पिंजरा और पंख-44
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
शगुन और आयुष के वाक् साहस ने अनिल चाचा के मन को गहरा आघात दिया था. अगली सुबह ही आयुष की आईआईटी-जी में सफलता की सूचना ने उन्हें गर्व से भर दिया. ऑफिस के लिए घर से निकले, रास्ते में पान की दुकान पर, फिर ऑफिस में उन्होंने आयुष की सफलता का गर्व से उल्लेख किया. जल्दी ही यह सफलता रामगंजमंडी जैसे छोटे शहर का गर्व बन गई. गुप्ता परिवार के घर बधाइयों का ताँता लग गया.
काउंसलिंग 18 से 22 जून तक थी. आयुष को 19 जून को आईआईटी दिल्ली पहुँचना था. गुप्ताजी और आयुष 18 जून की शाम दिल्ली के लिए ट्रेन में बैठ गए. अगले दिन आईआईटी दिल्ली में मूल दस्तावेजों की जाँच हुई, आयुष ने सेंटर एलॉटमेंट के लिए चॉइस शीट भरी और उसी शाम उन्होंने वापसी की ट्रेन पकड़ ली.
अब आयुष को जिज्ञासा थी कि उसे किस ब्रांच में और कहाँ प्रवेश मिलता है? वह रोज वेबसाइट देखता. 29 जून को काउंसलिंग का परिणाम आया. उसे इच्छित ब्रांच कंप्यूटर साइंस एण्ड इंजीनियरिंग (सीएसई) मिल गयी थी. लेकिन उसे गुवाहाटी आईआईटी में प्रवेश मिला था. उसके लिए यह केवल आईआईटी प्रवेश की सूचना नहीं थी, बल्कि एवरेज के ठप्पे से सदा के लिए बाहर निकल जाने का प्रमाण पत्र था. उसे एक नयी दिशा मिली थी. आयुष ने अपना एलॉटमेंट लेटर डाउनलोड करके प्रिंट किया. गुवाहाटी जाने की सूचना से मम्मा और चाची उदास हो गयी. अब आयुष को पढ़ाई के लिए बहुत दूर जाना पड़ेगा. वह साल में दो- एक बार ही मुश्किल से घर आ सकेगा.
गुप्ताजी ने आयुष का एलॉटमेंट लेटर देखा और धीरे से उसे मेज पर रख दिया. उनकी आँखें पुत्र की सफलता से सजल हो गयीं. लेकिन उनमें बेटे के घर से दूर एक अनजान शहर में विद्या अध्ययन के लिए जाने का डर भी था. पत्नी की चिन्ता के जवाब में उन्होंने यही कहा, “कोई बात नहीं कैम्पस में ही तो रहना है. फिर फोन है, रोज बात की जा सकती है.”
अब तक अनिल चाचा की आयुष और शगुन से नाराजगी कम हो चुकी थी. धीरे-धीरे वे समझने लगे थे कि पुत्रेच्छा ने उन्हें उतावला बना दिया था. अगले स्वस्थ बच्चे के लिए उन्हें अभी कम से कम दो वर्ष रुकना ही होगा. उन्होंने तत्काल स्टेशन जाकर पता किया कि गुवाहाटी के लिए कोटा से सीधी साप्ताहिक ट्रेन है, गुप्ताजी से सलाह करके दोनों का जाने का और गुप्ताजी का वापसी का रिजर्वेशन भी करवा आए. अब दोनों को 15 जुलाई रविवार सुबह कोटा से निकलना था, उससे पहले 2 जुलाई को शगुन को बनस्थली छोड़ने जाना था.
बनस्थली जाने से एक दिन पहले शगुन ने सहेज कर रखा हुआ आयुष का पुराना 'संबल' वाला रजिस्टर निकाल कर उसे दिया.
"इसे गुवाहाटी साथ लेकर जाना आयुष," शगुन ने कहा. "आईआईटी में तुम्हें बहुत तेज़ दिमाग मिलेंगे, लेकिन याद रखना, वहां जाकर केवल 'मशीन' नहीं बन जाना है. जो संवेदनशीलता तुमने यहाँ सीखी है, उसे वहां भी सहेज कर रखना."
"दीदी, अगर आप नहीं होतीं, तो शायद मैं आज किसी गुमनाम से कॉलेज में अपनी किस्मत को कोस रहा होता. आपने मुझे केवल पढ़ना ही नहीं, मुश्किलों से लड़ना भी सिखाया है." शगुन ने देखा आयुष की आँखें नम थीं.
अगली सुबह घर से निकलते समय दरवाजे पर खड़ी चाची ने हाथ हिला कर शगुन को विदा करने लगी तो उनकी गोद में नन्ही मुक्ति भी अनुसरण करते हुए मुस्कुराई और अपना हाथ हिलाया. कार में बैठते समय शगुन ने खिड़की से बाहर देखा—रामगंजमंडी की वही धूल भरी सड़कें अब उसे छोटी लग रही थीं. उसे पता था कि एक साल बाद जब वह बीएससी करके लौटेगी, तो घर के समीकरण बदल चुके होंगे. कार फिर से हाईवे पर थी. इस बार इस यात्रा में पापा-मम्मा के साथ आयुष भी था.
बनस्थली विद्यापीठ पहुँचे तो एक बज चुके थे. गेट रजिस्टर पर प्रवेश पंजीकरण के बाद वे सीधे शगुन के हॉस्टल शांता निकेतन गए. शगुन अपने कमरे में जाकर सामान रख आई, मम्मा मदद के लिए साथ गई. आयुष और पापा को रिसेप्शन में ही रुकना पड़ा. गेस्ट हाउस में कमरा लेकर सामान रखा. वहीं कैंटीन में भोजन किया. शगुन बोली, “पापा आपने ड्राइव किया है, थके हैं तो आप सब आराम करें तब तक मैं ऑफिस जाकर फीस जमा करके लौटती हूँ.”
“मैं भी साथ चलूँ दीदी? इस बहाने विद्यापीठ देख लूंगा.”
ऑफिस करीब आधा किलोमीटर दूर था. दोनों पैदल गए. वहाँ सब ओर लड़कियाँ और महिलाएँ नजर आईँ. पुरुष बस इक्का-दुक्का दिखे. आयुष को फौरन अपने बोर्डिंग स्कूल और होस्टल की याद आए. जहाँ केवल पुरुष ही पुरुष थे, सफाई आदि के लिए इक्का-दुक्का महिलाएँ ही दिखती. वह भी सामान्य नहीं था और यह भी. दोनों ही शिक्षा के साथ संस्कारित करने का दावा करते थे. लेकिन दोनों खूबसूरत नामों वाले बन्दीघर थे. जिनमें पितृसत्ता को सुरक्षित रखने की ठीक-ठीक व्यवस्था थी. उसे तत्काल आईआईटी गुवाहाटी का खयाल आया, क्या वहाँ भी सब ऐसा ही होगा?
ऑफिस का काम निपटा कर शगुन ने उसे विद्यापीठ का हवाई अड्डा दिखाया. वहाँ एक छोटा हवाई जहाज भी खड़ा था. फिर वे हॉर्स ग्राउंड गए जहाँ छात्राएँ घुड़सवारी सीखती थीं. रास्ते में पड़ती इमारतों के बारे में शगुन बताती जाती थी कि वे हॉस्टल हैं या इन्स्टीट्यूट हैं, या फिर कर्मचारियों के आवास. घूमते हुए जब वे थक गए तो वापस लौटे. रास्ते में सड़क और हॉस्टलों की कतार के मध्य लगे वृक्षों के बीच एक अस्थायी स्ट्रक्चर दिखाई दिया. आयुष के पूछने पर शगुन ने बताया कि ये होस्टलों के बीच कुछ कैंटीन बनाए गए हैं. जिनमें खाने पीने की वस्तुएँ मिल जाती हैं. फिर शगुन उसे उस कैंटीन तक ले गयी. दोनों ने वहाँ कॉफी का आर्डर दिया. आयुष को देख एक लड़की ने शगुन से आँखों के इशारे में आयुष के बारे में पूछा. शगुन ने बताया कि भाई है, इसे आईआईटी गुवाहाटी में सीएसई ब्रांच में प्रवेश मिला है. लड़कियों ने आयुष से ‘हाय’ बोल कर अभिवादन किया.
कैंटीन की कॉफी पीकर वे वापस गेस्ट हाउस पहुँचे. मम्मा-पापा तैयार थे. शगुन को हॉस्टल छोड़ कर वे वापस मंडी के लिए रवाना हो गए.
... क्रमशः
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