लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
आयुष को आए चार दिन हो चुके थे. घर का माहौल अभी असामान्य था. पापा हमेशा की तरह सुबह नौ बजे बैंक के लिए निकल जाते, फिर रात के आठ-नौ बजे तक घर लौटते. वे परिवार को अधिक समय नहीं दे पाते थे. घर के मामलों में चाचा बिना पूछे भी अपनी राय देते रहते. सुबह चाय पर उन्होंने फिर यही कहा, "अब आयुष आ गया है, सब ठीक हो जाएगा." पर आयुष खुद जान रहा था कि कुछ भी "ठीक" नहीं हुआ था. शगुन अब भी रोज दुपहर खाना खाने के बाद साइकिल उठा पुस्तकालय जाती और शाम को 4-5 बजे लौटती. उसकी आँखों में स्थिरता थी, जो आयुष को बेचैन कर देती.
दोपहर होने को थी. आयुष कहीं गया हुआ था. शगुन लिविंग रूम में बैठी "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप" पढ़ रही थी. तभी दरवाज़े की घंटी बजी, शगुन ने दरवाजा खोला. प्रकाश और विनय सामने खड़े थे. दोनों आयुष के बोर्डिंग जाने के पहले के दोस्त थे. उनका और आयुष का मिलना तभी होता जब वह बोर्डिंग स्कूल से छुट्टियों पर घर लौटता.
शगुन ने मुस्कुराकर अंदर आने का इशारा किया. "वह बाहर गया है, अभी आता होगा. तुम बैठो."
वे अंदर आए. विनय की नज़र शगुन के हाथ में पकड़ी किताब पर पड़ी. "यह किताब...?" उसने पूछा.
शगुन ने बेहिचक कहा, "पढ़ रही हूँ. लड़कों के मनोवैज्ञानिक पिंजरे पर है. तुमने पढ़ी है?"
विनय हँसा. "नहीं, हम तो ऐसी किताबें देख कर छोड़ देते हैं. वे बड़ों के पढ़ने लायक हैं. मैं तो इसे आपके हाथ देखकर ही चकित हूँ. आप पढ़ रही हैं, तो बता सकती हैं कि इसमें क्या है?
प्रकाश ने टोका, "अरे यार, लड़कियाँ ऐसी किताबें पढ़ती हैं क्या?"
शगुन ने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "लड़कियाँ वह सब पढ़ सकती हैं जो लड़के पढ़ते हैं. बल्कि, हर कोई वह पढ़ सकता है जो वह समझना चाहता है. मैं यह जानना चाहती हूँ कि क्यों इंसानों को 'पुरुषत्व' और 'नारित्व' के पिंजरों में बाँध देते हैं."
विनय ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया. प्रकाश चुप रह गया.
तभी आयुष आ गया. दरवाज़े से ही उसने दोस्तों की आवाज़ें सुनीं, और फिर शगुन का स्पष्ट, दृढ़ स्वर. वह तेजी से लिविंग रूम में आया. दोस्तों को देखकर उसका चेहरा खिला, पर शगुन को उनके साथ बैठे, आँख मिलाकर बात करते देखकर उसकी भौंहें तन गईं. उसने हमेशा चाहा था कि शगुन दूसरों के सामने "विनम्र" बनी रहे. पर आज वह दोस्तों के सामने ऊँचाई से बात कर रही थी.
"चलो, बाहर चलते हैं," आयुष ने जल्दी से कहा, जैसे शगुन की मौजूदगी उसे असहज कर रही हो.
वे तीनों शहर के एक छोटे से कैफ़े में बैठे. प्रकाश ने चाय मंगाई. आयुष चुपचाप बैठा था, मन ही मन शगुन के उस सवाल को दोहरा रहा था, "क्यों बाँध देते हैं पिंजरों में?"
"दीदी तो कमाल की है यार," प्रकाश ने कहा. "इतना कॉन्फिडेंस! पहले तो वह बात करते हुए भी शर्माती थी."
आयुष ने चाय का कप थामा. "वो बस... जिद्दी हो गईं है. समय के साथ."
विनय ने सीधे आयुष की आँखों में देखा. "जिद्दी नहीं, आयुष. मुझे तो वे साहसी लगीं. मैंने उन्हें बाज़ार में देखा था. साइकिल पर, अकेली, और बिल्कुल निडर. तेरे चाचा उसे रोकते होंगे, पर वो नहीं रुकतीं. उनके पास एक लक्ष्य है."
"लक्ष्य?" आयुष ने पूछा, आवाज़ में एक खीझ थी.
"हाँ. वो आगे पढ़ना चाहती है. मैंने सुना है वो दिल्ली की यूनिवर्सिटी जे.एन.यू. और बनस्थली विद्यापीठ जैसी जगहों के बारे में पूछताछ कर रही हैं."
आयुष का दिल धक से रह गया. जे.एन.यू. और बनस्थली? दूर? अकेले? उसके मन में तुरंत विरोध के शब्द उभरे, पर वह चुप रहा.
"लोग क्या कहेंगे?" आयुष ने अंततः कहा, अपनी ठंडी चाय को देखते हुए.
"लोग वही कहेंगे जो हमेशा से कहते आए हैं, "विनय ने शांत स्वर में कहा. "पर सवाल यह है कि तू क्या चाहता है? क्या तू चाहता है कि शगुन डरकर जिए, या जिए जैसे वह जीना चाहती है? और तू खुद... तू क्या चाहता है? तेरा स्ट्रीम का फैसला हुआ? तू तो साइंस ही ले रहा है न?"
आयुष ने कोई जवाब नहीं दिया. उसे एहसास हुआ कि उसके अपने दोस्त भी उसकी सोच से आगे निकल रहे हैं. वे शगुन को सम्मान से देख रहे थे, न कि कमजोरी या अवज्ञा से.
शाम को वे लौटे. शगुन बरामदे में साइकिल की चेन साफ़ कर रही थी. उसने दोस्तों को अलविदा कहा, फिर आयुष से पूछा, "सब ठीक रहा?"
आयुष ने हाँ में सिर हिलाया. फिर अचानक पूछ बैठा, "तू... जे.एन.यू. और बनस्थली के बारे में सोच रही है?"
शगुन ने रुई का टुकड़ा हाथ में रोककर कहा, "हाँ. क्या हुआ? जे.एन.यू. देश की सबसे बेहतर यूनिवर्सिटी है. वहाँ विदेश से भी विद्यार्थी पढ़ने आते हैं. और बनस्थली में तो सिर्फ लड़कियाँ होती हैं. घुड़सवारी सिखाते हैं, जहाज उड़ाना सिखाते हैं... और आज़ादी सिखाते हैं."
"पर वे बहुत दूर है."
"दोनों ही इतने दूर नहीं. अधिक से अधिक 7-8 घंटों में दोनों ही जगह पहुँचा जा सकता है. फिर दूर होना बुरा नहीं होता, भाई. कभी-कभी दूर जाने से ही हम खुद के पास लौट पाते हैं."
आयुष कहना चाहता था, "तू नहीं जा सकती. मैं नहीं होने दूंगा." पर वाक्य उसके गले में अटक गया. शगुन की आँखें सीधी थीं, उनमें लेश मात्र भी डर नहीं था, बल्कि वह अटल विश्वास से भरी हुई थी.
"तूने चाचा को बताया?" आयुष ने अंततः पूछा.
"अभी नहीं. पहले मैं खुद तो पूरी तरह तैयार हो लूँ. और तुम्हें भी इस साल अपनी स्ट्रीम तय करनी है तुमने कुछ सोचा कि नहीं?" यह कहकर शगुन अंदर चली गई. वह देखता रह गया.
रात में आयुष ने वह किताब उठाई, "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप". उसने पहला अध्याय खोला; "डर: मर्दानगी का सबसे मजबूत ताला".
उसे विजय का वाक्य याद आया, "तेरा डर तेरी कैद है."
और शगुन का वाक्य, "दूर जाने से ही खुद के पास लौट पाते हैं."
बाहर बरामदे में शगुन की साइकिल खड़ी थी. आयुष ने खिड़की से देखा. चाँदनी में उसके पहिए चमक रहे थे, जैसे कह रहे हों: "हम घूमते रहेंगे. तुम चाहो या न चाहो. तुम रुक सकते हो, पर हम नहीं."
उसने किताब बंद की. आज पहली बार उसे लगा कि शगुन को "नियंत्रण" में करना उसके बस में नहीं, उसे समझना ज्यादा ज़रूरी है.
पर वह कहाँ से शुरू करे? इस सवाल का उत्तर अभी उसके पास नहीं था.
दोनों भाई बहनों का रिजल्ट आने वाला था. इस साल उसे स्ट्रीम चुनना था. साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स और शगुन को कॉलेज?
दोनों के लिए यह फैसले की घड़ी थी. शगुन बाहरी दुनिया की ओर जा रही थी, और वह अपने भीतर के किले में वापस लौटना चाहता था.