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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

परतें

पिंजरा और पंख-22
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
शांता निकेतन होस्टल के कमरा 106 में सुबह की धूप प्रवेश कर चुकी थी. शगुन ने अपना खादी का सादा हल्के भूरे रंग का कुर्ता, सफेद पायजामा पहना, सफेद दुपट्टा गले में डाला. किरण अपना कुर्ता प्रेस कर रही थी. "हमारे यहाँ तो खादी भी अलग होती है," उसने गर्व से कहा, "सुघड़ हाथों से काती हुई, एकदम महीन."

शगुन ने ध्यान से देखा. किरण के कपड़ों की खादी वाकई महीन थी. उसकी खुद के कपड़े बाजार की साधारण खादी के थे. प्रियंका की वर्दी और भी सादी थी, पर साफ-सुथरी. सीमा की वर्दी थोड़ी मोटी, जैसे टिकाऊपन ज्यादा मायने रखता हो.

"कल मंगलवार है," प्रियंका ने कैलेंडर देखते हुए कहा, "साप्ताहिक छुट्टी का दिन. कोई क्लास नहीं और ऊपर से मैस में स्पेशल डिश भी.”.


सीमा मुस्कुराई, "हमारे घर में भी मंगलवार को मीठा बनता है. यहाँ तो मैस में कल पूरी, सब्जी और खीर बनेंगी."

किरण ने उत्साह से कहा, "हाँ! मंगलवार को तो हमेशा विशेष भोजन होता है. सबसे अच्छे भोजन का दिन."

प्रियंका ने सिर हिलाया, "शाकाहारी, शुद्ध भोजन. अच्छा है."

शगुन ने सोचा, “सप्ताह में एक दिन की छुट्टी, पर मैस में विशेष भोजन. बनस्थली की अपनी लय. पर क्या इस ‘विशेष’ में भी सबके लिए एक जैसा ‘विशेष’ है?

भोजनशाला में नाश्ते के समय, सबका खाना एक जैसा था. दलिया और दूध. फातिमा, एक मुस्लिम लड़की जो अक्सर उनके साथ बैठती थी, ने धीरे से कहा, "हमारे यहाँ तो जुम्मे (शुक्रवार) का दिन खास होता है. पर यहाँ का मंगल भी अच्छा है."

"अच्छा है". शगुन ने शब्द पकड़े. पर क्या वास्तव में अच्छा है? क्या जो उसके लिए "विशेष" है, वह फातिमा के लिए भी उतना ही "विशेष" है?

दोपहर की कक्षा में, अंग्रेजी की मैडम ने एक कविता पढ़ी, "भारत की विविधता" पर. फिर चर्चा छिड़ गई.

"हमारे भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती है इसकी विविधता," मैडम ने कहा.

प्रियंका ने हाथ उठाया, "मैडम, पर विविधता में एकता भी तो होनी चाहिए. सबको एक सूत्र में बाँधने वाली कोई बात."

किरण बोली, "जैसे हम सब यहाँ खादी वस्त्रों में हैं."

सीमा चुप रही. शगुन ने देखा, वह कुछ कहना चाहती थी, पर शायद हिम्मत नहीं हुई.

फातिमा ने धीरे से कहा, "विविधता तभी सुंदर है जब सबको बराबर का सम्मान मिले."

प्रियंका ने फातिमा की ओर देखा. कोई प्रतिक्रिया नहीं. शगुन ने सोचा, क्या यह चुप्पी भी एक तरह की प्रतिक्रिया है?

शाम के भोजन का समय हुआ तो सब मैस की ओर चल पड़ीं. सीमा ने जाते समय अपनी अलमारी से एक डिब्बा निकाला और साथ ले लिये.

जब भोजन परस दिया गया तो. सीमा ने कहा, “मैं अचार साथ लायी हूँ, माँ के हाथ का बना. मेरी माँ बहुत टेस्टी अचार बनाती हैं. चखोगी तो उंगलियाँ चाटती रह जाओगी.” उसने चम्मच की मदद से डिब्बे से अचार निकाल कर अपनी प्लेट में रखा और डब्बा किरण की तरफ बढ़ा दिया.

किरण ने उत्साह से अपनी प्लेट में रखा और चख कर एक चटकारा लेकर कहा. "बहुत स्वादिष्ट है!" शगुन ने भी प्रशंसा की.

प्रियंका ने हाथ के इशारे से अचार के लिए इनकार कर दिया. "मैं तो अभी भरपेट खा चुकी हूँ," उसने कहा.

शगुन ने देखा, प्रियंका की आँखों में वही हिचक थी. ब्राह्मण लड़की. एससी परिवार का अचार. पारंपरिक दूरी.

सीमा ने भी देख लिया. उसने डिब्बा बंद कर दिया. "कोई बात नहीं," उसने कहा, पर आवाज़ में एक टूटन थी. और किसी की निगाह नहीं पड़ी, पर शगुन ने देख लिया था कि उसकी आँखों में पानी छलक आया था.

सब अपने कमरे में पहुँची. कुछ देर बाद, प्रियंका ने अपनी अलमारी से एक पैक निकाला, चॉकलेट हैं, भैया ने भिजवायी थीं. "चलो, यह खाते हैं," उसने कहा, और सबको बाँटने लगी.

सीमा ने हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया. "नहीं... मैं तो मीठा कम खाती हूँ," उसने कहा.

अब प्रियंका का चेहरा उदास हो गया. शगुन ने देखा, एक चक्र पूरा हो गया था. अचार और चॉकलेट के बीच. दो दुनियाओं के बीच.

रात को, जब सब सो चुके थे, शगुन ने अपनी निकाल कर टॉर्च जलाई और डायरी लिखने बैठी.

"आज समझा: बनस्थली हमें बाहर से एक जैसा बनाती है.

एक जैसे खादी वस्त्र. एक जैसा भोजन. एक जैसे नियम.

पर अन्दर...

अन्दर हम अलग-अलग हैं.

किरण में राजपूत का गर्व है.

प्रियंका में ब्राह्मण का अहंकार.

सीमा में छुआछूत का दंश.

फातिमा में अल्पसंख्यक की असुविधा है.

और मुझ में...?

एक वैश्य लड़की की उलझन है.

जो देख रही है कि वर्ण, जाति, धर्म...

ये रेखाएँ वस्त्रों के नीचे भी जीवित हैं.

आज प्रियंका की हिचक...

सीमा के आँसू...

फातिमा की कसक...

बताते हैं कि, एकरूपता का दावा...

एक भ्रम है.

हम सब यहाँ हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमि से.

हमारी एक जैसी किताबें, एक जैसे वस्त्र.

हमारे मन, वे फिर भी अलग हैं

अचार और चॉकलेट सिर्फ खाने का आदान-प्रदान नहीं

दो दुनियाओं का, दो सामाजिक वास्तविकताओं का मौन टकराव था.

किरण ने सीमा का अचार चखा.

प्रियंका ने नहीं चखा. दोनों सामाजिक रूप से ऊपर हैं

फिर ये अंतर क्यों?

सीमा ने प्रियंका की चॉकलेट क्यों नहीं ली?

अहं ने क्या अहं को जगाया

या केवल अपना सम्मान बचाया?

मैंने दोनों चखे,

पर क्या मैं दोनों की दुनियाओं को समझ पाई?

नहीं.
नियम हैं, और हम एक जैसे खादी वस्त्र पहन रहे हैं.

पर मन? वह तो नहीं बदला.

नियमों ने व्यवहार बदला,

संस्कार नहीं.

आज सीमा के आँसू कहते थे

लड़ाई सिर्फ पितृसत्ता से नहीं

इन अदृश्य दीवारों से भी है.

एक जैसे वस्त्र और भोजन

बन जाते हैं परतें

ढकते हैं भेदों को

हमें पहचानने होंगे ये भेद

और स्वीकारना होगा उन्हें.

मन मिलें और जुड़ें दृढ़ता से

पर कैसे?

शगुन ने डायरी बन्द की

बाहर ढका हुआ था

सब कुछ अंधकार से

सब कुछ था एकरूप

यह एकरूपता क्या कृत्रिम थी?

वह सोच रही थी.

फिर निद्रा ने उसे अपने आगोश में ले लिया

नए दिन में नयी ताजगी के लिए.

... क्रमशः





गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

नयी लड़ाई

पिंजरा और पंख-21
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
आयुष की आँखें खुलीं. सुबह के पाँच बजे थे. बोर्डिंग स्कूल की पीटी की घंटी अभी भी उसकी स्मृति में गूँजती थी. उसका शरीर उसी लय में साँस ले रहा था. उठो, सीधे खड़े हो जाओ. दौड़ने जाना है... नहीं दौड़ना नहीं, रिविजन के लिए बैठना है.

उसकी नजर अलमारी के फोटो फ्रेम पर पड़ी. बारहवीं क्लास का समूह चित्र. यूनिफॉर्म में, सिर ऊँचा—"उत्कृष्ट कैडेट". फिर नजर किताबों पर गई. हरेक पर छपा था: "IIT ASPIRANT - The Ultimate Guide to Excellence."

दो "उत्कृष्टताएँ". एक अतीत, दूसरा वर्तमान.

आयुष को प्रैक्टिकल रिकॉर्ड जमा करने आज स्कूल जाना था. "आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय" में नामांकन के पहले दिन ही स्पष्ट कर दिया गया था कि, “उसे प्रैक्टिकल के सिवा स्कूल नहीं आना है, उसकी उपस्थिति दर्ज कर ली जाएगी.”

स्कूल का प्रवेश द्वार कोचिंग की चकाचौंध से दूर था. बस एक फीका बोर्ड: "शिक्षा ही उन्नति है." पर अन्दर का दृश्य इस सिद्धान्त का मखौल उड़ा रहा था.

प्रिंसिपल के कार्यालय के बाहर भीड़ थी. एक शिक्षक चिल्ला रहा था: "जिसका प्रैक्टिकल नहीं हुआ, लैब में जाओ! दस बैच और हैं!"

लैब में बीस सीटें थीं, पर पचास बच्चे ठूँसे हुए थे. दो माइक्रोस्कोप पूरे विज्ञान विभाग के लिए. एक शिक्षक बिना देखे सिग्नेचर कर रहा था.

एक लड़का आयुष के पास आया; "पहली बार आ रहे हो? यहाँ कुछ नहीं सीखना. सिर्फ सिग्नेचर लो और भागो. असली पढ़ाई कोचिंग में होगी."

"फिर यह स्कूल क्यों है?"

लड़का हँसा: "बोर्ड का नियम है. यह हमारा 'लीगल एड्रेस' है. असली 'एजुकेशनल एड्रेस' तुम्हारा कोचिंग है."

लीगल एड्रेस. एजुकेशनल एड्रेस.

आयुष सोचने लगा: "यहाँ हमें 'विद्यार्थी' कहते हैं, पर यहाँ कोई विद्या नहीं. यहाँ बस बोर्ड परीक्षा में बैठने का लाइसेंस है."

प्रैक्टिकल रिकॉर्ड जमा हुआ. बिना देखे सिग्नेचर. पूरी प्रक्रिया में पाँच मिनट.

जाते-जाते उसने बोर्ड को फिर देखा: "शिक्षा ही उन्नति है." आज यह वाक्य झूठा लगा.

‘संबल कोचिंग’ के गेट पर लौटते ही वातावरण बदल गया. सब कुछ संगठित, उद्देश्यपूर्ण. स्क्रीन पर टिकर; "अगला टेस्ट: 48 घंटे बाद. तैयारी: 65% पूर्ण."

आयुष सोच रहा था: "यहाँ मेरा भविष्य बन रहा है. पर क्या सिर्फ एक और सर्टिफिकेट के लिए?"

फिजिक्स की कक्षा में डॉ. शर्मा ने प्रवेश किया. "आज का टॉपिक: रोटेशनल मोशन. पिछले पाँच वर्षों में 42 सवाल आए. हर सवाल 2.7 मिनट का. तुम्हें 1.5 मिनट में हल करना है."

थोड़ी देर बाद वह रुके. "तुमने अब तक स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की होगी. आज भी स्कूल गए होंगे. एक एस्पायरेंट को शिक्षा नहीं, उससे आगे की चीज ‘स्किल’ चाहिए. तुम्हारे लिए स्कूल सिर्फ बोर्ड परीक्षा में बैठने का लाइसेंस है. वहाँ तुमने 'शिक्षा' देखी होगी." उनकी आँखों में तीखी चमक थी. "यहाँ मैं तुम्हें 'स्किल' दे रहा हूँ; परीक्षा पास करने का स्किल. वहाँ तुम 'छात्र' हो. यहाँ 'योद्धा'. युद्ध में सिर्फ विजय या पराजय."

आयुष ने उनकी आँखों में देखा. कोई छल नहीं. स्पष्टवादिता. यह स्कूल के पाखंड से बेहतर थी.

लंच पर आयुष ने अपनी नोटबुक देखी. कवर पर लिखा था:

लक्ष्य: IIT

हथियार: टेस्ट -शगुन

आज यह मंत्र अधूरा लगा. उसने पेन निकाला. नीचे लिखा:

मैदान: आईआईटी एंट्रेंस

प्रवेश द्वार: स्कूल

प्रशिक्षण: कोचिंग

अभ्यास: हर टेस्ट

विजय: स्वयं पर

शाम को लाइब्रेरी में विशाल मिला. वह पिछले दो टेस्टों में फेल हो चुका था.

"स्कूल गया था? मजा आया?"

"मजा नहीं, सबक मिला. हम दो जिंदगियाँ जी रहे हैं. एक में 'छात्र', दूसरी में 'योद्धा'."

विशाल ने सिर हिलाया. "मैं तो हार मान चुका. पापा ने कहा, इस बार आईआईटी, या घर वापसी."

"और फिर?"

"शायद प्राइवेट कॉलेज... पर पापा को क्या बताऊँगा..."

आयुष ने उसकी आँखों में भय देखा. पिता के कोप का. समाज के तिरस्कार का.

"हम दोनों एक ही लड़ाई लड़ रहे हैं, विशाल. दुश्मन आईआईटी नहीं, यह ‘पूरी व्यवस्था’ है जो हमें दो हिस्सों में बाँट देती है."

रात को डेस्क पर आयुष ने एक नई कॉपी निकाली. पहले पन्ने पर लिखा:

युद्ध-योजना

1. शत्रु: शिक्षा का पाखंड

2. युद्ध-मैदान: यह कोचिंग

3. शस्त्र: ज्ञान (रटना नहीं, समझना)

4. सहयोगी: वह उत्कृष्ट कैडेट

5. लक्ष्य: एक ऐसी शिक्षा जो पाखंड न हो

नीचे लिखा; आज का सबक: स्कूल सर्टिफिकेट देगा. कोचिंग रैंक देगी. शिक्षा? मुझे खुद तलाशनी होगी.

बिस्तर पर लेटा आयुष अचानक उठ बैठा. उसने अपनी डायरी खोली. लिखने लगा:

तारीख: सितम्बर, 5

स्थान: कोटा

आज समझा शिक्षा दो हिस्सों में बंट गई है. एक औपचारिक, दूसरी वास्तविक. मेरी लड़ाई इस विभाजन के पाखंड से है, जो कहता है: "तुम्हें दो अलग व्यक्ति बनना होगा."

नहीं. मैं एक ही रहूँगा. वही उत्कृष्ट कैडेट जो अनुशासन जानता है. वही आईआईटी एस्पायरेंट जो ज्ञान चाहता है.

और अगर इस व्यवस्था में यह संभव नहीं... तो पहले खुद को बदलूँगा. ताकि कल को शायद व्यवस्था बदल सके.

शगुन,
तुम्हारा मंत्र अभी भी काम करता है. पर अब मैंने अपना मंत्र बना लिया है. तुम सोने के पिंजरे से लड़ रही हो. मैं इस शिक्षा के पाखंड से. शायद हमारी लड़ाइयाँ अलग हैं. पर दुश्मन एक ही है, वह व्यवस्था जो हमें "पूर्ण" होने से रोकती है.

कल से नया युद्ध शुरू.

आयुष ने डायरी बंद की. वह सोने के लिए अपने बिस्तर पर जा कर लेट गया. चेहरे पर थकान थी, पर एक नई दृढ़ता भी. वह दृढ़ता जो दुश्मन को पहचान लेने पर आती है.

सर्टिफिकेट नहीं... पाखंड.

रैंक नहीं... विभाजन.

जीत नहीं... समझ.

यही उसकी नई लड़ाई थी.
... क्रमशः

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

सोने का पिंजरा

पिंजरा और पंख-20
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

सुबह की धूप से कमरा 106 नहाया हुआ था. शगुन की आँखें खुलीं. किरण अभी सो रही थी, भरतपुर की सीमा और कोटद्वार से आई प्रियंका तैयार हो चुकी थीं.

अंडर ग्रेजुएट और ऊपर के कोर्स के विद्यार्थियों के लिए यूनिफोर्म निर्धारित नहीं थी, किन्तु वस्त्र खादी के होना अनिवार्य था. फिर भी कपड़े की बुनावट व रंगों ने वस्त्रों में कुछ विविधता घोल दी थी. खादी उसे देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ रही थी.

उन्हें पहले दिन एक घंटा पहले 'मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान भवन' बुलाया गया था. वहाँ विभाग के ग्रेजुएशन के सभी नए छात्र-छात्राएँ एकत्र थे. मंच पर वरिष्ठ प्रोफेसर और विभाग प्रमुख मौजूद थीं. 

एक प्रोफेसर ने संस्था और विभाग के इतिहास और नियमों का परिचय दिया. फिर विभाग प्रमुख का संबोधन शुरू हुआ. उनकी आवाज़ गंभीर, आदेशात्मक और स्नेह से भरी थी.

"बेटियों, यह विद्यापीठ तुम्हें एक उत्कृष्ट शिक्षा देगा, और एक सुसंस्कृत, सहनशील और ‘संपूर्ण नारी’ बनने का मार्ग भी दिखाएगा. शिक्षा का अंतिम लक्ष्य है, ‘एक ऐसी नारी का निर्माण जो अपने ज्ञान से परिवार को रोशन करे, अपने संस्कारों से समाज को सँवारे.’"

"संपूर्ण नारी". शब्द शगुन के कानों में अटक गया. उसकी भौंहें माथे पर थोड़ी सी चढ़ गईं. क्या शिक्षा का लक्ष्य "संपूर्ण मनुष्य" नहीं होना चाहिए था? "नारी" विशेषण क्यों जरूरी था? पर उसने विचार को दबा दिया. शायद वह गलत समझ रही थी. शायद यहाँ के संदर्भ में यही सही था.

नौ बजे पहली कक्षा आरम्भ हुई "व्यवहार का जैविक आधार". यह बी.एससी. मनोविज्ञान का मुख्य विषय था. कक्षा में प्रवेश करते ही शगुन ने एक अलग ही ऊर्जा महसूस की. यह वह विज्ञान था जिसे पढ़ने का उसने चुनाव किया था.

प्रोफेसर डॉ. श्रीवास्तव वरिष्ठ और गंभीर थे. उन्होंने तंत्रिका तंत्र की मूल इकाई, न्यूरॉन, के बारे में समझाना शुरू किया. शगुन उत्सुकता से सुन रही थी, नोट्स ले रही थी.

फिर डॉ. श्रीवास्तव मस्तिष्क के विभिन्न भागों और उनके कार्यों पर आए. एक चार्ट दिखाते हुए उन्होंने कहा, " एक दिलचस्प शोध बिंदु. कुछ अध्ययनों से पता चला है कि महिला मस्तिष्क में कॉर्पस कैलोसम, यानी दोनों गोलार्द्धों को जोड़ने वाला तंतुमय पुल, पुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा होता है."

कक्षा में सन्नाटा छा गया. लड़कियाँ ध्यान से सुन रही थीं.

"इस बड़े आकार का मतलब है, दोनों गोलार्द्धों के बीच बेहतर संपर्क. इसीलिए महिलाएँ मल्टी-टास्किंग में अधिक सक्षम होती हैं. यही उनमें भावनाओं के बेहतर संप्रेषण, सहज ममता और सामूहिक कल्याण की भावना का संभावित जैविक आधार है."

शगुन की कलम रुक गई. उसने दोबारा सुना, ‘जैविक आधार...’ ‘सहज ममता और त्याग’.
एक वैज्ञानिक तथ्य सीधे-सीधे एक सामाजिक रूढ़ि से जुड़ रहा था. जैसे कोई कह रहा हो, “तुम्हारे दिमाग का यह हिस्सा बड़ा है, इसलिए तुम्हें ममत्वपूर्ण और त्यागी होना ही है. प्रकृति ने तुम्हें इसी लिए बनाया है.”

उसकी उँगलियाँ बेचैन हो उठीं. उसने हाथ उठाया.

"सर, एक सवाल है."

डॉ. श्रीवास्तव ने उसकी ओर देखा. "हाँ, बताओ."

"सर, क्या यह शोध यह साबित करता है कि ममता और त्याग जैविक हैं? या फिर ये सामाजिक रूप से सिखाए गए गुण हैं, और मस्तिष्क की यह संरचना उन्हें ग्रहण करने में सिर्फ सहायक होती है? कारण और परिणाम में अंतर है न?"

कक्षा में पूर्ण सन्नाटा छा गया. कुछ लड़कियों ने शगुन की ओर देखा. डॉ. श्रीवास्तव ने अपना चश्मा सहेजा. उनके चेहरे पर एक सूखी, असहज मुस्कान थी.

"अच्छा सवाल है," उन्होंने कहा, "पर हम अभी जैविक आधार पढ़ रहे हैं. सामाजिक निर्माण, सीखने और संस्कृति के प्रभाव की बात सामाजिक मनोविज्ञान के कोर्स में आएगी. अभी बुनियादी जैविक संरचनाओं पर ध्यान दो."

उन्होंने सवाल को टाल दिया था. पर शगुन ने उनकी आँखों में एक फिसलन-सी देखी, एक असहजता जो तब होती है जब कोई आरामदायक स्थापना पर सवाल उठा दे.

दोपहर बाद, वह हॉस्टल वार्डन, श्रीमती चंद्रा 'कक्की' के पास एक फॉर्म जमा करने गयी. फॉर्म लेते हुए कक्की ने कहा, "नियम याद हैं न? रात आठ बजे तक हॉस्टल लौटना. शहर जाने के लिए अभिभावक से लिखित अनुमति. मोबाइल शाम सात बजे तक."

"हाँ, कक्की," शगुन ने कहा. फिर, एक सहज प्रश्न पूछ बैठी, "ये सब नियम... हमारी सुरक्षा के लिए हैं न?"

कक्की ने उसे देखा. उनकी आँखों में एक मिश्रित भाव था, स्नेह और दृढ़ता.

"बेटी, सुरक्षा तो एक कारण है," उन्होंने कहा, आवाज़ नरम पर अटल, "पर इससे तुम्हारी साख बनती है. पढ़ाई के बाद दुनिया तुम्हें 'बनस्थली की लड़की' के नाम से जानेगी. यह नाम हमारी सबसे बड़ी पूंजी है. और यह नाम... शुद्ध आचरण से ही चमकता है."

शगुन ने शब्दों को पचाया. ‘साख’. ‘शुद्ध आचरण’. यह नियम सिर्फ उनके शरीर की सुरक्षा के लिए नहीं थे. यह किसी सामूहिक प्रतिष्ठा की सुरक्षा थी. उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उसके निर्णय... सब कुछ इस 'साख' के आगे गौण थे. यह पिंजरा सोने का था, पर पिंजरा तो था ही.

कमरे में लौटकर उसने किरण से अपनी उलझन साझा की. "लगता नहीं कि ये नियम... हमें बच्चा समझते हैं? हम वयस्क हैं न?"


किरण, जो अपने बिस्तर को व्यवस्थित कर रही थी, मुस्कुराई. "अरे, यहाँ सब कुछ तो बहुत सही है, शगुन! हमें पाला जा रहा है. बाहर की दुनिया कितनी खतरनाक है! और साख की बात... कक्की सही कहती हैं. हम लड़कियों की साख ही तो सब कुछ है. इसे बचाना ही चाहिए."

किरण के चेहरे पर सहमति और गर्व था. वह इन नियमों को नहीं, बल्कि उनके पीछे के संरक्षण और सम्मान को देख रही थी. शगुन ने महसूस किया, उसकी लड़ाई सिर्फ संस्था से नहीं, बल्कि उन साथियों से भी है, जिन्होंने इन बंधनों को अपनी पहचान और सुरक्षा का हिस्सा बना लिया था.

रात को, जब सब सो चुके थे, शगुन ने टॉर्च जलाई और डायरी लिखने बैठी.

"आज बनस्थली का दूसरा चेहरा देखा.

यह कोटा कोचिंग सा कठोर नहीं है. पर मुलायम हाथों से थपथपाता है, मीठी आवाज़ में 'बेटी' कहता है.

यह 'तुम्हारे भले' के लिए कहता है. इसने तीन चीजें सिखाईं:

1. विज्ञान पुराने विचारों का वाहक बन सकता है. यह सच नहीं, सुविधाजनक सच बता सकता है.

2. सुरक्षा और कैद के बीच रेखा बहुत पतली है. वही हाथ जो सहारा देते हैं, बेड़ियाँ भी बन सकते हैं. और उन्हें 'साख' और 'सम्मान' का नाम दे दिया जाता है.

3. सबसे बड़ा दुश्मन वह नहीं जो तुम्हें रोके, बल्कि वह है जो तुम्हें यह मनवा दे कि रुकना, बंधना ही तुम्हारी खुशी, तुम्हारी पहचान और तुम्हारी शक्ति है.


किरण ने यह मान लिया है. कि मैं नहीं मान सकती.

पर लड़ना होगा... बुद्धिमानी से. विज्ञान से. सवालों से. हर उस 'तथ्य' से जो मुझे 'तुम्हारे जैसा होने' का पाठ पढ़ाए.

कल से, मैं और बेहतर सवाल पूछने होंगे."
... क्रमशः

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

मंत्र


पिंजरा और पंख-19
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
रविवार की रात, 206 में हवा जैसे थम सी गई थी.
 
इंटरकॉम की घंटी ने खामोशी तोड़ी. फोन पर पापा थे.

“सब ठीक?"

"हाँ, पापा."

"शगुन का एडमीशन हो गया है. उसे साइंस स्ट्रीम में मनोविज्ञान मिल गया है. हॉस्टल आवंटन कल होगा. गया. तू ठीक है?"

“हाँ, पापा.” आयुष के मन में एक फीकी सी राहत थी. कम से कम शगुन को अपनी मरजी की जगह और स्ट्रीम मिला.

फिर माँ ने फोन लिया. हमेशा की तरह वही स्नेह और चिंता. "खाना तो ठीक से खा रहा है न? दूध पीता है?"

"हाँ, मम्मी."

"और... पढ़ाई? ज्यादा टेंशन तो नहीं ले रहा?"

"नहीं, मम्मी. सब ठीक है."

"शगुन ने कहा था न," माँ ने याद दिलाया, " तू छोटे-मोटे टेस्ट में मत उलझना. बस आईआईटी पर ध्यान देना. उसी की तैयारी करना."

आयुष ने सहमति दी. "हाँ, मम्मी."

कॉल खत्म हुई. कमरे में खामोशी फिर लौट आई, लेकिन कानों में माँ के शब्द गूँज रहे थे, "छोटे टेस्ट में मत उलझना." यह मंत्र इस सूनेपन में एक सुकून भरी याद था, पर उसकी धड़कनें कम न होती थीं. “तू नहीं जानती, शगुन, यहाँ क्या होता है”, उसने मन ही मन कहा, “यहाँ हर टेस्ट बड़ा होता है”.

सुबह पाँच बजे अलार्म ने उसे जगाया. शरीर बिस्तर से उठने को मना कर रहा था. कॉरिडोर में दूसरे कमरों के लड़के निकल रहे थे, चुपचाप. नाश्ते पर कोई बातचीत नहीं, सब या तो नोट्स देख रहे थे या आँखें बंद करके फॉर्मूले दोहरा रहे थे. हवा में स्पर्धा का मौन दबाव था.

फिजिक्स के टीचर बोर्ड पर समीकरण लिख रहे थे, उनकी आवाज़ लयबद्ध, नीरस गुनगुनाहट थी. आयुष की नज़र ब्लैकबोर्ड, पर दिमाग कोटा से दूर, शायद बनस्थली में भटक रहा था. तभी, जैसे दूर से कोई आवाज़ आई, "इन टेस्टों में मत उलझ... बस आईआईटी पर ध्यान दे."

उसने सिर को झटका दिया. ब्लैकबोर्ड पर उसकी कल्पना ने "IIT" का विशाल लोगो देखा, एक सेकंड के लिए. फिर वह सीधा बैठा, कलम उठाई, और नोट्स लेने लगा. पहली बार, उस मंत्र ने उसे डूबने से बचा लिया था.

दोपहर बाद, कोचिंग के नोटिस बोर्ड के चारों ओर भीड़ जमा थी. “संबल कोचिंग - साप्ताहिक टेस्ट - रैंक लिस्ट.” आयुष की छाती धड़कने लगी, सांसें थम गयी. आँखें रोल नंबर तलाशने लगीं, आखिर रोल नंबर 43 पर जाकर अटक गयीं. रैंक 56. उसका पेट भिंच गया. ग्यारहवीं में 220 छात्रों में भी वह टॉप-50 में नहीं था. इस बार वह लक्ष्य चूक गया.

आसपास आवाजें थीं. "मैं 9वें पर" लड़के की आवाज़ में गर्व था. "बाप रे... 102, मैं तो बर्बाद हो गया," यह टूटी हुई आवाज़ थी.

आयुष खामोश रहा. उसके कानों में गूँज रहा था, "छोटे टेस्ट... छोटे टेस्ट..."

यह गूंज बहुत हलकी थी. टॉप-50 भी नहीं! पापा को पता लगा तो? अगले टेस्ट में नीचे गया तो? आईआईटी कैसे क्रैक होगा?"

वह एक तरफ हट गया. मंत्र पर, भय जीतता दिखता था.

शाम को कैंटीन में, 205 वाला विशाल मिला, "टेस्ट कैसा रहा?” आयुष ने पूछा.

"क्या बताऊँ, यार... 86 रह गया. घर फोन करने तक का मन नहीं है. उनसे क्या कहूँगा."

आयुष ने एक गहरी सांस ली. खुद को समझाने के लिए, विशाल से कहने लगा, "यार, इतना मत सोच. यह तो... कोचिंग का अपना इंटरनल टेस्ट है. असली मुकाबला तो आईआईटी एंट्रेंस है न? उसी से हमें फर्क पड़ना चाहिए."

विशाल ने उसकी ओर देखा. उसकी आँखों में थकान और एक कड़वी हँसी थी. "इंटरनल टेस्ट? यहीं से तो 'असली' की तैयारी होती है, आयुष. यहाँ नीचे गए तो वहाँ का सपना तक दिखना बंद हो जाता है."

आयुष चुप रहा. विशाल का जवाब उसके मन में घर कर गया. शायद वह सही था. बाहरी दुनिया के लिए यह मंत्र सिर्फ एक आसान, भोली सी बात थी.

रात को सेल्फ-स्टडी के घंटे में, आयुष डेस्क पर बैठा. किताब खुली थी, पर उसे 56वीं रैंक दिखती थी. उसने गलत हुए सवाल देखे. हर गलती उसे शर्म और डर की ओर धकेलती थी. वह किताब बंद करने को था.

तभी अचानक, बिजली सी कौंधी.

शगुन ने कहा था, "छोटे टेस्ट में मत उलझ."

उसने यह नहीं कहा था, "छोटे टेस्ट को अनदेखा कर."

उलझना. अनदेखा करना. दो अलग चीजें थीं.

उसने अपनी कॉपी का कवर पलटा. एक कोने में, उसने पेंसिल से साफ-साफ लिखा:

लक्ष्य : आईआईटी.

हथियार : ये टेस्ट.

एक शब्द ने सब कुछ बदल दिया. 'उलझना' से 'हथियार' तक का सफर. उसने टेस्ट पेपर फिर से उठाया, इस बार निराशा से नहीं, एक एनालिस्ट की सूक्ष्म दृष्टि से. किस सवाल में कहाँ चूक हुई? कौनसा कॉन्सेप्ट क्लियर नहीं था? कौनसी गलती दोबारा हो सकती है? वह गलतियों को सुधारने लगा, हर गलती के आगे कारण लिखने लगा. उस पल, दिमाग में रैंक नहीं थी, अपनी कमजोरियाँ पढ़ रहा था. उनसे मुक्ति की पहली कवायद.

रात को फोन की घंटी बजी. पापा थे. आयुष ने गहरी सांस ली. उसने कॉपी के कवर पर लिखे शब्दों को देखा. हथियार : ये टेस्ट.

"हाँ, पापा."

"कैसा रहा आज का दिन? टेस्ट का रिजल्ट आया?"

"हाँ, पापा, आ गया." उसकी आवाज़ सपाट थी. " रैंक 56 आई है."

लाइन के दूसरी ओर एक पल की चुप्पी थी, आयुष की सांस रुकी हुई.

"पिछली बार तो शायद 49 थी? यह गिरावट क्यों." पापा के स्वर में चिंता थी.
आयुष इस सवाल के लिए तैयार था.

"कुछ नए टॉपिक थे, पापा... वो क्लियर नहीं थे. मैंने अपनी गलतियों को नोट किया है. उन पर काम करूँगा." उसने थोड़ा रुककर कहा, "यह कोचिंग का अपना इंटरनल टेस्ट है. इससे सीखकर ही तो एंट्रेंस की तैयारी होती है न?"

"ठीक है," पापा के स्वर में नाराजगी नहीं थी, बल्कि सजगता थी, "गलतियों से सीखो. हमें तुम पर भरोसा है. तुम कर सकते हो."

कॉल खत्म हुई. आयुष ने फोन नीचे रखा. उसने सच कहा था. और दबाव कम हुआ था. मंत्र ने उसे सच बोलने का साहस दिया था.

बिस्तर पर लेटे हुए, आयुष की आँखें अंधेरे में खुली थीं. उसके होंठ फड़के, मंत्र दोहराते हुए:
"लक्ष्य: IIT. हथियार: टेस्ट."

थकान और एक नई समझ के बीच, नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया.
... क्रमश:

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

होस्टल नं. सात

पिंजरा और पंख-18
लघुकथा श्रृंखला   : दिनेशराय द्विवेदी

सुबह का सूरज बनस्थली के आँगन में सुनहरी किरणें बिखेर रहा था. गेस्ट हाउस से निकलकर, तीनों एक बार फिर विद्यापीठ के प्रशासनिक भवन की ओर चले. होस्टल आवंटन का दिन था. ग्यारह बजे होस्टल आवंटित हुआ. नाम था शांता निकेतन : होस्टल नं. सात. यहाँ सभी होस्टलों के नाम ‘शांता’ नाम से आरंभ होते थे. शांता विद्यापीठ के संस्थापक हीरालाल शास्त्री की पुत्री थी, जिसका बारह वर्ष की उम्र में असमय देहान्त हो गया. उसी की स्मृति में इस विद्यापीठ की स्थापना हुई.

वे शांता निकेतन पहुँचे. रिसेप्शन पर खादी की गहरी नीली साड़ी पहने एक स्त्री ने स्वागत किया. रिसेप्शन पर सूचना अंकित थी, “होस्टल में पुरुष प्रवेश वर्जित” है. रिसेप्शनिस्ट ने बताया शगुन को कमरा नं. 106 मिला है.

उस पल शगुन ने समझा, रिसेप्शन एक सीमा है. जहाँ से उसकी पुरानी दुनिया पीछे छूट गयी थी, और एक नई, अज्ञात दुनिया शुरू होगी. माँ ने उसका हाथ थाम लिया. एक परिचारिका उन्हें रूम नं. 106 ले गयी.


हॉस्टल एक सुंदर, तीन मंज़िला इमारत थी. वे 106 के सामने पहुँचे, दरवाज़ा खुला था. अंदर तीन लड़कियाँ थीं. एक अपना सामान अलमारी में लगा रही थी, दूसरी खिड़की से बाहर देख रही थी, और तीसरी, दुबली पतली, आँखें लाल कर चारपाई पर पालथी लगाए बैठी थी.

"नमस्ते," शगुन ने आवाज़ लगाई.

तीनों ने मुड़कर देखा. परिचय संक्षिप्त और शर्मीला था. खिड़की वाली लड़की अलवर से थी. अलमारी वाली उत्तराखंड से. और लाल-आँखों वाली लड़की, किरण, मोड़क से थी.




"मोड़क?" माँ ने आश्चर्य से पूछा, "तुम्हारे पापा का नाम?"

"मंगलसिंह जी," किरण ने धीरे से कहा.

"वही जो सीमेंट फैक्ट्री में फोरमैन हैं?

“जी.” लड़की ने कहा.

“शगुन के पापा वहीं काम करते हैं.”

एक जान-पहचान की डोर, इस विशाल, अजनबी जगह में मिल गई थी. शगुन ने एक पल के लिए किरन की ओर देखा. उसकी आँखों से आँसू अब भी बाहर निकलने को तत्पर थे. पर वह शगुन को देख मुसकुराई, एक फीकी-सी मुस्कान. जान-पहचान से उसे थोड़ी तसल्ली हुई थी, शगुन ने सोचा.

सामान रखने में थोड़ा वक्त लगा. दोपहर हो चुकी थी. लंच का वक्त हो चुका था. शगुन को आज लंच होस्टल में नहीं मिलना था. वे तीनों गेस्ट हाउस पहुँचे. लंच किया और थोड़ा विश्राम. शगुन को होस्टल छोड़ मम्मा पापा को वापसी यात्रा करनी थी. वे शगुन के साथ होस्टल पहुँचे. रिसेप्शन में रामसिंह मौजूद थे. शगुन मम्मा के साथ अपने रूम गयी. कुछ ही देर में दोनों वापस लौटीं, उनके साथ किरन और उसकी माँ भी थीं.

आखिर विदाई का पल आया. दोनों लड़कियाँ होस्टल के बाहर तक माता-पिता को छोड़ने आयीं. निकट ही गुप्ता जी की कार खड़ी थी. अचानक किरन अपनी माँ से लिपट कर रोने लगी. उसकी आवाज भी तेज थी. माँ भी न बची वे भी बिलख पड़ीं. शगुन आश्चर्य से उन्हें देख रही थी. यह रोना साधारण विदाई का दुख नहीं लग रहा था. इसमें एक गहरी हार, एक मजबूरी, एक अनचाही दूरी की पीड़ा थी. किरण का शरीर हिल रहा था, जैसे वह टूट रहा हो.

वहीं बिल्कुल अलग, शगुन और मम्मा खड़ी थीं. माँ की आँखें नम जरूर थीं, लेकिन वे उसे बहने नहीं दे रही थीं. उन्होंने शगुन के कंधों को मज़बूती से पकड़ा. शगुन ने माँ से फुसफुसाकर कहा, "माँ, किरन यहाँ मन से नहीं आई. बस... एक मौका मिल गया, तो भेज दी गई. मर्जी से आती तो ऐसे नहीं रोती."

माँ ने जवाब देने के स्थान पर शगुन को कहा, "संभलकर रहना, बेटा, खाने-पीने का ध्यान रखना. फोन करना."

शगुन ने उन्हें गले लगा लिया. उसकी आँखें सूखी थीं. उसने माँ के कंधे पर सिर रखा और एक गहरी सांस ली. इस आलिंगन में प्यार था, विश्वास था, और एक सचेतन दृढ़ता थी. उसे रोना नहीं आ रहा था. उसे पता था कि यह एक जरूरी विछोह है जो उसकी नींव को मजबूत करेगा.

आखिर मंगलसिंह ने अपनी पत्नी से कहा, हो भी गया, अब चलना भी है बस छूट जाएगी. माँ-बेटी अलग हुईं. माँ पल्लू से किरन के आँसू पोंछने लगी.

“रामसिंह, आप बस से जाएंगे?” शगुन के पापा ने पूछा.

“हाँ सर, बस से ही आए थे.”

क्यों न हमारे साथ चलो. कार में पिछली सीटें खाली हैं. आपको मोड़क छोड़ते जाएंगे.”

“नहीं सर, हम बस से चले जाएंगे.”

“जब कार जा ही रही है तो आप बस से कैसे चले जाएंगे. आप पिछली सीट पर बैठें.”

अचानक गुप्ता जी को याद आया कि शगुन के पास तो फोन है ही नहीं. उन्होंने तुरन्त अपने फोन की सिम निकाली, फोन में शगुन के लिए ली गयी नयी सिम डाली और शगुन को दिया.

“पापा, ये तो आपका फोन है?”

“हाँ, मैंने सोचा था कोटा से तुम्हारे लिए नया ले दूंगा. फिर ध्यान आया कि आज तो रविवार है. अब तुम मेरा रखो. मैं कोटा से नया ले लूंगा.”



जब कार मोड़क पहुँची और मंगल सिंह उतरे, तो उन्होंने जेब से कुछ नोट निकालकर गुप्ता जी की ओर बढ़ाए. "पेट्रोल का... थोड़ा सा हिस्सा, गुप्ताजी."

गुप्ताजी ने मुस्कुराकर उनका हाथ हल्के से धकेल दिया. "अरे, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, सिंह साहब. देना ही है तो... दोस्ती दीजिए. बस इतना ही काफी है."



पापा की कार चल पड़ी. यहाँ होस्टल शांता निकेतन था, विद्यापीठ था, एक भरा-पूरा परिसर. जहाँ शगुन अब अपने नए जीवन के साथ अकेली थी. कमरे में लौटकर, शगुन ने देखा, किरण अब भी सिसक रही थी. अलवर वाली लड़की अपनी किताबें व्यवस्थित कर रही थी, और उत्तराखंड वाली खिड़की के पास खड़ी चुपचाप बाहर देख रही थी.

शगुन अपनी चारपाई पर बैठ गई. उसने अपनी डायरी निकाली, और आखिरी पन्ने पर लिखा:

"आज मुझे नया पता मिला: ‘शांता निकेतन’ हॉस्टल नंबर सात, कमरा 106.

मेरी तीन रूममेट हैं. एक सिसक रही है... शायद उसकी लड़ाई मेरी लड़ाई से अलग है

कल से मेरी क्लास. मेरा विज्ञान. मेरी पसंद.

और... मैं रोई नहीं."

वह डायरी बंद करके खिड़की के पास गई. बाहर, बनस्थली की शाम धीरे-धीरे उतर रही थी. दूर कहीं, एक घोड़े की टापों की आवाज़ सुनाई दी. उसे एक नई सुबह, एक नई शुरुआत का इंतज़ार था.

... क्रमशः

शनिवार, 31 जनवरी 2026

फिर विज्ञान

पिंजरा और पंख-17

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

घर से निकलते नौ बज गए, आयुष के होस्टल पहुँचे तब साढ़े दस बजे थे. सबसे पहले कार से उतर कर शगुन होस्टल में घुसी. आयुष होस्टल के रिसेप्शन पर ही मिल गया, टेस्ट देकर लौटा ही था. उसकी आँखों के नीचे गहरे घेरे थे, टेस्ट की तैयारी ने उन्हें कुरेद दिया हो. शगुन की ओर देखकर वह मुस्कुराने की कोशिश भर कर पाया.

"टेस्ट कैसा रहा?"

आयुष ने कंधे उचकाए. "पता नहीं. पर टॉप रेंक तो नहीं आएगी." उसकी आवाज़ में खालीपन था, जैसा रामगंजमंडी से आते समय था. शगुन का दिल भारी हो गया.

“तुझे आईआईटी एंट्रेंस क्रैक करना है? बीच के टेस्ट टॉप करने नहीं. उस टारगेट पर ध्यान रख. इन में मत उलझ. बेहतर है खुद अपनी टेस्टिंग करता रह, रोज. अभी से आईआईटी को टारगेट बना. तू कर लेगा.”

“बात तो तेरी सही है... और, मम्मी पापा?”

“मैं फौरन अंदर आ गयी. वे आते होंगे.” शगुन ने कहा.

“बाहर ही चलते हैं. उधर ही चाय पी लेंगे.”

“चल.” शगुन ने कहा. वे दोनों बाहर आए. कार के पास मम्मी-पापा आपस में कुछ कह रहे थे.

“क्या हुआ मम्मा?

“कुछ नहीं, बस यूँ ही.” आयुष को सामने देखा तो मम्मा ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. पूछने लगी, “कैसा है? तेरी शकल कैसी हो गयी है? तू ठीक से खाया पिया कर. दस-पाँच दिन में जब भी पापा कोटा आएंगे तेरे लिए चाची से बनवा कर बेसन के लड्डू और मठरी भिजवा दूंगी.

माँ के स्नेह से आयुष की आँखें भी नम हो गईं. शगुन ठीक थी. उसका लक्ष्य आईआईटी एंट्रेंस क्रैक करना है, न कि बीच के टेस्ट.

तभी पापा ने कहा, “माँ बेटे का मिलन हो गया हो तो, चल कर चाय पी लें? आगे भी चलना है.”

माँ-बेटे अलग हुए. आयुष उन्हें पास ही सड़क किनारे एक ठेले पर ले गया. पास रखी बैंचों पर बैठ कर चाय पी. चाय स्वादिष्ट थी.

आयुष से मिल कर वे आगे चले. राजमार्ग नं. 12, बढ़िया सड़क, नयी कार दौड़ पड़ी. एक अच्छी बारिश हो चुकी थी. खेतों में धान की रोपाई होते दिखी. बूंदी से देवली तक पहाड़ी इलाका, फिर आगे मैदान था. किसान खेतों में काम करते दिखे. आगे इकलौता पहाड़ दिखा. गुप्ताजी ने बताया कि इसी की तलहटी में निवाई कस्बा है और इससे बायें मुड़ कर  9 किलोमीटर बनस्थली.  

निवाई और पहाड़ खत्म हुए. बायीं ओर बनस्थली विद्यापीठ का विशालकाय बोर्ड दिखा गुप्ताजी ने कार बायीं और जाने वाली सड़क पर डाल दी. कुछ ही देर में वे बनस्थली विद्यापीठ के विशाल प्रवेशद्वार के अंदर थी. यहाँ गार्ड ने उन्हें रोक कर कार साइड में लगवाई. गेट रजिस्टर में विवरण अंकित करने को कहा गया. पापा जब तक विवरण अंकित करते शगुन कार से उतरकर परिसर को निहारने लगी. सीधी जाती सड़क, जिसके दोनों ओर सघन वृक्षावली और उनके बीच से झाँकते तीन-चार मंजिले भवन.

दोपहर ढलने लगी थी. गेस्ट हाउस में कमरा लिया, सामान रखा, वहीं के कैंटीन में लंच लिया. विद्यापीठ के प्रवेश कार्यालय पहुँचे तब तक तीन बज चुके थे.

शगुन ने काउंटर पर बैठे कर्मचारी से "ऑनर्स मनोविज्ञान” के लिए फार्म मांगा."

शगुन ने फॉर्म भरना शुरू किया. नाम, पता, विषय... फिर अचानक उसकी नज़र एक विकल्प पर अटक गई.

स्नातक कार्यक्रम चुनें:

  • बी.ए. (ऑनर्स) मनोविज्ञान
  • बी.एससी. (ऑनर्स) मनोविज्ञान

उसने पलकें झपकाईं. बी.एससी.? मनोविज्ञान में?

"सर, यह बी.एससी. वाला..." उसने कर्मचारी से पूछा.

"हाँ, यह भी है. बी.एससी. ऑनर्स लेना है तो पहले साल कुछ फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी भी पढ़नी होगी. दूसरे साल से पूरा फोकस मनोविज्ञान पर."

एक पल के लिए सब कुछ थम सा गया. फिर एक गर्म लहर उसके भीतर से उठी. यह वह रास्ता था जिसकी उसे कल्पना भी नहीं थी. वह विज्ञान पढ़ सकती थी¡. अपनी मर्जी से. बिना किसी के कहने पर.

"पापा," उसकी आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी, "मैं बी.एससी. ऑनर्स ले लूँ?"

मिस्टर गुप्ता ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा. "पर... इतने विषय? तू संभाल पाएगी?"

"संभाल लूंगी." शगुन का जवाब तत्काल और स्पष्ट था. उसकी आँखों में वह चमक थी जो किसी नए अवसर के सामने आती है; “आकांक्षा और उत्साह का मिश्रण.”

पापा ने एक लंबी साँस ली. उन्होंने शगुन के चेहरे पर वह निश्चय देखा जो उन्होंने कार खरीदते समय अपने चेहरे पर महसूस किया था. एक अजीब सा गर्व उनके भीतर उमड़ा.

उन्होंने कहा, "जो ठीक लगे."

फॉर्म भरा गया. फीस जमा हुई. शाम पाँच बजने को थे. फीस जमा करने वाले कैशियर ने कहा, “देर हो गयी, पाँच बजने को हैं, होस्टल का आवंटन कल सुबह हो सकेगा.

गेस्ट हाउस लौटते हुए, सड़क से अंदर जाती सड़क पर एक कैंटीन सी दिखी.  वहाँ कुछ लड़कियाँ बैठ कर चाय पीते हुए बातें कर रही थीं. गुप्ता जी ने कैंटीन के निकट ले जा कर करा रोक दी. “उतरो, चाय पी लेते हैं, पता भी लगेगा कि यहाँ कैंटीन में क्या मिल जाते हैं.

"बहुत कठिन कोर्स है, बेटा," माँ ने बैंच पर बैठते हुए चिंतित स्वर में कहा, "पर तू कर लेगी."

"तुमने सही चुना," पापा ने कहा, "आजकल साइंस के क्षेत्र में बहुत संभावनाएँ हैं."

शगुन मुस्कुराई. उनके शब्दों में एक नई समझ थी. वे उसे अब केवल एक 'लड़की' के रूप में नहीं, बल्कि एक 'छात्रा' के रूप में देख रहे थे.

तभी माँ ने कहा, "आयुष का चेहरा देखा तुमने? कितना थका हुआ लग रहा था."

“तुम भी क्या बातें करने लगीं? गेस्ट-हाउस जाकर खूब बतिया लेना.

की थकी आँखों की याद ने शगुन की खुशी पर एक छाया डाल दी. उसके भाई के लिए विज्ञान एक बोझ था, एक जेल. उसके लिए यह एक चुनाव था, एक चाबी. एक ही सिक्के के दो पहलू.

रात को कमरे में अकेले, शगुन ने अपनी डायरी खोली.

आज मैंने खुद चुना. बी.एससी.. पापा मान गए. यह कोई छोटी जीत नहीं. कल होस्टल मिलने पर मम्मा पापा चले जाएंगे. होस्टल मेरे लिए नया घर होगा. 

उसने खिड़की से बाहर देखा. विद्यापीठ की मुख्य सड़क पर रोशनी थी. दोनों ओर वृक्षों के पीछे भवनों से  कुछ रोशनियाँ फैली हुई थीं. उनमें से एक रोशनी उसके होस्टल की भी है, जिसमें कल से उसे रहना होगा.

... क्रमश:

 

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

कार, लिफाफा और लड्डू

पिंजरा और पंख-16

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

घर के अहाते में खड़ी शगुन की चमकदार साइकिल के साथ अब एक चमकदार कोरल-रेड मारुति 800 और आ चुकी थी. पूरा मोहल्ला उसे देख जा रहा था. पापा चाबियाँ हाथ में हिलाते, खुशी से चाचा को बता रहे थे, "कंपनी की योजना थी... सालाना सिर्फ चार प्रतिशत ब्याज पर लोन. वाहन भत्ता इतना कि किस्त आराम से निकल आएगी. बस पेट्रोल का खर्च अपना."

"शानदार है!" चाचा ने कार के बोनट पर हाथ फेरते हुए कहा, "अब आयुष को कोटा छोड़ने-लाने में आसानी हो जाएगी. और... हाँ, शगुन के लिए अच्छे रिश्ते मिलने में भी आसानी होगी. प्रतिष्ठानुकूल रिश्ता मिल सकेगा." उनकी नज़र में कार सामाजिक प्रतिष्ठा में उछाल पैदा करना वाली और पारिवारिक दायित्वों हेतु नया साधन थी.

चाचा के शब्दों ने शगुन पर एक भारी, अदृश्य छाया सी डाल दी. यह कार उपयोग के लिए नहीं, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा, भाई की सुविधा तथा उसके भविष्य के 'रिश्तों' की तलाश के लिए थी. उसे अपनी यात्रा अभी भी उस पुरानी साइकिल से जुड़ी लग रही थी, जिसके पहिए अब धीमे पड़ गए थे.

दो दिन बाद वह सुबह आई.

डाकिया आया और दरवाज़े की जाली में एक खाकी लिफाफा अटका गया. शगुन के हाथों ने उसे छुआ तो कागज़ की सख्ती ने उसकी नब्ज तेज़ कर दीं. ऊपर हरे अक्षरों में लिखा था; ‘बनस्थली विद्यापीठ’.

उसका दिल जोरों से धड़कने लगा. उसने डरते हुए लिफाफा खोला, कहीं नज़रों का धोखा न हो. पर वह उसके सीनियर सेकेंडरी के अंकों के आधार पर, बी.ए. (ऑनर्स) मनोविज्ञान में सीधे प्रवेश का प्रस्ताव था.

एक पल के लिए सब कुछ थम सा गया. फिर एक गर्म, मीठी लहर, जो उसके पैरों की उँगलियों से दौड़ गयी और उसके चेहरे पर एक चमकदार, अनियंत्रित मुस्कान के रूप में फूट पड़ी. उसने पत्र को छाती से लगा लिया और पलटकर रसोई की ओर दौड़ी, "मम्मा! एडमिशन मिल गया!"

माँ के हाथ गीले थे. उन्होंने उन्हें अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछा, फिर पत्र लेकर उलटा-सीधा देखा. उनकी आँखों में चमक के साथ-साथ एक धुँधलापन भी तैर गया. "अरे वाह, बेटा! बहुत बढ़िया... अब तो तू पक्की ग्रेजुएट बन जाएगी." आवाज़ में गर्व था, पर उसकी गहराई में वही पुरानी चिंता कुलबुला रही थी, “बेटी का दूर जाना”.

तभी चाची रसोई से बाहर आईं. बात सुनकर नहीं, महसूस करके. उनके हाथ में एक छोटी थाली थी, जिस पर दो सुनहरे बेसन के लड्डू रखे थे. उन्होंने कुछ नहीं पूछा. शगुन की चमकती आँखें और माँ के भीगे पलकों के बीच की कहानी उन्होंने एक नज़र में पढ़ ली थी.

"खोल मुहँ," चाची ने आदत के अनुसार कहा, जैसे शगुन अभी भी पाँच साल की बच्ची हो. शगुन ने मुस्कुराकर मुहँ खोल दिया. चाची ने एक लड्डू उसके मुहँ में रख दिया. बेसन की मीठी महक और घी का गाढ़ा स्वाद उसकी जुबान पर फैल गया; “सफलता का पहला, निजी और बिना शोर का स्वाद.”

"शाम को पापा और चाचा को दिखाना," चाची ने कहा, दूसरा लड्डू माँ की ओर बढ़ाते हुए.

शाम को चाचा घर लौटे, पर उन्हें किसी ने कुछ न बताया, फिर दो घंटे बाद पापा ने घर में कदम रखा. लिविंग में शगुन उनके लिए चाय लेकर गयी तो साथ में खाकी लिफाफा भी उन्हें पकड़ा दिया. पापा ने लेटर लेकर ध्यान से पढ़ा. "ये तो बहुत अच्छी खबर है. अब बनस्थली जाने की तैयारी करो."

बड़े भाई के मुहँ से बनस्थली का नाम सुन कर चाचा चौंके. तुरन्त शगुन की और गुस्से से देखा. “तुमने मुझे नहीं बताया, शैतान¡

“आपने पूछा ही नहीं.” यह कह कर शगुन वापस किचन की ओर चली गयी.


रात को भोजन के समय जब सब साथ थे. माँ कहने लगीं. "नए कपड़े भी सिलवाने पड़ेंगे, तीन-चार सलवार-सूट तो बनाने ही होंगे."

"कपड़ों की फिक्र न करो," चाची की आवाज़ ने बातचीत में दखल दिया. वे गर्म चपातियाँ लिए वहाँ थीं. खड़ी थीं. "बनस्थली में तो खादी पहननी पड़ती है. कुर्ता-पायजामा या सलवार-कमीज, सब खादी का. मेरी भांजी बताया था. और किताबें भी वहीं से मिलेंगी. कॉलेज बताएगा कि क्या चाहिए, और कैम्पस में ही प्रकाशक से भी कम दाम में मिल जाएंगी. खादी का कपड़ा और दर्जी भी वहीं मिल जाएंगे. उनका अपना सिस्टम है."

यह नई जानकारी थी. माँ हैरान थीं, "सारे कपड़े नए खादी के? यह तो बहुत... सादगी है."

पापा ने, जिनकी नज़र पहले ही कार के खर्च के बाद के बजट पर थी, राहत की सांस ली. "अच्छी बात है. कार के खर्च के बाद यह तो बहुत छोटी बचत है. सिस्टम से ही सब ले लेंगे, आसान रहेगा."

शगुन सुनती रही. उसकी तैयारियों में "नयापन" का कोई स्थान नहीं था. न नए कपड़े, न नई किताबें. सब कुछ एक पहले से तय, सादे, एक समान व्यवस्था का हिस्सा था. एक पल को उसे अजीब लगा, फिर एहसास हुआ; शायद यही तो बनस्थली का सबक था: बाहरी चमक-दमक से परे, भीतरी विकास पर ध्यान.

उस रात, डायरी के सामने बैठकर, शगुन के मन में एक तीव्र इच्छा उठी, आयुष से मिलने की. बिना उसे बताए, बिना उसकी थकी आँखों में अपनी खुशी की चमक देखे, यह सफलता अधूरी लग रही थी. वह जानती थी कोटा में रविवार को अवकाश होता है.


अगले दिन उसने पापा से कहा, "पापा, मैं बनस्थली जाने से पहले आयुष से मिलना चाहती हूँ. हम रविवार को ही कोटा चले जाएंगे. उससे मिलेंगे, रात कंपनी के गेस्ट हाउस में रुक लेंगे. सोमवार सुबह सीधे वहीं से बनस्थली के लिए रवाना हो जाएंगे."

पापा ने इस प्रस्ताव पर सोचा. यह व्यावहारिक था. एक ही यात्रा में दो काम और भावनात्मक संतुष्टि भी. उन्होंने शगुन को आश्चर्य से देखा, फिर सोचकर खुश भी हुए कि वह प्लानिंग में भी माहिर होती जा रही है. उन्होंने शगुन की ओर प्यार भरी नजरों से मुस्कुराते हुए देखा.

“तुमने ठीक कहा बेटा, ऐसा ही करेंगे.”

शगुन ने खिड़की से बाहर कार की ओर देखा. अब वह सिर्फ चमकदार साधन नहीं लग रही थी. वह एक पुल लग रही थी; उसके वर्तमान और भविष्य के बीच, उसके और उसके भाई के अलग-अलग संघर्षों के बीच. कल का रविवार उस पुल की पहली यात्रा होगी.