@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: उमंग

सोमवार, 4 मई 2026

उमंग

देहरी के पार, कड़ी - 43
कॉमरेड कुलकर्णी के साथ हुई रणनीतिक बैठक के बाद प्रिया, स्नेहा और राहुल 'मेवाड़ भोजनालय' (MB) पहुँचे. वहाँ चल रहे एयर कंडीशनर ने उन्हें राहत दी, तो ऐसा लगा. उनमें से किसी को मुंबई में रहते हुए भी अभी यहाँ की उमस भरी गर्मी की आदत नहीं हुई थी. सबके फ्लैटों में एयर कंडीशनर थे और कंपनी के दफ्तर में तो थे ही. कुछ ही देर में प्रशांत बाबू भी वहाँ पहुँच गए. दिन भर की मानसिक थकान और ईसीआई फैक्ट्री के मजदूरों के उलझे मामले के तनाव के बीच, यह रात का भोजन एक जरूरी विराम था.

कुछ ही देर में मेज पर गरमा-गरम खाना लग गया. राहुल अभी भी 'ट्रक सिस्टम' और मजदूरों के मुआवजे के गणित में उलझा हुआ था, जबकि स्नेहा उन मजदूरों की औरतों और बच्चों के चेहरों को याद कर रही थी. तभी प्रिया का फोन मेज पर वाइब्रेट हुआ. स्क्रीन पर 'आकाश' का नाम चमकते ही प्रिया के चेहरे पर एक थकी हुई सी मुस्कान आ गई. उसने मेज से थोड़ी दूरी बनाकर फोन उठाया.

"हेलो आकाश! इतनी रात को कैसे याद किया? सब खैरियत तो है?" प्रिया ने स्वर को हल्का रखने की कोशिश की.

"प्रिया! बड़ी खुशखबरी है," आकाश की आवाज़ में वह उत्साह था जो अक्सर जयपुर की शांत गलियों में सुनाई देता था. "मैंने जिन बड़ी कंपनियों में आवेदन किया था, उनमें से एक का आज फाइनल कन्फर्मेशन आ गया है. पैकेज में सीधे १० लाख का अपग्रेड है, और कंपनी भी बहुत प्रतिष्ठित है."

प्रिया का दिल खुशी से भर गया. वह जानती थी कि आकाश पिछले काफी समय से इस स्विच के लिए मेहनत कर रहा था. "वाह आकाश! यह तो वाकई शानदार खबर है. मुझे पता था तुम कर लोगे. जयपुर में अंकल-आंटी और तान्या तो बहुत खुश होंगे!"

"हाँ, वे खुश तो बहुत हैं," आकाश थोड़ा रुका, फिर स्वर बदलते हुए बोला, "लेकिन एक पेंच है. यह वर्क-फ्रॉम-होम वाला मामला अब खत्म हो रहा है. उन्होंने साफ़ कर दिया है कि मुझे मुंबई आना होगा, और वहीं रह कर काम करना होगा. यानी अब अगले महीने से हम एक ही शहर में होंगे."

प्रिया के लिए यह खबर किसी सपने जैसी थी. मुंबई जैसे अजनबी और संघर्षों से भरे शहर में, जहाँ वह अनायास ही औद्योगिक मजदूरों की लड़ाई में सहयात्री हो गयी थी, आकाश का पास होना उसे एक बहुत बड़ा मानसिक संबल (Support) देने वाला था. लेकिन जैसे ही उसकी तार्किक सोच ने जयपुर के घर की तस्वीर बनाई, उसकी खुशी पर चिंताओं की एक परत चढ़ गई.

"आकाश, करियर के हिसाब से यह बहुत बड़ी छलांग है, और तुम्हारा मुंबई आना मेरे लिए भी बहुत खुशी की बात है. लेकिन..." प्रिया की आवाज़ गंभीर हो गई, "तुमने जयपुर वाले घर के बारे में सोचा है? अब तक तुम वहां साथ थे, तो मम्मी-पापा की सेहत और घर की सारी व्यवस्था संभली हुई थी. तुम्हारे मुंबई आ जाने के बाद वे वहां बिल्कुल अकेले रह जाएंगे."

“हाँ यह तो है. मम्मी, पापा और तान्या के लिए उदासी की बात है कि मैं अब जयपुर में नहीं रहूंगा और उनका यहाँ मुंबई आना किसी तरह संभव नहीं.” आकाश ने कहा.

प्रिया ने आगे कहा, "तान्या जयपुर में ही पढ़ रही है, यह ठीक है. लेकिन वह अभी भी अपनी पढ़ाई और करियर के शुरुआती दबाव में है. अंकल-आंटी अब बुजुर्ग हो रहे हैं. अगर तुम वहां से निकल आए, तो घर और माता-पिता की रोजमर्रा की देखरेख का पूरा बोझ अकेले तान्या के कंधों पर आ जाएगा. क्या उसने इस बारे में कुछ कहा?"

आकाश दूसरी तरफ खामोश रहा. शायद वह भी इसी द्वंद्व से जूझ रहा था. "तान्या कह तो रही है कि वह सब संभाल लेगी, लेकिन मुझे पता है कि उसके लिए यह आसान नहीं होगा. मम्मी-पापा भी चाहते हैं कि मैं इस अवसर को न छोड़ूँ, पर उनके चेहरों पर वह अनकहा डर मैंने महसूस किया है प्रिया."

“अच्छा आकाश मैं अपने साथियों के साथ रेस्टोरेंट में डिनर पर हूँ, मैं रखती हूँ, फिर कल बात करते हैं. बाय¡”

“बाय.” उधर से आकाश का उत्तर आया तो प्रिया ने फोन काट दिया.

प्रिया को चकाला की उन तंग गलियों के मजदूर परिवार याद आए. वहाँ भी समस्या 'आजादी' और 'जिम्मेदारी' के बीच की ही थी. यहाँ आकाश के पास पैसा और करियर था, लेकिन कीमत थी 'पारिवारिक स्थिरता'.

फोन बंद कर जब प्रिया वापस मेज पर लौटी, तो प्रशांत बाबू ने उसकी आँखों में वह चमक और चिंता का मिश्रण भांप लिया. "प्रिया, सब ठीक है? घर से कोई खबर?"

प्रिया ने लंबी सांस ली और पनीर का एक टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, "जी सर, सब ठीक है. बस एक दोस्त मुंबई शिफ्ट हो रहा है. करियर में बहुत बड़ी तरक्की हुई है उसकी, लेकिन उसे पाने के लिए उसे जयपुर का अपना सुरक्षित घर और बुजुर्ग माता-पिता और छोटी बहिन को छोड़कर आना होगा."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तो मुंबई की रीत है प्रिया. यह शहर कुछ देने से पहले बहुत कुछ मांगता है. मजदूरों से उनका पसीना और सुकून मांग रहा है, तो किसी नौजवान से उसका घर. लेकिन बेहतर जीवन के लिए यह संघर्ष ही इंसान को माँजता है."

डिनर के बाद जब प्रिया एमबी से बाहर निकली, तो मुम्बई की रात की हवा नमी भरी ठंडी हवा में उसे अपने मन में एक अजीब सी उमंग महसूस हो रही थी. आकाश का मुंबई आना उसके लिए एक 'संबल' था, लेकिन तान्या और उसके माता-पिता की चिंता एक 'संशय' थी.

उसे अहसास हुआ कि 11 मई की देहरी सिर्फ मजदूरों के लिए नहीं, बल्कि उसके निजी जीवन के लिए भी एक बड़ा मोड़ साबित होने वाली थी. एक तरफ 350 परिवारों की 'न्याय और मुक्ति' की लड़ाई थी, और दूसरी तरफ वह सोच रही थी कि आकाश का मुंबई आना क्या उनके आपसी संबंधों में एक नई शुरुआत हो सकता है.

प्रिया ने मुंबई की रोशनियों को देखा. वह सोच रही थी, “ईएसआई के मजदूरों की इस लड़ाई में आगे उसकी भूमिका क्या होगी और आकाश के आने से उसके आने वाले जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
... क्रमशः

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