@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: अलग-अलग लड़ाइयाँ

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

अलग-अलग लड़ाइयाँ

पिंजरा और पंख-23
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
मिड-टर्म परीक्षा क्रिसमस के पहले हो चुकी थी. परिणाम का इन्तजार था. तेज सर्दी रात नौ बजे बाद सड़कें सूनी रहतीं. “मकर संक्रांति के बाद सर्दी कम होने लगेगी” कहते हुए लोग कड़कड़ाती सर्दी के अहसास से मुक्ति की कोशिश करते. आयुष आज पढ़े का रिविजन करने बैठ रहा था. तभी उसके फोन की घंटी बजी. पापा थे.

"बेटा, मिड-टर्म के रिजल्ट आए?" आवाज़ में वही उत्सुकता, वही चिंता.

"नहीं पापा, एक-दो दिन में आएंगे."

"कैसी संभावना है?”

“पेपर सब अच्छे किए थे. नंबर अच्छे ही आएंगे.” स्वर में आत्मविश्वास के बावजूद थोड़ा कंपन था.

“याद है न तुम्हें, दोहरी परीक्षा है, अगले साल बोर्ड निकालना है और आईआईटी एंट्रेंस भी.”

“हाँ पापा.”


“बेटा, सारा दारोमदार तुम्हीं पर है.”

“मैं समझता हूँ, पापा.”

“ठीक है, तुम पढ़ाई का ध्यान रखो.. तुम्हारी मम्मा पड़ोस में गयी है, आएगी तब बात कर लेगी.”

कॉल समाप्त हुई. वही बात. वही दबाव. पर आज का दबाव कुछ अलग था.

उसने "युद्ध-योजना" बनाई थी:

शत्रु: शिक्षा का पाखंड

युद्ध-मैदान: यह कोचिंग

शस्त्र: ज्ञान

सहयोगी: वह उत्कृष्ट कैडेट

उसे लगा इसमें कमी है, पर क्या? वह सोचने लगा. उसे शगुन के मंत्र की याद आई.

उसे शगुन का कथन याद आया, "हम सब पिंजरों में हैं. तुम्हारा अलग, मेरा अलग. पर पिंजरा तो पिंजरा है."

आयुष को लक्ष्य पता है? लेकिन उसका पिंजरा क्या है?

अचानक उसके जेहन में बिजली कौंधी. “यह लक्ष्य ही उसका पिंजरा है.”

यही बात है. उसने अपने आपको लक्ष्य की लक्ष्मण रेखा के अंदर कैद कर लिया है, यही उसका पिंजरा है. वह इस पिंजरे से कैसे निकले?

उसने रफ कॉपी के पन्ने पर लिखा. “लक्ष्य ही उसका पिंजरा है, उसकी सीमा है.”

कुछ देर सोचने के बाद उसने लिखा, “सीमा से आगे जाना होगा......पर कैसे?”

“अब इस पर बाद में सोचूंगा. अभी बस आज का रिविजन.” उसने रिविजन के लिए फिजिक्स नोटबुक उठा ली.



अगले दिन कोचिंग में, मिड-टर्म के पेपर वापस मिले. आयुष के मार्क्स ठीक थे, 88%. उसने सोचा था इस बार 90 पार करेगा. लेकिन, कोई बात नहीं. अब वह 95 से ऊपर की कोशिश करेगा.

विशाल केवल 59% ला पाया.

टिफिन ब्रेक में विशाल बोला, "मैं छोड़ रहा हूँ, आयुष. मैं नहीं कर सकता. यह लड़ाई मेरी नहीं."

"पर..."

"पापा को बोल दिया है. वे नाराज़ हैं, पर... मैं बोर्ड पर फोकस करूंगा. सीनियर में गुड फर्स्ट डिवीजन निकाल लूंगा. फिर ग्रेजुएशन के स्तर पर सोचूंगा क्या करना है. सीनियर पीसीएम से होगा तो वहाँ बहुत विकल्प रहेंगे."

आयुष ने देखा विशाल की आँखों में हार नहीं थी, बल्कि आत्म स्वीकार की शांति थी... और निश्चय भी.

"तुम्हारे लिए अच्छा है," आयुष ने कहा, "अगर तुम खुश हो."

विशाल मुस्कुराया, "खुश तो शायद नहीं हूँ. पर संतुष्ट हूँ. मैं अब इस रेस का हिस्सा नहीं बनूंगा. मैं वह चुनूंगा, जो मैं सबसे बेहतर कर सकूँ."

विशाल सही था.

“कल मूवी चलें? नयी लगी है.” उसने आयुष को प्रस्ताव दिया.

“बिलकुल, तुम्हारा निश्चय सेलिब्रेट करना बनता है, और मेरे 89 भी, पहले से अधिक हैं. कुछ फ्रेशनेस आ जाएगी, 3 से 6 वाला शो देखेंगे.”

“पक्का?”

“बिलकुल पक्का.”



शाम को आयुष का मन किया. उसने शगुन को कॉल लगाई.

“हेलो भाई, तेरे को बात करने की फुरसत हो गयी?” शगुन का स्वर उलाहना जैसा था.

“हाँ शगुन, व्यस्त रहता हूँ तो किसी को फोन की याद नहीं आती.”

“अरे, तेरा मिड-टर्म रिजल्ट आ गया होगा न?”

“आज ही आया है. 89% रह गए.”

“इतने तो बढ़िया हैं, और तू ऐसे कह रहा है जैसे फेल हुआ हो. 12वीं के मिड टर्म तक 95 से ऊपर पकड़ लेगा. .... अच्छा बता, सेलिब्रेट कर रहा है कि नहीं?” शगुन ने हौसला बढ़ाते हुए पूछा.

“क्यों न मनाऊँ, पहले से आगे बढ़ा हूँ. कल विशाल के साथ मूवी देखूंगा. बाद में बढ़िया सा खाएंगे.”

“ये हुई न बात. अब तू सचमुच मेरा भाई लगता है. पापा मम्मा से बात हुई?

“नहीं, पापा देर से घर आते हैं, वे खुद फोन करेंगे.”

“फिर भी आज दस बजे तक न आए तो तू कर लेना.”

“विशाल ने आईआईटी एंट्रेंस की रेस छोड़ दी. 12वीं पीसीएम से करेगा. कहता है वह करूंगा जो मैं सबसे बेहतर कर सकता हूँ.”

“यह तो बढ़िया बात है. यदि रेस नहीं दौड़ सकते तो उससे निकल आओ. खेलों की कमी थोड़े ही है. वह खेलो जो सबसे बढ़िया खेल सकते हो. उसे मेरी ओर से बधाई देना.”

“और, तेरा क्या चल रहा है?” आयुष ने शगुन से पूछा.

“बढ़िया चल रहा है. खूब नया सीख रही हूँ. महीन-महीन चीजें, सिलेबस से भी और उसके बाहर से भी. बस मजा आ रहा है. मेरी फिक्र मत कर. मैं यहाँ सबसे बढ़िया करूंगी.”

“हाँ, वहाँ जा कर चैम्पियन हो गयी है न, कोई रोकने वाला तो है नहीं.” आयुष ने उलाहना दिया.

“अरे नहीं आयुष. यहाँ भी कम चीजें नहीं हैं रोकने वाली. बस कुछ समझ ली हैं, कुछ समझ रही हूँ.”

“मतलब, लड़ाई जारी है?”

“यह दुनिया ही ऐसी ही है. हर जगह कोई न कोई लड़ाई तैयार रहती है.”

“कैसी लड़ाई, तेरा किसी से झगड़ा हुआ क्या?” आयुष ने थोड़ा चिन्ता से कहा.

“नहीं रे, झगड़े की बात नहीं. पर यहाँ आकर जान रही हूँ कि कैसे लोग दूसरों को बिना कारण ही खुद से नीचा समझने लगते हैं. दुःख होता है. पर यह मेरे विषय मनोविज्ञान से संबंधित है. मैं अभी समझ रही हूँ. इस पर फिर फुरसत में बात करेंगे. अभी पापा मम्मा को रिजल्ट बता. क्या पता उन्हें फोन एंगेज मिल रहा हो.”

“हाँ, रखता हूँ. तू ठीक से रहना.”

“हाँ, तू बड़ा हो गया है न, ऐसे बात करेगा? तू ठीक से रहना. अब रखती हूँ.”

आयुष सोचने लगा. शगुन लड़ाई अलग है, उसकी अलग. दोनों लड़ रहे हैं. क्या दुनिया हर जगह लड़ाई माँगती है? और हर किसी को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होती है?

विशाल ने अपनी लड़ाई चुनी, वह बाहर निकल आया.

शगुन अपनी लड़ाई लड़ रही है उसे समझ रही है.

वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है, सीमाओं से आगे जाने की.

तीन अलग राहें, तीन अलग लड़ाइयाँ. सबकी मंज़िल, खुद को पाना.

शायद लड़ाई ही वह चाबी है जो पिंजरे को खोल सकती है.



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