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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

बीज

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

शगुन चार बरस की होने को थी. दीवाली के पहले पापा कपड़े खरीद कर लाए. उसके लिए एक खूबसूरत गुलाबी चमकदार फ्रॉक थी जिस पर मखमली कपड़े के बने फूल लगे थे. उसे पसंद आई थी. लेकिन उसने उसे छूकर छोड़ दिया. गर्मियों में जब मामा के घर थी तब मामा भी उसके लिए फ्रॉक ही लाए थे और मुन्नू भैया के लिये टी शर्ट और पैंट. मुन्नू भैया उन कपड़ों में बहुत सुन्दर लग रहे थे. तब उसने लौट कर पापा से कहा भी था कि उसे भी टी शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा फिर फ्रॉक ले आए. वह रूठ गयी कि उसे तो शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा ने उसे मनाते हुए कहा था. पैंट शर्ट लड़कों की ड्रेस है उसमें वह अच्छी नहीं लगेगी. लड़कियाँ तो फ्रॉक में ही सुन्दर सजीली लगती हैं. उसे नहीं मनाया जा सका तो उन्होंने कोशिश छोड़ दी और मम्मा से कहा कि इसे समझाओ, ऐसी जिदें ठीक नहीं. शगुन को पहली बार समझ आया कि : कुछ चीजें लड़कियों के लिए नहीं हैं.

सात साल की होते होते, उसके पास दो दुनियाएँ थीं एक घर के दरवाजे के अन्दर और एक बाहर. बाहर की दुनिया में उसका दखल सीमित था. जबकि एक तरफ छोटा भाई आयुष था, जो शाम को मैदान में खेल रहे लड़कों के पास जा बैठता और उन्हें देखता. जब भी उसे मौका मिलता वह फुटबॉल को किक मारता. दूसरी तरफ वह थी, दादी रंगोली के डिब्बे लाकर उससे बोलती-"चलो, तुम्हें रंगोली बनाना सिखाऊँ. खूबसूरत बनाओगी तो सब की प्रशंसा मिलेगी. लड़कों का क्या, उनके लिए सड़कों-मैदानों की धूल और कीचड़ ही भले हैं. अभी आयुष धूल-मिट्टी में सन कर आएगा और मम्मा की डाँट खाएगा उसे ठंडे पानी से हाथ पैर धोने पड़ेंगे तब नानी याद आ जाएगी."

शगुन ने रंगों के डब्बे थाम लिए और रंगोली बनाना सीखा. बाहर से आयुष की खिलखिलाहट आती. उसने सीखा: खूबसूरती गढ़ना उसका काम था और उसकी जगह घर के भीतर थी.

आठ बरस की उम्र में उसने 'हक' का पहला पाठ पढ़ा. दिवाली पर माँ ने बेसन के लड्डू बनाए. पहला लड्डू आयुष की थाली में रखा गया.

"लड़का है, पहले उसका हक बनता है," चाचा ने कहा, जैसे कोई पुराना नियम सुना रहे हों.
दूसरा लड्डू शगुन को मिला. मिठाई तो एक जैसी थी, पर वह पल उसे अलग कर रहा था. उसने सीखा: उसका हक... दूसरे नंबर पर आता है.

वह नौ की हुई. उसे गुस्सा आया तो उसने ऊँची आवाज में कह दिया, "मैं नहीं करुँगी!"

माँ ने फौरन उसे तीखी आवाज में उसे डाँटा, "शगुन! इतनी तेज़ आवाज़? तुम्हें शर्म नहीं आती इतना जोर से बोलते हुए? लड़कियाँ ऐसे नहीं बोलतीं. उन्हें आहिस्ता बोलना चाहिए. उसकी आवाज़ पर लगाम कस दी गई.

उसी हफ्ते आयुष किसी बात पर चिल्लाया, तो पापा ने मम्मा से कहा, "देखो, कितना जोश है बेटे में!"

शगुन ने सीखा: उसकी आवाज़ का स्वर कोमल और धीमा होना चाहिए. उसका गुस्सा 'अशोभनीय' था, जबकि भाई का गुस्सा 'जोश'.

ग्यारह बरस की उम्र में उसने आयुष की साइकिल ली और चलाना सीखने लगी. उस का संतुलन बिगड़ा और वह गिर पड़ी, घुटने में खरोंच आ गई. उसका पायजामा घुटने पर से रगड़ खाने से फट गया और पता नहीं कैसे उसी समय कुर्ता भी कंधे के यहाँ से उधड़ गया, उसका कंधा दिखने लगा.

पिता खबर मिलते ही दौड़े आए, चेहरे पर चिंता थी. पर चिंता के साथ आया एक वाक्य जो चोट से ज्यादा गहरा था: "देखो, इसीलिए कहता था, लड़कियों को ये सब नहीं करना चाहिए. खतरा होता है."
फौरन डिस्पेंसरी ले जाया जाता उसके पहले मम्मा ने यह कहते हुए कि उसका कंधा दिख रहा है, उसके कपड़े बदलवा दिए. उसके घुटने पर पट्टी कराई गयी, एटीएस इंजेक्शन लगा और खाने को दवाएँ दी गयीं. साइकिल चलाने की अनुमति जो कभी उसे नहीं मिली थी, उससे छिन गई.

उसने सीखा: 'सुरक्षा' के नाम पर लड़कियों की दुनिया सिकुड़ी हुई होती है. उसकी हिम्मत, उसकी जोखिम उठाने की क्षमता का कोई अर्थ नहीं. उस पर सभी लड़कियों की तरह एक लेबल चिपकी थी : 'नाजुक' और उसके शरीर के हिस्से नहीं दिखने चाहिए.

बारहवाँ साल चल रहा था. एक दोपहर वह माँ के साथ किचन में बैठी थी, आलू छील रही थी. एक सहज प्रश्न उसके मन में उठा. वह पूछ बैठी, मम्मा कभी साइकिल चलाई है, तुमने?

काम करती हुई माँ के हाथ रुक गए. एक पल को वह चुप रह गयी, फिर बिना शगुन की ओर देखे, धीरे से बोलीं, "नहीं बेटा... हमारे ज़माने में तो लड़कों को भी साइकिल नहीं मिलती थी. हमारे तो वह सपने में भी नहीं थी."

फिर माँ ने तुरंत टॉपिक बदल दिया, "ये लो, आलू छील लो, तो प्याज़ भी काट देना."

उस पल शगुन को एक झटका-सा लगा. यह सिर्फ उसके लिए नहीं था. ये नियम... ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे, वे एक विरासत थे. परिवार और समाज जिन्हें चुपचाप नयी पीढ़ी को सौंप देता था. इस विरासत में डर, सीमाएँ और 'नहीं' शब्द भरे हुए थे. उसकी माँ भी इसी कंडीशनिंग का उत्पाद थीं, और अब अचेतन में, उसी विरासत को आगे बढ़ा रही थी.

शाम को अपने कमरे में, शगुन छोटे से आईने के सामने खड़ी हुई. उसमें वह बच्ची नहीं दिख रही थी जिसे रंगोली बनाना अच्छा लगता था. एक नई चेतना की किरण उसकी आँखों में थी. उसे एहसास हो रहा था कि उसका जीवन एक पूर्व-लिखित पटकथा का हिस्सा था, जिसके संवाद उसे बचपन से ही प्यार, डाँट, चिंता और परंपरा के माध्यम से याद करा दिए गए थे.

लड़कियाँ ऐसे नहीं करतीं.

तुम्हारे लिए यह ठीक नहीं.

शर्म नहीं आती?

वह आईने में अपनी परछाईं से आँख मिलाती रही. उसके भीतर एक सवाल ने जन्म लिया, धीमा पर स्पष्ट: "क्या मैं इस पटकथा को ही याद करती रहूँगी... या खुद इसे दोबारा लिख सकती हूँ?"


आईने में उसकी छवि मुसकुराई नहीं. बस, एक गहरी, शांत जिज्ञासा से देखती रही. अंकुरण के लिए छटपटा रहा एक बीज न जाने कहाँ से आ गया था. अब वह अंकुराएगा या उसे दबा दिया जाएगा? यह भविष्य के गर्भ में छिपा था.

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बेटा

लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी

आठ साल का आयुष अपनी बहन शगुन की पीठ पर सवार होकर घोड़ा-घोड़ा खेल रहा था. शगुन दस साल की थी, पर आयुष के मुकाबले हड्डियों में हल्की-सी थी. फिर भी वह अपने भाई को पीठ पर लादकर पूरे कमरे का चक्कर लगा रही थी, और दोनों के खिलखिलाहट से कमरा गूंज रहा था.

"घोड़ा रुक! अब मैं राजा बनूंगा!" आयुष ने कहा और शगुन की पीठ से कूदकर बिस्तर पर चढ़ गया. उसने चादर को कंधों पर लपेटा और माथे पर कागज़ का ताज रख लिया. शगुन ने अपनी चुनी हुई गुड़िया को गोद में उठा ली. वह रानी बनी.

तभी दरवाज़ा खुला और उनके चाचा अनिल अंदर आए. उनकी नज़र सबसे पहले आयुष पर पड़ी, जो चादर ओढ़े खड़ा था, फिर शगुन पर जो गुड़िया को सुला रही थी.


चाचा का चेहरा कड़क हो गया. "आयुष! लड़के चादर नहीं ओढ़ते. लड़के घोड़ा-घोड़ा नहीं खेलते. तुम्हें पढ़ना चाहिए, क्रिकेट खेलना चाहिए."

आयुष स्तब्ध रह गया. "और तुम, शगुन, भाई को पीठ पर लादती हो? लड़कियाँ इतना शोर नहीं करतीं. जाओ, माँ के पास रसोई में मदद करो."

शगुन ने गुड़िया वहीं छोड़ी और बिना एक शब्द कहे कमरे से बाहर चली गई. आयुष ने देखा कि उसकी आँखें नम थीं.

"चाचा, हम तो बस खेल रहे थे," आयुष ने कहा, उसकी आवाज़ में एक कंपन था.

"खेल भी सीखना पड़ता है, बेटा," चाचा ने कहा, "तुम लड़के हो. तुम्हें मज़बूत बनना है. लड़के रोते नहीं, लड़के डरते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."



चाचा के जाने के बाद, आयुष अकेला कमरे में खड़ा रहा. उसने चादर उतारकर बिस्तर पर फेंक दी. फिर उसने शगुन की छोड़ी हुई गुड़िया उठाई.

वह गुड़िया लेकर रसोई में गया. शगुन बर्तन साफ़ कर रही थी, उसकी आँखें अब भी लाल थीं.

"यह लो," आयुष ने गुड़िया बढ़ाते हुए कहा.

शगुन ने गुड़िया ले ली, पर उसने आयुष की आँखों में नहीं देखा.

"चाचा ने कहा लड़के रोते नहीं," आयुष ने कहा, "पर तुम रो सकती हो, है न?"

शगुन ने सिर हिलाया, "लड़कियाँ रो सकती हैं. पर खेल नहीं सकतीं."



अगली सुबह, शगुन ने फिर से अपना खिलौना लेकर आयुष के कमरे में दस्तक दी. "चलो, आज मैं राजा बनूँगी!" वह बोली.

आयुष ने उसे देखा. फिर अचानक उसकी नज़र दरवाज़े पर गई—जहाँ कल चाचा खड़े थे. एक क्षण के लिए, उसके मन में चाचा की आवाज़ गूँज उठी. उसने शगुन की ओर हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया.

"नहीं... मुझे पढ़ना है," आयुष ने कहा, और किताबें लेकर बैठ गया.

शगुन कुछ पल वहीं खड़ी रही, फिर धीरे से चली गई. आयुष किताब की ओर देखता रहा, पर अक्षर धुंधले पड़ गए थे.



चार साल बाद, आयुष बारह साल का हो गया.

स्कूल की क्रिकेट टीम के चयन में उसका नाम नहीं आया. वह पूरा दिन मैदान में बैठा रहा, टीम की प्रैक्टिस देखता रहा. घर लौटते हुए, उसकी आँखों में पानी भर आया. गले में एक गाँठ सी बन गई, जो साँस लेने में रुकावट डाल रही थी.

वह बाथरूम में गया और शीशे के सामने खड़ा हो गया. आँखें लाल थीं, गाल गीले हो रहे थे. तभी उसके कानों में अपने चाचा की आवाज गूंजी, साफ़ और कठोर: "लड़के रोते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."

उसने अपने सब ओर देखा, चाचा कहीं नहीं थे. पर कानों में उनकी आवाज गूंज रही थी.

आयुष ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं. नाखून हथेलियों में चुभने लगे. उसने अपना सिर ऊपर उठाया, आँखें फैलाकर ताका जिससे आँसू बहने न पाएँ और एक गहरी, कँपकँपी भरी साँस ली.

फिर उसने नल खोला और ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया. पानी और आँसू एक हो गए. जब वह बाहर आया, तो उसके चेहरे पर कोई नमी नहीं थी. केवल एक खालीपन था, जैसे किसी ने उसके भीतर का एक कोना साफ़ कर दिया हो.



उस रात खाने की मेज़ पर शगुन ने पूछा, "टीम में चुन लिए?"

आयुष ने सिर हिलाया, "नहीं. कोई बात नहीं."

उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो. शगुन ने उसे देखा, उसकी पीठ एकदम सीधी थी और होंठ जैसे हिले ही न हों. वह कुछ कहना चाहती थी, पर चुप रही. उसे पता था, आयुष अब वह बच्चा नहीं रहा जो गुड़िया वाली बात करता था.

आयुष ने अपनी प्लेट साफ़ की. उस दिन वह रोया नहीं था, और उस दिन के बाद भी वह कभी नहीं रोया.

लड़के रोते नहीं.

और उसने सीख लिया था.

और शगुन समझ गयी थी कि अब वह और आयुष अपने माता पिता के बच्चे होते हुए भी बेटी और बेटे हो गए हैं.