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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

कानूनी तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 24
शुक्रवार लंच के बाद से यूनियन के सैक्रेटरी अपने चार मजदूर साथियों के साथ एडीशनल सैक्रेटरी लेबर (एएसएल) के दफ्तर में बैठे हुए थे. यह दिन ईसीआई फैक्ट्री के प्रबंधन के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था. आज शाम तक एएसएल के सख्त आदेश के दबाव में उन्हें 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' के बिल-वाउचर्स की फाइलें जमा करानी थीं. वे ठीक पौने पाँच बजे पहुँचे, दो बोरे दस्तावेजों से भरे हुए थे, एएसएल के स्टाफ ने एक बोरा अपने यहाँ जमा किया और दस्तावेजों की लिस्ट फाइल के साथ नत्थी कर दी. दूसरा बोरा और दस्तावेजों की सूची यूनियन सैक्रेटरी को दी.

“क्या ये सारे दस्तावेज आपके पास डिजिटल फॉर्म में नहीं हैं?” एएसएल ने पूछा.

“सर हैं तो, पर आपने दस्तावेज पेश करने को कहा था. डिजिटल फॉर्म में पेश करने की हिदायत होती तो हम उसे पेश कर देते.” फैक्ट्री से आए लीगल मैनेजर मनोज भाट ने कहा.

“कोई बात नहीं, हम अब आदेश दे रहे हैं. आप उक्त सभी दस्तावेज डिजिटल फॉर्म में पेन ड्राइव में सेव करके दो प्रति में पेश करें. साथ में भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) की धारा 63 (4) का प्रमाण पत्र भी पेश करें.” एएसएल ने कहा. फिर पूछा, “कब तक कर देंगे?”

“सर, अगली डेट पर पेश कर देंगे.”

“ठीक है, अगले शुक्रवार तक पेश करें?”

“सर, इस आवेदन का फैसला 60 दिन में करके प्रबंधन को सूचित करना है. वरना डीम्ड परमिशन हो जाएगी. पूरे सप्ताह की तारीख देना उचित नहीं होगा. इसे सोमवार को रख लें.” यूनियन सैक्रेटरी ने सप्ताह भर बाद की पेशी नियत करने पर आपत्ति की. फिर भी एएसएल ने यह कहते हुए मंगलवार की तारीख दी कि वे केवल दो ही दिन यहाँ बैठते हैं, शेष दिन उन्हें सेक्रेट्रिएट में बैठकर मंत्रालय का काम निपटाना होता है. उन्होंने आश्वासन दिया कि वे 60 दिन नहीं होने देंगे.

शनिवार दोपहर प्रशांत बाबू, वकील चव्हाण और प्रिया यूनियन दफ्तर में मिले. दस्तावेजों का बोरा खोलकर देखा गया. दस्तावेज बहुत थे; फिजिकल जाँच में कई दिन लग सकते थे. तय किया गया कि डिजिटल रिकॉर्ड मिलने पर ही जाँच की जाए.

प्रिया ने बताया कि, “डिजिटल कॉपी मंगल को मिलेगी. शुक्रवार तक सभी दिन वर्किंग होंगे. उसकी टीम यदि रोज थोड़ा-थोड़ा 'डिटेल्स' मिलान करे तब भी शनिवार के पहले फाइनल करना संभव नहीं होगा.”

वकील चव्हाण साहिब ने बताया कि, “उसके बाद हमें जवाब तैयार करने में दो दिन लग सकते हैं. इसलिए बेहतर है कि जवाब पेश करने की तारीख अगले मंगलवार की ही लें. हम उस दिन जवाब पेश कर देंगे तो प्रबंधक की साक्ष्य के शपथ पत्र पेश करने के लिए फिर शुक्रवार की तिथि मिलेगी. तब तक हड़ताल शुरू हुए 27 दिन और क्लोजर के आवेदन को 20 दिन हो जाएंगे. हमें साक्ष्य के समय बहुत जल्दी करनी पड़ेगी, वरना डीम्ड परमिशन का संकट खड़ा हो सकता है और उसका कोई तोड़ नहीं है.”

मंगलवार को पेन ड्राइव में डिजिटल रेकॉर्ड मिल गया. क्लोजर परमिशन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत करने के लिए योजनानुसार अगले मंगल की पेशी तय कर दी गयी. डिजिटल रिकॉर्ड की पेन ड्राइव उसी दिन प्रिया को पहुँचा दी गयीं. प्रिया ने उसकी चार प्रतियाँ तैयार करके एक खुद रखी और बाकी राहुल, स्नेहा और आदित्य को बाँट दी.

प्रिया को डिनर के बाद रात दस बजे समय मिला. उसने पेन ड्राइव को लैपटॉप में लगा कर दस्तावेज देखना शुरू किया तो उसकी आँखें खुली रह गईं. पिछले पाँच वर्षों में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' को लगातार बढ़ाया गया था. जिस तरह हर साल खर्चे बढ़ते गए थे, उससे यह स्पष्ट हो चुका था कि ये जानबूझकर किया गया है.

अगले शनिवार चारों प्रिया के फ्लैट पर मिले. उन्होंने दस्तावेजों का अपने डिजिटल एनालिसिस रिपोर्ट से अंतिम मिलान शुरू किया. जैसे-जैसे बिलों का मिलान होता गया, सच की परतें खुलती चली गईं. चारों ने मिल कर लंच तक यह काम पूरा कर लिया. चारों बहुत थक गए थे उन्होंने लंच बाहर से मंगा लिया. प्रशांत बाबू से मीटिंग शाम पाँच बजे यूनियन ऑफिस में तय हुई.

यूनियन ऑफिस की मीटिंग में प्रशांत बाबू, ईसीआई यूनियन के अध्यक्ष और सैक्रेटरी तो मौजूद थे ही, उन्होंने वकील चव्हाण साहब को भी बुला लिया था. प्रिया ने उत्साह से बताना शुरू किया, "कॉमरेड प्रशांत, ये देखिए! मैनेजमेंट ने जिस 'कंसल्टेंसी फीस' के नाम पर जिस फर्म को लाखों रुपये भुगतान करना दिखाया है, वह असल में मालिक की पत्नी की एक कागजी फर्म है. ये 'ट्रैवल एक्सपेंस'? ये मजदूरों और स्टाफ के लिए नहीं, बल्कि डायरेक्टरों की विदेश यात्राओं के टिकट हैं जिन्हें कंपनी का बिजनेस खर्च में दिखा दिया गया है."

वकील रमेश चव्हाण ने डिजिटल दस्तावेज वाली पेन ड्राइव और उनके मिलान की पेन ड्राइव अपने ब्रीफकेस में रखते हुए कहा, "हम हर हाल में मंगलवार को प्रबंधन के क्लोजर की परमिशन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत कर देंगे. अगली पेशी पर वे गवाहों के शपथपत्र प्रस्तुत करेंगे. हमें अपने सीए से समान खर्चों के अन्य उद्योगों के ऑडिटेड दस्तावेज प्राप्त करने के लिए केवल एक सप्ताह का समय मिलेगा. जिससे अगली पेशी पर हम प्रबंधकों के गवाहों से जिरह कर सकें. हम यह मिलान और दूसरे उद्योगों के दस्तावेज जिरह के दौरान ही प्रस्तुत करेंगे, उस समय प्रबंधन की ओर से आए लोगों के चेहरे देखने लायक होंगे.”

मंगलवार को वकील चव्हाण ने यूनियन के अध्यक्ष के साथ एएसएल दफ्तर जाकर क्लोजर परमिशन की प्रबंधन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत कर दिया. उससे अगले शुक्रवार की पेशी पर प्रबंधन ने अपनी साक्ष्य में अपने जनरल मैनेजर और सीए के शपथ पत्र प्रस्तुत किए.

इसी शुक्रवार को जोइंट लेबर कमिश्नर के यहाँ मजदूरों के मांग पत्र पर समझौता वार्ता थी. लेकिन प्रबंधन की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ. समझौता अधिकारी ने उन्हें टिप्पणी प्रस्तुत करने के लिए सोमवार की पेशी तय कर दी. मजदूर यूनियन की ओर से प्रशांत बाबू ने प्रबंधन के रवैये पर कड़ी आपत्ति करते हुए कहा कि “मजदूरों की हड़ताल वाजिब है और जारी है. इसलिए आपको सोमवार को कुछ न कुछ निर्णय लेना पड़ेगा.”
... क्रमशः

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

दोहरी लड़ाई

देहरी के पार, कड़ी - 23
'इलेक्ट्रो सर्किट इंडिया' (ECE) उद्योग के मजदूरों की आमसभा जज्बे और जोश के साथ हड़ताल को जारी रखने के निर्णय के साथ समाप्त हुई थी. रविवार का दिन आराम का नहीं बल्कि आगे की रणनीति तय करने और उस पर काम करने का था. प्रशांत बाबू, प्रिया, यूनियन के अध्यक्ष व मंत्री और सीनियर वकील रमेश चव्हाण के बीच लंबी बैठक चली.

राज्य के श्रम विभाग से फैक्ट्री के क्लोजर की अनुमति वाले मामले में अभी सुनवाई की तारीख की कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई थी. वकील चव्हाण का सुझाव था कि, “हमें आवेदन की सूचना प्राप्त हो चुकी है, सुनवाई की तारीख तय हो उससे पहले हमें 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स मैनेजमेंट से पेश कराए जाने और उनकी प्रतियाँ यूनियन को उपलब्ध कराने के लिए श्रम विभाग को आवेदन पेश कर देना चाहिए. इस रेकॉर्ड के मुकाबले अन्य उद्योगों के ऑडिटेड रिकार्ड से तुलना करके हम फर्जी बिलों के जरीए बड़े मुनाफे को घाटे में दिखाए जाने वाले फर्जीवाड़े को साबित कर सकेंगे. हम यह आवेदन कल ही दे दें तो हमारा समय बचेगा. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि सुनवाई आवेदन के 50वें दिन तक पूरी हो जाए जिससे डीम्ड क्लोजर की संभावना नहीं रहे.”

सुझाव एकदम सही था, सभी इससे सहमत थे. प्रशांत बाबू ने एक समस्या सामने रख दी. “लेकिन कॉमरेड चव्हाण, हम अन्य उद्योगों के खर्चों के ऑडिटेड रिकॉर्ड कहाँ से लाएंगे?”

“उसके लिए मैं एक सीए फर्म को जानता हूँ , जो अनेक उद्योगों का ऑडिट करती है. वह इस तरह का रिकार्ड उपलब्ध करवा सकती है और प्रमाणित करने वाला सीए यह बयान भी दे सकता है कि ये खर्चे उसने खुद उस कंपनी की बुक्स का ऑडिट करके प्रमाणित किए हैं. बस उसे इसका कुछ शुल्क देना पड़ेगा.”

“शुल्क हम यूनियन फंड से दे देंगे, बहुत अधिक तो नहीं होगा न?” यूनियन अध्यक्ष शिंदे ने पूछा.

“नहीं बहुत अधिक नहीं होगा. वे सीए मजदूरों के हमदर्द हैं. हमारी पार्टी को नियमित रूप से चंदा भी देते हैं. उनकी फीस बहुत मामूली होगी, वह भी रिकार्ड के लिए.” वकील चव्हाण ने कहा.

अगले दिन सुबह ग्यारह बजे ही यूनियन के अध्यक्ष और मंत्री वकील चव्हाण के साथ श्रम विभाग गए और एडीशनल सेक्रेटरी लेबर से मिलकर अपना आवेदन पेश किया. इतना ही नहीं उन्होंने क्लोजर परमिशन के आवेदन पर पहली सुनवाई के लिए तारीख तय करा दी और मैनेजमेंट तक नोटिस पहुँचाने की व्यवस्था भी कर आए. नोटिस में यह भी हिदायत दी थी कि वे उनके द्वारा पेश की गई बैलेंस शीटों में दिखाए गए 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' के खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स प्रस्तुत करें या यूनियन के आवेदन का जवाब दें. अब गेंद प्रबंधन के पाले में थी.

बुधवार की दोपहर ईसीई फैक्ट्री के गेट पर लगे शामियाने में एक सरकारी चपरासी ने आकर यूनियन अध्यक्ष शिंदे को एक पत्र दिया. श्रम विभाग ने सूचना भेजी थी कि मजदूरों के मांग पत्र और हड़ताल के मामले में प्रबंधन और यूनियन दोनों के प्रतिनिधि समझौता वार्ता के लिए जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में पहुँचें.

शुक्रवार को जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में भारी तनाव था. एक तरफ प्रबंधन के सूट-बूट पहने प्रतिनिधि थे, दूसरी तरफ प्रशांत बाबू और यूनियन के पदाधिकारी.

कार्यवाही शुरू होते ही प्रबंधन प्रतिनिधि ने अपनी लिखित टिप्पणी प्रस्तुत की. उनका प्रस्ताव चालाकी से भरा था. प्रबंधन प्रतिनिधि ने मौखिक रूप से कहा, "हम 'ट्रक सिस्टम' को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते, लेकिन इसमें सुधार के लिए तैयार हैं. हम सामानों की एक सूची बनाएंगे—रोजमर्रा की जरूरत का किराना, स्टेशनरी आदि चीजें 'एम्पलॉइज शॉप' पर दस साल पहले वाली कीमतों पर मिलती रहेंगी, और बाकी चीजों के बदले हम वेतन में भत्ता (Allowance) जोड़ देंगे. लेकिन मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए हम मूल वेतन (Basic Salary) बढ़ाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं."

समझौता अधिकारी (Conciliation Officer) ने प्रबंधन की टिप्पणी को गौर से देखा. उन्होंने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और दो टूक लहजे में कहा, "देखिए, हमारा विभाग किसी भी ऐसी व्यवस्था को मान्यता नहीं देगा जो 'ट्रक सिस्टम' के किसी भी रूप को बरकरार रखती हो. यह पद्धति हमारी सरकार पूरी तरह से अनुचित घोषित कर चुकी है. वह इसके किसी भी रूप को बनाए रखने के लिए तैयार नहीं है. हम ऐसा कोई समझौता नहीं रजिस्टर नहीं करेंगे जिसमें मजदूरों को मजबूरन कंपनी की दुकान से सामान खरीदना पड़े. ट्रक पद्धति को तो खत्म करना ही होगा, इस पर किसी तरह का कोई मोलभाव नहीं होगा."

प्रबंधन प्रतिनिधि ने कुछ कहना चाहा, लेकिन अधिकारी ने उन्हें रोक दिया. "फिलहाल आप ट्रक पद्धति के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करें. वेतन वृद्धि और अन्य मांगों पर हम अगली बैठक में बात करेंगे."

उधर, एडीशनल सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से भी प्रबंधन को तगड़ा झटका लगा. उन्हें आदेश मिला कि, “शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करें.”

फैक्ट्री गेट पर पिकेटिंग कर रहे मजदूरों को जब खबर दी गयी कि श्रम विभाग ने 'ट्रक सिस्टम' को सिरे से खारिज कर दिया है और एडीशनल सैक्रेटरी ने प्रबंधन को शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करने का आदेश दिया गया है, तो वे उत्साह से भर उठे. पंडाल में मजदूरों के आपस में बोलने से कोलाहल बढ़ गया. इस शोर तथा मजदूरों को फिर से सभा के अनुशासन में लौटने के लिए सैक्रेटरी ने जोर से नारा लगाया.

“इंकलाब – ज़िंदाबाद.”

मजदूरों ने बिखरा सा उत्तर दिया, “इंकलाब जिन्दाबाद”.

सैक्रेटरी ने तीन बार यही नारा लगाया. हर बार मजदूरों की आवाज बढ़ती रही. चौथी बार में नारे ने औद्योगिक क्षेत्र गुंजा दिया.

इसी बीच मजदूरों के बीच किसी पंजाबी मजदूर ने नारा लगाया, “साड्डा हक़ ले के रहेंगे.”

“ले के रहेंगे... ले के रहेंगे. ” तमाम मजदूरों ने पूरे जोश से उत्तर दिया.
... क्रमशः

रविवार, 12 अप्रैल 2026

जज़्बा

देहरी के पार, कड़ी - 22
प्रशांत बाबू, प्रिया और उसके साथी लंच के दौरान भी ईसीआई फैक्ट्री के प्रबंधन के फर्जीवाड़े की बारीकियों पर बात करते रहे. फर्जीवाड़ा सामने आने से उनका हौसला बढ़ गया था. सबके चेहरों पर एक नई चमक थी. प्रशांत बाबू के पास आज कार थी. पाँचों उसी से फैक्ट्री गेट पहुँचे. चार बजने में समय था. आमसभा की तैयारी पूरी थी. दोनों शामियाने एक ही ओर तान कर एक लंबा पंडाल बना दिया गया था. अब उसमें ढाई सौ से अधिक लोग बैठ सकते थे. इतने ही मजदूरों के एकत्र होने की संभावना थी. लेकिन चार बजते-बजते पंडाल पूरा भर गया. उसके बाद भी मजदूर आते जा रहे थे. मंच से आग्रह हुआ कि लोग बीच की जगह को कम करते हुए आगे खिसकें. जिससे बाद में आने वालों को बैठने में परेशानी न हो. मजदूरों ने आगे खिसककर जगह बनाई तो आने वाले कुछ मजदूर वहाँ बैठ गए. फिर भी काफी लोग खड़े रह गए.

हड़ताल का सातवाँ दिन था. उमस भरे दिन और खाली जेबों की चिंता के बीच मज़दूरों के चेहरों पर एक गंभीर सन्नाटा था. 'ट्रक सिस्टम' के शोषण ने उनके पास बचत के नाम पर कुछ नहीं छोड़ा था. 'अगली 10 तारीख' का डर सबके मन में था, जब उन्हें मासिक वेतन नहीं मिलने वाला था. यदि क्लोजर मंजूर हो जाता तो छंटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी का पैसा उसके भी 65 दिन बाद उन्हें मिलता. इस तरह उनके सामने दो माह से अधिक घर चलाने की समस्या थी. सभी मजदूर वैसे ही बमुश्किल जी रहे थे. हड़ताल के दिन से ही उन्होंने हर तरह के खर्च पर लगाम लगा ली थी. खाने-पीने के बजट तक में कटौती कर दी थी.

प्रिया की टीम ने सभास्थल से 50 फुट दूर एक चाय की गुमटी के बाहर रखी बेंचों में से एक पर अपना अड्डा जमा लिया था. कुछ देर बाद रामजी काका भी आ गए वे भी उनके साथ बेंच पर बैठ गए और गुमटी वाले को पाँचों के लिए चाय देने को कहा.

यूनियन अध्यक्ष ने माइक संभाला, सभा शुरू हुई. आज उनका लहजा बदला हुआ था, आवाज में गुस्सा था और ऊँची थी, "साथियों, प्रबंधन कहता है कि कारखाना घाटे में है! जिसके कारण वे इसे चलाने में असमर्थ हैं, वे सरकार से इसे बंद करने की परमिशन मांग रहे हैं. लेकिन आज हमारे पास वो सच है जो इनके मुहँ बन्द कर देगा."

उन्होंने प्रिया की टीम की तैयार की हुई 'एनालिसिस रिपोर्ट' हवा में लहराई. "हमारे तकनीकी विशेषज्ञ मित्रों ने 24 घंटों से भी कम में कंपनी की बैलेंस शीटों का पोस्टमार्टम करके साबित कर दिया है कि जिसे ये 'घाटा' बता रहे हैं, वो असल में ''ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' के नाम पर की गई चोरी है. जिस साल आपका वेतन स्थिर रहा, उसी साल इन अफसरों के खर्चे चार गुना बढ़ गए! यह घाटा प्राकृतिक नहीं है, इसको मेन्युफेक्चर किया गया है. हमारे साथियों ने मैनेजमेंट के सारे फर्जीवाड़े को उजागर कर दिया है."

जैसे ही 'आंकड़ों के फर्जीवाड़े' की बात हुई, मज़दूरों के बीच एक गुस्से की लहर दौड़ गई. जो मज़दूर अब तक क्लोजर के नाम से डरे हुए थे, उनकी आँखों में अब गुस्से की चमक थी. एक ने नारा लगाया, "शेम-शेम" सबने ऊंची आवाज में  उसका उत्तर दिया, "शेम-शेम".

प्रशांत बाबू माइक पर आए. वे इस उद्योग के मजदूरों की यूनियन के सदस्य या पदाधिकारी न होते हुए भी मजदूरों के बीच सर्वप्रिय नेता थे, मजदूरों का उन पर भरोसा था. उन्होंने सीधा सवाल किया, "अगले माह वेतन नहीं मिलेगा. प्रबंधन ने क्लोजर का जाल बिछाया है ताकि आप डरकर घुटने टेक दें. यह भी हो सकता है कि सरकार क्लोजर की मंजूरी दे दे और 90 दिन बाद कारखाना बंद हो जाए. वैसी स्थिति में आपको छँटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी ही मिलेंगे. प्रोविडेंट फंड तो वैसे भी आपका ही है. इसलिए हमें एक बार फिर याद करना पड़ेगा कि इस सप्ताह के शुरू में जब हमने हड़ताल शुरू की थी तब आपने ही एक स्वर में कहा था कि, “हम ‘ट्रक सिस्टम’ समाप्त होने और फेयर वेजेज लागू किए बिना काम पर नहीं जाएंगे. चाहे नौकरी क्यों न चली जाए.”

अब हमारे पास दो रास्ते हैं—या तो हम इस फर्जीवाड़े के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ते हुए हड़ताल जारी रखें, या फिर फिलहाल पुरानी शर्तों पर काम पर लौट जाएं. और क्लोजर पर सरकार के फैसले तक इंतजार करें. इससे आपको अगले तीन माह के वेतन मिल जाएंगे. फैसला आपका है."

सभा में एक पल के लिए भारी खामोशी छा गई. तभी एक अधेड़ उम्र का मज़दूर, जिसके हाव-भाव से ही अनुभव और गंभीरता का अहसास होता था खड़ा हुआ माइक हाथ में लिया.

"साथियों," उन्होंने गूँजती आवाज़ में कहा, "मालिक कहता है कि कारखाना उसका है. अरे, इस कारखाने की एक-एक मशीन हमने अपने हाथों से लगाई है, इस कारखाने की ईंट-ईंट हमारे पसीने से भीगी है. जब हम निर्माण कर सकते हैं, तो हम मजदूर इसके असली मालिक हैं. और जो मालिक कहलाता है, वह बकौल बापू गांधी केवल ट्रस्टी है. अब ये ट्रस्टी एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर हमारे हक को निगल रहे हैं?"

मज़दूरों के बीच से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा गूँजा. अधेड़ मज़दूर ने आगे कहना जारी रखा, "उस 'ट्रक सिस्टम' की गुलामी में वापस जाने से बेहतर है कि हम बाहर फावड़ा चला लें, गड्ढे खोद लें. हम इस बेईमान मैनेजमेंट के आगे अपना आत्मसम्मान नहीं खोएंगे. हड़ताल जारी रहेगी और अब हम क्लोजर का जवाब कोर्ट में देंगे!"

मज़दूरों को हड़ताल होने से पहले की मीटिंग याद आई. जब फैसले के लिए हाथ उठवाए गए कि हड़ताल जारी रखी जाए या स्थगित कर दी जाए तो बहुमत ने एक स्वर में हड़ताल जारी रखने का निर्णय लिया. रामजी काका, सोच रहे थे, अब जब मजदूरों के घरों की रसोइयों पर संकट गहराएगा, तब 'सामूहिक रसोई' चालू करनी ही पड़ेगी.

प्रिया ने दूर से ही प्रशांत बाबू को सिर हिलाकर संकेत दिया. उसे अहसास हुआ कि कोडिंग और डेटा एनालिसिस केवल कागज थे, असली ताकत तो शोषण के विरुद्ध खड़े होने का वह 'जज़्बा' है जो इन मज़दूरों को खाली जेब होने के बावजूद सीना तानकर खड़े रहने की शक्ति दे रहा था.
... क्रमशः

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

कच्चा चिट्ठा

देहरी के पार, कड़ी - 21
मेवाड़ भोजनालय से निकलने के पहले प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य ने आपस में बात करके एनालिसिस का तरीका तय किया. प्रिया ने दो-दो बैलेंस शीटें तीनों को बाँट दीं. तीनों को सोने के पहले इनके सैकड़ों पन्नों पर छपे डेटा को डिजिटल फॉर्म में और सर्च करने योग्य सॉफ्ट कापी में बदलना था. चारों ने सुबह नौ बजे ऑनलाइन मीटिंग मिलना तय किया. प्रिया ने अपने पास कोई बैलेंस शीट नहीं रखी थी. वह फैक्ट्री के क्लोजर की अनुमति का आवेदन और उसके साथ के दूसरे दस्तावेजों को अपने साथ ले आई थी. उसे इनका अध्ययन कर एनालिसिस के लिए आधार बिन्दु तैयार करने थे.

चारों अपने-अपने घर पहुँचकर सक्रिय हो गए. प्रिया ने क्लोजर के आवेदन की फाइल का अध्ययन आरंभ किया तो शेष तीनों टाटा की हाई-रीजोल्यूशन स्कैनिंग करने में जुट गए. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उन सैकड़ों पन्नों के डेटा को प्रिंट से डिजिटल फॉर्म में बदलकर सर्च करने योग्य बनाना था. स्कैनिंग के बाद ओसीआर (Optical Character Recognition) सॉफ्टवेयर के ज़रिए उन जटिल सारणियों को टेक्स्ट फाइलों और एक्सेल शीटों में बदलना शुरू किया. देर रात जब वे सोने के लिए गए, उसके पहले तमाम बैलेंस शीटों की सॉफ्ट कॉपियाँ तैयार हो चुकी थीं.

शनिवार सुबह वे चारों ऑनलाइन मीटिंग में मिले. तीनों ने अपने पास की सॉफ्ट कॉपियाँ प्रिया को भेज दीं. उसने अगले दस मिनट में तमाम सॉफ्ट कॉपियों को कंपाइल करके शेष तीनों साथियों को भेजा. अब सभी के पास उनकी एक-एक सॉफ्ट कॉपी थी.

प्रिया ने कहा, "हम इन आंकड़ों को 'पीछे से आगे' (Reverse Chronology) के क्रम में देखेंगे. छठे साल के घाटे से शुरू करके वापस पहले साल के मुनाफे तक जाएंगे, तभी हमें प्रबंधन की 'फाइनेंशियल इंजीनियरिंग' पकड़ में आएगी."

जैसे-जैसे डेटा साफ होता गया, चारों की आँखें फटती चली गईं.

प्रिया ने स्क्रीन शेयर करते हुए एक ग्राफ दिखाया, "देखो, पिछले छह सालों में मज़दूरों के वेतन और उनके कल्याण पर होने वाले खर्च का प्रतिशत (Percentage of Labour Cost) वार्षिक खर्चों का 3% के आसपास रहा है. यह या तो स्थिर था या उसमें मामूली गिरावट आई. यह साफ़ बताता है कि मज़दूरों की 'ट्रक सिस्टम' को समाप्त करने और 'फेयर वेजेज' की लड़ाई एकदम जायज थी. मालिक उन्हें एक धेला भी एक्स्ट्रा नहीं दे रहा था."

लेकिन असली 'झोल' कहीं और था. आदित्य ने 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' के कॉलम को हाईलाइट किया. "यहाँ देखो! तीसरे साल के बाद से ऑफिस के खर्चे, मैनेजमेंट की फीस, और 'कंसल्टेंसी चार्जेज' जो कभी भी 3% से अधिक नहीं रहे, बढ़ते-बढ़ते पिछले तीन वर्षों से चार गुना बढ़कर 11 से 13 प्रतिशत के बीच झूल रहे हैं. जिस दौरान फैक्ट्री को 'घाटे' की ओर धकेला जा रहा था, उसी दौरान प्रबंधन खुद पर होने वाले खर्च को बेतहाशा बढ़ा रहा था."

स्नेहा ने डेटा का विश्लेषण करते हुए बताया, "यह कोई प्राकृतिक घाटा नहीं है. इन्होंने जानबूझकर संभावित मज़दूर आंदोलन को भांपते हुए बैलेंस शीट को 'मैन्युपुलेट' किया है और मुनाफे को खर्चों के नाम डाल दिया है जिससे उसे 'घाटा' दिखाया जा सके.

राहुल कहने लगा खर्चों के नाम पर डाली गयी यह बड़ी धनराशि जो हर साल मजदूरों पर खर्च होने वाली राशि की लगभग तीन गुना है और किसी न किसी की जेब में काला धन बन कर गयी होगी. इसने उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों को मालामाल कर दिया होगा. इधर बढ़ता हुआ घाटा दिखा कर हर साल मजदूरों को क्लोजर (Closure) का डर दिखाया जाता रहा और उनकी मजदूरी बढ़ाने की न्यायोचित मांग दबा दी गयी. यह एक सोची-समझी विधिक चाल ही नहीं बल्कि बड़ा घोटाला है और आर्थिक अपराध भी है."

प्रिया की टीम ने एक विस्तृत 'एनालिसिस रिपोर्ट' तैयार की, जिसमें हर उस फर्जीवाड़े को चिन्हित किया गया था जहाँ आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ हुई थी. प्रिया ने रिपोर्ट की दो कॉपी प्रिंट कर लीं. एक बजे से ऊपर का समय हो चुका था. चारों ने सुबह से चाय-ब्रेड-बिस्कुट के सिवा कुछ नहीं लिया था. उन्होंने तय किया कि वे मेवाड़ भोजनालय जाकर लंच करेंगे और वहीं से शाम की आमसभा देखने के लिए फैक्ट्री गेट पहुँचेंगे.

वे मेवाड़ भोजनालय पहुँचे तो दो बजे से अधिक समय हो चुका था. प्रशांत बाबू मेवाड़ भोजनालय के उसी पिछले कमरे में मिले जहाँ विक्रांत की गिरफ्तारी के बाद सबने डिनर किया था. प्रिया ने रिपोर्ट की फाइल उनके सामने रख दी. उन्होंने फाइल को तुरंत अपनी टेबल पर फैलाया और उसे पढ़ने लगे. वे रिपोर्ट के नोट्स पढ़ते जाते थे और उनसे संबंधित डाटा का ग्राफ गौर से देखकर समझने की कोशिश कर रहे थे. भोजनालय का कर्मचारी पानी लेकर आया तो प्रिया ने सभी के लिए लंच ऑर्डर कर दिया. प्रिया की टीम एक अलग टेबल पर आ गयी, वे धीमी आवाज में बातें करने लगे जिससे प्रशांत बाबू के काम में व्यवधान न हो.

अचानक प्रशांत बाबू बोल उठे. "कॉमरेडों, तुमने कच्चा चिट्ठा तैयार करके जबर्दस्त काम किया है. फैक्ट्री प्रबंधन के लिए यह डेथ वारंट जैसा साबित होगा.. हमने साबित कर दिया है कि फैक्ट्री मुनाफे में चल सकती है, बस मालिक की नीयत खोटी है." उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी.

"शानदार! यह काम एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की टीम हफ़्तों में करती. अब हमारे पास आम सभा में मज़दूरों को देने के लिए केवल ही भाषण नहीं, बल्कि ठोस सबूत हैं."
... क्रमशः

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

अदृश्य हमला

देहरी के पार, कड़ी - 20
प्रशांत बाबू ने पिछली रात ही प्रिया को फोन पर बता दिया था कि, “तैयार रहना, ईसीआई इंडस्ट्री का मालिक कल कोई बड़ा धमाका करने वाला है." काम पर पहुँचते ही उसने आदित्य, स्नेहा और राहुल को भी सूचना दे दी कि आज कुछ बड़ा हो सकता है, और हमें कोई नया टास्क मिल सकता है. अब वे इस बड़ी की सूचना के इन्तजार में थे.

ईसीआई फैक्ट्री के गेट पर शुक्रवार की सुबह एक अजीब सी उदासी के साथ शुरू हुई, पिकेटिंग स्थल पर मज़दूरों की गतिविधियाँ उनकी दिनचर्या बन चुकी थी. अदालती आदेश ने जो 'सौ मीटर' की लक्ष्मण रेखा खींची थी, उसके दोनों ओर मज़दूर शामियानों पर शांति से बैठे थे. दूसरे शामियाने के लिए ऑफिस का साउंड सिस्टम ले आया गया था. अब दोनों ओर से नारेबाजी, भाषण, क्रान्तिकारी गीत बारी-बारी से गूंजने लगे थे. एक ओर का स्पीकर बंद होता तो दूसरी ओर का शुरू हो जाता. कभी दोनों ओर से सवाल जवाब होने लगते.

सुबह नौ बजे फैक्ट्री में जब जनरल शिफ्ट का स्टाफ—मैनेजर, सुपरवाइजर और अकाउंट विभाग के लोग गेट के अंदर दाखिल हुए, तो मज़दूरों ने कोई नारेबाजी नहीं की. वे बस उन्हें देखते रहे. मजदूरों के मन में नौकरी खोने का कोई भय नहीं था, बल्कि एक गहरी विरक्ति थी. वे उस 'ट्रक पद्धति' से इतने तंग आ चुके थे कि उनके लिए कारखाना चालू रहना या बंद होना, दोनों ही संघर्ष के दो अलग रास्ते थे. वे महंगाई के इस दौर में केवल अपने पसीने की सही कीमत 'फेयर वेजेज' चाहते थे.

दोपहर बाद चार बजे तक माहौल सामान्य था. तभी सड़क के दक्षिणी छोर से एक डाकिया अपनी साइकिल की घंटी बजाता हुआ पिकेटिंग स्थल पर आया. उसके पास 'स्पीड पोस्ट ए.डी.' का एक भारी-भरकम पीला लिफाफा था. डाकिया अक्सर खुशियाँ लाता है, पर उस लिफाफे पर 'जनरल मैनेजर' की सील देखकर यूनियन कार्यसमिति के सदस्य सतर्क हो गए. अध्यक्ष ने हस्ताक्षर कर ए.डी. का कार्ड लौटा दिया. यूनियन कार्यसमिति के सभी सात सदस्य एक शामियाने में गोल घेरा बनाकर बैठ गए.

लिफाफा खुला और उसके साथ ही प्रबंधन का वह 'अदृश्य हमला' सबके सामने आ गया. प्रबंधन ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-O का सहारा लेते हुए राज्य सरकार को उद्योग बंद करने (Closure) के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था. आवेदन के साथ पिछले छह वर्षों की बैलेंस शीटों का एक पूरा जखीरा नत्थी किया गया था.

प्रशांत बाबू को तुरंत खबर दी गयी. वे अपने काम से जल्दी छूट कर शाम छह बजे पहुँचे. उन्होंने डाक से मिले दस्तावेजों को सरसरी तौर पर देखा. उनकी आँखों के सामने पिछले छह सालों का एक सुनियोजित 'वित्तीय प्रपंच' घूमने लगा. प्रबंधन ने आंकड़ों को बड़ी सफाई से पेश किया था, पहले दो वर्ष: मुनाफ़े को धीरे-धीरे गिरता हुआ दिखाया गया. तीसरे वर्ष एक 'मामूली लाभ' की तस्वीर पेश की गई. चौथे से छठे वर्ष तक एक खड़ी ढलान की तरह बढ़ता हुआ घाटा दिखाया गया था.

प्रशांत बाबू ने गंभीर स्वर में साथियों को समझाया, "यह आंकड़ों की बाजीगरी है. प्रबंधन ने सरकार को यह दिखाने की कोशिश की है कि यह संस्थान अब 'इकोनॉमिकली वायबल' नहीं रहा. और सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को इसपर फैसला सुनाकर उसकी सूचना इस आवेदन को देने के 60 दिनों के भीतर फैक्ट्री प्रबंधन को देनी है. अगर साठ दिन बीत गए और सरकार ने प्रबंधन को कोई जवाब नहीं दिया, तो कानूनन इसे उद्योग को बंद करने की 'डीम्ड परमिशन' मान लिया जाएगा. उसके बाद आवेदन प्रस्तुत करने से 90 दिन बाद उद्योग को बंद कर दिया जाएगा.”

यूनियन अध्यक्ष ने यह खबर मजदूरों को दी तो उनमें से कोई भयभीत नहीं हुआ. बल्कि उनके बीच से किसी ने नारा लगाया, “इंकलाब ज़िंदाबाद.” मजदूरों ने पूरी बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया.

“हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है.” यह दूसरा नारा था जिसका और जोश के साथ मजदूरों ने जवाब दिया.

नारों के बाद एक पुराने मज़दूर ने खड़े होकर अध्यक्ष के हाथ से माइक ले लिया. कहने लगा, साथियों हमें कारखाने के बंद हो जाने का कोई डर नहीं है. हम वेतन के ‘ट्रक सिस्टम’ में घुट-घुट कर मर जाने से बेहतर समझते हैं कि एक बार में ही हिसाब हो जाए. जितना ये हमें वेतन देते हैं, उससे अधिक तो हम फुटकर मजदूरी करके भी कमा लेंगे. अगर कारखाना बंद होता है तो हम इस कैद से आज़ाद हो जाएंगे.”

पुराने मजदूर के चुप होते ही मजदूरों ने फिर से नारा लगाया, “इंकलाब जिन्दाबाद.”

इस बार तमाम मजदूरों ने पहले से भी अधिक बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया. ...

ज़्यादातर मज़दूर पुरानी वेतन पद्धति से इतने परेशान थे कि अब वे 'फेयर वेजेज' से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं थे. हाँ, कुछ युवा मज़दूर थोड़े विचलित ज़रूर थे कि अचानक काम बंद हुआ तो शहर में गुज़ारा कैसे होगा, लेकिन सामूहिक स्वर 'आर या पार' का ही था.

कार्यसमिति ने प्रशांत बाबू के साथ मिल कर तय किया कि शनिवार शाम चार बजे पिकेटिंग स्थल पर ही मज़दूरों की 'आम सभा' बुलाई जाए. उन्हें इस कानूनी आवेदन का तकनीकी सच बताना ज़रूरी था.

प्रशांत बाबू को मेवाड़ भोजनालय पहुँचने में नौ बज गए, वहाँ प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य उन्हें इन्तजार करते मिले. कारखाना बंदी का आवेदन और उसके साथ के दस्तावेजों को चारों ने देखा.

प्रिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "सर¡ यह घाटा पूरी तरह 'मेन्युफेक्चर' किया लग रहा है. हमें इनकी बैलेंस शीटों का एनालिसिस करना पड़ेगा. क्या हम इस आवेदन और दस्तावेजों को अपने साथ ले जा सकते हैं?”

“हाँ, बिलकुल ले जाएँ, पर हमें एनालिसिस कल दो-तीन बजे तक मिल जाए.” प्रशांत बाबू ने कहा. “पर तुम लोग अब मुझे ‘सर’ कहने से मुझे मुक्ति दो. हम एक दूसरे के साथी हैं. तुम सब मुझे ‘कॉमरेड’ कह सकते हो.”

‘बिलकुल, हम आपको अपना एनालिसिस कल दो बजे तक दे देंगे, कॉमरेड.” प्रिया ने ‘कॉमरेड’ इतना सहज तरीके से कहा था कि बाकी चारों की हँसी छूट पड़ी और ठहाके में बदल गयी.

तभी रामजी काका भी आ गए. भोजनालय के कर्मचारी उनके लिए खाना लगाने लगे.
... क्रमशः

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

निषेधाज्ञा

देहरी के पार, कड़ी - 19
मंगलवार की सुबह भी प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी की उसी शांत सड़क पर, कारखाने के गेट से कुछ दूर उसी बेंच पर आकर बैठे. लेकिन कुछ ही मिनट बाद प्रिया का फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे. उन्होंने कहा, "बैठने का स्थान बदलो, जरूरी है." वे तुरंत वहाँ से उठकर फैक्ट्री गेट के सामने होते हुए दूसरी और पहुँचे वहाँ ऐसी ही एक बैंच देखकर बैठ गए. हड़ताल का जोश दूसरे ही दिन एक 'अनुशासन' में बदल चुका था. गेट पर मज़दूरों की टोलियाँ शांतिपूर्ण तरीके से वहाँ लगाए गए शामियाने में बैठी रहीं. मजदूरों के पास लाउडस्पीकर सिस्टम था. कोई न कोई उस पर भाषण देता रहता. बीच-बीच में जोशीले नारे भी लगते. मजदूरों के बीच बहुत से अच्छे गायक भी थे, वे क्रांतिकारी गीत गाते. इसी तरह उनका समय गुजरता. शाम छह बजे पिकेटिंग समाप्त कर दी जाती. दस-पंद्रह लोग शामियाने में रात रहते. मजदूरों की आँखों में दृढ़ संकल्प दिखाई देता.

बुधवार सुबह आठ बजे के कुछ पहले प्रशांत बाबू पिकेटिंग के स्थान से टहलते हुए उस बेंच तक पहुँचे, जहाँ प्रिया और उसके साथी बैठे थे. उन्हें देख राहुल और आदित्य खड़े होने लगे तो उन्होंने इशारे से मना कर दिया. फिर खड़े-खड़े ही उन्होंने गंभीरता से कहा, "साथियों, अब तुम्हें यहाँ आने की जरूरत नहीं है. तुमने तीन दिन इस संघर्ष को जीकर महसूस कर लिया है. यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं, तुम 'अदृश्य' रहकर हमारे सूचना तंत्र को संभालो.” चारों स्तब्ध होकर सुन रहे थे. “मैं यहाँ से टहलते हुए कुछ दूर जाकर वापस लौटूंगा. मैं वापस शामियाने तक पहुँच जाऊँ, तब तुम यहाँ से निकल लेना. रामजी काका ने तुम्हें याद किया है उनसे मिलते हुए जाना.”

वहाँ से वापस लौटते हुए चारों मेवाड़ भोजनालय पहुँचे. रामजी काका उन्हें देखते ही चहक उठे. “आओ बच्चों, लगता है आज सुबह-सुबह रास्ता भूल गए हो, मैं तो तुम्हें देखने को ही तरस गया था.”

“नहीं काका, हम सुबह तो रोज वैसे ही लेट उठते हैं और जैसे तैसे समय से काम पर पहुँचते हैं. यह तो तीन दिनों से हम जल्दी उठकर छह बजे ही ईसीआई के मजदूरों की हड़ताल देखने पहुँच जाते थे. वहाँ से वापस घर होकर ऑफिस पहुँचते थे. सुबह जल्दी उठने की वजह से शाम को ऑफिस से छूटते ही सीधे घर पहुँचना ही सूझता था. आज भी वहीं गए थे, प्रशांत बाबू ने ही कहा कि हम लौटते हुए आपसे मिलकर जाएँ. आप हमें बहुत याद कर रहे हैं.” प्रिया ने सफाई देने की कोशिश की.

“हाँ बिटिया, प्रशांत बाबू न भेजते तो तुम लोग तो आज भी नहीं आते. खैर छोड़ो, तुम अंदर चलकर बैठो, आज तुम सबका ब्रेक फास्ट यहीं है. मैं भी आता हूँ.

वे अंदर जाकर बैठे. कुछ देर बाद रामजी भी वहाँ आ गए. तब तक सबके लिए पोहा और जलेबी का नाश्ता आ गया था.

“देखो बच्चों, तुम अभी वाकई नासमझ हो।” रामजी काका ने परिवार के बुजुर्ग की तरह बोलना शुरू किया. “तुम तीन दिन से हड़ताल देखने जा रहे हो, यह ठीक नहीं है. जो काम तुम अपने ऑफिस या घर से कर सकते हो, उसके लिए हड़ताल की जगह जाना जरूरी नहीं. यह पूंजीपति और मजदूरों की लड़ाई है और निजाम पूरी तरह पूंजीपति का है. वह अभी तुम पर हाथ नहीं डालेगा. लेकिन जैसे ही उसे पता लगेगा कि तुम मजदूरों के संघर्ष को धारदार बनाते हो, तो वह तुम्हें नहीं बख्शेगा. इसलिए जरूरी है कि इस लड़ाई का हर सिपाही यथाशक्ति इसके लिए काम भी करे और खुद को बचाकर भी रखे. तुम अब मजदूर वर्ग के सिपाही हो, तुम्हें उसी के हिसाब से सोचने की आदत डालनी चाहिए. तुम शाम के समय यहाँ आ सकते हो. तुम्हें हड़ताल की सारी सूचनाएँ यहीं मिलेंगी.”

चारों अवाक थे कि 'रामजी मजदूरों की लड़ाई के बारे में इतने गंभीर कैसे हैं?' रामजी उनकी जिज्ञासा समझ कर बोले. “अभी मेरे बारे में कुछ मत पूछना. तुम्हें घर होकर अपने ऑफिस जाना है. मेरी कहानी फिर किसी दिन फुरसत में सुनाऊंगा.”

नाश्ता करके चारों चल दिए.

गुरुवार सुबह आठ बजे, जब मज़दूर रोज़ की तरह गेट पर जमा थे, अचानक दो पुलिस गाड़ियाँ वहाँ आकर रुकीं. इस बार पुलिस का रवैया सख्त था. इंस्पेक्टर ने हाथ में एक कागज़ लहराते हुए यूनियन अध्यक्ष और सैक्रेटरी को बुलाया.

"यह सिविल कोर्ट का अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) आदेश है," इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज़ में कहा. "कारखाना मालिक की अर्जी पर अदालत ने आदेश दिया है, 'कोई भी मज़दूर या प्रदर्शनकारी कारखाने के मुख्य द्वार के 100 मीटर के दायरे में पिकेटिंग नहीं करेगा.' आप लोग तुरंत पीछे हटिए, वरना हमें बल प्रयोग करना पड़ेगा."

यूनियन अध्यक्ष ने कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) पढ़ी. उन्होंने देखा कि कानून की कलम ने मज़दूरों को उनके अपने ही कारखाने की देहरी से 'दूर' कर दिया था.

अब मज़दूरों ने अपनी पिकेटिंग को दो हिस्सों में बाँट लिया. अनुशासन ऐसा था कि बिना किसी शोर-शराबे के, आधे मज़दूर सड़क के उत्तरी छोर पर चले गए और आधे दक्षिणी छोर पर. 100 मीटर की वह खाली सड़क अब 'मालिक के अहंकार' और 'मज़दूरों के धैर्य' के बीच की एक सरहद बन गई थी.

प्रिया को यह खबर अपने ऑफिस के केबिन में मिली. उसने राहुल को मैसेज किया— "कोर्ट के आदेश ने मजदूरों को शारीरिक रूप से दूर किया है, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि डिजिटल दुनिया में 100 मीटर की दूरी का कोई अस्तित्व नहीं है."

प्रिया की टीम ने तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर एक नया संदेश प्रसारित किया: "दूरी बढ़ी है, हौसला नहीं. हम गेट से दूर हुए हैं, लक्ष्य से नहीं."

शाम को मेवाड़ भोजनालय में रामजी काका ने प्रशांत बाबू से कहा, "बाबू, 100 मीटर दूर होने से क्या होता है? हमारी निगाहें तो अभी भी गेट पर ही हैं. हम गेट पर ही 'सामूहिक रसोई' शुरू करेंगे. हड़ताल करने वाले मजदूर वहीं सड़क के किनारे बैठकर खाना बनाएंगे और खाएंगे."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए प्रिया को फोन किया, "प्रिया, अब असली परीक्षा शुरू हुई है. कल शुक्रवार है, और मुझे लग रहा है कि मालिक कोई बड़ा धमाका करने वाला है. तैयार रहना."
... क्रमशः

रविवार, 5 अप्रैल 2026

टूटती जंजीरें

देहरी के पार, कड़ी - 18
सुबह पाँच बजे, अंधेरी की सड़कें अभी सुबह की पहली किरण की प्रतीक्षा में थीं. राहुल, स्नेहा और आदित्य अपने-अपने आवासों से निकल कर प्रिया के यहाँ पहुँचे थे और वहाँ से वे एक कॉमन टैक्सी लेकर रवाना हुए. उनके लिए सोमवार की यह सुबह बहुत खास थी. विक्रांत को छकाने और उसे पकड़कर पुलिस के हवाले करने के दौरान वे सामूहिक कोशिशों की ताकत को समझ चुके थे. उन चारों की टैक्सी 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के मुख्य द्वार से कुछ दूर आकर रुकी. वे चारों उतरकर वहीं पास में एक पेड़ के निकट सड़क के किनारे लगी बेंच पर बैठ गए. वे अपनी पहचान गुप्त रखते हुए उस संघर्ष को अपनी आँखों से देखना और महसूस करना चाहते थे, जिसे उन्होंने अब तक केवल किस्सों, कोडिंग और डेटा में जिया था.

कारखाने का विशाल लोहे का गेट अभी बंद था. सामने वाली पूरी सड़क अभी सन्नाटे में डूबी थी. कुछ ही देर में हलचल होने लगी. दो-दो चार-चार की संख्या में मज़दूर आकर फैक्ट्री के गेट के आसपास जमा होने लगे. कारखाने में प्रोडक्शन की दो ही शिफ्टें चलती थीं. सुबह छह बजे से दोपहर दो बजे तक और दो बजे से रात दस बजे तक. ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों की शिफ्ट सुबह आठ बजे से शाम पाँच बजे तक की होती. छह बजने में अभी देर थी, लेकिन उससे पन्द्रह मिनट पहले ही वहाँ सुबह की शिफ्ट में आने वाले मजदूरों से अधिक मजदूर इकट्ठा हो चुके थे. दूसरी शिफ्ट के भी बहुत मजदूर सुबह ही आ गए थे. तभी एक पुलिस कार वहाँ पहुँची और उससे एक इंस्पेक्टर, एक असिस्टेंट इंस्पेक्टर, एक हेड कांस्टेबल और दो सिपाही उतरे. कार के पीछे ही एक पुलिस बस आकर गेट से कोई पचास मीटर पहले ही खड़ी हो गई. उससे करीब तीस सिपाही नीचे उतरे. उनमें से अधिकांश के कंधे पर पथराव से बचने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बेंत की बनी केन-शील्ड लदी थीं.

“अभी गाँव बसा नहीं कि लुटेरे पहले आ गए.” राहुल ने कहा. “पुलिस पहले ही आ गई. हमारे तो बुलाते-बुलाते नहीं आती.”

प्रिया को अचानक अपने शहर कोटा की याद आई. उसने बचपन में सुना था कि कैसे वहाँ के जे.के. सिंथेटिक्स कारखाने के मज़दूरों ने 1971 में कानूनी सीमा से अधिक बोनस देने की मांग के लिए फौलादी लड़ाई लड़ी थी. जिसे तोड़ने के लिए वहाँ के एसपी के इशारे पर कारखाने के गार्डों ने पिकेटिंग कर रहे मजदूरों पर गोलियाँ चलवा दी थीं और आठ मजदूर शहीद हो गए. आज भी उस उजाड़ फैक्ट्री के दरवाजे के सामने आम सड़क के किनारे उन मजदूरों की याद में शहीद स्मारक खड़ा है जहाँ हर वर्ष गोलीकांड के दिन मजदूर इकट्ठा होकर अपने शहीद साथियों को याद करते हैं.

“पुलिस अपने आप नहीं आई होगी.” प्रिया ने कहा, “इसके लिए जरूर कारखाना मालिक ने पहले से मुंबई पुलिस कमिश्नर को आवेदन किया होगा और एडवांस में खर्चा जमा कराया होगा. हालाँकि पूछने पर पुलिस यही कहेगी कि वह किसी भी संभावित हिंसा की रोकथाम के यहाँ आई है.”

“मुझे तो लगता है जैसी यूनियन और मजदूरों की तैयारी है खाकी वर्दियाँ यहाँ पिकनिक ही मनाकर ही लौटेंगे.” राहुल ने पुलिस की खिल्ली उड़ाने के लहजे में कहा.

“पुलिस की इस तरह खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं. वह हमारी मदद भी करती है, जैसे विक्रांत के मामले में की थी.” आदित्य बोला.

“वह सही है, पर जहाँ मामला किसी पूंजीपति का हो वह उसी का पक्ष लेती है, मजदूरों का साथ देने का उदाहरण तो मैंने कभी नहीं देखा न सुना.” राहुल ने पलट कर जवाब दिया.

“हाँ, ये तो है,” प्रिया ने कहा. आदित्य और स्नेहा ने भी इस पर अपनी सहमति व्यक्त की.

छह बजने के कुछ ही देर बाद राहुल को कंपनी की एक बस कारखाने के पिछले गेट की ओर जाने वाले संकरे रोड पर मुड़ती दिखी. उसमें करीब पंद्रह-बीस मज़दूर थे. जरूर प्रबंधन इन्हें कुछ डराकर और लालच देकर लाया होगा. उसने तुरंत अपने तीनों साथियों को बताया. आदित्य ने अपने मोबाइल से संदेश भेजा. तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर अलर्ट गूँजा. बीस-तीस मज़दूर जो सतर्कता के लिए पिछली गली में तैनात थे, उन्होंने बस को रोक लिया.

कोई हिंसा नहीं हुई, कोई धक्का-मुक्की नहीं. बस तीन-चार वरिष्ठ मज़दूर आगे आए, बस के अंदर झाँका और बड़े धीरज से बोले, "साथियों, आज अंदर जाओगे तो कल की रोटी और महंगी हो जाएगी. आओ, शामियाने में बैठो." वे मज़दूर, जो डर और लालच के मारे आए थे, अपने साथियों का हाथ थामकर बस से नीचे उतर आए. मैनेजर और सुपरवाइजरों को किसी ने नहीं रोका, वे आराम से कारखाने के अंदर पहुँच गए. लेकिन मजदूरों के बिना कोई प्रोडक्शन नहीं हो सकता था. वे किसे सुपरवाइज करते और क्या मैनेज करते. जिन्हें किया था वे तो अपने साथियों के चेहरे देखकर बस से उतर चुके थे.

नौ बजते-बजते यह साफ हो गया कि हड़ताल शत-प्रतिशत सफल है. कारखाने के अंदर सन्नाटा पसरा था. प्रिया और उसकी टीम वहाँ से निकलकर अपने ऑफिस की ओर चल दी. ग्यारह बजे उन्हें अपनी ड्यूटी पर पहुँच कर लॉग-इन करना था.

ऑफिस पहुँचने के बाद भी उनके फोन और लैपटॉप शांत नहीं थे. वे अपने काम के बीच-बीच में 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' और 'पर्दाफाश' संदेशों का प्रबंधन कर रहे थे. प्रिया ने गौर किया कि उसके ऑफिस के वातावरण और कारखाने के गेट के उस माहौल में कितनी दूरी थी, फिर भी एक 'श्रम' ही था जो उन्हें आपस में जोड़ रहा था.

शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया "पहला दिन हमने जीत लिया, ज़ंजीरें टूट रही हैं." प्रिया के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई. उसने कोड लिखना शुरू किया. उसे महसूस हुआ कि आज उसकी कोडिंग में एक अलग तरह की ऊर्जा है. वह अब केवल एक 'सॉफ्टवेयर इंजीनियर' नहीं रह गई थी, वह अब उस बड़े 'सिस्टम' का हिस्सा थी जो न्याय की मांग कर रहा था. उसकी आँखों के सामने कतारों में लाल झंडे लिए जलूस निकालते कोटा के मजदूरों की तस्वीरें तैरने लगीं. उसने महसूस किया कि मजदूरों और शहीद स्मारक की यादों ने उसके अंदर एक अजीब सी शांति और साहस भर दिया है.
... क्रमशः

तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 17
'इलेक्ट्रो सर्किट इंडिया' के प्रबंधक को अंतिम सूचना दे दी गई थी कि उनकी मांगें नहीं माने जाने पर सोमवार से फैक्ट्री के सभी मजदूर हड़ताल पर चले जाएंगे. इस बीच राहुल ने प्रिया को बताया कि फैक्ट्री प्रबंधन के पास सभी मजदूरों के व्हाट्सएप नंबर हैं, वह संदेशों के माध्यम से मिथ्या सूचनाएँ प्रसारित करके मजदूरों में भ्रम उत्पन्न कर सकता है. हम ऐसी सूचनाओं के फैक्ट-चेक करके मजदूरों को सावधान कर सकते हैं. किन्तु इसके लिए हमें सभी मजदूरों के नंबर और यूनियन के किसी ऑफिसर का फोन नंबर चाहिए जिससे मजदूरों को यह संदेश भेजा जा सके.

शनिवार को प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य एक साथ एसोसिएशन के ऑफिस पहुँचे. उन्होंने यह बात प्रशांत बाबू को बताई. उन्होंने बताया कि, “कारखाने के सभी मजदूरों का व्हाट्सएप ग्रुप बना हुआ है. उसमें यूनियन के सभी पदाधिकारी जुड़े हुए हैं.”

प्रिया ने कहा, “अब काम आसान है. यूनियन के सभी पदाधिकारी संदिग्ध संदेश प्राप्त होते ही मेरे नंबर पर फॉरवर्ड करेंगे. हम उसका फैक्ट चेक करके संदेश यूनियन के अध्यक्ष के नंबर से सभी मजदूरों के व्हाट्सएप नंबर पर भेज देंगे. हम इस संदेश को ‘पर्दाफाश’ शीर्षक देंगे और हर संदेश को एक क्रमांक देंगे. जैसे ‘पर्दाफाश- नं.1’.

प्रशांत बाबू ने इस काम के लिए यूनियन ऑफिस में एक कमरा उन्हें देने का प्रस्ताव दिया. किन्तु प्रिया ने इसके लिए मना कर दिया. उसने कहा कि हम यह काम कहीं से भी कर लेंगे, जिससे किसी को कुछ पता नहीं लगेगा. इस तरह से 'IIDEA' के ये नए चार सदस्य मिलकर एक ‘अदृश्य कमांड सेंटर’ बन गए थे. जिन्हें हड़ताल के लिए एक डिजिटल ढ़ाल का काम करना था. हालाँकि इन चारों की एसोसिएशन सदस्यता गोपनीय रखी गई थी.

रविवार सुबह से ही 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के मज़दूरों के व्हाट्सएप में हलचल बढ़ गई. मजदूरों के व्हाट्सएप में अनजान नंबरों से संदेश तैरने लगे— "पंजाब में नई फैक्ट्री का काम शुरू हो गया है, मुंबई की मशीनें रविवार रात तक ट्रक में लद जाएंगी.

प्रिया ने अपने लैपटॉप पर इन संदेशों का 'मेटा-डेटा' और पैटर्न चेक किया. उसने पाया कि सभी मैसेज एक ही 'बल्क मैसेजिंग सॉफ्टवेयर' से भेजे जा रहे थे. उसने तुरंत प्रशांत बाबू को सूचित किया. प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, "प्रबंधक डरा हुआ है, प्रिया. जब तर्क खत्म होते हैं, तो वे अफ़वाहों का सहारा लेते हैं." प्रिया की टीम ने तुरंत उन संदेशों का खंडन करने वाला सटीक 'फैक्ट-चेक' मैसेज ‘पर्दाफाश-1’ तैयार किया, जिसे यूनियन के अध्यक्ष और सचिव ने सभी मज़दूरों तक पहुँचाया.

रविवार की दोपहर तक खबर आई कि कारखाने के कुछ 'जॉबर्स' वरिष्ठ मज़दूरों के घर जाकर उन्हें 'पर्सनल प्रमोशन' और पंजाब वाले प्लांट में ऊँचे ओहदे का लालच दे रहे हैं. मालिक की कोशिश थी कि सोमवार की सुबह गेट पर भीड़ कम रहे.

राहुल और स्नेहा ने पिछले तीन सालों के 'प्रोडक्टिविटी डेटा' और 'वेतन वृद्धि' के पुराने रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया. उन्होंने दिखाया कि कैसे ये वही पुराने मज़दूर हैं जिनका वेतन दस साल से 'एम्पलॉइज शॉप' के नाम पर स्थिर रखा गया था. इस डेटा को एक सरल ग्राफ में बदलकर जब मज़दूरों को दिखाया कि उनका वेतन वर्तमान में मिल रहे वेतन से चार गुना से कुछ अधिक होना चाहिए था, तो उनका संकल्प और मजबूत हो गया. "दस साल की गुलामी का इनाम अब केवल एक खोखला वादा है," यह बात मज़दूरों के बीच बिजली की तरह फैल गई.

आदित्य ने मज़दूरों के लिए एक 'इमरजेंसी अलर्ट' सिस्टम बनाया. इसे 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' नाम दिया गया. इसका उद्देश्य था कि अगर सोमवार सुबह गेट पर पुलिस या बाउंसरों का हस्तक्षेप हो, तो पलक झपकते ही सभी मज़दूरों और यूनियन के नेताओं तक लोकेशन के साथ जानकारी पहुँच जाए. इस तरह 'अकाट्य एकता' को अपना 'डिजिटल सुरक्षा कवच' मिला.

रविवार शाम, यूनियन ऑफिस के नजदीकी पार्क में मजदूरों की आम सभा हुई. इस सभा में कारखाने के मजदूरों की संख्या साढ़े तीन सौ के करीब थी, जो कारखाने के मजदूरों की संख्या के नब्बे प्रतिशत थे. सभी ने मांगें मंजूर होने तक हड़ताल में बने रहने के साथ इस बात का भी संकल्प लिया कि इस बार मालिक फेयर वेजेज देने को तैयार नहीं होता है तो वे इस कारखाने में काम पर नहीं जाएंगे चाहे कारखाना बंद क्यों न हो जाए. मजदूरों के पूरे जोश के साथ मीटिंग खत्म हुई. ‘मजदूर एकता ज़िंदाबाद’, ‘हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’ और ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के नारों से सारा इलाका गूंज उठा. सभा आरंभ होने से समाप्त होने और मजदूरों के चले जाने तक एक सब इंस्पेक्टर के साथ लगभग बीस पुलिस वाले पार्क के पास तैनात रहे.

सभा के बाद यूनियन ऑफिस के भीतरी कमरे में प्रशांत बाबू, सीनियर वकील, यूनियन अध्यक्ष-सचिव और प्रिया की टीम के बीच एक गुप्त मीटिंग हुई. सोमवार सुबह 6 बजे की पहली शिफ्ट से हड़ताल शुरू होनी थी.

प्रशांत बाबू ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा, "कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो गेट पर केवल मज़दूर आत्म-सम्मान के साथ खड़े होंगे. हमें हड़ताल को अहिंसक बनाए रखना है, इसका ध्यान यूनियन के पदाधिकारियों को रखना है. अफवाहों का खंडन करने के लिए समय-समय पर ‘पर्दाफाश’ संदेश और हर आधा घंटे में 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' व्हाट्सएप पर आते रहेंगे. प्रबंधन मजदूरों को उकसाने के लिए गुंडों या बाउंसरों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन हमें पूरा ध्यान रखना होगा कि हम उत्तेजित न हों. यदि मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाने की कोई कार्यवाही हो तो हम उससे तुरन्त निपटेंगे और अपनी ओर से हिंसा न करेंगे. हमारे मजदूरों को हर हाल में हिंसा से बचना है. हमारी शांति ही हमारा सबसे बड़ा हथियार होगी."

प्रिया और उसके साथियों ने महसूस किया कि वे पहली बार किसी 'सिस्टम' को क्रैश होने से बचाने का काम नहीं कर रहे थे, बल्कि एक नए, न्यायपूर्ण सिस्टम को जन्म लेने में मदद कर रहे थे. दफ्तरों और घरों में घंटों कोडिंग के जालों से उलझने के दौरान जिस तरह की बोरियत और ऊब उन्हें सामना करना पड़ता था,वैसी यहाँ नहीं थी. उसके विपरीत उन्हें अपने कोडिंग के ज्ञान की ताकत और उसके उपयोग का एक नया मानवीय चेहरा नज़र आ रहा था.
... क्रमशः

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

पुर्जा नहीं, इंसान

देहरी के पार, कड़ी - 16
रविवार शाम चार बजे मुंबई की उमस के बीच, प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी वेस्ट के एक पुराने औद्योगिक इलाके में 'IIDEA' के कार्यालय पहुँचे. बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर एक लंबे कमरे के अंत में एक टेबल लगी थी, जिसके पीछे की कुर्सी पर एक अधेड़ व्यक्ति बैठा था. कमरे में दोनों ओर दो-दो बेंचें रखी थीं जिन पर कुछ लोग बैठे थे. उन्होंने टेबल के पीछे बैठे व्यक्ति से कहा, “हमें प्रशांत बाबू से मिलना है.”

“वे ऊपर मीटिंग में हैं.” वहाँ बैठे व्यक्ति ने जवाब दिया. “आप कहाँ से आए हैं? और क्या नाम हैं? बता दें, मैं उन्हें खबर भिजवा दूंगा.”

“बस उन्हें कहिए ‘डाटाप्रोस’ से प्रिया और उसके साथी आए हैं.”

उसने एक व्यक्ति को अंदर भेजा. पाँच मिनट बाद वह लौटा और बोला, “आपको ऊपर बुलवाया है.”

चारों उसी व्यक्ति के साथ कमरे के अंदर के दरवाजे से अंदर गए, वहाँ एक छोटे आंगन से सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं. फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में प्रशांत बाबू बैठे मिले, इस कमरे के पास ही एक हॉल था जिसमें कम से कम दो सौ लोग बैठ सकते थे. वहाँ कोई बैठक चल रही थी.

“आओ, तुम लोग बिलकुल समय से आए हो. कुछ देर बाद एक महत्वपूर्ण मीटिंग शुरू होने वाली है. मैं चाहता हूँ तुम सब उसमें दर्शक के रूप में बैठो. बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“हम उसमें शामिल होंगे, लेकिन पहले हम यूनियन की सदस्य बनना चाहते हैं.”

“मैं तुम्हें फॉर्म देता हूँ, इन्हें भर दीजिए और उस पर बने क्यूआर कोड को स्कैन करके अपनी सदस्यता शुल्क पे कर दीजिए.” प्रशांत बाबू ने चार फॉर्म निकाल कर प्रिया को दिए, चारों ने वहीं बैठकर उन्हें भरा, शुल्क भुगतान की. प्रशांत बाबू ने फार्म के निचले हिस्से पर अपने हस्ताक्षर करके उन्हें रसीद दे दी.

“आपकी यूनियन का नाम ‘डेमोक्रेटिक आईटी एम्पलॉइज एसोसिएशन’ यह 'IIDEA' से एफिलिएटेड है. मैं इस यूनियन की मुम्बई इकाई का सैक्रेटरी हूँ. एसोसिएशन के सदस्य बन कर तुम सब एक व्यापक ‘श्रम शक्ति’ का हिस्सा बन गए हो.”

कुछ देर में पास वाले हॉल में मीटिंग आरंभ हो गयी. वे सब भी उसी हॉल में जा बैठे.

मीटिंग में 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के लगभग 150 मज़दूर जमा थे. यह कारखाना इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) बनाता था. चर्चा से पता चला कि दस साल पहले मालिक ने एक अजीब समझौता किया था. जब मज़दूरों ने महंगाई के कारण वेतन बढ़ाने की मांग की, तो मालिक ने कहा— "मैं वेतन नहीं बढ़ाऊंगा, लेकिन कारखाने की अपनी 'एम्प्लॉइज शॉप' पर आपको राशन और दूसरी सब जरूरी चीजें उसी पुराने दाम पर मिलेंगी जो आज हैं."

शुरू में यह लुभावना लगा, लेकिन वक्त के साथ दुकान के बाहर की दुनिया में 'महंगाई' आग लगा चुकी थी. बच्चों की स्कूल फीस, अस्पताल का खर्च और बस का किराया उस से नहीं मिल सकता था. मज़दूरों ने अब फिर से यूनियन बनाई और अपना मांग-पत्र दिया.

मांग पत्र पर मालिक का जवाब सीधा और क्रूर था— "हड़ताल की, तो मैं यह यूनिट पंजाब ले जाऊँगा. तुम सब सड़क पर आ जाओगे."

मीटिंग में 'IIDEA' के कानूनी सलाहकार, एक सीनियर वकील मौजूद थे उन्होंने अपनी राय मजदूरों के सामने रखी: "कानूनी रूप से मालिक को अपना व्यापार कहीं भी ले जाने का हक है. अगर उसने ऐसा किया, तो आप सब बेरोजगार हो जाएंगे. यह आपको सोचना है कि क्या आप फिर भी हड़ताल का जोखिम उठाने को तैयार हैं या नहीं?"

कुछ पल की खामोशी के बाद एक अधेड़ उम्र का मज़दूर खड़ा हुआ. उसके हाथ आईसी बनाने के काम से कुछ काले पड़ गए थे. उसने कड़क आवाज़ में कहा— "साहब, बेरोज़गारी का डर दिखाकर वह हमें गुलाम बनाए रखना चाहता है. इन शर्तों पर काम करना भी तो धीरे-धीरे मरने जैसा ही है. हम कुछ भी कर लेंगे, फुटकर मजदूरी कर लेंगे, लेकिन इस ज़िल्लत में काम नहीं करेंगे. हम हड़ताल करेंगे!"

उसके बाद मजदूरों का आव्हान किया गया कि, ‘वे हड़ताल के विषय अपनी मंच पर आकर रखें. और वे मजदूर अवश्य अपनी बात रखें जो हड़ताल के विरुद्ध राय रखते हों. यदि हड़ताल होती है तो बाद में कोई यह नहीं कहे कि वह हड़ताल के विरुद्ध है’. इसके बाद कुछ हाथ उठे, उन सब मजदूरों ने मंच पर आकर एक-एक करके अपनी राय रखी. अंत में यूनियन के पदाधिकारियों ने आपस में कुछ बात की, फिर सैक्रेटरी ने सब मजदूरों से कहा, “यूनियन कार्यसमिति की राय है कि हमें मालिक को एक सप्ताह का समय और देना चाहिए और उसके बाद के सोमवार से हड़ताल कर देना चाहिए. जो भी इस राय के विरुद्ध हो वह हाथ खड़ा करे, उसे अपनी राय रखने का अवसर दिया जाएगा.

किसी मजदूर ने हाथ नहीं उठाया. कुछ देर इंतजार करने के बाद सैक्रेटरी ने कहा जो हड़ताल के साथ है वे हाथ उठाएँ. मजदूरों ने हाथ उठाए. हाथ गिने गए. उसके बाद सैक्रेटरी ने कहा कि, “सर्वसम्मत राय है कि आज से ठीक आठवें दिन सोमवार को सुबह की शिफ्ट के साथ हड़ताल आरंभ होगी.”

इसके बाद सैक्रेटरी ने नारा लगाया, ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद¡’ सब मजदूरों ने नारे का बुलंदी से जवाब दिया. उनकी आवाज़ों में एक अजीब सा तालमेल था, बिलकुल 'हीरे के अणुओं' की उस मजबूती जैसा जिसके बारे में प्रशांत बाबू ने उन्हें बताया था.

प्रशांत बाबू मंच पर आए. उनकी नज़रें प्रिया पर पड़ीं, जो सन्न होकर यह सब देख रही थी. प्रशांत बाबू ने गरजती हुई आवाज़ में कहा: "जब जीवन का संकट बेरोज़गारी के डर से बड़ा हो जाए, तो नेतृत्व का काम रास्ता दिखाना होता है. हम यहाँ केवल चंद रुपयों के लिए नहीं, बल्कि अपने 'अधिकारों' और 'मनुष्य की गरिमा' के लिए लड़ेंगे. सारा मज़दूर एकमत है, IIDEA इस लड़ाई का नेतृत्व करेगा. हम हड़ताल करेंगे!"

हॉल फिर से 'मजदूर एकता ज़िंदाबाद' के नारों से गूंज उठा. प्रिया ने एक सच्चा जनतंत्र वाद देखा था उसे अहसास हुआ कि 'देहरी के पार' की दुनिया केवल जैसे विक्रांत व्यक्तिगत दुश्मनों से लड़ने के बारे में नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था से टकराने के बारे में भी है जो इंसान को मशीन का एक पुर्जा समझती है.
... क्रमशः

रविवार, 28 अप्रैल 2013

ये आग नहीं बुझेगी

ल सुबह टंकी पर चढ़े सेमटेल-सेमकोर पिक्चर ट्यूब कारखानों के श्रमिक प्रशासन से बातचीत और आश्वासनों के बाद शाम को टंकी से नीचे उतर गए। पर प्रश्न है कि क्या प्रशासन उन्हें उन का बकाया वेतन दिलवा सकेगा? कारखाने 7 नवम्बर 2012 को बंद हुए थे। अक्टूबर 2012 के पूरे महिने श्रमिकों ने पूरी मेहनत से काम किया था और क्षमता से अधिक उत्पादन किया था। उस माह का वेतन भी आज तक बकाया है। इस वेतन को वसूल करने के लिए एक मुकदमा श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ पेश किया गया। जिस में निर्णय हुए आज चार माह हो चुके हैं। लेकिन न तो राज्य सरकार मालिक से वेतन की वसूली कर सकी है और न ही वसूल करने के लिए कंपनियों की संपत्ति पर कुर्की का कोई आदेश जारी कर सकी है। उलटे मालिक ने कारखाने बंद करने की जो अनुमति सरकार से मांगी थी उस आवेदन का 60 दिन में निर्णय कर के मालिक को सूचित न करने के कारण मालिक को स्वतः ही अनुमति मिल गई है। 

 
स से स्पष्ट है कि राजस्थान सरकार मालिकों के साथ है। मजदूरों के लिए उस के पास कुछ नहीं है। लगता है सरकार में बैठे मंत्रियों कि निगाहें इस कारखानों की बेशकीमती जमीन को हथिया कर उसे  बिल्डरों को बेच कर करोड़ों के वारे न्यारे करने की योजना की तरफ हैं। मजदूरों का क्या वे छह माह से हकों की लड़ाई लड़ रहे हैं कितने दिन लड़ेंगे। जब खाने को नहीं बचेगा और किरानी और मकान मालिक अपने पैसों के लिए दबाव डालेंगे तो वे अपने आप मैदान छोड़ कर भाग जाएंगे।  आज देश में जो सरकारें हैं वे इसी तरह काम कर रही हैं। उन्हें काम करने वालों से बस इतना मतलब है कि काम करने के वक्त वे काम करते रहें। उन्हें उन की मजदूरी और उन के हक मिलें न मिलें इस की उन्हें कोई परवाह नहीं।

लेकिन जो आग मजदूरों में, उन के परिवारों के सदस्यों में, स्कूल जाने वाले बच्चों में पैदा हुई है वह नहीं बुझेगी। सरकार और पूंजीपति समझ रहे हैं कि उस पर राख पड़ जाएगी। पर आग तो आग है, वह राख के नीचे भी सुलगती रहेगी। फिर यह आग पेट की भूख से पैदा हुई है जो कभी नहीं बुझती।  इन मजदूरों के परिवार कुछ महिनों में अपने अपने गाँव चले जाएंगे या फिर रोजगार की तलाश में देश के विभिन्न हिस्सों में चले जाएंगे। सरकार, नौकरशाह और पूंजीपति समझेंगे काम खत्म। लेकिन ये लोग देश के जिस भी हिस्से में जाएंगे आग को साथ ले जाएंगे।  

रकार, नौकरशाह और पूंजीपति जान लें कि उन्हों ने हनुमान नाम के बंदर की पूंछ में आग लगा दी है। उस की पूंछ की यह आग तभी बुझेगी जब लंका के तमाम सोने के महल आग की भेंट न चढ़ जाएंगे।

बुधवार, 9 मार्च 2011

महिलाओं का समान अधिकार प्राप्त करने का संकल्प धर्म की सत्ता की समाप्ति की उद्घोषणा है

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस था। हिन्दी ब्लाग जगत की 90% पोस्टों पर महिलाएँ काबिज थीं। उन की खुद की पोस्टें तो थीं ही, पुरुषों की पोस्टों पर भी वे ही काबिज थीं। महिला दिवस के बहाने धार्मिक प्रचार की पोस्टों की भरमार थीं। कोई उन्हें देवियाँ घोषित कर रहा था तो कोई उन्हें केवल अपने धर्म में ही सुरक्षित समझ रहा था। मैं शनिवार-रविवार यात्रा पर था। आज मध्यान्ह बाद तक वकालत ने फुरसत न दी। अदालत से निकलने के पहले कुछ साथियों के साथ चाय पर बैठे तो मैं ने अनायास ही सवाल पूछ डाला कि क्या कोई धर्म ऐसा है जो महिलाओं को पुरुषों से अधिक या उन के बराबर अधिकार देता हो। जवाब नकारात्मक था। दुनिया में कोई धर्म ऐसा नहीं जो महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देता हो। कोई उन्हें देवियाँ बता कर भ्रम पैदा करता है तो कोई उन्हें केवल पुरुष संरक्षण में ही सुरक्षित पाता है मानो वह जीती जागती मनुष्य न हो कर केवल पुरुष की संपत्ति मात्र हों। मैं ने ही प्रश्न उछाला था, लेकिन चर्चा ने मन खराब कर दिया। 
चाय के बाद तुरंत घर पहुँचा तो श्रीमती जी  टीवी पर आ रही एक प्रसिद्ध कथावाचक की लाइव श्रीमद्भागवतपुराण कथा देख-सुन रही थीं। साथ के साथ साड़ी पर फॉल टांकने का काम भी चल रहा था। फिर प्रश्न उपस्थित हुआ कि क्यों महिलाएँ धर्म की ओर इतनी आकर्षित होती हैं?  जो चीज उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त करने से रोक रही हैं, उसी ओर क्यों प्रवृत्त होती हैं। लाइव कथा में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से दुगनी से भी अधिक थी। वास्तव में उन में से अधिक महिलाएँ तो वे थीं जो स्वतंत्रता पूर्वक केवल ऐसे ही आयोजनों में जा सकती थीं। लेकिन इन आयोजनों को करने में पुरुषों और व्यवस्था की ही भूमिका प्रमुख है। शायद इस लिए कि पुरुष चाहते हैं कि महिलाओं को इस तरह के आयोजनों में ही फँसा कर रखा जाए। इन के माध्यम से लगातार उन के जेहन में यह बात ठूँस-ठूँस कर भरी जाए कि पुरुष के आधीन रहने में ही उन की भलाई है।
न सब तथ्यों ने मुझे इस निष्कर्ष तक पहुँचाया कि महिलाओं की पुरुषों के समान अधिकार और समाज में बराबरी का स्थान प्राप्त करने का उन का संघर्ष तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि वे धर्म से मुक्ति प्राप्त नहीं कर लेती। महिलाओं का समान अधिकार प्राप्त करने का संकल्प धर्म की सत्ता की समाप्ति की उद्घोषणा है। इस बात से महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करने के विरोधी धर्म-प्रेमी बहुत चिंतित हैं।  आजकल ब्लाग जगत में  इस तरह के लेखों की बाढ़ आई हुई है और वे स्त्रियों को धर्म की सीमाओं में बांधे रखने के लिए न केवल हर तीसरी पोस्ट में पुरानी बातों को दोहराते हैं, अपितु एक ही पोस्ट को एक ही दिन कई कई ब्लागों पर चढ़ाते रहते हैं। मुझे तो ये हरकतें बुझते हुए दीपक की तेज रोशनी की तरह प्रतीत होती हैं।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

नागरिक और मानवाधिकार हनन का प्रतिरोध करने को समूह बनाएँ

विगत आलेख  पुलिस को कहाँ इत्ती फुरसत कि ..............?   पर अब तक अंतिम  टिप्पणी श्री Bhavesh (भावेश ) की है कि 'रक्षक के रूप में भक्षक और इंसानियत के नाम पर कलंक इस देश की पुलिस से जितना दूर रहे उतना ही ठीक है.'  मुझे भावेश की ये टिप्पणी न जाने क्यों अंदर तक भेद गई। मुझे लगा कि यह रवैया समस्या से दूर भागने का है, जो आजकल आम दिखाई पड़ता है। 
दालत पुलिस को सिर्फ जाँच के लिए मामला भेजती है जिस में पुलिस को केवल मात्र गवाहों के बयानों और दस्तावेज आदि के आधार पर अपनी रिपोर्ट देनी है कि मामला क्या है। इस रिपोर्ट से कोई अपराध होना पाया जाता है या नहीं पाया जाता है इस बात का निर्णय अदालत को करना है। अपराध पाया जाने पर क्या कार्यवाही करनी है यह भी अदालत को तय करना है ऐसे में पुलिस एक व्यक्ति को जिस ने कोई अपराध नहीं किया है। यह कहती है कि तुम बीस हजार रुपए दे दो और आधा प्लाट अपने भाई को दे दो तो हम मामला यहीं रफा-दफा कर देते हैं, अन्यथा तुम्हें मुकदमे में घसीट देंगे। ऐसी हालत में पुलिस जो पूरी तरह से गैर कानूनी काम कर रही है उस का प्रतिरोध होना ही चाहिए। 
ब से पहला प्रतिरोध तो उस के इन अवैधानिक निर्देशों की अवहेलना कर के होना चाहिए। संबंधित पुलिस अफसर के तमाम बड़े अफसरों को इस की खबर की जानी चाहिए और अदालत को भी इस मामले में सूचना दी जानी चाहिए। यह सीधा-सीधा मानवाधिकारों का हनन है। यदि इस का प्रतिरोध नहीं किया जाता है तो सारे नागरिक अधिकार और मानवाधिकार एक दिन पूरी तरह ताक पर रख दिए जाएंगे।  कुछ तो पहले ही रख दिए गए हैं। वास्तव में जब भी किसी देश के नागरिक अपने नागरिक अधिकारों के हनन को सहन करने लगते हैं तो यह आगे बढ़ता है। 
ब भी एक अकेला व्यक्ति ऐसा प्रतिरोध करता है तो यह बहुत संभव है कि पुलिस उसे तंग करे। उस के विरुद्ध फर्जी मुकदमे बनाने के प्रयत्न करे। लेकिन जब यही प्रतिरोध एक समुदाय की और से सामने आता है तो पुलिस की घिघ्घी बंध जाती है। क्यों कि वह जानती है समुदाय में ताकत होती है, जिस से वह लड़ नहीं सकती। समुदाय की जायज मांगों पर देर सबेर कार्यवाही अवश्य हो सकती है। फिर पुलिस एक मुहँ तो बंद कर सकती है लेकिन जब मुहँ पचास हों तो यह उस के लिए भी संभव नहीं है। जब समुदाय बोलने लगता है तो राजनैताओं को भी उस पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है, शायद इस भय से ही सही कि अगले चुनाव में जनता के बीच कैसे जाया जा सकता है। इस तरह की घटनाएँ समुदाय के मुहँ पर आ जाने के बाद अखबारों और मीडिया को भी बोलना आवश्यक प्रतीत होने लगता है।
म में से कोई भी ऐसा नहीं जो किसी न किसी समुदाय का सदस्य न हो। वह काम करने के स्थान का समुदाय हो सकता है। वह मुहल्ले को लोग हो सकते हैं। वे किसी अन्य जनसंगठन के लोग भी हो सकते हैं। निश्चित रूप से हमें इस तरह की घटनाओं की सूचना सब से पहले समुदाय को दे कर उसे सक्रिय करना चाहिए। एक बाद और कि हमें समुदाय को संगठित करने की ओर भी ध्यान देना चाहिए। हम कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि जहाँ हम रहते हैं वहाँ के निवासियों की एक सोसायटी तो कम से कम बना ही लें और उस का पंजीयन सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत करा लें। इस से उस क्षेत्र के बाशिंदों को एक सामाजिक और कानूनी पहचान मिलती है। इस के लिए कुछ भागदौड़ तो करनी पड़ सकती है। लेकिन यह सोसायटी है बड़े काम की चीज और ऐसे ही आड़े वक्त काम आती है। एक बात और कि सोसायटी बनने पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी सोसायटी को पूछने लगते हैं। निश्चित रूप से एक-एक वोट के स्थान पर समूहबद्ध वोटों का अधिक महत्व है। लोगों का संगठनीकरण आवश्यक है।