@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: जुलाई 2026

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

वापसी की तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 74
प्रिया ने दो दिन के लिए ऑफिस से छुट्टी मयंक को मुंबई की सैर कराने के लिए नहीं ली थी. उसे मयंक और मम्मा-पापा के लिए कुछ खरीददारी भी करनी थी. गुरुवार, सुबह उसने जल्दी उठकर नाश्ते की तैयारी कर ली. फिर चाय के लिए पतीली गैस चूल्हे पर चढ़ाकर मयंक को जगाया. “तुम जल्दी से ब्रश करो, चाय तैयार है. उसके बाद जल्दी से तैयार हो लो, तब तक मैं नाश्ता तैयार कर लूंगी. हम नाश्ता करके बाजार चलेंगे. हमें आज बहुत सारी शॉपिंग भी करनी है.”

नाश्ते के बाद दोनों भाई-बहन दादर बाज़ार के लिए निकल लिए. प्रिया की इच्छा थी कि जब मयंक शनिवार को कोटा लौटे, तो उसके साथ न केवल उसके लिए बल्कि मम्मा पापा के लिए उपहार भी हों.

बाज़ार की चहल-पहल के बीच घूमते हुए प्रिया ने मयंक की पसंद से उसके लिए चार बेहतरीन फॉर्मल शर्टें खरीदीं और दो जींस भी. फिर दोनों एक बड़ी साड़ियों की दुकान में गए, यहाँ से प्रिया ने अपनी माँ के लिए एक औरंगाबादी हिमरू साड़ी, एक पुणे की पुणेरी साड़ी और एक खुन साड़ी खरीदी.

"दीदी, आपने मेरे और मम्मा के लिए तो खरीदी कर दी. क्या पापा के लिए कुछ नहीं लेंगी?” मयंक ने साड़ी की दुकान से निकलते हुए पूछा.

"पापा के लिए क्यों न लेंगे? उनके लिए एक शानदार सूती कुर्ता-पायजामा लेंगे. मंडी के कामों के लिए उन्हें आरामदायक रहेगा. मैं सोच रही हूँ एक सफारी सूट का कपड़ा भी ले लूं. वे पहनकर किसी शादी या पार्टी में जाएंगे तो लोगों को फक्र के साथ कहेंगे कि यह उन्हें प्रिया ने गिफ्ट में दिया है, वह क्षण उनके लिए बहुत प्यारा होगा," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा.

“एक बात है दीदी, आप मम्मा, पापा और मुझे भी खूब समझती हैं.”

उसके बाद उन्होंने एक दुकान से कुर्ता-पायजामा खरीदा, दूसरी से सफारी सूट के दो सेट खरीदे. खरीददारी के बाद कॉफी पीने के लिए कैफे की तरफ जा ही रहे थे कि बीच में एक घड़ियों की दुकान दिखने पर प्रिया उसमें घुस गई. मयंक को भी उसके पीछे जाना पड़ा. घड़ी की दुकान में उसने एक इलेक्ट्रॉनिक स्पोर्ट कलाई घड़ी पसंद करते हुए उसे मयंक को पहनने को कहा. मयंक के घड़ी पहनने के बाद प्रिया ने पूछा, “कैसी लगी?”

“लगी तो अच्छी दीदी, पर महंगी भी बहुत है. मैंने तो कभी पाँच सौ से अधिक की घड़ी न पहनी. यह तो छह हजार की है.”

“महंगी सस्ती छोड़, तुझे अच्छी लगी है, तो पैक करवा. इसे पहनना. यह रोज तुम्हारी मॉर्निंग वाक और वर्कआउट वगैरा का ध्यान रखेगी. मुझे पता है जैसे ही पापा का काम संभालोगे तुम्हारा पेट बाहर निकलने लगेगा, इसलिए दैनिक वर्कआउट बहुत जरूरी है. यह ब्लड ऑक्सीजन, पल्स-रेट वगैरा भी बताती रहेगी. इससे तुम्हारा दिन नियमित होगा. यदि पापा को फ्री करना है तो तुम्हें यह सब करना होगा.”

खरीदारी के बाद वे सिद्धि विनायक मंदिर पहुँचे. वहाँ बहुत लंबी कतार थी. उन्हें मुख्य मंदिर तक पहुँचने में करीब 20 मिनट लगे. मयंक को वहाँ आश्चर्य हुआ कि मंदिर में सभी दर्शनार्थी सीधे गर्भगृह तक जा सकते हैं. उसने कोटा और उत्तर भारत के मंदिरों में ऐसा नहीं देखा था. दर्शन करके बाहर निकले तब तीन बज रहे थे. मयंक को भूख महसूस होने लगी थी.

“दीदी, सुबह का नाश्ता तो पच गया. भूख लग रही है. कहीं लंच करना चाहिए.”

“हाँ, मंयक, भूख ही नहीं लगी होगी. आज खूब चले हैं, तुम्हें थकान भी होने लगी होगी. चल, सामने ही यहाँ का प्रसिद्ध शिवराज ढाबा है. आज का लंच वहीं करते हैं.”

थोड़ी दूर पैदल चलने पर ही शिवराज ढाबा आ गया. वे अंदर गए. तीन बजे भी वहाँ लगभग सभी टेबलें भरी थीं. बायीं ओर की एक टेबल खाली हो रही थी. दो मिनट इंतजार करने पर वह उन्हें मिल गई.

टेबल पर बैठते हुए मयंक ने कहा, "दीदी, आप चिंता मत करना. मैं कोटा पहुँचते ही आढ़त का काम पूरी तरह समझूंगा और पापा को जल्द से जल्द मुनीम जी के भरोसे से मुक्त कर दूंगा. उन्हें आराम के लिए पूरा समय मिलेगा.” प्रिया ने भाई के चेहरे को देखा; उसमें अब एक परिपक्व वयस्क की दृढ़ता और पारिवारिक ज़िम्मेदारी साफ़ झलक रही थी.

ढाबे का भोजन उसके नाम जैसा ही स्वादिष्ट था. भरपेट खाने के बाद मयंक ने डकार लेते हुए कहा, “दीदी अब तो सीधे घर चलना होगा. अपनी हिम्मत नहीं अब घूमने की.”

अगले दिन, शुक्रवार 28 जून 2019 की सुबह आठ बजे ही, प्रशांत बाबू वादे के मुताबिक कोर्ट जाने से पहले प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. मयंक ने लपक कर उनके पैर छुए. प्रशांत बाबू ने उसके सिर पर हाथ रखकर बहुत आत्मीयता से आशीर्वाद दिया, "खुश रहो बेटा! मुझे तुम्हारी दीदी से पता चला कि तुम कल वापस कोटा लौट रहे हो. यह बहुत अच्छी बात है कि तुम अब अपने पिता के साथ उनके मोर्चे पर खड़े होने जा रहे हो."

प्रिया रसोई से चाय और नाश्ता ले आई. चाय की चुस्कियाँ लेते हुए प्रशांत बाबू का रुख तुरंत आज होने वाली ट्रिब्यूनल की सुनवाई की तरफ मुड़ गया. उनके चेहरे पर थोड़ी चिंता की रेखाएँ थीं.

"प्रिया, कल शाम मेरी यूनियन सचिव कॉमरेड शिंदे से लंबी बात हुई," प्रशांत बाबू ने गंभीर आवाज़ में कहा. "प्रबंधन ने जो 'गोल्डन हैंड शेक' का प्रस्ताव उनके सामने रखा है, उसने शिंदे जी को बहुत गहरे असमंजस और डर में डाल दिया है."

"क्या शिंदे जी प्रबंधन के प्रभाव में आ रहे हैं सर?" प्रिया ने आशंकित होकर पूछा.

"नहीं प्रिया, ऐसा बिल्कुल नहीं है," प्रशांत बाबू ने तुरंत स्पष्ट किया. "शिंदे यूनियन के निर्वाचित सचिव हैं, बरसों से मज़दूरों के सुख-दुख के साथी रहे हैं. उनका डर दरअसल बहुत वाजिब और ज़मीनी है, जिसे वे मज़दूरों के सामने भी प्रकट कर रहे हैं. शिंदे जी का कहना है कि प्रबंधन एकमुश्त ठीक-ठाक रकम दे रहा है. अगर आज कोर्ट में हमने जवाब दाखिल करवा दिया और मामला आगे बढ़ा, तो ये मिल मालिक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे. कानूनी लड़ाई में सालों खिंच जाएंगे. इस बीच अगर मिल बंद रही और मज़दूरों को कुछ नहीं मिला, तो उनके परिवारों का पेट कैसे पलेगा? परिवारों को पालने में सारे मजदूर छिन्न-भिन्न हो जाएंगे. इससे मजदूरों की जो एकता अभी है वह नहीं रहेगी, कमजोर होगी और उसके साथ ही यूनियन की संघर्ष की शक्ति भी. एक मज़दूर नेता के तौर पर उनका यह सोचना और डरना गलत नहीं है."

प्रिया ने गहराई से सोचते हुए कहा, "मैं समझ सकती हूँ सर. शिंदे जी का डर उचित और बिल्कुल व्यावहारिक है. मुझे भी लगता है कि प्रस्ताव बेहतर है. लेकिन हमें इसमें मजदूरों को मिलने वाले लाभों को बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा देनी चाहिए. मिल मालिक इस बेशकीमती ज़मीन के टके करना चाहता है तो उसमें मजदूरों को हिस्सा मिलना चाहिए. आज यदि कोर्ट का रुख कड़ा रहे तो हम प्रबंधन से बढ़िया बारगेनिंग कर सकते हैं."

"बिल्कुल ठीक! चलो, दोपहर ढाई बजे की पेशी है. आज चव्हाण साहब भी कोर्ट में मज़बूत तैयारी के साथ आ रहे हैं," प्रशांत बाबू ने घड़ी देखते हुए कहा और मयंक से हाथ मिलाकर कोर्ट के लिए विदा ली. जाते वक्त वे प्रिया को कहना नहीं भूले कि, ‘उसने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या तय किया’. प्रिया ने उसका कोई उत्तर दिए बिना मुस्कुराते हुए उन्हें विदा किया.

इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में प्रबंधन ने जवाब के लिए और वक्त देने की गुजारिश की. इस पर चव्हाण साहब ने अपने तर्क रखते हुए विरोध किया. जज ने चव्हाण साहब के तर्कों को बहुत ध्यान से सुना. उन्होंने प्रबंधन के वकील की तरफ देखा और उनका रुख बेहद कड़ा हो गया.

"मिस्टर काउंसिल, यह कोर्ट किसी भी सूरत में अपनी तय की गई तीन महीने की समय-सीमा का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करेगी," जज साहब ने फाइल पर पेन चलाते हुए सख्त लहजे में कहा. "दस्तावेज़ आपके पास पिछले दस दिनों से हैं. यह समय का अपव्यय करने की कोशिश है."

जज साहब ने आदेश लिखवाया, "प्रबंधन का समय मांगने का आवेदन खारिज किया जाता है. प्रबंधन पर पाँच हजार रुपए का जुर्माना (Costs) लगाया जाता है. लिखित जवाब (Written Statement) दाखिल करने के लिए जुलाई के पहले सप्ताह की अगली तारीख दी जाती है, जो कि 'अंतिम और आखिरी मौका' होगा. यदि उस दिन भी जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो प्रबंधन का जवाब देने का विधिक अधिकार बंद (Right Closed) मान लिया जाएगा."

कोर्ट रूम के बाहर निकलते ही शिंदे के चेहरे पर भी एक बड़ी राहत थी. उन्होंने प्रशांत बाबू और चव्हाण साहब का हाथ थामते हुए कहा, "चव्हाण साहब, आज कोर्ट ने जो कड़ा रुख दिखाया है, उससे हमारी बारगेनिंग पावर बढ़ गई है. उनके वकील बाहर मुझसे कह रहे थे कि हमें अगले दो-तीन दिनों में ही बैठकर किसी समझौते तक पहुँचने के लिए बात करनी होगी. कोर्ट की इस कड़ाई ने मज़दूरों के मन के डर को बहुत हद तक कम कर दिया है."

प्रिया को यह समाचार प्रशांत बाबू ने फोन पर दिया. प्रिया ने मयंक को भी इस लड़ाई के बारे में विस्तार से बताया.

"दीदी, पर मेरा कोटा का अपना अनुभव कहता है कि यदि “गोल्डन हैंडशेक” में मजदूरों को अच्छा मुआवजा और दूसरे कानूनी लाभ तुरन्त मिल जाते हैं तो यही बेहतर होगा.” मयंक ने अपनी राय देते हुए कहा. फिर उसने मुस्कुराते हुए याद दिलाया, "वैसे दीदी, कल शनिवार है. शाम को मेरी ट्रेन है. लेकिन उससे पहले, सुबह नौ बजे हमें गेटवे पर आकाश भैया से मिलना है. हमारी मुंबई डायरी का आखिरी पन्ना अभी बाकी है."

प्रिया ने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुंबई की बत्तियाँ जगमगा रही थीं. उसे विश्वास था कि ‘ईसीआई’ फैक्ट्री के मजदूरों के संघर्ष की जीत होगी. और कल समंदर की लहरों के बीच मयंक की इस मुंबई यात्रा का एक सुंदर समापन होने वाला था.
...क्रमशः

शनिवार, 4 जुलाई 2026

समझौता प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 73
'चपाती' रेस्टोरेंट में अच्छी-चहल-पहल थी. दो टेबलों से लोग अभी उठकर गए थे, उनकी सफाई की जा रही थी. प्रिया और मयंक को कुछ देर रिसेप्शन में इंतजार करना पड़ा. मयंक ने सादी चपाती, दाल-तड़का और टिंडा मसाला का ऑर्डर दे दिया.

पापा से फोन पर हुई बातचीत के बाद प्रिया के भीतर एक अजीब सी खामोशी पसर गई थी. मयंक अपनी दीदी के मन की इस हलचल को बहुत अच्छी तरह समझ रहा था. वह जानता था कि बरसों का संकोच और ग्लानि जब एक झटके में पिघलती है, तो मन को संभलने में थोड़ा वक्त लगता है. उसने माहौल को हल्का करना चाहा.

"दीदी, सच बताऊँ तो मुझे तो अभी से कोटा की फिक्र होने लगी है," मयंक ने मुस्कुराते हुए चपाती का पहला निवाला तोड़ते हुए कहा.

प्रिया ने चश्मे के पीछे से उसे उत्सुकता से देखा, "जब कोई किसी जिम्मेदारी को उठाने को तैयार हो जाता है तो फिर फिक्र भी होने लगती है, यह सामान्य बात है. पर यह सब कोटा पहुँच कर सोचना, जब तक यहाँ है, तू फिक्र को अलग रख."

"अरे दीदी, पापा की आढ़त की फिक्र है," मयंक ने शरारत से आँखें नचाईं. "अब जब आपके कहे मुताबिक पापा और मम्मी दोनों एक सप्ताह के लिए मुंबई घूमने आएंगे, तो वहाँ कोटा में पूरी आढ़त और चाबियाँ मेरे पास होंगी. मैं तो सोच रहा हूँ कि सबसे पहले मुनीम जी की छुट्टी कर दूँ और सारा हिसाब-किताब अपने कंप्यूटर पर ले आऊँ. पापा लौटकर वहाँ आएंगे, तब तक सब कुछ बदलकर अपने हिसाब से कर दूंगा.”

मयंक की इस बचकानी लेकिन बेहद आत्मीय शरारत को सुनकर प्रिया के चेहरे पर हफ़्तों बाद एक खिलखिलाती हुई राहत भरी मुस्कान आ गई.

"चल, पागल जैसी बातें मत कर. मुनीम जी की छुट्टी करेगा? उलटे वो तेरी छुट्टी कर देंगे. मुनीम जी को पापा के साथ काम करते पैंतीस साल से भी अधिक हो गए. मैंने तो आँखें खोलीं, तब से उन्हें वहीं देखा है. जानता भी है? सारा काम वही संभालते हैं. पापा तो केवल गद्दी पर बैठकर निगरानी करते हैं. तू बच्चा है उनके सामने. आढ़त संभालेगा तो उनके सहायक की हैसियत से, ज्यादा कुछ किया तो वे तेरा मंडी में आना बंद कर देंगे.” प्रिया ने मज़े लेते हुए कहा और फिर उसका लहजा थोड़ा गंभीर हुआ, "वैसे तूने अच्छा सोचा, मयंक. पापा-मम्मी को सचमुच इस भागदौड़ और मानसिक तनाव से बाहर निकलकर कुछ दिन आराम की सख्त ज़रूरत है. मेरा भी प्रोजेक्ट कल-परसों में खत्म हो रहा है, मैं भी ऑफिस से कुछ दिन की छुट्टी का मन बना रही हूँ. जब वे आएंगे, तो मैं उन्हें अपने साथ घुमाऊंगी."

"हाँ दीदी, बिल्कुल. और गाइड के पैसे बचाने के लिए आकाश भाई भी तो हैं." मयंक ने एक और पासा फेंका. प्रिया ने कृत्रिम गुस्से से उसे घूरा, पर उसके गालों पर आई हल्की सी सुर्खी मयंक की नज़रों से बच नहीं सकी.

सोमवार सुबह प्रिया उठी और जल्दी से तैयार होने लगी. वह चाहती थी कि प्रोजेक्ट का काम 25 जून की डेडलाइन से एक दिन पहले, आज ही पूरा हो ले. उसकी पूरी टीम पिछले कई हफ़्तों से दिन-रात एक किए हुए थी, कोडिंग के कुछ अंतिम छोरों को आपस में जोड़ कर री-टेस्टिंग करना शेष था. वह चाहती थी कि आज रात तक यह सारा काम पूरा हो ले और अगले दिन केवल क्लाइंट को डिलीवरी ही शेष रहे.

उस दिन काम करते हुए उसे आधी रात हो गई. उसके साथ तीन टीम मेंबर और रुके हुए थे. ऑफिस से बाहर निकलकर सभी ने कॉमन टैक्सी की. वह रात एक बजे के बाद घर पहुँची. तब तक मयंक एक नींद ले चुका था. उसे अपनी दीदी के इस कड़े कॉर्पोरेट यथार्थ को देखकर समझ आ रहा था कि चाहे कारखाने का मज़दूर हो या लाखों का पैकेज पाने वाला सॉफ्टवेयर इंजीनियर, काम के अमानवीय घंटे और अपनी रीढ़ निचोड़ देने वाली मेहनत दोनों जगह एक जैसी ही है.

25 जून को प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक डिलीवर और टेस्ट हो गया. वह घर पहुँची, तब उसके चेहरे पर एक बड़ी जंग फतह करने जैसा सुकून था. वह चाहती तो थी कि अगले तीन दिन वह छुट्टी लेकर मयंक के साथ मुंबई घूम ले. लेकिन प्रोजेक्ट डिलीवर करने के अगले दिन यह ठीक नहीं था. प्रोजेक्ट में कुछ भी शिकायत आती तो सबसे पहले उसी को क्लाइंट से बात करनी होती. लेकिन उसने मयंक के साथ के लिये 27-28 जून को अवकाश ले लिया.

बुधवार की शाम ऑफिस से लौटकर प्रिया रसोई में चाय बना रही थी, तभी प्रशांत बाबू की कॉल आ गई.

"बधाई हो प्रिया! मुझे बब्बन भाई से पता चला कि तुम्हारा प्रोजेक्ट कल रात सफलतापूर्वक मुकम्मल हो गया," प्रशांत बाबू की आवाज़ में हमेशा की तरह वही पितातुल्य स्नेह था.

"जी सर, कल देर रात सब ठीक से डिलीवर हो गया था. आज भी शाम क्लाइंट से बात हुई तो उसने बताया कि सब कुछ अपेक्षा से भी अधिक फास्ट चल रहा है. बस अभी ऑफिस से लौटी हूँ. एकदम हल्का महसूस हो रहा है," प्रिया ने कहा.

"बहुत अच्छा. लेकिन प्रिया, इधर मिल मालिकों ने एक नया और बहुत ख़तरनाक पासा फेंका है," प्रशांत बाबू का लहजा तुरंत गंभीर हो गया. "तुम्हें याद है न कि पिछले मंगलवार, 18 जून को हमारी 'ऑटो चालक यूनियन' की बैठक से ठीक पहले, हमारे वकीलों ने ट्रिब्यूनल के मुंसरिम (Court Clerk) के सामने मिल मज़दूरों का 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' और सारे अकाट्य सांख्यिकीय दस्तावेज़ पेश किए थे? और जज साहब ने इस विवाद को सुलझाने के लिए सितंबर के मध्य तक की कड़ी समय-सीमा तय करते हुए प्रबंधन को अपना लिखित जवाब (Written Statement) देने के लिए महज़ दस दिन की मोहलत दी थी?"

"जी सर, मुझे अच्छी तरह याद है. परसों, यानी शुक्रवार 28 जून को कोर्ट में उनकी पेशी है और उन्हें अपना लिखित जवाब दाखिल करना है," प्रिया ने विधिक बारीकी को दोहराया.

प्रशांत बाबू ने आगे बताया, "बात यह है प्रिया कि तुमने मज़दूरों के घरेलू खर्चों, बाज़ार भाव और मिल के गुप्त मुनाफे का जो अकाट्य गणित (Data) तैयार किया है, उसका कोई तोड़ मिल मालिकों के वकीलों को नहीं मिल रहा है. ऊपर से अक्टूबर में राज्य के विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए सरकार के मंत्रियों ने भी उन्हें पिछले दरवाजे से मिल बंद करने का चांस देने से साफ़ मना कर दिया है. वे चुनावी माहौल में वोट बैंक को नाराज़ करने का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते. कोर्ट में अपनी निश्चित हार देखकर, मिल प्रबंधन ने अब कानूनी लड़ाई से भागने का रास्ता चुना है."

"तो वे क्या कर रहे हैं सर?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

"उन्होंने हमारी यूनियन के सचिव शिंदे के सामने 'गोल्डन हैंडशेक' (Golden Handshake) का एकमुश्त समझौता प्रस्ताव आधिकारिक रूप से रखा है. "वे चाहते हैं कि ट्रिब्यूनल का कोई भी प्रतिकूल निर्णय आने से पहले, उद्योग बंदीकरण पर जो भी लाभ मजदूरों के बनते हैं उनसे लाख-पचास हजार अधिक देकर मज़दूरों से स्वेच्छा से इस्तीफ़ा लिखवा लिया जाए और इस पूरे मामले को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया जाए. वे मज़दूरों के बीच यह अफवाह भी उड़ा रहे हैं कि अगर मामला कोर्ट में लंबा खिंचा, तो मिल बंद हो जाएगी और किसी को फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी."

प्रिया का चेहरा गंभीर हो गया, "सर, यह पूंजीपतियों की बहुत पुरानी और आजमाई हुई चाल है. जब वे कानूनी शिकंजे में फंसते हैं, तो पैसों के दम पर मज़दूरों का सब्र और उनकी रीढ़ तोड़ने की कोशिश करते हैं. वे कोर्ट के बाहर ही इस आंदोलन को खत्म करना चाहते हैं."

"बिल्कुल प्रिया. मज़दूरों के भीतर इस छलावे को लेकर एक असमंजस और अंतर्द्वंद्व की स्थिति बनने लगी है. हमें बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा. खैर, परसों शुक्रवार को कोर्ट की कार्यवाही बहुत कुछ साफ़ करेगी कि उनके वकील क्या रुख अपनाते हैं. और हाँ, मयंक अभी यहीं है न?”

“नहीं सर, उसकी शनिवार शाम को कोटा की टिकट बुक करवा दी है. पापा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. वहाँ जाकर उनकी मदद करेगा. आगे सब कुछ इसे ही देखना है. मैंने भी दो दिन की छुट्टी ले ली है. उसे मुंबई की कुछ और जगहें दिखा दूंगी. चाहती हूँ उसके लिए और मम्मी-पापा के लिए कुछ खरीद दूँ. उसका खाली हाथ जाना ठीक नहीं है.”

“प्रिया, यह तुमने अच्छा सोचा. इससे तुम्हारे मम्मी-पापा से रिश्ता नॉर्मल होने में मदद मिलेगी. हो सका तो मैं शुक्रवार तक तुम्हारे फ्लैट पर आता हूँ. एक बार मयंक से मिल लूंगा.”

“सर, फोन करके आइए. कहीं ऐसा न हो कि हम बाहर से नहीं लौट पाएँ और आप परेशान हों.” प्रिया ने कहा.

“नहीं फोन करके ही आऊंगा. और तुमने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या सोचा?” प्रशांत बाबू ने फिर वही सवाल पूछा जिसने प्रिया को असमंजस में डाल दिया था.

“उस बारे में मैं अभी निर्णय नहीं ले पाई हूँ. मयंक के यहाँ होने और प्रोजेक्ट पूरा करने के चक्कर में सोच ही नहीं पाई.”

“ठीक है. मयंक के जाने के बाद संभवतः रविवार को तुम्हारे यहाँ फिर आता हूँवहीं चाय के साथ हम तुम्हारी पार्टी मेंबरशिप के उस संकोच और मज़दूरों के इस नए संकट, दोनों पर विस्तार से बात करेंगे."

"जी सर, मुझे आपका बेसब्री से इंतज़ार रहेगा," प्रिया ने दृढ़ता से कहा.

फोन रखने के बाद प्रिया खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई. बाहर मुंबई की उमस भरी हवा थी. एक तरफ उसका अपना प्रोजेक्ट पूरा हो चुका था, लेकिन दूसरी तरफ पूंजीपतियों के इस 'गोल्डन हैंडशेक' के नए दांव ने कानूनी मोर्चे की तपिश को और बढ़ा दिया था. यह वीकेंड और आने वाला सप्ताह बहुत निर्णायक चीजें सामने लाने वाला था.

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

पिघलती बर्फ

देहरी के पार, कड़ी - 72
प्रिया चाय बनाने रसोई में चली गई, मयंक ने अपने मोबाइल से पापा को कॉल लगाई. पाँच लंबी रिंग के बाद माँ की आवाज़ गूंजी, “हेलो.”

"नमस्ते मम्मी, आप कैसी हैं? और पापा कैसे हैं?" मयंक ने बहुत आत्मीयता से पूछा.

"हम ठीक हैं बेटा, पापा बाथरूम में नहा रहे हैं, तू बता. मुंबई कैसी लगी? प्रिया कैसी है? तू तो मुंबई की चमक में प्रिया की तरह हमें भी भूल गया, वहाँ पहुँचा तब फोन किया था, उसके बाद आज कर रहा है.” उधर से माँ का ममता भरा उलाहना मिला, लेकिन माँ की आवाज़ में हमेशा जैसी खनक नहीं थी, एक थकान सी घुली हुई थी.

"मैं ठीक हूँ, मम्मी. दीदी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं."

माँ ने एक हल्की सी सांस ली, "पापा अभी आधा घंटा पहले मंडी से लौटे हैं. चाय पी और अब बाथरूम में नहाने गए हैं. मंडी में गर्मी के मारे दिन में हालत खराब हो जाती है. तुझे तो पता है उनका स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहता, दिनभर की भागदौड़ में जल्दी थक जाते हैं. पॉलिश फैक्ट्री में भी बस एक ही मशीन चल रही है, बाकी बंद कर दी हैं. खान से ही अच्छा पत्थर कम आ रहा है. बाजार में तरह-तरह की टाइलें आ गई हैं, कोटा स्टोन का क्रेज़ यहाँ कोटा में ही नहीं रहा. कई पॉलिश फैक्टरियाँ बंद हो गईं. तेरे पापा कहते हैं कि कोई अच्छा ग्राहक मिलते ही पॉलिश फैक्ट्री बेच देना चाहिए, वरना बाद में मशीनें कबाड़ में बिकेंगी."

माँ की बातें सुनकर मयंक का चेहरा गंभीर हो गया. माँ जो कह रही थी, वह कोई ताजा स्थिति नहीं थी. दो सप्ताह पहले जब वह कोटा में था, तब भी यही हाल था. लेकिन ये बातें माँ ने पहले कभी नहीं कही थीं. इन बातों से उसे चिंता होने लगी. उसकी आँखों के सामने पिता का वह थका हुआ चेहरा तैर गया जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अकेले परिवार का आर्थिक मोर्चा थामे हुए थे. मयंक ने महसूस किया कि उसका एमबीए अब पूरा हो चुका है, रिजल्ट भी हफ्ते भर में आने वाला है. उसे तुरंत कोटा लौटना चाहिए. “हाँ मम्मी-पापा की बात तो सही है. पॉलिश फैक्ट्री का तो कोई मतलब नहीं रहा.”


“तेरे पापा कह रहे थे कि बेहतर है कि फैक्ट्री बेचकर उसकी जगह टाइलों के स्टॉकिस्ट बन जाएँ. पूरा हाड़ौती का एरिया रहेगा. सब जगह माल सप्लाई करेंगे तो कई गुना कमाया जा सकता है.”

“हाँ माँ, उनकी बात सही है. पर मैं वहाँ आऊंगा, तब ये बातें करेंगे.”

“अच्छा प्रिया कहाँ है? उससे बात करा.”

“वह रसोई में चाय बना रही है.”

“चल ठीक है, तेरे पापा नहाकर आते ही बात कराती हूँ.”

मयंक ने फोन रखा ही था कि प्रिया ट्रे में चाय के कप लिए रसोई से बाहर आई. उसने मयंक के गंभीर चेहरे को देखा और पूछा, "क्या हुआ मयंक? पापा से बात हो गई?"

चाय का कप थामते हुए मयंक ने गहरी आवाज़ में कहा, "हाँ दीदी. पापा नहा रहे थे, मम्मी से बात हुई. अब वे थकने लगे हैं. उनका स्वास्थ्य अब उतना अच्छा नहीं रहता. पॉलिश फैक्ट्री में केवल एक मशीन चल रही है. उसका कोई भविष्य नहीं रहा. आढ़त में कॉम्पिटीशन बहुत हो गया है, वो तो किसानों से पुराने रिश्ते हैं, इसलिए सब ठीक चल रहा है. कोटा में बिज़नेस की स्थिति भी ठीक नहीं है. लगता है कि मुझे अब तुरंत वापस कोटा जाना चाहिए. वहाँ पापा को मेरी ज़रूरत है. मुंबई खूब घूम लिया हूँ. बाकी कुछ रहा होगा तो फिर कभी घूम लूंगा.

प्रिया ने अपने छोटे भाई को देखा. कद में तो उसने ऊँचाई प्राप्त कर ही ली थी. लेकिन आज उसकी बातों में जिस वैचारिक समझ और ज़िम्मेदारी का भाव था, उससे प्रिया का दिल भर आया. उसका छोटा भाई अब सचमुच समझदार हो चला था. हालांकि भाई के जाने की बात से उसके मन में उदासी की हल्की सी लहर उठी. पर उसका अहसास उसने मयंक को नहीं होने दिया. तभी मयंक के फोन की घंटी बज उठी. पापा थे.

मयंक ने लपक कर उसे लिया और कहा, ‘हेलो पापा, प्रणाम.”

“हाँ, मयंक कैसा है? मुंबई घूम लिया.”

“हाँ पापा, पहली बार में जितना घूमा जा सकता है उससे कुछ अधिक ही घूम लिया.”

“फिर कब आ रहा है?”

“बस अभी रिजर्वेशन देखता हूँ, जिस दिन का टिकट मिलेगा रवाना हो जाऊंगा.”

“अच्छा ठीक है. प्रिया कहाँ है? वह हो तो उसे फोन दे.”

“देता हूँ पापा.”

मयंक ने तुरन्त फोन प्रिया की ओर बढ़ाया. “दीदी, पापा, आपसे बात करेंगे.” प्रिया ने फोन ले लिया.”

“हाँ पापा, प्रणाम¡ आप कैसे हैं?

“मैंने फोन किया तो पूछ रही है, पापा कैसे हैं? तू इतनी नाराज है मुझसे? कि कभी सोचती भी नहीं कि पापा के हाल ही पूछ लें?”

“नहीं पापा ऐसी बात नहीं है. बस हिम्मत नहीं पड़ती.”

“बड़ी अजीब है तू, शादी को बीच में छोड़कर घर से निकलने में डर नहीं लगा, पर पापा से बात करने में लगता है?”

“नहीं पापा वो बात नहीं है.”

“तो फिर क्या है? क्या तू ये सोचती है कि पापा क्या बात करेंगे? ... अब मैं जानता हूँ, विक्रांत को समझने में मैंने बहुत बड़ी गलती की थी. मैं समझता था वह संस्कारी लड़का है. पर उसने बहुत बड़ा धोखा दिया. हमें तो दिया ही, कोटा के सारे व्यापार जगत को भी धोखा दिया. आज उसकी हालत ये है कि वह कोटा में किसी तरह का धंधा नहीं कर सकता. यहाँ की प्रोपर्टी बेचने की फिराक में है. यहाँ कभी-कभी चुपके से आता है, उसका पता भी तब लगता है जब वह चला जाता है. सुना है स्थायी रूप से मुंबई ही शिफ्ट हो जाएगा. तूने अच्छा किया जो शादी से भाग गई. तेरी शादी हो जाती, और तो मैं तो जीते जी मर जाता. तूने मुझे भी बचा लिया. मैं तेरा गुनहगार हूँ.” इतना बोलते-बोलते पापा की आवाज रुंध गई थी. प्रिया सन्न होकर सुन रही थी.

“पापा ये आप क्या कह रहे हैं? मैं जानती थी कि आप जल्दी ही समझ जाएंगे. उसकी बहुत सी बातें तो मुझे भी पता नहीं थीं. आप शान्ति रखें. ऐसी बातें न सोचें. मैं भी छुट्टी लेकर कोटा आऊंगी, तब सब नॉर्मल हो जाएगा. बस आप अपना ध्यान रखें.”

“हाँ बेटा, मैं क्या कहूँ? मैं तो तुमसे कुछ भी कहने का नहीं रहा. यह घर पहले तेरा है, हमारा और मयंक का बाद में. तू आ तो सही.”

“पापा, अब आप ये फिजूल की बातें छोड़ें. मयंक अभी जल्दी लौटने की कह रहा था. मैं उसका टिकट बुक करवा देती हूँ. वह जल्दी कोटा पहुँच जाएगा. एक बात और पापा. मयंक वहाँ पहुँच जाए. कुछ दिन वहाँ का काम ये देख लेगा. आप और मम्मी दोनों मुंबई आ जाइए, कम से कम एक सप्ताह के लिए. मैं भी छुट्टी ले लूंगी. साथ रहेंगे.”

“नहीं प्रिया अभी मुश्किल है. एकदम सब कुछ मयंक कैसे संभालेगा?”

“जैसे आपके बीमार होने पर संभालता था, वैसे ही संभाल लेगा. मैं मयंक को कहती हूँ. वहाँ जाकर यह आपको फ्री करेगा और आप और मम्मी मुंबई आ रहे हैं.”

“ठीक है, पहले मयंक को यहाँ आने दे, फिर सोचेंगे. तू ठीक से रहना और अपना ध्यान रखना.”

“हाँ, पापा.” उसने कहा. तभी उधर से फोन कट गया. प्रिया ने फोन मयंक को लौटा दिया.

“दीदी, अब मुझे जल्दी कोटा लौटना पड़ेगा.” मयंक ने फोन लेते हुए कहा.

"मैं समझ सकती हूँ मयंक," प्रिया ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा. "तू बिल्कुल सही सोच रहा है. चल, मैं अभी तेरा रिजर्वेशन देखती हूँ."

प्रिया ने तुरंत अपना लैपटॉप खोला और आईआरसीटीसी (IRCTC) की वेबसाइट पर जाकर अगले शनिवार, 29 जून 2019 की रात की ट्रेन में मयंक का टिकट बुक कर दिया.

"ले मयंक, अगले शनिवार का रिजर्वेशन पक्का हो गया. इस तरह तेरे पास मुंबई में अभी चार-पाँच दिन और हैं. मेरा प्रोजेक्ट पूरा होने को है. कोई अड़चन न आई तो कल के बाद मेरे पास कुछ दिन कोई खास काम न रहेगा. मैं भी छुट्टी ले लूंगी, साथ घूमेंगे." प्रिया ने लैपटॉप बंद करते हुए कहा.

“हाँ दीदी, आप साथ रहेंगी तो घूमने का आनंद कुछ और ही होगा,” मयंक ने कह दिया, लेकिन अचानक उसे अहसास हुआ कि पापा से बात और उसके कोटा लौटने की बात से प्रिया उदास हो चली है. उसने तुरन्त बात बदली. “दीदी, हमने चाय तो पी ली. पर अब तेज भूख लगी है.”

“चल तू बैठकर टीवी देख. मैं खाना बनाने की तैयारी करती हूँ.”

“नहीं दीदी, आप रहने दो. क्यों न हम ‘चपाती’ रेस्टोरेंट चलें.”

“तू यही चाहता है तो चल तू अपने कपड़े बदल मैं भी तैयार होकर आती हूँ.” यह कहते हुए प्रिया अपने बेडरूम की ओर चल दी.
... क्रमशः