@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: 2026

शुक्रवार, 15 मई 2026

माँ से बात

देहरी के पार, कड़ी - 52
आकाश को मैसेज करने के बाद प्रिया ने किचन में जाकर देखा. चाय तैयार थी, बल्कि कुछ ज्यादा उबल चुकी थी. चाय छानकर, मग हाथ में लिए वह बिस्तर पर आ गई. आज पूरे दिन उसे व्यस्त रहना पड़ा था. सुखद बात यह थी कि दिन के अधिक समय वह आकाश के साथ थी. उसने नोट किया था कि जितनी देर आकाश उसके साथ रहा, सकुचाता रहा. आखिर उसे किस बात का संकोच था? और मैसेज में वह डर वाली बात, आखिर वह किस बात से डर रहा था? उसने याद करने की कोशिश की कि वह जितनी देर आकाश के साथ रही, क्या-क्या हुआ था?

‘हो सकता है उसके अलसुबह जल्दी बोरिवली स्टेशन पहुँच जाने से वह आश्चर्यचकित हुआ हो. कोटा और जयपुर में एक अकेली लड़की का सुबह पाँच बजे किसी हमउम्र लड़के को रिसीव करने के लिए स्टेशन पहुँचना अजूबा होता. लेकिन मुंबई में तो यह सहज सामान्य बात थी. उसे अपने फ्लैट में ले आना और पाँच घंटों से अधिक एक साथ रहना भी शायद उसे अजीब लगा हो. वहाँ जयपुर या कोटा में यह निश्चित ही संभव नहीं होता. हो सकता है उसके फ्लैट में रहने के दौरान वह इस बात से डर रहा हो कि कहीं कोई उसके फ्लैट की घंटी न बजा बैठे और उन दोनों को अकेले देख उनके बारे में कुछ ऊट-पटांग न सोचने लगे..’ वह मन ही मन हँस पड़ी. ‘तब तो जब वे यहाँ से एमबी के लिए निकले तब आकाश ने ज़रूर राहत की साँस ली होगी. उसके बाद रामजी काका और उनके स्टाफ का व्यवहार, और फिर बब्बन भाई के साथ ऑटो का सफर, पता नहीं बब्बन भाई ने उससे न जाने क्या बातें की होंगी.”

‘तो क्या यहाँ यूनियन के लोगों के साथ उसके संबंध बनना और यूनियन के कामों में उसकी तन मन से संलिप्तता ने उसे डराया होगा? ... खैर वह इतना क्यों सोच रही है, मिलने पर सब कुछ साफ हो जाएगा. यदि उसने स्पष्ट नहीं किया तो वह खुद पूछ लेगी कि वह किस बात से डर रहा था.’

उसने उठकर चाय का प्याला सिंक में रखा. सोचने लगी शाम के खाने में क्या बनाए. फिर उसने थोड़े से चावल निकालकर कुकर में पकने के लिए गैस पर चढ़ाया और अरहर की दाल को कटोरी में भीगने के लिए छोड़ दिया.

वह वापस अपने बिस्तर पर पहुँची. उसे ध्यान आया कि कितने ही दिन हो गए हैं, माँ से बात नहीं हुई है. उसने फोन उठाकर माँ को लगाया. पूरी घंटी जाने पर भी फोन रिसीव न होने पर उसने फोन रख दिया. हो सकता है माँ किसी काम में व्यस्त हो और फोन न उठा पा रही हो. तभी फोन की घंटी बज उठी. माँ ही थी.

“हेलो मम्मी कैसी हैं?”

“मैं ठीक हूँ पर तुझे आज कैसे मेरी याद आ गई? पता है पूरे आठ दिन हो गए हैं बात किए हुए. लगता है तू मुझे तो बिलकुल भूल ही गई है.” माँ ने उलाहना दिया.

“कैसी बात करती हो मम्मी? अपनी माँ को कोई भूल सकता है क्या? बस कुछ कामों में व्यस्त रही तो बात नहीं कर पाई. अब आज मैंने ही तो फोन किया न?”

“हाँ हाँ ठीक है, जब तुझे याद आ जाती है तो फोन करती है. वैसे तो भूल ही गई है.” इस बात पर प्रिया को हँसी आ गयी.

“अच्छा ये बता, पापा कैसे हैं?”

“ठीक हैं, रोज मंडी जाते हैं. कारोबार पूरी तरह संभाल लिया है, मयंक को पढ़ाई के लिए बिल्कुल फ्री कर दिया है. आज दिनभर से घर पर ही थे. अभी शाम को सात बजे निकले हैं अपने दोस्तों से मिलने. अब आने में रात के दस बजेंगे.”

“और मयंक कैसा है?”

“बिलकुल ठीक है, वह भी घूमने गया है. वह भी वही दस बजे तक लौटेगा. तूने सबकी पूछ ली, अब तेरी भी बता. तेरा क्या चल रहा है? तेरी नौकरी कैसी चल रही है? मयंक ने बताया था कि तू किसी यूनियन के काम में पड़ गई है. उसमें किसी तरह के लड़ाई-झगड़े तो नहीं होते न? यहाँ पहले कारखानों में एक से ज्यादा यूनियनें थीं. वे आपस में लड़ते थे तो खून-खच्चर हो जाते थे. वैसा वहाँ तो नहीं है न? तू फालतू ही इस पचड़े में पड़ गई है. तुझे यूनियन से क्या काम? अच्छी खासी नौकरी करती है, बढ़िया तनखा है, जैसे भी हो इससे दूर ही रहना चाहिए.” माँ ने चिंता व्यक्त की.

“नहीं माँ ऐसा कुछ नहीं है. पता नहीं मयंक ने आपको क्या कह दिया है. जब मैं यहाँ आई और विक्रांत ने मुझे परेशान करने की कोशिश की तो इन्हीं यूनियन वालों ने बिना किसी स्वार्थ के मेरा साथ दिया और विक्रांत को जेल की हवा खानी पड़ी. अब वे अपने वेतन और नौकरी के लिए लड़ रहे हैं, तो मैं लिखने-पढ़ने में उनकी मदद कर देती हूँ. किसी तरह की कोई रिस्क नहीं है. तू चिन्ता मत कर. और हाँ, आप जयपुर वाले आकाश को जानती हैं न? वही, जो मेरा लैपटॉप लेने आया था.”

“हाँ, जानती हूँ. वह अभी कुछ दिन पहले भी आया था. जब एक काली गाड़ी अपने मकान के सामने खड़ी रहने लगी थी.”

“हाँ वही, अब वह वहाँ आपकी तसल्ली के लिए आया था न, बस ऐसे ही हम एक दूसरे की मदद करते हैं. आकाश ने कंपनी बदल ली है और यहाँ दूसरी कंपनी में जॉइन करेगा. आज ही मुंबई पहुँचा है.”

“यह तो अच्छा हुआ, कम से कम वहाँ एक आदमी तो जान पहचान का हुआ.” माँ ने ऐसे कहा जैसे उन्हें आकाश के मुंबई पहुँचने की खबर से उसे बहुत तसल्ली हो गयी हो. प्रिया की हँसी फूट पड़ी.

“मम्मी, तू भी न. यहाँ बहुत जान पहचान वाले हैं. तू मुम्बई आकर देख, सबसे मिलाऊंगी, तो तेरी पूरी तसल्ली हो जाएगी. अच्छा मम्मी मैं रखती हूँ, मयंक आए तो कहना मुझ से बात कर लेगा.”

माँ से बात करके प्रिया ने खुद को बहुत हल्का महसूस किया. कुकर पर्याप्त सीटी ले चुका था. उसने कुकर को गैस से उतारकर देखा. चावल पक गए थे. उसने उन्हें अलग बरतन में निकाल कर उसी कुकर में दाल पकने को चढ़ा दी.

सोमवार सुबह आकाश विक्रोली की उस ऊँची कॉरपोरेट बिल्डिंग के रिसेप्शन पर खड़ा था, जिसमें उसकी नयी एम्पलॉयर कंपनी का कार्यालय था. यहाँ पहुँचकर उसे अहसास हुआ कि अब उसके जीवन का एक और नया अध्याय शुरू हो चुका है. ग्यारह से आठ की शिफ्ट, बीच में घंटे भर का विश्राम—एक ऐसा चक्र जो अब उसकी रोज की जिन्दगी का हिस्सा बनने वाला था. नई कंपनी में नया प्रोजेक्ट, उसके लिए नई प्रोफेशनल चुनौतियाँ लाएगा. फिलहाल उस पर सबसे बड़ा दबाव—जल्द से जल्द एक स्थाई आशियाना तलाशना था. गेस्ट हाउस में न तो अधिक दिन रह सकते हैं और न ही वहाँ अपने घर जैसा अहसास होता है. उसे सुबह ऑफिस जाने से पहले ही किसी प्रॉपर्टी डीलर से मिलकर बताना होगा कि उसे किस तरह का आवास चाहिए.
... क्रमशः

बुधवार, 13 मई 2026

समानांतर मोर्चे

देहरी के पार, कड़ी - 51
आकाश को प्रिया ने आटोरिक्शा में बिठाकर विदा किया तो वह भी बाहर सिर निकालकर उसे ओझल होने तक देखता रहा. बब्बन भाई ने कुशलता से अपना रिक्शा अंधेरी की भीड़भाड़ वाली सड़क से निकालकर विक्रोली की ओर मोड़ दिया. आकाश की आँखों में उसे विदा करती प्रिया की छवि अब भी तैर रही थी.

प्रिया की छवि ने आकाश के मन में एक विचित्र हलचल पैदा कर दी थी. उससे पहली बार कोटा में प्रत्यक्ष मिलने के बाद तीन रात जयपुर में साथ बिताने के बीच प्रिया उसे अच्छी लगने लगी थी. लेकिन कंपनी के नियमों के चलते वह उसकी चाहत के उस दायरे से बाहर रही जो उसे जीवनसाथी बनाने की ओर बढ़ता.. लेकिन जैसे ही आकाश ने कंपनी स्विच की, प्रिया उसकी चाहत के उस दायरे में प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया को उसने अब तक केवल एक गंभीर प्रोफेशनल और संकट में घिरी एक युवती के रूप में देखा था, लेकिन आज मुंबई की सड़कों पर उसकी 'पहुँच' और लोगों का उसके प्रति 'सम्मान' देखकर वह चकित था. बब्बन भाई जैसे मेहनतकश का उसे 'दीदी' कहना और रामजी काका का उस पर अगाध भरोसा—आकाश को समझ आ रहा था कि प्रिया ने इस शहर में आकर सिर्फ नौकरी नहीं की थी, बल्कि अपने आचरण से एक स्थान हासिल कर लिया था. वह मुम्बई में रोजगार के लिए आकर रहने वाली सामान्य लड़की नहीं लगती थी, बल्कि ऐसा लगता था जैसे वह यहीं कहीं पैदा हुई, और पली बढ़ी थी. उसमें इस शहर के प्रति अजनबीपन पूरी तरह समाप्त हो चुका था. उसे ऐसा लगा कि वह जयपुर में उसके जितने निकट आई थी उतनी ही दूर चली गई थी.

विक्रोली के गेस्ट हाउस पहुँचते-पहुँचते आकाश के मन में यह विचार पुख्ता हो गया कि प्रिया के साथ जुड़ना आसान नहीं होगा. प्रिया के विस्तृत और संघर्षशील व्यक्तित्व को स्वीकार करना होगा. इसके लिए उसे प्रिया को और गहराई के साथ समझने की कोशिश करनी होगी. उसे खुद भी अपने व्यक्तित्व को विस्तार देना होगा और उसके व्यक्तित्व से दूरी कम करनी होगी. उसने अपना सामान कमरे में रखा और खिड़की से बाहर फैली मुंबई की इमारतों की ऊँचाइयाँ देखते हुए सोचा, "क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ? क्या मैं यह कर सकूंगा?"

आईआईडीईए के उस छोटे हॉल में कुछ कुर्सियाँ बढ़ा दी गई थीं, अब वहाँ 24 लोग बैठ सकते थे. कार्यसमिति के 21 में से 19 सदस्य ही आए थे. एक सदस्य के रिश्ते में किसी का देहान्त हो गया था और एक किसी जरूरी काम से मुंबई से बाहर था. बैठक में प्रशांत बाबू और कुलकर्णी जी सहित 21 व्यक्ति थे. कमरे में ज्यादा लोगों के कारण उमस बढ़ गई थी, पंखा अपनी पूरी रफ्तार से चलते रहने के बावजूद उसे कम करने में नाकाम था.

जैसे ही सचिव शिंदे ने 'प्रोफेशनल रिसर्च एनालिस्ट' बुक करने, उससे प्रश्नावली तैयार करवाने और कुछ घंटों की ट्रेनिंग के साथ 'साइंटिफिक सर्वे' का औपचारिक प्रस्ताव रखा, हॉल में विरोध के स्वर उभरने लगे. एक वरिष्ठ सदस्य ने मेज थपथपाते हुए कहा, "शिंदे, हमें इन बाहरी पढ़े-लिखे लोगों की क्या ज़रूरत है? हम बरसों से अपने मजदूर साथियों के साथ जी रहे हैं. हम जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं. यह सर्वे सिर्फ वक्त की बर्बादी है और इससे मैनेजमेंट को हमारी रणनीति का पता चल जाएगा."

बहस गरम हो गई. कुछ सदस्यों को लगा कि यह 'सर्वे' दरअसल उनकी अपनी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. प्रशांत बाबू शांत थे, वे जानते थे कि यह प्रतिरोध होना ही था. उन्होंने सभी सदस्यों को इस विषय पर अपने विचार रखने को कहा. फ्रेक्शन में उपस्थित सदस्यों सहित कुल 9 सदस्यों ने ही इस सर्वे के समर्थन में राय दी, बाकी सबने उसे व्यर्थ बताया. इस मुद्दे पर बहस इतनी तेज हो गई कि दो-तीन मेंबर एक साथ ऊँची आवाज में बोलने लगे.

कॉमरेड कुलकर्णी ने हस्तक्षेप कर ऊँचा बोलने वालों को चुप कराया. “यह बैठक कुछ निर्णय लेने के लिए बुलाई गयी है. उसके लिए विचार विमर्श सहज रीति से हो सकता है. सब अपनी राय शांति से रख सकते हैं. अब जिस बिंदु पर विवाद है, पहले हमें समझ लेने चाहिए उसके बाद हम फिर से राय कर सकते हैं. यहाँ कितने लोग हैं जो एक विज्ञान सम्मत रीति से किए जाने वाले सर्वे के लाभों और नुकसान के बारे में समझते हैं?”

इस प्रश्न से बैठक में एकदम शांति छा गई. उनमें से कोई भी सर्वे के तरीके के बारे में कोई जानकारी नहीं रखता था. कॉमरेड कुलकर्णी ने बोलना जारी रखा. “पहले तो आप सबको यह समझना चाहिए कि यह सर्वे हमारी राय बदलने के लिए नहीं, बल्कि हमारी राय को 'सबूत' में बदलने के लिए है. इसके दो उद्देश्य हैं. एक तो मजदूरों की राय स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ जाए. दूसरे जब इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में बात हो तो हम मैनेजमेंट के तर्क का कि मजदूर खुश हैं हम जवाब दे सकें. तब हमारे पास सबूत होगा. यह सर्वे वह दस्तावेज़ बनेगा जिसे अदालत नकार नहीं सकेगी."

कॉमरेड कुलकर्णी के 'कोर्ट', 'सबूत' और स्पष्ट राय वाले तर्क से विरोधी कुछ शांत हुए. प्रशांत बाबू ने मौके का फायदा उठाते हुए जोड़ा, "अगर हम विज्ञान और डेटा का साथ नहीं लेंगे, तो पूंजीवाद हमें पुरानी तकनीकों की तरह ही कुचल देगा." काफी तर्क-वितर्क के बाद, प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया, हालांकि दो-तीन चेहरे फिर भी तने हुए नजर आते रहे.

फ्रेक्शन मीटिंग से घर लौटते समय शेयरिंग ऑटो में बैठी प्रिया ने अपनी आँखें मूँद लीं. वह आज के दिन के बारे में सोचने लगी. सुबह पाँच बजे उठना, स्टेशन पहुँचकर आकाश को रिसीव करना, उसका छह घंटों का साथ, उसे विदा करने के बाद फ्रेक्शन मीटिंग— सब कुछ उसके मस्तिष्क पटल पर किसी फिल्म के दृश्यों की तरह चल रहा था.

उसे महसूस हुआ कि उसका अपना जीवन अब दो समानांतर मोर्चों पर चल रहा था. एक मोर्चा 'व्यक्तिगत' था, जहाँ आकाश का साथ उसे एक शांत कोमलता से भर देता था, और दूसरा मोर्चा 'सामाजिक' था, जहाँ हर कदम पर वह सहज ही रणनीति का हिस्सा बन जाती थी.

फ्लैट का दरवाज़ा खोलते ही उसे उस सन्नाटे का अहसास हुआ जो आकाश के जाने के बाद और गहरा गया था. उसने चाय के लिए दूध, चीनी, पत्ती और पानी सब एक साथ पतीली में डाल गैस पर चढ़ा दिया और बालकनी में आकर खड़ी हो गई. आज उसने एक बहुत बड़ी जीत हासिल की थी—फ्रेक्शन को एक आधुनिक सोच के लिए मनाना आसान नहीं था.

तभी उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी. आकाश का मैसेज था. "प्रिया, तुम्हें आज मुंबई में फिर से देखा तुम्हारा सुबह जल्दी उठकर बोरिवली स्टेशन पर मुझे लेने आना, अपने घर ले जाना, फिर रामजी का मेवाड़ भोजनालय, तुम्हारा मीटिंग में समय से पहुँचने का जुनून और फिर वे बब्बन भाई जो मुझे छोड़ने आए. इन सब के बीच तुम्हारे व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू आज मैंने देखा, तुम कुछ अपरिचित सी लगने लगी. तुम्हारे इस रूप ने मुझे गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन उसे देख मन कुछ भय भी पैदा हुए. उनपर मिलने पर बात करेंगे. उम्मीद है तुम्हारी मीटिंग सफल रही होगी."

मुस्कुराते हुए मैसेज का जवाब टाइप करने लगी— "मीटिंग सफल रही, आकाश. हम बात करेंगे लेकिन ये मुंबई अभी तुम्हें और भी बहुत कुछ दिखाएगी."
... क्रमशः

मंगलवार, 12 मई 2026

फ्रेक्शन मीटिंग

देहरी के पार, कड़ी - 50
वह आकाश के ऑटोरिक्शा को तब तक देखती रही जब तक कि वह आँखों से ओझल न हो गया. उसने अपनी घड़ी देखी, 1:35 हो चुके थे. उसे दो बजे आईआईडीईए ऑफिस पहुँचना था. वह तुरंत ऑफिस की दिशा में जाते हुए एक शेयरिंग ऑटो में बैठ गई.

रिसेप्शन में उसे बताया गया कि मीटिंग छोटे हॉल में है. यहाँ लकड़ी की पुरानी अंडाकार मेज हॉल के आधे भाग में रखी थी. मेज पर स्लेटी रंग का कपड़ा बिछा था. जिसके गिर्द प्लास्टिक की 12 कुर्सियाँ रखी थीं. प्रशांत बाबू, कॉमरेड कुलकर्णी, यूनियन अध्यक्ष उल्लास कामठे और सचिव शिंदे, पांच अन्य कार्यसमिति सदस्य आपस में बातचीत में मशगूल थे. यूनियन सचिव शिंदे के सामने एक रजिस्टर और दो सूचियाँ रखी थीं. जो संभवतः ईसीआई में काम करने वाले सभी मजदूरों की और यूनियन के सदस्यों की रही होंगी.

प्रिया के अंदर आते ही प्रशांत बाबू ने उसे बैठने का संकेत दिया. कुलकर्णी जी ने कहा, “प्रिया भी आ गयी है अब मीटिंग शुरू की जाए.”

“बिल्कुल ठीक.” प्रशांत बाबू ने कहा. “कॉमरेड शिंदे आप शुरू करें.”

शिंदे ने बोलना शुरू किया. “कॉमरेड, हमारी मूल समस्या वेतन की है. फैक्ट्री में जो भुगतान योग्य वेतन मजदूरों को मिलता है वह दूसरी फैक्टरियों से आधा भी नहीं होता. ट्रक सिस्टम में एम्पलॉइज शॉप से मिलने वाले सामानों की कीमतों और बाजार कीमतों के अंतर को जोड़ लें तब भी यह वे अन्य फैक्टरियों के मजदूरों के वेतन का 65 से 70 प्रतिशत रह जाता है. कम वेतन के कारण मजदूरों के परिवारों की आर्थिक हालत हमेशा कमजोर बनी रहती है और अक्सर वे कर्ज में रहते हैं. इससे मजदूरों की पत्नियों को अनिवार्य रूप से काम करना पड़ता है. अनेक के घरों में घर से किए जाने वाले काम कर रखे हैं, जिसमें बच्चे भी जुटे रहते हैं, उनकी पढ़ाई बाधित होती है. फैक्ट्री से छूटने के बाद घर पहुँच कर मजदूर खुद भी उसी काम में जुट जाता है. लोग अपने घरों में जो काम कर रहे हैं वह उन्हें अधिक मूल्यवान लगता है. अधिकांश परिवार यह समझते हैं कि यदि मजदूर नौकरी छोड़कर दूसरा काम करने लगे, या परिवार के में ही जुट जाए, तो इस नौकरी से होने वाली कमाई से अधिक कमा सकता है. मेरे खुद के परिवार तक में ऐसी ही स्थिति है. मुझे रोज इस दबाव को सहन करना पड़ता है. प्रिया दीदी और उनके साथी मेरे घर होकर आए हैं. वे खुद इसी नतीजे पर पहुँचे. हमने जब ट्रक सिस्टम समाप्त करने और फेयर वेजेज के लिए हड़ताल शुरू की थी तब सब इस बात पर उतारू थे कि मालिक फैक्ट्री बंद भी कर दे तो वे भुगत लेंगे. ऐसी हालत में कम से कम उन्हें ग्रेच्युटी, छंटनी का मुआवजा और प्रोविडेंट फंड तो मिल जाएगा. तब से लेकर आज तक मजदूरों की सोच में कोई बदलाव हुआ है, मुझे नहीं लगता. इसलिए यदि वीआरएस (स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति) का प्रस्ताव आया तो अधिकांश मजदूर उसे स्वीकार करने की स्थिति में होंगे. मुझे बस इतना ही कहना है, हो सकता है हम में से कोई इससे अलग राय भी रखता हो.”

कॉमरेड शिंदे ने अपनी बात समाप्त की और उनके बाद एक सदस्य कॉमरेड राम लुभावन को छोड़कर शेष सभी पार्टी सदस्यों ने कॉमरेड शिंदे की राय से सहमति प्रकट की. कॉमरेड राम लुभावन का कहना था कि “फैक्ट्री में करीब 25 से 50 मजदूर ऐसे हैं जिनकी उम्र 55 साल से ऊपर की है, उनमें से अधिकांश ये सोचते हैं कि यह नौकरी चलती रहे तो बेहतर है. इन मजदूरों के घरों में इनके बच्चे जॉब में लग गए हैं या खुद अपना काम करते हैं जिससे उन्हें अच्छी आय हो जाती है. इनमें से अधिकांश किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते. ट्रक सिस्टम समाप्त हो और मजदूरों को फेयर वेजेज मिलने लगे, ये तो वे भी चाहते हैं. यह तो साफ ही है कि ट्रक सिस्टम अब नहीं रहेगा. सारी बात इस तथ्य पर निर्भर करेगी कि अब उन्हें वेतन कितना मिलता है.”

प्रशांत बाबू ने अपनी बात जोड़ी, "बिल्कुल. मैनेजमेंट ने अब 'क्रेडिट वाउचर्स' देना और राशन की दुकान पर कुछ सामान बढ़ाकर जो छोटी-छोटी राहतें दे रहा है, वे दरअसल मजदूरों के उस गुस्से को शांत करने के लिए हैं जो 'ट्रक सिस्टम' के खिलाफ था. वे चाहते हैं कि मजदूर यह सोचने लगें कि मैनेजमेंट कुछ सुधार कर देगा, ट्रक सिस्टम न रहेगा लेकिन उसके बावजूद उन्हें फेयर वेतन नहीं देगा. सारा दारोमदार इस बात पर है कि इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल क्या फैसला देती है? और कब देती है? हमारी अदालतों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे जल्दी फैसला नहीं देतीं. प्रबंधन इधर-उधर के फिजूल के आवेदन पेश करके उसमें देरी करने की कोशिश करेगा. वह यही चाहता है कि जैसे-तैसे 30-35 प्रतिशत मजदूरों को वीआरएस लेने के लिए मना ले. यदि ऐसा हुआ तो यूनियन वीआरएस स्कीम में बेहतर शर्तों पर आज बारगेनिंग कर सकती है, तब नहीं कर सकेगी. स्थिति वाकई विकट है, इसलिए जरूरी है कि हमारे कार्यकारिणी सदस्य सभी मजदूरों तक जाएँ और जानें कि वे क्या चाहते हैं. उसके बाद ही हम आगे के संघर्ष की रूपरेखा बना सकते हैं. मेरे विचार में हमें रूपरेखा तय कर लेनी चाहिए कि यह सर्वे कैसे होगा?”

कॉमरेड कुलकर्णी ने प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, तुमने जो रैंडम सर्वे किया था, उसके आधार पर और तकनीक के क्षेत्र में परिवर्तनों के आधार पर तुम्हारी राय क्या है?"

प्रिया ने अपना टैबलेट खोला और डेटा दिखाते हुए कहा, "सर, आज स्थिति यह है कि इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने की तकनीक बहुत विकसित हो गयी है. इस फैक्ट्री ने पिछले चार-पाँच सालों से अपनी तकनीक में कोई विकास नहीं किया है. जिसके कारण इसका मुनाफा नई इकाइयों की अपेक्षा कम हुआ है. इसके ग्राहकों की संख्या कम हुई है, क्योंकि सब अपने उत्पादनों में एडवांस आई. सी. लगाना चाहते हैं. नयी इकाइयों के साथ बाजार में बने रहने के लिए इन्हें अपनी तकनीक का नवीनीकरण करना होगा, जिसमें इन्हें पूंजी लगाना होगा. संभवतः इसीलिए कंपनी इस इकाई को बंद करके इसकी जमीन को औद्योगिक आवासीय या व्यवसायिक में परिवर्तित करवाकर बिल्डरों की मदद से अच्छा मुनाफा काटना चाहती है. वह मामूली पूंजी लगाकर किसी नए औद्योगिक क्षेत्र में बैंकों से 70-80 प्रतिशत सस्ता ऋण लेकर नयी यूनिट लगाने की जुगत में है. वहाँ कंपनी को अच्छी सब्सिडी मिल जाएगी और अनेक प्रकार के टैक्सों से कम से कम पाँच साल के लिए छूट मिल जाएगी. कंपनी का यही प्लान है तो बहुत अच्छा है, वह इस प्लान को बदलने के लिए तैयार नहीं होगी. इस स्थिति में यूनियन ने ठीक से बारगेनिंग की तो वीआरएस पैकेज बढ़िया हो सकता है. अब स्थिति यह बन चुकी है कि इस फैक्ट्री को बंद होने से रोका नहीं जा सकेगा. बस उसे कुछ समय टाला जा सकता है.”

कॉमरेड कुलकर्णी के सिवा सभी अपनी राय प्रकट कर चुके थे. प्रशांत बाबू के कहने पर उन्होंने अपनी राय रखी. “कॉमरेड, सब कुछ स्पष्ट है. मैं प्रिया की राय से सहमत हूँ कि परिस्थिति ऐसी निर्मित हो चुकी है कि फैक्ट्री को बंद होने से नहीं रोका जा सकेगा. लेकिन यह बात हम मजदूरों से नहीं कह सकते. जब तक वे अपने अनुभव से इसे नहीं समझेंगे, इसे सच नहीं मानेंगे. ऐसी स्थिति में हम मजदूरों की राय जानना चाहते हैं, उसके लिए हमें प्रोफेशनल तरीका अपनाना पड़ेगा. मैं कुछ प्रोफेशनल एनालिस्टों को जानता हूँ जो आधुनिक रीति से विज्ञान सम्मत सर्वे कर सकते हैं. उनमें से हमें एक एनालिस्ट को बुक करना होगा. वह हमसे अधिक फीस नहीं लेगा. लेकिन वह हमारे लिए उचित प्रश्नावली तैयार कर देगा और हमारे कार्यकारिणी सदस्यों को एक संक्षिप्त ट्रेनिंग दे देगा. डाटा एकत्र होने के बाद एनालिस्ट उनका एनालिसिस करके हमें राय दे देगा. यह स्टडी कानूनी महत्व भी रखेगी. बस इसे हमें जल्दी से जल्दी करना पड़ेगा. इस स्टडी के बाद ही हम अपनी नीति तय कर पाएंगे.”

कॉमरेड कुलकर्णी की राय पर सभी सहमत थे. निर्णय लिया गया कि सचिव कार्यकारिणी मीटिंग में इस स्टडी के लिए प्रस्ताव रखेंगे. संभावना है कि यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो जाएगा, यदि कठिनाई हुई तो पार्टी सदस्य इसे बहुमत से पारित करवाने की कोशिश करेंगे.

प्रिया दंग थी. वह अब तक सर्वे को केवल 'डेटा कलेक्शन' समझती थी, लेकिन यहाँ उसे समझ आया कि इसे विज्ञान सम्मत होना चाहिए. आज उसने कुछ-कुछ यह भी समझा कि ‘वर्किंग क्लास की वेनगार्ड पार्टी’ कैसे काम करती है? उसने यह भी समझा कि भले ही प्रशांत बाबू उसे रेडीमेड पार्टी मेंबर कहते हों लेकिन उसे अभी पार्टी मेंबर बनने के लिए बहुत कुछ सीखना और पढ़ना होगा.
... क्रमशः

रविवार, 10 मई 2026

व्यक्तित्व

देहरी के पार, कड़ी - 49
बुधवार रात प्रिया थकी हुई तो थी ही एमबी में खाना खा लेने से उसे नींद घेरने लगी थी. वह आकाश से बात करना चाहती थी, पर एक अजीब सी हिचकिचाहट ने उसे रोक लिया. गुरुवार की शाम घर पहुँचते ही प्रिया ने आकाश को फोन लगाया, मन में हिचकिचाहट अब भी थी. वह जानती थी कि आकाश अपनी 'मर्यादा' और 'समाज' वाले तर्क पर अडिग है, लेकिन उसका मन यह मानने को कतई तैयार नहीं था कि आकाश मुंबई आए और उसके यहाँ न आकर सीधे किसी अनजान गेस्ट हाउस में चला जाए.

"आकाश, मैं तुम्हारी बात का सम्मान करती हूँ," प्रिया ने फोन पर धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, "लेकिन जयपुर में जिस तरह तान्या और मम्मी-पापा ने मुझे लगभग जबरन तुम्हारे घर रोक लिया था. उसके बाद दो दिन और तीन रातें मैं तुम्हारे परिवार के साथ रही. मुझे लगने लगा था कि मैं उस परिवार का अभिन्न हिस्सा हूँ. मुझे यह सोचकर ही बुरा लग रहा है कि तुम सुबह बोरिवली स्टेशन पर उतरोगे और वहाँ से टैक्सी करके सीधे गेस्ट हाउस चले जाओगे. लगभग बीच में मेरा फ्लैट पड़ेगा और तुम मुझसे मिले बिना निकल जाओगे.”

“लेकिन प्रिया....” आकाश ने कुछ कहने की कोशिश की थी. लेकिन प्रिया ने उसे बोलने नहीं दिया.

“कुछ नहीं, तुम्हारी ट्रेन पहुँचने के पहले मैं बोरिवली स्टेशन पहुँच रही हूँ. वहाँ से हम सीधे मेरे फ्लैट आएंगे. तुम थोड़ा आराम करना, नाश्ता करना और फिर तैयार होकर अपने गेस्ट हाउस निकल जाना. क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते?"

फोन के दूसरी तरफ सन्नाटा था. आकाश को समझ नहीं आया कि वह प्रिया की इस छोटी सी जिद का क्या जवाब दे. शायद वह उसके भावनात्मक तर्क को काट नहीं पा रहा था. कुछ पल बाद उसकी आवाज़ आई, "ठीक है प्रिया. मैं रविवार सुबह बोरिवली पहुँच रहा हूँ. तुम लेने मत आना, मैं टैक्सी से पहुँच जाऊँगा."

प्रिया मुस्कुराई. "नहीं, मैं स्टेशन आ रही हूँ. वरना तुम टैक्सी में बैठे मेरे फ्लैट रास्ता ढूंढ रहे होगे. तुम परेशान होकर सीधे गेस्ट हाउस का रास्ता भी पकड़ सकते हो."

“ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी.” आकाश ने कहा, प्रिया ने उसके लिए कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा था.

रविवार, 19 मई की सुबह. बोरिवली स्टेशन आने के पहले ही आकाश अपना सामान लिए डिब्बे के दरवाजे पर आकर खड़ा हुआ. मुंबई की हवा में हमेशा रहने वाली नमी और समुद्र की नमकीन गंध उसके नथुनों में घुस गई. ट्रेन की गति धीमी हुई, वह प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर जा रही थी. वहाँ खड़े लोगों के बीच उसे प्रिया दिखाई दी, तो उसे लगा जैसे इस भीड़ भरे अनजान शहर में उसका कोई अपना है. प्रिया के चेहरे पर एक ऐसी राहत थी जो पिछले कई हफ्तों के तनाव के बाद पहली बार दिखाई दी थी.

प्रिया के फ्लैट पर पहुँचते ही माहौल बदल गया. जयपुर में उसके घर बिताए गए दो दिन बहुत तनाव के थे. तब उसे प्रिया पूरी तरह एक जिम्मेदारी की तरह लगी थी और जब उसने उसे मुंबई आने के लिए एयरपोर्ट छोड़ा था तो उस जिम्मेदारी को ठीक से निभा देने और उससे मुक्ति के अहसास के साथ एक राहत महसूस हुई थी. उसके बाद यह पहली बार था जब वे किसी 'लैपटॉप स्क्रीन' या 'ऑफिस कॉल' के बिना आमने-सामने थे. प्रिया ने पोहा और चाय बनाई. नाश्ते की मेज पर बातें कम थीं और एक-दूसरे की उपस्थिति का अहसास ज़्यादा. आकाश को तैयार होते देख प्रिया को महसूस हुआ कि जिस व्यक्ति को उसने अब तक केवल एक 'सहकर्मी' के रूप में देखा था, वह अब उसके निजी जीवन की 'देहरी' के भीतर कदम रख चुका है.

वहाँ कोई अंतरंगता नहीं थी, बस एक दूसरे के प्रति अगाध सम्मान था. आकाश की वही सादगी, उसकी वही मर्यादित बातचीत, प्रिया को बार-बार यह अहसास करा रही थी कि उसका चुनाव गलत नहीं है. आकाश जब तैयार होकर बाहर निकला, तो प्रिया ने उसे गौर से देखा. "मुंबई तुम्हें थोड़ा बदलेगी आकाश, पर उम्मीद है तुम अपनी यह सादगी बचाकर रखोगे."

आकाश बस मुस्कुराया. "कोशिश तो यही रहेगी."

साढ़े बारह बजे दोनों फ्लैट से निकले. प्रिया उसे सीधे 'मेवाड़ भोजनालय' (MB) ले गई. वह चाहती थी कि आकाश उसकी उस दुनिया को देखे जहाँ उसकी अनेक शामें कटी थीं, जहाँ उसने मेहनतकशों के एक अलग ही रूप के साक्षात्कार किए थे.

भोजनालय में हमेशा की तरह हलचल थी. रामजी काका काउंटर पर बैठे हिसाब देख रहे थे. प्रिया को एक युवक के साथ देखकर उनकी अनुभवी आँखों में एक चमक सी कौंधी.

"काका, ये आकाश हैं. जयपुर से आए हैं और कल से अपनी नई कंपनी जॉइन कर रहे हैं," प्रिया ने परिचय कराया.

रामजी काका ने उठकर आकाश का स्वागत किया. "आओ बेटा, बैठो. प्रिया बिटिया ने तुम्हारे बारे में बताया था." उन्होंने आकाश को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर प्रिया की ओर देखकर बोले, "प्रिया, तुम्हारा दोस्त अच्छा है. इसके के चेहरे पर वैसी ही ईमानदारी है जैसी मेवाड़ भोजनालय के खाने में."

सुनकर प्रिया हँस पड़ी और आकाश थोड़ा झेंप गया, पर रामजी की बेबाकी ने उसे सहज कर दिया. लंच के दौरान रामजी काका ने बातों-बातों में उसे ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष के बारे में भी बताया. "बेटा, यह शहर सिर्फ भागता नहीं है, यह लड़ता भी है. प्रिया ने इस लड़ाई में जो भूमिका निभाई, वह किसी सिपाही से कम नहीं थी."

आकाश ने प्रिया की ओर देखा. उसे पहली बार अंदाज़ा हुआ कि जिस लड़की को वह केवल कोडिंग और फाइलों में उलझी हुई समझता था, वह अंधेरी की सड़कों पर मजदूरों के लिए उम्मीद की एक किरण बनी हुई थी. प्रिया के प्रति उसका सम्मान और गहरा हो गया.

डेढ़ बज चुका था. लंच खत्म हुआ. दोनों भोजनालय के बाहर आकर खड़े हुए, कुछ ही दूर एक आटोरिक्शा खड़ा था जिसके ड्राइवर की आँखें ग्राहक तलाश रही थीं. प्रिया उसे आवाज देने ही वाली थी कि उसकी नज़र इन दोनों पर पड़ी और उसने अपना ऑटोरिक्शा इन दोनों के पास आकर रोक दिया.

ड्राइवर अपना मुहँ बाहर निकालकर बोला. “ नमस्ते दीदी, बैठो. कहाँ चलना है?”

“बब्बन भाई, मैं नहीं, आकाश जा रहे हैं.” प्रिया ने आकाश की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये मेरे मित्र हैं, जयपुर से आए हैं. इन्हें विक्रोली में अपनी कंपनी के गेस्ट हाउस जाना है. आप छोड़कर आइएगा.”

“बिलकुल, दीदी.”

आकाश, प्रिया और आटोरिक्शा चालक के बीच के वार्तालाप को चकित होकर देख रहा था. उसके विस्मय को देखकर प्रिया ने आकाश को कहा, “आकाश, बब्बन भाई आटोरिक्शा चालक यूनियन के कार्यकर्ता हैं. ये तुम्हें ठीक गेस्ट हाउस ले जाकर छोड़ेंगे.”

आकाश के चेहरे से विस्मय अब कम नहीं हुआ था. वह प्रिया के व्यक्तित्व के विस्तार को देखते हुए ही आटोरिक्शा में बैठ गया.

"प्रिया, अब मुझे निकलना चाहिए. गेस्ट हाउस में रिपोर्ट करना है और कल जॉइनिंग भी है," आकाश ने कहा.

“ठीक, आकाश, फिर मिलते हैं.”

"ज़रूर. और तुम्हारी मीटिंग के लिए ऑल द बेस्ट," आकाश ने टैक्सी में बैठते हुए कहा.

टैक्सी जैसे ही आँखों से ओझल हुई. दोपहर की धूप अब तेज़ हो गई थी. उसके मन में आकाश के साथ बिताए उन छह घंटों की कोमलता ताज़ा थी, लेकिन तभी उसके मोबाइल की स्क्रीन पर प्रशांत बाबू का मैसेज चमका— "प्रिया, हम पहुँच गए हैं. आ रही हो न."

प्रिया ने एक लंबी सांस ली. फोन पर प्रशांत बाबू को कॉल करके कहा, “मैं दस मिनट में पहुँच रही हूँ.”
... क्रमशः

शनिवार, 9 मई 2026

भीतरी मोर्चा

देहरी के पार, कड़ी - 48
आमसभा ने निर्णय किया था कि कार्यसमिति के सदस्य हर मजदूर से मिलेंगे और उसकी राय जानेंगे. प्रिया और उसकी टीम पहले मजदूरों के परिवारों के बीच रैंडम सर्वे कर चुकी थी. लगभग सबके परिवार चाहते थे कि ट्रक सिस्टम झेलने के बजाय नौकरी छोड़ देना बेहतर था. दूसरी नौकरी तलाशी जा सकती थी या खुद का कुछ काम किया जा सकता था. किन्तु अब कार्यसमिति को प्रत्येक मजदूर से उसकी और उसके परिवार की राय जाननी थी. इसकी कार्यविधि तय करने के लिए कार्यसमिति की बैठक रविवार 19 मई अपराह्न चार बजे होनी थी.

19 मई को सुबह आकाश मुंबई पहुँच रहा था. प्रिया ने उसे अपने यहाँ आने को कहा था लेकिन उसने मना कर दिया. आकाश ने मना करते समय जो बात कही थी, उसकी गूंज उसके ज़ेहन से नहीं जा रही थी. "यहाँ तुम अकेली रहती हो. मेरे साथ तुम्हारा ऐसा कोई रिश्ता नहीं जिससे मेरा वहाँ रुकना समाज बर्दाश्त कर सके." फिर भी आकाश के मुंबई आते ही उससे मिलना चाहती थी.

आकाश के तर्क से प्रिया निरुत्तर हो गई थी, लेकिन जब उसने फुरसत में इस वाक्य की परतों को टटोला. वह खुद से सवाल कर रही थी कि आखिर आकाश ने यह तर्क क्यों रखा? क्या आकाश प्रिया की सामाजिक छवि को लेकर चिंतित है? या फिर वह खुद अपनी छवि के प्रति सचेत है? यह सही था कि उसके घर छोड़ देने के बाद जब आकाश का जयपुर निवास उसकी अस्थायी शरणस्थल बना था तो उसके मंगेतर विक्रांत ने वहाँ पहुँचकर हंगामा करने का दुस्साहस किया था और प्रिया और आकाश के नामों को जोड़कर बवाल खड़ा किया था, हालाँकि तब वह आकाश को ठीक से जानती तक नहीं थी, उसके लिए वह मात्र एक सहकर्मी था. तो क्या विक्रांत का मिथ्या आरोप लगाकर बवाल करना ही आकाश की इस सतर्कता का कारण है.

बहुत सोचने के बाद प्रिया को अहसास हुआ कि वह खुद किसी गहरी भावना से संचालित होकर उसे अपने यहाँ रुकने का न्योता दे रही थी, यह भूलकर कि जिस समाज में वे रहते हैं, वहाँ एक युवक और युवती का 'बिना रिश्ते' के एक छत के नीचे होना आज भी संदेह की नज़र से देखा जाता है. उसने सोचा, "क्या आकाश के मन में भी मेरे प्रति वैसी ही भावना है जिसे वह अपनी इस 'मर्यादा' के पीछे छुपा रहा है?" आकाश के संस्कार और उसका ठहराव प्रिया को उसकी ओर और अधिक खींच रहे थे. उसे महसूस हुआ कि आकाश ने यह दूरी बनाकर दरअसल उनके बीच के सम्मान को और ऊँचा कर दिया था.

बुधवार को ऑफिस में अधिक काम होने से प्रिया बहुत थक गई थी. ऑफिस से निकलते हुए भी उसे देर हो गई थी. घर पहुँचकर खुद के लिए डिनर तैयार करना उसे अपने बस का नहीं लग रहा था. उसने तय किया कि वह एमबी (मेवाड़ भोजनालय) से डिनर करके घर पहुँचेगी, रामजी काका से मिलना भी हो जाएगा. लेकिन उसकी आशा के विपरीत प्रशांत बाबू भी वहीं मिल गए. वे डिनर खत्म करने वाले थे. प्रिया को देखकर प्रसन्न हो गए. बोले, आओ प्रिया, मैं तुम्हें फोन करने की सोच ही रहा था. और देखो, तुम यहीं मिल गई।”

“नमस्ते सर, कोई जरूरी बात थी?” प्रिया ने बैठते हुए पूछा.

“रविवार को ईसीआई यूनियन की कार्यसमिति बैठक होगी. उससे पहले कार्यसमिति के कुछ खास सदस्यों की एक बैठक रविवार दोपहर दो बजे रखी है. तुम्हारी टीम एक रैंडम सर्वे पहले कर चुकी है इसलिए मैं चाहता हूँ इस दो बजे वाली बैठक में तुम भी शामिल रहो.”

“पर मैं तो उस यूनियन की सदस्य भी नहीं हूँ. क्या ऐसी बैठक में शामिल रहना मेरे लिए उचित होगा? और कार्यकारिणी की बैठक के पहले उसी कार्यकारिणी के कुछ खास सदस्यों का मिलना एक तरह से कार्यकारिणी में एक गुट जैसा व्यवहार नहीं होगा?. प्रिया ने सवाल किया.

“मुझे तुमसे ऐसे ही सवाल की उम्मीद थी. ....” प्रशांत बाबू आगे कुछ बोलते उससे पहले ही रामजी पानी का गिलास लेकर आ गए. “बिटिया आज तुमने आकर बहुत अच्छा किया, मुझे भी तुम्हारी याद आ रही थी. पहले बताओ, तुम्हारे लिए चाय भिजवाऊँ या खाना ही लगवा दूँ.”

“नहीं काका, अब चाय का समय नहीं रहा. बहुत भूख लगी है, खाना ही लगवा दो. बस दाल, एक अच्छी सी सब्जी, एक कटोरी दही और चपाती भिजवा दो आप. मैं प्रशांत बाबू से कुछ बातें कर लूँ. डिनर के बाद आपसे खूब बातें करके जाउंगी.” प्रिया ने कहा.

“ठीक है बिटिया मैं खाना ही लगवाता हूँ, तुम प्रशांत बाबू से बात कर लो.”

प्रशांत बाबू ने फिर से बात आरंभ की, “यही तो तुम्हारी विशेषता है कि तुम बात का विश्लेषण तुरन्त कर लेती हो. तुम फौरन गुट वाली बात पर पहुँच गई, यह किसी और के लिए इतना आसान नहीं था. तुम जानती हो मैं, कामरेड कुलकर्णी, शिंदे और रामजी काका डब्लूपीवीसी (वेनगार्ड पार्टी ऑफ वर्किंग क्लास) के मेंबर हैं.”

“हाँ मुझे पता है, इस पार्टी का राजनैतिक कार्यक्रम आपने ही मुझे पढ़ने को दिया था. और भी कुछ किताबें आपने मुझे दी थीं. मैंने सभी पढ़ी हैं.”

“फिर तुम समझ सकती हो कि यह गुट की नहीं बल्कि ईसीआई यूनियन में पार्टी के फ्रेक्शन की मीटिंग है.” प्रशांत बाबू ने कहा. “इस मीटिंग में हम विचार करेंगे कि मजदूरों के व्यापक हित में क्या है? मैं चाहता हूँ कि तुम भी इस मीटिंग में रहो.”

“सर, एक राजनैतिक पार्टी के फ्रेक्शन में क्या गैर पार्टी मेंबर भी शामिल हो सकता है?” प्रिया ने अपनी शंका जाहिर की.

“सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता. किन्तु तुम्हारी समझ बहुत वस्तुनिष्ठ है. तुम ईसीआई मजदूरों और उनके संघर्ष से यकायक ही गहराई के साथ जुड़ चुकी हो. तुम उनके बारे में सोचती हो और मुझसे या शिंदे से बहुत भिन्न भी नहीं हो. मैं स्वयं तुम्हारी तरह मध्यवर्ग से आता हूँ, इसलिए मुझपर उस वर्ग की सोच का प्रभाव अभी भी बहुत है और मैं उतना वस्तुनिष्ठ तरीके से नहीं सोच पाता हूँ जितना कि तुम. इसलिए हमने सोचा है कि तुम भी उस मीटिंग में रहो तो अच्छा है.”

प्रशांत बाबू की बात सुनकर प्रिया हँस पड़ी. “सर ऐसा भी नहीं है मैं भी जल्दी ही भावना में बह जाती हूँ.”

“हम सभी मनुष्य हैं और संवेदनशील भी, भावनाएँ हम सभी को प्रभावित करती हैं, लेकिन जीवन भावनाओं से नहीं बल्कि ठोस जमीनी यथार्थ से चलता है और तुम बहुत जल्दी भावनात्मक आवेग से मुक्त होकर वस्तुनिष्ठ रीति से सोचने लगती हो. तुम्हारे साथ अक्सर मुझे लगता है कि तुम एक रेडीमेड पार्टी मेंबर हो.”

इस बार प्रिया को हँसी चली तो ठहाके में बदल गई. पास की टेबलों पर बैठे लोग उसकी ओर देखने लगे. लोगों का ध्यान आकर्षित होते देख प्रशांत बाबू ने पूछा, “तुम बताओ इस मीटिंग में आ रही हो या नहीं?”

“मुझे सोचना पड़ेगा, सर. उसी दिन सुबह आकाश आ रहा है वह मंडे को नई कंपनी जॉइन कर रहा है. मैं उससे तुरंत मिलना चाहती हूँ. मैंने उसे अपने यहाँ ही रुकने को बोला था, पर उसने मना कर दिया. वह सीधे गेस्ट हाउस जाना चाहता है. मैं उससे बात करके आपको बताऊंगी कि मैं मीटिंग में आ सकती हूँ कि नहीं.”

“वह तुम्हारा आउटलुक है, पर कोशिश करना कि तुम आ सको. मुझे लगता है तुम्हारे होने से हम सही निर्णय ले सकेंगे.”

“ठीक है, मैं कोशिश करूंगी. यदि आज ही आकाश से बात हो सकी तो कल आपको फोन कर के बता दूंगी.” प्रिया ने कहा.

तब तक प्रिया का खाना टेबल पर आ चुका था और प्रशांत बाबू अपना भोजन समाप्त कर चुके थे. “ठीक प्रिया, मैं तुम्हारे उत्तर का इंतजार करूंगा.” इतना कहकर प्रशांत बाबू टेबल से उठ गए.
... क्रमशः

शुक्रवार, 8 मई 2026

संघर्ष ही संघर्ष

देहरी के पार, कड़ी - 47
प्रिया मेवाड़ भोजनालय के डिनर से लौटकर फ्लैट पहुँची तो 11 बजे थे. कपड़े बदल कर वह बेड पर लेटी ही थी कि फोन बज उठा. आकाश की कॉल थी.

“कैसी हो प्रिया?”

“मैं ठीक हूँ. तुम्हारा नोटिस पीरियड कब खत्म हो रहा है और जॉइन करने मुंबई कब आ रहे हो?”

“बस जल्दी ही आ रहा हूँ.”

“वो कैसे? 60 दिन का नोटिस पीरियड है, अभी तो नोटिस दिए मुश्किल से दस दिन हुए होंगे?”

“मेरा प्रोजेक्ट खत्म हो गया है, रेजिग्नेशन के बाद कंपनी ने मुझे नया प्रोजेक्ट देना नहीं है, तो मुझे अर्ली रिलीज मिल गया है. 17 मई को रिलीव हो रहा हूँ, 19 को सुबह मुंबई पहुँच रहा हूँ. बीस को नयी कंपनी में जॉइन करूंगा.” आकाश ने बताया.

“अरे वाह¡ बस हफ्ते भर बाद¡ यह तो बहुत बढ़िया है. तुम कहीं और नहीं रुकना, सीधे मेरे फ्लैट पर चले आना.”

“नहीं प्रिया, कंपनी मुझे दो सप्ताह के लिए गेस्ट हाउस में फ्री रेजीडेंस दे रही है. इस बीच मैं अपना फ्लैट तलाश लूंगा.”

“क्यों वहाँ क्यों रुकोगे? मैं जयपुर आई तो तुमने जाने दिया था होटल?”

“प्रिया वह अलग बात थी. वहाँ मैं परिवार के साथ था और तुम्हें मैंने नहीं मेरे परिवार ने रोका था और तुम चाहते हुए भी होटल नहीं जा सकी थी. यहाँ तुम अकेली रहती हो. मेरे साथ तुम्हारा ऐसा कोई रिश्ता नहीं जिससे मेरा वहाँ रुकना समाज बर्दाश्त कर सके. फिर अभी विक्रांत का मुम्बई आना जाना है. मैं गेस्ट हाउस ही जा रहा हूँ.”

प्रिया आकाश के इस तर्क के सामने निरुत्तर हो गई. कॉल समाप्त होने के बाद भी बहुत देर तक वह आकाश और उसके परिवार के बारे में सोचती रही. उसके मम्मी-पापा दोनों कितने स्नेही हैं, और छोटी बहिन तान्या कितनी प्यारी है? जयपुर में उसके यहाँ रुकने के वक्त, विक्रांत से होने वाले अपने विवाह के दो दिन पहले उसने घर छोड़ा था. जयपुर उनके घर रहने के दौरान उसके मन में यह बात बैठ गयी थी की यदि उसका विवाह हो तो ऐसे व्यक्ति से हो जिसका परिवार आकाश के परिवार की तरह हो. आकाश से रिश्ते की बात तो वह आज तक भी नहीं सोच पाई. सोचती भी कैसे? दोनों एक ही कंपनी के एम्पलॉई थे और कंपनी के कंडक्ट रूल्स एम्पलॉइज के बीच अंतरंग संबंधों को पूरी तरह वर्जित करते थे. किन्तु अब जब आकाश ने कंपनी छोड़ दी थी और दूसरी कंपनी जॉइन कर रहा था तो यह बात भी उसके ज़ेहन में दस्तक दे रही थी कि काश आकाश और उसके बीच इस तरह का रिश्ता बन जाए. सोचते-सोचते उसे कब नींद आ गई पता ही नहीं लगा.
....
ईसीआई एम्पलॉइज एसोसिएशन की आमसभा रविवार 12 मई को शाम 4 बजे आईआईडीईए के अंधेरी ऑफिस के सामने वाले पार्क में रखी गयी थी. मैनेजमेंट के क्लोजर एप्लीकेशन वापस ले लेने के बाद यह पहली सभा थी. प्रिया को इस की कार्यवाही हर हाल में देखनी थी. वह जानना चाहती थी कि जिनके परिवार ट्रक सिस्टम से छुटकारे के लिए, बिना कोई लाभ लिए भी उन्हें यह नौकरी छोड़कर कुछ भी कर लेने की सलाह कितने ही महीनों से दे रहे थे, उन मजदूरों की अब क्या प्रतिक्रिया रहेगी. फेयर वेजेज का मामला इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल को भेज दिया गया था लेकिन अभी तक उसकी एक भी सुनवाई नहीं हुई थी. क्लोजर एप्लीकेशन की कार्यवाही के दौरान यह स्पष्ट हो गया था कि प्रबंधन हर हालत में उद्योग को बंद करना चाहता था. आमसभा में कॉमरेड कुलकर्णी भी आने वाले थे. वह उनको भी सुनना चाहती थी. उसने अपनी इच्छा प्रशांत बाबू को बताई तो उन्होंने कहा, तुम्हें जरूर आना चाहिए. तुमने मजदूरों की इस लड़ाई में तुम्हारा महत्वपूर्ण योगदान दिया है. तुम्हारा हक बनता है.

शाम साढ़े चार बजे आमसभा शुरू हुई. प्रिया भीड़ का हिस्सा बनकर इसे देख रही थी. यूनियन सचिव शिंदे और प्रशांत बाबू के संक्षिप्त संबोधन के बाद कॉमरेड कुलकर्णी माइक पर आए. उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सीधे मुद्दे की बात की.

कुलकर्णी जी ने आगाह करते हुए कहा, “साथियों, प्रबंधन पराजित हुआ है पर थका नहीं है. उसे आपकी फैक्ट्री से ज्यादा फैक्ट्री की ज़मीन की कीमत में दिलचस्पी है. अभी जो राहत मिली है, वह सिर्फ अक्टूबर चुनाव तक की राजनीतिक मजबूरी है. चुनाव खत्म होते ही नेता और पूंजीपति फिर हाथ मिला लेंगे. मुमकिन है कि प्रबंधन जल्द ही आपके सामने एक आकर्षक 'स्वैच्छिक सेवा समाप्ति' (VRS) का प्रस्ताव रखे.”

उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा, “मैं जानना चाहता हूँ कि यदि प्रबंधन मोटी रकम देकर सम्मानजनक समझौते की बात करे, तो आपकी क्या राय है?”

पार्क में सन्नाटा छा गया. तभी एक वरिष्ठ मजदूर ने खड़े होकर सुझाव दिया, “कॉमरेड, यह फैसला खुली सभा में नहीं हो सकता. मैनेजमेंट के कान हर जगह हैं. बेहतर होगा कि कार्यसमिति हर मजदूर से व्यक्तिगत बात करे और फिर हम कोई सामूहिक निर्णय लें.”

पार्क में मौजूद सैकड़ों मजदूरों ने एक स्वर में इस सुझाव का समर्थन किया. आमसभा समाप्त हुई, लेकिन वातावरण में एक नई तरह का तनाव छोड़ गई.

सूरज ढल रहा था. प्रिया ने देखा कि मजदूर गुटों में बँटकर फुसफुसाते हुए पार्क से बाहर निकल रहे थे. आज जीत का गुलाल नहीं था, बल्कि भविष्य की चिंताओं का धुंधलका था. उसे अहसास हुआ कि “मजदूरों के जीवन में न्याय मिलना कितना दुष्कर है. यूनियन के रूप में संगठित होना, सही नेतृत्व मिलना और फिर अपने हकों के लिए निरंतर लड़ना—यही उनके जीवन का अनिवार्य चक्र बन गया है. यदि वे संगठित न हों, तो शायद हमेशा मालिकों के हाथों की कठपुतली बने रहें. आजीवन संघर्ष ही उनका भाग्य है; मानो जिस दिन संघर्ष थमेगा, जीवन की डोर भी टूट जाएगी."

प्रिया सोच रही थी कि क्या दुनिया भर के तमाम निर्माण करने वाले इन मेहनतकशों के लिए इस दुश्चक्र से निकलने का कोई मार्ग हो सकता है?
... क्रमशः

गुरुवार, 7 मई 2026

खुशी

देहरी के पार, कड़ी - 46
गुरुवार 9 मई 2019.

प्रिया ने दिन में अनेक बार ट्रैक करके क्लोजर एप्लीकेशन की फाइल का मूवमेंट जानने की कोशिश की, लेकिन फाइल सीएमओ से श्रम सचिव के पास आकर वहीं अटक गयी थी.

उसने ऑफिस से अपने फ्लैट पहुँचकर प्रशांत बाबू को फोन करके पूछा तो उनसे पता लगा कि चीफ मिनिस्टर ने प्रबंधन की विद्ड्रॉल एप्लिकेशन पर आगे सुनवाई के लिए फाइल श्रम मंत्रालय भेज दी है. यूनियन सचिव शिंदे को फोन पर सूचना मिली है कि 10 मई को लेबर सेक्रेटरी एएसएल ऑफिस में सुबह 11 बजे सुनवाई करेंगे.

10 मई को सुबह एएसएल ऑफिस का गलियारा शांत था. ईसीआई कंपनी के एमडी के अहंकार पर सीएमओ पर जो 'चाबुक' चला था, उसका असर आज साफ़ दिख रहा था. एमडी और वकील भट्ट अपने अपने फॉर्मल आउट फिट में अपने-अपने सहायकों सहित समय से बीस मिनट पहले ही इजलास में आकर बैठे थे. लेकिन दोनों की आँखों से वह चमक गायब थी जो दूसरों को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल होती थी. 11 बजने से कुछ मिनट पहले कुलकर्णी जी, प्रशांत बाबू, यूनियन के सचिव शिंदे और वकील चव्हाण ने इजलास में प्रवेश किया.

जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, कुलकर्णी जी ने एक नया कानूनी पेच मेज पर रख दिया. "सर," कुलकर्णी जी ने सचिव की ओर देखते हुए कहा, "प्रबंधन ने फैक्ट्री के क्लोजर को बिना शर्त वापस लेने का आवेदन प्रस्तुत किया है, यह स्वागत योग्य है. लेकिन पिछले दो महीनों में इन मजदूरों ने जो मानसिक तनाव झेला है, और यूनियन ने इस अवैध बंदी के खिलाफ जो कानूनी लड़ाई लड़ी है, उसका क्या? मैनेजमेंट ने जानबूझकर यह विवाद खड़ा किया. हमारी मांग है कि प्रबंधन इस मुकदमे का खर्च यूनियन को दे."

एमडी के चेहरे पर झल्लाहट उभरी, लेकिन लॉ सेक्रेटरी ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया. उसने सीधे कंपनी वकील से पूछा, "मिस्टर भट्ट, यूनियन की मांग जायज है. मैनेजमेंट ने प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है. 'लिटिगेशन कॉस्ट' तो आपको देनी होगी. क्या आप तैयार हैं?”

“आपने बजा फरमाया सर, लेकिन इस पर मुझे कंपनी से सलाह करनी होगी.” वकील भट्ट ने अतिशय विनम्रता से उत्तर दिया. शायद उसके पास इस्तेमाल करने के लिए इसके सिवा कोई और युक्ति शेष नहीं बची थी.”

“कंपनी के एमडी आपके साथ हैं, आप चाहें तो उनसे अकेले में बात कर सकते हैं”

“जी सर.”

“मिस्टर कुलकर्णी, यूनियन कितना खर्चा चाहती है?” सेक्रेटरी ने पूछा. जवाब यूनियन के वकील चव्हाण साहब ने दिया.

“यहाँ कितने दिन सुनवाई हुई है? इसे मामले की फाइल पर देखा जा सकता है. खुद मिस्टर भट्ट जानते हैं कि उनकी और मुम्बई हाईकोर्ट के डेजिग्नेटेट सीनियर वकील की एक दिन की फीस क्या है. इसके अतिरिक्त कोर्ट आने जाने, स्टेशनरी, ड्राफ्टिंग, टाइपिंग आदि के खर्चे आप खुद अनुमान लगा सकते हैं. यह किसी भी हालत में बीस लाख से कम नहीं होगा. फिर भी जो वाजिब कॉस्ट आप तय कर देंगे वह हमें मान्य होगी.” कुलकर्णी जी ने कहा.

“मिस्टर भट्ट, आपका क्या कहना है?”

“सर, हम आपस में सलाह करके बताते हैं, दो मिनट का समय दिया जाए.” भट्ट ने निवेदन किया.”

“ठीक है, मैं चैम्बर में लौट रहा हूँ. आप आपस में सलाह कर लीजिए, हो सके तो कुलकर्णी जी और चव्हाण साहब से बात करके सहमति बनाइए. मुझे दस मिनट बाद चैम्बर में आकर बताइए.” इतना कह कर सेक्रेटरी इजलास से उठ कर अपने चैम्बर में चले गए.

वकील भट्ट और एमडी भी अपने सहायकों सहित इजलास से बाहर चले गए.

कोई दस मिनट बाद कोर्ट जमादार ने आकर चव्हाण साहब को सूचना दी कि आप चार लोगों को सेक्रेटरी साहब ने चैम्बर में आने को कहा है. भट्ट साहब और एमडी भी वहीं बैठे हैं. चव्हाण साहब, कुलकर्णी जी, प्रशांत बाबू और यूनियन सेक्रेटरी शिंदे लॉ सेक्रेटरी के चैम्बर में पहुँचे. सेक्रेटरी ने उन्हें बैठने को कहा.

“भट्ट साहब ने लिटिगेशन कॉस्ट के रूप में दस लाख देने का प्रस्ताव किया था. लेकिन प्रभावी सुनवाई के दिनों और चव्हाण साहब के सम्मान को देखते हुए मेरे कहने पर ये बारह लाख देने को तैयार हैं, इस पर आपको कोई एतराज तो नहीं?” लॉ सेक्रेटरी ने कुलकर्णी जी से पूछा.

कुलकर्णी जी ने चव्हाण साहब की और देखा. तब खुद चव्हाण साहब बोल पड़े. “ लिटिगेशन कॉस्ट एप्रूव करने का काम आपका है, आप जो भी फरमा देंगे वह यूनियन को मंजूर होगा.”

लॉ सेक्रेटरी ने एमडी की और मुखातिब होकर कहा. “मिस्टर एमडी, आप यह कॉस्ट कब तक अदा कर देंगे?”

“सर हम विवाद को शेष नहीं रखना चाहते. हम अभी दस मिनट में चैक आपको सौंप देंगे, आप इन्हें तुरन्त दे सकते हैं.” एमडी के चेहरे पर शांति थी, अब वह कुछ राहत महसूस कर रहा था. तभी कुलकर्णी जी बोल पड़े.

“एमडी साहब, अभी तो ट्रक सिस्टम की समाप्ति और फेयर वेजेज का विवाद इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में शेष है. बेहतर है कि उसे यूनियन से बात करके सैटल कर लें.”

“कुलकर्णी जी, आपकी बात सही है. मिस्टर एमडी, आपको इस पर सोचना चाहिए. मैं कुलकर्णी जी को जानता हूँ. उस मामले में आपको निगोशिएट करने में कोई परेशानी नहीं होगी. सचिव ने सलाह दी.

“जरूर, हम कोशिश करेंगे. यदि आपकी इजाजत हो तो मैं बाहर जाकर अपने असिस्टेंट को चैक बनाने के लिए कह दूँ. बात यहीं खत्म हो तो बेहतर है.” एमडी ने लॉ सेक्रेटरी को कहा. चैम्बर में मौजूद वकील भट्ट सहित सभी मुस्कुरा उठे.

कुछ देर में मिस्टर एमडी चैक लेकर चैम्बर में लौटे. सेक्रेटरी को चैक दिया, जिसे उसने तुरन्त कुलकर्णी जी को दिया, कुलकर्णी जी ने चैक यूनियन सचिव शिंदे को देकर, रसीद रीडर को देने को कहा.

सेक्रेटरी ने चैम्बर में ही चाय मंगवा ली थी. चाय समाप्त होने पर सब बाहर निकले. वहाँ फैक्ट्री की दूसरी शिफ्ट के 60-70 मजदूर आ गए थे. कुलकर्णी जी ने उन्हें आज की तमाम कार्यवाही के बारे में बताया. मजदूरों ने जब जाना कि मैनेजमेंट को 12 लाख रुपए मुकदमा खर्च के रूप में यूनियन को दिए हैं तो उनमें उल्लास छा गया. वे वहीं “इंकलाब जिन्दाबाद¡” का नारा लगाने लगे.

प्रिया को खबर प्रशांत बाबू ने फोन पर दी तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. मजदूरों की पूरी लड़ाई में उसका और उसके साथियों का भी योगदान था. उसे लग रहा था कि वह जीत गई है. उसने अपने साथियों को बताया और कहा कि आज का डिनर मेरी ओर से मेवाड़ भोजनालय में रहेगा.
... क्रमशः

बुधवार, 6 मई 2026

चाबुक

देहरी के पार, कड़ी - 45
ईसीआई यूनियन सचिव शिंदे और कुलकर्णी जी दादर ऑफिस पहुँगे. वहाँ कुछ पोस्टर और एक पर्चा डिज़ाइन किए हुए मौजूद थे. वे दोनों पोस्टर देखने लगे.

पोस्टरों की टैगलाइन थी, “कारखाना बंदी मंजूर नहीं”. पर्चे की हेड लाइन थी, “कारखाना बंदी को मंजूर करने वाले मंत्री, विधायक, सरकार को जनता नहीं बख्शेगी.” कुलकर्णी जी ने पोस्टर की एक डिजाइन चुनी और पर्चे को ओ. के. कर दिया. ऑफिस सेक्रेटरी को बुलाकर कहा, “ये डिजाइन लातूर यूनियन दफ्तर को व्हाट्सएप कर दो. सौ पोस्टर और ढाई हजार पर्चे छपवाएंगे. पोस्टर आज शाम ही निलंगा शहर में चिपकाए जाएंगे और पर्चे भी रात दस बजे तक सारे बँट जाएँ. पोस्टर और पर्चे बाँटने की खबर लातूर के सभी अखबारों में छपवाने का इंतजाम भी करेंगे. मेरी लातूर और निलंगा दोनों जगह बात हो चुकी है.”

इसके बाद कुलकर्णी जी ने शिंदे को कहा. “आपकी ड्यूटी है कि आप पोस्टर और पर्चे का डिजाइन लातूर पहुँच जाने के बाद लातूर के जिला सेक्रेट्री और निलंगा यूनियन के सेक्रेटरी से संपर्क में रहेंगे, दोनों के नंबर मैं आपको व्हाट्सएप कर रहा हूँ . जब पोस्टर लग जाने और पर्चे बँटने की खबर आपको मिल जाए, तब आप मुझे बताएंगे. आप लातूर में भी पूछेंगे कि खबर छपने की व्यवस्था की गई कि नहीं.”

आठ मई की सुबह साढ़े दस बजे ही शहर गर्मी से तपने लगा था. लेकिन सचिवालय में श्रम मंत्री का विशाल चैम्बर वातानुकूलित होने पर भी बाहर से ज्यादा गर्म था. विधायक महेश फड़के ने कल ही अपनी शिवसेना वाली आक्रामकता दिखाते हुए कुलकर्णी और पाँच मजदूरों के साथ 11 बजे मिलने का समय ले लिया था. लेकिन सुबह जो खबर उन्हें निलंगा से मिली, उसने उन्हें परेशान कर दिया था. ईसीआई के बंदीकरण के मामले में वहाँ पोस्टर लगे थे और पर्चे बँटे थे और सुबह मजदूरों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया था.

मंत्री ने लेबर सेक्रेटरी को बुला रखा था. वह जैसे ही चैम्बर पहुँचा. मंत्री ने ऊँची आवाज में पूछा, “ये क्या चल रहा है? मेरे कहे बिना ईसीआई की फाइल लॉ सेक्रेटरी के पास कैसे पहुँची?”

“वो ... सर आप दौरे पर थे, इसलिए मैंने सोचा जब तक आप लौटें वहाँ से लीगल ओपिनियन ले ली जाए. समय बचेगा.” सेक्रेटरी ने दबे स्वर में कहा.


“मुझसे फोन पर पूछ सकते थे.”

“सर, गलती हो गई. आईंदा ध्यान रखेंगे.”

“अभी मेरा बाप, एमएलए फड़के आने वाला है, उसके साथ कामरेड कुलकर्णी भी होगा और पाँच मजदूर भी होंगे. उनको क्या जवाब दूंगा?”

उनकी बात चल ही रही थी कि बाहर से जमादार पर्ची लेकर आ गया कि फड़के और कुलकर्णी मजदूरों के साथ हाजिर हैं.

“कहाँ बिठाया उनको?”

“विजिटर्स हॉल में बिठा दिया है.”

“जाकर बोलो मंत्री जी इधर ही आ रहे हैं.”

उधर सेक्रेट्रिएट इंटेलिजेंस का सीनियर इंस्पेक्टर भोंसले चीफ मिनिस्टर के चैम्बर में रिपोर्ट कर रहा था, “ईसीआई के मामले में शिवसेना एमएलए, लेबर लीडर कुलकर्णी और पाँच कार्यकर्ताओं के साथ लेबर मिनिस्टर से मिलने पहुँचा है, उधर निलंगा में पोस्टर चिपकने, पर्चा बँटने और अखबार में उसकी खबर छपने से मिनिस्टर का पारा आसमान पर है, वह पगलाया हुआ है.”

लेबर मिनिस्टर अपने चैंबर से विजिटिंग हॉल के लिए निकलने वाला था कि तभी उसके पीए के फोन की घंटी बजी. उसका चेहरा सफेद पड़ गया. उसने हड़बड़ाते हुए कहा, "सर, सीएमओ (मुख्यमंत्री कार्यालय) से फोन है. ईसीआई की फाइल अभी के अभी छठे माले पर मंगाई है."

“भेजो अभी के अभी भेजो, मैं फड़के से मिलकर लौटूँ उसके पहले भेज दो. बला टले.”

मिनिस्टर फड़के, कुलकर्णी और मजदूर कार्यकर्ताओं से मिला. उनको बोला, “फैक्ट्री बंद होने की परमिशन हरगिज नहीं मिलेगी और कम्युनिकेशन भी 11 मई के पहले हो जाएगा.

दो बजे प्रिया की घड़ी ने वाइब्रेट किया तो वह कंप्यूटर को स्लीप मोड में छोड़कर लंच के लिए उठ गई. लंच रूम में आकर टिफिन खोलने के पहले उसने मोबाइल पर ईएसआई की फाइल की स्टेटस चैक की, उसकी धड़कनें तेज हो गईं. फाइल लेबर सेक्रेटरी से सीधे सीएमओ पहुँच चुकी थी. उसने तुरंत मैसेज टाइप किया: "फाइल श्रम मंत्रालय से सीधे 'CMO' शिफ्ट हो गई है. कुछ बहुत बड़ा होने वाला है."

प्रशांत बाबू को जब यह मैसेज मिला, तो उन्होंने कुलकर्णी जी की ओर देखा. राजनैतिक शतरंज की बिसात पर अब सबसे बड़ा 'वजीर' मैदान में उतर चुका था.

ईसीआई का एमडी, जो अब तक लेबर मिनिस्टर और इंडस्ट्री मिनिस्टर को अपनी उंगलियों पर नचा रहा था, उसे आनन-फानन में मुख्यमंत्री के केबिन में बुलाया गया. वह सूट-बूट में पूरी तैयारी के साथ आया था कि घाटे के आँकड़े पेश करेगा, लेकिन सामने मुख्यमंत्री का शांत पर बेहद सख्त चेहरा देखकर उसकी सारी दलीलें गले में ही अटक गईं.

मुख्यमंत्री ने फाइल को मेज पर सरकाते हुए एमडी की आँखों में देखा. "मिस्टर एमडी, आप पिछले एक महीने से लेबर मिनिस्टर, इंडस्ट्री मिनिस्टर और विधायक को साधने की कोशिश कर रहे थे. आपने सोचा कि सबको 'मैनेज' कर लिया तो रास्ता साफ है? शायद आपने यह भुला दिया कि इस राज्य का नेतृत्व मैं कर रहा हूँ."

एमडी ने कुछ कहना चाहा, पर मुख्यमंत्री ने हाथ के इशारे से उसे चुप करा दिया. "मुझे आपके घाटे की बैलेंस शीट में कोई दिलचस्पी नहीं है. मेरी दिलचस्पी अक्टूबर में होने वाले चुनावों में है. अगर ये 350 मजदूर बेरोजगार हुए, तो अंधेरी पूर्व से लेकर आपके इंडस्ट्रियल बेल्ट तक जो आग लगेगी, उसे बुझाने की ताकत आपमें नहीं है."

मुख्यमंत्री की आवाज़ अब और ठंडी और मारक हो गई. "मैनेजमेंट को तरजीह चाहिए थी, वह मैंने दे दी—सीधे आपको यहाँ बुलाकर. अब फैसला आपका है. या तो यूनियन के साथ बैठकर समझौता कीजिए और दीवाली तक कारखाना चालू रखिए, वरना मैं अभी इसी वक्त इस एप्लिकेशन को रिजेक्ट करने का आदेश दे रहा हूँ. आज ही आपको कम्युनिकेशन मिल जाएगा. और याद रखिए, एक बार रिजेक्ट हुआ तो अगली एप्लिकेशन के लिए पूरे एक साल का इंतजार करना होगा. एक साल का करोड़ों का मुनाफा छोड़ने के लिए तैयार हैं?"

एमडी के माथे पर पसीना चमकने लगा. उसका सारा अहंकार भाप बनकर उड़ रहा था.

मुख्यमंत्री ने फाइल को परे धकेलते हुए ठंडे स्वर में कहा, "मिस्टर एमडी, आप अब तक अपनी रसूख के जोर पर सिस्टम को हांक रहे थे, लेकिन आप भूल गए कि जब सत्ता का ‘चाबुक’ चलता है, तो बड़े-बड़े मैनेजमेंट के आंकड़े धुल जाते हैं. समझदार हो तो आज ही विद्ड्रॉल की एप्लिकेशन दो. आधे घंटे का समय है—फैसला आपका है. सोच लो और मुझे बताओ," मुख्यमंत्री ने अपनी कलम उठाई और दूसरी फाइल की ओर देखने लगे. एमडी के लिए यह इशारा था कि उसे फौरन उठकर बाहर जाना है.

एमडी केबिन से बाहर निकला. उसके चेहरे पर वह चमक नहीं थी जो चार दिन पहले थी. बाहर वकील भट्ट उसका इंतजार कर रहा था. “मिस्टर भट्ट, बीस मिनट में क्लोजर एप्लीकेशन विद्ड्रॉल की एप्लीकेशन तैयार करके लेबर सेक्रेटरी को देनी है. भट्ट फौरन लेबर सेक्रेटरी के पीए के दफ्तर में घुसा. वहाँ क्लर्क को पटाया और दो लाइन की एप्लीकेशन टाइप करवा लाया. एमडी से हस्ताक्षर करवाकर एप्लीकेशन सीधे लेबर सेक्रेटरी को जाकर थमा दी.

लेबर सेक्रेटरी एमडी को आश्चर्य से देखने लगा. उसने एप्लीकेशन ले ली और बोला, “एमडी साहब साथ हैं, उन्हें लेकर यहाँ मेरे चैम्बर में बैठो मैं बीस मिनट में लौटता हूँ.

प्रिया अपने कंप्यूटर पर काम कर रही थी कि उसकी घड़ी वाइब्रेट हुई. शाम के छह बजे थे. उसने मोबाइल उठाया और ईसीआई की क्लोजर एप्लीकेशन की स्टेटस देखने लगी, अपडेट था— 'विद्ड्रॉन एप्लिकेशन फाइल्ड बाई एप्लीकेंट'.

उसकी आँखों में आँसू आ गए. उसने कांपते हाथों से कुलकर्णी जी को फोन किया. "सर... मैनेजमेंट ने फाइल क्लोज करने के लिए आवेदन दे दिया है."

कुलकर्णी जी ने लंबी सांस ली और मुस्कुराए. "अभी आधी जंग जीती है प्रिया. असली जंग कल सुबह शुरू होगी.”
... क्रमशः

मंगलवार, 5 मई 2026

सत्ता की चौखट

देहरी के पार, कड़ी - 44
सोमवार सुबह प्रिया समय पर अपने ऑफिस पहुँच गई. अपनी सीट पर पहुँचकर उसने लॉग इन किया. कुछ देर में टीम मीटिंग शुरू हुई और पाँच मिनट में खत्म हो गई. अब सभी को आज के अपने टास्क पता थे. वे काम पर जुट गए. कंप्यूटर स्क्रीन पर कोड्स की लाइनें दौड़ने लगीं. प्रिया का सारा ध्यान अपने काम पर था. दिमाग में कोई और चीज थी भी कहीं दूसरी तह में लॉक हो चुकी थी. तभी कलाई घड़ी ने वाइब्रेट किया. उसने देखा तो ठीक 12 बजे थे. यह अलार्म खुद उसी ने सेट कर रखे थे. जो सुबह सात बजे से आरंभ होकर रात ग्यारह तक हर घंटे वाइब्रेट करते थे. उसे कुर्सी पर बैठकर कंप्यूटर पर अपनी आँखें गड़ाए रखते हुए लगातार काम करना पड़ता था. जिसमें यह जरूरी था कि हर घंटे अपनी सीट से उठकर टहल ले. इससे शरीर की अकड़न दूर होती थी, आँखों को आराम मिलता था. वह दो घूँट पानी पीती थी. किसी साथी से बतियाती थी या मशीन पर जाकर अपने लिए कॉफी बना लाती थी और उसे पीते हुए कोई गीत गुनगुनाने लगती थी.

वह सीट से उठी, कूलर पर जाकर दो घूँट पानी पिया और अपने लिए एक कॉफी बनाकर वापस सीट पर पहुँचकर कॉफी की एक सिप ली. उसका ध्यान ईसीआई क्लोजर पर गया. उसने अपने मोबाइल से ट्रैक किया. फाइल अभी भी लॉ सेक्रेटरी के यहाँ थी, यह विभाग खुद मुख्यमंत्री देखते थे. उसने मैसेज टाइप किया: "फाइल अभी भी लॉ सेक्रेटरी के पास है." मैसेज पहले प्रशांत बाबू और उनके जरीए कुलकर्णी जी तक पहुँचा. उन्होंने फोन पर सीधे लॉ सेक्रेटरी से बात की. उसे समझाया कि फाइल को तुरंत क्लियर होना है. आज यह फाइल वापस श्रम मंत्रालय नहीं पहुँची तो फैक्ट्री की सारी लेबर कल सुबह मुख्यमंत्री के बंगले पर होगी. यह भी ध्यान रखना कि अक्टूबर में विधानसभा के चुनाव होने हैं. दो बजे प्रिया ने ट्रैक किया तो पता लगा कि फाइल श्रम मंत्रालय वापस जा चुकी है. कुलकर्णी जी को खबर मिली तो उन्होंने संतोष की साँस ली. अब उन्हें श्रम मंत्रालय से ही निपटना था. श्रम मंत्रालय में उन्होंने सीधे एएसएल से बात की जिसने प्रबंधक के क्लोजर एप्लीकेशन की सुनवाई की थी. उसने बताया कि वह अब इस मामले में कुछ नहीं कर सकता. अब फाइल उनके पास नहीं आनी थी. वे केवल फाइल के मूवमेंट को बता सकते हैं.

श्रम मंत्री लातूर जिले के निलंगा विधानसभा क्षेत्र से आता था और भाजपा विधायक था. यह क्षेत्र मुख्यतः कृषि पर निर्भर था. कुछ चीनी मिलें थीं और अधिकांश किसान गन्ना उगाते थे. वहाँ खेत मजदूर यूनियन का व्यापक प्रभाव था. वहाँ की दो चीनी मिलों में उनके फेडरेशन से संबद्ध यूनियनें थीं. उनका चीनी मिलों के मजदूरों की दूसरी यूनियनों के साथ मोर्चा बना हुआ था. कुलकर्णी जी जानते थे कि जरूरत पड़ने पर वहाँ से दबाव बनाया जा सकता है. लेकिन उसके पहले वे अंधेरी पूर्व के विधायक से बात करना चाहते थे. वह शिवसेना से था. उन्हें पता था कि भाजपा और शिवसेना के गठबंधन के बावजूद, चुनावी जमीन पर दोनों अपनी साख बचाने की होड़ में रहते हैं.

यूनियन के अध्यक्ष-सचिव और कारखाने के पाँच मजदूरों के साथ कुलकर्णी जी सात मई सुबह साढ़े आठ बजे ही अंधेरी पूर्व के विधायक महेश फड़के के निवास पर थे. पीए ने उन्हें बैठक में बैठाया. कुछ देर में विधायक बैठक में आ गए.

कुलकर्णी जी नमस्कार, कैसे आना हुआ?

“नमस्कार, विधायक साहब, बस ईसीआई का मामला है" कुलकर्णी जी ने मेज पर ईसीआई के मजदूरों की सूची रख दी, "इन साढ़े तीन सौ परिवारों में से ढाई सौ आपके विधानसभा क्षेत्र के वोटर हैं. अक्टूबर में चुनाव हैं. मालिक कारखाना बंद करना चाहते हैं. फाइल भाजपा के श्रम मंत्री की टेबल पर है. उसके एक दस्तखत से ये लोग सड़क पर आ गए, तो अंधेरी पूर्व की जनता यह नहीं पूछेगी कि गलती किसकी थी. वे बस यह देखेंगे कि उनकी अपनी पार्टी (शिवसेना) उन्हें बचा नहीं पाई." कुलकर्णी जी के टोन में चेतावनी थी.

“हाँ, मुझे याद है, कंपनी का एमडी आया था चार दिन पहले. लेबर मिनिस्टर को सिफारिश कराने के लिए कि मैं मिनिस्टर को कह दूँ कि कारखाना बंद होने से चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. चुनाव में बड़ा चंदा देने की बात भी कर रहा था. मैंने फटकार दिया उसको. ‘मेरे यहाँ बेरोजगारी फैलेगी, बदनामी मेरी और शिवसेना की होगी, फर्क तो पड़ेगा. मैं श्रम मंत्री को बंदी की परमिशन देने नहीं दूंगा.’ बहुत चिरौरी करता रहा. पर मैंने उसे विदा कर दिया, जाते-जाते बोलता था, फिर आएगा. पर कुलकर्णी जी आप चिन्ता ना करो. मैं अपने इलाके का मजदूर बेरोजगार नहीं होने दूंगा.” विधायक ने अपने अंदाज़ में कहा.

“फाइल लेबर सैक्रेटरी के पास है. लेबर मिनिस्टर मुंबई में नहीं है, कल लौटेगा. वह कहीं और बिज़ी हो जाएगा. लेकिन ग्यारह मई के पहले क्लोजर एप्लीकेशन निरस्त होने के आदेश पर साइन हो जाने चाहिए, वरना वक्त पर सूचना मैनेजमेंट को न मिलेगी और डीम्ड परमिशन हो जाएगी. मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे. आप और हम कुछ नहीं कर पाएंगे. बेरोजगार मजदूर क्या करता है, आपको पता है.”

“कुलकर्णी जी आप फिकर मत करो. कल आठ तारीख है. आप दस बजे इधर आ जाओ. अकेले नहीं, यूनियन के अध्यक्ष-मंत्री और दो-चार मजदूर भी होने चाहिए. आपके साथ चलूंगा लेबर मिनिस्टर के उधर. मेरी नहीं सुनी, वहाँ से सीधे मातोश्री चलेंगे. लेबर मिनिस्टर को क्लोजर एप्लीकेशन खारिज करके ऑर्डर 10 तारीख को भेजना ही पड़ेगा. अब तीन दिन मेरा-आपका यही काम है.”

विधायक निवास से बाहर आए तो यूनियन के अध्यक्ष-मंत्री और मजदूर खुश थे. कुलकर्णी जी ने कहा “अभी खुश होने की जरूरत नहीं है. शिंदे साहब आप मेरे साथ यूनियन ऑफिस दादर चल रहे हैं. हम वहाँ चलकर श्रम मंत्री के इलाके से ही उसे संदेश देने का काम करेंगे.”
... क्रमशः

सोमवार, 4 मई 2026

उमंग

देहरी के पार, कड़ी - 43
कॉमरेड कुलकर्णी के साथ हुई रणनीतिक बैठक के बाद प्रिया, स्नेहा और राहुल 'मेवाड़ भोजनालय' (MB) पहुँचे. वहाँ चल रहे एयर कंडीशनर ने उन्हें राहत दी, तो ऐसा लगा. उनमें से किसी को मुंबई में रहते हुए भी अभी यहाँ की उमस भरी गर्मी की आदत नहीं हुई थी. सबके फ्लैटों में एयर कंडीशनर थे और कंपनी के दफ्तर में तो थे ही. कुछ ही देर में प्रशांत बाबू भी वहाँ पहुँच गए. दिन भर की मानसिक थकान और ईसीआई फैक्ट्री के मजदूरों के उलझे मामले के तनाव के बीच, यह रात का भोजन एक जरूरी विराम था.

कुछ ही देर में मेज पर गरमा-गरम खाना लग गया. राहुल अभी भी 'ट्रक सिस्टम' और मजदूरों के मुआवजे के गणित में उलझा हुआ था, जबकि स्नेहा उन मजदूरों की औरतों और बच्चों के चेहरों को याद कर रही थी. तभी प्रिया का फोन मेज पर वाइब्रेट हुआ. स्क्रीन पर 'आकाश' का नाम चमकते ही प्रिया के चेहरे पर एक थकी हुई सी मुस्कान आ गई. उसने मेज से थोड़ी दूरी बनाकर फोन उठाया.

"हेलो आकाश! इतनी रात को कैसे याद किया? सब खैरियत तो है?" प्रिया ने स्वर को हल्का रखने की कोशिश की.

"प्रिया! बड़ी खुशखबरी है," आकाश की आवाज़ में वह उत्साह था जो अक्सर जयपुर की शांत गलियों में सुनाई देता था. "मैंने जिन बड़ी कंपनियों में आवेदन किया था, उनमें से एक का आज फाइनल कन्फर्मेशन आ गया है. पैकेज में सीधे १० लाख का अपग्रेड है, और कंपनी भी बहुत प्रतिष्ठित है."

प्रिया का दिल खुशी से भर गया. वह जानती थी कि आकाश पिछले काफी समय से इस स्विच के लिए मेहनत कर रहा था. "वाह आकाश! यह तो वाकई शानदार खबर है. मुझे पता था तुम कर लोगे. जयपुर में अंकल-आंटी और तान्या तो बहुत खुश होंगे!"

"हाँ, वे खुश तो बहुत हैं," आकाश थोड़ा रुका, फिर स्वर बदलते हुए बोला, "लेकिन एक पेंच है. यह वर्क-फ्रॉम-होम वाला मामला अब खत्म हो रहा है. उन्होंने साफ़ कर दिया है कि मुझे मुंबई आना होगा, और वहीं रह कर काम करना होगा. यानी अब अगले महीने से हम एक ही शहर में होंगे."

प्रिया के लिए यह खबर किसी सपने जैसी थी. मुंबई जैसे अजनबी और संघर्षों से भरे शहर में, जहाँ वह अनायास ही औद्योगिक मजदूरों की लड़ाई में सहयात्री हो गयी थी, आकाश का पास होना उसे एक बहुत बड़ा मानसिक संबल (Support) देने वाला था. लेकिन जैसे ही उसकी तार्किक सोच ने जयपुर के घर की तस्वीर बनाई, उसकी खुशी पर चिंताओं की एक परत चढ़ गई.

"आकाश, करियर के हिसाब से यह बहुत बड़ी छलांग है, और तुम्हारा मुंबई आना मेरे लिए भी बहुत खुशी की बात है. लेकिन..." प्रिया की आवाज़ गंभीर हो गई, "तुमने जयपुर वाले घर के बारे में सोचा है? अब तक तुम वहां साथ थे, तो मम्मी-पापा की सेहत और घर की सारी व्यवस्था संभली हुई थी. तुम्हारे मुंबई आ जाने के बाद वे वहां बिल्कुल अकेले रह जाएंगे."

“हाँ यह तो है. मम्मी, पापा और तान्या के लिए उदासी की बात है कि मैं अब जयपुर में नहीं रहूंगा और उनका यहाँ मुंबई आना किसी तरह संभव नहीं.” आकाश ने कहा.

प्रिया ने आगे कहा, "तान्या जयपुर में ही पढ़ रही है, यह ठीक है. लेकिन वह अभी भी अपनी पढ़ाई और करियर के शुरुआती दबाव में है. अंकल-आंटी अब बुजुर्ग हो रहे हैं. अगर तुम वहां से निकल आए, तो घर और माता-पिता की रोजमर्रा की देखरेख का पूरा बोझ अकेले तान्या के कंधों पर आ जाएगा. क्या उसने इस बारे में कुछ कहा?"

आकाश दूसरी तरफ खामोश रहा. शायद वह भी इसी द्वंद्व से जूझ रहा था. "तान्या कह तो रही है कि वह सब संभाल लेगी, लेकिन मुझे पता है कि उसके लिए यह आसान नहीं होगा. मम्मी-पापा भी चाहते हैं कि मैं इस अवसर को न छोड़ूँ, पर उनके चेहरों पर वह अनकहा डर मैंने महसूस किया है प्रिया."

“अच्छा आकाश मैं अपने साथियों के साथ रेस्टोरेंट में डिनर पर हूँ, मैं रखती हूँ, फिर कल बात करते हैं. बाय¡”

“बाय.” उधर से आकाश का उत्तर आया तो प्रिया ने फोन काट दिया.

प्रिया को चकाला की उन तंग गलियों के मजदूर परिवार याद आए. वहाँ भी समस्या 'आजादी' और 'जिम्मेदारी' के बीच की ही थी. यहाँ आकाश के पास पैसा और करियर था, लेकिन कीमत थी 'पारिवारिक स्थिरता'.

फोन बंद कर जब प्रिया वापस मेज पर लौटी, तो प्रशांत बाबू ने उसकी आँखों में वह चमक और चिंता का मिश्रण भांप लिया. "प्रिया, सब ठीक है? घर से कोई खबर?"

प्रिया ने लंबी सांस ली और पनीर का एक टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, "जी सर, सब ठीक है. बस एक दोस्त मुंबई शिफ्ट हो रहा है. करियर में बहुत बड़ी तरक्की हुई है उसकी, लेकिन उसे पाने के लिए उसे जयपुर का अपना सुरक्षित घर और बुजुर्ग माता-पिता और छोटी बहिन को छोड़कर आना होगा."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तो मुंबई की रीत है प्रिया. यह शहर कुछ देने से पहले बहुत कुछ मांगता है. मजदूरों से उनका पसीना और सुकून मांग रहा है, तो किसी नौजवान से उसका घर. लेकिन बेहतर जीवन के लिए यह संघर्ष ही इंसान को माँजता है."

डिनर के बाद जब प्रिया एमबी से बाहर निकली, तो मुम्बई की रात की हवा नमी भरी ठंडी हवा में उसे अपने मन में एक अजीब सी उमंग महसूस हो रही थी. आकाश का मुंबई आना उसके लिए एक 'संबल' था, लेकिन तान्या और उसके माता-पिता की चिंता एक 'संशय' थी.

उसे अहसास हुआ कि 11 मई की देहरी सिर्फ मजदूरों के लिए नहीं, बल्कि उसके निजी जीवन के लिए भी एक बड़ा मोड़ साबित होने वाली थी. एक तरफ 350 परिवारों की 'न्याय और मुक्ति' की लड़ाई थी, और दूसरी तरफ वह सोच रही थी कि आकाश का मुंबई आना क्या उनके आपसी संबंधों में एक नई शुरुआत हो सकता है.

प्रिया ने मुंबई की रोशनियों को देखा. वह सोच रही थी, “ईएसआई के मजदूरों की इस लड़ाई में आगे उसकी भूमिका क्या होगी और आकाश के आने से उसके आने वाले जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
... क्रमशः

रविवार, 3 मई 2026

रणनीति

देहरी के पार, कड़ी - 42
अंधेरी स्थित आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर के दोनों सीलिंग फैन चल रहे थे उसके बावजूद उमस से किसी तरह की राहत नहीं मिल पा रही थी. ऐसा लगता था कि कभी भी बारिश आ जाएगी. दफ्तर का माहौल भी आज कुछ अधिक अनुशासन में था. आज यहाँ ईसीआई यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक में ट्रेड यूनियनों के अखिल भारतीय केंद्र (AICCTU) के महाराष्ट्र स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी मौजूद थे—गहरा सांवला रंग, खादी का सफेद कुर्ता और आँखों पर मोटा चश्मा. उनके बगल में प्रशांत बाबू और शिंदे साहब थे. दूसरी तरफ प्रिया, स्नेहा और राहुल, भी बैठे थे.

प्रशांत बाबू ने मीटिंग की औपचारिक शुरुआत करते हुए कॉमरेड कुलकर्णी को बताया कि ईसीआई फैक्ट्री के क्लोजर परमिशन की फाइल को लेबर सेक्रेटरी ने 'लॉ डिपार्टमेंट' को भेज दी है और वहाँ पैंडिंग है.

"कुलकर्णी जी, स्थिति नाजुक है. एएसएल के यहाँ सुनवाई के दौरान हमने कोई कसर नहीं रखी. हमें पूरा विश्वास है कि सरकार ने मेरिट पर फैसला किया तो मैनेजमेंट का आवेदन निरस्त होगा, लेकिन उसका 14 मई के पहले सरकार का आदेश पारित करना और मैनेजमेंट तक पहुँचना आवश्यक है." प्रशांत बाबू का स्वर गंभीर था. "अगर ११ मई तक फाइल कानून मंत्रालय से बाहर नहीं आती तो यह सब होना मुमकिन नहीं होगा और 15 मई को सुबह ईसीआई के सभी मजदूर बेरोजगार होंगे. मैनेजमेंट पूरी जुगत में है कि फाइल 'लॉ डिपार्टमेंट' में अटकी रहे."

कुलकर्णी जी ने मेज पर रखे पानी के गिलास को हाथ लगाया, फिर बिना उठाए छोड़ दिया. "मैनेजमेंट चाहता है कि हम आखिरी वक्त में घुटने टेक दें. उनके वकील भट्ट ने जो लीगल क्वेरी (कानूनी सवाल) खड़ी की है, वह सिर्फ समय काटने का तरीका है. वे जानते हैं कि एक बार 'डीम्ड क्लोजर' मिल गया, तो फिर हम कोर्ट-दर-कोर्ट भटकते रहेंगे और मजदूर सड़क पर होंगे."

तभी प्रिया ने धीरे से अपनी डायरी खोली. "सर, मैं कुछ साझा करना चाहती हूँ. मैं और मेरे दोनों साथी आईआईडीईए की नए सदस्य हैं. हम इस हड़ताल और मुकदमे के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते रहे हैं. हम पिछले दो दिनों से इस फैक्ट्री के मजदूरों के घरों में गए हैं और जानने की कोशिश की है कि मजदूरों के परिवार के सदस्य क्या सोचते हैं, हम यूनियन के सेक्रेटरी शिंदे साहब के घर भी होकर ए हैं."


सेक्रेटरी शिंदे सुनकर चौंक गए और उत्सुकता से प्रिया की ओर देखने लगे. प्रिया ने गहरी सांस ली, "सर, एक चौंकाने वाला सच यह है कि मजदूर और उनके परिवार के सदस्य फैक्ट्री का क्लोजर होने से बिलकुल नहीं डरते हैं. लेकिन वे उस 'अनिश्चितता' से डरे हुए हैं जिसमें वे पिछले दस साल से जी रहे हैं. मैंने सावित्री अम्मा और बिठ्ठल भाई जैसे लोगों से बात की. उनका कहना है कि ईसीआई की यह नौकरी अब उनकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन गई है. वे 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों से आज़ाद होना चाहते हैं."

कमरे में सन्नाटा छा गया. शिंदे साहब, जो खुद उसी फैक्ट्री के मजदूर थे, थोड़े असहज हुए. "प्रिया बेटा, हम और हमारा परिवार के बीच सोच एक अलग बात है लेकिन एक यूनियन के लिए मजदूरों की 'नौकरी अचानक चले जाना या छोड़ देना' इतना आसान नहीं होता. हमारा अस्तित्व ही नौकरी बचाने से जुड़ा है. अगर हम क्लोजर मान लेते हैं, तो क्या यह मैनेजमेंट की जीत नहीं होगी?"

यही वह बिंदु था जहाँ एक पुरानी विचारधारा और नई वास्तविकता टकरा रही थी.

राहुल ने बीच में हस्तक्षेप किया, "शिंदे साहब, जीत इसमें नहीं है कि हम एक डूबते हुए जहाज पर सवार रहें. जीत इसमें है कि डूबने से पहले हम मजदूरों को उनकी मेहनत का पूरा हिसाब दिलाकर उन्हें किनारे पर उतार दें. वे लोग बाहर जाकर कोई नई नौकरी तलाश कर सकते हैं या फिर छोटा-मोटा काम करके आज की तुलना में ज्यादा सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं. हमने देखा है कि उनके घरों में हुनर की कमी नहीं है, बस उनके पास नहीं है तो अपने हुनर और मेहनत का उपयोग करने के लिए संसाधन नहीं हैं."

कॉमरेड कुलकर्णी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और अपनी उँगलियों से माथा सहलाने लगे. "प्रिया का विश्लेषण चौंकाने वाला है, लेकिन इसमें एक कड़वी सच्चाई है. दुनिया ने हमेशा मजदूरों को 'मजदूर' के रूप में देखा, लेकिन वे भी 'इंसान' हैं और उसी रूप में अपनी पहचान और आज़ादी चाहते हैं. अगर वे खुद ट्रक सिस्टम जैसी गुलामी को और ढोना नहीं चाहते, तो हम उन पर अपनी पुरानी लड़ाई थोप नहीं सकते. जहाँ तक मुझे ईसीआई फैक्ट्री में मजदूरों की हड़ताल के आरंभ में सूचना दी गयी थी, उसके मुताबिक सारे मजदूर फैक्ट्री के बंद होने और नौकरी चले जाने का खतरा उठाते हुए ही हड़ताल पर गए थे."

कुलकर्णी की इस बात के बाद मीटिंग में लंबी बहस चली. सबने अपने-अपने विचार रखे कानूनी पहलुओं को खंगाला गया. प्रश्न यह था कि अगर यूनियन क्लोजर का विरोध करना छोड़ देती है, तो मैनेजमेंट के पास मोलभाव करने की क्या वजह बचेगी?

प्रिया ने अपना पक्ष मजबूती से रखा, "सर, हम क्लोजर का विरोध न करें, ऐसा मैंने नहीं कहा. मैं कह रही हूँ कि हमारी शर्तों को बदल दिया जाए. हम सरकार से कहें कि क्लोजर की अनुमति तभी मिले जब मैनेजमेंट हर मजदूर को पिछले दस साल से 'ट्रक सिस्टम' के अवैध उपयोग से किए गए शोषण का मुआवजा, बकाया ग्रेच्युटी और एक 'विशेष एक्जिट पैकेज' दे. हमें 'नौकरी' के बदले 'न्याय और मुक्ति' को अपना मुख्य मुद्दा बनाना होगा."

कुलकर्णी जी ने मेज थपथपाई. "यही रास्ता है! अगर हम मैनेजमेंट को इस बात पर मजबूर कर दें कि क्लोजर उनके लिए 'सस्ता' नहीं बल्कि 'बहुत महंगा' सौदा साबित होगा, तो वे खुद बातचीत की मेज पर आएंगे. हमें सरकार को यह बताना होगा कि यह सिर्फ एक फैक्ट्री बंद होने का मामला नहीं है, बल्कि दस साल से चल रहे एक अवैध श्रम-प्रथा (ट्रक सिस्टम) के निपटारे का मामला है. लेकिन अभी हमारे सिर पर क्लोजर परमिशन की तलवार लटकी हुई है, इसके लिए सीधे श्रम मंत्री से मिलकर उसे समझाना होगा. हो सकता है हमें, श्रम मंत्री के बंगले के सामने धरना प्रदर्शन भी करना पड़े."

अगले दो घंटों में रणनीति को अंतिम रूप दिया गया. निर्णय लिया गया कि कल सोमवार, 6 मई को यूनियन मंत्रालय को एक ऐसा 'अल्टीमेटम' देगी जो अब तक के उनके रुख से बिल्कुल अलग होगा.

यूनियन सरकार से मांग करेगी कि ईसीआई की क्लोजर की परमिशन वाले आवेदन को तुरंत निरस्त किया जाए. यदि फैक्ट्री के मालिक क्लोजर चाहते हैं तो यूनियन के साथ समझौते के माध्यम से ही संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं. लेबर कमिश्नर खुद मजदूरों के बीच जाकर उनके 'ट्रक सिस्टम' के दावों की जांच करें और रिपोर्ट सरकार को दें. यदि 8 मई तक ठोस जवाब नहीं मिलता, तो 11 मई को श्रम मंत्री के निवास पर प्रदर्शन और घेराव होगा.

कुलकर्णी जी ने कहा कि, “मैं व्यक्तिगत रूप से प्रयास करूंगा कि श्रम मंत्री 6 या 7 मई को मिलने का समय दें.”

मीटिंग खत्म हुई, तो रात के साढ़े आठ बज रहे थे. कुलकर्णी जी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा. "प्रिया, तुमने आज हमारी लड़ाई का रूप बदल दिया है, जो अधिक मानवीय है. लेकिन याद रखना, जो रास्ता हमने अब चुना है वह काँटों भरा है. मैनेजमेंट और लॉ डिपार्टमेंट अब और भी शातिराना चालें चलेंगे."

प्रिया ने अपनी डायरी बैग में रखी. "सर, 6 दिन बचे हैं. 11 मई तक हमें कुछ न कुछ हासिल करना होगा.
... क्रमशः

शनिवार, 2 मई 2026

बेड़ियाँ

देहरी के पार, कड़ी - 41
मई के महीने की तपिश और समंदर से उठती नमी से भरपूर हवा से वातावरण भारी था. पसीना किसी तरह रुकता नहीं था. शनिवार की सुबह, जब ज्यादातर मुंबईकर वीकेंड की सुस्ती में डूबे थे, प्रिया अंधेरी (पूर्व) के चकाला इलाके की एक तंग गली के मुहाने पर खड़ी थी. राहुल और स्नेहा भी उसके साथ थे.

दो मई को दोपहर बाद ही असिस्टेंट सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से कार्यवाही समाप्त हुई थी. उसी दिन उसे सेक्रेटरी को रिपोर्ट देनी थी लेकिन तीन मई की दोपहर ट्रैकिंग से पता लगा कि रिपोर्ट सुबह सेक्रेटरी को मिली थी और शाम को यह जानकारी कि फाइल को सेक्रेटरी ने राय देने के लिए लॉ सेक्रेटरी को भेज दिया है. अगले दो दिन अवकाश होने के कारण फाइल को वहीं रहना था, जिससे ट्रैकिंग से कुछ हासिल नहीं हो सकता था.

प्रिया को ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष के बीच हमेशा यह लगा कि जब वे फैक्ट्री में या संघर्ष के दौरान साथ रहते हैं तो नौकरी या फैक्ट्री के बंद होने के संबंध में उनका विचार लगभग एक जैसा रहता है. लेकिन इनके परिवार के लोग क्या सोचते हैं? और परिवार के बीच रहकर खुद मजदूर क्या सोचते हैं? इसे अवश्य जानना चाहिए. उसने अपना यह विचार अपने शेष तीनों साथियों के सामने रखा कि क्यों न इस वीकेंड पर इन मजदूरों के परिवारों के बीच जाया जाए. क्योंकि जब तक वह उन ३५० परिवारों के चूल्हों की आग और उनके संघर्ष की नमी को महसूस न किया जाए तब तक इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता कि आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

आदित्य का कार्यक्रम इस वीकेंड पर अपने किसी मित्र से मिलने पुणे जाने का था. स्नेहा फौरन इस काम के लिए तैयार हो गई. राहुल पहले तो आने में हिचकिचा रहा था, उसे चकाला और जे.बी. नगर की तंग गलियों में धूल फाँकने के विचार में कोई औचित्य नजर नहीं आता था. लेकिन प्रिया ने जब कहा कि, “औचित्य का पता तो वहीं जाकर लगेगा. हम शनिवार को चलते हैं, यदि हमें लगेगा कि यह औचित्यहीन है तो रविवार नहीं चलेंगे.” यह सुनने के बाद वह अनमने तरीके से ही सही पर तैयार हो गया था और अब साथ था.

जैसे-जैसे वे गलियों के भीतर बढ़े, शहर का शोर पीछे छूटता गया और एक अलग ही दुनिया सामने आई. यहाँ घर एक-दूसरे से सटे हुए थे, मानों एक-दूसरे का सहारा लेकर खड़े हों. उनके पास यूनियन सेक्रेटरी शिंदे का पता था. वे तलाश करके सबसे पहले वहाँ पहुँचे. दो कमरे, एक छोटी सी रसोई, एक टॉयलेट और एक कॉमन हॉल. हॉल में ही एक कोने में रखी मशीन पर शिंदे की पत्नी सावित्री कपड़े सिल रही थीं. मशीन की 'पच-पच' की आवाज़ हवा में एक लय पैदा कर रही थी. प्रिया को देखते ही वे मुस्कुराईं. उन्होंने मशीन रोक दी. उनसे पास ही रखे चीड़ की लकड़ी के ढाँचे पर बने स्प्रिंग वाले पुराने सोफे पर बैठने को कहा. राहुल के उस पर बैठते ही वह करीब आठ इंच अंदर बैठ गया. प्रिया और स्नेहा बहुत सावधानी से उस पर बैठे.

“दीदी, मैं दो तीन साल से शिंदे साहब से कह रही हूँ कि इसे ठीक करा लें. लेकिन वे कहते हैं बोनस मिलेगा तो नया ले लेंगे. जब बोनस आता है तो और दूसरे जरूरी खर्चे निकल आते हैं.” सावित्री जी ने कहा. उन्होंने बताया कि “शिंदे साहब की तो सुबह की शिफ्ट थी वे सुबह सवा पाँच बजे ही निकल गए थे. आप आईं, बहुत अच्छा लगा," सावित्री जी ने कहा. उनके हाथों की फुर्ती बता रही थी कि वे सिर्फ एक गृहिणी नहीं, बल्कि घर की आर्थिक रीढ़ भी हैं.

प्रिया ने देखा कि पास ही में एक 12-13 साल का लड़का, जिसे शिंदे का पोता 'छोटू' बताया गया, स्कूल का बस्ता एक तरफ रखकर कुछ पुराने रेडियो और बिजली के बोर्ड खोलकर बैठा था. राहुल ने उत्सुकता से पूछा, "बेटा, ये क्या कर रहे हो?"

छोटू ने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, " स्कूल से आने के बाद बिजली वाले चाचा की दुकान पर बैठता हूँ. तार जोड़ना और सोल्डरिंग करना सीख रहा हूँ. अगले साल तक मैं खुद के छोटे-मोटे काम करना सीख जाऊंगा.”

प्रिया के मन में एक टीस उठी. ये बच्चे बचपन से ही जानते हैं कि ज़िंदगी की लड़ाई उन्हें जल्दी शुरू करनी है. सावित्री जी ने चाय के प्याले बढ़ाते हुए कहा, "बेटा, ईसीआई की नौकरी ने हमें सिर्फ अनिश्चितता दी है. पिछले दस साल से उस 'ट्रक सिस्टम' ने उनको आधा कर दिया है. हफ़्ते के छहों दिन काम मिलता है, बस इसी लालच में वे वहां बंधे रहे. पर अब हम सब चाहते हैं कि बस बहुत हुआ."

डेढ़ बजे तक प्रिया और उसके साथी पाँच-छह घरों में जा चुके थे. स्नेहा, जो आमतौर पर काफी चुलबुली रहती थी, खामोशी से डायरी में कुछ नोट कर रही थी.

तीनों ने पास ही एक रेस्टोरेंट में दोपहर का लंच किया और फिर से बस्ती में घुस गए. एक घर में वे बिठ्ठल भाई से मिले, जो ईसीआई में करीब 15 साल से थे. उनके पैर में चोट थी, फिर भी वे एक कोने में बैठकर प्लास्टिक के कुछ खिलौने जोड़ रहे थे. बिठ्ठल भाई की राय ने प्रिया को चौंका दिया. उन्होंने कहा, "दीदी, सब कहते हैं कि यूनियन नौकरी बचाने के लिए लड़ती है. पर हम? हम इस नौकरी से 'मुक्ति' चाहते हैं. ईसीआई अब कारखाना नहीं, एक ऐसी जेल है जिसका जेलर हमें न मारता है, न जीने देता है. हमें बस हमारा हिसाब ठीक-ठीक मिल जाए, हम अपनी मेहनत से कहीं भी पेट पाल लेंगे."

प्रिया ने महसूस किया कि ये मजदूर हार नहीं मान रहे थे, बल्कि वे एक ऐसी आज़ादी माँग रहे थे जहाँ उनके पसीने की कीमत तय हो, न कि कोई प्रबंधन उन्हें 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों में जकड़े रखे.

अगले दिन, रविवार सुबह भी तीनों अपनी इस 'जाँच' में जुटे रहे. अपने-अपने घरों को लौटने के पहले उन्होंने बाहर ही लंच किया. तीनों का मन विचारों से भरा हुआ था. खाना खाते समय प्रिया के फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. यह विक्रांत के किसी पुराने व्यावसायिक सहयोगी का सोशल मीडिया पोस्ट था. फोटो में विक्रांत एक आलीशान रेस्टोरेंट में कुछ लोगों के साथ बैठा था. चेहरे पर वही पुराना अहंकार वापस लौट रहा था.

प्रिया ने नोटिफिकेशन देखकर भी अनदेखा कर दिया. विक्रांत अब उसके लिए एक 'अदृश्य साया' था, जिससे वह डरती नहीं थी, पर सावधान जरूर थी. उसे पता था कि विक्रांत अपनी खोई हुई साख पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. लेकिन चकाला की उन गलियों में मिले अनुभवों ने उसे एक अलग ही सुरक्षा कवच दे दिया था.

शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया, "प्रिया, शाम छह बजे IIDEA ऑफिस में यूनियन की मीटिंग है उसमें एआईसीसीटीयू के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी भी होंगे. मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार होगा. तुम आ सको तो बेहतर होगा."

उसने तय किया कि वह इस मीटिंग में अवश्य जाएगी. दो दिनों में उसने जो कुछ मजदूरों के परिवारों से मिलकर जाना है, उसे सभी को बताया जाना आवश्यक है.
... क्रमशः