पिंजरा और पंख-28
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
रामगंजमंडी की दोपहर अब और भी बोझिल होने लगी थी. सूरज तपने लगा था. दिन में कई बार धूल के बरबूले चक्कर काटते हुए निकल जाते, पीछे धूल और बहुत सारी गंदगी छोड़ जाते. रविवार था, लेकिन किसी की हिम्मत दिन भर घर से बाहर जाने की न हुई थी. घर में एक अजीब सी उत्तेजना और सावधानी का माहौल था. चाची, जो अब तक घर के कामकाज में एक मशीन की तरह जुटी रहती थीं, अब सबकी विशेष निगरानी में थीं. कारण केवल यह नहीं था कि वह गर्भवती थीं, बल्कि कारण वह 'उम्मीद' थी जिसे अनिल चाचा, मम्मी और पापा ने अपने मन में पाल रखा था.
ड्राइंग रूम में चाचा अपने किसी मित्र से फोन पर बात कर रहे थे, "हाँ भाई, इस बार पक्का उम्मीद है कि वंश आगे बढ़ेगा. पिछली बार तो... खैर, इस बार मैंने ज्योतिषी से भी सलाह ली है."
बैठक में गुप्ता जी अखबार के पीछे छिपे थे. वे जानते थे कि अनिल जो कह रहा है, वह घर की शांति के लिए मानना पड़ेगा. छोटे भाई की फोन पर कही बात पर उन्होंने चश्मा उतारकर बस इतना ही कहा, 'अनिल, संतान तो ईश्वर की देन है, चाहे जो भी हो, उसे बस अपना प्यार और सही संस्कार मिलें.' चाचा ने तुरंत टोकते हुए कहा, 'भाई साहब, संस्कार तो ठीक हैं, पर समाज में सर उठाकर चलने के लिए कुल का दीपक भी तो चाहिए.'"
रसोई की दहलीज पर खड़ी शगुन ने यह सुना और उसके चेहरे पर एक कड़वाहट तैर गई. 'पिछली बार' से चाचा का मतलब शायद उन उम्मीदों से था जो कभी पूरी नहीं हुईं, या शायद वह शगुन के अस्तित्व को ही एक 'अधूरी उम्मीद' मान रहे थे.
शगुन रसोई में गई, जहाँ चाची धीरे-धीरे सब्जियाँ काट रही थीं. उनके चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में एक अजीब सी शांति.
"चाची, आप आराम क्यों नहीं करतीं? मैं कर दूंगी यह सब," शगुन ने उनके हाथ से चाकू लेते हुए कहा.
चाची मुस्कुराई, "अरे बेटा, काम करते रहने से शरीर चलता रहता है. और वैसे भी, अब तो सबकी नज़रें मुझ पर टिकी हैं. जैसे मैं कोई इंसान नहीं, कोई कीमती संदूक हूँ जिसके अंदर का सामान सबको देखना है."
शगुन पास ही रखे स्टूल पर बैठ गई. "चाची, सब लोग 'लड़का-लड़का' क्यों कर रहे हैं? क्या अगर लड़की हुई तो वह आपकी या चाचा की संतान नहीं होगी? आयुष और मैं भी तो यही बात कर रहे थे कि लोग पहले से ही पूर्वाग्रह क्यों पाल लेते हैं?"
चाची ने एक गहरी साँस ली और खिड़की के बाहर देखा, जहाँ चिलचिलाती धूप में नीम का पेड़ खड़ा था. "शगुन, इस घर में सबके दिमाग फिरे हुए हैं, हर किसी को वंश बढ़ाने की फिक्र लगी है. ये घर क्या पूरे शहर में जिधर भी जाओ सब ऐसी ही बात करेंगे. हर कोई यही सोचता है कि बेटा होगा तो बुढ़ापे की लाठी बनेगा और बेटी होगी तो पराया धन. लेकिन सच पूछो तो...; चाची की आवाज़ धीमी हो गई, जैसे वह कोई राज बता रही हों, "मैं तो चाहती हूँ कि पहली संतान लड़की ही हो."
शगुन चौंक गई. "सच में?"
"हाँ," चाची ने शगुन के सिर पर हाथ फेरा. "मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी वह सब करे जो मैं नहीं कर पाई. मैं उसे तुम्हारे जैसा निडर बनाना चाहती हूँ. पर डरती हूँ कि क्या यह समाज और यह घर उसे उड़ने देगा? या फिर उसे भी मेरी तरह इसी रसोई और मर्यादा के पिंजरे में सजा दिया जाएगा?"
"रसोई के दूसरे कोने में शगुन की माँ खामोशी से आटा गूँथ रही थीं. उन्होंने चाची और शगुन की बातें सुनीं तो उनके हाथ ठिठक गए. उन्होंने शगुन की ओर देखा, उनकी आँखों में एक धुंधली सी याद तैर गई—जब शगुन पैदा हुई थी, तो घर में वैसी खुशियाँ नहीं मनाई गई थीं जैसी आयुष के जन्म पर दिखी थीं. उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, 'शगुन, तेरी चाची सही कह रही है. हम औरतें इस घर में अपनी मर्जी से नहीं, अपनी किस्मत से आती हैं. लेकिन तू और आयुष हम से अलग हो. कम से कम तुम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे रखना.'"
आयुष सीढ़ियों पर बैठा कोई किताब पढ़ रहा था., पर उसका ध्यान चाचा की बातों पर था. उसे याद आया कि जब वह छोटा था, तो उसे 'मजबूत' बनने के लिए कहा जाता था और शगुन को 'सलीकेदार'. क्या आने वाले बच्चे पर भी जन्म से पहले ही ये लेबल चिपका दिए जाएंगे?
तभी चाचा लिविंग से रसोई की ओर आए "शगुन, तुम्हारी चाची यहाँ क्या कर रही हैं? डाक्टर ने उन्हें आराम के लिए कहा है और वे यहाँ आ लगीं. उन्हें कहो कि वे अपने कमरे में जा कर आराम करें. उन्हें इस परिवार को वंशज देना है.”
इतना कह कर चाचा अपने कमरे में जाने लगे तो देखा आयुष सीढ़ियों पर बैठा है. “हद हो गयी आयुष, ये लड़कियों की तरह सीढ़ियों पर बैठ कर बातें सुन रहे हो. कमरे में जाओ या नीचे लिविंग में."
“हाँ चाचा, जा ही रहा हूँ”, यह कह कर वह लिविंग में आ गया.
नीचे आ कर आयुष ने शगुन की ओर देखा. दोनों की आँखों में एक ही सवाल था—क्या इस घर में कभी कोई बच्चा बिना किसी 'शर्त' के पैदा हो पाएगा? क्या पंखों को फैलने से पहले ही काट दिया जाना ही देस की रीत है?
शाम को जब सूरज ढल रहा था, आयुष और शगुन छत पर मिले. "चाची भी लड़की चाहती हैं, आयुष," शगुन ने कहा. "पर चाचा को 'वारिस' चाहिए," आयुष ने मुंडेर पर हाथ रखते हुए कहा. "2006 आ गया है, पर सोच अब भी 1906 में अटकी पड़ी है. हम कुछ बनने के लिए कोटा और बनस्थली जा रहे हैं, पर क्या हम वाकई इस पिंजरे से बाहर निकल पाएंगे?"
रात के सन्नाटे में, रामगंजमंडी के उस घर में तीन लोग जाग रहे थे—एक जो अपनी पहचान ढूंढ रहा था, एक जो उड़ान की तैयारी में थी, और एक जो अपने गर्भ में पल रही नन्ही जान के लिए एक बेहतर दुनिया का सपना देख रही थी.
... क्रमशः
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