पिंजरा और पंख-18
लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
सुबह का सूरज बनस्थली के आँगन में सुनहरी किरणें बिखेर रहा था. गेस्ट हाउस से निकलकर, तीनों एक बार फिर विद्यापीठ के प्रशासनिक भवन की ओर चले. होस्टल आवंटन का दिन था. ग्यारह बजे होस्टल आवंटित हुआ. नाम था शांता निकेतन : होस्टल नं. सात. यहाँ सभी होस्टलों के नाम ‘शांता’ नाम से आरंभ होते थे. शांता विद्यापीठ के संस्थापक हीरालाल शास्त्री की पुत्री थी, जिसका बारह वर्ष की उम्र में असमय देहान्त हो गया. उसी की स्मृति में इस विद्यापीठ की स्थापना हुई.
वे शांता निकेतन पहुँचे. रिसेप्शन पर खादी की गहरी नीली साड़ी पहने एक स्त्री ने स्वागत किया. रिसेप्शन पर सूचना अंकित थी, “होस्टल में पुरुष प्रवेश वर्जित” है. रिसेप्शनिस्ट ने बताया शगुन को कमरा नं. 106 मिला है.
उस पल शगुन ने समझा, रिसेप्शन एक सीमा है. जहाँ से उसकी पुरानी दुनिया पीछे छूट गयी थी, और एक नई, अज्ञात दुनिया शुरू होगी. माँ ने उसका हाथ थाम लिया. एक परिचारिका उन्हें रूम नं. 106 ले गयी.
हॉस्टल एक सुंदर, तीन मंज़िला इमारत थी. वे 106 के सामने पहुँचे, दरवाज़ा खुला था. अंदर तीन लड़कियाँ थीं. एक अपना सामान अलमारी में लगा रही थी, दूसरी खिड़की से बाहर देख रही थी, और तीसरी, दुबली पतली, आँखें लाल कर चारपाई पर पालथी लगाए बैठी थी.
"नमस्ते," शगुन ने आवाज़ लगाई.
तीनों ने मुड़कर देखा. परिचय संक्षिप्त और शर्मीला था. खिड़की वाली लड़की अलवर से थी. अलमारी वाली उत्तराखंड से. और लाल-आँखों वाली लड़की, किरण, मोड़क से थी.
"मोड़क?" माँ ने आश्चर्य से पूछा, "तुम्हारे पापा का नाम?"
"मंगलसिंह जी," किरण ने धीरे से कहा.
"वही जो सीमेंट फैक्ट्री में फोरमैन हैं?
“जी.” लड़की ने कहा.
“शगुन के पापा वहीं काम करते हैं.”
एक जान-पहचान की डोर, इस विशाल, अजनबी जगह में मिल गई थी. शगुन ने एक पल के लिए किरन की ओर देखा. उसकी आँखों से आँसू अब भी बाहर निकलने को तत्पर थे. पर वह शगुन को देख मुसकुराई, एक फीकी-सी मुस्कान. जान-पहचान से उसे थोड़ी तसल्ली हुई थी, शगुन ने सोचा.
सामान रखने में थोड़ा वक्त लगा. दोपहर हो चुकी थी. लंच का वक्त हो चुका था. शगुन को आज लंच होस्टल में नहीं मिलना था. वे तीनों गेस्ट हाउस पहुँचे. लंच किया और थोड़ा विश्राम. शगुन को होस्टल छोड़ मम्मा पापा को वापसी यात्रा करनी थी. वे शगुन के साथ होस्टल पहुँचे. रिसेप्शन में रामसिंह मौजूद थे. शगुन मम्मा के साथ अपने रूम गयी. कुछ ही देर में दोनों वापस लौटीं, उनके साथ किरन और उसकी माँ भी थीं.
आखिर विदाई का पल आया. दोनों लड़कियाँ होस्टल के बाहर तक माता-पिता को छोड़ने आयीं. निकट ही गुप्ता जी की कार खड़ी थी. अचानक किरन अपनी माँ से लिपट कर रोने लगी. उसकी आवाज भी तेज थी. माँ भी न बची वे भी बिलख पड़ीं. शगुन आश्चर्य से उन्हें देख रही थी. यह रोना साधारण विदाई का दुख नहीं लग रहा था. इसमें एक गहरी हार, एक मजबूरी, एक अनचाही दूरी की पीड़ा थी. किरण का शरीर हिल रहा था, जैसे वह टूट रहा हो.
वहीं बिल्कुल अलग, शगुन और मम्मा खड़ी थीं. माँ की आँखें नम जरूर थीं, लेकिन वे उसे बहने नहीं दे रही थीं. उन्होंने शगुन के कंधों को मज़बूती से पकड़ा. शगुन ने माँ से फुसफुसाकर कहा, "माँ, किरन यहाँ मन से नहीं आई. बस... एक मौका मिल गया, तो भेज दी गई. मर्जी से आती तो ऐसे नहीं रोती."
माँ ने जवाब देने के स्थान पर शगुन को कहा, "संभलकर रहना, बेटा, खाने-पीने का ध्यान रखना. फोन करना."
शगुन ने उन्हें गले लगा लिया. उसकी आँखें सूखी थीं. उसने माँ के कंधे पर सिर रखा और एक गहरी सांस ली. इस आलिंगन में प्यार था, विश्वास था, और एक सचेतन दृढ़ता थी. उसे रोना नहीं आ रहा था. उसे पता था कि यह एक जरूरी विछोह है जो उसकी नींव को मजबूत करेगा.
आखिर मंगलसिंह ने अपनी पत्नी से कहा, हो भी गया, अब चलना भी है बस छूट जाएगी. माँ-बेटी अलग हुईं. माँ पल्लू से किरन के आँसू पोंछने लगी.
“रामसिंह, आप बस से जाएंगे?” शगुन के पापा ने पूछा.
“हाँ सर, बस से ही आए थे.”
क्यों न हमारे साथ चलो. कार में पिछली सीटें खाली हैं. आपको मोड़क छोड़ते जाएंगे.”
“नहीं सर, हम बस से चले जाएंगे.”
“जब कार जा ही रही है तो आप बस से कैसे चले जाएंगे. आप पिछली सीट पर बैठें.”
अचानक गुप्ता जी को याद आया कि शगुन के पास तो फोन है ही नहीं. उन्होंने तुरन्त अपने फोन की सिम निकाली, फोन में शगुन के लिए ली गयी नयी सिम डाली और शगुन को दिया.
“पापा, ये तो आपका फोन है?”
“हाँ, मैंने सोचा था कोटा से तुम्हारे लिए नया ले दूंगा. फिर ध्यान आया कि आज तो रविवार है. अब तुम मेरा रखो. मैं कोटा से नया ले लूंगा.”
कार मोड़क पहुँची. मंगलसिंह और उनकी पत्नी नीचे उतरे. मंगलसिंह ने अपनी जेब से कुछ नोट निकालकर गुप्ता जी की ओर बढ़ाए. "पेट्रोल का... थोड़ा सा हिस्सा, गुप्ताजी."
गुप्ताजी ने मुस्कुराकर उनका हाथ हल्के से धकेल दिया. "अरे, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, सिंह साहब. देना ही है तो... दोस्ती दीजिए. बस इतना ही काफी है."
पापा की कार चल पड़ी. यहाँ होस्टल शांता निकेतन था, विद्यापीठ था, एक भरा-पूरा परिसर. जहाँ शगुन अब अपने नए जीवन के साथ अकेली थी. कमरे में लौटकर, शगुन ने देखा, किरण अब भी सिसक रही थी. अलवर वाली लड़की अपनी किताबें व्यवस्थित कर रही थी, और उत्तराखंड वाली खिड़की के पास खड़ी चुपचाप बाहर देख रही थी.
शगुन अपनी चारपाई पर बैठ गई. उसने अपनी डायरी निकाली, और आखिरी पन्ने पर लिखा:
"आज मुझे नया पता मिला: ‘शांता निकेतन’ हॉस्टल नंबर सात, कमरा 106.
मेरी तीन रूममेट हैं. एक सिसक रही है... शायद उसकी लड़ाई मेरी लड़ाई से अलग है
कल से मेरी क्लास. मेरा विज्ञान. मेरी पसंद.
और... मैं रोई नहीं."
वह डायरी बंद करके खिड़की के पास गई. बाहर, बनस्थली की शाम धीरे-धीरे उतर रही थी. दूर कहीं, एक घोड़े की टापों की आवाज़ सुनाई दी. उसे एक नई सुबह, एक नई शुरुआत का इंतज़ार था.
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