देहरी के पार, कड़ी - 65
प्रिया के फोन रख देने के बीस मिनट बाद ही मयंक को जयपुर मुंबई ट्रेन का थर्ड एसी टिकट ई-मेल से मिल गया, साथ ही टेक्स्ट मैसेज भी फॉरवर्ड होकर मिला. अब उसे गुरुवार की शाम मुंबई के लिए ट्रेन पकड़नी थी. उसने यह बात तब तक छिपाए रखी जब तक कि पापा फैक्ट्री के लिए न निकल गए. उनके जाते ही उसने टिकट का प्रिंट निकाला और लेकर मम्मी के पास पहुँच गया. “मम्मी, दीदी से आज सुबह ही बात हुई. पूछ रही थी कि ‘तेरी परीक्षा निपट गई?’. मैंने बताया कि रिजल्ट आने तक महीने भर मैं बिलकुल फ्री हूँ, तो कहने लगीं मुम्बई आ जा, मैं टिकट करवा देती हूँ. बीस मिनट बाद तो उन्होंने मुझे टिकट भी भेज दिया.”
“तूने प्रिया से बात कर ली, मुझे बताया भी नहीं. मैं भी उससे बात कर लेती. और फिर दो घंटे तक उस बात को छिपाए रखा. अच्छा ... ... मैं समझ गई. तू पापा के जाने का इंतजार कर रहा था. तू इतना डरता है पापा से?”
“नहीं मम्मी, मैं कहाँ डरता हूँ? बस प्रिया दीदी का नाम जुबान पर आते ही उनका चेहरे की चमक चली जाती है, वे उदास हो जाते हैं. इसीलिए सुबह-सुबह ध्यान रखा. उनका पूरे दिन का काम खराब हो जाता.”
“बड़ा आया पापा का ध्यान रखने वाला.”
“टिकट कब का है?”
“अगले गुरुवार का है. शुक्रवार सुबह मैं दीदी के साथ होऊंगा,” मयंक ने कहा.
रात गुप्ता जी लौटे तो पता लगने पर मयंक से पूछा, “प्रिया ने तुम्हारी माँ का टिकट नहीं बनवाया?”
“नहीं बनवाया, दीदी ने कहा, ‘फिर पापा अकेले रह जाएंगे’.” सुनकर गुप्ता जी ने चुप्पी साध ली.
शुक्रवार की सुबह ट्रेन मुंबई के बोरिवली स्टेशन पहुँच रही थी. मयंक अपने कंधे पर पिट्ठू बैग लटकाए और एक छोटा सूटकेस बाएँ हाथ में थामे अपने कोच के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ. खुले दरवाजे से आ रही तेज हवा ने उसके बालों को बिखेर दिया, वे हवा के साथ उड़ने लगे. ट्रेन रुकने के पहले ही उसे स्टेशन पर प्रिया दिखाई दे गई. वह उसे देखकर अपना हाथ हिला रही थी. महीनों बाद दीदी को देख उसके चेहरे पर खुशी दौड़ गई. ट्रेन रुकते ही वह उतरा और दौड़कर दीदी के पास पहुँचा, प्रिया ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. दोनों की आँखें नम हो आईं.
मुंबई जैसे महानगर में आने के बाद प्रिया अधिक दिन अकेली नहीं रही थी. रामजी काका और प्रशांत बाबू से भेंट के बाद उसकी मित्रता का दायरा बढ़ ही रहा था. मित्र यूनियनों के अनेक कार्यकर्ता उसे अपने परिवार के सदस्य समझने लगे थे. मेवाड़ भोजनालय (एमबी) के सारे स्टाफ के लिए वह दीदी थी. फिर भी सहोदर भाई को गले लगाना, उसे बाहों में लपेट लेना था ऐसा था, जैसे उसका समूचा परिवार उसकी बाहों में समा गया हो. फ्लैट पर पहुँचने के बाद चाय के मग हाथ में लिए दोनों भाई-बहन डाइनिंग टेबल पर बैठे, तो मयंक चाय की चुस्कियाँ लेते हुए कोटा के घर का पूरा हाल सुनाने लगा.
"दीदी, पापा भी अब पहले जैसे नहीं रहे," मयंक ने बिस्कुट का टुकड़ा दाँतों से काटते हुए कहा. "उनका गुस्सा अब पूरी तरह गायब हो चुका है. अब जब भी तुम्हारा ज़िक्र आता है, तो वे अड़ियल नहीं होते, बल्कि चुप हो जाते हैं. उनकी आँखों में अब एक दबी हुई फिक्र और तुम्हारे लिए एक अनकहा सम्मान दिखाई देता है. मम्मी तो बस उस दिन का इंतज़ार कर रही हैं जब पापा खुद कहेंगे कि चलो, मुंबई चलकर प्रिया से मिल कर आते हैं."
मयंक की बातें प्रिया के कानों में शहद घोल रही थीं. पारिवारिक संबंधों का यह सुख, अपनों की फिक्र और एक सहज, सुरक्षित घरेलू जीवन की आकांक्षा बेशकीमती होती है, इसका अहसास उसे आज बहुत गहराई से हो रहा था. लेकिन ठीक उसी क्षण, उसके अंतर्मन के किसी कोने में एक हल्की सी टीस उठी. वह सोचने लगी—उसके पिता ने विरासत में मिले एक मध्यम आढ़त के व्यवसाय से एक छोटे उद्योग के स्वामी होने तक का सफर तय किया था. तब वह बहुत छोटी थी. वे दिन पापा के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए संघर्ष और कभी-कभी अभाव के दिन थे. वे और उनके कर्मचारी सब एक जैसी स्थिति को जीते थे. मुश्किल से ये अच्छे दिन देखने को मिले थे. संघर्ष के दिनों में आढ़त और फैक्ट्री के कर्मचारियों के साथ जिए गए कष्ट के दिनों ने ही उसमें मेहनतकश बिरादरी के प्रति करुणा भाव जन्म लिया. उनमें से अनेक से उसे बेटी जैसा प्यार मिला था. उसी दौर ने प्रिया को उन्हें अपना परिवार समझने की सीख पैदा की थी, जिसने उसे मुंबई में मजदूरों के संघर्ष से जोड़ दिया.
प्रिया ने फुर्ती से नाश्ता बनाया और अपने लिए टिफिन तैयार कर लिया तथा मयंक के लिए भी लंच बना कर किचन में छोड़ दिया. मयंक को समय से लंच कर लेने की हिदायत दी और खुद अपने ऑफिस चली आई. यहाँ कंप्यूटर की स्क्रीन पर उंगलियाँ चलाते हुए भी उसके दिमाग में प्रशांत बाबू का पार्टी मेंबर बनने का प्रस्ताव बार-बार सामने आ रहा था. वह जानती थी कि वह बौद्धिक रूप से योग्य है; उसने साहित्य पढ़ा है, उससे सीखा है, अब वह खुद कर्मचारी है और श्रमजीवी होने का मतलब समझती है. फिर कमी कहाँ थी? कमी योग्यता में नहीं थी. शायद उसमें अभी उस साहस की कमी थी जो वक्त आने पर वर्ग के लिए खुद को पूरी तरह झौंक देने को चाहिए होता है.
उसके जेहन में कभी गोर्की के 'माँ' का नायक पावेल ब्लासोव की तो कभी आस्त्रोवस्की के अग्निदीक्षा उपन्यास के पावेल कोर्चागिन की छवियाँ आ खड़ी होती. कभी उसका ध्यान शहीद-ए-आजम भगत सिंह पर जा टिकता. तेईस साल की उम्र का वह लड़का, कितना कुछ पढ़ चुका था? कितनी दुनिया देख चुका था. दुनिया और समाज के बारे में उसने अपनी जो समझ सबके सामने रखी थी, शायद आज भी देश लगभग वहीं खड़ा है. उसने अपने लिए जो सामाजिक लक्ष्य निर्धारित किए थे वे आज भी नहीं बदले हैं. आज भी समाज, देश और दुनिया को वही चाहिए जो भगत सिंह चाहता था.
प्रिया ने की-बोर्ड छोड़कर कुर्सी के पीछे सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं. फाँसी के फंदे पर झूलने से महज कुछ मिनट पहले तक जेल की कोठरी में भगत लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था.. वह सोचने लगी कि आखिर वह क्या आदर्श था, जिसने उसे असेंबली में बम फेंकने और हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ जाने का साहस दिया था?
"क्या मुझमें कभी वैसा हौसला पैदा होगा?" प्रिया ने खुद से पूछा. "क्या मैं उस महान आदर्श के लिए अपने व्यक्तिगत सुखों को स्वेच्छा से पीछे धकेल सकती हूँ?" यह प्रश्न उसके मस्तिष्क में स्थाई रूप से खड़ा हो गया था.
शाम को वह ऑफिस से लौटी, तब आकाश पहले से उसके फ्लैट पर पहुँचा हुआ था और मयंक से गपबाजी में मशगूल था. प्रिया के घर छोड़ देने के बाद आकाश का प्रिया को अपनी कार से जयपुर ले लाना, होटल पर न ठहरने देना और उसकी सुरक्षा के लिए उसे अपने परिवार के साथ अपने घर ठहराना. उसके पूरे परिवार का उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना और विक्रांत से बचाना ऐसी घटनाएँ थी जिन्होंने मयंक के मन में आकाश के लिए गहरा आदर पैदा किया था. दोनों हॉल में बैठे अनौपचारिक, रूप से ऐसे बतिया रहे थे जैसे छोटे बड़े भाई हों.
प्रिया के कपड़े बदल कर तैयार होने पर पौने नौ बज रहे थे. यह खाने का समय था. वे निकट ही ‘चपाती’ रेस्टोरेंट पहुँचे, वहीं डिनर किया और फिर तीनों अंधेरी की एक हलचल भरी, रोशन सड़क पर टहलने निकले. मयंक और आकाश आगे-आगे चल रहे थे. मयंक चहकते हुए कोटा की बातें कर रहा था और आकाश मुस्कुराते हुए उसे मुंबई के तौर-तरीके समझा रहा था.
प्रिया उन दोनों से दो कदम पीछे, चुपचाप उनके साथ चल रही थी. सड़क की पीली बत्तियों की रोशनी में उसने आगे चलते आकाश के चौड़े कंधों और उसकी हँसती, खिलखिलाती आवाज़ को देखा. आकाश—एक ऐसा इंसान जो उसकी आज़ादी का सम्मान करता था, जो उसके जीवन में एक बेहद खूबसूरत, शांत और प्रेमपूर्ण भविष्य का प्रतीक बन सकता था. शायद उसके साथ ऐसा वैवाहिक जीवन वैसा हो सकता था, जिसका सपना हर लड़की देखती है.
लेकिन ठीक उसी पल, उसकी आँखों के सामने मिल के गेट पर खड़े लाचार मज़दूरों के चेहरे आ गए, जिनके बीच पिछले दिनों उसने पूरी शिद्दत के साथ काम किया था. मजदूर वर्ग की वेनगार्ड पार्टी का मेंबर होने का सीधा मतलब था—अपने व्यक्तिगत सुखों, अपनी सुख-सुविधाओं और यहाँ तक कि अपने प्रेम को भी मज़दूर वर्ग के व्यापक हितों से पीछे की पायदान पर रख देना. अगर कभी आंदोलन की ज़रूरत और इस व्यक्तिगत प्रेम के बीच चुनाव करना पड़ा, तो क्या वह बिना हिचकिचाए अपनी खुशियों को सेक्रिफाइस कर पाएगी? क्या वह इतनी मजबूत है?
अचानक आकाश ने पीछे मुड़कर देखा. प्रिया को पीछे चुपचाप चलते पाकर उसने अपनी रफ्तार धीमी कर दी और उसके करीब आते हुए बेहद अपनेपन से पूछा, "प्रिया, तुम कहाँ खो गई हो? देखो मयंक क्या कह रहा है."
प्रिया ने पलकें झपकाईं. उसने अपने भीतर के उस वैचारिक बवंडर को बहुत संभालकर अपने सीने में छिपा लिया और चेहरे पर एक गहरी, शांत और आत्मीय मुस्कान लाते हुए कहा, "कहीं नहीं आकाश, बस तुम दोनों की बातें सुन रही हूँ और सोच रही हूँ कि आज मुंबई की यह शाम कितनी सुंदर लग रही है."
उसने आगे बढ़ते हुए आकाश और मयंक के बीच अपनी जगह बनाई. वह जानती थी कि उसके अंतर्मन का यह संघर्ष इतनी जल्दी खत्म होने वाला नहीं है; यह रास्ता लंबा था और इसका फैसला उसे बहुत धीरज और परिपक्वता के साथ करना था.
... क्रमशः
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें