देहरी के पार, कड़ी - 70
रविवार, शाम छह बजने से पहले प्रिया और मयंक अंधेरी ईस्ट यूनियन कार्यालय के बाहर खड़े थे. मयंक ने देखा कि इमारत के मुख्य द्वार पर ‘एआईसीसीटीयू’ का बोर्ड लगा है. लेकिन साथ ही अनेक छोटे छोटे बोर्ड भी वहाँ लगे थे जिनमें ‘ईसीआई मजदूर यूनियन’ 'ऑटो चालक यूनियन' और 'आईटी एंड टेक्निकल एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन' के बोर्ड भी थे.
"दीदी, यहाँ आईटी और टेक्निकल कर्मचारियों और ऑटो चालकों का दफ्तर एक ही जगह है?" अपनी समझ के हिसाब से आटो चलाने वाले और टेक्निकल उत्पादों के फैक्ट्री मजदूरों और सूचना प्रोद्योगिकी के कर्मचारियों की यूनियनों को एक साथ एक ही जगह देख मयंक अचरज में पड़ गया था.
प्रिया ने मुस्कुराते हुए ऑफिस के भीतर कदम बढ़ाया, "हाँ मयंक. ये तीनों ही संगठन केंद्रीय मज़दूर संगठन 'एआईसीसीटीयू' (AICCTU) से संबद्ध हैं. मुंबई जैसे शहर में जहाँ जगह की किल्लत है, वहाँ अलग-अलग यूनियनें इस परिसर का साझा उपयोग करते हैं. चाहे कंप्यूटर पर कोड लिखने वाली उँगलियाँ हों या ऑटो का स्टीयरिंग थामने वाले हाथ, या फिर हथौड़ा चलाने वाले फैक्ट्री मजदूर, सभी की लड़ाइयाँ एक जैसी हैं. सभी मेहनत करते हैं उसके बदले वेतन पाते हैं. कानून भी शारीरिक, तकनीकी, ऑपरेशनल और क्लैरिकल काम करने वाले लोगों को श्रमिक ही कहता है. सबके विधिक अधिकार समान हैं. इनमें से केवल सुपरवाइजरी और प्रबंधकीय काम करने वालों को जरूर अलग किया गया है."
“दीदी, बाकी सब तो समझ गया पर ये ऑपरेशनल काम क्या हैं?”
“तू बता, ऑटो चालक क्या करते हैं?” प्रिया ने मयंक से पलटकर सवाल किया.
“आटो रिक्शा चलाते हैं.”
“आटो रिक्शा से लेकर हवाई जहाज तक सभी मशीनें हैं. कारखानों में भी बहुत मशीनें होती हैं जिन्हें लोग चलाते हैं. कंप्यूटर को भी कमांड देना होता है तब वह काम करता है. ये सब ऑपरेशनल काम हैं. ”
भीतर दाखिल होते ही बब्बन भाई ने उनका बेहद आदर से स्वागत किया. प्रशांत बाबू वहाँ पहले से मौजूद थे और कुछ वरिष्ठ चालकों के साथ किसी दस्तावेज़ पर चर्चा कर रहे थे. बैठक शुरू होने में अभी कुछ मिनट बाकी थे, इसलिए बब्बन भाई मयंक को दफ्तर के एक हिस्से में बनी 'लाइब्रेरी' दिखाने ले गए.
मयंक लाइब्रेरी में रखी अलमारियों को देखकर दंग रह गया. उसे उम्मीद थी कि यहाँ केवल कुछ पुरानी पत्रिकायें या अख़बार होंगे. लेकिन वहाँ 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट', 'मोटर व्हीकल एक्ट', 'एम्पलॉइज कम्पेन्सेशन एक्ट', ‘आई टी एक्ट’ जैसी कानूनी किताबों के साथ-साथ कार्ल मार्क्स, लेनिन और शहीद-ए-आजम भगत सिंह का वैचारिक साहित्य, विश्व के अनेक नामवर साहित्यकारों के उपन्यास और इतिहास की पुस्तकें बेहद करीने से सजी हुई दिखाई दे रही थीं. मेज़ पर दो-तीन ऑटो चालक अपनी खाकी वर्दी में पूरी एकाग्रता से कुछ नोट्स पढ़ रहे थे. मयंक को समझ आया कि इस महानगर का श्रमजीवी वर्ग केवल शारीरिक श्रम नहीं कर रहा, बल्कि अपनी विधिक और वैचारिक लड़ाई के लिए बौद्धिक रूप से भी खुद को समृद्ध बनाने में लगा है.
ठीक छह बजे 'ऑटो चालक यूनियन' की कार्यकारिणी की बैठक शुरू हुई. यह यूनियन उस 'ऑटो रिक्शा चालक-मालक संघटना संयुक्त कृती समिती' की एक मुख्य घटक थी, जिसे आगामी संघर्ष के लिए एक मोर्चे के रूप में गठित किया गया था. बैठक में 9 जून को सरकार को दिए गए 'हड़ताल के नोटिस', किराया दर संशोधन और चालकों के लिए 'कल्याण बोर्ड' के गठन जैसी मांगों और हड़ताल का संचालन किस तरह से होना है जैसे मुद्दों पर अनुशासित और गंभीर चर्चा होने लगी. प्रिया और मयंक पीछे की कुर्सियों पर बैठकर इस चर्चा को देख-सुन रहे थे.
जब बैठक अपने अंतिम चरण में पहुँची, तो बब्बन भाई अचानक माइक पर आए. उनकी आवाज़ में एक अलग ही खनक थी, "साथियों! आज की इस कार्यकारिणी की बैठक में हमारे बीच एक ऐसी शख्सियत मौजूद हैं, जिन्होंने टेक्सटाइल मिल मज़दूरों की कानूनी लड़ाई में प्रबंधन के पसीने छुड़ा दिए. वे 'आईटी एंड टेक्निकल एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन' की एक प्रखर नेता हैं. मैं गुज़ारिश करूँगा हमारी प्रिया दीदी से कि वे आएँ और हमारे साथियों का मार्गदर्शन करें."
प्रिया के नाम की घोषणा होते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा. मयंक ने चकित होकर दीदी की तरफ देखा. प्रिया के चेहरे पर कोई हड़बड़ाहट नहीं थी; उसके हाव-भाव में एक परिपक्व श्रमिक नेता की गंभीरता थी. वह सधे हुए कदमों से माइक पर पहुँची.
प्रिया ने कोई पारंपरिक, उत्तेजक या राजनीतिक भाषण नहीं दिया. उसने बेहद तार्किक और विधिक भाषा में बात शुरू की, "साथियों, जब आप सड़क पर ऑटो लेकर निकलते हैं, तो आप सिर्फ एक गाड़ी नहीं चला रहे होते, आप इस मुंबई महानगर की आर्थिक रीढ़ को गति दे रहे होते हैं. इसलिए, जब आप किराया संशोधन या कल्याण बोर्ड की मांग करते हैं, तो वह कोई भीख नहीं है, बल्कि इस व्यवस्था में आपके श्रम का जायज कानूनी हिस्सा है. सरकार को दिया गया 9 जून को हड़ताल का नोटिस आपकी ताकत है, लेकिन इस ताकत की असली सफलता आपके सांगठनिक अनुशासन और विधिक स्पष्टता में है. हमें 9 जून के पहले कानून के दायरे में रहते हुए अपनी मांगों को इतनी मज़बूती से सरकार और जनता के सामने रखना होगा कि प्रशासन के पास झुकने के अलावा कोई चारा न बचे."
पीछे बैठा मयंक मंत्रमुग्ध होकर अपनी दीदी को देख रहा था. कल समंदर की लहरों के बीच आकाश भैया ने जो कहा था, वह आज उसकी आँखों के सामने सच हो रहा था—बदलाव रातों-रात नहीं आते, उनके पीछे कड़ा अनुशासन और दृढ़ वैचारिक धरातल होता है. दीदी का यह रूप देखकर मयंक का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था.
मीटिंग समाप्त होने के बाद, हॉल में थोड़ी चहल-पहल कम हुई. मयंक लाइब्रेरी जाकर कुछ चालकों के साथ उनके अनुभवों पर चर्चा करने लगा. इसी बीच, दफ्तर के एक शांत कोने में प्रशांत बाबू और प्रिया को बात करने के लिए कुछ पल का एकांत मिल गया.
प्रशांत बाबू ने अपनी आँखों पर चश्मा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बेहद आत्मीय लहजे में पूछा, "तो प्रिया... आज रविवार भी बीतने को है. उस दिन मैंने तुमसे पार्टी मेंबरशिप के बारे में बात की थी, उस पर क्या फैसला किया तुमने? अपने भीतर के द्वंद्व से बाहर आ पाईं?"
प्रिया ने कुछ पल के लिए अपनी नजरें झुकाईं, फिर प्रशांत बाबू की ओर देखते हुए पूरी ईमानदारी और परिपक्वता के साथ अपना असमंजस सामने रख दिया, "सर, मैं इस आंदोलन से, इन मज़दूरों से और साम्यवाद के महान आदर्शों से दिल से जुड़ी हूँ. लेकिन जब बात औपचारिक रूप से पार्टी मेंबरशिप लेने की आती है... तो मेरे भीतर एक गहरा संकोच और असमंजस खड़ा हो जाता है. मुझे लगता है कि क्या मैं अभी इस सांगठनिक अनुशासन और इसकी राजनीतिक ज़िम्मेदारियों के लिए पूरी तरह तैयार हूँ? मेरी अपनी कुछ पारिवारिक सीमाएँ और संकोच भी हैं, जिन्हें मैं अनदेखा नहीं कर सकती."
प्रशांत बाबू को उसकी बात सुनकर मन ही मन बहुत प्रसन्नता हुई. उनके चेहरे पर एक आत्मीय और गम्भीर मुस्कान उभर आई. वे हल्के से हँसे और बोले, "प्रिया, मुझे लगता है कि तुमने पार्टी मेंबरशिप को बहुत अधिक गंभीरता से ले लिया है. खैर, यह तुम्हारा अपनी वैचारिक ईमानदारी के प्रति सम्मान ही है कि तुम इसे इतनी गहराई से सोच रही हो."
उन्होंने प्रिया के कंधे पर थपकी देते हुए आगे कहा, "कोई बात नहीं. इस तरह के वैचारिक द्वंद्व बहुत स्वाभाविक हैं. मैं अगले वीकेंड पर तुम्हारे फ्लैट पर ही आ जाऊँगा. वहीं बैठकर, चाय के साथ हम एक बार फिर इस विषय पर विस्तार से बात करेंगे. तब तक तुम शांत मन से विचार करो."
प्रशांत बाबू के इस आश्वासन और बड़प्पन से प्रिया के मन का एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया. उसने राहत की सांस ली. बाहर मुंबई की रात घनी हो रही थी, लेकिन अंधेरी ईस्ट के इस दफ्तर से निकलते हुए प्रिया और मयंक के भीतर विचारों की एक नई रोशनी टिमटिमा रही थी.
... क्रमशः