@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: समझौता प्रस्ताव

शनिवार, 4 जुलाई 2026

समझौता प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 73
'चपाती' रेस्टोरेंट में अच्छी-चहल-पहल थी. दो टेबलों से लोग अभी उठकर गए थे, उनकी सफाई की जा रही थी. प्रिया और मयंक को कुछ देर रिसेप्शन में इंतजार करना पड़ा. मयंक ने सादी चपाती, दाल-तड़का और टिंडा मसाला का ऑर्डर दे दिया.

पापा से फोन पर हुई बातचीत के बाद प्रिया के भीतर एक अजीब सी खामोशी पसर गई थी. मयंक अपनी दीदी के मन की इस हलचल को बहुत अच्छी तरह समझ रहा था. वह जानता था कि बरसों का संकोच और ग्लानि जब एक झटके में पिघलती है, तो मन को संभलने में थोड़ा वक्त लगता है. उसने माहौल को हल्का करना चाहा.

"दीदी, सच बताऊँ तो मुझे तो अभी से कोटा की फिक्र होने लगी है," मयंक ने मुस्कुराते हुए चपाती का पहला निवाला तोड़ते हुए कहा.

प्रिया ने चश्मे के पीछे से उसे उत्सुकता से देखा, "जब कोई किसी जिम्मेदारी को उठाने को तैयार हो जाता है तो फिर फिक्र भी होने लगती है, यह सामान्य बात है. पर यह सब कोटा पहुँच कर सोचना, जब तक यहाँ है, तू फिक्र को अलग रख."

"अरे दीदी, पापा की आढ़त की फिक्र है," मयंक ने शरारत से आँखें नचाईं. "अब जब आपके कहे मुताबिक पापा और मम्मी दोनों एक सप्ताह के लिए मुंबई घूमने आएंगे, तो वहाँ कोटा में पूरी आढ़त और चाबियाँ मेरे पास होंगी. मैं तो सोच रहा हूँ कि सबसे पहले मुनीम जी की छुट्टी कर दूँ और सारा हिसाब-किताब अपने कंप्यूटर पर ले आऊँ. पापा लौटकर वहाँ आएंगे, तब तक सब कुछ बदलकर अपने हिसाब से कर दूंगा.”

मयंक की इस बचकानी लेकिन बेहद आत्मीय शरारत को सुनकर प्रिया के चेहरे पर हफ़्तों बाद एक खिलखिलाती हुई राहत भरी मुस्कान आ गई.

"चल, पागल जैसी बातें मत कर. मुनीम जी की छुट्टी करेगा? उलटे वो तेरी छुट्टी कर देंगे. मुनीम जी को पापा के साथ काम करते पैंतीस साल से भी अधिक हो गए. मैंने तो आँखें खोलीं, तब से उन्हें वहीं देखा है. जानता भी है? सारा काम वही संभालते हैं. पापा तो केवल गद्दी पर बैठकर निगरानी करते हैं. तू बच्चा है उनके सामने. आढ़त संभालेगा तो उनके सहायक की हैसियत से, ज्यादा कुछ किया तो वे तेरा मंडी में आना बंद कर देंगे.” प्रिया ने मज़े लेते हुए कहा और फिर उसका लहजा थोड़ा गंभीर हुआ, "वैसे तूने अच्छा सोचा, मयंक. पापा-मम्मी को सचमुच इस भागदौड़ और मानसिक तनाव से बाहर निकलकर कुछ दिन आराम की सख्त ज़रूरत है. मेरा भी प्रोजेक्ट कल-परसों में खत्म हो रहा है, मैं भी ऑफिस से कुछ दिन की छुट्टी का मन बना रही हूँ. जब वे आएंगे, तो मैं उन्हें अपने साथ घुमाऊंगी."

"हाँ दीदी, बिल्कुल. और गाइड के पैसे बचाने के लिए आकाश भाई भी तो हैं." मयंक ने एक और पासा फेंका. प्रिया ने कृत्रिम गुस्से से उसे घूरा, पर उसके गालों पर आई हल्की सी सुर्खी मयंक की नज़रों से बच नहीं सकी.

सोमवार सुबह प्रिया उठी और जल्दी से तैयार होने लगी. वह चाहती थी कि प्रोजेक्ट का काम 25 जून की डेडलाइन से एक दिन पहले, आज ही पूरा हो ले. उसकी पूरी टीम पिछले कई हफ़्तों से दिन-रात एक किए हुए थी, कोडिंग के कुछ अंतिम छोरों को आपस में जोड़ कर री-टेस्टिंग करना शेष था. वह चाहती थी कि आज रात तक यह सारा काम पूरा हो ले और अगले दिन केवल क्लाइंट को डिलीवरी ही शेष रहे.

उस दिन काम करते हुए उसे आधी रात हो गई. उसके साथ तीन टीम मेंबर और रुके हुए थे. ऑफिस से बाहर निकलकर सभी ने कॉमन टैक्सी की. वह रात एक बजे के बाद घर पहुँची. तब तक मयंक एक नींद ले चुका था. उसे अपनी दीदी के इस कड़े कॉर्पोरेट यथार्थ को देखकर समझ आ रहा था कि चाहे कारखाने का मज़दूर हो या लाखों का पैकेज पाने वाला सॉफ्टवेयर इंजीनियर, काम के अमानवीय घंटे और अपनी रीढ़ निचोड़ देने वाली मेहनत दोनों जगह एक जैसी ही है.

25 जून को प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक डिलीवर और टेस्ट हो गया. वह घर पहुँची, तब उसके चेहरे पर एक बड़ी जंग फतह करने जैसा सुकून था. वह चाहती तो थी कि अगले तीन दिन वह छुट्टी लेकर मयंक के साथ मुंबई घूम ले. लेकिन प्रोजेक्ट डिलीवर करने के अगले दिन यह ठीक नहीं था. प्रोजेक्ट में कुछ भी शिकायत आती तो सबसे पहले उसी को क्लाइंट से बात करनी होती. लेकिन उसने मयंक के साथ के लिये 27-28 जून को अवकाश ले लिया.

बुधवार की शाम ऑफिस से लौटकर प्रिया रसोई में चाय बना रही थी, तभी प्रशांत बाबू की कॉल आ गई.

"बधाई हो प्रिया! मुझे बब्बन भाई से पता चला कि तुम्हारा प्रोजेक्ट कल रात सफलतापूर्वक मुकम्मल हो गया," प्रशांत बाबू की आवाज़ में हमेशा की तरह वही पितातुल्य स्नेह था.

"जी सर, कल देर रात सब ठीक से डिलीवर हो गया था. आज भी शाम क्लाइंट से बात हुई तो उसने बताया कि सब कुछ अपेक्षा से भी अधिक फास्ट चल रहा है. बस अभी ऑफिस से लौटी हूँ. एकदम हल्का महसूस हो रहा है," प्रिया ने कहा.

"बहुत अच्छा. लेकिन प्रिया, इधर मिल मालिकों ने एक नया और बहुत ख़तरनाक पासा फेंका है," प्रशांत बाबू का लहजा तुरंत गंभीर हो गया. "तुम्हें याद है न कि पिछले मंगलवार, 18 जून को हमारी 'ऑटो चालक यूनियन' की बैठक से ठीक पहले, हमारे वकीलों ने ट्रिब्यूनल के मुंसरिम (Court Clerk) के सामने मिल मज़दूरों का 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' और सारे अकाट्य सांख्यिकीय दस्तावेज़ पेश किए थे? और जज साहब ने इस विवाद को सुलझाने के लिए सितंबर के मध्य तक की कड़ी समय-सीमा तय करते हुए प्रबंधन को अपना लिखित जवाब (Written Statement) देने के लिए महज़ दस दिन की मोहलत दी थी?"

"जी सर, मुझे अच्छी तरह याद है. परसों, यानी शुक्रवार 28 जून को कोर्ट में उनकी पेशी है और उन्हें अपना लिखित जवाब दाखिल करना है," प्रिया ने विधिक बारीकी को दोहराया.

प्रशांत बाबू ने आगे बताया, "बात यह है प्रिया कि तुमने मज़दूरों के घरेलू खर्चों, बाज़ार भाव और मिल के गुप्त मुनाफे का जो अकाट्य गणित (Data) तैयार किया है, उसका कोई तोड़ मिल मालिकों के वकीलों को नहीं मिल रहा है. ऊपर से अक्टूबर में राज्य के विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए सरकार के मंत्रियों ने भी उन्हें पिछले दरवाजे से मिल बंद करने का चांस देने से साफ़ मना कर दिया है. वे चुनावी माहौल में वोट बैंक को नाराज़ करने का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते. कोर्ट में अपनी निश्चित हार देखकर, मिल प्रबंधन ने अब कानूनी लड़ाई से भागने का रास्ता चुना है."

"तो वे क्या कर रहे हैं सर?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

"उन्होंने हमारी यूनियन के सचिव शिंदे के सामने 'गोल्डन हैंडशेक' (Golden Handshake) का एकमुश्त समझौता प्रस्ताव आधिकारिक रूप से रखा है. "वे चाहते हैं कि ट्रिब्यूनल का कोई भी प्रतिकूल निर्णय आने से पहले, उद्योग बंदीकरण पर जो भी लाभ मजदूरों के बनते हैं उनसे लाख-पचास हजार अधिक देकर मज़दूरों से स्वेच्छा से इस्तीफ़ा लिखवा लिया जाए और इस पूरे मामले को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया जाए. वे मज़दूरों के बीच यह अफवाह भी उड़ा रहे हैं कि अगर मामला कोर्ट में लंबा खिंचा, तो मिल बंद हो जाएगी और किसी को फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी."

प्रिया का चेहरा गंभीर हो गया, "सर, यह पूंजीपतियों की बहुत पुरानी और आजमाई हुई चाल है. जब वे कानूनी शिकंजे में फंसते हैं, तो पैसों के दम पर मज़दूरों का सब्र और उनकी रीढ़ तोड़ने की कोशिश करते हैं. वे कोर्ट के बाहर ही इस आंदोलन को खत्म करना चाहते हैं."

"बिल्कुल प्रिया. मज़दूरों के भीतर इस छलावे को लेकर एक असमंजस और अंतर्द्वंद्व की स्थिति बनने लगी है. हमें बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा. खैर, परसों शुक्रवार को कोर्ट की कार्यवाही बहुत कुछ साफ़ करेगी कि उनके वकील क्या रुख अपनाते हैं. और हाँ, मयंक अभी यहीं है न?”

“नहीं सर, उसकी शनिवार शाम को कोटा की टिकट बुक करवा दी है. पापा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. वहाँ जाकर उनकी मदद करेगा. आगे सब कुछ इसे ही देखना है. मैंने भी दो दिन की छुट्टी ले ली है. उसे मुंबई की कुछ और जगहें दिखा दूंगी. चाहती हूँ उसके लिए और मम्मी-पापा के लिए कुछ खरीद दूँ. उसका खाली हाथ जाना ठीक नहीं है.”

“प्रिया, यह तुमने अच्छा सोचा. इससे तुम्हारे मम्मी-पापा से रिश्ता नॉर्मल होने में मदद मिलेगी. हो सका तो मैं शुक्रवार तक तुम्हारे फ्लैट पर आता हूँ. एक बार मयंक से मिल लूंगा.”

“सर, फोन करके आइए. कहीं ऐसा न हो कि हम बाहर से नहीं लौट पाएँ और आप परेशान हों.” प्रिया ने कहा.

“नहीं फोन करके ही आऊंगा. और तुमने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या सोचा?” प्रशांत बाबू ने फिर वही सवाल पूछा जिसने प्रिया को असमंजस में डाल दिया था.

“उस बारे में मैं अभी निर्णय नहीं ले पाई हूँ. मयंक के यहाँ होने और प्रोजेक्ट पूरा करने के चक्कर में सोच ही नहीं पाई.”

“ठीक है. मयंक के जाने के बाद संभवतः रविवार को तुम्हारे यहाँ फिर आता हूँवहीं चाय के साथ हम तुम्हारी पार्टी मेंबरशिप के उस संकोच और मज़दूरों के इस नए संकट, दोनों पर विस्तार से बात करेंगे."

"जी सर, मुझे आपका बेसब्री से इंतज़ार रहेगा," प्रिया ने दृढ़ता से कहा.

फोन रखने के बाद प्रिया खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई. बाहर मुंबई की उमस भरी हवा थी. एक तरफ उसका अपना प्रोजेक्ट पूरा हो चुका था, लेकिन दूसरी तरफ पूंजीपतियों के इस 'गोल्डन हैंडशेक' के नए दांव ने कानूनी मोर्चे की तपिश को और बढ़ा दिया था. यह वीकेंड और आने वाला सप्ताह बहुत निर्णायक चीजें सामने लाने वाला था.

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