देहरी के पार, कड़ी - 39
प्रिया की आँख खुली तो खिड़की से बहुत तेज प्रकाश अंदर आ रहा था. उसने अचकचाकर घड़ी देखी तो उसे डिजिटल घड़ी के अंक ठीक से दिखाई नहीं दिए. उसकी आँखें पूरी खुल ही नहीं पा रही थीं. उसने अपनी आँखों की पुतलियों पर हल्के से उंगलियाँ चलाकर उन्हें साफ किया. फिर सिरहाने की टेबल पर रखा चश्मा आँखों पर चढ़ाया, तब अंक दिखे. घड़ी सवा आठ बजा रही थी. ऐसी गहरी नींद उसे बहुत दिनों बाद आई थी. रात को एक बार भी उसकी नींद नहीं टूटी थी. आठ घंटे से भी अधिक सो लेने के बाद भी उसे लगा कि कल की थकान अभी निकली नहीं है. उसकी इच्छा हुई कि फिर से सो जाए. लेकिन कुछ देर लेटे रहने के बाद उठी. अपने लिए चाय बनाकर पीने बैठी.
आज दो मई थी. एएसएल के यहाँ सुनवाई की अंतिम तारीख. रात एमबी में बातचीत के बीच प्रशांत बाबू ने बातचीत में कहा था, कल अधिक कुछ नहीं होना है. एएसएल दोनों पक्षों के तर्क सुनेगा और फिर घंटे-दो घंटे में या फिर तीन मई को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय भेज देगा जहाँ श्रम मंत्री से सलाह के बाद लेबर सेक्रेटरी अंतिम निर्णय लेगा. उसे लगा, उसका आज वहाँ कोई काम नहीं है, बेहतर है कि वह ऑफिस चली जाए.
उसने चव्हाण साहब को फोन करके पूछ लिया, उन्हें उसकी कोई जरूरत नहीं थी. उसने तय किया कि वह आज सुनवाई में न जाकर अपने ऑफिस जाएगी. शाम को ऑफिस समाप्त होने के बाद एमबी होते हुए अपने फ्लैट लौटेगी. वहाँ उसे पता चल ही जाएगा कि आज एएसएल के यहाँ क्या हुआ.
प्रिया ऑफिस से छूटी तो आठ बज चुके थे. वह सीधे एमबी पहुँची. प्रशांत बाबू अपनी खास टेबल पर बैठे आज का अखबार पढ़ रहे थे. वह उनके सामने की कुर्सी पर जा बैठी.
प्रिया को देखते ही प्रशांत बाबू ने अखबार मेज पर रख दिया और चश्मा उतारते हुए मुस्कुराए. "आओ प्रिया, आज तुम कोर्ट नहीं आईं तो इजलास थोड़ा शांत लग रहा था."
प्रिया ने कुर्सी खींचते हुए पूछा, "शांत? मुझे तो लगा था आज भट्ट साहब ने आसमान सिर पर उठा लिया होगा. क्या हुआ आज?"
इससे पहले कि प्रशांत बाबू कुछ कहते, रामजी काका तीन कप चाय लेकर वहाँ पहुँच गए. उनके चेहरे पर एक अजब सी चमक थी, जैसे कोई बड़ी जंग जीतकर लौटे हों.
"बिटिया, आज तुम नहीं आई तो तुमने बहुत बड़ा तमाशा छोड़ दिया!" रामजी ने चाय मेज पर रखते हुए चहक कर कहा. "आज तो चव्हाण साहब ने वो धोबी पछाड़ दी है कि भट्ट साहब के चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया था जैसे सरकारी दफ्तरों की पुरानी दीवारों का चूना गिरता है."
प्रशांत बाबू ने बीच में टोकते हुए कहा, "रामजी, थोड़ा तसल्ली से बताओ. प्रिया, मुख्य बात यह है कि एएसएल ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुना. भट्ट ने अपनी वही पुरानी राग अलापी कि कंपनी 'वेंटिलेटर' पर है और उसे बंद करना ही एकमात्र रास्ता है."
"हाँ! और फिर देखो तमाशा..." रामजी काका ने अपनी चाय का एक बड़ा घूँट भरा और हाथ नचाते हुए बोले, "भट्ट साहब कह रहे थे कि मैनेजमेंट बहुत 'उदार' है, मजदूरों को पैसा दे रहा है. तभी चव्हाण साहब अपनी जगह से ऐसे खड़े हुए जैसे कोई शेर झाड़ी से निकलता है. उन्होंने एएसएल से कहा— 'सर, ये उदारता नहीं, ये तो कसाई का दाना है जो बकरे को हलाल करने से पहले डाला जाता है.' यह सुनते ही जीएम साहब, जो भट्ट के पीछे बैठे थे, उनके चेहरे का रंग एकदम उड़ गया, वे बार-बार अपनी टाई ढीली करने लगे. इजलास में एसी और पंखा चलते रहने के बावजूद वे पसीने-पसीने हो गए. "
प्रिया और प्रशांत बाबू दोनों हंस पड़े. रामजी काका ने आगे मजे लेते हुए कहा, "और वो भट्ट साहब! बहस के बीच में बार-बार अपनी फाइलें ऐसे टटोल रहे थे जैसे कोई चोर जेब काटने के बाद खुद पीड़ित का बटुआ ढूंढने लगता है. जब चव्हाण साहब ने 'ट्रक सिस्टम' और डिफेंस सप्लाई की बात छेड़ी, तो भट्ट साहब का गला ही सूख गया. वे बार-बार पानी की खाली हो गई बोतल को हाथ लगाने लगे. एएसएल ने उन्हें देखा तो अपने ही चपरासी को भेज कर उनके लिए पानी मंगा दिया."
प्रशांत बाबू ने बात को आगे बढ़ाया, "मजाक अपनी जगह है प्रिया, पर कानूनी रूप से चव्हाण साहब ने आज बेहतरीन काम किया. उन्होंने साबित कर दिया कि क्लोजर 'बोनाफाइड' नहीं है. अंत में एएसएल ने बता दिया कि वे मंत्रालय जाकर अपनी रिपोर्ट आज ही तैयार कर रहे हैं."
"और वो लाल पोटली!" रामजी काका ने आँखों को बड़ा करते हुए कहा. "प्रिया बिटिया, तुमने देखा नहीं... जैसे ही बहस खत्म हुई, एएसएल के रीडर ने इस केस की भारी-भरकम फाइल को लाल सूती कपड़े के बस्ते में लपेटा और चपरासी से उसे साहब की गाड़ी में रखने को बोला. जीएम और भट्ट साहब उस लाल बस्ते को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके घर की चाबी कोई छीन कर ले जा रहा हो."
रामजी काका की आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी. उन्होंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "गाड़ी जब मंत्रालय की तरफ रवाना हुई, तो भट्ट साहब का चेहरा देखने लायक था. कल तक जो शेर बने घूम रहे थे, आज भीगी बिल्ली बने अपनी चमचमाती कार में दुबक कर निकल गए."
प्रिया ने चाय का प्याला हाथ में लिया. उसे अहसास हुआ कि भले ही वह आज कोर्ट में मौजूद नहीं थी, लेकिन रामजी काका के इस 'आँखों देखे हाल' ने उसे उस पूरी विधिक लड़ाई का अहसास करा दिया था.
उसने प्रशांत बाबू की तरफ देखा, "तो अब गेंद मंत्रालय के पाले में है?"
प्रशांत बाबू गंभीर हो गए, "हाँ, और मंत्रालय की इमारत में एएसएल के इजलास से बहुत अधिक पेच हैं. वहां फाइलें बोलती नहीं हैं, दबाई जाती हैं. हम 14 मई तक इंतजार करते नहीं रह सकते, हमें कुछ ऐसा करना होगा कि सरकार हर हालत में 11 मई तक ही अपना निर्णय दे दे क्योंकि उसे फैक्ट्री प्रबंधन को पहुँचाकर उसका सबूत भी रखना होगा. 13-14 को शनिवार-रविवार हैं, इन दिनों वीकेंड के नाम पर कुछ भी गड़बड़ की जा सकती है."
... क्रमशः
