@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: वैचारिक आग

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

वैचारिक आग

पिंजरा और पंख-30
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
आयुष के जाने के बाद कमरा अचानक बड़ा लगने लगा. कल तक यह कमरा दो दोस्तों की वैचारिक दुनिया था, जहाँ वे चाचा के पुराने ख्यालों का मजाक उड़ाते थे और अपने सपने बुनते थे. अब वहां सिर्फ सन्नाटा था, जिसे नीचे लिविंग रूम से आती चाचा की ऊँची आवाज बार-बार तोड़ रही थी.

लिविंग रूम में फिर से 'पवित्रता' और 'अनुमान' लौटने लगे थे. चाचा किसी पंडित से फोन पर बात कर रहे थे, "हाँ महाराज, पितृदोष है तो क्या हुआ? आप तो बस उपाय बताइए जिससे कुल का वारिस सुरक्षित रहे. पिछली बार की गलती नहीं दोहरानी है."

शगुन के कान खड़े हो गए. 'पिछली बार की गलती'—चाचा का मतलब साफ था कि वे लड़कियों के जन्म को 'गलती' मानते थे. उसके मन में कड़वाहट उभर आई. वह अपनी किताब बंद की कर बाहर निकल आई.

रसोई में चाची को आज फिर एक विशेष काढ़ा पिलाया जा रहा था. मम्मी पास खड़ी थीं, उनकी आँखों में दुविधा थी पर वे कुछ बोल नहीं रही थीं.


"चाची, यह क्या है?" शगुन ने पास आकर पूछा.

"बेटा, तेरे चाचा लाए हैं. कहते हैं इसे पीने से गर्भ पुष्ट रहता है और... संतान तेजस्वी होती है," चाची ने बुझे हुए स्वर में कहा.

शगुन ने प्याले की गंध सूंघी. वह किसी जड़ी-बूटी जैसा तीखा और अजीब था. "चाचा, आप बिना किसी डॉक्टरी सलाह के यह क्या पिला रहे हैं?"

रसोई की दहलीज पर खड़े चाचा अपनी भौंहें सिकोड़कर बोले, "शगुन, हर चीज डॉक्टर की सलाह से नहीं चलती. यह पीढ़ियों का तजुरबा है. तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, घरेलू मामलों में दखल मत दो."

"घरेलू मामला या अंधविश्वास, चाचा?" शगुन का स्वर ऊंचा हो गया. "आप चाची की सेहत के साथ खेल रहे हैं सिर्फ इसलिए कि आपको 'दीपक' चाहिए? अगर इस काढ़े से चाची को कुछ हो गया तो?"

चाचा ने गुस्से में लिविंग रूम में अखबार पढ़ रहे बड़े भाई की ओर देखा. "भाई साहब, देखिए शगुन को! कैसे जुबान लड़ा रही है? कल तक ठीक थी, आयुष को कोटा छोड़कर आने के बाद से इसके तेवर ही बदल गए हैं. आप चुप क्यों हैं?"

गुप्ताजी ने अखबार नीचे किया. शगुन को लगा कि शायद वे फिर 'घर की शांति' वाला राग अलापेंगे. लेकिन दरा में किया वादा उनके भीतर कहीं जाग रहा था. उन्होंने चश्मा उतारा और शांत स्वर में कहा, "अनिल, शगुन ने सही कहा. बिना डॉक्टर से पूछे ऐसी चीजें देना ठीक नहीं है. नीतू को आराम की जरूरत है, इन सब प्रपंचों की नहीं."

रसोई में सन्नाटा छा गया. यह पहली बार था जब गुप्ताजी ने अनिल चाचा की 'विशेषज्ञता' को नकारा था. चाचा का चेहरा तमतमा उठा. उन्हें लगा जैसे उनके किले की एक ईंट खिसक गई हो. वे बिना कुछ कहे जूते पहनकर पैर पटकते हुए घर के बाहर निकल गए. उनके जूतों की आवाज घर के तनाव को बयान कर रही थी.

चाचा के जाने के बाद दीवार से लगकर खड़ी मम्मा काँपते हाथों से आटा ढँकने लगी. उनकी आँखों में गहरा डर था. चाची उनके कमरे में चली गईं. मम्मा शगुन खींचकर एक कोने में ले गयीं.

"यह क्या किया तूने शगुन? क्यों बात को इतना बढ़ा दिया?" उनकी आवाज़ दबी हुई थी, जैसे दीवारें भी सुन रही हों.

शगुन ने हैरानी से माँ को देखा, "माँ, आप देख रही थीं कि वे चाची को बिना डॉक्टरी सलाह के क्या पिला रहे थे. क्या आप चाहती थीं कि मैं चुप रहूँ?"

"अरे बेटा, घर-गृहस्थी में इतना तो चलता है," सरोज ने माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए कहा. "तू तो अगले महीने बनस्थली चली जाएगी. आज चाचा के अहंकार को चोट लगी है. वे इसका बदला चाची पर निकालेंगे. उन्हें ताने देंगे, उन्हें तंग करेंगे. तेरे जाने के बाद यहाँ शांति नहीं, एक अंतहीन क्लेश बचेगा."

सरोज का यह 'भीरु तर्क' शगुन के भीतर तेजाब की तरह उतरा. उसे समझ आया कि इस घर में अन्याय केवल चाचा नहीं कर रहे थे, बल्कि माँ की 'मौन सहमति' और 'डर' भी उस अन्याय को से रहा था.

शगुन माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर दृढ़ता से बोली, "माँ, ऐसी 'शांति' कुछ नहीं बदलेगा. चाचा तो अभी भी चाची को कर रहे हैं—मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से. बस फर्क इतना है कि चाची अकेली सह रही थीं, अब उन्हें पता है कि कोई उनके हक के लिए खड़ा हो सकता है."

"तू नहीं समझेगी. हम औरतें ससुराल में अपनी मर्जी से नहीं, अपनी किस्मत से आती हैं. और किस्मत से लड़ना महंगा पड़ता है."

"माँ, किस्मत से नहीं, हम उस सोच से लड़ रहे हैं जो खुद को बेबस मानने पर मजबूर करती हैं," शगुन ने अंतिम वार किया. "मैं बनस्थली जाने से पहले चाची को इतना मजबूत बनाकर जाऊँगी कि वे खुद अपने लिए खड़ी हो सकें. लड़ना महंगा पड़ता है माँ, लेकिन घुट-घुट कर जीना उससे भी ज्यादा महंगा है."

सरोज चुप हो गई, उसके पास शगुन के इस 'प्रत्यक्ष' तर्क का कोई उत्तर नहीं था. उसे लगा जैसे उसकी अपनी बेटी उससे कई साल बड़ी हो गई है. शगुन ऊपर चली गई, पर उसने महसूस किया कि उसकी अनुपस्थिति में चाची का कवच और भी मजबूत होना चाहिए.

शगुन चाची को लेकर अपने कमरे में आई. उन्हें बिस्तर पर बैठाया, उनकी आँखों में आंसू थे.

"शगुन, तू क्यों लड़ती है इनसे? ये नहीं बदलेंगे," चाची ने सिसकते हुए कहा.

शगुन ने चाची के हाथ थाम लिए. "बदलना तो पड़ेगा चाची. अगर आज हम नहीं बोले, तो आने वाली संतान भी इसी घुटन में पैदा होगी. अगर वह लड़की हुई, तो उसे जन्म से पहले ही 'गलती' मान लिया जाएगा, और अगर लड़का हुआ, तो उसे 'मर्दानगी' के पिंजरे में कैद कर दिया जाएगा. मैं नहीं चाहती कि आयुष की तरह कोई और बच्चा भी सिर्फ 'वारिस' बनने के लिए जिए."

चाची ने शगुन को गौर से देखा. उन्हें लगा जैसे उनके सामने शगुन नहीं, बल्कि वह हिम्मत खड़ी है जो वे खुद कभी नहीं जुटा पाईं.

रात को जब शगुन सोने के लिए लेटी, तो उसे महसूस हुआ कि अब वह अकेली नहीं है. पापा का साथ मिलना एक छोटी जीत थी, लेकिन वह जानती थी कि असली लड़ाई अभी बाकी है. रात गहरा गयी थी, और उस पुराने घर की दीवारों में अब 'मर्यादा' के पहरों के खिलाफ एक वैचारिक आग सुलगने लगी थी.
 ... क्रमशः

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