देहरी के पार, कड़ी - 74
प्रिया ने दो दिन के लिए ऑफिस से छुट्टी मयंक को मुंबई की सैर कराने के लिए नहीं ली थी. उसे मयंक और मम्मा-पापा के लिए कुछ खरीददारी भी करनी थी. गुरुवार, सुबह उसने जल्दी उठकर नाश्ते की तैयारी कर ली. फिर चाय के लिए पतीली गैस चूल्हे पर चढ़ाकर मयंक को जगाया. “तुम जल्दी से ब्रश करो, चाय तैयार है. उसके बाद जल्दी से तैयार हो लो, तब तक मैं नाश्ता तैयार कर लूंगी. हम नाश्ता करके बाजार चलेंगे. हमें आज बहुत सारी शॉपिंग भी करनी है.”
नाश्ते के बाद दोनों भाई-बहन दादर बाज़ार के लिए निकल लिए. प्रिया की इच्छा थी कि जब मयंक शनिवार को कोटा लौटे, तो उसके साथ न केवल उसके लिए बल्कि मम्मा पापा के लिए उपहार भी हों.
बाज़ार की चहल-पहल के बीच घूमते हुए प्रिया ने मयंक की पसंद से उसके लिए चार बेहतरीन फॉर्मल शर्टें खरीदीं और दो जींस भी. फिर दोनों एक बड़ी साड़ियों की दुकान में गए, यहाँ से प्रिया ने अपनी माँ के लिए एक औरंगाबादी हिमरू साड़ी, एक पुणे की पुणेरी साड़ी और एक खुन साड़ी खरीदी.
"दीदी, आपने मेरे और मम्मा के लिए तो खरीदी कर दी. क्या पापा के लिए कुछ नहीं लेंगी?” मयंक ने साड़ी की दुकान से निकलते हुए पूछा.
"पापा के लिए क्यों न लेंगे? उनके लिए एक शानदार सूती कुर्ता-पायजामा लेंगे. मंडी के कामों के लिए उन्हें आरामदायक रहेगा. मैं सोच रही हूँ एक सफारी सूट का कपड़ा भी ले लूं. वे पहनकर किसी शादी या पार्टी में जाएंगे तो लोगों को फक्र के साथ कहेंगे कि यह उन्हें प्रिया ने गिफ्ट में दिया है, वह क्षण उनके लिए बहुत प्यारा होगा," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा.
“एक बात है दीदी, आप मम्मा, पापा और मुझे भी खूब समझती हैं.”
उसके बाद उन्होंने एक दुकान से कुर्ता-पायजामा खरीदा, दूसरी से सफारी सूट के दो सेट खरीदे. खरीददारी के बाद कॉफी पीने के लिए कैफे की तरफ जा ही रहे थे कि बीच में एक घड़ियों की दुकान दिखने पर प्रिया उसमें घुस गई. मयंक को भी उसके पीछे जाना पड़ा. घड़ी की दुकान में उसने एक इलेक्ट्रॉनिक स्पोर्ट कलाई घड़ी पसंद करते हुए उसे मयंक को पहनने को कहा. मयंक के घड़ी पहनने के बाद प्रिया ने पूछा, “कैसी लगी?”
“लगी तो अच्छी दीदी, पर महंगी भी बहुत है. मैंने तो कभी पाँच सौ से अधिक की घड़ी न पहनी. यह तो छह हजार की है.”
“महंगी सस्ती छोड़, तुझे अच्छी लगी है, तो पैक करवा. इसे पहनना. यह रोज तुम्हारी मॉर्निंग वाक और वर्कआउट वगैरा का ध्यान रखेगी. मुझे पता है जैसे ही पापा का काम संभालोगे तुम्हारा पेट बाहर निकलने लगेगा, इसलिए दैनिक वर्कआउट बहुत जरूरी है. यह ब्लड ऑक्सीजन, पल्स-रेट वगैरा भी बताती रहेगी. इससे तुम्हारा दिन नियमित होगा. यदि पापा को फ्री करना है तो तुम्हें यह सब करना होगा.”
खरीदारी के बाद वे सिद्धि विनायक मंदिर पहुँचे. वहाँ बहुत लंबी कतार थी. उन्हें मुख्य मंदिर तक पहुँचने में करीब 20 मिनट लगे. मयंक को वहाँ आश्चर्य हुआ कि मंदिर में सभी दर्शनार्थी सीधे गर्भगृह तक जा सकते हैं. उसने कोटा और उत्तर भारत के मंदिरों में ऐसा नहीं देखा था. दर्शन करके बाहर निकले तब तीन बज रहे थे. मयंक को भूख महसूस होने लगी थी.
“दीदी, सुबह का नाश्ता तो पच गया. भूख लग रही है. कहीं लंच करना चाहिए.”
“हाँ, मंयक, भूख ही नहीं लगी होगी. आज खूब चले हैं, तुम्हें थकान भी होने लगी होगी. चल, सामने ही यहाँ का प्रसिद्ध शिवराज ढाबा है. आज का लंच वहीं करते हैं.”
थोड़ी दूर पैदल चलने पर ही शिवराज ढाबा आ गया. वे अंदर गए. तीन बजे भी वहाँ लगभग सभी टेबलें भरी थीं. बायीं ओर की एक टेबल खाली हो रही थी. दो मिनट इंतजार करने पर वह उन्हें मिल गई.
टेबल पर बैठते हुए मयंक ने कहा, "दीदी, आप चिंता मत करना. मैं कोटा पहुँचते ही आढ़त का काम पूरी तरह समझूंगा और पापा को जल्द से जल्द मुनीम जी के भरोसे से मुक्त कर दूंगा. उन्हें आराम के लिए पूरा समय मिलेगा.” प्रिया ने भाई के चेहरे को देखा; उसमें अब एक परिपक्व वयस्क की दृढ़ता और पारिवारिक ज़िम्मेदारी साफ़ झलक रही थी.
ढाबे का भोजन उसके नाम जैसा ही स्वादिष्ट था. भरपेट खाने के बाद मयंक ने डकार लेते हुए कहा, “दीदी अब तो सीधे घर चलना होगा. अपनी हिम्मत नहीं अब घूमने की.”
अगले दिन, शुक्रवार 28 जून 2019 की सुबह आठ बजे ही, प्रशांत बाबू वादे के मुताबिक कोर्ट जाने से पहले प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. मयंक ने लपक कर उनके पैर छुए. प्रशांत बाबू ने उसके सिर पर हाथ रखकर बहुत आत्मीयता से आशीर्वाद दिया, "खुश रहो बेटा! मुझे तुम्हारी दीदी से पता चला कि तुम कल वापस कोटा लौट रहे हो. यह बहुत अच्छी बात है कि तुम अब अपने पिता के साथ उनके मोर्चे पर खड़े होने जा रहे हो."
प्रिया रसोई से चाय और नाश्ता ले आई. चाय की चुस्कियाँ लेते हुए प्रशांत बाबू का रुख तुरंत आज होने वाली ट्रिब्यूनल की सुनवाई की तरफ मुड़ गया. उनके चेहरे पर थोड़ी चिंता की रेखाएँ थीं.
"प्रिया, कल शाम मेरी यूनियन सचिव कॉमरेड शिंदे से लंबी बात हुई," प्रशांत बाबू ने गंभीर आवाज़ में कहा. "प्रबंधन ने जो 'गोल्डन हैंड शेक' का प्रस्ताव उनके सामने रखा है, उसने शिंदे जी को बहुत गहरे असमंजस और डर में डाल दिया है."
"क्या शिंदे जी प्रबंधन के प्रभाव में आ रहे हैं सर?" प्रिया ने आशंकित होकर पूछा.
"नहीं प्रिया, ऐसा बिल्कुल नहीं है," प्रशांत बाबू ने तुरंत स्पष्ट किया. "शिंदे यूनियन के निर्वाचित सचिव हैं, बरसों से मज़दूरों के सुख-दुख के साथी रहे हैं. उनका डर दरअसल बहुत वाजिब और ज़मीनी है, जिसे वे मज़दूरों के सामने भी प्रकट कर रहे हैं. शिंदे जी का कहना है कि प्रबंधन एकमुश्त ठीक-ठाक रकम दे रहा है. अगर आज कोर्ट में हमने जवाब दाखिल करवा दिया और मामला आगे बढ़ा, तो ये मिल मालिक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे. कानूनी लड़ाई में सालों खिंच जाएंगे. इस बीच अगर मिल बंद रही और मज़दूरों को कुछ नहीं मिला, तो उनके परिवारों का पेट कैसे पलेगा? परिवारों को पालने में सारे मजदूर छिन्न-भिन्न हो जाएंगे. इससे मजदूरों की जो एकता अभी है वह नहीं रहेगी, कमजोर होगी और उसके साथ ही यूनियन की संघर्ष की शक्ति भी. एक मज़दूर नेता के तौर पर उनका यह सोचना और डरना गलत नहीं है."
प्रिया ने गहराई से सोचते हुए कहा, "मैं समझ सकती हूँ सर. शिंदे जी का डर उचित और बिल्कुल व्यावहारिक है. मुझे भी लगता है कि प्रस्ताव बेहतर है. लेकिन हमें इसमें मजदूरों को मिलने वाले लाभों को बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा देनी चाहिए. मिल मालिक इस बेशकीमती ज़मीन के टके करना चाहता है तो उसमें मजदूरों को हिस्सा मिलना चाहिए. आज यदि कोर्ट का रुख कड़ा रहे तो हम प्रबंधन से बढ़िया बारगेनिंग कर सकते हैं."
"बिल्कुल ठीक! चलो, दोपहर ढाई बजे की पेशी है. आज चव्हाण साहब भी कोर्ट में मज़बूत तैयारी के साथ आ रहे हैं," प्रशांत बाबू ने घड़ी देखते हुए कहा और मयंक से हाथ मिलाकर कोर्ट के लिए विदा ली. जाते वक्त वे प्रिया को कहना नहीं भूले कि, ‘उसने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या तय किया’. प्रिया ने उसका कोई उत्तर दिए बिना मुस्कुराते हुए उन्हें विदा किया.
इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में प्रबंधन ने जवाब के लिए और वक्त देने की गुजारिश की. इस पर चव्हाण साहब ने अपने तर्क रखते हुए विरोध किया. जज ने चव्हाण साहब के तर्कों को बहुत ध्यान से सुना. उन्होंने प्रबंधन के वकील की तरफ देखा और उनका रुख बेहद कड़ा हो गया.
"मिस्टर काउंसिल, यह कोर्ट किसी भी सूरत में अपनी तय की गई तीन महीने की समय-सीमा का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करेगी," जज साहब ने फाइल पर पेन चलाते हुए सख्त लहजे में कहा. "दस्तावेज़ आपके पास पिछले दस दिनों से हैं. यह समय का अपव्यय करने की कोशिश है."
जज साहब ने आदेश लिखवाया, "प्रबंधन का समय मांगने का आवेदन खारिज किया जाता है. प्रबंधन पर पाँच हजार रुपए का जुर्माना (Costs) लगाया जाता है. लिखित जवाब (Written Statement) दाखिल करने के लिए जुलाई के पहले सप्ताह की अगली तारीख दी जाती है, जो कि 'अंतिम और आखिरी मौका' होगा. यदि उस दिन भी जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो प्रबंधन का जवाब देने का विधिक अधिकार बंद (Right Closed) मान लिया जाएगा."
कोर्ट रूम के बाहर निकलते ही शिंदे के चेहरे पर भी एक बड़ी राहत थी. उन्होंने प्रशांत बाबू और चव्हाण साहब का हाथ थामते हुए कहा, "चव्हाण साहब, आज कोर्ट ने जो कड़ा रुख दिखाया है, उससे हमारी बारगेनिंग पावर बढ़ गई है. उनके वकील बाहर मुझसे कह रहे थे कि हमें अगले दो-तीन दिनों में ही बैठकर किसी समझौते तक पहुँचने के लिए बात करनी होगी. कोर्ट की इस कड़ाई ने मज़दूरों के मन के डर को बहुत हद तक कम कर दिया है."
प्रिया को यह समाचार प्रशांत बाबू ने फोन पर दिया. प्रिया ने मयंक को भी इस लड़ाई के बारे में विस्तार से बताया.
"दीदी, पर मेरा कोटा का अपना अनुभव कहता है कि यदि “गोल्डन हैंडशेक” में मजदूरों को अच्छा मुआवजा और दूसरे कानूनी लाभ तुरन्त मिल जाते हैं तो यही बेहतर होगा.” मयंक ने अपनी राय देते हुए कहा. फिर उसने मुस्कुराते हुए याद दिलाया, "वैसे दीदी, कल शनिवार है. शाम को मेरी ट्रेन है. लेकिन उससे पहले, सुबह नौ बजे हमें गेटवे पर आकाश भैया से मिलना है. हमारी मुंबई डायरी का आखिरी पन्ना अभी बाकी है."
प्रिया ने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुंबई की बत्तियाँ जगमगा रही थीं. उसे विश्वास था कि ‘ईसीआई’ फैक्ट्री के मजदूरों के संघर्ष की जीत होगी. और कल समंदर की लहरों के बीच मयंक की इस मुंबई यात्रा का एक सुंदर समापन होने वाला था.
...क्रमशः
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