@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: अदृश्य विभाजन

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

अदृश्य विभाजन

पिंजरा और पंख-24
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली आए हुए छह माह से अधिक हो चुके थे. इस बीच शगुन स्त्रियों की शिक्षा के निमित्त निर्मित इस नयी दुनिया का खूब जायजा ले चुकी थी. इस दुनिया के बाहर के समाज के तमाम लक्षण यहाँ मौजूद थे. बस यहाँ लगता था कि विद्यापीठ सुरक्षित ढंग से लड़कियों को शिक्षित वाला एक किला है, जहाँ पुरुष उपस्थिति नगण्य है. यहाँ लड़कियाँ अध्ययन के दौरान प्रेम प्यार के चक्करों से बची रहेंगी और फिर यहाँ से वे पितृसत्ता के लिए एक बेहतरीन उत्पाद के रूप में अपने घरों को वापस लौटेंगी. लेकिन क्या यह किला है? इसके भीतर वे सामाजिक विभाजन मौजूद थे जिनसे बचाने का यह दावा करता था. शांता निकेतन हॉस्टल का कमरा 106 इन विभाजनों का सूक्ष्म नमूना था.

सुबह हुई शगुन ने अपनी आँखें खोलीं और पल भर के लिए सिर्फ देखती रही; एक ही छत के नीचे फैली चार समानांतर वास्तविकताएँ.

प्रियंका जाग चुकी थी. वह अपने बिस्तर के पास बैठी, आँखें बंद किए, मन ही मन मंत्र पढ़ रही थी. ब्राह्मण परिवार की नियमित सुबह की प्रार्थना.

किरण अपने बिस्तर पर वज्रासन की मुद्रा में थी. वह खादी के स्थान पर एक महंगे ट्रैकसूट में थी. और राजपूत परिवार की फिटनेस के प्रति सचेतता अभिव्यक्त कर रही थी.

सीमा चुपचाप अपना बिस्तर समेट रही थी. कोई मंत्र नहीं, कोई योग नहीं. बस काम. उसने अपने तकिए के नीचे से एक फोटो निकाली; उसका समूचा परिवार एक डेयरी फार्म के सामने खड़ा था, जिसमें मुखिया के हाथ में अंबेडकर की तस्वीर थी. एक पल उसे देखा, फिर वापस रख दिया. दलित परिवार की सादगी, प्रदर्शन से दूर. हमेशा अध्ययन के प्रति बहुत सचेत और शायद बाबा साहेब के प्रति आभार.

शगुन उठ बैठी. वह जानती थी कि वह भी इन विभाजनों का हिस्सा थी और उनका अवलोकक भी. एक वैश्य लड़की, जो देख रही थी कि कैसे वर्ण, जाति, धर्म; सब किले मेंन मौजूद हैं, भले ही सबने खादी पहन ली हो.

नाश्ते के लिए मैस जाते हुए, प्रियंका ने कहा, "कल माघ पूर्णिमा है. मैं प्रार्थना सभा में जाऊँगी."

"क्या वह सबके लिए है?" सीमा ने पूछा, आवाज़ में एक सहज जिज्ञासा.

प्रियंका रुक कर बोली. "हम... यानी जो जाना चाहें." उत्तर सही था, पर अपूर्ण. शगुन ने समझा’ "हम" का अर्थ "ब्राह्मण" था.

मैस में, फातिमा उनकी मेज पर आकर बैठ गई. "सुप्रभात," उसने कहा, मुस्कुराते हुए.

"कल जुम्मे की नमाज़ के लिए जाओगी?" प्रियंका ने पूछा, आवाज़ में एक अजीब सी औपचारिकता.

"हाँ," फातिमा ने कहा, "दोपहर को. पर यहाँ... उचित जगह ढूँढनी पड़ती है."

"उचित जगह?" शगुन ने पूछा.

"जहाँ लोग घूरें नहीं," फातिमा ने साधारण से कहा, पर उसकी आँखों में एक कसक थी.

शगुन ने महसूस किया; प्रार्थना के लिए भी "उचित जगह" चाहिए. और कभी-कभी, वह जगह सिर्फ भौतिक नहीं, सामाजिक भी होती है.

कैंटीन में चाय पीते हुए, बातचीत कक्षा के प्रोजेक्ट पर आ गई.

"हमें चार लोगों का समूह बनाना है," किरण ने कहा.

एक क्षण चुप्पी छा गई. स्वाभाविक रूप से, वे चारों एक समूह बनातीं. प्रियंका, किरण, सीमा, शगुन. पर फातिमा? वह किसके साथ जाती?

"तुम किसके साथ होगी?" शगुन ने फातिमा से पूछा.

"मेरी दो और सहेलियाँ हैं," फातिमा ने कहा, "हम तीनों मिलकर करेंगे."

शगुन ने सोचा, ‘क्या यह संयोग था? या फिर धर्म के आधार पर स्वाभाविक समूहन?’ शायद कक्षा में भी कमरा 106 वाली वही अदृश्य रेखाएँ थीं मौजूद थीं?

दोपहर के बाद, कमरे में वापस आकर, शगुन ने देखा कि तीनों अपने-अपने कोने में समा गईं. उसे भी अपने कोने में आन पड़ा.

प्रियंका का कोना: धार्मिक पुस्तकें, पूजा का सामान, एक छोटा तुलसी का पौधा.
किरण का कोना: फैशन मैगजीन, आयातित स्किनकेयर, एक महँगा हेयर ब्रश.
सीमा का कोना: पाठ्य पुस्तकें, एक पुरानी नोटबुक, सादा पेन और कॉपी.
शगुन का कोना: मनोविज्ञान की किताबें, एक नक्शा, और... खालीपन.

वह खालीपन भरना चाहती थी. जो इन कोनों के बीच से गुजरता.

रात को, शगुन ने अपनी नोटबुक निकाली. डायरी नहीं, एक साधारण नोटबुक. वह आयुष को पत्र लिखना चाहती थी. उसे बताना चाहती थी कि कैसे यह "किला" अभेद्य नहीं है. कैसे यहाँ भी वही विभाजन हैं.

पर वह रुक गई. आयुष कोटा में था, टेस्ट, रैंक, आईआईटी की तैयारी में. क्या उसे इन "अदृश्य विभाजनों" की चिंता थी? शायद नहीं. या शायद थी, पर उसके पास समय नहीं था.

उसने पेन रख दिया. आज नहीं. आज वह नोटबुक में कुछ और लिखेगी.

उसने लिखना शुरू किया:

अवलोकन

1. चार लड़कियाँ: प्रियंका (ब्राह्मण), किरण (राजपूत), सीमा (दलित), मैं (वैश्य)

2. चार आस्थाएँ: पूजा, योग, अंबेडकर का आभार और नमाज़ (फातिमा)

3. चार आर्थिक स्तर: उच्च-मध्य, उच्च, मध्य, मध्य

4. हिन्दी के विभिन्न रूप: संस्कृतनिष्ठ, अंग्रेजी मिश्रित, साधारण हिन्दी, अरबी-फारसी प्रेरित उर्दू, और मेरी भाषा मेरी? शायद जिसमें सब.

प्रश्न:
क्या ये विभाजन टूट सकते हैं?
मैं क्या कर सकती हूँ?
क्या पहला कदम बस... पूछना है?

उसने नोटबुक बंद की. कमरे में अँधेरा था, पर चारों के सोने के तरीके भी अलग थे. प्रियंका की नियमित, शांत साँसें. किरण की गहरी, आरामदायक साँसें. सीमा की हल्की, सतर्क साँसें. और खुद उसकी... विचारमग्न साँसें.

वह जानती थी, कल फिर सारी दुनियाएँ जागेंगी. वही कोने. वही अदृश्य रेखाएँ.

पर शायद... कल वह सवाल पूछेगी. प्रियंका से: "तुम्हारी पूजा में क्या है जो तुम्हें शक्ति देती है?" सीमा से: "तुम्हारे परिवार की डेयरी कैसे चलती है?" किरण से: "तुम्हारे योग का रहस्य क्या है?" फातिमा से: "तुम्हारी नमाज़ में क्या शांति मिलती है?"

सिर्फ सवाल. कोई उत्तर की अपेक्षा नहीं. बस... शुरुआत.

एक सवाल मैं खुद से भी पूछती हूँ. क्या हिन्दी की यह विविधता कभी एकरूप हो पायेगी? शायद हाँ और शायद नहीं. एकरूपता से विविधता समाप्त हो जाएगी, सौन्दर्य खो जाएगा. आज यह सौंदर्य शायद विविधता से ही है.

यह सोचना ही शायद पहला कदम है. दीवारों को पहचानना नहीं, बल्कि उनमें खिड़कियाँ बनाना. और शायद सवाल ही खिड़की है.

एक सवाल जो पूछे: 'तुम कौन हो? और मैं... तुम्हें जानना चाहती हूँ.’

जिससे ये कोने मिल सकें. ये दुनियाएँ बात कर सकें. और यह किला... सचमुच एक घर बन सके.

सुबह होगी. और शगुन सबसे एक-एक सवाल पूछेगी.

... क्रमशः

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