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गुरुवार, 22 जनवरी 2026

फैसले की घड़ी

लघुकथा  :   दिनेशराय द्विवेदी
आयुष को आए चार दिन हो चुके थे. घर का माहौल अभी असामान्य था. पापा हमेशा की तरह सुबह नौ बजे बैंक के लिए निकल जाते, फिर रात के आठ-नौ बजे तक घर लौटते. वे परिवार को अधिक समय नहीं दे पाते थे. घर के मामलों में चाचा बिना पूछे भी अपनी राय देते रहते. सुबह चाय पर उन्होंने फिर यही कहा, "अब आयुष आ गया है, सब ठीक हो जाएगा." पर आयुष खुद जान रहा था कि कुछ भी "ठीक" नहीं हुआ था. शगुन अब भी रोज दुपहर खाना खाने के बाद साइकिल उठा पुस्तकालय जाती और शाम को 4-5 बजे लौटती. उसकी आँखों में स्थिरता थी, जो आयुष को बेचैन कर देती.

दोपहर होने को थी. आयुष कहीं गया हुआ था. शगुन लिविंग रूम में बैठी "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप" पढ़ रही थी. तभी दरवाज़े की घंटी बजी, शगुन ने दरवाजा खोला. प्रकाश और विनय सामने खड़े थे. दोनों आयुष के बोर्डिंग जाने के पहले के दोस्त थे. उनका और आयुष का मिलना तभी होता जब वह बोर्डिंग स्कूल से छुट्टियों पर घर लौटता.

"दीदी, आयुष आया है न?"

शगुन ने मुस्कुराकर अंदर आने का इशारा किया. "वह बाहर गया है, अभी आता होगा. तुम बैठो."

वे अंदर आए. विनय की नज़र शगुन के हाथ में पकड़ी किताब पर पड़ी. "यह किताब...?" उसने पूछा.

शगुन ने बेहिचक कहा, "पढ़ रही हूँ. लड़कों के मनोवैज्ञानिक पिंजरे पर है. तुमने पढ़ी है?"

विनय हँसा. "नहीं, हम तो ऐसी किताबें देख कर छोड़ देते हैं. वे बड़ों के पढ़ने लायक हैं. मैं तो इसे आपके हाथ देखकर ही चकित हूँ. आप पढ़ रही हैं, तो बता सकती हैं कि इसमें क्या है?

प्रकाश ने टोका, "अरे यार, लड़कियाँ ऐसी किताबें पढ़ती हैं क्या?"

शगुन ने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "लड़कियाँ वह सब पढ़ सकती हैं जो लड़के पढ़ते हैं. बल्कि, हर कोई वह पढ़ सकता है जो वह समझना चाहता है. मैं यह जानना चाहती हूँ कि क्यों इंसानों को 'पुरुषत्व' और 'नारित्व' के पिंजरों में बाँध देते हैं."

विनय ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया. प्रकाश चुप रह गया.

तभी आयुष आ गया. दरवाज़े से ही उसने दोस्तों की आवाज़ें सुनीं, और फिर शगुन का स्पष्ट, दृढ़ स्वर. वह तेजी से लिविंग रूम में आया. दोस्तों को देखकर उसका चेहरा खिला, पर शगुन को उनके साथ बैठे, आँख मिलाकर बात करते देखकर उसकी भौंहें तन गईं. उसने हमेशा चाहा था कि शगुन दूसरों के सामने "विनम्र" बनी रहे. पर आज वह दोस्तों के सामने ऊँचाई से बात कर रही थी.

"चलो, बाहर चलते हैं," आयुष ने जल्दी से कहा, जैसे शगुन की मौजूदगी उसे असहज कर रही हो.

वे तीनों शहर के एक छोटे से कैफ़े में बैठे. प्रकाश ने चाय मंगाई. आयुष चुपचाप बैठा था, मन ही मन शगुन के उस सवाल को दोहरा रहा था, "क्यों बाँध देते हैं पिंजरों में?"

"दीदी तो कमाल की है यार," प्रकाश ने कहा. "इतना कॉन्फिडेंस! पहले तो वह बात करते हुए भी शर्माती थी."

आयुष ने चाय का कप थामा. "वो बस... जिद्दी हो गईं है. समय के साथ."

विनय ने सीधे आयुष की आँखों में देखा. "जिद्दी नहीं, आयुष. मुझे तो वे साहसी लगीं. मैंने उन्हें बाज़ार में देखा था. साइकिल पर, अकेली, और बिल्कुल निडर. तेरे चाचा उसे रोकते होंगे, पर वो नहीं रुकतीं. उनके पास एक लक्ष्य है."

"लक्ष्य?" आयुष ने पूछा, आवाज़ में एक खीझ थी.

"हाँ. वो आगे पढ़ना चाहती है. मैंने सुना है वो दिल्ली की यूनिवर्सिटी जे.एन.यू. और बनस्थली विद्यापीठ जैसी जगहों के बारे में पूछताछ कर रही हैं."

आयुष का दिल धक से रह गया. जे.एन.यू. और बनस्थली? दूर? अकेले? उसके मन में तुरंत विरोध के शब्द उभरे, पर वह चुप रहा.

"लोग क्या कहेंगे?" आयुष ने अंततः कहा, अपनी ठंडी चाय को देखते हुए.

"लोग वही कहेंगे जो हमेशा से कहते आए हैं, "विनय ने शांत स्वर में कहा. "पर सवाल यह है कि तू क्या चाहता है? क्या तू चाहता है कि शगुन डरकर जिए, या जिए जैसे वह जीना चाहती है? और तू खुद... तू क्या चाहता है? तेरा स्ट्रीम का फैसला हुआ? तू तो साइंस ही ले रहा है न?"

आयुष ने कोई जवाब नहीं दिया. उसे एहसास हुआ कि उसके अपने दोस्त भी उसकी सोच से आगे निकल रहे हैं. वे शगुन को सम्मान से देख रहे थे, न कि कमजोरी या अवज्ञा से.

शाम को वे लौटे. शगुन बरामदे में साइकिल की चेन साफ़ कर रही थी. उसने दोस्तों को अलविदा कहा, फिर आयुष से पूछा, "सब ठीक रहा?"

आयुष ने हाँ में सिर हिलाया. फिर अचानक पूछ बैठा, "तू... जे.एन.यू. और बनस्थली के बारे में सोच रही है?"

शगुन ने रुई का टुकड़ा हाथ में रोककर कहा, "हाँ. क्या हुआ? जे.एन.यू. देश की सबसे बेहतर यूनिवर्सिटी है. वहाँ विदेश से भी विद्यार्थी पढ़ने आते हैं. और बनस्थली में तो सिर्फ लड़कियाँ होती हैं. घुड़सवारी सिखाते हैं, जहाज उड़ाना सिखाते हैं... और आज़ादी सिखाते हैं."

"पर वे बहुत दूर है."

"दोनों ही इतने दूर नहीं. अधिक से अधिक 7-8 घंटों में दोनों ही जगह पहुँचा जा सकता है. फिर दूर होना बुरा नहीं होता, भाई. कभी-कभी दूर जाने से ही हम खुद के पास लौट पाते हैं."

आयुष कहना चाहता था, "तू नहीं जा सकती. मैं नहीं होने दूंगा." पर वाक्य उसके गले में अटक गया. शगुन की आँखें सीधी थीं, उनमें लेश मात्र भी डर नहीं था, बल्कि वह अटल विश्वास से भरी हुई थी.

"तूने चाचा को बताया?" आयुष ने अंततः पूछा.

"अभी नहीं. पहले मैं खुद तो पूरी तरह तैयार हो लूँ. और तुम्हें भी इस साल अपनी स्ट्रीम तय करनी है तुमने कुछ सोचा कि नहीं?" यह कहकर शगुन अंदर चली गई. वह देखता रह गया.

रात में आयुष ने वह किताब उठाई, "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप". उसने पहला अध्याय खोला; "डर: मर्दानगी का सबसे मजबूत ताला".

उसे विजय का वाक्य याद आया, "तेरा डर तेरी कैद है."

और शगुन का वाक्य, "दूर जाने से ही खुद के पास लौट पाते हैं."

बाहर बरामदे में शगुन की साइकिल खड़ी थी. आयुष ने खिड़की से देखा. चाँदनी में उसके पहिए चमक रहे थे, जैसे कह रहे हों: "हम घूमते रहेंगे. तुम चाहो या न चाहो. तुम रुक सकते हो, पर हम नहीं."

उसने किताब बंद की. आज पहली बार उसे लगा कि शगुन को "नियंत्रण" में करना उसके बस में नहीं, उसे समझना ज्यादा ज़रूरी है.

पर वह कहाँ से शुरू करे? इस सवाल का उत्तर अभी उसके पास नहीं था.

दोनों भाई बहनों का रिजल्ट आने वाला था. इस साल उसे स्ट्रीम चुनना था. साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स और शगुन को कॉलेज?

दोनों के लिए यह फैसले की घड़ी थी. शगुन बाहरी दुनिया की ओर जा रही थी, और वह अपने भीतर के किले में वापस लौटना चाहता था.

बुधवार, 21 जनवरी 2026

नये सवाल

 लघुकथा  :   दिनेशराय द्विवेदी

आयुष के आने की खबर ने घर में एक विचित्र हलचल पैदा कर दी. माँ ने शगुन से पूछा कि क्या वह कमरे को तैयार कर लेगी जिससे आयुष को कोई परेशानी न हो. शगुन ने माँ को आश्वस्त कर दिया. फिर भी आयुष के आने के दिन सुबह माँ ने हर एक चीज जाँची कि सब कुछ ठीक है या नहीं. हर रोज सुबह चाय पर चाचा अखबार पढ़ते हुए चाची को कहना नहीं भूलते कि, "अब सब संभल जाएगा. लड़की को मर्द की नज़र चाहिए." चाची बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुप ही रहती, लेकिन सजग बनी रहती.

एक शाम रसोई में चाची ने शगुन को अकेले पाकर कहा, "तू डरना मत... पर लड़ना भी मत. समझाना. हमें तो समझाने का मौका भी नहीं मिला." यह चाची की शगुन से पहली सीधी बात थी. शगुन ने देखा, उनकी आँखों में उम्मीद थी, जैसे वे अपनी ज़िंदगी की लड़ाई शगुन के माध्यम से लड़ रही हों.

शगुन ने फैसला किया, वह आयुष का स्वागत अपने तरीके से करेगी. उसने कमरे में आयुष के बिस्तर के पास की मेज पर दो चीज़ें रखीं; एक साइकिल की चाबी, और पुस्तकालय से लाई गई किताब "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप"; जो पारंपरिक मर्दानगी के मनोवैज्ञानिक ख़तरों पर थी.

सुबह चाचा स्टेशन गए. शगुन साइकिल लेकर बाज़ार गई, आयुष के लिए उसकी पसंद का समोसा लाने. यह उसकी शांत चुनौती थी, “मैं अकेले आ-जा सकती हूँ, और तुम्हारी पसंद का ख़्याल भी रख सकती हूँ.”

सुबह के साढ़े दस बजने को थे, टैक्सी के रुकने की आवाज आई. शगुन ने दरवाजा खोला. आयुष टैक्सी के बाहर कदम रख रहा था. वह कैजुअल्स में था, चेहरा एक दम सख्त, आँखों के नीचे गहरे घेरे उसकी थकान बता रहे थे. उसकी नज़र पहले शगुन पर पड़ी, फिर उसकी जेब से झाँक रही साइकिल की चाबी पर. चाचा ने आयुष का बैग टैक्सी से बाहर निकाला, टैक्सी वाले को भाड़ा दिया. आयुष ने चाचा से बैग लेने की जहमत नहीं उठाई, वह दरवाजे से घर के अंदर आया और सीधे लिविंग रूम में आ बैठा. शगुन भी उसके पीछे पास ही आ बैठी. उसके चेहरे पर न मुस्कान थी, न डर, बस एक स्थिरता थी.

“सफर कैसा रहा?” उसने आयुष से पूछा.

“सफर जैसा सफर, बस वहाँ से बैठे, यहाँ आकर उतर गये.” उसके स्वर में हलका अहंकार था.

"तू..." आयुष ने शुरू किया, आवाज़ में एक खिंचाव.

"सफ़र लंबा तो था ही," शगुन उठी और डाइनिंग पर रखे पैकेट को खोल कर समोसों से प्लेट सजाई और लाकर आयुष को देते हुए बोली, तेरा मनपसंद नाश्ता... लाई हूँ.

आयुष ने प्लेट हाथ में ली. अब उसकी नजरें समोसों पर थीं. लेकिन, सवाल शगुन से किया “तेरे को अकेले जाना जरूरी था?

"आते ही भाई का मनपसंद नाश्ता जरूरी क्यों नहीं था? और मैं अकेली नहीं थी, मेरी साइकिल साथ थी.” जवाब देते हुए शगुन अपनी जेब से साइकिल की चाबी निकाल कर दाएँ हाथ की तर्जनी में घुमाने लगी थी.

तभी चाचा आयुष का बैग कमरे में रख कर लिविंग में पहुँच गए.

“तो तू समोसे लेने चली गयी?” चाचा ने सोफे पर टिकते हुए शगुन से ऐसे कहा जैसे उसने कोई गलती कर दी हो.

“आपके लिए भी हैं.” शगुन तब तक दूसरी प्लेट में समोसे सजा चुकी थी. उसने दूसरी प्लेट चाचा के आगे बढ़ा दी. आयुष समोसा खाते हुए शगुन की ओर देखता रह गया उससे कुछ कहते नहीं बना.


नाश्ते के बाद आयुष कमरे में आया उसका बिस्तर कायदे से सजा हुआ था. वह अपने बिस्तर पर बैठा. उसके दायें ओर दोनों के बिस्तरों के बीच खिड़की के पास रखी मेज पर एक किताब रखी थी, "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप". आयुष ने उसे उठा लिया. किताब तहसील पुस्तकालय से लायी हुई थी. वह समझ गया कि शगुन की पुस्तकालय तक नियमित दौड़ है.

रात के भोजन पर चाचा शुरू हो गए, "अब भाई आ गया है, शगुन. तू भी समझदार हो जा. साइकिल से इधर उधर घूमना छोड़ घर के काम सीखने पर ध्यान दे.”

शगुन रोटी से कौर तोड़ते हुए मुस्कुराकर बोली, "मैं पढ़ाई में अव्वल हूँ, चाचा. और साइकिल से ही समय बचता है."

आयुष चुप था, पर उसकी नज़रें शगुन के हाथों पर थीं. जवाब देते हुए उसके हाथों में कोई कंपन नहीं था. माँ ने चाचा की प्याली में सब्ज़ी परोसते हुए कहा, "पहले खाना खा लो, बातें बाद में कर लेना."

चाची ने रसोई में रोटी बेलते हुए लिविंग में एक निगाह डाली, उनके चेहरे पर मुस्कान थी.


आयुष को रात में ठीक से नींद नहीं आई. वह उठकर बहार बरामदे में आया. शगुन की साइकिल वहाँ टिकी थी. उसके पहियों की रिमें और हैंडल चाँदनी में चमक रहे थे. उसने अनजाने में एक पहिए को हाथ से घुमा दिया.

"तू भी कुछ कहना चाहता है, पर डर रहा है न?" पीछे से चाची की आवाज़ आई. आयुष चौंका. चाची पानी पीने आई थीं. "शगुन डरपोक नहीं है, बेटा. वह सिर्फ़ इंसान है; जैसे तू है. और तेरा डर... वह तेरी ताकत नहीं, तेरी कैद है." इतना कहकर चाची चली गईं, पर उनके शब्द हवा में लटक गए.

आयुष कमरे में लौटा. शगुन गहरी नींद में थी. उसने टेबल लैंप का स्विच ऑन करके इस तरह रखा जिससे शगुन के बिस्तर पर रोशनी न जाए. वह मेज पर पड़ी किताब "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप" उठा कर देखने लगा. किताब में कवर के बाद ही एक कागज लगा था. जिस पर उसके लिए लिखा था;

"आयुष, इसे तुम भी पढ़ लेना. बस यह जान लो, मैंने इसे पढ़ चुकी हूँ. और अब मैं वह नहीं, जो तुम्हारे जाने के पहले थी.” – शगुन"

आयुष ने किताब बंद की. उसकी नज़र मेज के पार खिड़की पर गई. वहाँ शगुन ने एक छोटा सा पौधा रखा था, जिसके गमले पर एक कागज़ चिपका था: "इसे धूप और पानी दोनों चाहिए."

उसे अचानक एनसीसी कैंप की याद आई; वह कमजोर कैडेट जिसे धूप में खड़ा किया गया था. उसके हाथ काँप उठे थे. बाहर, रात का अंधेरा था. घर के भीतर, दो दिलों के बीच एक नए संघर्ष की तैयारी थी. वह सोच रहा था; शगुन बहुत आगे बढ़ गयी है. 
क्रमशः .....

सोमवार, 19 जनवरी 2026

लिफाफे में भूचाल

लघुकथा  : दिनेशराय द्विवेदी

आयुष की दिनचर्या सख्त यांत्रिक अनुशासन में बंध चुकी थी, बिना किसी गलती की गुंजाइश के. सुबह 5 बजे की व्हिशल बजने के पहले उठना और सही समय पर दौड़ व ड्रिल के लिए मैदान पर, लौटकर तैयार होना और समय पर सुबह की प्रेयर पर पहुँचना. उसके बाद क्लासें, ब्रेकफास्ट, फिर क्लासें, लंच और विश्राम, रेमेडियल क्लास, शाम को खेल का मैदान, शाम की प्रार्थना, डिनर, फिर होमवर्क व सेल्फ स्टडी, रात की नींद और सुबह फिर से 5 बजे की व्हिशल. उसे सोचने को भी समय नहीं था. पर हर रात उसे देर तक उसे नींद नहीं आती. आँखों के नीचे के गहरे घेरे इस गड़बड़ी को सार्वजनिक करने लगे थे. विजय कभी-कभी उसे गौर से देखता, पर कुछ नहीं कहता.

एक शाम, हॉस्टल के कॉमन रूम की मेज पर रखे डाक से आए लिफाफों में से एक की लिखावट को आयुष की निगाहों ने फौरन पहचाना, वह शगुन की थी. उसने लिफाफा उठाया, और चुपचाप अपने रूम में आ गया. किवाड़ बन्द कर उसने लिफाफा खोला और साँस रोक कर पत्र पढ़ने लगा.

पत्र के शब्द एक-एक करके उसकी आँखों के सामने से गुजरे; साइकिल, पुस्तकालय, लेखिका का व्याख्यान.

फिर वह पंक्ति आई, “यह चिंता नहीं, तुम्हारा प्यार था.”

आयुष ने देखा पत्र हिल रहा है. वह सोच में पड़ गया. आखिर उसके हाथ क्यों काँप रहे हैं? उसने अपनी रुकी हुई साँस को छोड़ा और दो तीन गहरी साँसें लीं. साँसे दुरुस्त होने पर पत्र फिर पढ़ने लगा.

आखिरी सवाल आया; “क्या यह अनुशासन तुम्हें भीतर से मजबूत बना रहा है?” पढ़ कर उसने पत्र को मेज पर पटक दिया. वह देर तक असमंजस में रहा. भीतर की मजबूती? फिर उसने अपने आप से कहा, वह मजबूत है बाहर से भी, और भीतर से भी. भीतर की मजबूती के बिना क्या बाहर की मजबूती आती है?

अब वह सोच रहा था कि इस पत्र का क्या करे? पहले मन किया कि वह पत्र को फाड़ कर डस्टबिन के हवाले कर दे. फिर विचार आया ... नहीं, यह भागना होगा. जवाब लिखना चाहिए, और शगुन को सब कुछ समझा देना चाहिए. पर कैसे? उसे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह लिखे क्या? आखिर विचार आया अभी कुछ मत करो. वह उठा और उसने पत्र को सूटकेस में सबसे नीचे दबा कर रख दिया. जैसे किसी राज को दफ्न कर दिया हो. उसने महसूस किया उसका गला सूख रहा है. उसने अपनी बोतल उठाई और एक साँस में उसे मुहँ के जरीए अपने पेट में उड़ेल लिया.

उस रात वह देर तक नहीं सो सका. उसने फिर वही सपना देखा; लेकिन इस बार साइकिल चला रही शगुन के पीछे वह दौड़ रहा था. साइकिल तेज थी, वह उसे पकड़ नहीं पा रहा था. वह थकने लगा. साइकिल के पहिए और तेज घूमने लगे. उसके कानों में एक आवाज गूंजी, “सीमाएँ मन में होती हैं...” उसकी नींद टूट गयी. वह हाँफ रहा था.

अगले दिन हॉस्टल के बरामदे में एक जूनियर छात्र तेजी से उसकी बगल से निकला, उसे हलका सा धक्का लगा, आयुष की किताबें गिर गयीं. आयुष उस छात्र की ओर देखने लगा. उसकी आँखों में गुस्सा नहीं आया. वह ठंडी निगाहों से उस छात्र को जाते देखता रहा. आगे जा कर बरामदे के साथ वह भी दाएँ मुड़ कर ओझल हो गया. सब सोच रहे थे; अब उस जूनियर लड़के की खैर नहीं. आयुष दौड़ेगा, लड़के को पकड़ेगा और फिर ... पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

सबकी अपेक्षा के विपरीत आयुष ने लड़के पर से अपनी निगाहें हटाईं. नीचे गिरी किताबों को देखा और झुककर उन्हें उठाने लगा. सब किताबें समेट, बिना एक शब्द मुहँ से निकाले वह आहिस्ता से अपने रूम की ओर बढ़ गया.

सब की निगाहें उस पर चिपकी हुई थी. विजय मुस्कुराए बिना नहीं रह सका. उसने अपने साथियों से कहा, “यह क्या हुआ यार? आज तो आयुष एक दम बदला-बदला लगा. बिलकुल एक इंसान की तरह.” आयुष के कानों तक भी यह आवाज पहुँची. एक पल को उसने मुड़ कर विजय की ओर देखा. लेकिन, बिना कोई जवाब दिए, वह आगे चल दिया. उसे लगा कि उसके कदम थोड़े भारी हो चले हैं.

अपने रूम में लौटकर आयुष ने शगुन का पत्र निकाला, फिर से पढ़ने लगा. पढ़ते हुए ही उसकी नजरें टेबल पर पड़ी कैंची से टकराईं. एक पल को उसके मन में आया; काट दो इसे, मिटा दो इन सवालों को. उसने कैंची उठाई... लेकिन फिर उसे वापस रख दिया. कैंची वहीं पड़ी रह गई. वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था.

उसने तय किया; वह शगुन को जवाब नहीं लिखेगा.

पर उसने एक और फैसला किया; वह अगली छुट्टियों में घर जाएगा. छुट्टियाँ बिताने नहीं, बल्कि शगुन से मिलने, उसे समझाने? शायद वह उसे समझा पाए. पर उसके मन के एक कोने में एक डर छुपा था. वह शगुन से ज्यादा बात ही न कर पाया तो... शगुन ने ही खुद उसे समझा दिया तो ...

उस रात आयुष ने डायरी निकाली. एक खाली पन्ना तलाशा और उस पर लिखा;

"पत्र आया, शगुन के सवाल मिले.

अभी जवाब तलाशना है.

शगुन की साइकिल चल पड़ी है, वह रुक नहीं रही है.

उसके मन के पहिए भी उसी की तरह दौड़ रहे हैं.

वह साइकिल को पकड़ेगा.

नहीं पकड़ पाया तो ... ...

वह आगे नहीं लिख पाया. उसने वह पन्ना मरोड़ा और दोनों हथेलियों के बीच घुमा कर गेंद सी बना दी. फिर उसे डस्टबिन में डाल दिया.

उसने सोने की कोशिश की. नहीं सो सका. कहीं दूर थाने में घंटे बजने लगे, टन .. टन .. टन .. वह गिनने लगा, 12 के बाद घंटे बजना बन्द हो गया. आधी रात गुजर चुकी थी. उसकी आँखों में नींद कहीं नहीं थी. वह उठा. डस्टबिन से उसने गुड़ी मुड़ी हुए पत्र को निकाला. उसे सीधा किया. हाथों से प्रेस कर के उसकी सिलवटें हटाने की कोशिश की और फिर फोल्ड करके अपनी डायरी के बीच रखा. डायरी को अपने तकिए के नीचे दबा कर सोने की कोशिश करने लगा.

खिड़की के बाहर, आज चाँद फिर टूटा हुआ दिखाई दे रहा था, टुकड़ा-टुकड़ा बादलों के बीच से झाँकता हुआ.

रविवार, 18 जनवरी 2026

पहियों पर आज़ादी

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
साइकिल सीख लेने से शगुन का दायरा बढ़ गया. अब वह स्कूल और बाज़ार के साथ शहर की उन सड़कों पर भी जा सकती थी जहाँ लड़कियाँ अकेली कम दिखती थीं. लेकिन वह यह भी जानती थी कि हर आज़ादी की कीमत चुकानी पड़ती है.

एक शाम चाय पर चाची ने माँ से कहा, “भाभी, शगुन को थोड़ा रोको... लोग क्या कहेंगे? वह इतनी दूर निकल जाती है.”

माँ ने हल्के से कहा, “पढ़ाई में तो अव्वल है, और अब तो खुद ही सब संभाल लेती है.”

पर चाचा ने अखबार नीचे रखते हुए स्पष्ट कह दिया, “अब बस भाभी, आप तो जानती हैं. लड़कियों के अकेले कहीं जाने के नतीजे क्या होते हैं. समय रहते संभल जाना चाहिए.”

शगुन मनोविज्ञान के अध्ययन से जानने लगी थी कि “सीमाएँ तोड़ने के लिए पहले धैर्य से सीमाओं को समझना जरूरी है.” उसने सोच लिया कि वह चाचा को विश्वास दिलाएगी कि साइकिल समय बचाती है, पढ़ाई के लिए अधिक समय मिलता है. पर पहले उसे साबित करना था कि यह आज़ादी सुरक्षित और सार्थक है.

वह तहसील पुस्तकालय में युवा लेखिका, नीरजा शर्मा, की वार्ता सुनने जाना चाहती थी. वहाँ पहले आटोरिक्शा से जा चुकी थी. इस बार उसने साइकिल से वहाँ जाना तय किया. वार्ता समकालीन स्त्री समस्याओं पर थी, ”स्त्रियों की आवाज, स्त्रियों की सड़कें.” शगुन वार्ता के दिन बिना किसी को बताए पुस्तकालय गई. रास्ते में उसे सुनने को भी मिला, “देखो, अकेली लड़की साइकिल पर!” शगुन ने उसे अनसुना कर दिया. तब उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. उसने तेजी से पैडल चलाए, जैसे उसका डर उसे आगे धकेल रहा हो.

वार्ता में का सार था कि, ”स्त्रियाँ अक्सर समाज से पहले अपनी सीमाएँ खुद बना लेती हैं. हम स्त्रियाँ सोचने लगती हैं कि यह रास्ता हमारे लिए नहीं है, पर सच यह नहीं. सही में हम कदम उठाने से डरती हैं. यह पहला कदम ही सबसे कठिन होता है. बाद का रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाता है.”

शगुन ने सोचा, ”क्या मैं भी अपनी सीमाएँ खुद बना रही हूँ? यदि ऐसा है भी तो मैंने आज यहाँ आकर एक सीमा तोड़ी है.

वह घर लौटी, तब सूरज ढल चुका था. चाचा दरवाज़े पर ही थे. शगुन को देख उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया. “तू कहाँ गई थी? किसके साथ गयी थी? आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.” वे ऊँची आवाज में बोले.

सुन कर वह बिलकुल नहीं घबराई, वह जानती थी कि किसी न किसी दिन उसे ऐसे सवालों का सामना करना पड़ेगा. शगुन ने पहली बार स्पष्ट और धीमे स्वर में कहा, “ चाचाजी, भाई यहाँ नहीं है, और मैंने कोई गलत काम नहीं किया. मैं पुस्तकालय गई थी.

“चाची और माँ चुप रहीं. माँ की आँखों में चिंता दिखी, पर उन्होंने संयम रखा और अपने होंठ बन्द रखे.

रात में, जब सब सो चुके तब मम्मा शगुन के कमरे में आई. “तेरी हिम्मत अच्छी है... पर चाचा का डर भी ठीक है. बदनामी होते देर नहीं लगती, बेटी.”

शगुन ने माँ की आँखों में देख कर गंभीरता से कहा, ”माँ, डर हमेशा रहेगा. पर डर के आगे जीना सीखना होगा. वरना जिंदगी सिर्फ चारदीवारी में सिमट जाएगी.” मम्मा ने और कुछ नहीं कहा, बस उसके सिर पर हाथ रखा. यह उनका अनकहा, स्नेहासिक्त मौन समर्थन था. यह शगुन की जीत थी, छोटी थी, मगर ठोस थी.

उस रात शगुन अपनी डायरी लिखने बैठी, पर मन न लगा. उसके मन में चाचा का वह वाक्य गूंज रहा था, “आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.”

डायरी के स्थान पर वह आयुष को पत्र लिखने बैठ गयी. उसने लिखा,

प्रिय भाई, आयुष¡ तुम्हें बहुत प्यार.

तुमने एनसीसी कैम्प में “उत्कृष्ट कैडेट” का खिताब प्राप्त किया, तुम्हें बहुत बहुत मुबारक. 

मैंने भी हाल ही में एक “उपलब्धि” हासिल की है, साइकिल चलाना सीख लिया है. अब मैं स्कूल और बाज़ार साइकिल से जाती हूँ. कल मैं तहसील पुस्तकालय गई. वहाँ वार्ता में एक लेखिका ने कहा, ”सीमाएँ अक्सर हमारे मन में होती हैं, बाहर नहीं.”

तुम्हें याद है, तुमने कहा था, “हॉस्टल में लड़कियों के बारे में बात नहीं होती।” मैं यह बात तब नहीं समझी थी। अब समझ रही हूँ. शायद तुम भी एक ऐसी ही दुनिया में रहते हो, जहाँ कुछ बातें “नहीं” होतीं, कुछ भाव “नहीं” दिखाए जाते.

चाचा कहते हैं, “लड़कियाँ अकेले बाहर नहीं जानी चाहिए. तुमने भी शायद माँ से यही कहा था? मैं जानती हूँ, तुम चिंतित हो, यह चिंता नहीं तुम्हारा प्यार था. पर कभी तुमने सोचा, यह चिंता हमें सुरक्षित रखती है या छोटा बनाती है?

तुम्हारे कैंप में जो कठोर अनुशासन सिखाया जाता है, क्या वह तुम्हें अन्दर से भी मजबूत बना रहा है? या सिर्फ बाहर से? इस सवाल का कोई जवाब देने की ज़रूरत नहीं. बस इतना जान लो, मैं सुरक्षित हूँ, और थोड़ी आज़ाद भी. शायद एक दिन तुम भी अपने हॉस्टल की उन “न कही जाने वाली बातों” के बारे में कुछ बताओगे।
                                                                                                                              तुम्हारी बहन,

                                                                                                                                  शगुन

उसने पत्र लिख कर तह किया और लिफाफे में बंद करके गोंद से चिपका दिया. सुबह स्कूल जाते समय ही वह पोस्ट ऑफिस से टिकट ले कर चिपकाकर इसे डाक में छोड़ देगी.

इसके बाद उसने डायरी लिखी.

“आज मैंने साइकिल पर पहली बार इतनी दूर तय की. रास्ते में डर भी लगा, दिल तेजी से धड़कता रहा. पर आवाज़ नहीं दबी. पुस्तकालय में बैठकर लगा जैसे मैंने अपने लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल लिया है.

घर में लड़ाई हुई, पर मैं हारी नहीं. माँ ने चुपचाप मेरा साथ दिया, शायद यही “सूक्ष्म जीत” है. उनका हाथ मेरे सिर पर था, और उसमें एक आशीर्वाद था जो शब्दों से बड़ा था.

अब मैं जानती हूँ, पहिये सिर्फ साइकिल के नहीं, मन के भी होते हैं. और एक बार घूमने लगें, तो रुकते नहीं.

मैंने आयुष को भी पत्र लिखा है. शायद वह मेरी बात को समझ सके. हो सकता है वह न भी समझे. पर उसने जब मुझे रोके जाने की बात कही थी, तो मुझे उस तक अपनी बात भी जरूर पहुँचानी चाहिए थी. मैंने पहुँचा दी है.
 ... क्रमश:

शनिवार, 17 जनवरी 2026

अदृश्य दरारें

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
एनसीसी कैंप से मिले "उत्कृष्ट कैडेट" के प्रमाणपत्र ने आयुष को गर्व से भर दिया. उसे अपने बैग में लिए जब उसने होस्टल में प्रवेश किया तो लग रहा था, जैसे वह अभी भी परेड ग्राउंड पर हो. उसकी चाल सीधी-सतर और मजबूत थी, कंधे सख्त और निगाहें तेज, जैसे अपने लक्ष्य को बेध देंगी. अपने रूम पर पहुँच कर उसने प्रमाणपत्र को दीवार पर इस तरह टांगा कि कमरे में आने वाले हर व्यक्ति की निगाह सबसे पहले उस पर पड़े. वह हर वक्त उसे याद दिलाता रहे कि उसके सभी फैसले सही थे. कैंप में मिले इस खिताब ने उसकी दुनिया को बदल दिया था.

राजन जैसे दोस्तों ने उसकी पीठ थपथपाई, "अब तुम असली मर्द हो, यार!" आयुष को लगा ये तारीफ़ें बेहतर महसूस कराती, लेकिन फिर उसके भीतर गूंजकर कहीं खो जाती. उसके भीतर कहीं एक खाली जगह थी, जहाँ पहले हँसी, डर और गुस्सा रहते थे. अब वे सब वहाँ नहीं थे, सिर्फ गूंज बची थी."

रात सोते के पहले जब वह उनींदा होता, उसे अक्सर एनसीसी कैंप का वह कमजोर कैडेट दिखाई देता जो धूप में खड़ा था, जिसका चेहरा पसीने से सराबोर था. फिर वह चेहरा बदलने लगता. वह कभी सिद्धार्थ, कभी शगुन और कभी-कभी खुद उसके चेहरे में बदल जाता. आयुष की नींद टूटती वह हाँफ रहा होता और उसका बिस्तर पसीने से भीगा होता. वह खुद से सवाल करता. फिर खुद ही जवाब देता,

"कच्ची नींद है, ऐसे में दिमाग पता नहीं क्या-क्या सोचने लगता है." वह फिर से सोने की कोशिश करता. पर देर तक नींद नहीं आती.

एक दिन राजन ने किसी पुरानी मजाकिया घटना का जिक्र कर रहा था. बात हँसने की थी आयुष को हँसी आयी भी. लेकिन उसके मुहँ से हँसी के स्थान पर खी-खी आवाज निकली, जैसे उसे खाँसी आयी हो.

"तेरी हँसी को क्या हो गया? वे ठहाके कहाँ चले गए यार?" राजन ने पूछा.

"हँसने से क्या मिलता है?" आयुष ने कठोर स्वर में कहा, "कुछ सार्थक होता है क्या?" राजन चुप रह गया.

आयुष ने जवाब तो दे दिया था पर खुद हैरान था. वह अकेले में आईने के सामने खड़ा हुआ और हँसने की कोशिश की. उसे आईने में एक विचित्र, बेजान और अजनबी चेहरा दिखाई दिया. वह उसका अपना प्रतिबिंब तो नहीं था. वह देख नहीं सका और उसने मुहँ फेर लिया.

एक दिन घर से माँ का फोन आया, उसके हाल पूछने के बाद उत्साह से बताने लगी. "शगुन ने साइकिल चलाना सीख लिया है. वह उसी से स्कूल जाती है, बाज़ार लो सामान ले आती है."

सुन कर आयुष को अच्छा नहीं लगा. उसने कहा, "माँ, उसका अकेले बाहर. यूँ डोलना ठीक नहीं. उसे रोको."

फोन की दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया. फिर माँ बोली, "ठीक है, बेटा."

फोन कटने पर आयुष मोबाइल को घूरते हुए सोचता रह गया. “शगुन के साइकिल सीख लेने की बात उसे अच्छी क्यों नहीं लगी?” फिर उस को लगा, उसकी यह सोच उसे कमजोर बना देगी, उसने खुद को डाँटा, “कमज़ोर मत बन. औरतें अकेले कभी सुरक्षित नहीं रह सकतीं, उन्हें संरक्षण चाहिए ही”; यही सही है.

फिर बोर्डिंग स्कूल में एक नया लड़का विजय किसी दूसरे बोर्डिंग से आया. वह एनसीसी कैंप में भी था. एक शाम वह आयुष के कमरे में आया. उससे बातचीत में कहने लगा.

"तुम्हें पता है, कैंप में तुमने जो किया, वह ताकत नहीं थी, तुम्हारा डर था. तुमने उसकी मदद नहीं की क्योंकि तुम्हें डर था कि अगर एक बार दया दिखाई, तो तुम्हारा 'मर्द' वाला मुखौटा उतर जाएगा... और तुम फिर वही पुराने वाले आयुष बन जाओगे जो रो सकता था."

सुनते ही आयुष का खून खौल उठा. वह विजय को धक्का देकर बोला, "बाहर निकल जा!"
विजय चला गया, पर उसका वाक्य कमरे में लटकता रह गया. वह वाक्य सारी रात आयुष के कानों में गूंजता रहा, "डर था... डर था..." उसने देखा, उसके हाथों में कंपन हो रहा था. वह सोचता रह गया. “क्या वह वास्तव में डर रहा था?”

तभी एक दिन आयुष सुबह की दौड़ में एक मिनट देरी से पहुँचा. सब उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे. एक जूनियर कैडेट ने हिम्मत करके कहा, "सर, आप तो कभी देर नहीं करते?"

आयुष का दिमाग सन्न हो गया. फिर अचानक वह चिल्ला उठा,

"छोटी सी बात पर टोकना ज़रूरी है क्या? अपना काम करो!"

सब चुप रह गए, जैसे हवा जम गई. आयुष ने दौड़ना शुरू किया, वह तेज दौड़ा, और तेज... और तेज, जैसे वह नहीं, उसका गुस्सा दौड़ रहा हो. उस दिन वह रिकॉर्ड तोड़ दौड़ा. पर जब रुका, तो साँस फूल रही थी, दिल तेजी से धड़क रहा था और आँखों के आगे अँधेरा था. उसे पहली बार अपने शरीर की सीमा का एहसास हुआ, लेकिन मन की सीमा अभी दूर थी.

उस रात आयुष फिर आईने के सामने खड़ा था. उसने गौर से देखा, उसकी आँखों के नीचे गहरे घेरे थे, जबड़े की मांसपेशियाँ तनी हुईं थीं और होंठ सख्त.

उसने अपने प्रतिबिंब से पूछा, "तुम ठीक हो?"

प्रतिबिंब ने जवाब नहीं दिया.

"तुम मजबूत हो?"

फिर कोई जवाब नहीं.

आयुष ने थके स्वर में पूछा, "पर... क्यों? तुम जवाब क्यों नहीं देते?"

उसका प्रतिबिंब फिर भी चुप रहा.

आयुष ने अपना माथा शीशे पर टिका दिया. शीशा ठंडा था, वह ठंडक जैसे उसके सिर में घुसती जा रही थी. उसने अपना माथा शीशे से हटा लिया.

रात को जब उसने बिस्तर पर लेटा, उसे रूम की खिड़की से चाँद दिखाई दिया. लेकिन पूरा नहीं. वह टूटा हुआ था, आधा बादलों से आधा ढका हुआ?

उसने उधर से अपनी आँखें फेर लीं.

सुबह उसे सामने दीवार पर टंगा प्रमाणपत्र दिखाई दिया. उसे वह थोड़ा तिरछा लगा. आयुष ने सोचा वह उसे ठीक करेगा. लेकिन फिर मन न हुआ. कई दिन तक उसने उसे ठीक करने की जहमत नहीं उठाई?

आयुष के भीतर, अदृश्य दरारें फैलने लगी थीं, चुपचाप, निरंतर. वह उन्हें देखने को तैयार नहीं था. उसके बजाय, वह और ज़ोर से दौड़ने, और कठोर बनने की तैयारी कर रहा था.
 ... क्रमश:

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

सूक्ष्म प्रतिरोध

लघुकथा  :   दिनेशराय द्विवेदी
चाची के घर लौटने पर परिवार 'पूरा' लगने लगा. माँ को अपनी 'चाय-संगिनी' मिल गयी, चाचा अब आराम से थे. घर में अब और दो स्त्रियाँ थीं जो उनके लिए सब कुछ 'ढंग से' करतीं. शगुन के लिए घर अब मनोविज्ञान सीखने की प्रयोगशाला था. अब वह मनोविज्ञान के सिद्धांत केवल किताबों से ही नहीं बल्कि व्यवहार से भी सीख रही थी. उसने 'सूक्ष्म प्रतिरोध' के बारे में पढ़ा और तय किया कि वह चुपचाप प्रयोग शुरू करेगी.

रात खाने पर चाचा बोले, "आज ऑफिस में विक्रम ने खूब मज़े लेकर बता रहा था कि आखिर उसकी पत्नी ने यह कह कर नौकरी छोड़ दी, कि पति के तनाव के कारण उसका दिल नौकरी में नहीं लगता."
चाची ने सहमति दी, "उसने सही किया, आखिर स्त्री का पहला फर्ज पति की संतुष्टि है.”

न ने अपनी प्लेट उठाते हुए धीरे से कहा, "अगर, पत्नी का तनाव देखकर पति नौकरी छोड़ दे, तो?"

एक बारगी सन्नाटा छा गया, उसकी बात सुनकर. फिर चाचा एक ठहाका लगाकर बोले, "वाह... शगुन, लगता है तुम मनोविज्ञान के साथ तर्कशास्त्र भी पढ़ रही हो. भविष्य में वकील बनने का इरादा तो नहीं?”

माँ ने अन्दरूनी भय के साथ शगुन को देखा, शगुन बस मुस्कुरा दी.

अपने घर में शगुन का यह पहला प्रयोग था. एक असंतुलित कथन को संतुलित सवाल में बदल देना. प्रतिक्रिया में ठहाका लगा लेकिन विचार बीज की तरह गिरा.

उधर शगुन के स्कूल में लड़कियों के लिए 'आत्मरक्षा' की एक क्लास आयोजित हुई. जिसमें सलवार-पूरी बाँह वाली कमीज वाली यूनिफॉर्म अनिवार्य थी, हँसना मना, और केवल 'स्वीकार्य' मूव्स सीखने की इजाज़त थी.

शगुन ने ट्रेनर से पूछा, "सर, क्या हमें वही मूव्स सिखाएंगे जो लड़कों को सिखाते हैं? असल हमला तो वही होगा न?"

ट्रेनर अपना ट्रैक सूट ठीक करते हुए बोला, "तुम्हारी सुरक्षा के लिए ये काफी हैं. ज़्यादा आक्रामक मूव्स लड़कियों को नुकसान पहुँचा सकते हैं. अगर हमला करने वाला अस्पताल पहुँच गया तो लड़की मुकदमा लड़ते-लड़ते ही थक जाएगी."

कुछ लड़कियाँ हँस पड़ीं.

उस रात शगुन ने यूट्यूब पर वीडियो देखकर अपने कमरे में प्रैक्टिस की. माँ ने दरवाज़ा खोला तो देखा तो वह एक किक का अभ्यास कर रही थी.

"अरे बाप रे! यह सब क्या कर रही हो? चोट लग जाएगी!"

"वही सीख रही हूँ माँ, जो स्कूल में 'स्वीकार्य' नहीं है."

माँ ने आँखें दिखाईं, लेकिन दरवाज़ा बंद करते हुए बुदबुदाई, "अच्छा ही है... कम से कम आयुष जैसे लड़कों से तो बच लोगी." मां की आँखों में थोड़ा गर्व झलका.

शगुन का दूसरा प्रयोग भी आंशिक रूप से सफल रहा. उसने डर तोड़ा, और माँ की चिंता से छिपा समर्थन भी मिला.



एक दिन चाची अपना पुराना एलबम देख रही थी. शगुन ने देखा, युवा चाची साड़ी में, कॉलेज की सीढ़ियों पर किताबें हाथ लिए खड़ी हैं.

"चाची, आप कॉलेज में पढ़ी हैं?" शगुन ने पूछा.

चाची के चेहरे पर एक चमक आकर बुझ गयी. "बस बी.ए. किया और फिर... शादी हो गई."

"आपको अफ़सोस है?"

"अफ़सोस? नहीं... बस कभी-कभी सोचती हूँ, अगर पढ़ाई जारी रखती तो क्या होता?"
फिर अचानक उन्होंने गर्व से कहा, "तब फिर तुम्हारे चाचाजी का टिफिन कौन पैक करता? उनके फेवरेट मेथी के पराठे कौन बनाता!" इन पराठों ने तो मेरी पहचान बना दी?"

शगुन मुसकुराई. उसने चाची से भावनात्मक कनेक्शन स्थापित कर लिया. और पराठों का राज़ भी हाथ लगा! उसका यह प्रयोग भी सफल रहा.

शहर के तहसील लायब्रेरी में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता थी. विषय था "शिक्षा में लैंगिक समानता".

शगुन ने घर बताया: "स्कूल प्रोजेक्ट की रिसर्च के लिए लायब्रेरी जाना है."

चाचा ने समाचार पत्र के पीछे से अपना सर बाहर निकालते हुए कहा, "अच्छा है. पर जल्दी लौटना. वैसे भी लायब्रेरी में तो सब किताबें ही हैं... बातें करने वाले कौन मिलेंगे वहाँ?" शायद उनको को लगता था कि लायब्रेरियाँ सिर्फ किताबों का गोदाम भर होती हैं. शगुन ने नहीं बताया कि वह प्रतियोगिता में भाग लेने जा रही है.

लायब्रेरी के हॉल में लड़कों की भीड़ थी. कुछ लड़कियाँ भी थीं. उसने अपना नाम प्रतिभागी सूची में लिखवाया, तो क्लर्क ने हैरानी से पूछा, "तुम... तुम प्रतियोगी हो?"

"जी," शगुन ने दृढ़ता से कहा.

मंच पर बैठी तो एक लड़का अपने दोस्त से फुसफुसाया, "अरे, यह तो गर्ल्स स्कूल वाली यूनिफॉर्म है... यह कहाँ आ गई?"

शगुन ने सुन कर अनसुना कर दिया. उसका दिल धड़क रहा था. फिर उसने वह सब कहा जो उसने महीनों से सोचा था. “स्कूल के नियमों से लेकर घर की बातचीत तक. उसकी आवाज़ शुरू में काँपी, फिर मजबूत हो गई.”

जब वह बोलकर बैठी, तो सन्नाटा था. फिर एक वरिष्ठ शिक्षक ने ताली बजाई. फिर कुछ और तालियाँ बजीं.

उसे पुरस्कार नहीं मिला. पर जब वह नीचे उतरी, तो दो लड़कियों ने उसके पास आकर कहा, "तुम बहुत हिम्मती हो. अगली बार हम भी भाग लेंगे."

"एक कॉलेज स्टूडेंट मिला, उसने कहा, "मेरी बहन भी खूब सवाल करती है। आज मैंने समझा, उन्हें दबाना नहीं, सुनना चाहिए।"

शगुन को लगा, यही तो है, धीरे-धीरे बदलाव.



शाम को घर लौटते हुए उसका कदम हल्के थे. रास्ते में उसे एक पोस्टर दिखा, "लड़कियों के लिए साइकिल प्रशिक्षण शिविर". उसने मन ही मन सोच लिया. अगला लक्ष्य.

उस रात शगुन ने अपनी डायरी लिखी-

"आज मैंने अपनी आवाज़ को पहली बार सुना. यह परफेक्ट से बहुत कम थी, लेकिन मजबूत थी, और मेरी थी.
घर लौटी तो चाची ने चाय के लिए पूछा. माँ ने पूछा, ‘भूख लग आयी होगी?’. चाचा ने पूछा, 'प्रोजेक्ट हो गया?' मैंने कहा, 'हाँ, हो गया.'
उन्हें नहीं पता कि प्रोजेक्ट क्या है? उन्हें शायद पता भी न चले. पर मुझे पता है.
मैं अब वह नहीं, जो सिर्फ सवाल पूछती थी. मैं वह बन रही हूँ जो उन सवालों के जवाब तलाशती हूँ, आहिस्ता से, बिना किसी शोर के.
चाचा आज रिमोट तलाश रहे थे. मैंने चुपचाप सोफ़े के नीचे से निकालकर दिया. उन्होंने कहा, देखो, लड़कियाँ छुपी हुई चीज़ें तलाश देती हैं!'
मैंने मन ही मन सोचा, 'वे खोई हुई आवाज़ भी ढूँढ लेती हैं.'
यह मेरा सूक्ष्म प्रतिरोध था. आज से यही मेरी भाषा होगी.
आज मैंने इस भाषा का पहला वाक्य बोल दिया है."          ... क्रमश:

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

स्वैच्छिक पलायन

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

गर्मियों की लंबी छुट्टियाँ आयुष के लिए एक अवांछित कैद बन गई थीं. बोर्डिंग स्कूल की व्यवस्थित दुनिया से निकलकर, उसे अपने ही घर में अजनबी जैसा महसूस हो रहा था. यहाँ कोई घंटी नहीं बजती थी, कोई यूनिफॉर्म नहीं थी, और न ही वह मर्दाना भाईचारा था, जहाँ हर बात का अर्थ सपाट होता था.

यहाँ सब कुछ गहरा और उलझा हुआ था. माँ की चिंताएँ घर-परिवार की थीं, और शगुन... वह अब और भी पढ़ी-लिखी और सवाल पूछने वाली हो गई थी. एक दिन उसने आयुष से पूछा, "तुम्हारे हॉस्टल में कितनी लड़कियाँ हैं?"

सवाल इतना सीधा और अप्रत्याशित था कि आयुष का दिमाग पल भर के लिए खाली हो गया. हॉस्टल की दीवारों पर लिखे नंबर और दोस्तों के मजाक उसकी आँखों के सामने तैर गए. "लड़कियाँ? वहाँ लड़कियाँ नहीं होतीं. सिर्फ... लड़के होते हैं." उसने अटकते हुए जवाब दिया.

"तो फिर लड़कियों के बारे में बात कैसे होती है?" शगुन ने पूछा, उसकी आँखों में एक जिज्ञासा थी जो आयुष को तीर सी चुभ गई.

"बात... नहीं होती," उसने जल्दी से कहा, और टीवी देखने लगा. उस रात उसे नींद नहीं आयी. शगुन के सवाल ने उसके अंदर बेचैनी पैदा कर दी थी, जैसे कोई पर्दा हिल गया हो.

छुट्टियाँ खत्म होने पर उसे राहत मिली. हॉस्टल लौटकर उसने गहरी साँस ली. यहाँ सब कुछ स्पष्ट था. पर यह स्पष्टता लंबे समय तक नहीं टिकी.

दिवाली के बाद, चाचा ने फोन पर खबर दी, "चाची वापस आ गई हैं. अब घर में रौनक रहेगी."

आयुष ने 'बहुत अच्छा' कहा, पर उसका दिल एक भारी पत्थर-सा हो गया. चाची भी. अब घर पर तीन औरतें होंगी. उसकी कल्पना में घर का वातावरण और भी दमघोंटू हो गया. चाय पीते हुए सलाह, कपड़ों पर टिप्पणियाँ, शगुन के उलझे हुए सवाल. एक ऐसी दुनिया जहाँ बोर्डिंग स्कूल वाली भाषा बेकार थी, और जहाँ वह हमेशा उलझन महसूस करने लगता था.

तभी उसकी नज़र नोटिस बोर्ड पर लगे एक पोस्टर पर पड़ी; "एनसीसी विंटर कैंप: अनुशासन, साहस, राष्ट्र सेवा का सुनहरा अवसर!"

यह अंधेरे में अचानक मिली रोशनी थी. कैंप. टेंट. दौड़. ड्रिल. सिर्फ लड़के. कोई औरतें नहीं. कोई उलझे सवाल नहीं. यह उसकी जानी-पहचानी दुनिया का विस्तार था, बल्कि उससे भी बेहतर ... स्वैच्छिक पलायन की राह.

उसने पिता को फोन किया, अपनी आवाज़ में उत्साह भरकर, "पापा, यह एनसीसी कैंप मेरे करियर के लिए बहुत अच्छा रहेगा. प्रमाणपत्र मिलेगा, एकता और अनुशासन सीखूँगा. मैं क्रिसमस पर घर नहीं आ पाऊँगा, यह मेरे भविष्य के लिए ज़रूरी है."

पिता ने सहमति दे दी. चाचा ने कहा, "शाबाश बेटा! जोश देखकर अच्छा लगा."

कैंप की कठोरता आयुष के लिए सान्त्वना भरी थी. यहाँ आदेश और पालन सब कुछ था. सुबह पाँच बजे की घंटी, दौड़, यूनिफॉर्म की शानदार सफाई, ड्रिल की तेज आवाज़ें. एनसीसी अधिकारी की गूंजती कड़क आवाज़, "तुम लड़के हो! नरम मत बनो! देश को अपने कंधों पर जिम्मेदारी लेने वाले सिपाही चाहिए, रोने-धोने वाले जवान नहीं!"

हर दिन शारीरिक थकान से खत्म होता, भरपूर मानसिक शांति मिलती. यहाँ कोई जटिलता नहीं थी. हर जगह ताकत थी. आज्ञापालन था. भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं था.

एक दिन एक जूनियर कैडेट को, जो ड्रिल में लगातार गलती कर रहा था, सबके सामने धूप में खड़ा रहने की सजा दी गयी. उसका चेहरा शर्म और थकान से लाल हो गया था. उसे देख कर आयुष को लड़के पर बिलकुल दया नहीं आयी, बल्कि तीव्र घृणा महसूस हुई. “इतना कमजोर बंदा? सबके सामने शर्मिंदा हो रहा है? वह यहाँ के लायक ही नहीं.” आयुष ने तभी अपने अंदर की आवाज सुनी: "मर्द बनना है, तो ऐसी कमजोरी कभी मत दिखाओ."

कैंप समाप्त हुआ. आयुष को 'उत्कृष्ट कैडेट' का प्रमाणपत्र मिला. वह लौटा तो उसकी चाल में एक नया दबदबा था, कंधे और सीधे थे, निगाहें सीधी और सधी आवाज. अब वह केवल बोर्डिंग स्कूल का सीनियर नहीं रह गया था; बल्कि एक प्रशिक्षित सिपाही था, जिसने स्वेच्छा से कठोरता सीखी और उसे आत्मसात कर लिया था.

हॉस्टल में उसकी वापसी पर एक छोटी सी पार्टी हुई. राजन ने कहा, "अब, हमारा आयुष असली मर्द है!" आयुष ने मुस्कुराकर उसकी पीठ थपथपाई, लेकिन यह मुस्कुराहट उसकी आँखों में नहीं थी. वहाँ एक शून्यता थी, जैसे भीतर सब कुछ व्यवस्थित होकर एक निर्जीव कक्ष में बंद कर दिया गया हो.

एक रात फिर वही पुराना नाटक दोहराया गया. सिद्धार्थ, वही कविता वाला लड़का, फिर से निशाने पर था. इस बार उसने किसी लड़की से फोन पर बात कर ली थी, यह, एक अक्षम्य पाप था.

आयुष अपनी किताब में डूबा था. चीखें सुनकर उसने सिर उठाया. सिद्धार्थ की आँखें, जो हमेशा की तरह मदद माँग रही थीं, उसकी आँखों से मिलीं. पहले की तरह उसे झटका लगा, पर यह झटका इस बार सिर्फ पल भर का विचलन था. उसने कोई भाव नहीं दिखाया. उसने धीरे से किताब का पन्ना पलटा, और पढ़ने में व्यस्त हो गया. उसके कानों में एनसीसी अधिकारी की आवाज़ गूँजी; "तुम लड़के हो! नरम मत बनो!"

उसके अंदर की सारी नरमी पत्थर हो गयी.

कमरा शोर से भर गया था, पर आयुष का ध्यान अपनी साँसों पर केंद्रित था; स्थिर, नियमित. जब सब शांत हो गया तो उसने देखा, सिद्धार्थ कोने में सिसक रहा था. आयुष के भीतर कोई हलचल नहीं हुई. बल्कि उसने संतोष महसूस किया, जैसे कोई कठिन परीक्षा पास कर ली हो.

बाद में शीशे के सामने खड़े होकर उसने अपना प्रतिबिंब देखा. यूनिफॉर्म पर एकदम सही क्रीज, बाल व्यवस्थित. चेहरे पर कोई रेखा, कोई उथल-पुथल नहीं. केवल एक शांत, नियंत्रित रिक्तता. एक परफेक्ट मर्द.

उसे शगुन का विचार आया. पर उसकी याद अब धुंधली थी, बहुत दूर से आते स्वर जैसी, जिसका उसकी मौजूदा हकीकत से कोई संबंध नहीं रह गया था. उसने सही रास्ता चुना था. उसने कमजोरी से पलायन किया था, और अब वह उस ताकत के केंद्र में था, जिसे वह जानता था.

उसने अपने कमरे की लाइट बंद कर दी, और बिना किसी विचार और स्वप्न के, एक गहरी, भारी नींद में डूब गया. उसका पलायन पूरा हो चुका था. अब केवल उसे एक नई, कड़ी हकीकत का सामना करना था, जिसका चुनाव उसने स्वयं किया था.                       ... क्रमश:

सोमवार, 12 जनवरी 2026

नियमावली

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

स्कूल की आखिरी घंटी बजने वाली थी, शगुन की नज़र खिड़की से बाहर उड़ती एक चिड़िया पर टिकी थी, पर कान वैल्यू एजुकेशन की क्लास में प्रिंसिपल मैडम के शब्दों पर थे, उनकी आवाज़ में एक ऐसा आग्रह था जो सुझाव नहीं, बल्कि एक कठोर नियम लगता था.

"और याद रखना, लड़कियों, असली सुंदरता चेहरे पर नहीं, चरित्र में होती है. एक अच्छी लड़की की पहचान उसकी विनम्रता, उसका संयम और परिवार के प्रति त्याग है."

शगुन की उँगली अनायास ही अपनी नोटबुक पर खिसक गई, जहाँ उसने सुबह मनोविज्ञान की क्लास में एक शब्द नोट किया था: "सामाजिक अनुकूलन". उसकी परिभाषा याद आई: “व्यवहार को सामाजिक मानदंडों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया.” एक ठंडी सिहरन सी उसकी रीढ़ में दौड़ गयी. मैडम के शब्द अचानक एक प्रोसेस का हिस्सा लगने लगे, कोई शाश्वत सत्य नहीं. वह एक कुम्हार को प्रतिमाएँ गढ़ने के पहले मिट्टी को तैयार करने में लगा था, बस.

"खुश रहना सीखो," मैडम ने बोलना जारी रखा, "घर की खुशहाली तुम्हारे हाथ में है. एक चिड़चिड़ी, हर बात पर सवाल उठाने वाली लड़की पूरे वातावरण को दूषित कर देती है."

शगुन ने अपने आस-पास देखा. कई सिर गंभीरता से हिल रहे थे. उसने सोचा, क्या वे सब इस 'एक खास साँचे में ढाले जाने’ के प्रोसेस को महसूस नहीं कर पा रही थीं? या फिर, वे पहले ही साँचे में ढल चुकी थीं?

अगले दिन सुबह की असेंबली में, जब सब लड़कियाँ लाइन में खड़ी थीं. एक अलग तरह का पाठ शुरू हुआ. वाइस-प्रिंसिपल, जिनकी नज़रें हमेशा ही छात्राओं को स्कैन करती रहती थीं, अचानक प्रिया के सामने रुक गईं. उन्होंने उसकी स्कर्ट के किनारे को उँगलियों से पकड़कर खींचा.

"यह क्या है?" उनकी आवाज़ कर्कश थी, "स्कर्ट इतनी छोटी क्यों है? और यह ब्लाउज़... क्या यह तुम्हें टाइट नहीं लग रहा?"

प्रिया का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया. तमाम छात्राओं की नज़रें उस पर टिक गईं. मैडम ने सबकी तरफ देखा, यह सबक सब छात्राओं के लिए था.

"लड़कियों, तुम्हारा ध्यान पढ़ाई और संस्कारों पर होना चाहिए, न कि ऐसी चीज़ों पर जो अनुचित ध्यान आकर्षित करें. तुम्हारे शरीर की हर अभिव्यक्ति एक संदेश है. यह संदेश सही होना चाहिए."

उनके शब्द हवा में लटक गए. प्रिया अब सिकुड़ी हुई, अपने आप में समाई खड़ी थी. शगुन के मन में कल पढ़ा हुआ एक और शब्द उभरा” "वस्तुकरण". प्रिया का शरीर, उसकी पोशाक, एक समस्या बन गई थी. एक ऐसी वस्तु जिसका विश्लेषण, आलोचना और सार्वजनिक सुधार किया जा सकता था, ताकि वह देखने वालों को 'उचित संदेश’ दे. शगुन ने अपनी स्कर्ट को नीचे खींच लिया, यह एक स्वचालित, आत्म-सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया थी. डर का यह वायरस छूत की तरह फैल गया था.

घर पर चाची की वापसी नई ही थी. विवाह के बाद जब चाचा-चाची के बीच अनबन होने के कारण वह मायके चली गई थीं, अब धुंधली याद बन चुके थे. "मामला सुलझ गया," बस इतना ही कहा गया था, और चाची वापस आ गई थीं. शायद उन नियमों को मान कर, जिन्हें तोड़ना उनके लिए संभव नहीं था.

शाम को एक पारिवारिक समारोह था. माँ ने एक सुंदर, हल्की ज़री वाले सलवार-सूट को हाथ में लेकर वापस रख दिया. वही सूट जो शगुन को पसंद था.

"नहीं बेटा, यह वाला ज़रूरत से ज़्यादा आकर्षक है. तुम्हारी उम्र में सुंदर दिखना अच्छा है, पर 'बहुत' सुंदर दिखने को लोग गलत समझ सकते हैं. बेवजह लोग तुम्हें घूरेंगे. तुम्हारी पढ़ाई और समझदारी ही तुम्हारे लिए असली सुंदरता है."

तभी चाची चाय का कप हाथ में लिए कमरे में आईं. उन्होंने स्थिति भाँप ली और माँ के शब्दों पर मुहर लगा दी, "सही कहा भाभी ने. हम लड़कियों को खुद अपनी सीमाएँ तय करनी पड़ती हैं. वरना ... बाद में पछताना पड़ता है." उनकी आवाज़ के आखिरी शब्दों में थकान और विवशता झलकी, जिसे देख शगुन का दिल एक पल के लिए भारी हो गया. चाची ने यह पाठ शायद स्वयं जीकर सीखा था.

शगुन के भीतर एक तीखा प्रतिवाद उठा. तो क्या सुंदरता एक अपराध है? क्या डर हमारी नियति है? पर उसने कुछ नहीं कहा. उसके चेहरे पर उभरी इस कुंठा और क्रोध को माँ ने भाँप लिया.

माँ उसे खिड़की के पास ले गईं, धीमी आवाज में समझाने लगीं, "मैं समझती हूँ तुम्हें अच्छा नहीं लगा. पर देखो बेटा, आज फंक्शन है. सारे रिश्तेदार वहाँ रहेंगे. ऐसे मौकों पर माहौल खुशनुमा रहना चाहिए. तुम्हारी नाराजगी या जिद से बात बिगड़ सकती है. हम लड़कियों को थोड़ा सहना पड़ता है, ताकि सब की खुशी बनी रहे. तुम्हारी नाराजगी सिर्फ तुम्हारी नहीं रह जाती. उसका असर सब पर पड़ता है."

यह पाठ अब सिर्फ कपड़ों के बारे में नहीं था. यह उसकी खुद की भावनाओं के बारे में था. उसके क्रोध, उसकी इच्छा को दबाकर, दूसरों की सुविधा और 'शांति' को तरजीह देना. उसे सिखाया जा रहा था कि उसकी व्यक्तिगत भावनाएँ सामूहिक भावनात्मक जिम्मेदारी के आगे गौण हो गयी थी. यह आत्म-दमन का पाठ था.

शगुन ने चुपचाप सादा सूट पहन लिया. उसका मन उसके बैग में रखी मनोविज्ञान की किताब में था. किताब में ये सभी शब्द थे, 'सामाजिक अनुकूलन', 'वस्तुकरण', 'आंतरिककरण उत्पीड़न' (Internalized Oppression). वे सिर्फ शब्द नहीं थे; वे चाबियाँ थीं, जो उसकी ज़िंदगी के बक्सों पर ताले लगा रही थीं.

पर इस ज्ञान ने शगुन को अकेलेपन की पीड़ा दी. इसे साझा करने के लिए उसके निकट कोई नहीं था. न प्रिया के साथ, न माँ के साथ, और न चाची के साथ था, जो खुद इसी व्यवस्था की पूर्व-छात्रा और अब सहायक-शिक्षिका बन चुकी थीं.

फंक्शन में जाने से पहले शगुन ने अपने बैग को देखा मनोविज्ञान की किताब वहीं थी. से छूकर उसे कुछ शान्ति मिली. वह जान गई थी कि ये नियम स्वाभाविक नहीं हैं, बनाए गए हैं. वह उन्हें तोड़ नहीं सकती थी. नहीं, अभी नहीं. अभी तो उसने बस उन्हें जानना शुरू किया था.

और पहला पाठ यही था: तुम्हारा शरीर तुम्हारा नहीं, तुम्हारी भावनाएँ तुम्हारी नहीं. दोनों पर नियंत्रण बाहरी है.
उसने सोचा, कल स्कूल में वह अपनी मनोविज्ञान की किताब फिर खोलेगी. शायद अगला अध्याय उसे कोई माकूल जवाब दे.                 ... क्रमश:

रविवार, 11 जनवरी 2026

पाठ

 लघुकथा  :  दिनेशराय द्वि्वेदी

ट्रेन की खिड़की से बाहर धुँधले उजाले में खेत-पेड़ गुजर रहे थे. आयुष की नजर उन पर थी, पर दिख कुछ नहीं रहा था. आँखों के सामने शगुन का चेहरा था, उस आखिरी रात का, जब उसने पूछा था, "क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुम खुद को खो रहे हो?"

सवाल अब भी कानों में सरसरा रहा था. उसने जवाब नहीं दिया था. बस चिल्ला दिया था, और चिल्लाने के बाद की चुप्पी सीने पर पत्थर-सी पड़ी थी.

ट्रेन रुकी. बोर्डिंग स्कूल का स्टेशन था. प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही एक गंध ने घेर लिया; पसीना, फिनाइल, पुरानी किताबों की गंध. हॉस्टल की गंध. एक अजीब सी राहत मिली. यहाँ सब स्पष्ट था. नियम, पदानुक्रम, मजाक. यहाँ शगुन जैसे सवाल नहीं थे. यहाँ सब कुछ सतह पर था, और सतह पर ही निपट जाता था.

हॉस्टल के कमरे में राजन ने उसका स्वागत एक गाली से किया. आयुष बेमन से मुस्कुरा दिया. यह रस्म थी. विजय ने बैग की ओर देखा, "घर से मिठाई?"

"कुछ खास नहीं," आयुष ने कहा. बैग में माँ के हाथ के लड्डू थे, पर उन्हें निकालना अब कमजोरी लगता.

शाम को डिनर हॉल में उसने एक नया चेहरा देखा; नौवीं कक्षा का पतला-दुबला लड़का, समर.

"अरे देखो, नया 'कुमारी' आ गया है!" राजन ने ऊँची आवाज़ में कहा.

"क्यों भई, तेरा नाम तो लड़कियों जैसा है," विजय ने कहा, "कविता पढ़ता होगा न?"

समर ने सिर उठाकर देखा, फिर नीचे झुक गया. उसकी चुप्पी और भड़काने वाली थी.

उस रात के बाद समर "सिस्सी" बन गया. धीरे चलना, शर्माना, वगैरा; उसकी हर छोटी हरकत पर टिप्पणी होती. आयुष देखता रहा.

यह इस सत्र का पहला पाठ था: स्त्रीलिंग विशेषताएँ उस पर चस्पा कर दी गईं. समर का "इलाज" शुरू हुआ. उसे जबरन क्रिकेट खिलाया गया, गालियाँ रटाई गईं.

एक दिन लाइब्रेरी में आयुष ने समर को कविता की किताब छुपाते देखा. नजरें मिलीं. समर की आँखों में सवाल था; ‘तुम क्यों नहीं कुछ कहते?’ आयुष ने तुरंत नजरें फेर लीं. उसकी चुप्पी एक सुरक्षा-दीवार थी.

हफ्ते बीते. बातें गहरी और विकृत होती गई. अब सिर्फ हीरोइनें नहीं, सोशल मीडिया की अनजान लड़कियों के प्रोफाइल तोड़े जाते. "देखो इसका नया डीपी. क्या रेटिंग दोगे?"

लड़के स्क्रीन के इर्द-गिर्द झुंड बना लेते. लड़की का चेहरा, उसकी पोस्ट; सब एक कोड की तरह तोड़ा जाता. उसकी इच्छा, व्यक्तित्व सब गायब. वह शारीरिक अंगों का एक सेट बन जाती. जो सबसे "बोल्ड" टिप्पणी करता, वह नायक बन जाता. आयुष चुप रहता. उसकी चुप्पी असहमति नहीं, सहमति थी. यह दूसरा पाठ था: स्त्री एक वस्तु है, और उसका 'ज्ञान' ही पुरुषत्व की पूंजी है.

एक शाम "विशेष व्याख्यान" हुआ. एक बुजुर्ग शिक्षक बोले, "याद रखो, लड़कियाँ ध्यान भटकाने का सबसे बड़ा साधन हैं. प्रेम-प्रसंग मीठा जहर है. अच्छा लड़का वही है जिसका ध्यान केवल पढ़ाई, व्यायाम और खेल पर टिका रहे."

हॉल में सन्नाटा था. आयुष के मन में विचार कौंधा: अगर लड़कियाँ इतनी खतरनाक हैं... तो क्या यह स्त्री-विहीन दुनिया एक लाभ नहीं? हम बचाए गए हैं? यह विचार वीभत्स था, पर उसमें एक सच्चाई भी थी. यह तीसरा पाठ था: स्त्री एक बाहरी खतरा है. यह दुनिया हमारा 'सुरक्षित क्षेत्र' है.

इन पाठों के बीच आयुष ने एक और पाठ सीखा. हॉस्टल की महिला कर्मचारियों के प्रति. वे झाड़ू लगाती थीं, बर्तन साफ करती थीं. पर वे होते हुए भी अदृश्य थीं. लड़के उनसे आँख नहीं मिलाते थे, नाम नहीं जानते थे. उनका श्रम चाहिए था, उनकी मानवता, उनकी संवेदनाएँ नहीं. वे सिर्फ मशीन थी.

फिर वह रात आई. अँधेरे कमरे में केवल मोबाइल स्क्रीन की रोशनी थी. राजन ने एक वीभत्स वीडियो दिखाना शुरू किया. समर फुसफुसाया, "बंद करो... यह गलत है."

कमरे में सन्नाटा. फिर राजन हँसा, "अरे! हमारी 'कुमारी' को तो 'गलत' लगता है!" वह मुड़ा, "अरे आयुष, तेरी बहन है न? कभी उसकी सहेली की फोटो दिखाई है?"

प्रश्न बिजली-सा गुजरा. आयुष के मन में दो छवियाँ टकराईं: उसकी सगी बहन शगुन, और इस कमरे की भाषा की "बहन". एक वस्तु, एक मजाक.

सब की नजरें उस पर थीं. यह परीक्षा थी. शगुन का चेहरा आँखों के सामने तैरा. “तुम खुद को खो रहे हो?”

आयुष ने एक सेकंड के लिए आँखें बंद कीं. जब खोलीं, तो चेहरे पर कोई भाव नहीं था. एक खाली मुस्कुराहट होंठों पर चिपक गई. उसकी आवाज़ सपाट निकली:

"अरे, वो’ वो बहुत साधारण है. बस पढ़ाई में लगी रहती है. कोई फोटो नहीं."

उसने जानबूझकर उसे 'उबाऊ' बना दिया. इस एक झूठ में, आयुष ने हॉस्टल के मूल्यों को अपने सबसे पुराने रिश्ते से ऊपर रख दिया.

कमरे में तालियाँ बजीं. आयुष ने इम्तिहान 'पास' कर लिया था. उसकी जगह सुरक्षित हो गई.

रात को सपना आया. शगुन धुंधली परछाई सी खड़ी थी, "आयुष, तुम कहाँ खो गए?"

आयुष जवाब देना चाहता था, पर मुहँ से वही गालियाँ निकलने लगीं. शगुन की छवि चीखती हुई गायब हो गई.

आयुष हाँफता हुआ जाग गया. कमरे में खर्राटे गूँज रहे थे. उसने अपने हाथ देखे. वही हाथ जिसने शगुन की गुड़िया थामी थी. आँखों में जलन उभरी. गले की पुरानी गाँठ फूल गई. एक सिसकी सीने से टकराकर ऊपर आई. उसने तकिए को जोर से पकड़ लिया. और फिर, बिना आवाज किए, तकिए में मुहँ दबाकर, उसने वह पहला और आखिरी आँसू रोया जो बारह साल की उम्र के बाद कभी नहीं आया था. शरीर एक झटके में काँपा, फिर शांत हो गया.

सुबह जब वह उठा, तो सकी आँखें सूखी और चेहरा पत्थर की तरह सख्त था. दर्पण के सामने यूनिफॉर्म के बटन लगाते हुए उसने अपनी ओर देखा. भीतर का वह लड़का, जिसने रात को आँसू बहाए थे, अब गायब था. उसकी जगह एक खोखला, सही ढंग से ढला हुआ खोल था, जो सभी पाठ याद कर चुका था.

उसने दर्पण से नजर हटा ली, और कमरे से बाहर कदम रख दिया. दिन का पहला पाठ शुरू होने वाला था.                    ...   क्रमशः 

शनिवार, 10 जनवरी 2026

चिनगारी

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

आयुष के बोर्डिंग स्कूल चले जाने के बाद शगुन को कई नए काम मिल गए. पहले आयुष बाहर के छोटे-मोटे काम कर देता था. अब उनमें से अधिकांश उसे करने पड़ते थे. उसका स्कूल के अलावा मोहल्ले की सीमा से बाहर जाना सिमट गया. पहले वह जाती तो आयुष को साथ ले जाती थी. अब उसे अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी. शगुन 'घर की बड़ी बेटी' होने का अर्थ समझ रही थी, उसका अपना समय सिकुड़ गया था. उसकी दुनिया अब अधिक से अधिक घर की चारदीवारी में सिमट रही थी. जिज्ञासावश खरीदी गई उसकी विज्ञान की किताबें वह यदा-कदा ही पढ़ पाती थी.

शगुन ने सैकण्डरी स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी. गणित और विज्ञान के अंकों ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था. अब उसे अध्ययन के लिए अपनी स्ट्रीम चुननी थी. वह जीव विज्ञान लेना चाहती थी. सोचती, यदि डॉक्टर बन सकी तो परिवार और लोगों के काम आ सकती हूँ. खुद का और परिवार का नाम भी रोशन होगा.

चाचा स्कूल से उसका प्रवेश फॉर्म ले आए. रात के खाने के समय पिता और चाचा बैठे थे. वह रसोई में रोटियाँ बेल रही थी, माँ परोस रही थी. अचानक माँ ने कहा, “रोटियाँ मुझे बेलने दे, खाना तू परोस दे. पापा तेरे एडमिशन के बारे में बात करना चाहते हैं.”

उसने बेलन माँ को थमाया, आटा सने हाथ धोए और गर्म रोटियाँ लेकर डाइनिंग में पहुँची.

"आर्ट्स ही ठीक रहेगा," पिता ने शगुन को बिना देखे ही कहा, "लड़कियों के लिए आसान है. इतिहास-समाजशास्त्र शादी के बाद बच्चों को पढ़ाने में भी काम आएंगे."

सुनकर शगुन की साँसें थम सी गईं. “पर पापा, मेरे सबसे ज़्यादा नंबर तो साइंस और गणित में आए हैं," उसने पिता और चाचा की थाली में रोटियाँ परोसते हुए कहा, "मैं बायोलॉजी पढ़ना चाहती हूँ.”

“अब तक की जो साइंस-गणित तुमने पढ़ी, वह प्रारंभिक थी, जो सब को सीखनी चाहिए," चाचा ने बिना रुके कह दिया, "आगे जब ये मुख्य विषय होंगे तो बहुत मुश्किल होंगे. आयुष भी यहाँ नहीं है. घर के इतने काम करते हुए तुम बायोलॉजी नहीं कर सकोगी. एक बार फेल हुई तो बहुत इज्ज़त खराब होगी.”

“पर गणित में मैं कभी 90-95 प्रतिशत से कम नहीं लाई. वह मेरी पसंदीदा है," शगुन ने हिम्मत जुटाकर कहा.

“क्या?” पिता की आवाज़ कड़ी हो गई, “तुम बायोलॉजी लेकर क्या करोगी? मेडिकल के लिए प्री-मेडिकल देना पड़ेगा, कोचिंग करनी पड़ेगी, बहुत मेहनत. और कॉम्पिटीशन निकाल भी लिया तो मेडिकल की पढ़ाई बहुत महंगी है. एक-सवा करोड़ खर्च होता है. हम जैसे मध्यवर्गीय के बस की बात नहीं.”

“और डॉक्टर बन भी गई तो शादी में कितना दहेज देना होगा, पता है?” चाचा ने आगे जोड़ा, “आजकल तो डेढ़-दो करोड़ मांग चल रही है. मेडिकल की तो हम सोच भी नहीं सकते.”

शगुन का गला रुंध गया. उसकी सारी हसरतों पर पानी फिर चुका था. तभी उसके मन में एक तर्क कौंधा ‘आजकल आर्ट्स में ऑप्शनल गणित या मनोविज्ञान भी ले सकते हैं. मनोविज्ञान से तर्कशक्ति बढ़ती है... वह विज्ञान का ही एक हिस्सा है.’

“तो... क्या मैं आर्ट्स में मनोविज्ञान ले सकती हूँ?” उसकी आवाज़ धीमी, पर स्पष्ट थी, “वह भी तो... विज्ञान जैसा ही है.”

पिता और चाचा ने एक दूसरे की ओर देखा. एक क्षण की चुप्पी के बाद पिता बोले, “ठीक है... मनोविज्ञान ले सकती हो.”

चाचा की भृकुटियाँ तन गईं, पर वे चुप रहे.

शगुन डाइनिंग रूम छोड़कर सीधे अपने कमरे में गई और बिस्तर पर गिरकर तकिए में मुँह दबा रोने लगी. उसका मुख्य सपना तो टूट गया था, पर एक खिड़की... एक छोटी सी खिड़की खुली रह गई थी. “मनोविज्ञान”.

खाना खाने वह नीचे नहीं लौटी. सब काम निपटाने के बाद माँ उसके कमरे में आई. जैसे-तैसे समझाया और नीचे लाकर खाना खिलाया.

अगली सुबह शगुन नीचे नहीं उतरी. माँ उसे बुला कर लाई. पिता ने समझाना शुरू किया, “हम मध्यवर्गीय लोग हैं, बेटा. अपनी गुदड़ी देखकर चलना पड़ता है...” आखिरकार, शगुन आर्ट्स लेने को राजी हो गई, बशर्ते मनोविज्ञान उसका विषय हो.

दिन में चाचा के साथ वह स्कूल गई और आर्ट्स स्ट्रीम में मनोविज्ञान चुनते हुए आवेदन जमा करा दिया.

क्रिसमस की छुट्टियों में आयुष घर लौटा. वह लंबा हो गया था, बात करने का अंदाज़ भी बदल गया था. वह बोर्डिंग स्कूल के किस्से सुनाता — कंप्यूटर लैब, हॉस्टल की शरारतें. पूरा परिवार मंत्रमुग्ध सुनता रहता.

"देखो, कितना कुछ सीख रहा है!" माँ गर्व से कहतीं.

एक शाम चाचा ने वह तुलना फिर दोहराई, "आयुष को दुनिया देखने-सीखने को मिल रही है. शगुन, तुम्हें भी अब अपनी दुनिया, घर-परिवार को बेहतर सीखना है."

शगुन ने आयुष की ओर देखा. पर आयुष बेखबर अपनी प्लेट में खाना परोस रहा था. रात को दोनों जब अपने कमरे में सोने गए, तो शगुन ने पूछा, "बोर्डिंग स्कूल... कैसा लगा तुम्हें?"

आयुष ने कंधे उचकाए, "ठीक है. पर खाना बहुत बेकार है."

उसकी शिकायतें सतही थीं. शगुन की आँखों के गहरे सवालों को, उस चुप्पी के भार को, वह नहीं पढ़ पाया. उनके बीच नई दीवार अब देखी जा सकती थी.

छुट्टियाँ खत्म हुईं. आयुष वापस जाने के लिए तैयार हुआ. इस बार शगुन स्टेशन नहीं गई. वह अपनी खिड़की से उसे जाते देखती रही.

जब वह नज़रों से ओझल हुआ, तो उसकी नज़र अपनी अलमारी पर पड़ी जिसमें उसकी शौकिया तौर पर खरीदी विज्ञान पुस्तकें थी. फिर अपने स्कूल बैग पर, जिसमें मनोविज्ञान की नई किताब थी. वह अपने आप से ही कहने लगी, “पाठ्यक्रम में नहीं तो क्या हुआ? स्कूल लाइब्रेरी से लाकर विज्ञान की किताबें पढ़ सकती हूँ. इसी से मेरा ज्ञान बढ़ेगा.

उसने तय किया, वह ऐसा करती रहेगी. यही छोटी सी आदत, यही अध्ययन की ललक... उसकी चिंगारी को बचाए रखेगी.   ...   क्रमशः 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

बोर्डिंग या जेल

लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी

जब आयुष प्राथमिक विद्यालय की अंतिम कक्षा में था तभी अनिल चाचा उसे नवोदय विद्यालय में प्रवेश की तैयारी करा रहे थे. प्रवेश के लिए आवेदन किया और उसे वहाँ प्रवेश मिल गया. यह एक बोर्डिंग स्कूल था. उसके वहाँ जाने के पहले मम्मा ने उसके लिए बेसन के लड्डू और मठरियाँ बनाईं उन्हें नए एयरटाइट डब्बे मंगवा कर उनमें पैक किया. उसके सूटकेस में हर चीज सावधानी से रखी गई. कपड़े, किताबें और भी बहुत कुछ. पापा ने सभी दस्तावेज अच्छी तरह जाँच कर रखे. मम्मा-पापा दोनों उसे बोर्डिंग स्कूल तक छोड़ कर गए शगुन और अनिल चाचा उन्हें स्टेशन छोड़ने आए. ट्रेन में चढ़ने के बाद वह अपनी सीट पर खिड़की के पास जा बैठा. ट्रेन चलने तक खिड़की से बाहर झाँकता रहा. शगुन चुप थी लेकिन एकटक उसे देखे जा रही थी, जैसे सोच रही हो कि आयुष नहीं उसका बचपन जा रहा है. अनिल चाचा ने ट्रेन में चढ़ने के पहले आयुष के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, "बेटा, बोर्डिंग स्कूल से तुम्हें मर्द बन कर निकलना है."

जब ट्रेन ने रवाना होने की सीटी दी तो शगुन ने धीमे से उसे कहा, “आयुष वहाँ से मुझे पत्र लिखना.

"हाँ, जरूर लिखूंगा", आयुष ने कहा. तभी ट्रेन चल दी. वह शगुन और चाचा की ओर तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक कि वे उसकी नजरों से ओझल न हो गए.


आयुष को बोर्डिंग स्कूल छोड़ कर माता-पिता वापस घर पहुँचे. शगुन ने दरवाजा खोला और माँ के हाथ से बैग ले लिया. सामान रखने के बाद माँ ने शगुन की ओर देखा, और हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया और बोली, "अब आयुष दूर है, उसकी याद आएगी. अब तुम्हें भी समझदार बनना होगा. घर के काम-काज में तुम्हारी ज्यादा हिस्सेदारी रहेगी. पर मैं धीरे-धीरे सब सिखा दूँगी."

अनिल चाचा ने सहमति में सिर हिलाया, "बिल्कुल सही. लड़कियों को घर की जिम्मेदारियाँ सीखनी ही चाहिए. आयुष को तो बाहर की दुनिया का अनुभव करना है."

शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने महसूस किया कि अब उसकी अपनी भूमिका भी बदल रही थी. वह "घर की बड़ी बेटी" हो गयी थी. एक ऐसा अलंकरण जिसमें आज़ादी नहीं, जिम्मेदारियों का बोझ था.

बोर्डिंग स्कूल पूरी तरह ‘मर्दों की दुनिया था. वहाँ कहीं लड़कियाँ, स्त्रियाँ नहीं थीं, न शिक्षक, न रसोइया, न और कोई. उनके न होने पर यहाँ गर्व किया जाता था, मानो स्त्रियाँ तपस्या भंग कर डालने वाली व्यवधान हों. कुछ दिन बाद ही आयुष ने महसूस किया कि स्त्रियों का यह अभाव बहुत भारी था.

रात दस बजे हॉस्टल का वार्डन लाइट बंद करके चला जाता था. उसके बाद आवाज़ें ज़ोर पकड़ने लगतीं थी. छात्रों के बीच "दुनिया" पर चर्चा होने लगती. ऐसी दुनिया जिससे आयुष यहाँ आने तक पूरी तरह अनजान था.

"अरे यार, तुझे मेरे दोस्त अमित की बहन का फोटो दिखाता हूँ?" राजन ने चारपाई पर पलटते हुए कहा, “क्या क्लासिक ब्यूटी है."

"ब्यूटी क्या होती है, असली देखी है कभी?" विजय ने कहा" फिल्मों हीरोइनें ही तो ब्यूटी हैं."

आयुष चुपचाप लेटा सब सुन रहा था. उसके लिए "लड़की" शब्द अब तीन हिस्सों में बंट गया था.

एक, स्कूल की ऊँची दीवारों से दूर वाली एक अमूर्त अवधारणा. जिसकी भाषा उसे नहीं आती थी.

दो, होस्टल की अंधेरी कोरिडोरों और शौचालयों की दीवारों पर लिखे गंदे किस्से और फोन नंबर. जिनकी लड़की एक रहस्य थी, एक पाप, एक गुप्त कोड.

तीन, उसकी बहन शगुन, जिसकी पीठ पर बैठ वह घोड़ा-घोड़ा खेलता था. पर अब उसकी घर की यादें पुराने एलबम की तस्वीर जैसी फीकी पड़ रही थी. उनके बीच का अंतिम सार्थक बात कब हुई थी? शायद उस दिन जब उसने शगुन की गुड़िया लौटाई थी. उसके बाद केवल गर्मियों की छुट्टियों की औपचारिक बातें ही रह गई थीं. अब वह सोलह की है. वह कैसी होगी? उसे कुछ भी पता नहीं था.

"सुनो आयुष," राजन ने रोबदार अंदाज में कहा, "तूने कभी किसी लड़की से बात की है? असली वाली से?"

सवाल सुनकर आयुष का दिमाग़ खाली हो गया. "बात?" उसने कहा, "मेरी... बहन से मैंने खूब बातें की हैं."

कमरे में एकाएक ठहाका फूट पड़ा. "अरे यार, बहन नहीं! बहन तो परिवार वाली होती है. असली लड़की. जैसे किसी दोस्त की बहन. या... कोई और."

आयुष के पास कोई जवाब नहीं था. उसके पास "असली" का कोई अनुभव नहीं था. उसकी पूरी जानकारी सुनी सुनाई थी. फिल्मी गानों, दोस्तों की डींगों और दीवारों पर लिखे शब्दों से मिली हुई. एक दिन विजय ने अपने फोन पर एक फोटो दिखाई, "देखो, मेरे बड़े भाई की गर्लफ्रेंड."

लड़कों का झुंड उस छोटी सी स्क्रीन के इर्द-गिर्द जमा हो गया. आयुष भी झाँका. तस्वीर में एक लड़की बिलकुल फेशनेबल कपड़ों में पेड़ के सहारे खड़ी थी.

"वाह! क्या फिगर है!"

"ऐसी गर्लफ्रेंड मिले तो जिंदगी बन जाए!"

आयुष ने ध्यान से देखा. लड़की के चेहरे पर एक भाव था, शायद खुशी का. पर झुंड की टिप्पणियों ने उस भाव को नष्ट कर दिया. वह तस्वीर अब एक "फिगर" बन गई थी. एक मापदंड. किशोर बच्चों की गोसिप्स का विषय.

रात को, जब बातें शांत हो गईं, आयुष ने अपनी आँखें बंद कीं. उसे शगुन याद आई. उसे याद आया कि कैसे उसने चाचा के जाने के बाद उसकी गुड़िया उसे लौटा दी थी, और कैसे अगले दिन उससे दूरी बना ली थी. अगर शगुन की तस्वीर किसी लड़के के फोन में होती तो? क्या वह भी ऐसी ही टिप्पणियों का विषय बनती?

एक अजीब सी ग्लानि ने उसे घेर लिया. उसने सोचा, "हम लड़कियों के बारे में कुछ नहीं जानते. बस, बातें बनाते हैं. और ऐसे ही एक काल्पनिक दुनिया गढ़ लेते हैं."

उसकी यह सोच अकेलेपन में दब गई. अगली सुबह दर्पण के सामने यूनिफॉर्म में खड़े आयुष ने अपने कंधे सीधे किए। शीशे में वह खुद को नहीं, अपनी नई भूमिका को देख रहा था. एक ऐसी भूमिका जिसमें अभिनेता की खुद की आवाज़ दब रही थी। उसकी दुनिया में लड़कियाँ केवल तस्वीरें, किस्सों और दीवारों पर लिखे नंबर थीं। वह सोच रहा था की जेलें भी स्कूल और होस्टल जैसी ही होती होंगी. आयुष को फिलहाल उसी हवा में सांस लेनी थी.    ... क्रमशः 

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

बीज

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

शगुन चार बरस की होने को थी. दीवाली के पहले पापा कपड़े खरीद कर लाए. उसके लिए एक खूबसूरत गुलाबी चमकदार फ्रॉक थी जिस पर मखमली कपड़े के बने फूल लगे थे. उसे पसंद आई थी. लेकिन उसने उसे छूकर छोड़ दिया. गर्मियों में जब मामा के घर थी तब मामा भी उसके लिए फ्रॉक ही लाए थे और मुन्नू भैया के लिये टी शर्ट और पैंट. मुन्नू भैया उन कपड़ों में बहुत सुन्दर लग रहे थे. तब उसने लौट कर पापा से कहा भी था कि उसे भी टी शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा फिर फ्रॉक ले आए. वह रूठ गयी कि उसे तो शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा ने उसे मनाते हुए कहा था. पैंट शर्ट लड़कों की ड्रेस है उसमें वह अच्छी नहीं लगेगी. लड़कियाँ तो फ्रॉक में ही सुन्दर सजीली लगती हैं. उसे नहीं मनाया जा सका तो उन्होंने कोशिश छोड़ दी और मम्मा से कहा कि इसे समझाओ, ऐसी जिदें ठीक नहीं. शगुन को पहली बार समझ आया कि : कुछ चीजें लड़कियों के लिए नहीं हैं.

सात साल की होते होते, उसके पास दो दुनियाएँ थीं एक घर के दरवाजे के अन्दर और एक बाहर. बाहर की दुनिया में उसका दखल सीमित था. जबकि एक तरफ छोटा भाई आयुष था, जो शाम को मैदान में खेल रहे लड़कों के पास जा बैठता और उन्हें देखता. जब भी उसे मौका मिलता वह फुटबॉल को किक मारता. दूसरी तरफ वह थी, दादी रंगोली के डिब्बे लाकर उससे बोलती-"चलो, तुम्हें रंगोली बनाना सिखाऊँ. खूबसूरत बनाओगी तो सब की प्रशंसा मिलेगी. लड़कों का क्या, उनके लिए सड़कों-मैदानों की धूल और कीचड़ ही भले हैं. अभी आयुष धूल-मिट्टी में सन कर आएगा और मम्मा की डाँट खाएगा उसे ठंडे पानी से हाथ पैर धोने पड़ेंगे तब नानी याद आ जाएगी."

शगुन ने रंगों के डब्बे थाम लिए और रंगोली बनाना सीखा. बाहर से आयुष की खिलखिलाहट आती. उसने सीखा: खूबसूरती गढ़ना उसका काम था और उसकी जगह घर के भीतर थी.

आठ बरस की उम्र में उसने 'हक' का पहला पाठ पढ़ा. दिवाली पर माँ ने बेसन के लड्डू बनाए. पहला लड्डू आयुष की थाली में रखा गया.

"लड़का है, पहले उसका हक बनता है," चाचा ने कहा, जैसे कोई पुराना नियम सुना रहे हों.
दूसरा लड्डू शगुन को मिला. मिठाई तो एक जैसी थी, पर वह पल उसे अलग कर रहा था. उसने सीखा: उसका हक... दूसरे नंबर पर आता है.

वह नौ की हुई. उसे गुस्सा आया तो उसने ऊँची आवाज में कह दिया, "मैं नहीं करुँगी!"

माँ ने फौरन उसे तीखी आवाज में उसे डाँटा, "शगुन! इतनी तेज़ आवाज़? तुम्हें शर्म नहीं आती इतना जोर से बोलते हुए? लड़कियाँ ऐसे नहीं बोलतीं. उन्हें आहिस्ता बोलना चाहिए. उसकी आवाज़ पर लगाम कस दी गई.

उसी हफ्ते आयुष किसी बात पर चिल्लाया, तो पापा ने मम्मा से कहा, "देखो, कितना जोश है बेटे में!"

शगुन ने सीखा: उसकी आवाज़ का स्वर कोमल और धीमा होना चाहिए. उसका गुस्सा 'अशोभनीय' था, जबकि भाई का गुस्सा 'जोश'.

ग्यारह बरस की उम्र में उसने आयुष की साइकिल ली और चलाना सीखने लगी. उस का संतुलन बिगड़ा और वह गिर पड़ी, घुटने में खरोंच आ गई. उसका पायजामा घुटने पर से रगड़ खाने से फट गया और पता नहीं कैसे उसी समय कुर्ता भी कंधे के यहाँ से उधड़ गया, उसका कंधा दिखने लगा.

पिता खबर मिलते ही दौड़े आए, चेहरे पर चिंता थी. पर चिंता के साथ आया एक वाक्य जो चोट से ज्यादा गहरा था: "देखो, इसीलिए कहता था, लड़कियों को ये सब नहीं करना चाहिए. खतरा होता है."
फौरन डिस्पेंसरी ले जाया जाता उसके पहले मम्मा ने यह कहते हुए कि उसका कंधा दिख रहा है, उसके कपड़े बदलवा दिए. उसके घुटने पर पट्टी कराई गयी, एटीएस इंजेक्शन लगा और खाने को दवाएँ दी गयीं. साइकिल चलाने की अनुमति जो कभी उसे नहीं मिली थी, उससे छिन गई.

उसने सीखा: 'सुरक्षा' के नाम पर लड़कियों की दुनिया सिकुड़ी हुई होती है. उसकी हिम्मत, उसकी जोखिम उठाने की क्षमता का कोई अर्थ नहीं. उस पर सभी लड़कियों की तरह एक लेबल चिपकी थी : 'नाजुक' और उसके शरीर के हिस्से नहीं दिखने चाहिए.

बारहवाँ साल चल रहा था. एक दोपहर वह माँ के साथ किचन में बैठी थी, आलू छील रही थी. एक सहज प्रश्न उसके मन में उठा. वह पूछ बैठी, मम्मा कभी साइकिल चलाई है, तुमने?

काम करती हुई माँ के हाथ रुक गए. एक पल को वह चुप रह गयी, फिर बिना शगुन की ओर देखे, धीरे से बोलीं, "नहीं बेटा... हमारे ज़माने में तो लड़कों को भी साइकिल नहीं मिलती थी. हमारे तो वह सपने में भी नहीं थी."

फिर माँ ने तुरंत टॉपिक बदल दिया, "ये लो, आलू छील लो, तो प्याज़ भी काट देना."

उस पल शगुन को एक झटका-सा लगा. यह सिर्फ उसके लिए नहीं था. ये नियम... ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे, वे एक विरासत थे. परिवार और समाज जिन्हें चुपचाप नयी पीढ़ी को सौंप देता था. इस विरासत में डर, सीमाएँ और 'नहीं' शब्द भरे हुए थे. उसकी माँ भी इसी कंडीशनिंग का उत्पाद थीं, और अब अचेतन में, उसी विरासत को आगे बढ़ा रही थी.

शाम को अपने कमरे में, शगुन छोटे से आईने के सामने खड़ी हुई. उसमें वह बच्ची नहीं दिख रही थी जिसे रंगोली बनाना अच्छा लगता था. एक नई चेतना की किरण उसकी आँखों में थी. उसे एहसास हो रहा था कि उसका जीवन एक पूर्व-लिखित पटकथा का हिस्सा था, जिसके संवाद उसे बचपन से ही प्यार, डाँट, चिंता और परंपरा के माध्यम से याद करा दिए गए थे.

लड़कियाँ ऐसे नहीं करतीं.

तुम्हारे लिए यह ठीक नहीं.

शर्म नहीं आती?

वह आईने में अपनी परछाईं से आँख मिलाती रही. उसके भीतर एक सवाल ने जन्म लिया, धीमा पर स्पष्ट: "क्या मैं इस पटकथा को ही याद करती रहूँगी... या खुद इसे दोबारा लिख सकती हूँ?"


आईने में उसकी छवि मुसकुराई नहीं. बस, एक गहरी, शांत जिज्ञासा से देखती रही. अंकुरण के लिए छटपटा रहा एक बीज न जाने कहाँ से आ गया था. अब वह अंकुराएगा या उसे दबा दिया जाएगा? यह भविष्य के गर्भ में छिपा था.     
                                                                                                                                       ...   क्रमशः