@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: संघर्ष ही संघर्ष

शुक्रवार, 8 मई 2026

संघर्ष ही संघर्ष

देहरी के पार, कड़ी - 47
प्रिया मेवाड़ भोजनालय के डिनर से लौटकर फ्लैट पहुँची तो 11 बजे थे. कपड़े बदल कर वह बेड पर लेटी ही थी कि फोन बज उठा. आकाश की कॉल थी.

“कैसी हो प्रिया?”

“मैं ठीक हूँ. तुम्हारा नोटिस पीरियड कब खत्म हो रहा है और जॉइन करने मुंबई कब आ रहे हो?”

“बस जल्दी ही आ रहा हूँ.”

“वो कैसे? 60 दिन का नोटिस पीरियड है, अभी तो नोटिस दिए मुश्किल से दस दिन हुए होंगे?”

“मेरा प्रोजेक्ट खत्म हो गया है, रेजिग्नेशन के बाद कंपनी ने मुझे नया प्रोजेक्ट देना नहीं है, तो मुझे अर्ली रिलीज मिल गया है. 17 मई को रिलीव हो रहा हूँ, 19 को सुबह मुंबई पहुँच रहा हूँ. बीस को नयी कंपनी में जॉइन करूंगा.” आकाश ने बताया.

“अरे वाह¡ बस हफ्ते भर बाद¡ यह तो बहुत बढ़िया है. तुम कहीं और नहीं रुकना, सीधे मेरे फ्लैट पर चले आना.”

“नहीं प्रिया, कंपनी मुझे दो सप्ताह के लिए गेस्ट हाउस में फ्री रेजीडेंस दे रही है. इस बीच मैं अपना फ्लैट तलाश लूंगा.”

“क्यों वहाँ क्यों रुकोगे? मैं जयपुर आई तो तुमने जाने दिया था होटल?”

“प्रिया वह अलग बात थी. वहाँ मैं परिवार के साथ था और तुम्हें मैंने नहीं मेरे परिवार ने रोका था और तुम चाहते हुए भी होटल नहीं जा सकी थी. यहाँ तुम अकेली रहती हो. मेरे साथ तुम्हारा ऐसा कोई रिश्ता नहीं जिससे मेरा वहाँ रुकना समाज बर्दाश्त कर सके. फिर अभी विक्रांत का मुम्बई आना जाना है. मैं गेस्ट हाउस ही जा रहा हूँ.”

प्रिया आकाश के इस तर्क के सामने निरुत्तर हो गई. कॉल समाप्त होने के बाद भी बहुत देर तक वह आकाश और उसके परिवार के बारे में सोचती रही. उसके मम्मी-पापा दोनों कितने स्नेही हैं, और छोटी बहिन तान्या कितनी प्यारी है? जयपुर में उसके यहाँ रुकने के वक्त, विक्रांत से होने वाले अपने विवाह के दो दिन पहले उसने घर छोड़ा था. जयपुर उनके घर रहने के दौरान उसके मन में यह बात बैठ गयी थी की यदि उसका विवाह हो तो ऐसे व्यक्ति से हो जिसका परिवार आकाश के परिवार की तरह हो. आकाश से रिश्ते की बात तो वह आज तक भी नहीं सोच पाई. सोचती भी कैसे? दोनों एक ही कंपनी के एम्पलॉई थे और कंपनी के कंडक्ट रूल्स एम्पलॉइज के बीच अंतरंग संबंधों को पूरी तरह वर्जित करते थे. किन्तु अब जब आकाश ने कंपनी छोड़ दी थी और दूसरी कंपनी जॉइन कर रहा था तो यह बात भी उसके ज़ेहन में दस्तक दे रही थी कि काश आकाश और उसके बीच इस तरह का रिश्ता बन जाए. सोचते-सोचते उसे कब नींद आ गई पता ही नहीं लगा.
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ईसीआई एम्पलॉइज एसोसिएशन की आमसभा रविवार 12 मई को शाम 4 बजे आईआईडीईए के अंधेरी ऑफिस के सामने वाले पार्क में रखी गयी थी. मैनेजमेंट के क्लोजर एप्लीकेशन वापस ले लेने के बाद यह पहली सभा थी. प्रिया को इस की कार्यवाही हर हाल में देखनी थी. वह जानना चाहती थी कि जिनके परिवार ट्रक सिस्टम से छुटकारे के लिए, बिना कोई लाभ लिए भी उन्हें यह नौकरी छोड़कर कुछ भी कर लेने की सलाह कितने ही महीनों से दे रहे थे, उन मजदूरों की अब क्या प्रतिक्रिया रहेगी. फेयर वेजेज का मामला इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल को भेज दिया गया था लेकिन अभी तक उसकी एक भी सुनवाई नहीं हुई थी. क्लोजर एप्लीकेशन की कार्यवाही के दौरान यह स्पष्ट हो गया था कि प्रबंधन हर हालत में उद्योग को बंद करना चाहता था. आमसभा में कॉमरेड कुलकर्णी भी आने वाले थे. वह उनको भी सुनना चाहती थी. उसने अपनी इच्छा प्रशांत बाबू को बताई तो उन्होंने कहा, तुम्हें जरूर आना चाहिए. तुमने मजदूरों की इस लड़ाई में तुम्हारा महत्वपूर्ण योगदान दिया है. तुम्हारा हक बनता है.

शाम साढ़े चार बजे आमसभा शुरू हुई. प्रिया भीड़ का हिस्सा बनकर इसे देख रही थी. यूनियन सचिव शिंदे और प्रशांत बाबू के संक्षिप्त संबोधन के बाद कॉमरेड कुलकर्णी माइक पर आए. उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सीधे मुद्दे की बात की.

कुलकर्णी जी ने आगाह करते हुए कहा, “साथियों, प्रबंधन पराजित हुआ है पर थका नहीं है. उसे आपकी फैक्ट्री से ज्यादा फैक्ट्री की ज़मीन की कीमत में दिलचस्पी है. अभी जो राहत मिली है, वह सिर्फ अक्टूबर चुनाव तक की राजनीतिक मजबूरी है. चुनाव खत्म होते ही नेता और पूंजीपति फिर हाथ मिला लेंगे. मुमकिन है कि प्रबंधन जल्द ही आपके सामने एक आकर्षक 'स्वैच्छिक सेवा समाप्ति' (VRS) का प्रस्ताव रखे.”

उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा, “मैं जानना चाहता हूँ कि यदि प्रबंधन मोटी रकम देकर सम्मानजनक समझौते की बात करे, तो आपकी क्या राय है?”

पार्क में सन्नाटा छा गया. तभी एक वरिष्ठ मजदूर ने खड़े होकर सुझाव दिया, “कॉमरेड, यह फैसला खुली सभा में नहीं हो सकता. मैनेजमेंट के कान हर जगह हैं. बेहतर होगा कि कार्यसमिति हर मजदूर से व्यक्तिगत बात करे और फिर हम कोई सामूहिक निर्णय लें.”

पार्क में मौजूद सैकड़ों मजदूरों ने एक स्वर में इस सुझाव का समर्थन किया. आमसभा समाप्त हुई, लेकिन वातावरण में एक नई तरह का तनाव छोड़ गई.

सूरज ढल रहा था. प्रिया ने देखा कि मजदूर गुटों में बँटकर फुसफुसाते हुए पार्क से बाहर निकल रहे थे. आज जीत का गुलाल नहीं था, बल्कि भविष्य की चिंताओं का धुंधलका था. उसे अहसास हुआ कि “मजदूरों के जीवन में न्याय मिलना कितना दुष्कर है. यूनियन के रूप में संगठित होना, सही नेतृत्व मिलना और फिर अपने हकों के लिए निरंतर लड़ना—यही उनके जीवन का अनिवार्य चक्र बन गया है. यदि वे संगठित न हों, तो शायद हमेशा मालिकों के हाथों की कठपुतली बने रहें. आजीवन संघर्ष ही उनका भाग्य है; मानो जिस दिन संघर्ष थमेगा, जीवन की डोर भी टूट जाएगी."

प्रिया सोच रही थी कि क्या दुनिया भर के तमाम निर्माण करने वाले इन मेहनतकशों के लिए इस दुश्चक्र से निकलने का कोई मार्ग हो सकता है?
... क्रमशः

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