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बुधवार, 6 मई 2026

चाबुक

देहरी के पार, कड़ी - 45
ईसीआई यूनियन सचिव शिंदे और कुलकर्णी जी दादर ऑफिस पहुँगे. वहाँ कुछ पोस्टर और एक पर्चा डिज़ाइन किए हुए मौजूद थे. वे दोनों पोस्टर देखने लगे.

पोस्टरों की टैगलाइन थी, “कारखाना बंदी मंजूर नहीं”. पर्चे की हेड लाइन थी, “कारखाना बंदी को मंजूर करने वाले मंत्री, विधायक, सरकार को जनता नहीं बख्शेगी.” कुलकर्णी जी ने पोस्टर की एक डिजाइन चुनी और पर्चे को ओ. के. कर दिया. ऑफिस सेक्रेटरी को बुलाकर कहा, “ये डिजाइन लातूर यूनियन दफ्तर को व्हाट्सएप कर दो. सौ पोस्टर और ढाई हजार पर्चे छपवाएंगे. पोस्टर आज शाम ही निलंगा शहर में चिपकाए जाएंगे और पर्चे भी रात दस बजे तक सारे बँट जाएँ. पोस्टर और पर्चे बाँटने की खबर लातूर के सभी अखबारों में छपवाने का इंतजाम भी करेंगे. मेरी लातूर और निलंगा दोनों जगह बात हो चुकी है.”

इसके बाद कुलकर्णी जी ने शिंदे को कहा. “आपकी ड्यूटी है कि आप पोस्टर और पर्चे का डिजाइन लातूर पहुँच जाने के बाद लातूर के जिला सेक्रेट्री और निलंगा यूनियन के सेक्रेटरी से संपर्क में रहेंगे, दोनों के नंबर मैं आपको व्हाट्सएप कर रहा हूँ . जब पोस्टर लग जाने और पर्चे बँटने की खबर आपको मिल जाए, तब आप मुझे बताएंगे. आप लातूर में भी पूछेंगे कि खबर छपने की व्यवस्था की गई कि नहीं.”

आठ मई की सुबह साढ़े दस बजे ही शहर गर्मी से तपने लगा था. लेकिन सचिवालय में श्रम मंत्री का विशाल चैम्बर वातानुकूलित होने पर भी बाहर से ज्यादा गर्म था. विधायक महेश फड़के ने कल ही अपनी शिवसेना वाली आक्रामकता दिखाते हुए कुलकर्णी और पाँच मजदूरों के साथ 11 बजे मिलने का समय ले लिया था. लेकिन सुबह जो खबर उन्हें निलंगा से मिली, उसने उन्हें परेशान कर दिया था. ईसीआई के बंदीकरण के मामले में वहाँ पोस्टर लगे थे और पर्चे बँटे थे और सुबह मजदूरों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया था.

मंत्री ने लेबर सेक्रेटरी को बुला रखा था. वह जैसे ही चैम्बर पहुँचा. मंत्री ने ऊँची आवाज में पूछा, “ये क्या चल रहा है? मेरे कहे बिना ईसीआई की फाइल लॉ सेक्रेटरी के पास कैसे पहुँची?”

“वो ... सर आप दौरे पर थे, इसलिए मैंने सोचा जब तक आप लौटें वहाँ से लीगल ओपिनियन ले ली जाए. समय बचेगा.” सेक्रेटरी ने दबे स्वर में कहा.


“मुझसे फोन पर पूछ सकते थे.”

“सर, गलती हो गई. आईंदा ध्यान रखेंगे.”

“अभी मेरा बाप, एमएलए फड़के आने वाला है, उसके साथ कामरेड कुलकर्णी भी होगा और पाँच मजदूर भी होंगे. उनको क्या जवाब दूंगा?”

उनकी बात चल ही रही थी कि बाहर से जमादार पर्ची लेकर आ गया कि फड़के और कुलकर्णी मजदूरों के साथ हाजिर हैं.

“कहाँ बिठाया उनको?”

“विजिटर्स हॉल में बिठा दिया है.”

“जाकर बोलो मंत्री जी इधर ही आ रहे हैं.”

उधर सेक्रेट्रिएट इंटेलिजेंस का सीनियर इंस्पेक्टर भोंसले चीफ मिनिस्टर के चैम्बर में रिपोर्ट कर रहा था, “ईसीआई के मामले में शिवसेना एमएलए, लेबर लीडर कुलकर्णी और पाँच कार्यकर्ताओं के साथ लेबर मिनिस्टर से मिलने पहुँचा है, उधर निलंगा में पोस्टर चिपकने, पर्चा बँटने और अखबार में उसकी खबर छपने से मिनिस्टर का पारा आसमान पर है, वह पगलाया हुआ है.”

लेबर मिनिस्टर अपने चैंबर से विजिटिंग हॉल के लिए निकलने वाला था कि तभी उसके पीए के फोन की घंटी बजी. उसका चेहरा सफेद पड़ गया. उसने हड़बड़ाते हुए कहा, "सर, सीएमओ (मुख्यमंत्री कार्यालय) से फोन है. ईसीआई की फाइल अभी के अभी छठे माले पर मंगाई है."

“भेजो अभी के अभी भेजो, मैं फड़के से मिलकर लौटूँ उसके पहले भेज दो. बला टले.”

मिनिस्टर फड़के, कुलकर्णी और मजदूर कार्यकर्ताओं से मिला. उनको बोला, “फैक्ट्री बंद होने की परमिशन हरगिज नहीं मिलेगी और कम्युनिकेशन भी 11 मई के पहले हो जाएगा.

दो बजे प्रिया की घड़ी ने वाइब्रेट किया तो वह कंप्यूटर को स्लीप मोड में छोड़कर लंच के लिए उठ गई. लंच रूम में आकर टिफिन खोलने के पहले उसने मोबाइल पर ईएसआई की फाइल की स्टेटस चैक की, उसकी धड़कनें तेज हो गईं. फाइल लेबर सेक्रेटरी से सीधे सीएमओ पहुँच चुकी थी. उसने तुरंत मैसेज टाइप किया: "फाइल श्रम मंत्रालय से सीधे 'CMO' शिफ्ट हो गई है. कुछ बहुत बड़ा होने वाला है."

प्रशांत बाबू को जब यह मैसेज मिला, तो उन्होंने कुलकर्णी जी की ओर देखा. राजनैतिक शतरंज की बिसात पर अब सबसे बड़ा 'वजीर' मैदान में उतर चुका था.

ईसीआई का एमडी, जो अब तक लेबर मिनिस्टर और इंडस्ट्री मिनिस्टर को अपनी उंगलियों पर नचा रहा था, उसे आनन-फानन में मुख्यमंत्री के केबिन में बुलाया गया. वह सूट-बूट में पूरी तैयारी के साथ आया था कि घाटे के आँकड़े पेश करेगा, लेकिन सामने मुख्यमंत्री का शांत पर बेहद सख्त चेहरा देखकर उसकी सारी दलीलें गले में ही अटक गईं.

मुख्यमंत्री ने फाइल को मेज पर सरकाते हुए एमडी की आँखों में देखा. "मिस्टर एमडी, आप पिछले एक महीने से लेबर मिनिस्टर, इंडस्ट्री मिनिस्टर और विधायक को साधने की कोशिश कर रहे थे. आपने सोचा कि सबको 'मैनेज' कर लिया तो रास्ता साफ है? शायद आपने यह भुला दिया कि इस राज्य का नेतृत्व मैं कर रहा हूँ."

एमडी ने कुछ कहना चाहा, पर मुख्यमंत्री ने हाथ के इशारे से उसे चुप करा दिया. "मुझे आपके घाटे की बैलेंस शीट में कोई दिलचस्पी नहीं है. मेरी दिलचस्पी अक्टूबर में होने वाले चुनावों में है. अगर ये 350 मजदूर बेरोजगार हुए, तो अंधेरी पूर्व से लेकर आपके इंडस्ट्रियल बेल्ट तक जो आग लगेगी, उसे बुझाने की ताकत आपमें नहीं है."

मुख्यमंत्री की आवाज़ अब और ठंडी और मारक हो गई. "मैनेजमेंट को तरजीह चाहिए थी, वह मैंने दे दी—सीधे आपको यहाँ बुलाकर. अब फैसला आपका है. या तो यूनियन के साथ बैठकर समझौता कीजिए और दीवाली तक कारखाना चालू रखिए, वरना मैं अभी इसी वक्त इस एप्लिकेशन को रिजेक्ट करने का आदेश दे रहा हूँ. आज ही आपको कम्युनिकेशन मिल जाएगा. और याद रखिए, एक बार रिजेक्ट हुआ तो अगली एप्लिकेशन के लिए पूरे एक साल का इंतजार करना होगा. एक साल का करोड़ों का मुनाफा छोड़ने के लिए तैयार हैं?"

एमडी के माथे पर पसीना चमकने लगा. उसका सारा अहंकार भाप बनकर उड़ रहा था.

मुख्यमंत्री ने फाइल को परे धकेलते हुए ठंडे स्वर में कहा, "मिस्टर एमडी, आप अब तक अपनी रसूख के जोर पर सिस्टम को हांक रहे थे, लेकिन आप भूल गए कि जब सत्ता का ‘चाबुक’ चलता है, तो बड़े-बड़े मैनेजमेंट के आंकड़े धुल जाते हैं. समझदार हो तो आज ही विद्ड्रॉल की एप्लिकेशन दो. आधे घंटे का समय है—फैसला आपका है. सोच लो और मुझे बताओ," मुख्यमंत्री ने अपनी कलम उठाई और दूसरी फाइल की ओर देखने लगे. एमडी के लिए यह इशारा था कि उसे फौरन उठकर बाहर जाना है.

एमडी केबिन से बाहर निकला. उसके चेहरे पर वह चमक नहीं थी जो चार दिन पहले थी. बाहर वकील भट्ट उसका इंतजार कर रहा था. “मिस्टर भट्ट, बीस मिनट में क्लोजर एप्लीकेशन विद्ड्रॉल की एप्लीकेशन तैयार करके लेबर सेक्रेटरी को देनी है. भट्ट फौरन लेबर सेक्रेटरी के पीए के दफ्तर में घुसा. वहाँ क्लर्क को पटाया और दो लाइन की एप्लीकेशन टाइप करवा लाया. एमडी से हस्ताक्षर करवाकर एप्लीकेशन सीधे लेबर सेक्रेटरी को जाकर थमा दी.

लेबर सेक्रेटरी एमडी को आश्चर्य से देखने लगा. उसने एप्लीकेशन ले ली और बोला, “एमडी साहब साथ हैं, उन्हें लेकर यहाँ मेरे चैम्बर में बैठो मैं बीस मिनट में लौटता हूँ.

प्रिया अपने कंप्यूटर पर काम कर रही थी कि उसकी घड़ी वाइब्रेट हुई. शाम के छह बजे थे. उसने मोबाइल उठाया और ईसीआई की क्लोजर एप्लीकेशन की स्टेटस देखने लगी, अपडेट था— 'एप्लिकेशन विद्ड्रॉन बाई एप्लीकेंट'.

उसकी आँखों में आँसू आ गए. उसने कांपते हाथों से कुलकर्णी जी को फोन किया. "सर... फाइल क्लोज हो गई. उन्होंने विद्ड्रॉ कर लिया!"

कुलकर्णी जी ने लंबी सांस ली और मुस्कुराए. "अभी आधी जंग जीती है प्रिया. असली जंग कल सुबह शुरू होगी.”
... क्रमशः

मंगलवार, 5 मई 2026

सत्ता की चौखट

देहरी के पार, कड़ी - 44
सोमवार सुबह प्रिया समय पर अपने ऑफिस पहुँच गई. अपनी सीट पर पहुँचकर उसने लॉग इन किया. कुछ देर में टीम मीटिंग शुरू हुई और पाँच मिनट में खत्म हो गई. अब सभी को आज के अपने टास्क पता थे. वे काम पर जुट गए. कंप्यूटर स्क्रीन पर कोड्स की लाइनें दौड़ने लगीं. प्रिया का सारा ध्यान अपने काम पर था. दिमाग में कोई और चीज थी भी कहीं दूसरी तह में लॉक हो चुकी थी. तभी कलाई घड़ी ने वाइब्रेट किया. उसने देखा तो ठीक 12 बजे थे. यह अलार्म खुद उसी ने सेट कर रखे थे. जो सुबह सात बजे से आरंभ होकर रात ग्यारह तक हर घंटे वाइब्रेट करते थे. उसे कुर्सी पर बैठकर कंप्यूटर पर अपनी आँखें गड़ाए रखते हुए लगातार काम करना पड़ता था. जिसमें यह जरूरी था कि हर घंटे अपनी सीट से उठकर टहल ले. इससे शरीर की अकड़न दूर होती थी, आँखों को आराम मिलता था. वह दो घूँट पानी पीती थी. किसी साथी से बतियाती थी या मशीन पर जाकर अपने लिए कॉफी बना लाती थी और उसे पीते हुए कोई गीत गुनगुनाने लगती थी.

वह सीट से उठी, कूलर पर जाकर दो घूँट पानी पिया और अपने लिए एक कॉफी बनाकर वापस सीट पर पहुँचकर कॉफी की एक सिप ली. उसका ध्यान ईसीआई क्लोजर पर गया. उसने अपने मोबाइल से ट्रैक किया. फाइल अभी भी लॉ सेक्रेटरी के यहाँ थी, यह विभाग खुद मुख्यमंत्री देखते थे. उसने मैसेज टाइप किया: "फाइल अभी भी लॉ सेक्रेटरी के पास है." मैसेज पहले प्रशांत बाबू और उनके जरीए कुलकर्णी जी तक पहुँचा. उन्होंने फोन पर सीधे लॉ सेक्रेटरी से बात की. उसे समझाया कि फाइल को तुरंत क्लियर होना है. आज यह फाइल वापस श्रम मंत्रालय नहीं पहुँची तो फैक्ट्री की सारी लेबर कल सुबह मुख्यमंत्री के बंगले पर होगी. यह भी ध्यान रखना कि अक्टूबर में विधानसभा के चुनाव होने हैं. दो बजे प्रिया ने ट्रैक किया तो पता लगा कि फाइल श्रम मंत्रालय वापस जा चुकी है. कुलकर्णी जी को खबर मिली तो उन्होंने संतोष की साँस ली. अब उन्हें श्रम मंत्रालय से ही निपटना था. श्रम मंत्रालय में उन्होंने सीधे एएसएल से बात की जिसने प्रबंधक के क्लोजर एप्लीकेशन की सुनवाई की थी. उसने बताया कि वह अब इस मामले में कुछ नहीं कर सकता. अब फाइल उनके पास नहीं आनी थी. वे केवल फाइल के मूवमेंट को बता सकते हैं.

श्रम मंत्री लातूर जिले के निलंगा विधानसभा क्षेत्र से आता था और भाजपा विधायक था. यह क्षेत्र मुख्यतः कृषि पर निर्भर था. कुछ चीनी मिलें थीं और अधिकांश किसान गन्ना उगाते थे. वहाँ खेत मजदूर यूनियन का व्यापक प्रभाव था. वहाँ की दो चीनी मिलों में उनके फेडरेशन से संबद्ध यूनियनें थीं. उनका चीनी मिलों के मजदूरों की दूसरी यूनियनों के साथ मोर्चा बना हुआ था. कुलकर्णी जी जानते थे कि जरूरत पड़ने पर वहाँ से दबाव बनाया जा सकता है. लेकिन उसके पहले वे अंधेरी पूर्व के विधायक से बात करना चाहते थे. वह शिवसेना से था. उन्हें पता था कि भाजपा और शिवसेना के गठबंधन के बावजूद, चुनावी जमीन पर दोनों अपनी साख बचाने की होड़ में रहते हैं.

यूनियन के अध्यक्ष-सचिव और कारखाने के पाँच मजदूरों के साथ कुलकर्णी जी सात मई सुबह साढ़े आठ बजे ही अंधेरी पूर्व के विधायक महेश फड़के के निवास पर थे. पीए ने उन्हें बैठक में बैठाया. कुछ देर में विधायक बैठक में आ गए.

कुलकर्णी जी नमस्कार, कैसे आना हुआ?

“नमस्कार, विधायक साहब, बस ईसीआई का मामला है" कुलकर्णी जी ने मेज पर ईसीआई के मजदूरों की सूची रख दी, "इन साढ़े तीन सौ परिवारों में से ढाई सौ आपके विधानसभा क्षेत्र के वोटर हैं. अक्टूबर में चुनाव हैं. मालिक कारखाना बंद करना चाहते हैं. फाइल भाजपा के श्रम मंत्री की टेबल पर है. उसके एक दस्तखत से ये लोग सड़क पर आ गए, तो अंधेरी पूर्व की जनता यह नहीं पूछेगी कि गलती किसकी थी. वे बस यह देखेंगे कि उनकी अपनी पार्टी (शिवसेना) उन्हें बचा नहीं पाई." कुलकर्णी जी के टोन में चेतावनी थी.

“हाँ, मुझे याद है, कंपनी का एमडी आया था चार दिन पहले. लेबर मिनिस्टर को सिफारिश कराने के लिए कि मैं मिनिस्टर को कह दूँ कि कारखाना बंद होने से चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. चुनाव में बड़ा चंदा देने की बात भी कर रहा था. मैंने फटकार दिया उसको. ‘मेरे यहाँ बेरोजगारी फैलेगी, बदनामी मेरी और शिवसेना की होगी, फर्क तो पड़ेगा. मैं श्रम मंत्री को बंदी की परमिशन देने नहीं दूंगा.’ बहुत चिरौरी करता रहा. पर मैंने उसे विदा कर दिया, जाते-जाते बोलता था, फिर आएगा. पर कुलकर्णी जी आप चिन्ता ना करो. मैं अपने इलाके का मजदूर बेरोजगार नहीं होने दूंगा.” विधायक ने अपने अंदाज़ में कहा.

“फाइल लेबर सैक्रेटरी के पास है. लेबर मिनिस्टर मुंबई में नहीं है, कल लौटेगा. वह कहीं और बिज़ी हो जाएगा. लेकिन ग्यारह मई के पहले क्लोजर एप्लीकेशन निरस्त होने के आदेश पर साइन हो जाने चाहिए, वरना वक्त पर सूचना मैनेजमेंट को न मिलेगी और डीम्ड परमिशन हो जाएगी. मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे. आप और हम कुछ नहीं कर पाएंगे. बेरोजगार मजदूर क्या करता है, आपको पता है.”

“कुलकर्णी जी आप फिकर मत करो. कल आठ तारीख है. आप दस बजे इधर आ जाओ. अकेले नहीं, यूनियन के अध्यक्ष-मंत्री और दो-चार मजदूर भी होने चाहिए. आपके साथ चलूंगा लेबर मिनिस्टर के उधर. मेरी नहीं सुनी, वहाँ से सीधे मातोश्री चलेंगे. लेबर मिनिस्टर को क्लोजर एप्लीकेशन खारिज करके ऑर्डर 10 तारीख को भेजना ही पड़ेगा. अब तीन दिन मेरा-आपका यही काम है.”

विधायक निवास से बाहर आए तो यूनियन के अध्यक्ष-मंत्री और मजदूर खुश थे. कुलकर्णी जी ने कहा “अभी खुश होने की जरूरत नहीं है. शिंदे साहब आप मेरे साथ यूनियन ऑफिस दादर चल रहे हैं. हम वहाँ चलकर श्रम मंत्री के इलाके से ही उसे संदेश देने का काम करेंगे.”
... क्रमशः

सोमवार, 4 मई 2026

उमंग

देहरी के पार, कड़ी - 43
कॉमरेड कुलकर्णी के साथ हुई रणनीतिक बैठक के बाद प्रिया, स्नेहा और राहुल 'मेवाड़ भोजनालय' (MB) पहुँचे. वहाँ चल रहे एयर कंडीशनर ने उन्हें राहत दी, तो ऐसा लगा. उनमें से किसी को मुंबई में रहते हुए भी अभी यहाँ की उमस भरी गर्मी की आदत नहीं हुई थी. सबके फ्लैटों में एयर कंडीशनर थे और कंपनी के दफ्तर में तो थे ही. कुछ ही देर में प्रशांत बाबू भी वहाँ पहुँच गए. दिन भर की मानसिक थकान और ईसीआई फैक्ट्री के मजदूरों के उलझे मामले के तनाव के बीच, यह रात का भोजन एक जरूरी विराम था.

कुछ ही देर में मेज पर गरमा-गरम खाना लग गया. राहुल अभी भी 'ट्रक सिस्टम' और मजदूरों के मुआवजे के गणित में उलझा हुआ था, जबकि स्नेहा उन मजदूरों की औरतों और बच्चों के चेहरों को याद कर रही थी. तभी प्रिया का फोन मेज पर वाइब्रेट हुआ. स्क्रीन पर 'आकाश' का नाम चमकते ही प्रिया के चेहरे पर एक थकी हुई सी मुस्कान आ गई. उसने मेज से थोड़ी दूरी बनाकर फोन उठाया.

"हेलो आकाश! इतनी रात को कैसे याद किया? सब खैरियत तो है?" प्रिया ने स्वर को हल्का रखने की कोशिश की.

"प्रिया! बड़ी खुशखबरी है," आकाश की आवाज़ में वह उत्साह था जो अक्सर जयपुर की शांत गलियों में सुनाई देता था. "मैंने जिन बड़ी कंपनियों में आवेदन किया था, उनमें से एक का आज फाइनल कन्फर्मेशन आ गया है. पैकेज में सीधे १० लाख का अपग्रेड है, और कंपनी भी बहुत प्रतिष्ठित है."

प्रिया का दिल खुशी से भर गया. वह जानती थी कि आकाश पिछले काफी समय से इस स्विच के लिए मेहनत कर रहा था. "वाह आकाश! यह तो वाकई शानदार खबर है. मुझे पता था तुम कर लोगे. जयपुर में अंकल-आंटी और तान्या तो बहुत खुश होंगे!"

"हाँ, वे खुश तो बहुत हैं," आकाश थोड़ा रुका, फिर स्वर बदलते हुए बोला, "लेकिन एक पेंच है. यह वर्क-फ्रॉम-होम वाला मामला अब खत्म हो रहा है. उन्होंने साफ़ कर दिया है कि मुझे मुंबई आना होगा, और वहीं रह कर काम करना होगा. यानी अब अगले महीने से हम एक ही शहर में होंगे."

प्रिया के लिए यह खबर किसी सपने जैसी थी. मुंबई जैसे अजनबी और संघर्षों से भरे शहर में, जहाँ वह अनायास ही औद्योगिक मजदूरों की लड़ाई में सहयात्री हो गयी थी, आकाश का पास होना उसे एक बहुत बड़ा मानसिक संबल (Support) देने वाला था. लेकिन जैसे ही उसकी तार्किक सोच ने जयपुर के घर की तस्वीर बनाई, उसकी खुशी पर चिंताओं की एक परत चढ़ गई.

"आकाश, करियर के हिसाब से यह बहुत बड़ी छलांग है, और तुम्हारा मुंबई आना मेरे लिए भी बहुत खुशी की बात है. लेकिन..." प्रिया की आवाज़ गंभीर हो गई, "तुमने जयपुर वाले घर के बारे में सोचा है? अब तक तुम वहां साथ थे, तो मम्मी-पापा की सेहत और घर की सारी व्यवस्था संभली हुई थी. तुम्हारे मुंबई आ जाने के बाद वे वहां बिल्कुल अकेले रह जाएंगे."

“हाँ यह तो है. मम्मी, पापा और तान्या के लिए उदासी की बात है कि मैं अब जयपुर में नहीं रहूंगा और उनका यहाँ मुंबई आना किसी तरह संभव नहीं.” आकाश ने कहा.

प्रिया ने आगे कहा, "तान्या जयपुर में ही पढ़ रही है, यह ठीक है. लेकिन वह अभी भी अपनी पढ़ाई और करियर के शुरुआती दबाव में है. अंकल-आंटी अब बुजुर्ग हो रहे हैं. अगर तुम वहां से निकल आए, तो घर और माता-पिता की रोजमर्रा की देखरेख का पूरा बोझ अकेले तान्या के कंधों पर आ जाएगा. क्या उसने इस बारे में कुछ कहा?"

आकाश दूसरी तरफ खामोश रहा. शायद वह भी इसी द्वंद्व से जूझ रहा था. "तान्या कह तो रही है कि वह सब संभाल लेगी, लेकिन मुझे पता है कि उसके लिए यह आसान नहीं होगा. मम्मी-पापा भी चाहते हैं कि मैं इस अवसर को न छोड़ूँ, पर उनके चेहरों पर वह अनकहा डर मैंने महसूस किया है प्रिया."

“अच्छा आकाश मैं अपने साथियों के साथ रेस्टोरेंट में डिनर पर हूँ, मैं रखती हूँ, फिर कल बात करते हैं. बाय¡”

“बाय.” उधर से आकाश का उत्तर आया तो प्रिया ने फोन काट दिया.

प्रिया को चकाला की उन तंग गलियों के मजदूर परिवार याद आए. वहाँ भी समस्या 'आजादी' और 'जिम्मेदारी' के बीच की ही थी. यहाँ आकाश के पास पैसा और करियर था, लेकिन कीमत थी 'पारिवारिक स्थिरता'.

फोन बंद कर जब प्रिया वापस मेज पर लौटी, तो प्रशांत बाबू ने उसकी आँखों में वह चमक और चिंता का मिश्रण भांप लिया. "प्रिया, सब ठीक है? घर से कोई खबर?"

प्रिया ने लंबी सांस ली और पनीर का एक टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, "जी सर, सब ठीक है. बस एक दोस्त मुंबई शिफ्ट हो रहा है. करियर में बहुत बड़ी तरक्की हुई है उसकी, लेकिन उसे पाने के लिए उसे जयपुर का अपना सुरक्षित घर और बुजुर्ग माता-पिता और छोटी बहिन को छोड़कर आना होगा."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तो मुंबई की रीत है प्रिया. यह शहर कुछ देने से पहले बहुत कुछ मांगता है. मजदूरों से उनका पसीना और सुकून मांग रहा है, तो किसी नौजवान से उसका घर. लेकिन बेहतर जीवन के लिए यह संघर्ष ही इंसान को माँजता है."

डिनर के बाद जब प्रिया एमबी से बाहर निकली, तो मुम्बई की रात की हवा नमी भरी ठंडी हवा में उसे अपने मन में एक अजीब सी उमंग महसूस हो रही थी. आकाश का मुंबई आना उसके लिए एक 'संबल' था, लेकिन तान्या और उसके माता-पिता की चिंता एक 'संशय' थी.

उसे अहसास हुआ कि 11 मई की देहरी सिर्फ मजदूरों के लिए नहीं, बल्कि उसके निजी जीवन के लिए भी एक बड़ा मोड़ साबित होने वाली थी. एक तरफ 350 परिवारों की 'न्याय और मुक्ति' की लड़ाई थी, और दूसरी तरफ वह सोच रही थी कि आकाश का मुंबई आना क्या उनके आपसी संबंधों में एक नई शुरुआत हो सकता है.

प्रिया ने मुंबई की रोशनियों को देखा. वह सोच रही थी, “ईएसआई के मजदूरों की इस लड़ाई में आगे उसकी भूमिका क्या होगी और आकाश के आने से उसके आने वाले जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
... क्रमशः

रविवार, 3 मई 2026

रणनीति

देहरी के पार, कड़ी - 42
अंधेरी स्थित आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर के दोनों सीलिंग फैन चल रहे थे उसके बावजूद उमस से किसी तरह की राहत नहीं मिल पा रही थी. ऐसा लगता था कि कभी भी बारिश आ जाएगी. दफ्तर का माहौल भी आज कुछ अधिक अनुशासन में था. आज यहाँ ईसीआई यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक में ट्रेड यूनियनों के अखिल भारतीय केंद्र (AICCTU) के महाराष्ट्र स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी मौजूद थे—गहरा सांवला रंग, खादी का सफेद कुर्ता और आँखों पर मोटा चश्मा. उनके बगल में प्रशांत बाबू और शिंदे साहब थे. दूसरी तरफ प्रिया, स्नेहा और राहुल, भी बैठे थे.

प्रशांत बाबू ने मीटिंग की औपचारिक शुरुआत करते हुए कॉमरेड कुलकर्णी को बताया कि ईसीआई फैक्ट्री के क्लोजर परमिशन की फाइल को लेबर सेक्रेटरी ने 'लॉ डिपार्टमेंट' को भेज दी है और वहाँ पैंडिंग है.

"कुलकर्णी जी, स्थिति नाजुक है. एएसएल के यहाँ सुनवाई के दौरान हमने कोई कसर नहीं रखी. हमें पूरा विश्वास है कि सरकार ने मेरिट पर फैसला किया तो मैनेजमेंट का आवेदन निरस्त होगा, लेकिन उसका 14 मई के पहले सरकार का आदेश पारित करना और मैनेजमेंट तक पहुँचना आवश्यक है." प्रशांत बाबू का स्वर गंभीर था. "अगर ११ मई तक फाइल कानून मंत्रालय से बाहर नहीं आती तो यह सब होना मुमकिन नहीं होगा और 15 मई को सुबह ईसीआई के सभी मजदूर बेरोजगार होंगे. मैनेजमेंट पूरी जुगत में है कि फाइल 'लॉ डिपार्टमेंट' में अटकी रहे."

कुलकर्णी जी ने मेज पर रखे पानी के गिलास को हाथ लगाया, फिर बिना उठाए छोड़ दिया. "मैनेजमेंट चाहता है कि हम आखिरी वक्त में घुटने टेक दें. उनके वकील भट्ट ने जो लीगल क्वेरी (कानूनी सवाल) खड़ी की है, वह सिर्फ समय काटने का तरीका है. वे जानते हैं कि एक बार 'डीम्ड क्लोजर' मिल गया, तो फिर हम कोर्ट-दर-कोर्ट भटकते रहेंगे और मजदूर सड़क पर होंगे."

तभी प्रिया ने धीरे से अपनी डायरी खोली. "सर, मैं कुछ साझा करना चाहती हूँ. मैं और मेरे दोनों साथी आईआईडीईए की नए सदस्य हैं. हम इस हड़ताल और मुकदमे के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते रहे हैं. हम पिछले दो दिनों से इस फैक्ट्री के मजदूरों के घरों में गए हैं और जानने की कोशिश की है कि मजदूरों के परिवार के सदस्य क्या सोचते हैं, हम यूनियन के सेक्रेटरी शिंदे साहब के घर भी होकर ए हैं."


सेक्रेटरी शिंदे सुनकर चौंक गए और उत्सुकता से प्रिया की ओर देखने लगे. प्रिया ने गहरी सांस ली, "सर, एक चौंकाने वाला सच यह है कि मजदूर और उनके परिवार के सदस्य फैक्ट्री का क्लोजर होने से बिलकुल नहीं डरते हैं. लेकिन वे उस 'अनिश्चितता' से डरे हुए हैं जिसमें वे पिछले दस साल से जी रहे हैं. मैंने सावित्री अम्मा और बिठ्ठल भाई जैसे लोगों से बात की. उनका कहना है कि ईसीआई की यह नौकरी अब उनकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन गई है. वे 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों से आज़ाद होना चाहते हैं."

कमरे में सन्नाटा छा गया. शिंदे साहब, जो खुद उसी फैक्ट्री के मजदूर थे, थोड़े असहज हुए. "प्रिया बेटा, हम और हमारा परिवार के बीच सोच एक अलग बात है लेकिन एक यूनियन के लिए मजदूरों की 'नौकरी अचानक चले जाना या छोड़ देना' इतना आसान नहीं होता. हमारा अस्तित्व ही नौकरी बचाने से जुड़ा है. अगर हम क्लोजर मान लेते हैं, तो क्या यह मैनेजमेंट की जीत नहीं होगी?"

यही वह बिंदु था जहाँ एक पुरानी विचारधारा और नई वास्तविकता टकरा रही थी.

राहुल ने बीच में हस्तक्षेप किया, "शिंदे साहब, जीत इसमें नहीं है कि हम एक डूबते हुए जहाज पर सवार रहें. जीत इसमें है कि डूबने से पहले हम मजदूरों को उनकी मेहनत का पूरा हिसाब दिलाकर उन्हें किनारे पर उतार दें. वे लोग बाहर जाकर कोई नई नौकरी तलाश कर सकते हैं या फिर छोटा-मोटा काम करके आज की तुलना में ज्यादा सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं. हमने देखा है कि उनके घरों में हुनर की कमी नहीं है, बस उनके पास नहीं है तो अपने हुनर और मेहनत का उपयोग करने के लिए संसाधन नहीं हैं."

कॉमरेड कुलकर्णी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और अपनी उँगलियों से माथा सहलाने लगे. "प्रिया का विश्लेषण चौंकाने वाला है, लेकिन इसमें एक कड़वी सच्चाई है. दुनिया ने हमेशा मजदूरों को 'मजदूर' के रूप में देखा, लेकिन वे भी 'इंसान' हैं और उसी रूप में अपनी पहचान और आज़ादी चाहते हैं. अगर वे खुद ट्रक सिस्टम जैसी गुलामी को और ढोना नहीं चाहते, तो हम उन पर अपनी पुरानी लड़ाई थोप नहीं सकते. जहाँ तक मुझे ईसीआई फैक्ट्री में मजदूरों की हड़ताल के आरंभ में सूचना दी गयी थी, उसके मुताबिक सारे मजदूर फैक्ट्री के बंद होने और नौकरी चले जाने का खतरा उठाते हुए ही हड़ताल पर गए थे."

कुलकर्णी की इस बात के बाद मीटिंग में लंबी बहस चली. सबने अपने-अपने विचार रखे कानूनी पहलुओं को खंगाला गया. प्रश्न यह था कि अगर यूनियन क्लोजर का विरोध करना छोड़ देती है, तो मैनेजमेंट के पास मोलभाव करने की क्या वजह बचेगी?

प्रिया ने अपना पक्ष मजबूती से रखा, "सर, हम क्लोजर का विरोध न करें, ऐसा मैंने नहीं कहा. मैं कह रही हूँ कि हमारी शर्तों को बदल दिया जाए. हम सरकार से कहें कि क्लोजर की अनुमति तभी मिले जब मैनेजमेंट हर मजदूर को पिछले दस साल से 'ट्रक सिस्टम' के अवैध उपयोग से किए गए शोषण का मुआवजा, बकाया ग्रेच्युटी और एक 'विशेष एक्जिट पैकेज' दे. हमें 'नौकरी' के बदले 'न्याय और मुक्ति' को अपना मुख्य मुद्दा बनाना होगा."

कुलकर्णी जी ने मेज थपथपाई. "यही रास्ता है! अगर हम मैनेजमेंट को इस बात पर मजबूर कर दें कि क्लोजर उनके लिए 'सस्ता' नहीं बल्कि 'बहुत महंगा' सौदा साबित होगा, तो वे खुद बातचीत की मेज पर आएंगे. हमें सरकार को यह बताना होगा कि यह सिर्फ एक फैक्ट्री बंद होने का मामला नहीं है, बल्कि दस साल से चल रहे एक अवैध श्रम-प्रथा (ट्रक सिस्टम) के निपटारे का मामला है. लेकिन अभी हमारे सिर पर क्लोजर परमिशन की तलवार लटकी हुई है, इसके लिए सीधे श्रम मंत्री से मिलकर उसे समझाना होगा. हो सकता है हमें, श्रम मंत्री के बंगले के सामने धरना प्रदर्शन भी करना पड़े."

अगले दो घंटों में रणनीति को अंतिम रूप दिया गया. निर्णय लिया गया कि कल सोमवार, 6 मई को यूनियन मंत्रालय को एक ऐसा 'अल्टीमेटम' देगी जो अब तक के उनके रुख से बिल्कुल अलग होगा.

यूनियन सरकार से मांग करेगी कि ईसीआई की क्लोजर की परमिशन वाले आवेदन को तुरंत निरस्त किया जाए. यदि फैक्ट्री के मालिक क्लोजर चाहते हैं तो यूनियन के साथ समझौते के माध्यम से ही संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं. लेबर कमिश्नर खुद मजदूरों के बीच जाकर उनके 'ट्रक सिस्टम' के दावों की जांच करें और रिपोर्ट सरकार को दें. यदि 8 मई तक ठोस जवाब नहीं मिलता, तो 11 मई को श्रम मंत्री के निवास पर प्रदर्शन और घेराव होगा.

कुलकर्णी जी ने कहा कि, “मैं व्यक्तिगत रूप से प्रयास करूंगा कि श्रम मंत्री 6 या 7 मई को मिलने का समय दें.”

मीटिंग खत्म हुई, तो रात के साढ़े आठ बज रहे थे. कुलकर्णी जी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा. "प्रिया, तुमने आज हमारी लड़ाई का रूप बदल दिया है, जो अधिक मानवीय है. लेकिन याद रखना, जो रास्ता हमने अब चुना है वह काँटों भरा है. मैनेजमेंट और लॉ डिपार्टमेंट अब और भी शातिराना चालें चलेंगे."

प्रिया ने अपनी डायरी बैग में रखी. "सर, 6 दिन बचे हैं. 11 मई तक हमें कुछ न कुछ हासिल करना होगा.
... क्रमशः

शनिवार, 2 मई 2026

बेड़ियाँ

देहरी के पार, कड़ी - 41
मई के महीने की तपिश और समंदर से उठती नमी से भरपूर हवा से वातावरण भारी था. पसीना किसी तरह रुकता नहीं था. शनिवार की सुबह, जब ज्यादातर मुंबईकर वीकेंड की सुस्ती में डूबे थे, प्रिया अंधेरी (पूर्व) के चकाला इलाके की एक तंग गली के मुहाने पर खड़ी थी. राहुल और स्नेहा भी उसके साथ थे.

दो मई को दोपहर बाद ही असिस्टेंट सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से कार्यवाही समाप्त हुई थी. उसी दिन उसे सेक्रेटरी को रिपोर्ट देनी थी लेकिन तीन मई की दोपहर ट्रैकिंग से पता लगा कि रिपोर्ट सुबह सेक्रेटरी को मिली थी और शाम को यह जानकारी कि फाइल को सेक्रेटरी ने राय देने के लिए लॉ सेक्रेटरी को भेज दिया है. अगले दो दिन अवकाश होने के कारण फाइल को वहीं रहना था, जिससे ट्रैकिंग से कुछ हासिल नहीं हो सकता था.

प्रिया को ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष के बीच हमेशा यह लगा कि जब वे फैक्ट्री में या संघर्ष के दौरान साथ रहते हैं तो नौकरी या फैक्ट्री के बंद होने के संबंध में उनका विचार लगभग एक जैसा रहता है. लेकिन इनके परिवार के लोग क्या सोचते हैं? और परिवार के बीच रहकर खुद मजदूर क्या सोचते हैं? इसे अवश्य जानना चाहिए. उसने अपना यह विचार अपने शेष तीनों साथियों के सामने रखा कि क्यों न इस वीकेंड पर इन मजदूरों के परिवारों के बीच जाया जाए. क्योंकि जब तक वह उन ३५० परिवारों के चूल्हों की आग और उनके संघर्ष की नमी को महसूस न किया जाए तब तक इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता कि आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

आदित्य का कार्यक्रम इस वीकेंड पर अपने किसी मित्र से मिलने पुणे जाने का था. स्नेहा फौरन इस काम के लिए तैयार हो गई. राहुल पहले तो आने में हिचकिचा रहा था, उसे चकाला और जे.बी. नगर की तंग गलियों में धूल फाँकने के विचार में कोई औचित्य नजर नहीं आता था. लेकिन प्रिया ने जब कहा कि, “औचित्य का पता तो वहीं जाकर लगेगा. हम शनिवार को चलते हैं, यदि हमें लगेगा कि यह औचित्यहीन है तो रविवार नहीं चलेंगे.” यह सुनने के बाद वह अनमने तरीके से ही सही पर तैयार हो गया था और अब साथ था.

जैसे-जैसे वे गलियों के भीतर बढ़े, शहर का शोर पीछे छूटता गया और एक अलग ही दुनिया सामने आई. यहाँ घर एक-दूसरे से सटे हुए थे, मानों एक-दूसरे का सहारा लेकर खड़े हों. उनके पास यूनियन सेक्रेटरी शिंदे का पता था. वे तलाश करके सबसे पहले वहाँ पहुँचे. दो कमरे, एक छोटी सी रसोई, एक टॉयलेट और एक कॉमन हॉल. हॉल में ही एक कोने में रखी मशीन पर शिंदे की पत्नी सावित्री कपड़े सिल रही थीं. मशीन की 'पच-पच' की आवाज़ हवा में एक लय पैदा कर रही थी. प्रिया को देखते ही वे मुस्कुराईं. उन्होंने मशीन रोक दी. उनसे पास ही रखे चीड़ की लकड़ी के ढाँचे पर बने स्प्रिंग वाले पुराने सोफे पर बैठने को कहा. राहुल के उस पर बैठते ही वह करीब आठ इंच अंदर बैठ गया. प्रिया और स्नेहा बहुत सावधानी से उस पर बैठे.

“दीदी, मैं दो तीन साल से शिंदे साहब से कह रही हूँ कि इसे ठीक करा लें. लेकिन वे कहते हैं बोनस मिलेगा तो नया ले लेंगे. जब बोनस आता है तो और दूसरे जरूरी खर्चे निकल आते हैं.” सावित्री जी ने कहा. उन्होंने बताया कि “शिंदे साहब की तो सुबह की शिफ्ट थी वे सुबह सवा पाँच बजे ही निकल गए थे. आप आईं, बहुत अच्छा लगा," सावित्री जी ने कहा. उनके हाथों की फुर्ती बता रही थी कि वे सिर्फ एक गृहिणी नहीं, बल्कि घर की आर्थिक रीढ़ भी हैं.

प्रिया ने देखा कि पास ही में एक 12-13 साल का लड़का, जिसे शिंदे का पोता 'छोटू' बताया गया, स्कूल का बस्ता एक तरफ रखकर कुछ पुराने रेडियो और बिजली के बोर्ड खोलकर बैठा था. राहुल ने उत्सुकता से पूछा, "बेटा, ये क्या कर रहे हो?"

छोटू ने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, " स्कूल से आने के बाद बिजली वाले चाचा की दुकान पर बैठता हूँ. तार जोड़ना और सोल्डरिंग करना सीख रहा हूँ. अगले साल तक मैं खुद के छोटे-मोटे काम करना सीख जाऊंगा.”

प्रिया के मन में एक टीस उठी. ये बच्चे बचपन से ही जानते हैं कि ज़िंदगी की लड़ाई उन्हें जल्दी शुरू करनी है. सावित्री जी ने चाय के प्याले बढ़ाते हुए कहा, "बेटा, ईसीआई की नौकरी ने हमें सिर्फ अनिश्चितता दी है. पिछले दस साल से उस 'ट्रक सिस्टम' ने उनको आधा कर दिया है. हफ़्ते के छहों दिन काम मिलता है, बस इसी लालच में वे वहां बंधे रहे. पर अब हम सब चाहते हैं कि बस बहुत हुआ."

डेढ़ बजे तक प्रिया और उसके साथी पाँच-छह घरों में जा चुके थे. स्नेहा, जो आमतौर पर काफी चुलबुली रहती थी, खामोशी से डायरी में कुछ नोट कर रही थी.

तीनों ने पास ही एक रेस्टोरेंट में दोपहर का लंच किया और फिर से बस्ती में घुस गए. एक घर में वे बिठ्ठल भाई से मिले, जो ईसीआई में करीब 15 साल से थे. उनके पैर में चोट थी, फिर भी वे एक कोने में बैठकर प्लास्टिक के कुछ खिलौने जोड़ रहे थे. बिठ्ठल भाई की राय ने प्रिया को चौंका दिया. उन्होंने कहा, "दीदी, सब कहते हैं कि यूनियन नौकरी बचाने के लिए लड़ती है. पर हम? हम इस नौकरी से 'मुक्ति' चाहते हैं. ईसीआई अब कारखाना नहीं, एक ऐसी जेल है जिसका जेलर हमें न मारता है, न जीने देता है. हमें बस हमारा हिसाब ठीक-ठीक मिल जाए, हम अपनी मेहनत से कहीं भी पेट पाल लेंगे."

प्रिया ने महसूस किया कि ये मजदूर हार नहीं मान रहे थे, बल्कि वे एक ऐसी आज़ादी माँग रहे थे जहाँ उनके पसीने की कीमत तय हो, न कि कोई प्रबंधन उन्हें 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों में जकड़े रखे.

अगले दिन, रविवार सुबह भी तीनों अपनी इस 'जाँच' में जुटे रहे. अपने-अपने घरों को लौटने के पहले उन्होंने बाहर ही लंच किया. तीनों का मन विचारों से भरा हुआ था. खाना खाते समय प्रिया के फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. यह विक्रांत के किसी पुराने व्यावसायिक सहयोगी का सोशल मीडिया पोस्ट था. फोटो में विक्रांत एक आलीशान रेस्टोरेंट में कुछ लोगों के साथ बैठा था. चेहरे पर वही पुराना अहंकार वापस लौट रहा था.

प्रिया ने नोटिफिकेशन देखकर भी अनदेखा कर दिया. विक्रांत अब उसके लिए एक 'अदृश्य साया' था, जिससे वह डरती नहीं थी, पर सावधान जरूर थी. उसे पता था कि विक्रांत अपनी खोई हुई साख पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. लेकिन चकाला की उन गलियों में मिले अनुभवों ने उसे एक अलग ही सुरक्षा कवच दे दिया था.

शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया, "प्रिया, शाम छह बजे IIDEA ऑफिस में यूनियन की मीटिंग है उसमें एआईसीसीटीयू के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी भी होंगे. मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार होगा. तुम आ सको तो बेहतर होगा."

उसने तय किया कि वह इस मीटिंग में अवश्य जाएगी. दो दिनों में उसने जो कुछ मजदूरों के परिवारों से मिलकर जाना है, उसे सभी को बताया जाना आवश्यक है.
... क्रमशः

शुक्रवार, 1 मई 2026

अंदेशा

देहरी के पार, कड़ी - 40
प्रशांत बाबू और रामजी काका से दिन में हुई बहस का हाल जानने के बाद प्रिया डिनर के बाद ही घर लौट सकी. उसने कपड़े बदले ही थे कि फोन घनघना उठा. कोटा से मयंक था.

“हेलो मयंक कैसे हो? मम्मा और पापा कैसे हैं?”

“दीदी, फोन मैंने किया, तो पहले मुझे बोलने दो. मैं बोलता उसके पहले तीन सवाल दाग दिए आपने.”

“सॉरी मयंक, मैं पिछले दिनों बहुत व्यस्त रही, फोन नहीं कर सकी. आज ही कुछ फुरसत है तो फोन करने वाली ही थी कि तुम्हारा फोन आ गया, मैं खुद को रोक नहीं पाई.”

“रहने दो दीदी, असल बात तो ये है कि आप हमें भूल गई हैं. और वहाँ पता नहीं क्या-क्या करती रहती हैं. आकाश भाई ने सब बता दिया है मुझे. ....अच्छा अब सुनो, सबसे ताजा समाचार यह है कि हमारे भूतपूर्व होने वाले जीजाजी ‘श्रीमान विक्रांत जी’ की जमानत अर्जी आज मुम्बई हाईकोर्ट ने मंजूर कर ली है, एक दो दिन में आदेश निचली अदालत को पहुँचेगा और जमानत पेश करने पर वे छूट जाएंगे. वैसे तो आपने उनकी हुलिया बढ़िया कर दिया है इसलिए उनकी हिम्मत नहीं होगी, फिर भी अंदेशा तो बना रहेगा. सावधान रहने में बुराई क्या है?” मयंक ने बात परिहास से आरंभ की थी और गंभीरता से समाप्त की.”

“तू मेरी चिन्ता मत कर, यह मुम्बई है. इस महानगर में विक्रांत की हैसियत किसी गली के गुंडे बराबर भी नहीं है. फिर यहाँ मेरा साथ देने वाले बहुत हैं, मैं पूरी तरह सुरक्षित हूँ. तू बता, मम्मा-पापा कैसे हैं? पापा बिलकुल ठीक हैं, बिजनेस को पूरे जोर शोर से संभाल लिया है. मुझे अपनी पढ़ाई और आवारागर्दी के लिए पूरी छूट मिल गई है. माँ तुम्हारे ले दुखी रहती हैं. उनकी इच्छा होती है कि वे आपसे रोज बात करें. वे मेरे पास ही हैं, उन्हें फोन दे रहा हूँ.

“हेलो प्रिया, कैसी है बेटा? कितने दिन हुए तुझे मुझसे बात किए हुए? मुझे तेरी बहुत फिकर रहती है. तू रोज मुझसे बात किया कर, वरना मैं जल्दी ही बूढ़ी होकर चल दूंगी.” बात करते-करते मम्मा का स्वर रुआँसा हुआ तो प्रिया बोल पड़ी.

“माँ, तुम्हें पता है मैं कैसे घर से निकली, फिर कुछ दिन जयपुर रही. मुम्बई आई तो यहाँ भी विक्रांत ने मुझे चैन से न रहने दिया. वो तो मुझे ऐसे साथी मिल गए जिनकी वजह से वह कुछ नहीं कर सका और उसे जेल जाना पड़ा. उसके बाद जिन्होंने साथ दिया वे कुछ संकट में थे तो मुझे उनकी मदद करनी पड़ी.” आज ही फुरसत मिली थी. मैं फोन करने वाली थी कि मयंक का फोन आ गया. प्रिया ने माँ को समझाने की कोशिश की.”

“मैं जानती हूँ बेटा, तू काम में व्यस्त ही रही होगी. पर माँ का मन नहीं मानता. बस आज से नियम बना ले, रात को जब भी तूझे फुरसत मिले तू मुझे फोन जरूर करेगी.”

“हाँ माँ, आज से मैं रोज आपको फोन करूंगी.”

“और सुना है विक्रांत छूटने वाला है, तू सावधान रहना. यहाँ तो तेरे पापा अब वापस बिजनेस और समाज में सक्रिय हो गए हैं तो यहाँ उसकी हिम्मत नहीं पड़ेगी.”

“माँ, यहाँ भी उसकी जो दुर्गत हुई है वह हिम्मत नहीं करेगा. और कुछ करने की कोशिश की तो इस बार और अधिक मुहँ की खाएगा. अच्छा माँ, आप अपना खयाल रखना. मैं रखती हूँ.”

प्रिया फोन बंद करने के बाद सोच में पड़ गई कि विक्रांत आखिर छूटने के बाद क्या करेगा? निश्चय ही वह पहले अपने बिजनेस को संभालेगा. खैर, वह कल सुबह प्रशांत बाबू को कहेगी. विक्रांत के ऑफिस के इलाके में कुछ लोग तो यूनियन के जरूर होंगे, उसकी गतिविधियों की जानकारी मिल जाएगी.

प्रिया ने सुबह ऑफिस के लिए निकलने के पहले दस बजे प्रशांत बाबू को फोन किया और विक्रांत की जमानत की खबर दी.

“प्रिया, जिस तरह हमने उसे दबोच कर पुलिस के हवाले किया था. उसकी अब तुम्हारी तरफ नजर उठाने की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी. फिर भी मैं उसके दफ्तर के इलाके में रहने वाले लोगों को कह दूंगा. वे विक्रांत की गतिविधियों पर नजर रखेंगे. कुछ खास होगा तो हमें सूचना दे देंगे. तुम चाहो तो चव्हाण साहब को बता सकती हो वे हाईकोर्ट में अपने असिस्टेंट को कह देंगे कि वह विक्रांत की जमानत की शर्तों का पता लगा कर बताए.”

“ठीक है, मैं चव्हाण साहब से बात करती हूँ. कल एएसएल ने लेबर सेक्रेटरी को अपनी रिपोर्ट दे दी होगी. आगे की गतिविधि की क्या खबर है?” उसने ईसीआई के क्लोजर वाले मामले में प्रशांत बाबू से पूछा.

“अभी तक कोई खबर नहीं है, एएसएल की रिपोर्ट गोपनीय है इसलिए उसकी कोई खबर नहीं है लेकिन महाराष्ट्र सरकार मार्च 2012 से ई-फाइलिंग सिस्टम का उपयोग कर रही है. एएसएल के यहाँ सुनवाई की प्रत्येक पेशी की ‘ऑर्डर शीट’ भी वेब पर उपलब्ध है. एएसएल ने अपनी रिपोर्ट को भी इलेक्ट्रोनिकली सेक्रेटरी को भेजा होगा. यदि ऐसा है तो फाइल मूवमेंट ट्रेस किया जा सकता है. तुम चाहो तो कोशिश कर सकती हो.”

“यह तो बहुत अच्छी बात है. जरूर मैं आज कोशिश करती हूँ कि क्या हुआ है, यदि एक मूवमेंट का पता लगा तो फिर हर मूवमेंट पर नजर रखी जा सकती है.” प्रिया ने कहा.

“आज शाम ईसीआई यूनियन के सेक्रेटरी शिन्दे और मेरी एआईसीसीटीयू (All India Central Council of Trade Unions) के स्टेट सेक्रेटरी से मीटिंग है. वे इस मामले में क्या सुझाते हैं. मैं तुम्हें बताऊंगा. अच्छा मैं फोन रखता हूँ, जरूरी कॉल आ रही है.”

प्रिया ने घड़ी देखी, सवा दस बज चुके थे. वह आज नियमित समय पर ठीक ग्यारह बजे ऑफिस पहुँच जाना चाहती थी. उसने फ्लैट से बाहर आकर दरवाजा लॉक किया और तेजी से लिफ्ट की ओर बढ़ गई. लिफ्ट में उसका ध्यान फिर ईसीआई के मजदूरों की ओर चला गया. उनका जीवन कितना संघर्षशील रहा है? प्रबंधन ने उन्हें कितने लंबे समय तक ट्रक सिस्टम में जकड़े रखा. वे उससे मुक्त होना चाहते थे, यहाँ तक कि उससे मुक्त होने के संघर्ष में उनकी नौकरी चली जाए तो वे उसके लिए तैयार थे. कम से कम उसके बाद वे किसी बेहतर काम की तलाश करने की संभावनाएँ तो उनके पास थीं. इस संघर्ष को शुरू करते ही उन पर क्लोजर की लड़ाई थोप दी गई. मजदूरों और उनकी यूनियन ने अब तक इस लड़ाई को बेहतरीन तरीके से लड़ा था. फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि अब कारखाने के मजदूर अपने जीवन और भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं. उसने तय किया कि इस पर वह प्रशांत बाबू से बात भी करेगी और जब भी संभव हुआ मजदूरों से भी बात करने की कोशिश करेगी.
... क्रमशः

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

लाल बस्ता

देहरी के पार, कड़ी - 39
प्रिया की आँख खुली तो खिड़की से बहुत तेज प्रकाश अंदर आ रहा था. उसने अचकचाकर घड़ी देखी तो उसे डिजिटल घड़ी के अंक ठीक से दिखाई नहीं दिए. उसकी आँखें पूरी खुल ही नहीं पा रही थीं. उसने अपनी आँखों की पुतलियों पर हल्के से उंगलियाँ चलाकर उन्हें साफ किया. फिर सिरहाने की टेबल पर रखा चश्मा आँखों पर चढ़ाया, तब अंक दिखे. घड़ी सवा आठ बजा रही थी. ऐसी गहरी नींद उसे बहुत दिनों बाद आई थी. रात को एक बार भी उसकी नींद नहीं टूटी थी. आठ घंटे से भी अधिक सो लेने के बाद भी उसे लगा कि कल की थकान अभी निकली नहीं है. उसकी इच्छा हुई कि फिर से सो जाए. लेकिन कुछ देर लेटे रहने के बाद उठी. अपने लिए चाय बनाकर पीने बैठी.

आज दो मई थी. एएसएल के यहाँ सुनवाई की अंतिम तारीख. रात एमबी में बातचीत के बीच प्रशांत बाबू ने बातचीत में कहा था, कल अधिक कुछ नहीं होना है. एएसएल दोनों पक्षों के तर्क सुनेगा और फिर घंटे-दो घंटे में या फिर तीन मई को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय भेज देगा जहाँ श्रम मंत्री से सलाह के बाद लेबर सेक्रेटरी अंतिम निर्णय लेगा. उसे लगा, उसका आज वहाँ कोई काम नहीं है, बेहतर है कि वह ऑफिस चली जाए.

उसने चव्हाण साहब को फोन करके पूछ लिया, उन्हें उसकी कोई जरूरत नहीं थी. उसने तय किया कि वह आज सुनवाई में न जाकर अपने ऑफिस जाएगी. शाम को ऑफिस समाप्त होने के बाद एमबी होते हुए अपने फ्लैट लौटेगी. वहाँ उसे पता चल ही जाएगा कि आज एएसएल के यहाँ क्या हुआ.

प्रिया ऑफिस से छूटी तो आठ बज चुके थे. वह सीधे एमबी पहुँची. प्रशांत बाबू अपनी खास टेबल पर बैठे आज का अखबार पढ़ रहे थे. वह उनके सामने की कुर्सी पर जा बैठी.


प्रिया को देखते ही प्रशांत बाबू ने अखबार मेज पर रख दिया और चश्मा उतारते हुए मुस्कुराए. "आओ प्रिया, आज तुम कोर्ट नहीं आईं तो इजलास थोड़ा शांत लग रहा था."

प्रिया ने कुर्सी खींचते हुए पूछा, "शांत? मुझे तो लगा था आज भट्ट साहब ने आसमान सिर पर उठा लिया होगा. क्या हुआ आज?"

इससे पहले कि प्रशांत बाबू कुछ कहते, रामजी काका तीन कप चाय लेकर वहाँ पहुँच गए. उनके चेहरे पर एक अजब सी चमक थी, जैसे कोई बड़ी जंग जीतकर लौटे हों.

"बिटिया, आज तुम नहीं आई तो तुमने बहुत बड़ा तमाशा छोड़ दिया!" रामजी ने चाय मेज पर रखते हुए चहक कर कहा. "आज तो चव्हाण साहब ने वो धोबी पछाड़ दी है कि भट्ट साहब के चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया था जैसे सरकारी दफ्तरों की पुरानी दीवारों का चूना गिरता है."

प्रशांत बाबू ने बीच में टोकते हुए कहा, "रामजी, थोड़ा तसल्ली से बताओ. प्रिया, मुख्य बात यह है कि एएसएल ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुना. भट्ट ने अपनी वही पुरानी राग अलापी कि कंपनी 'वेंटिलेटर' पर है और उसे बंद करना ही एकमात्र रास्ता है."

"हाँ! और फिर देखो तमाशा..." रामजी काका ने अपनी चाय का एक बड़ा घूँट भरा और हाथ नचाते हुए बोले, "भट्ट साहब कह रहे थे कि मैनेजमेंट बहुत 'उदार' है, मजदूरों को पैसा दे रहा है. तभी चव्हाण साहब अपनी जगह से ऐसे खड़े हुए जैसे कोई शेर झाड़ी से निकलता है. उन्होंने एएसएल से कहा— 'सर, ये उदारता नहीं, ये तो कसाई का दाना है जो बकरे को हलाल करने से पहले डाला जाता है.' यह सुनते ही जीएम साहब, जो भट्ट के पीछे बैठे थे, उनके चेहरे का रंग एकदम उड़ गया, वे बार-बार अपनी टाई ढीली करने लगे. इजलास में एसी और पंखा चलते रहने के बावजूद वे पसीने-पसीने हो गए. "

प्रिया और प्रशांत बाबू दोनों हंस पड़े. रामजी काका ने आगे मजे लेते हुए कहा, "और वो भट्ट साहब! बहस के बीच में बार-बार अपनी फाइलें ऐसे टटोल रहे थे जैसे कोई चोर जेब काटने के बाद खुद पीड़ित का बटुआ ढूंढने लगता है. जब चव्हाण साहब ने 'ट्रक सिस्टम' और डिफेंस सप्लाई की बात छेड़ी, तो भट्ट साहब का गला ही सूख गया. वे बार-बार पानी की खाली हो गई बोतल को हाथ लगाने लगे. एएसएल ने उन्हें देखा तो अपने ही चपरासी को भेज कर उनके लिए पानी मंगा दिया."

प्रशांत बाबू ने बात को आगे बढ़ाया, "मजाक अपनी जगह है प्रिया, पर कानूनी रूप से चव्हाण साहब ने आज बेहतरीन काम किया. उन्होंने साबित कर दिया कि क्लोजर 'बोनाफाइड' नहीं है. अंत में एएसएल ने बता दिया कि वे मंत्रालय जाकर अपनी रिपोर्ट आज ही तैयार कर रहे हैं."

"और वो लाल पोटली!" रामजी काका ने आँखों को बड़ा करते हुए कहा. "प्रिया बिटिया, तुमने देखा नहीं... जैसे ही बहस खत्म हुई, एएसएल के रीडर ने इस केस की भारी-भरकम फाइल को लाल सूती कपड़े के बस्ते में लपेटा और चपरासी से उसे साहब की गाड़ी में रखने को बोला. जीएम और भट्ट साहब उस लाल बस्ते को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके घर की चाबी कोई छीन कर ले जा रहा हो."

रामजी काका की आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी. उन्होंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "गाड़ी जब मंत्रालय की तरफ रवाना हुई, तो भट्ट साहब का चेहरा देखने लायक था. कल तक जो शेर बने घूम रहे थे, आज भीगी बिल्ली बने अपनी चमचमाती कार में दुबक कर निकल गए."

प्रिया ने चाय का प्याला हाथ में लिया. उसे अहसास हुआ कि भले ही वह आज कोर्ट में मौजूद नहीं थी, लेकिन रामजी काका के इस 'आँखों देखे हाल' ने उसे उस पूरी विधिक लड़ाई का अहसास करा दिया था.

उसने प्रशांत बाबू की तरफ देखा, "तो अब गेंद मंत्रालय के पाले में है?"

प्रशांत बाबू गंभीर हो गए, "हाँ, और मंत्रालय की इमारत में एएसएल के इजलास से बहुत अधिक पेच हैं. वहां फाइलें बोलती नहीं हैं, दबाई जाती हैं. हम 14 मई तक इंतजार करते नहीं रह सकते, हमें कुछ ऐसा करना होगा कि सरकार हर हालत में 11 मई तक ही अपना निर्णय दे दे क्योंकि उसे फैक्ट्री प्रबंधन को पहुँचाकर उसका सबूत भी रखना होगा. 13-14 को शनिवार-रविवार हैं, इन दिनों वीकेंड के नाम पर कुछ भी गड़बड़ की जा सकती है."
... क्रमशः