लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
शगुन चार बरस की होने को थी. दीवाली के पहले पापा कपड़े खरीद कर लाए. उसके लिए एक खूबसूरत गुलाबी चमकदार फ्रॉक थी जिस पर मखमली कपड़े के बने फूल लगे थे. उसे पसंद आई थी. लेकिन उसने उसे छूकर छोड़ दिया. गर्मियों में जब मामा के घर थी तब मामा भी उसके लिए फ्रॉक ही लाए थे और मुन्नू भैया के लिये टी शर्ट और पैंट. मुन्नू भैया उन कपड़ों में बहुत सुन्दर लग रहे थे. तब उसने लौट कर पापा से कहा भी था कि उसे भी टी शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा फिर फ्रॉक ले आए. वह रूठ गयी कि उसे तो शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा ने उसे मनाते हुए कहा था. पैंट शर्ट लड़कों की ड्रेस है उसमें वह अच्छी नहीं लगेगी. लड़कियाँ तो फ्रॉक में ही सुन्दर सजीली लगती हैं. उसे नहीं मनाया जा सका तो उन्होंने कोशिश छोड़ दी और मम्मा से कहा कि इसे समझाओ, ऐसी जिदें ठीक नहीं. शगुन को पहली बार समझ आया कि : कुछ चीजें लड़कियों के लिए नहीं हैं.
सात साल की होते होते, उसके पास दो दुनियाएँ थीं एक घर के दरवाजे के अन्दर और एक बाहर. बाहर की दुनिया में उसका दखल सीमित था. जबकि एक तरफ छोटा भाई आयुष था, जो शाम को मैदान में खेल रहे लड़कों के पास जा बैठता और उन्हें देखता. जब भी उसे मौका मिलता वह फुटबॉल को किक मारता. दूसरी तरफ वह थी, दादी रंगोली के डिब्बे लाकर उससे बोलती-"चलो, तुम्हें रंगोली बनाना सिखाऊँ. खूबसूरत बनाओगी तो सब की प्रशंसा मिलेगी. लड़कों का क्या, उनके लिए सड़कों-मैदानों की धूल और कीचड़ ही भले हैं. अभी आयुष धूल-मिट्टी में सन कर आएगा और मम्मा की डाँट खाएगा उसे ठंडे पानी से हाथ पैर धोने पड़ेंगे तब नानी याद आ जाएगी."
शगुन ने रंगों के डब्बे थाम लिए और रंगोली बनाना सीखा. बाहर से आयुष की खिलखिलाहट आती. उसने सीखा: खूबसूरती गढ़ना उसका काम था और उसकी जगह घर के भीतर थी.
आठ बरस की उम्र में उसने 'हक' का पहला पाठ पढ़ा. दिवाली पर माँ ने बेसन के लड्डू बनाए. पहला लड्डू आयुष की थाली में रखा गया.
"लड़का है, पहले उसका हक बनता है," चाचा ने कहा, जैसे कोई पुराना नियम सुना रहे हों.
दूसरा लड्डू शगुन को मिला. मिठाई तो एक जैसी थी, पर वह पल उसे अलग कर रहा था. उसने सीखा: उसका हक... दूसरे नंबर पर आता है.
वह नौ की हुई. उसे गुस्सा आया तो उसने ऊँची आवाज में कह दिया, "मैं नहीं करुँगी!"
माँ ने फौरन उसे तीखी आवाज में उसे डाँटा, "शगुन! इतनी तेज़ आवाज़? तुम्हें शर्म नहीं आती इतना जोर से बोलते हुए? लड़कियाँ ऐसे नहीं बोलतीं. उन्हें आहिस्ता बोलना चाहिए. उसकी आवाज़ पर लगाम कस दी गई.
उसी हफ्ते आयुष किसी बात पर चिल्लाया, तो पापा ने मम्मा से कहा, "देखो, कितना जोश है बेटे में!"
शगुन ने सीखा: उसकी आवाज़ का स्वर कोमल और धीमा होना चाहिए. उसका गुस्सा 'अशोभनीय' था, जबकि भाई का गुस्सा 'जोश'.
ग्यारह बरस की उम्र में उसने आयुष की साइकिल ली और चलाना सीखने लगी. उस का संतुलन बिगड़ा और वह गिर पड़ी, घुटने में खरोंच आ गई. उसका पायजामा घुटने पर से रगड़ खाने से फट गया और पता नहीं कैसे उसी समय कुर्ता भी कंधे के यहाँ से उधड़ गया, उसका कंधा दिखने लगा.
पिता खबर मिलते ही दौड़े आए, चेहरे पर चिंता थी. पर चिंता के साथ आया एक वाक्य जो चोट से ज्यादा गहरा था: "देखो, इसीलिए कहता था, लड़कियों को ये सब नहीं करना चाहिए. खतरा होता है."
फौरन डिस्पेंसरी ले जाया जाता उसके पहले मम्मा ने यह कहते हुए कि उसका कंधा दिख रहा है, उसके कपड़े बदलवा दिए. उसके घुटने पर पट्टी कराई गयी, एटीएस इंजेक्शन लगा और खाने को दवाएँ दी गयीं. साइकिल चलाने की अनुमति जो कभी उसे नहीं मिली थी, उससे छिन गई.
उसने सीखा: 'सुरक्षा' के नाम पर लड़कियों की दुनिया सिकुड़ी हुई होती है. उसकी हिम्मत, उसकी जोखिम उठाने की क्षमता का कोई अर्थ नहीं. उस पर सभी लड़कियों की तरह एक लेबल चिपकी थी : 'नाजुक' और उसके शरीर के हिस्से नहीं दिखने चाहिए.
बारहवाँ साल चल रहा था. एक दोपहर वह माँ के साथ किचन में बैठी थी, आलू छील रही थी. एक सहज प्रश्न उसके मन में उठा. वह पूछ बैठी, मम्मा कभी साइकिल चलाई है, तुमने?
काम करती हुई माँ के हाथ रुक गए. एक पल को वह चुप रह गयी, फिर बिना शगुन की ओर देखे, धीरे से बोलीं, "नहीं बेटा... हमारे ज़माने में तो लड़कों को भी साइकिल नहीं मिलती थी. हमारे तो वह सपने में भी नहीं थी."
फिर माँ ने तुरंत टॉपिक बदल दिया, "ये लो, आलू छील लो, तो प्याज़ भी काट देना."
उस पल शगुन को एक झटका-सा लगा. यह सिर्फ उसके लिए नहीं था. ये नियम... ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे, वे एक विरासत थे. परिवार और समाज जिन्हें चुपचाप नयी पीढ़ी को सौंप देता था. इस विरासत में डर, सीमाएँ और 'नहीं' शब्द भरे हुए थे. उसकी माँ भी इसी कंडीशनिंग का उत्पाद थीं, और अब अचेतन में, उसी विरासत को आगे बढ़ा रही थी.
शाम को अपने कमरे में, शगुन छोटे से आईने के सामने खड़ी हुई. उसमें वह बच्ची नहीं दिख रही थी जिसे रंगोली बनाना अच्छा लगता था. एक नई चेतना की किरण उसकी आँखों में थी. उसे एहसास हो रहा था कि उसका जीवन एक पूर्व-लिखित पटकथा का हिस्सा था, जिसके संवाद उसे बचपन से ही प्यार, डाँट, चिंता और परंपरा के माध्यम से याद करा दिए गए थे.
लड़कियाँ ऐसे नहीं करतीं.
तुम्हारे लिए यह ठीक नहीं.
शर्म नहीं आती?
वह आईने में अपनी परछाईं से आँख मिलाती रही. उसके भीतर एक सवाल ने जन्म लिया, धीमा पर स्पष्ट: "क्या मैं इस पटकथा को ही याद करती रहूँगी... या खुद इसे दोबारा लिख सकती हूँ?"
आईने में उसकी छवि मुसकुराई नहीं. बस, एक गहरी, शांत जिज्ञासा से देखती रही. अंकुरण के लिए छटपटा रहा एक बीज न जाने कहाँ से आ गया था. अब वह अंकुराएगा या उसे दबा दिया जाएगा? यह भविष्य के गर्भ में छिपा था.