देहरी के पार, कड़ी - 42
अंधेरी स्थित आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर के दोनों सीलिंग फैन चल रहे थे उसके बावजूद उमस से किसी तरह की राहत नहीं मिल पा रही थी. ऐसा लगता था कि कभी भी बारिश आ जाएगी. दफ्तर का माहौल भी आज कुछ अधिक अनुशासन में था. आज यहाँ ईसीआई यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक में ट्रेड यूनियनों के अखिल भारतीय केंद्र (AICCTU) के महाराष्ट्र स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी मौजूद थे—गहरा सांवला रंग, खादी का सफेद कुर्ता और आँखों पर मोटा चश्मा. उनके बगल में प्रशांत बाबू और शिंदे साहब थे. दूसरी तरफ प्रिया, स्नेहा और राहुल, भी बैठे थे.
प्रशांत बाबू ने मीटिंग की औपचारिक शुरुआत करते हुए कॉमरेड कुलकर्णी को बताया कि ईसीआई फैक्ट्री के क्लोजर परमिशन की फाइल को लेबर सेक्रेटरी ने 'लॉ डिपार्टमेंट' को भेज दी है और वहाँ पैंडिंग है.
"कुलकर्णी जी, स्थिति नाजुक है. एएसएल के यहाँ सुनवाई के दौरान हमने कोई कसर नहीं रखी. हमें पूरा विश्वास है कि सरकार ने मेरिट पर फैसला किया तो मैनेजमेंट का आवेदन निरस्त होगा, लेकिन उसका 14 मई के पहले सरकार का आदेश पारित करना और मैनेजमेंट तक पहुँचना आवश्यक है." प्रशांत बाबू का स्वर गंभीर था. "अगर ११ मई तक फाइल कानून मंत्रालय से बाहर नहीं आती तो यह सब होना मुमकिन नहीं होगा और 15 मई को सुबह ईसीआई के सभी मजदूर बेरोजगार होंगे. मैनेजमेंट पूरी जुगत में है कि फाइल 'लॉ डिपार्टमेंट' में अटकी रहे."
कुलकर्णी जी ने मेज पर रखे पानी के गिलास को हाथ लगाया, फिर बिना उठाए छोड़ दिया. "मैनेजमेंट चाहता है कि हम आखिरी वक्त में घुटने टेक दें. उनके वकील भट्ट ने जो लीगल क्वेरी (कानूनी सवाल) खड़ी की है, वह सिर्फ समय काटने का तरीका है. वे जानते हैं कि एक बार 'डीम्ड क्लोजर' मिल गया, तो फिर हम कोर्ट-दर-कोर्ट भटकते रहेंगे और मजदूर सड़क पर होंगे."
तभी प्रिया ने धीरे से अपनी डायरी खोली. "सर, मैं कुछ साझा करना चाहती हूँ. मैं और मेरे दोनों साथी आईआईडीईए की नए सदस्य हैं. हम इस हड़ताल और मुकदमे के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते रहे हैं. हम पिछले दो दिनों से इस फैक्ट्री के मजदूरों के घरों में गए हैं और जानने की कोशिश की है कि मजदूरों के परिवार के सदस्य क्या सोचते हैं, हम यूनियन के सेक्रेटरी शिंदे साहब के घर भी होकर ए हैं."
सेक्रेटरी शिंदे सुनकर चौंक गए और उत्सुकता से प्रिया की ओर देखने लगे. प्रिया ने गहरी सांस ली, "सर, एक चौंकाने वाला सच यह है कि मजदूर और उनके परिवार के सदस्य फैक्ट्री का क्लोजर होने से बिलकुल नहीं डरते हैं. लेकिन वे उस 'अनिश्चितता' से डरे हुए हैं जिसमें वे पिछले दस साल से जी रहे हैं. मैंने सावित्री अम्मा और बिठ्ठल भाई जैसे लोगों से बात की. उनका कहना है कि ईसीआई की यह नौकरी अब उनकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन गई है. वे 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों से आज़ाद होना चाहते हैं."
कमरे में सन्नाटा छा गया. शिंदे साहब, जो खुद उसी फैक्ट्री के मजदूर थे, थोड़े असहज हुए. "प्रिया बेटा, हम और हमारा परिवार के बीच सोच एक अलग बात है लेकिन एक यूनियन के लिए मजदूरों की 'नौकरी अचानक चले जाना या छोड़ देना' इतना आसान नहीं होता. हमारा अस्तित्व ही नौकरी बचाने से जुड़ा है. अगर हम क्लोजर मान लेते हैं, तो क्या यह मैनेजमेंट की जीत नहीं होगी?"
यही वह बिंदु था जहाँ एक पुरानी विचारधारा और नई वास्तविकता टकरा रही थी.
राहुल ने बीच में हस्तक्षेप किया, "शिंदे साहब, जीत इसमें नहीं है कि हम एक डूबते हुए जहाज पर सवार रहें. जीत इसमें है कि डूबने से पहले हम मजदूरों को उनकी मेहनत का पूरा हिसाब दिलाकर उन्हें किनारे पर उतार दें. वे लोग बाहर जाकर कोई नई नौकरी तलाश कर सकते हैं या फिर छोटा-मोटा काम करके आज की तुलना में ज्यादा सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं. हमने देखा है कि उनके घरों में हुनर की कमी नहीं है, बस उनके पास नहीं है तो अपने हुनर और मेहनत का उपयोग करने के लिए संसाधन नहीं हैं."
कॉमरेड कुलकर्णी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और अपनी उँगलियों से माथा सहलाने लगे. "प्रिया का विश्लेषण चौंकाने वाला है, लेकिन इसमें एक कड़वी सच्चाई है. दुनिया ने हमेशा मजदूरों को 'मजदूर' के रूप में देखा, लेकिन वे भी 'इंसान' हैं और उसी रूप में अपनी पहचान और आज़ादी चाहते हैं. अगर वे खुद ट्रक सिस्टम जैसी गुलामी को और ढोना नहीं चाहते, तो हम उन पर अपनी पुरानी लड़ाई थोप नहीं सकते. जहाँ तक मुझे ईसीआई फैक्ट्री में मजदूरों की हड़ताल के आरंभ में सूचना दी गयी थी, उसके मुताबिक सारे मजदूर फैक्ट्री के बंद होने और नौकरी चले जाने का खतरा उठाते हुए ही हड़ताल पर गए थे."
कुलकर्णी की इस बात के बाद मीटिंग में लंबी बहस चली. सबने अपने-अपने विचार रखे कानूनी पहलुओं को खंगाला गया. प्रश्न यह था कि अगर यूनियन क्लोजर का विरोध करना छोड़ देती है, तो मैनेजमेंट के पास मोलभाव करने की क्या वजह बचेगी?
प्रिया ने अपना पक्ष मजबूती से रखा, "सर, हम क्लोजर का विरोध न करें, ऐसा मैंने नहीं कहा. मैं कह रही हूँ कि हमारी शर्तों को बदल दिया जाए. हम सरकार से कहें कि क्लोजर की अनुमति तभी मिले जब मैनेजमेंट हर मजदूर को पिछले दस साल से 'ट्रक सिस्टम' के अवैध उपयोग से किए गए शोषण का मुआवजा, बकाया ग्रेच्युटी और एक 'विशेष एक्जिट पैकेज' दे. हमें 'नौकरी' के बदले 'न्याय और मुक्ति' को अपना मुख्य मुद्दा बनाना होगा."
कुलकर्णी जी ने मेज थपथपाई. "यही रास्ता है! अगर हम मैनेजमेंट को इस बात पर मजबूर कर दें कि क्लोजर उनके लिए 'सस्ता' नहीं बल्कि 'बहुत महंगा' सौदा साबित होगा, तो वे खुद बातचीत की मेज पर आएंगे. हमें सरकार को यह बताना होगा कि यह सिर्फ एक फैक्ट्री बंद होने का मामला नहीं है, बल्कि दस साल से चल रहे एक अवैध श्रम-प्रथा (ट्रक सिस्टम) के निपटारे का मामला है. लेकिन अभी हमारे सिर पर क्लोजर परमिशन की तलवार लटकी हुई है, इसके लिए सीधे श्रम मंत्री से मिलकर उसे समझाना होगा. हो सकता है हमें, श्रम मंत्री के बंगले के सामने धरना प्रदर्शन भी करना पड़े."
अगले दो घंटों में रणनीति को अंतिम रूप दिया गया. निर्णय लिया गया कि कल सोमवार, 6 मई को यूनियन मंत्रालय को एक ऐसा 'अल्टीमेटम' देगी जो अब तक के उनके रुख से बिल्कुल अलग होगा.
यूनियन सरकार से मांग करेगी कि ईसीआई की क्लोजर की परमिशन वाले आवेदन को तुरंत निरस्त किया जाए. यदि फैक्ट्री के मालिक क्लोजर चाहते हैं तो यूनियन के साथ समझौते के माध्यम से ही संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं. लेबर कमिश्नर खुद मजदूरों के बीच जाकर उनके 'ट्रक सिस्टम' के दावों की जांच करें और रिपोर्ट सरकार को दें. यदि 8 मई तक ठोस जवाब नहीं मिलता, तो 11 मई को श्रम मंत्री के निवास पर प्रदर्शन और घेराव होगा.
कुलकर्णी जी ने कहा कि, “मैं व्यक्तिगत रूप से प्रयास करूंगा कि श्रम मंत्री 6 या 7 मई को मिलने का समय दें.”
मीटिंग खत्म हुई, तो रात के साढ़े आठ बज रहे थे. कुलकर्णी जी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा. "प्रिया, तुमने आज हमारी लड़ाई का रूप बदल दिया है, जो अधिक मानवीय है. लेकिन याद रखना, जो रास्ता हमने अब चुना है वह काँटों भरा है. मैनेजमेंट और लॉ डिपार्टमेंट अब और भी शातिराना चालें चलेंगे."
प्रिया ने अपनी डायरी बैग में रखी. "सर, 6 दिन बचे हैं. 11 मई तक हमें कुछ न कुछ हासिल करना होगा.
... क्रमशः