पिंजरा और पंख-42
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
8 अप्रेल 2007. सुबह आयुष की आँख खुली, उसने घड़ी देखी, छह बजने में तीन मिनट. उसने अपनी दिमागी घड़ी को धन्यवाद दिया और अलार्म बन्द किया. आज शरीर बहुत हल्का लगा उसमें मॉक टेस्ट के दिनों जैसा भारीपन नहीं था. पैरों में चप्पल डाल कर वह बाहर आया तो देखा होस्टल में सभी छात्र न केवल जाग चुके थे, बल्कि कुछ परीक्षा केन्द्र जाने के लिए तैयार हो रहे थे तो कुछ अभी से तैयार होकर नोट्स देखने में लगे थे. वह तसल्ली से सीढ़ियाँ उतर कर नीचे मैस में गया. पारलेजी का सबसे छोटा बिस्कुट पैक लिया और चाय के साथ गटके. फिर एक चाय और लेकर पी. लौटते ही बाथरूम में घुसा. वह ठीक आठ बजे बिलकुल तैयार था. उसकी नजर दीवार पर लगे कैलेंडर पर पड़ी जिस पर आठ अप्रेल के नीचे उसने लाल स्केच पेन से लिखा था— "सत्य से साक्षात्कार का दिन, युद्ध का नहीं." उसके चेहरे पर अनायास ही मुस्कान आ गयी. उसने महसूस किया कि पिछले दो सालों में उसने जो हज़ारों पन्ने काले किए थे, वे सिर्फ फॉर्मूले नहीं थे, वे प्रकृति की भाषा को समझने की कोशिश थी.
परीक्षा आरंभ होने के पच्चीस मिनट पहले वह परीक्षा हॉल में था. जब पहला पेपर सामने आया, तो चारों ओर पन्ने पलटने की सरसराहट और छात्रों की तेज होती सांसें सुनाई देने लगीं. आयुष ने कलम उठाई. जटिल कैलकुलस के सवालों के बीच वह उलझा नहीं, बल्कि उसे उनमें एक लय (Rhythm) दिखाई देने लगी. उसे लगा जैसे संख्याएँ उससे बात कर रही हैं.तीन घंटे कब बीते, पता नहीं चला.
अगला पेपर दो घंटे बाद दो बजे था. बीच के अंतराल में बाहर की सड़कों पर किसी मेले जैसा माहौल था, छात्र दूसरे के उत्तरों को 'चेक' कर रहे थे. आयुष इस शोर से दूर, एक रेस्टोरेंट में बैठा, उसने हल्का भोजन किया, कॉफी पी और एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया. उसने आँखें मूँद लीं. उसे शगुन से कही अपनी ही बात याद आई—"मैंने विज्ञान में विराट देखा है. क्या नहीं है वहाँ" आयुष के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गयी, विज्ञान की ये तमाम थ्योरियाँ इस विराट प्रकृति की व्याख्या के सिवा और क्या हैं. विज्ञान 'सत्य की तलाश' ही तो था. हर नया सत्य एक और नए सत्य की तलाश के रास्ते खोल देता है. उसे पिछले साल के शुरू में रैंक की जो चिन्ता होती थी वह याद आई, फिर उसके होंठों पर मुस्कान तैर गयी. वह 'रैंक' की चिंता अब एकदम तुच्छ चीज लग रही थी.
इस दौरान उसका मन एकदम साफ था. फिजिक्स के पेचीदा सवालों को हल करते वक्त उसे लगा था जैसे वह कोई युद्ध नहीं जीत रहा, बल्कि एक पुराने दोस्त से सुलह कर रहा है. शाम पाँच बजे की 'लॉन्ग बेल' बजी, उसके पहले आयुष की आज की आखिरी आंसर शीट तैयार थी. उसने पेन अपनी जेब में लगाया और एक लंबी, गहरी सांस लेकर उठा, आंसर शीट परीक्षा निरीक्षक के हवाले हॉल से बाहर निकला तो उसका शरीर में थकान तो थी, लेकिन कोई बोझा नहीं. वह परिणाम के बोझ, 'एवरेज' होने के भय और दूसरों की उम्मीदों से पूरी तरह मुक्त था.
हॉल से एक साथ निकलने के कारण परीक्षार्थी एक छोटी भीड़ में बदल गए थे. उसे बाहर जाने की कोई जल्दी नहीं थी. वह धीरे-धीरे परीक्षा केन्द्र से बाहर निकला. धूल, धुएँ और शोर के बीच उसने खुद को अकेला महसूस किया. उसके दिमाग में अब बस एक ही बात थी—होस्टल से बैग उठा कर बस स्टैंड जाना है, रामगंजमंडी के लिए बस पकड़नी है.
तभी भीड़ के उस पार उसे पहचानी सी 'कोरल रेड मारुति 800' दिखी. कार के पास सफेद शर्ट में खड़े उसके पापा ही थे. उनके बगल में खड़ी शगुन, पागलों की तरह उसकी तरफ हाथ हिला रही थी.
आयुष की आँखों में अचानक नमी उतर आई. यह वही 'रामगंजमंडी में स्टोन-डस्ट मिली धूल से सना हुआ लड़का था, जो आज खुद को ‘प्रकृति' का हिस्सा महसूस कर रहा था. जब वह पास पहुँचा, तो शगुन ने उसे लपक कर गले लगा लिया. आयुष की थकान शगुन की इस झप्पी ने हवा में उड़ा दी.
पापा ने बस इतना पूछा, "थक गया होगा?" आयुष बस मुस्कुरा दिया. पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा, इस हाथ में उसे आज पहली बार 'दबाव' नहीं, बल्कि 'सराहना' थी.
वे होस्टल पहुँचे, आयुष ने अपना बैग लिया और कुछ ही देर में उनकी कार झालावाड़ रोड पर थी. पौन घंटे बाद गुप्ताजी ने कार दरा-स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे लगाई. लाला जी का होटल सामने ही था. कारीगर ने कढ़ाई से गर्म-गर्म कचौड़ियाँ अतिरिक्त तेल हट जाने के लिए निकाल कर झारी पर ही रख रखी थीं. गुप्ताजी ने सभी को दो-दो कचौड़ियाँ देने के लिए कहा. कुछ ही समय में कचौड़ियाँ खट्टी-मीठी चटनियों के साथ उनकी टेबल पर थीं. तभी शगुन ने पूछा, “यहाँ का तो कलाकंद भी मशहूर है न पापा?
गुप्ताजी ने शगुन के सवाल के जवाब में सभी के लिए कलाकंद भी मंगा लिया. चाय पीकर जब वे खड़े हुए तो. शगुन ने कहा, “पापा कलाकंद वाकई बहुत स्वादिष्ट है. गुप्ताजी ने किलो भर कलाकंद घर के लिए और लिया. कार ने रामगंजमंडी में प्रवेश किया तब रात के आठ बज रहे थे. जैसे ही कार घर के सामने रुकी, मम्मा दरवाज़े पर खड़ी मिलीं. उनकी गोद में नन्ही 'मुक्ति' थी.
आयुष ने कार से उतरकर मम्मा के पैर छुए और फिर मुक्ति को अपनी बाहों में ले लिया. वह आयुष की गोद में आते ही मुस्कुराई. मुक्ति की इस छोटी सी मुस्कान ने जैसे आयुष के 'सत्य-साक्षात्कार' पर अपनी मुहर लगा दी. उसे अहसास हुआ कि विज्ञान का असली आनंद तो इस 'प्रेम' और 'मुक्ति' में ही छुपा है.
उस रात रामगंजमंडी के उस पुराने घर में 'आईआईटी' की कोई चर्चा नहीं हुई. वहाँ सिर्फ एक परिवार था, जो महीनों बाद एक साथ खाना खा रहा था—एक ऐसे आयुष के साथ, जो अब 'रैंक' की रेस से आज़ाद हो चुका था.
... क्रमशः