रीमती गुप्ता परोस रही थीं.

“शगुन, अब तो बता आखिर तुम्हारे और विवेक के बीच बात क्या हुई थी?” अनिल चाचा ने पूछा, अभी वे पूरी तरह शान्त थे.

"कुछ नहीं चाचा, सच तो यह है कि मैंने ही उन्हें रास्ता दिखाया था. मैंने बालकनी में विवेक को साफ़ बता दिया था कि मैं उनके उस सुनहरे पिंजरे में नहीं रह सकती जहाँ मेरी पहचान सिर्फ एक बहू की हो, जो घर-परिवार संभाले और कपड़ों का बिजनेस देखे. मैंने उनसे कह दिया था कि मेरा भविष्य बनस्थली में है, रिसर्च में है."

शगुन की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी कि अनिल चाचा अवाक रह गए.

शगुन ने आगे कहा, "मैंने उनसे यह भी कहा था कि वे नीचे चलकर खुद मना कर दें ताकि उनकी गरिमा बनी रहे और उनके माता-पिता अपमानित महसूस न करें. मैंने उन्हें चुनाव दिया था, और उन्होंने 'अपमान के भय' को चुना. उन्होंने इंदौर पहुँचकर मना किया, क्योंकि वे 'रिजेक्ट' होना सह सकते थे, पर 'अपमान' नहीं." यह कहते हुए शगुन ने गुप्ताजी को अपना ‘टीचिंग असिस्टेंट’ के पद पर नियुक्ति का आदेश थमा दिया.

गुप्ताजी ने पत्र पढ़ा, फिर शगुन की आँखों में देखा, उन आँखों में वही 'संबल' था जो उन्होंने कभी अपनी माँ की आँखों में देखा था, पर पहचान नहीं पाए थे.

“हाँ पापा, मेरे आते ही मेहमानों के आने का उल्लेख चल निकला और मैं यह पत्र और आप सबको बता नहीं पायी. मेरी नियुक्ति बनस्थली विद्यापीठ में टीचिंग असिस्टेंट के पद पर हो गयी है. मैं इसके साथ ही एम.एससी. और पीएचडी कर सकती हूँ. बल्कि अपना खर्च उठाने के साथ ही कुछ बचा भी सकती हूँ.”

गुप्ताजी की आँखें सजल हो गयी थीं. गुप्ताजी ने पास बैठी शगुन को अपनी छाती से लगा लिया. अब शगुन की आँखें भी छलकने को थीं.

"अनिल, मैंने उस दिन होटल में उनकी बातें सुनी थीं... शायद मैं भी डर रहा था. पर आज मुझे गर्व है कि मेरी बेटी में वह कहने की हिम्मत है जो मैं नहीं कह पाया."

अनिल चाचा क्या कहते? वे अवाक, सब कुछ देख रहे थे.
... क्रमशः

मंगलवार, 10 मार्च 2026

उपहास-भय

पिंजरा और पंख-53

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-3
रविवार सुबह से ही गुप्ता निवास में हलचल शुरू हो गई थी. अनिल चाचा सुबह तैयार होकर नाश्ते के बगैर ही निकले और स्कूटर से होटल ऋतुराज का एक चक्कर लगा आए. वे दस बजे लौटे तब तक नाश्ते के बाद घर में सभी नहा-धो कर तैयार हो चुके थे. चाची और मम्मा मेहमानों के लंच की तैयारी में जुटी थीं. वापस लौटते ही चाचा ने घोषणा कर दी कि मेहमान साढ़े ग्यारह से बारह बजे के बीच यहाँ पहुँच जाएंगे. फिर वे ड्राइंग रूम की सजावट को परखने लगे, जिसे पहले ही उनके निर्देशानुसार किसी वीआईपी लाउंज की तरह सजा दिया था. मेज़ पर काजू-किशमिश के डोंगे, ताज़ा रसगुल्ले और नमकीन सजा दिए गए थे. पर वातावरण में एक अजीब सा तनाव भरा था. डेढ़ साल की मुक्ति इस तनाव से बेखबर सजावट से खुश होकर इधर से उधर और उधर से इधर दौड़ लगा रही थी. 

पौने बारह बजे इंदौर वाले मेहमानों की लंबी कार घर के बाहर रुकी. विवेक, उसके माता-पिता और उसकी विवाहित बहन नीचे उतरे. चाचा ने बाहर आकर उनका स्वागत किया और उन्हें ड्राइंग रूम में ले आए. औपचारिक बातचीत शुरू हुई. विवेक के पापा लगातार बोले जा रहे थे, जिसमें उनके बिजनेस के टर्नओवर, खानदान की शहर में प्रतिष्ठा, सरकारी अफसरों और राजनेताओं से उनके रिश्ते वगैरह का उल्लेख था जो खत्म नहीं हो रहा था. बीच-बीच में विवेक की माँ कुछ न कुछ अपनी ओर से जोड़तीं और हर बार अपने गहने और साड़ी ठीक करने का अभिनय करतीं. जबकि विवेक की नज़रें बार-बार अंदर के दरवाज़े की ओर उठ रही थीं, जो किसी को भी उसकी तरफ देखते देखकर वापस अपने पिता और बहिन की तरफ मुड़ जाती थीं. टेबल पर सजे महंगे नाश्ते की ओर किसी ने देखा तक नहीं. चाचा ने एक दो बार नाश्ते की और इशारा कर मेहमानों से कहा भी कि ‘कुछ तो लीजिए’. जवाब में सुनने को मिला कि ‘अब सीधे लंच ही करेंगे.’

वक्त हुआ तो सभी ने डाइनिंग में बैठे, लंच किया. इस बीच शगुन एक दो बार मिठाई परसने आई. उसने मेहमानों को अभिवादन किया और परस कर वापस चली गयी. मेहमानों ने उसे देख भी लिया. वह बिना किसी बनाव-श्रृंगार के, खादी के कुर्ते में वह किसी साधारण लड़की के बजाय एक सुशिक्षित प्रोफेशनल लग रही थी.

लंच के बाद फिर से सब ड्राइंग रूम में बैठे. विवेक की माँ ने शगुन को भी वहीं बुलाने को कहा. कुछ देर में वह कॉफी लेकर आयी और सर्व करने के बाद जब वह बैठने लगी, तो विवेक की माँ ने उसे अपने पास बिठा लिया. उससे कुछ किताबी सवाल पूछे. विवेक बेचैन था, उसने माँ को इशारा किया कि वह अकेले में शगुन से बात करेगा. उसकी माँ ने मुस्कुराकर कहा, "भाई साहब, अगर बुरा न मानें तो बच्चों को आपस में दस मिनट बात करने दें?"

“क्यों नहीं? जरूर.” कह कर गुप्ताजी ने अनुमति दी और शगुन विवेक को साथ लेकर ऊपर की छोटी बालकनी में आ गई. दरवाजा बंद होते ही बात शुरू हुई. परिचय की औपचारिक बातें करने के बाद विवेक बोला, “आपका बी.एससी. मनोविज्ञान में करना बहुत बढ़िया है. व्यापार और सभी तरह के संबंधों को बनाए रखने में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा. वैसे अब आपका आगे क्या करने का इरादा है?”

शगुन तो इसी सवाल का जैसे इन्तजार कर रही थी. उसने मेज पर रखी अपनी 'संबल' नोटबुक को हौले से हाथ से छुआ और बोली, "विवेक जी, मैं अपने भविष्य के बारे में निर्णय कर चुकी हूँ."

शगुन की आवाज़ में एक ऐसी स्पष्टता थी कि विवेक स्तब्ध रह गया.

"मेरा चयन बनस्थली में 'टीचिंग असिस्टेंट' के पद पर हो चुका है. मुझे जून के अंतिम सप्ताह में वहाँ जोइन करना है. इसके बाद मैं पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुकी होऊंगी. मुझे मनोविज्ञान में एम.एससी. करना है और सके बाद पी.एच.डी. करनी है. मेरा भविष्य अध्यापन और रिसर्च में है. मुझे बिजनेस में रत्ती भर भी रुचि नहीं है."

सुन कर विवेक हैरान था, एक लड़की जिसे वे देखने आए हैं, ऐसी बात कैसे कर सकती थी. शगुन ने आगे कहा, "नीचे आपके परिवार ने मेरे लिए एक 'पिंजरा' तैयार किया है जहाँ मुझे घर की बहू बनकर घर-परिवार के साथ कपड़ों का बिजनेस संभालना होगा. मैं उस पिंजरे में नहीं रह सकती. मैं नीचे सबके सामने मना करने वाली हूँ. इससे आपके माता-पिता अपमानित महसूस कर सकते हैं. मैं नहीं चाहती कि किसी का अपमान हो."

विवेक ने कुछ बोलना चाहा, पर शगुन ने हाथ के इशारे से उसे रोका. "बेहतर होगा कि आप नीचे चलकर कहें कि आप 'सोचकर बताएंगे' और यहाँ से निकल जाएँ. बाद में होटल या इंदौर पहुँचकर आप मना कर दीजिएगा. लेकिन यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो मैं खुद सबके सामने मना कर दूंगी. चुनाव आपका है."

विवेक ने शगुन के आत्मविश्वास को देखा. उसने ऐसी लड़की पहले कभी नहीं देखी थी जो इतनी विनम्रता से इतनी बड़ी चोट कर सकती थी. पाँच मिनट बाद जब वे नीचे उतरे, विवेक का चेहरा उतरा हुआ था. शगुन जानती थी कि अपमान के भय (Gelotophobia) का उसका प्रयोग सफल रहा था.

अनिल चाचा तिलक का थाल तैयार रखे थे, पर विवेक ने अपने पिता के कान में कुछ कहा. उसके पिता ने गला साफ़ करते हुए गुप्ता जी से कहा, "भाई साहब, बच्चे ने कहा है कि वह थोड़ा और सोचना चाहता है. हम इंदौर पहुँचकर आपको फोन करेंगे."

अनिल चाचा को कुछ नहीं सूझा, हड़बड़ाहट में उनका हाथ तिलक के थाल पर लगा और उसमें रखी रोली की कटोरी उछल कर टेबल के नीचे गिर गयी. सब अवाक थे. मेहमान इसके साथ ही उठ खड़े हुए. गुप्ता, अनिल और श्रीमती गुप्ता उन्हें छोड़ने के लिए बाहर सड़क तक आए. शगुन ऊपर अपने कमरे में चली गयी, चाची रसोईघर में. ड्राइंगरूम में बस आयुष और मुक्ति ही रह गए.  मुक्ति को बस यह पता लगा कि मेहमान जो आए थे, वे गए. उसने आयुष की ओर मुड़ कर कहा, "दादा...... गए" आयुष के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई. 

"हाँ, मुक्ति, गंदे वाले मेहमान गए." इतना कह कर आयुष ने मुक्ति को गोद में उठा लिया और बाहर आया. उसने देखा कि मेहमानो की कार रवाना हो रही थी.
... क्रमशः

सोमवार, 9 मार्च 2026

सन्नाटे की गूँज

पिंजरा और पंख-52

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-2
शनिवार की शाम हवा में एक अजीब सा भारीपन था. अनिल चाचा ऑफिस से जल्दी आ गए. झटपट चाय पी, कपड़े बदले और खड़े हो गए, “मैं होटल ऋतुराज जा रहा हूँ, मेहमान आने वाले होंगे. वहाँ उन्हें रिसीव करने वाला कोई होना चाहिए.”

करीब सात बजे इंदौर वाले मेहमान अपनी बड़ी गाड़ी के साथ होटल पहुँचे. अनिल चाचा होटल में मेहमानों को चाय पिला कर वापस घर पहुँचे तब तक गुप्ताजी भी फैक्ट्री से वापस आ चुके थे. चाचा का उत्साह सातवें आसमान पर था. "भाई साहब, मेहमान होटल पहुँच गए हैं. थोड़ी देर आराम करके वे डिनर के लिए तैयार हो जाएंगे. हमें नौ बजे तक डिनर के लिए होटल पहुँच जाना चाहिए. वहीं लड़का देख लेंगे और दोनों परिवार मिल लेंगे, बातचीत हो जाएगी. शगुन घर ही रहेगी, वैसे भी मेहमानों के सामने उसे कल सुबह ही आना चाहिए."

शगुन अपने कमरे की खिड़की से देख रही थी कि कैसे पापा, मम्मा, चाचा और आयुष होटल के लिए निकल रहे हैं. आयुष ने जाते-जाते एक नज़र शगुन की ओर देखा, उसकी आँखों में एक चेतावनी थी.

घर अब खाली था. शगुन के लिए यह सन्नाटा नया नहीं था, लेकिन आज इस सन्नाटे में एक अजीब सी ताकत थी. उसने रसोई में जाकर अपने लिए चाय बनाई. उसने सोचा, "वहाँ होटल में इस वक्त मेरे भविष्य के बारे में बातें हो रही होंगी. शादी कैसे करनी है? क्या लेन-देन होना है, सारी शर्तों पर बातें हो रही होंगी. वहाँ पूरा परिवार है, बस मैं ही नहीं हूँ, जिसके बारे में उन्हें निर्णय करने हैं. कितना विचित्र है यह? और बरसों से चला आ रहा है कि एक लड़की के भविष्य के बारे में पूरा परिवार विमर्श करता है बस उस लड़की को ही छोड़ दिया जाता है. क्या यही मैं भी होने दूँ? नहीं, मैं यह कैसे होने दे सकती हूँ? मैं अपने अस्तित्व को किसी अनजान के अस्तित्व में विलीन नहीं होने दूंगी. मुझे अपनी पहचान खुद बनाना है.”

रात ग्यारह बजे घर के बाहर कार रुकी. मम्मा के हाथ में शगुन के लिए खाने का बैग था. वे थकी हुई और उदास लग रही थीं. अनिल चाचा और पापा नीचे लिविंग रुम में ही बातें करने बैठ गए.

आयुष सीधे ऊपर शगुन के कमरे में पहुँचा. उसके हाथ में शगुन के खाने का बैग था. वह बहुत उत्तेजित और गुस्से में था. "दीदी, वहाँ जो हुआ वह अपमानजनक था. विवेक के पापा और चाचा तो ऐसे बात कर रहे थे जैसे आप कोई वस्तु हों. विवेक की माँ ने तो मम्मा से यहाँ तक कह दिया कि, 'शगुन को समझा दीजियेगा कि शादी के बाद उसे अपनी पढ़ाई और नौकरी की ज़िद छोड़नी होगी. उसे उसकी कोई जरूरत नहीं. हमारे घर में किसी बहू ने आज तक बाहर काम नहीं किया. घर में सब कुछ है. वह घर संभाले, वही उसके लिए बहुत बड़ा काम होगा.' और पापा? वे बस चुपचाप गर्दन झुकाए सुन रहे थे. उनके पास कोई जवाब नहीं था."

शगुन ने आयुष की बात शांति से सुनी. उसने आयुष का हाथ थाम लिया. "आयुष, पापा की चुप्पी उनका डर है, और विवेक की माँ का अहंकार उनकी कंडीशनिंग. उन्हें लगता है कि स्त्रियों का जीवन परिवार और घर के पिंजरे के लिए है. उन्होंने खुद इसे जिया है. उसी में वे खुद को और तमाम स्त्रियों को सुरक्षित समझती हैं. उन्होंने अपनी बहू के लिए अपने यहाँ सुन्दर 'पिंजरा' तैयार किया है. उस पिंजरे के गुण भी उन्होंने खूब बताए होंगे. पर उन्हें पता नहीं कि शगुन उस पिंजरे में रहने को तैयार नहीं है, वह उड़ना सीख चुकी है उसके पंख अब पेरालाइज नहीं हैं."

आयुष ने खाने का बैग मेज़ पर रख दिया. "मम्मा ने कहा है कि खाना खा लेना, लेकिन दीदी, कल सुबह वे लोग तुम्हें देखने आएंगे, और उसी समय दस्तूर के लिए तैयार रहेंगे. चाचा ने पापा को लगभग मना लिया है कि कल ही बात पक्की कर दी जाए और लड़के का तिलक कर दिया जाए. तुम खाना खा लो. मैं छत पर हूँ."

शगुन अपनी 'संबल' नोटबुक के पास गई. उसने फातिमा वाले उस सूखे गुलाब को हाथ में लिया. "कल सुबह का सूरज रामगंजमंडी के लिए एक सामान्य रविवार होगा, पर मेरे लिए यह अपनी मर्यादा और अस्मिता की लड़ाई होगी. आयुष मेरे साथ है, बाकी बात मैं खुद संभालूँगी."

आयुष के जाने के बाद मम्मा आईं. कहने लगी, “लड़का सुन्दर है, उनके कपड़े का होलसेल का बिजनेस है. लड़का भी पहले एमबीए करके एमपीएससी की तैयारी में लगा था. उसके लिए उसने कोचिंग भी की थी. लेकिन बिजनेस में पूरा परिवार लगता है, इसलिए बहुत समझाने पर वह तैयारी छोड़ कर बिजनेस में आ गया. उसके बाद उसने बिजनेस को बहुत बढ़ा लिया. उसके पापा कह रहे थे. ‘शगुन पढ़ी लिखी है. वह भी मनोविज्ञान से. वह लड़कियों और औरतों के वस्त्रों के बिजनेस को घर से ही देख सकती है.’ मुझे तो लड़का और परिवार पसंद आया है. तुम्हारा भविष्य सुरक्षित रहेगा. कल तुम भी उन सब से मिल लोगी. तब तुम्हारे लिए मना करना कठिन होगा.”

शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने इतना ही कहा, “माँ, कल का कल देखेंगे.”

माँ वापस नीचे चली गयीं, वह खाना खाकर ऊपर छत पर चली गयी.

देर रात तक भाई-बहन छत पर बैठे रहे. नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रवि-पुष्य योग में तिलक कर देने से शगुन का भविष्य सुघड़ होने की बात कर रहे थे, और ऊपर छत पर दोनों उस 'अदृश्य पिंजरे' की सलाखों को गिन रहे थे जिन्हें कल सुबह टूटना था.

शगुन ने नोटबुक में लिखा, "जब सन्नाटा बहुत गहरा हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि आवाज़ अब गूँजने वाली है."
... क्रमशः

रविवार, 8 मार्च 2026

मोर्चेबन्दी

पिंजरा और पंख-51

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-1
एम.एससी. मनोविज्ञान बनस्थली विद्यापीठ से करने की अंडरटेकिंग देने पर शगुन की टीचिंग असिस्टेंट के पद पर नियुक्ति पुख्ता हो गयी. अब उसे 27 जून को पदभार ग्रहण करना था.

बी.एससी. फाइनल का अन्तिम पेपर समाप्त हुआ. 20 मई को बाद मम्मा-पापा उसे लेने आ रहे थे, उसी दिन वापस लौटना था. बी.एससी. फाइनल हो जाने से शगुन होस्टल रूम रिटेन नहीं कर सकती थी. अगले साल उसे नया होस्टल मिलना था. शगुन ने अपना सारा सामान पैक करना शुरू कर दिया. आयुष भी 21 मई को सुबह गुवाहाटी से कामाख्या एक्सप्रेस पकड़ कर 23 को दोपहर होने तक रामगंजमंडी पहुँच रहा था. उसके घर पहुँचने के दो दिनों मे ही आयुष का वहाँ पहुँचना उसके लिए अच्छा था.

कार घर के बाहर पहुँचते ही एक-दो बार हॉर्न बजाने पर चाची बाहर आई, उन्होंने गेट खोला, गुप्ताजी ने कार अंदर खड़ी की. एसी कार से बाहर निकलते ही शगुन को रामगंजमंडी की तेज गर्मी का अहसास हुआ. वह चाची से गले मिली, लेकिन उसकी आँखें मुक्ति को तलाश रही थीं. तभी उसे ड्राइंग रूम के दरवाजे के परदे के पीछे वह छुपती हुई दिखाई दी.

“दो दिन से रट रही है शगुन दी आएंगी आयुष भैया आएंगे. अब तुम आ गयी हो तो परदे के पीछे छुप रही है.” चाची ने बताया.

मुक्ति अब डेढ़ साल की थी. अब दौड़ने और बोलने भी लगी होगी. शगुन का मन उसे गोद में उठाने और बातें करने का हुआ. शगुन ड्राइंग रूम में गयी तो मुक्ति परदे के पीछे से हंसती हुई भाग कर अंदर जाने लगी, तभी फिसल कर फर्श पर कालीन पर गिर गयी. उसे चोट नहीं लगी थी पर बच्चे का रुआँसा होना स्वाभाविक था. शगुन ने उसे गोद में उठा कर पुचकार लिया. तू दीदी से भाग रही थी तो गिर गयी. दीदी से भागी क्यों? दीदी को प्यार नहीं करेगी? प्यार में भीगे शब्द सुन कर मुक्ति मुस्कुराने लगी.

इस बीच मम्मा, चाची और पापा सामान निकाल लाए. चाची उन्हें लेकर जीने से ऊपर जाने लगी. शगुन ने रोका तो कहने लगी, “एक बैग तुम्हारे लिए रख छोड़ा है, उसे लेकर आओ.”

चाची ने शगुन और आयुष का कमरा तैयार कर रखा था. सामान वे रख चुकी थीं. शगुन ने भी बैग रखा. फिर चाची से बतियाने लगी. उन्होंने बताया कि “इंदौर वाले मेहमान 26 मई की शाम को रामगंज मंडी पहुँच रहे हैं.

उस रात किसी ने शगुन से मेहमानों का कोई जिक्र नहीं किया. पापा के पूछने पर शगुन ने इतना जरूर बताया कि बी.एससी. में उसके विद्यापीठ में प्रथम स्थान पर रहने की पूरी संभावना है कि. ऐसा हुआ तो उसे स्वर्ण पदक मिलेगा. तीसरे दिन सुबह ग्यारह बजे आयुष भी घर पहुँच गया. उसे देख शगुन की बाँछें खिल उठीं. अब घर में उसका एक मजबूत समर्थक मौजूद था, और वह अपनी बात मजबूती से कह सकती थी.

दो दिन शान्ति से गुज़र गए. नन्ही मुक्ति शगुन और आयुष से खूब हिल गई थी. वे बाहर जाते तो उनके साथ जाने की जिद करती, वे साथ ले भी जाते. अभी तक उनके सामने मेहमानों के आने का कोई जिक्र नहीं हुआ था. पच्चीस मई की शाम अनिल चाचा दफ्तर से लौट कर आयुष के साथ लिविंग रूम में चाय पी रहे थे. शगुन ऊपर अपने कमरे में थी. तभी चाचा ने बताया कि, "कल शाम इन्दौर वाले मेहमान यहाँ होंगे. उनके ठहरने का इंतजाम होटल ऋतुराज में कर दिया है. रात को शगुन के सिवा हम सब उनके साथ होटल में ही डिनर कर लेंगे, हम परिवार और लड़के को देख लेंगे. अगली सुबह वे शगुन को देखने घर आएंगे. लंच यहीं करेंगे. उसके बाद वे होटल लोटेंगे और यदि उन्होंने हाँ कर दी तो हम होटल चल कर टीका करके दस्तूर कर देंगे. शगुन का ग्रेजुएशन हो चुका है, अब और क्या इंतज़ार करना?"

आयुष चाचा को सुन कर मुस्कुरा कर रह गया.

रात को छत पर, आयुष और शगुन एक साथ बैठे. चाची ने शाम को ही छत पर पानी छिड़क दिया था, वह ठंडी थी. हवा में भी कुछ ठंडक आ चुकी थी. यह वही जगह थी जहाँ कभी उन्होंने बचपन के सपने साझा किए थे.

"दीदी, अपना नियुक्ति पत्र लाई हो न?" आयुष ने धीमी आवाज़ में पूछा.

"हाँ आयुष, वह मेरे पास नीचे बैग में रखा है. मुझे ‘रोका’ हो जाने का कोई डर नहीं है, मुझे डर पापा की चुप्पी का है. मैं नहीं चाहती कि मेरा स्वावलंबन उन्हें समाज के सामने छोटा महसूस कराए."

आयुष ने दीदी का हाथ थाम लिया. "पापा को छोटा आप नहीं, बल्कि चाचा के थोपे हुए थोथे तर्क बना रहे हैं. जब आप यह पत्र दिखाएंगी, तो आप सिर्फ एक नौकरी की बात नहीं करेंगी, आप उस 'पिंजरे' की सलाखों को भी हटा देंगी जिसे पापा भी महसूस करते हैं पर कह नहीं पाते."

सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आहट हुई. मम्मा ऊपर आ रही थीं. उन्होंने दोनों को साथ देखा और उनके पास आकर बैठ गईं. "परसों की तैयारी पूरी है. अनिल चाचा ने सब व्यवस्था कर दी है. पर शगुन, तेरे पापा कुछ बोल नहीं रहे हैं, वे अंदर ही अंदर बहुत बेचैन हैं."

शगुन ने मम्मा का हाथ पकड़ लिया. "मम्मा, क्या पापा को मुझ पर भरोसा नहीं है? क्या मेरी तीन साल की मेहनत इस एक दिन की रस्म से कमज़ोर पड़ जाएगी?"

मम्मा की आँखों में आँसू थे, पर वे मुस्कुराईं. "भरोसा तो बहुत है बेटा, बस वे उस दुनिया से डरे हुए हैं जहाँ उन्होंने जन्म लिया है, जिसमें हम सब रहते हैं."

उस रात शगुन को नींद नहीं आई. उसने अपनी नोटबुक निकाली. उसमें उसने आज कुछ नहीं लिखा. बस एक पुराना सूखा हुआ गुलाब देखा, वही गुलाब जो फातिमा ने उसे इंटरव्यू वाले दिन दिया था.

नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र होने से रवि-पुष्य योग के लाभ गिना रहे थे. उधर गुवाहाटी की ब्रह्मपुत्र की लहरों की याद और बनस्थली के संकल्प के बीच आयुष और शगुन खुद को मजबूत कर रहे थे. रविवार को उन्हें साबित करना था कि पंख अब उड़ान के लिए तैयार हैं.
... क्रमशः

शनिवार, 7 मार्च 2026

स्वावलंबन

पिंजरा और पंख-50

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

सघन वृक्षावली के बीच बनस्थली विद्यापीठ कैम्पस को जनवरी के पहले सप्ताह की सुबह ने हमेशा की तरह कड़कड़ाती ठंड और कोहरे की चादर ओढ़ा रखी थी. लेकिन शगुन को इस तेज सर्दी का बिलकुल अहसास नहीं था. वह अपने भीतर एक अलग ही तपिश महसूस कर रही थी. वह और दिनों की अपेक्षा आज जल्दी तैयार होने लगी थी. आज उन सबकी पहली क्लास ग्यारह बज कर दस मिनट से आरंभ होने वाली थीं, लेकिन शगुन को सुबह दस बजे 'टीचिंग असिस्टेंट' (TA) के पद के साक्षात्कार के लिए चयन बोर्ड के सामने उपस्थित होना था. जब दूसरी लड़कियाँ सुबह का नाश्ता करके अभी अलसा रही थी, शगुन सुबह नौ बजे तैयार होकर सबसे बाद नाश्ते के लिए पहुँची. मेस का डाइनिंग हॉल लगभग खाली हो चुका था, दो लड़कियाँ अपना नाश्ता समाप्त कर रही थीं. वह तुरन्त नाश्ता करके अपने रूम में लौटी. अपनी ड्रेस को एक बार फिर जाँचा और जरूरी दस्तावेज चैक करके फोल्डर में रखे. उसकी तीनों रूम मेट ने उसे शुभकामनाएँ दीं कि उसका साक्षात्कार सफल रहे और उसे टी.ए. का यह पद मिले. वे तीनों जानती थीं कि शगुन ने तेजी से पारिवारिक और सामाजिक कंडीशनिंग को समझा है और उनसे छुटकारा पाया है. जबकि वे अभी इसकी हिम्मत नहीं जुटा पायी हैं.

अपने कमरे से बाहर निकलते ही शगुन को सामने से फातिमा आती दिखाई दी. उसने मुस्कुराते हुए शगुन को एक ताजा सुन्दर गुलाब भेंट किया और कहा, “इंशा अल्लाह, यह पद तुम्हें ही मिले”.

“तो तुमने मुझे भी तुम्हारे अल्लाह के भरोसे छोड़ दिया.” शगुन ने मुस्कुराकर जवाब दिया तो फातिमा ने जोर का ठहाका लगाया, शगुन भी उसमें शामिल हो गयी. ठहाके की आवाज सुन कर पास वाले कमरे के दरवाजे से एक लड़की ने झाँक कर देखा कि ठहाका किसने लगाया.

शगुन ने आज बादामी रंग का खादी का कुर्ता पाजामा और हलके भूरे रंग का ऊनी फुल स्वेटर पहना था. बाल सलीके से बंधे थे. मनोविज्ञान विभाग की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसे रामगंजमंडी की उस शगुन की याद आई जिसने बनस्थली विद्यापीठ के इसी कैंपस में तीन साल पहले सहमे हुए अपने कदम रखे थे.

विभागाध्यक्ष के केबिन के बाहर पाँच और उम्मीदवार थीं, सभी एम.एससी. (M.Sc.) अंतिम वर्ष के विद्यार्थी. शगुन अकेली थी जो अभी बी.एससी. (B.Sc.) के आखिरी सेमेस्टर में थी. उसकी धड़कनें तेज़ थीं, पर इरादा स्थिर. एक-एक कर सभी को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. शगुन सबसे आखिरी थी.

अंदर पैनल में तीन वरिष्ठ प्रोफेसर बैठे थे. बीच में बैठे प्रोफेसर ने उसकी फाइल बंद करते हुए पूछा, "शगुन, तुम्हारा एकेडमिक रिकॉर्ड शानदार है. लेकिन 'टीचिंग असिस्टेंट' के लिए केवल ज्ञान काफी नहीं है. तुम 'असामान्य मनोविज्ञान' (Abnormal Psychology) की जटिलताओं को उन छात्राओं को कैसे समझाओगी जो खुद किसी मानसिक या पारिवारिक दबाव में हों?"

शगुन ने एक पल के लिए डॉ. शास्त्री की ओर देखा और फिर बोर्ड की ओर मुखातिब हुई. "सर, मनोविज्ञान केवल किताबों का हिस्सा नहीं है. जब हम 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) की बात करते हैं, तो हमें छात्राओं को यह समझाना होगा कि समाज ने उन्हें जो बेड़ियाँ पहनाई हैं, वे उनका स्वभाव नहीं हैं. एक काउंसलर के रूप में मेरा काम उन्हें यह अहसास दिलाना होगा कि उनकी 'ना' कहना सीखने की क्षमता ही उनका सबसे बड़ा मानसिक उपचार है."

अगले बीस मिनट तक शगुन ने 'सांख्यिकी' (Statistics) और 'संगठनात्मक व्यवहार' (Organizational Behavior) के उन कठिन सवालों के जवाब दिए जो आमतौर पर पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर पर पूछे जाते हैं. उसकी आवाज़ में एक ऐसी स्पष्टता थी जो केवल अनुभव और संघर्ष से आती है.

साक्षात्कार पूरा हुआ तब एक बज चुका था. उसे भूख लगने लगी थी. मैस के भोजन का वक्त भी था. वह होस्टल पहुँची और कपड़े बदल कर सीधे डाइनिंग हॉल. प्रियंका, किरन, सीमा और फातिमा चारों वहीं थीं. उन्होंने उसे घेर लिया. पूछने लगीं, “इंटरव्यू कैसा रहा?”

“इंटरव्यू ठीक रहा. लेकिन चयन हो ही जाएगा, नहीं कह सकती. वहाँ मेरे अलावा सभी एम.एस.सी. फाइनल की लड़कियाँ थीं. हो सकता है उनमें से किसी का इंटरव्यू मुझसे बेहतर रहा हो.” शगुन ने सहजता से कहा.

“नहीं, तेरा ही होगा, मैंने तुझे अल्लाह को जो सौंप रखा है. वे तेरे साथ गलत नहीं करेंगे.” इतना कह कर फातिमा फिर हँस पड़ी. उसकी हँसी में बाकी चारों भी हँसने लगीं. तीन बजे से उनकी क्लासेज थीं. कुछ देर लड़कियों ने अपने होस्टल रूम में आराम किया फिर सभी क्लासेज के लिए निकल लीं.

आखिरी क्लास समाप्त होने के पहले परिचारिका क्लास में आई और बताया कि विभागाध्यक्ष ने क्लास के बाद शगुन को बुलाया है. क्लास के बाद जब सब लड़कियाँ होस्टल जा रही थीं. तब वह विभागाध्यक्ष के आफिस पहुँची

"शगुन, तुम्हारी समझ और परिपक्वता ने चयन समिति को प्रभावित किया है. हमने तुम्हें इस पद के लिए चुन लिया है. इस वर्ष तुम्हारा ग्रेजुएशन पूरा हो जाएगा. उसके बाद अगला सत्र 27 जून से आरंभ हो रहा है. उस दिन तुम्हें कार्यभार संभालना होगा, बस तुम्हें एक सप्ताह में यह अंडरटेंकिंग देनी होगी की पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स बनस्थली विद्यापीठ से ही करोगी. तुम्हें बधाई. तुम्हारा नियुक्ति पत्र एक दो दिन में तुम्हें मिल जाएगा."

हॉस्टल लौटने के पहले शगुन विभाग के कंप्यूटर रूम गयी और आयुष को मेल लिखा-

"प्रिय आयुष, आज मेरा चयन 'टीचिंग असिस्टेंट' के पद पर हो गया है. यह सफलता मेरी जितनी है, उतनी ही तुम्हारी भी. उस दिन तुमने पापा को फोन करके चाचा के 'धावे' को नहीं रुकवाया होता, तो शायद आज मैं इस चयन बोर्ड के सामने इतनी मजबूती से खड़ी नहीं हो पाती. तुम्हारे हस्तक्षेप ने मुझे वह 'समय' दिया आज मैं स्वावलंबी होने के मुहाने पर खड़ी हूँ. इस मई में जब हम घर पर होंगे, तो वहाँ मेरी अपनी एक नई स्वतंत्र पहचान होगी. इस पहचान में तुम्हारे योगदान के लिए थैंक्यू, मेरे संबल!"

उस रात शगुन ने अपनी पुरानी 'संबल' नोटबुक निकाली. उसमें लिखे 'पितृसत्ता' के सिद्धांतों के नीचे आज उसने एक नई लाइन जोड़ी— "जब ज्ञान स्वावलंबन तक पहुँच जाता है, तो भविष्य के मार्ग खुद-ब-खुद बनने लगते हैं."

खिड़की के बाहर गहराती रात अब उसे चुनौती नहीं, बल्कि एक नया अवसर दे रही थी.
... क्रमशः

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

इनकार

पिंजरा और पंख-49

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
नवंबर समाप्त होने को था. दिन में धूप अभी भी बर्दाश्त के बाहर थी. लेकिन सूरज के डूबते ही मौसम ठंडा हो जाता. रात को लोग गर्म कपड़ों में नजर आते. गुप्ता निवास के भीतर का माहौल आज गर्म था. गुप्ताजी फैक्ट्री से आठ बजे लौटे तो छोटा भाई अनिल उन्हें लिविंग रूम में ही मिला. वह अपनी जिद लिए बैठा था.

"भाई साहब, इंदौर वालों के पास रिश्ते आ रहे हैं, इतना अच्छा लड़का हाथ से निकल न जाए, इसलिए मैने उन्हें जुबान दे दी है. दिसंबर के आखिरी हफ्ते में हम सब बनस्थली चलेंगे. वहीं वे शगुन को देख लेंगे और हम कच्चा दस्तूर कर देंगे. लड़की की पढ़ाई अपनी जगह है, पर घर बसाना भी तो जिम्मेदारी है."

गुप्ताजी के मन में द्वंद्व का बवंडर फिर उठ खड़ा हुआ. फैक्ट्री में काम के दौरान वे सब भूले रहते. लेकिन घर आते ही पारिवारिक जिम्मेदारियों का अहसास होने लगता. जाति समाज में अधिकांश लड़कियों की शादियाँ ग्रेजुएट होने के पहले या फिर ग्रेजुएट होते ही हो जाती थीं. बाद में योग्य लड़के मिलने कठिन हो जाते. इस कारण से उन्हें अनिल की यह बात वाजिब ही लगती थी कि शगुन का भी अभी संबंध हो जाए और ग्रेजुएट होने के बाद उसकी शादी कर दें. लेकिन दूसरी और जब वे शगुन की मेहनत और उसका विकसित होता व्यक्तित्व देखते तो अत्यन्त प्रसन्न होते कि वह कितना सुंदर कर रही है. उन्हें लगता कि उसे अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर देना अधिक महत्वपूर्ण है. वे किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहे थे.

"पर अनिल, शगुन कह रही थी कि उसके प्रैक्टिकल और प्रेजेंटेशन हैं. इस समय हमारा वहां जाना..."

"अरे भाई साहब! ये पढ़ाई के बहाने कभी खत्म नहीं होंगे. एक दिन के कुछ घंटों में उसकी पढ़ाई का कुछ भी खराब नहीं होगा. हम वहाँ दोपहर तक पहुँचेंगे और शाम तक अपना काम समाप्त करके वापस लौट लेंगे. एक बार लड़के का तिलक कर दें. लड़का रुक जाएगा, उसके बाद शगुन को पढ़ाई में कोई बाधा नहीं होगी.” अनिल ने गुप्ताजी की बात काट दी.

मम्मा रसोई के दरवाजे पर खड़ी सब सुन रही थीं. उनकी आँखों में बेबसी थी. तभी घर के फोन की घंटी बजी. 

गुप्ताजी ने फोन उठाया. आयुष का फोन था.

 "कैसा है बेटा?"

"पापा, मैं ठीक हूँ. लेकिन शगुन दीदी से बात हुई थी, वह बहुत तनाव में है. उसने बताया कि चाचाजी मेहमानों को लेकर बनस्थली जाने की जिद कर रहे हैं. पापा, यह समय बिल्कुल ठीक नहीं है. दीदी का करियर इस समय सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर है. आपको पता है इस साल उनकी मेहनत कामयाब हुई तो वे विद्यापीठ में प्रथम स्थान हासिल कर सकती हैं. उन्हें इस समय जरा भी डिस्टर्ब करना ठीक नहीं. अगर आप जबरदस्ती वहाँ गए, तो न तो दीदी एकाग्र हो पाएगी और न ही उन मेहमानों के सामने हमारी कोई साख बचेगी. वहां कोई तमाशा हुआ तो वे लोग हमारी ही बदनामी करेंगे. अगर उन्हें इतनी ही जल्दी है, तो उन्हें साफ मना कर दीजिए."

आयुष की आवाज में एक नई मजबूती थी और बात तार्किक. उन्हें लगा कि उनके पैरों को डगमगाते देख बेटे ने मजबूती से उनका हाथ थाम लिया है. उनके आँखों में नमी उतर आई. उसने मम्मा से भी बात की और उन्हें भी यही समझाया. बेटे की इन दलीलों से गुप्ताजी के भीतर का असमंजस जाता रहा. उन्हें अहसास हुआ कि आयुष सही कह रहा है. शगुन का यह आखिरी साल है. मेहनत के बल पर वह ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम स्थान हासिल करने के निकट है. उसे डिस्टर्ब किया जाना ठीक नहीं. दूसरी ओर हम एक नया रिश्ता बनाने में इतनी जल्दी क्यों करें? जल्दबाजी मे तो कोई बढ़िया रिश्ता बनाया नहीं जा सकता. अचानक इस तरह बनस्थली जाना दोनों परिवारों के बीच वर्तमान संबंधों को भी खराब कर सकता है.

गुप्ताजी ने पलटकर अनिल चाचा की ओर देखा. उनकी आवाज़ एकदम शान्त और दृढ़ थी. "अनिल, मैंने सोच लिया है. हम दिसंबर में नहीं जाएंगे. शगुन को अपनी परीक्षा और प्रोजेक्ट बिना कोई बाधा उत्पन्न किए पूरा करने देंगे. इंदौर वालों से कहेंगे कि इस समय बनस्थली जाना ठीक नहीं. वे प्रतीक्षा करें. उन्हें ज्यादा ही जल्दी है, और उन्हें और रिश्ते मिल रहे हैं तो उनमें से किसी को देख लें. हम मई से पहले बात आगे नहीं बढ़ाएंगे. अभी हमें कोई जल्दी नहीं है."

अनिल चाचा अवाक रह गए. भाई साहब के मुंह से 'इनकार' सुनना उनके लिए अकल्पनीय था. वे बड़बड़ाते हुए बाहर निकल गए, लेकिन गुप्ताजी ने अपना रुख नहीं बदला.

उसी रात मम्मा ने शगुन को फोन किया. "बेटा, फिक्र मत कर. तेरे पापा ने मना कर दिया है. अब दिसंबर में कोई वहां नहीं आ रहा है. सब बातें मई तक टाल दी गई हैं. तू बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे."

फोन रखने के बाद शगुन ने एक गहरी और लंबी सांस ली. खिड़की के बाहर उतर आया अंधेरा अब उसे डरा नहीं रहा था. उसे पता था कि गुवाहाटी से आयुष के फोन ने और रामगंजमंडी में मम्मा ने पापा को निर्णय लेने में उसकी मदद की है. इस तरह पापा अपनी 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) से बाहर निकल सके और उसे उनका साथ मिल सका. यह साथ उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है. अब जनवरी का 'टीचिंग असिस्टेंट' का इंटरव्यू ही उसका अगला मोर्चा था.

उसने अपनी नई नोटबुक में लिखा, "वक्त मिल गया है.  अब उसे किसी भी हालत में स्वावलंबी बनना है."
... क्रमशः 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

ब्रह्मपुत्र की हवाएँ

पिंजरा और पंख-48

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

गुवाहाटी में दीवाली के पहले से ही सुबह की धुंध और गहरी होने लगी थी. पहले सेमेस्टर की परीक्षा के नतीजे आ चुके थे और आयुष ने अपनी जगह 'टॉप-10' में सुरक्षित कर ली थी. लेकिन इस सफलता से अधिक जिस चीज़ ने उसे बदला था, वह था यहाँ का खुला 'इंटरेक्शन'.

उस दोपहर, वह 'कम्प्यूटर सेंटर' में लैब असाइनमेंट पूरा कर रहा था. तभी उसके साथ वाली डेस्क पर ईशा ने अपनी कुर्सी खिसकाई. वह कोलकाता से थी और फिजिक्स की 'ब्राइट' छात्राओं में गिनी जाती थी.

"आयुष, तुमने 'डिस्क्रीट मैथ' वाले लॉजिक गेट्स का असाइनमेंट कर लिया? मुझे उस 'ट्रुथ टेबल' में थोड़ी दिक्कत आ रही है," ईशा ने सहजता से पूछा.

आयुष एक पल के लिए ठिठका. उसके पुराने बोर्डिंग स्कूल में लड़कियाँ केवल 'एनुअल डे' पर दिखती थीं, और घर (रामगंजमंडी) में लड़कियों से बात करने का मतलब था, ‘संदेह की नज़रें’. लेकिन यहाँ ईशा की आँखों में कोई संकोच नहीं था, केवल एक सहपाठी की जिज्ञासा थी.

"हाँ... वो, मैंने कर लिया है. तुम चाहो तो मेरा लॉजिक देख सकती हो," आयुष ने अपना रजिस्टर उसकी ओर बढ़ा दिया.

अगले एक घंटे तक दोनों ने 'बाइनरी लॉजिक' पर चर्चा की. क्लास के बाद वे दोनों कॉफी पीने कैंपस के मशहूर कैंटीन एरिया 'खोका' (Khokha) चले गए. वहाँ ब्रह्मपुत्र की ठंडी हवाएँ सीधे उनके बदन से टकरा रही थीं. आयुष ने देखा, आसपास कई और लड़के-लड़कियाँ समूहों में बैठे थे, हँस रहे थे, बहस कर रहे थे. वहाँ न तो अनिल चाचा का डर था, न ही समाज की 'मर्यादा' वाली घुटन.

ईशा ने कॉफी का घूँट लेते हुए कहा, "तुम्हें पता है आयुष, घर पर सब सोचते हैं कि मैं यहाँ सिर्फ पढ़ रही हूँ, लेकिन यहाँ आकर मुझे अहसास हुआ कि मैं पहली बार 'जी' रही हूँ. कोलकाता में पाबंदियाँ थीं, पर यहाँ हम अपनी पहचान खुद गढ़ते हैं."

आयुष को अपनी दीदी, शगुन की याद आई. उसे महसूस हुआ कि शगुन जिस 'आज़ादी' के लिए बनस्थली विद्यापीठ के परकोटा वाले दायरे में लड़ रही है, वह यहाँ कितनी सहज उपलब्ध है. उसने मन ही मन सोचा— "क्या रामगंजमंडी में कभी ऐसा हो पाएगा? जहाँ शगुन दीदी जैसी किसी लड़की को अपनी शिक्षा के लिए किसी 'मुहूर्त' या 'सगाई' से न लड़ना पड़े?"

रात को हॉस्टल लौटकर आयुष ने ईशा के साथ बिताए समय के बारे में सोचा. यह सिर्फ 'दोस्ती' नहीं थी, यह उसके भीतर की उस ग्रंथि का खुलना था जिसने उसे हमेशा सिखाया था कि स्त्री और पुरुष के बीच केवल 'रिश्ते' या 'दूरी' हो सकती है, 'सहज मित्रता' नहीं.

उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, आज मैंने जाना कि समानता केवल किताबों में नहीं होती, वह व्यवहार में होती है. यहाँ लड़कियां सिर्फ पढ़ नहीं रही हैं, वे नेतृत्व कर रही हैं. मुझे एक नई दोस्त मिली है, ‘ईशा’. उससे बात करके मुझे लगा कि पितृसत्ता का सबसे बड़ा हथियार 'अलगाव' (Separation) है. जब हम साथ मिलकर काम करते हैं, तो डर अपने आप खत्म हो जाता है. आप अपनी लड़ाई जारी रखिए, यहाँ की आबोहवा मेरे भीतर के 'अनिल चाचा' को रोज़ थोड़ा-थोड़ा मार रही है."

ईमेल भेजकर वह खिड़की के पास खड़ा हो गया. दूर ब्रह्मपुत्र का पानी चाँदनी में चमक रहा था. आयुष अब वह छोटा भाई नहीं रहा था जो केवल आज्ञा मानता था, वह अब एक 'स्वतंत्र-चेता' बन रहा था.

बनस्थली में शगुन का संघर्ष एक अलग स्तर पर था. दीवाली के बाद कैंपस में सन्नाटा था, लेकिन शगुन की मेज़ 'असामान्य मनोविज्ञान' की किताबों और केस स्टडी की फाइलों से अटी पड़ी थी. उसने हॉस्टल मेस की बाई नाथी और उसकी मदद से गाँव की अन्य स्त्रियों के जो इंटरव्यू लिए थे, वे उसके प्रोजेक्ट का आधार बन रहे थे.

उसी शाम मम्मा का फोन आया. "शगुन, अनिल चाचा बहुत नाराज़ हैं. वे कह रहे हैं कि तूने दीवाली पर न आकर उन लोगों का अपमान किया है. अब वे कह रहे हैं कि दिसंबर के अंत में वे खुद वहाँ बनस्थली आएंगे, उस लड़के और उसके परिवार के साथ. वे वहीं सब पक्का करना चाहते हैं."

शगुन का हाथ काँपा, पर आवाज़ नहीं. उसने पास रखे 'टीचिंग असिस्टेंट' (Teaching Assistant) के आवेदन फॉर्म को देखा. डॉ. शास्त्री ने उसे बताया था कि मनोविज्ञान विभाग में दो पद खाली हैं, और शगुन अपनी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर सबसे मजबूत दावेदार थी.

"मम्मा, चाचा को कह दीजिएगा कि दिसंबर में मेरे प्रैक्टिकल और फील्ड वर्क की प्रेजेंटेशन है. मुझे किसी से मिलने की फुरसत नहीं होगी. और मैं यह बहाना नहीं बना रही हूँ, स्थिति यही है कि अभी भी मेरी नींद पूरी नहीं होती. वे आए तो बहुत निराश होंगे," शगुन ने स्पष्ट कहा. “चाचा की बेसब्री बहुत डराती है, मम्मा. दिसंबर के बाद केवल तीन-चार माह बचेंगे. क्या वे तब तक नहीं रुक सकते.”

"बेटा, वे नहीं मानेंगे. वे पापा पर बहुत दबाव बना रहे हैं," मम्मा की आवाज़ में डर था.

शगुन ने फोन रखा और डॉ. शास्त्री के केबिन की ओर चल दी. शायद चाचा समझने लगे हैं कि, ‘यदि उसने बी.एससी. कर लिया तो लड़की हाथ से निकल जाएगी’. उसे पता था कि अब केवल 'ना' कहना काफी नहीं होगा, उसे खुद को आर्थिक रूप से स्वतंत्र साबित करना होगा. उसने ऑफिस जाकर टीचिंग असिस्टेंट के पद के लिए अपना आवेदन जमा किया और साक्षात्कार (Interview) की तैयारी में जुट गई.

उस रात उसने अपनी नई 'संबल' नोटबुक में लिखा, "आयुष गुवाहाटी में उस दुनिया को जीने का आरंभ कर चुका है, जिसे मैं यहाँ कागज़ों पर उतार रही हूँ. हम दोनों के बीच का यह संवाद ही हमारा असली हथियार है. दिसंबर में चाचा तो न आने पाएंगे लेकिन वापस लौटने पर युद्ध अब केवल उसके जीवन को सगाई में बांध देने के खिलाफ नहीं, बल्कि मेरी एक स्वतंत्र पहचान के लिए होगा."

खिड़की के बाहर बनस्थली के हरे वृक्षों के बीच छाया सन्नाटा और दूर गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र की लहरों को छूकर उठती हवाएँ, दोनों एक ही संकल्प से जुड़े थे.

... क्रमशः 

बुधवार, 4 मार्च 2026

प्रोजेक्शन

पिंजरा और पंख-47

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
दशहरा गुजर चुका था, दीवाली में बस सत्रह दिन शेष थे. शगुन हर वर्ष दीवाली पर घर गयी थी. पर इस वर्ष वह सोच ही नहीं पा रही थी कि वह जा पाएगी या नहीं. शगुन के मन में विषयों का एक सघन कोहरा छाया हुआ था. अंतिम सेमेस्टर की चुनौतियां पिछले वर्षों से कहीं अधिक तकनीकी और मानसिक थीं. उसे असामान्य मनोविज्ञान (Abnormal Psychology) की उन परतों को समझना था जहाँ सामान्य और असामान्य के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो जाती है.

दोपहर में वह साइकोलॉजी लैब में 'रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण' (Rorschach Inkblot Test) के कुछ परिणामों का विश्लेषण कर रही थी. यह एक 'प्रोजेक्शन' तकनीक है, जिसमें व्यक्ति स्याही के धब्बों में वही देखता है जो उसके अवचेतन में गहरे बैठा होता है. शगुन ने गौर किया कि कैसे अलग-अलग परिवेश से आई लड़कियाँ उन धब्बों में कभी उड़ते पक्षी देखती हैं, तो कभी बंद पिंजरे.

शाम को होस्टल पहुँची तो आराम के लिए कुछ देर के लिए लेट गयी. तभी उसके फोन की घंटी बज उठी. उसने अनमने ढंग से फोन उठाया, मम्मा का था. आम तौर पर वे इस समय फोन नहीं करतीं. रात को सब काम निपटाने के बाद अपने कमरे में जाकर ही फोन करती हैं. उसने सोचा कुछ तो जरूरी बात है. उसने फोन उठा लिया. "शगुन, इस बार दीवाली की भाई-दूज से अगले दिन अनिल चाचा इन्दौर वाले मेहमानों को खास तौर पर बुलाना चाहते हैं. कह रहे हैं कि तू यहाँ रहेगी तो बात बन जाएगी और उन्हें कच्चा दस्तूर दे सकते हैं."

शगुन तब तक निकल कर छत पर आ चुकी थी. पश्चिम में सूरज डूबने को था. शगुन के मस्तिष्क पटल पर सांख्यिकी के चार्ट उतर आए. अभी बहुत काम बाकी पड़ा था. दीवाली के तुरन्त बाद सेमेस्टर था. और उसके तुरन्त बाद आखिरी सेमेस्टर शुरू होना था. इस सेमेस्टर की केस स्टडी तैयार नहीं हुई थी जिसे सेमेस्टर के पहले जमा करना था.

“मम्मा, इस सेमेस्टर की केस स्टडी जमा करना है और दीवाली के तुरन्त बाद सेमेस्टर है, उसकी भी तैयारी करनी होगी. इस दीवाली पर मंडी आना नहीं हो सकेगा.”

"लेकिन बेटा, घर में सब तेरा इंतज़ार कर रहे हैं. चाचा कह रहे थे कि ऐसा बढ़िया लड़का हाथ से निकल जाएगा तो फिर अच्छे रिश्ते ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे.” मम्मा की आवाज़ में वही पुरानी घबराहट थी.

"मम्मा, मेरा करियर ही मेरा सबसे बड़ा मुहूर्त है. मैं दीवाली अवकाश में यहीं हॉस्टल में रहकर अपनी रिसर्च रिपोर्ट पूरी करूँगी और सेमेस्टर की तैयारी भी."

“शगुन, जैसा तू उचित समझे. मेरी खुशी तो तेरे साथ है. पर चाचा पापा से अपने सामने तुझे फोन करवा सकते हैं. तब उनसे क्या बात करनी है, सोच कर रखना.”

“ वह मैं देख लूंगी मम्मा, अब फोन रखती हूँ.”

अगले दिन लैब पहुँच कर उसने सांख्यिकी (Statistics) के चार्टों को देखा. उन्हें तैयार कर लेने के बाद उसे सेमेस्टर की तैयारी में जुटना था. सेमेस्टर खत्म होते ही फाइनल सेमेस्टर के चार मुख्य पेपरों की तैयारी के साथ-साथ फील्ड वर्क और केस स्टडी का काम भी था. परामर्श मनोविज्ञान (Counselling Psychology) की इंटर्नशिप और ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर की केस रिपोर्ट बनानी थी. उसे यह सब पूरे करने था. पिछले चार सेमेस्टरों में अर्जित अंकों के आधार पर उसकी स्थिति यह थी कि उसने इन सबके लिए मेहनत की तो वह विद्यापीठ की मनोविज्ञान की सबसे बेहतर छात्रा होकर स्वर्ण पदक अर्जित कर सकती थी. परिवार-समाज की ओर से आ रही बाधाओं से पार पाने के लिए उसे यह जरूरी लगता था. एक सांख्यिकी चार्ट पूरा करने के बाद वह डॉ. शास्त्री के केबिन की ओर बढ़ गई. डॉ. शास्त्री उसके प्रोजेक्ट, "पितृसत्तात्मक ढांचे में महिलाओं की मानसिक स्थिति: एक केस स्टडी" के डेटा का मिलान कर रहे थे.

शगुन ने पूछा, "सर, क्या मेरा यह डेटा पर्याप्त है?"

डॉ. शास्त्री ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और बोले, "डेटा तो प्रभावशाली है और पर्याप्त भी शगुन, लेकिन क्या तुमने गौर किया कि तुम्हारी केस स्टडीज में 'कंडीशंड रिस्पांस' (Conditioned Response) कितना गहरा है? ये स्त्रियाँ अपनी बेड़ियों को ही अपना गहना मानने लगी हैं. मनोविज्ञान की भाषा में इसे 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) कहते हैं, जहाँ व्यक्ति यह मान लेता है कि वह अपनी स्थिति बदल ही नहीं सकता. क्या तुम इसे अपने जीवन के यथार्थ में चुनौती देने के लिए तैयार हो? अकादमिक सत्य और व्यक्तिगत साहस के बीच की खाई बहुत गहरी होती है."

शगुन को अहसास हुआ कि उसका प्रोजेक्ट केवल एक डिग्री के लिए नहीं, बल्कि खुद को उस 'लर्नड हेल्पलेसनेस' से बाहर निकालने की प्रक्रिया है.

उसी रात उसने आयुष को ईमेल किया. आयुष गुवाहाटी में अपने पहले सेमेस्टर की लैब रिपोर्ट्स में व्यस्त था. उसने अपने जवाब में लिखा:

"दीदी, आपकी हिम्मत देखकर मुझे भी ताकत मिलती है. यहाँ मेरी पहली दीवाली है और अवकाश केवल एक सप्ताह का, चार दिन आने जाने में टूटेंगे. तीन दिन के लिए कैम्पस से कोई भी घर नहीं जा रहा है. सब यहीं दीवाली मनाने की सोच रहे हैं. मैं हर हालत में घर नहीं जा रहा हूँ. हम दोनों अपनी-अपनी 'वर्कशॉप' में खुद को घिस कर माँज रहे हैं. आप फिक्र मत करो, मैं पापा को अलग से फोन करके समझा दूंगा कि आपकी अनुसंधान परियोजना (Research Project) कितनी गंभीर है. सगाई का दबाव फिलहाल टल जाएगा. आगे की फिर आगे देखेंगे."

दीवाली की रात रामगंजमंडी में दीये जले, आतिशबाजी भी हुई, लेकिन गुप्ता निवास में एक असहज सन्नाटा पसरा रहा. अनिल चाचा पूरी दीवाली अपना चेहरा गुस्से से लाल किए रहे. "पढ़ाई या बहाना? अब ये मनोवैज्ञानिक परीक्षण तय करेंगे कि सगाई कब होगी?" गुप्ताजी चुप रहे, पर उनकी आँखों में शगुन के प्रति एक अनजाना सम्मान और समाज के प्रति एक गहरा डर साथ-साथ तैर रहे थे.

शगुन ने अपनी नई नोटबुक, अपनी नयी 'संबल' को खोला और लिखा: "स्वतंत्रता का पहला कदम 'ना' कहना सीखना है, और दूसरा कदम उस 'ना' को तर्क और योग्यता से सिद्ध करना है."
... क्रमशः

मंगलवार, 3 मार्च 2026

सामाजिक लक्ष्य

पिंजरा और पंख-46

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
जुलाई में अच्छी बारिश हो गयी थी. सदियों से न जाने कितनी प्यास इस धरती के पास जमा है कि चाहे कितनी ही बरसात हो, सारा पानी घंटों में पी जाती है. बनस्थली और आसपास के इलाके में हरियाली अपनी पूरी रंगत में थी. रेतीली जमीन पर हरियाली की चादर बिछ गई थी. शगुन की व्यस्तता बढ़ गयी थी. ऑनर्स मनोविज्ञान में उसका आखिरी साल था. समय निकाल पाना बहुत कठिन था. लेकिन उसका मन रह-रहकर आयुष के ईमेल के इर्द-गिर्द घूमता रहता.

उस दोपहर, डिपार्टमेंट की लाइब्रेरी में बैठी शगुन को फिर से आयुष के ईमेल की याद आई. उसने कंप्यूटर पर जाकर फिर से अपना ई-मेल अकाउंट खोला और इस बार आयुष का ई-मेल को प्रिंट कमांड दिया. थोड़ी देर में प्रिंट उसके हाथ में था. वह उसे फिर से पढ़ने लगी.— "दीदी, यहाँ सब कुछ शून्य (0) और एक (1) के बीच है. लेकिन लगभग कुछ समय लैब में गुजारना पड़ता है. ड्राइंग्स ही ड्राइंग्स, रेखाएँ खींचने के बीच यहाँ की उमस पसीना बहाने लगती है. ऐसा लगने लगता है कि इंजीनियर बनने से पहले मजदूर होना जरूरी है. अब समझ आ रहा है कि बहुत सारे आविष्कार अनपढ़ और अल्पपढ़ मजदूरों ने कैसे कर दिखाए?"

शगुन के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई. उसने तुरंत रिप्लाई (Reply) बटन दबाया और लिखा:

"प्रिय आयुष, तुमने जो महसूस किया है, वही शिक्षा का असली 'क्यूआर कोड' है. जब हाथ श्रम से काले होते हैं, तभी मस्तिष्क में विचारों की उजली लकीरें उभरती हैं. यह घिसना बंद मत करना, हीरा रगड़ खाकर ही अपनी चमक पाता है."

ईमेल भेजकर शगुन ने अपनी 'ऑनर्स प्रोजेक्ट' की फाइल खोली. विषय था, "पितृसत्ता में स्त्री शिक्षा का वैचारिक संघर्ष". डॉ. शास्त्री ने उसे आगाह किया था कि यह विषय अकादमिक से ज़्यादा व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन शगुन अड़ी रही. उसे लगा कि जो लड़ाई वह घर के भीतर लड़ रही है, उसे शब्दों में ढालना ही उसका असली 'संबल' होगा. जब वह प्रोजेक्ट करने लगी तो उसे महसूस हुआ कि केवल उसके परिवार के तथ्य पर्याप्त नहीं होंगे. शेष तथ्य कहाँ से लाए जाएँ? फिर उसे होस्टल मेस में काम करने वाली नाथी का ध्यान आया. वह विद्यापीठ परिसर से बाहर बसे बनस्थली गाँव से आती थी. उसने उससे बात की तो उसने महसूस किया कि उसे उसके गाँव जाकर कुछ स्त्रियों से बात करनी चाहिए. नाथी उसे गाँव की स्त्रियों से बात कराने को तैयार हो गयी. एक मंगलवार साप्ताहिक अवकाश के दिन जब नाथी का भी अवकाश था, शगुन बनस्थली गाँव गई. उसने चार घंटे वहाँ बिताए और बहुत सारी स्त्रियों से बात करने के बाद बहुत से तथ्य एकत्र किए. उसने महसूस किया कि यह संघर्ष जितना उसने सोचा था उससे कहीं बहुत अधिक कठोर है. लेकिन अब प्रोजेक्ट लगभग तैयार था, बस एक बार डॉ. शास्त्री को दिखाने भर की देर थी.

शाम को फोन पर मम्मा से बात हुई. उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोश बेचैनी थी. "शगुन, तू ठीक तो है न? पढ़ाई पर ध्यान देना, और... और अनिल चाचा ने आज फिर पापा से तेरे बारे में कुछ बात की थी." मम्मा की आधी-अधूरी बात ने शगुन के कान खड़े कर दिए. "क्या बात मम्मा? क्या फिर से कोई रिश्ता आया है?"

मम्मा ने लंबी साँस ली, "उनका कोई जानकार है, अच्छे लोग हैं, लड़का बैंक में है. चाचा कह रहे थे कि शगुन की पढ़ाई अब पूरी होने को है, तो क्यों न सगाई कर दी जाए? शादी का बीएससी का रिजल्ट आने के बाद देख लेंगे."

शगुन का गला सूख गया. वह जानती थी कि आयुष की सफलता ने चाचा के अहंकार को शांत जरूर किया था, लेकिन बदला नहीं था. अब वे शगुन की 'आज़ादी' को 'विवाह' की लक्ष्मण रेखा में बाँधकर अपना खोया हुआ वर्चस्व वापस पाना चाहते थे.

"मम्मा, आप पापा से कहिएगा कि मेरी उड़ान अभी बाकी है. अभी तो मुझे एमएससी (M.Sc) करनी है," शगुन ने दृढ़ता से कहा. "बेटा, मैं तो तेरे साथ हूँ, पर चाचा की बात टालना पापा के लिए मुश्किल होता जा रहा है. वे कहते हैं कि आयुष पर इतना खर्च हो रहा है, तो बेटी की ज़िम्मेदारी से जल्दी मुक्त होना ठीक है."

फोन रखने के बाद शगुन बहुत देर तक हॉस्टल की बालकनी में खड़ी रही. दूर क्षितिज पर चमकती बिजलियाँ उसे संकेत दे रही थीं कि रामगंजमंडी में एक बार फिर 'विचारों का युद्ध' छिड़ने वाला है. लेकिन वह सब सवालों का उत्तर जरूर देगी, चाचा को भी और जरूरत पड़ी तो पापा को भी. उसने सुना था कि बनस्थली में पोस्ट ग्रेजुएट छात्राओं को रिसर्च असिस्टेंट, टीचिंग असिस्टेंट आदि का काम मिल जाता है जो एक छात्रा के लिए पर्याप्त होता है. वह इसके लिए बात करेगी और अपने लिए काम प्राप्त करने की बात पुख्ता करके रखेगी. उसे विश्वास था कि पापा चाचा की बात को दरकिनार करके उसी की बात को तरजीह देंगे और चाची भी जरूर उसका साथ देंगी. वह इन छोटी चीजों के लिए अपने सामाजिक लक्ष्यों को नहीं छोड़ सकती. वह हार नहीं मानेगी.

अपने निश्चय को दृढ़ करके उसने आयुष को फोन किया.

“कैसी हो दीदी?” उधर से आयुष की आवाज आई.”

“मैं ठीक हूँ, तू तेरा बता. कैसा चल रहा है.”

“सब बढ़िया चल रहा है. थोड़ा मुश्किल तो लगता है. भागदौड़ और मेहनत खूब है. पर मजा भी खूब आ रहा है. नयी चीजें सीखने को मिल रही हैं. पढ़ने को खूब किताबें हैं, खेलने को खेल के मैदान हैं. वातावरण और मौसम तो जबर्दस्त है.”

“थोड़ी बहुत मौज-मस्ती ठीक है, तू भी करता है कि नहीं?”

“अभी नहीं दीदी, अभी तो मैं समझ रहा हूँ, एक बार अपना स्थान बना लूँ. फिर सब देखेंगे.”

“तू बहुत समझदार हो गया है.”

“अपनी दीदी का भाई जो हूँ.”

“अब रखती हूँ, आयुष. मैस जाने का वक्त हो गया. लड़कियाँ बुला रही हैं. फिर फोन करूंगी.”

मैस से आने के बाद उसने आयुष का 'संबल' रजिस्टर याद आया जो अब गुवाहाटी में था. उसे लगा कि अब उसे भी अपने लिए भी एक नया “संबल रजिस्टर” खुद तैयार करना होगा.
... क्रमशः

सोमवार, 2 मार्च 2026

क्यू आर कोड

पिंजरा और पंख-45

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
'कामाख्या एक्सप्रेस' के कोटा जंक्शन से रवाना होते ही आयुष को विस्थापन का अहसास हुआ. वह घर से बहुत दूर, दो हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर गुवाहाटी जा रहा था. वहाँ उसे आईआईटी में कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग पढ़ना है. इससे उसे एक खास कुशलता मिलेगी जो एक अच्छी नौकरी हासिल करने में उसे मदद करेगी. उसके परिवार की आकांक्षाएँ पूरी होंगी. लेकिन उसकी खुद की आकांक्षाओं का क्या? तभी उसकी नजर उबासी लेते पापा पर पड़ी.

“पापा, आप लेट जाएँ, कुछ नींद ले लें, रात भर ठीक से सोए नहीं हैं.” आयुष ने सीट से खड़े होकर कहा.

“सही है, तुम भी मिडिल बर्थ खोल लो और लेट जाओ, दो-एक घंटे की नींद ले लेंगे तो सहज हो जाएंगे.”

आयुष ने मिडिल बर्थ खोल ली और वह उस पर चला गया. गुप्ताजी लोअर बर्थ पर लेट गए. दोनों पिता-पुत्र को दो दिन और दो रातों तक सफर करना था.

17 जुलाई की सुबह जब ट्रेन 'कामाख्या स्टेशन' पर रुकी, तो बाहर की नमी और पहाड़ियों की धुंध ने उन्हें चकित कर दिया. टैक्सी से ब्रह्मपुत्र का पुल पार कर जब वे अमिन्गाँव आईआईटी कैंपस पहुँचे, तो उसकी विशालता देख दोनों हतप्रभ रह गए.

उसे 'बराक' (Barak) हॉस्टल के बी-ब्लॉक में कमरा नंबर 112 मिला. इस होस्टल में सभी कमरे एक-एक स्टूडेंट के लिए बने थे. वह अपना सामान अपने कमरे में ले आया. पापा को कैम्पस के गेस्ट हाउस में स्थान मिला. 18 से 20 जुलाई के बीच 'एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक' की लंबी कतारों में खड़े होकर आयुष ने दस्तावेजी कार्रवाई पूरी की, गुप्ताजी उसके साथ लगे रहे. वे मन ही मन आयुष पर गर्व कर रहे थे कि आयुष ने खुद अपनी मेहनत से यहाँ तक पहुँचने की योग्यता हासिल की. उन्हें विश्वास था कि वह यहाँ भी अच्छा ही करेगा.

होस्टल में पास का कमरा नं. 111 कार्तिक को मिला था. वह हैदराबाद से था. कार्तिक की टूटी-फूटी हिंदी और आयुष की खामोशी के बीच पहले दो दिन केवल 'औपचारिक हेलो' में बीते. 23 जुलाई को पापा उसे गले लगाकर वापस राजस्थान के लिए रवाना होने लगे तो दोनों की आँखें नम थी. ट्रेन के रवाना होने के बाद पहली बार आयुष को अपने सीने पर एक भारी पत्थर जैसा महसूस हुआ. वह घर से हज़ारों मील दूर, बिल्कुल अकेला था. वह रात बहुत मुश्किल से गुजरी.

अगला दिन ओरिएन्टेशन का था. 'ऑडिटोरियम' में डीन का भाषण, परिचय का शोर. इन सबके बीच आयुष का ध्यान वहाँ के माहौल पर था. उसके स्कूल में अनुशासन का मतलब 'सजा' था, यहाँ अनुशासन का मतलब 'जिम्मेदारी' लग रहा था. लेकिन उसे सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात से हुई थी कि हर होस्टल का अपना रीडिंग रूम था, जहाँ हर तरह की सैंकड़ों ताजा पत्रिकाएँ हर समय उपलब्ध थीं. इसके साथ ही आईआईटी की अपनी सेंट्रल लायब्रेरी थी, जिसमें सवा लाख से ऊपर पुस्तकें थीं. केवल विज्ञान से संबंधित नहीं बल्कि विश्व के हर तरह के ज्ञान से भरपूर. इसके अलावा कम्प्यूटरों के जरीए वे दुनिया भर की डिजिटल लायब्रेरियों से जुड़ा जा सकता था.

शाम को मेस में कार्तिक ने उसे एक पुराने छात्र से मिलवाया. उससे चेतावनी मिली, "भाई, कल से असली खेल शुरू होगा. ड्राइंग बोर्ड और वर्कशॉप के जूते तैयार रखना." इस चेतावनी ने आयुष की धड़कनें बढ़ा दीं.

अगले दिन 25 जुलाई को सुबह 8:00 बजे पहली क्लास शुरू हुई, “मैथेमेटिक्स-I (MA101)”. लेक्चर हॉल (L-2) में करीब 200 छात्र थे. प्रोफेसर ने आते ही बोर्ड पर 'कैलकुलस' के ऐसे जटिल समीकरण लिखने शुरू किए कि आयुष को लगा कि उसकी 1176वीं रैंक भी शायद कम पड़ जाएगी.

दोपहर के सत्र में उसकी पहली लैब थी, “इंजीनियरिंग ड्राइंग (ME111)”. आयुष ने बड़े से 'ड्राइंग बोर्ड' पर अपनी सफेद शीट लगाई. उसे 'पेंसिल ग्रेड' और 'प्रोजेक्शन' की सूक्ष्मताओं को समझना था. राजस्थान की सूखी गर्मी में पलने वाले आयुष के लिए गुवाहाटी की उमस में पसीना पोंछते हुए 'टी-स्क्वायर' संभालना भारी पड़ रहा था.

"यार, ये सीएसई (CSE) वालों को ड्राइंग क्यों सिखा रहे हैं? हमें तो कोड लिखना है," कार्तिक ने बगल वाली टेबल से फुसफुसाकर कहा.

आयुष मुस्कुराया. उसे शगुन दीदी की बात याद आई, "विराट हर जगह है." उसने मन ही मन सोचा कि शायद ये बारीक लकीरें भी उस विराट सत्य का ही हिस्सा हैं. ये कोड भी ड्राइंग ही हैं. वह कार्तिक की ओर मुस्कुरा कर रह गया. तभी उसे जापानी इंजीनियर ‘मासाहिरो हारा’ का ध्यान आया जिसने ‘क्यूआर कोड’ जैसी भाषा का आविष्कार किया है, जो एक ड्राइंग ही होती है. वह सीधा हो गया.

“तुमने ‘क्यूआर कोड’ सुना है? वह एक ड्राइंग ही होता है.” आयुष ने कार्तिक को जवाब देते हुए सवाल कर डाला.”

“ओह¡ ‘मासाहिरो हारा’, समझ गया. ड्राइंग सीखनी ही होंगी.” यह कह कर कार्तिक फिर से अपनी ड्राइंग पर झुक गया.”

शाम को वह वर्कशॉप (ME110) देखने गया. वहां की 'फोर्जिंग' और 'फिटिंग' शॉप से आती लोहे की महक ने उसे रामगंजमंडी की याद दिला दी, जहाँ अक्सर कहीं न कहीं मरम्मत का काम चलता रहता था.

रात 9:00 बजे, मेस से खाना खाकर जब वह कमरे में लौटा, तो थकान से चूर था. उसने अपना कंप्यूटर चालू किया. कैंपस के LAN (लोकल एरिया नेटवर्क) की जादुई रफ्तार ने उसे एक नई दुनिया से जोड़ दिया. उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, यहाँ सब कुछ बहुत 'टेक्निकल' है. पहले दिन कोडिंग नहीं, बल्कि हाथ में पेंसिल और दिमाग में 'मैथेमेटिक्स' लेकर बैठा हूँ. गुवाहाटी की बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही, जैसे यहाँ की पढ़ाई भी कभी नहीं रुकेगी."

खिड़की के बाहर 'बराक' हॉस्टल के पीछे पहाड़ियों पर बादल मंडरा रहे थे. आयुष ने 'संबल' रजिस्टर खोला और आज की तारीख के नीचे लिखा, "सफलता का मतलब केवल कंप्यूटर नहीं, बल्कि हर विषय की गहराई को समझना है." उसे एहसास हुआ कि आईआईटी का पहला साल उसे सिखाएगा कि 'इंजीनियर' बनने से पहले एक 'मजदूर' होना जरूरी है.
... क्रमशः