@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

पिघलती बर्फ

देहरी के पार, कड़ी - 72
प्रिया चाय बनाने रसोई में चली गई, मयंक ने अपने मोबाइल से पापा को कॉल लगाई. पाँच लंबी रिंग के बाद माँ की आवाज़ गूंजी, “हेलो.”

"नमस्ते मम्मी, आप कैसी हैं? और पापा कैसे हैं?" मयंक ने बहुत आत्मीयता से पूछा.

"हम ठीक हैं बेटा, पापा बाथरूम में नहा रहे हैं, तू बता. मुंबई कैसी लगी? प्रिया कैसी है? तू तो मुंबई की चमक में प्रिया की तरह हमें भी भूल गया, वहाँ पहुँचा तब फोन किया था, उसके बाद आज कर रहा है.” उधर से माँ का ममता भरा उलाहना मिला, लेकिन माँ की आवाज़ में हमेशा जैसी खनक नहीं थी, एक थकान सी घुली हुई थी.

"मैं ठीक हूँ, मम्मी. दीदी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं."

माँ ने एक हल्की सी सांस ली, "पापा अभी आधा घंटा पहले मंडी से लौटे हैं. चाय पी और अब बाथरूम में नहाने गए हैं. मंडी में गर्मी के मारे दिन में हालत खराब हो जाती है. तुझे तो पता है उनका स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहता, दिनभर की भागदौड़ में जल्दी थक जाते हैं. पॉलिश फैक्ट्री में भी बस एक ही मशीन चल रही है, बाकी बंद कर दी हैं. खान से ही अच्छा पत्थर कम आ रहा है. बाजार में तरह-तरह की टाइलें आ गई हैं, कोटा स्टोन का क्रेज़ यहाँ कोटा में ही नहीं रहा. कई पॉलिश फैक्टरियाँ बंद हो गईं. तेरे पापा कहते हैं कि कोई अच्छा ग्राहक मिलते ही पॉलिश फैक्ट्री बेच देना चाहिए, वरना बाद में मशीनें कबाड़ में बिकेंगी."

माँ की बातें सुनकर मयंक का चेहरा गंभीर हो गया. माँ जो कह रही थी, वह कोई ताजा स्थिति नहीं थी. दो सप्ताह पहले जब वह कोटा में था, तब भी यही हाल था. लेकिन ये बातें माँ ने पहले कभी नहीं कही थीं. इन बातों से उसे चिंता होने लगी. उसकी आँखों के सामने पिता का वह थका हुआ चेहरा तैर गया जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अकेले परिवार का आर्थिक मोर्चा थामे हुए थे. मयंक ने महसूस किया कि उसका एमबीए अब पूरा हो चुका है, रिजल्ट भी हफ्ते भर में आने वाला है. उसे तुरंत कोटा लौटना चाहिए. “हाँ मम्मी-पापा की बात तो सही है. पॉलिश फैक्ट्री का तो कोई मतलब नहीं रहा.”


“तेरे पापा कह रहे थे कि बेहतर है कि फैक्ट्री बेचकर उसकी जगह टाइलों के स्टॉकिस्ट बन जाएँ. पूरा हाड़ौती का एरिया रहेगा. सब जगह माल सप्लाई करेंगे तो कई गुना कमाया जा सकता है.”

“हाँ माँ, उनकी बात सही है. पर मैं वहाँ आऊंगा, तब ये बातें करेंगे.”

“अच्छा प्रिया कहाँ है? उससे बात करा.”

“वह रसोई में चाय बना रही है.”

“चल ठीक है, तेरे पापा नहाकर आते ही बात कराती हूँ.”

मयंक ने फोन रखा ही था कि प्रिया ट्रे में चाय के कप लिए रसोई से बाहर आई. उसने मयंक के गंभीर चेहरे को देखा और पूछा, "क्या हुआ मयंक? पापा से बात हो गई?"

चाय का कप थामते हुए मयंक ने गहरी आवाज़ में कहा, "हाँ दीदी. पापा नहा रहे थे, मम्मी से बात हुई. अब वे थकने लगे हैं. उनका स्वास्थ्य अब उतना अच्छा नहीं रहता. पॉलिश फैक्ट्री में केवल एक मशीन चल रही है. उसका कोई भविष्य नहीं रहा. आढ़त में कॉम्पिटीशन बहुत हो गया है, वो तो किसानों से पुराने रिश्ते हैं, इसलिए सब ठीक चल रहा है. कोटा में बिज़नेस की स्थिति भी ठीक नहीं है. लगता है कि मुझे अब तुरंत वापस कोटा जाना चाहिए. वहाँ पापा को मेरी ज़रूरत है. मुंबई खूब घूम लिया हूँ. बाकी कुछ रहा होगा तो फिर कभी घूम लूंगा.

प्रिया ने अपने छोटे भाई को देखा. कद में तो उसने ऊँचाई प्राप्त कर ही ली थी. लेकिन आज उसकी बातों में जिस वैचारिक समझ और ज़िम्मेदारी का भाव था, उससे प्रिया का दिल भर आया. उसका छोटा भाई अब सचमुच समझदार हो चला था. हालांकि भाई के जाने की बात से उसके मन में उदासी की हल्की सी लहर उठी. पर उसका अहसास उसने मयंक को नहीं होने दिया. तभी मयंक के फोन की घंटी बज उठी. पापा थे.

मयंक ने लपक कर उसे लिया और कहा, ‘हेलो पापा, प्रणाम.”

“हाँ, मयंक कैसा है? मुंबई घूम लिया.”

“हाँ पापा, पहली बार में जितना घूमा जा सकता है उससे कुछ अधिक ही घूम लिया.”

“फिर कब आ रहा है?”

“बस अभी रिजर्वेशन देखता हूँ, जिस दिन का टिकट मिलेगा रवाना हो जाऊंगा.”

“अच्छा ठीक है. प्रिया कहाँ है? वह हो तो उसे फोन दे.”

“देता हूँ पापा.”

मयंक ने तुरन्त फोन प्रिया की ओर बढ़ाया. “दीदी, पापा, आपसे बात करेंगे.” प्रिया ने फोन ले लिया.”

“हाँ पापा, प्रणाम¡ आप कैसे हैं?

“मैंने फोन किया तो पूछ रही है, पापा कैसे हैं? तू इतनी नाराज है मुझसे? कि कभी सोचती भी नहीं कि पापा के हाल ही पूछ लें?”

“नहीं पापा ऐसी बात नहीं है. बस हिम्मत नहीं पड़ती.”

“बड़ी अजीब है तू, शादी को बीच में छोड़कर घर से निकलने में डर नहीं लगा, पर पापा से बात करने में लगता है?”

“नहीं पापा वो बात नहीं है.”

“तो फिर क्या है? क्या तू ये सोचती है कि पापा क्या बात करेंगे? ... अब मैं जानता हूँ, विक्रांत को समझने में मैंने बहुत बड़ी गलती की थी. मैं समझता था वह संस्कारी लड़का है. पर उसने बहुत बड़ा धोखा दिया. हमें तो दिया ही, कोटा के सारे व्यापार जगत को भी धोखा दिया. आज उसकी हालत ये है कि वह कोटा में किसी तरह का धंधा नहीं कर सकता. यहाँ की प्रोपर्टी बेचने की फिराक में है. यहाँ कभी-कभी चुपके से आता है, उसका पता भी तब लगता है जब वह चला जाता है. सुना है स्थायी रूप से मुंबई ही शिफ्ट हो जाएगा. तूने अच्छा किया जो शादी से भाग गई. तेरी शादी हो जाती, और तो मैं तो जीते जी मर जाता. तूने मुझे भी बचा लिया. मैं तेरा गुनहगार हूँ.” इतना बोलते-बोलते पापा की आवाज रुंध गई थी. प्रिया सन्न होकर सुन रही थी.

“पापा ये आप क्या कह रहे हैं? मैं जानती थी कि आप जल्दी ही समझ जाएंगे. उसकी बहुत सी बातें तो मुझे भी पता नहीं थीं. आप शान्ति रखें. ऐसी बातें न सोचें. मैं भी छुट्टी लेकर कोटा आऊंगी, तब सब नॉर्मल हो जाएगा. बस आप अपना ध्यान रखें.”

“हाँ बेटा, मैं क्या कहूँ? मैं तो तुमसे कुछ भी कहने का नहीं रहा. यह घर पहले तेरा है, हमारा और मयंक का बाद में. तू आ तो सही.”

“पापा, अब आप ये फिजूल की बातें छोड़ें. मयंक अभी जल्दी लौटने की कह रहा था. मैं उसका टिकट बुक करवा देती हूँ. वह जल्दी कोटा पहुँच जाएगा. एक बात और पापा. मयंक वहाँ पहुँच जाए. कुछ दिन वहाँ का काम ये देख लेगा. आप और मम्मी दोनों मुंबई आ जाइए, कम से कम एक सप्ताह के लिए. मैं भी छुट्टी ले लूंगी. साथ रहेंगे.”

“नहीं प्रिया अभी मुश्किल है. एकदम सब कुछ मयंक कैसे संभालेगा?”

“जैसे आपके बीमार होने पर संभालता था, वैसे ही संभाल लेगा. मैं मयंक को कहती हूँ. वहाँ जाकर यह आपको फ्री करेगा और आप और मम्मी मुंबई आ रहे हैं.”

“ठीक है, पहले मयंक को यहाँ आने दे, फिर सोचेंगे. तू ठीक से रहना और अपना ध्यान रखना.”

“हाँ, पापा.” उसने कहा. तभी उधर से फोन कट गया. प्रिया ने फोन मयंक को लौटा दिया.

“दीदी, अब मुझे जल्दी कोटा लौटना पड़ेगा.” मयंक ने फोन लेते हुए कहा.

"मैं समझ सकती हूँ मयंक," प्रिया ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा. "तू बिल्कुल सही सोच रहा है. चल, मैं अभी तेरा रिजर्वेशन देखती हूँ."

प्रिया ने तुरंत अपना लैपटॉप खोला और आईआरसीटीसी (IRCTC) की वेबसाइट पर जाकर अगले शनिवार, 29 जून 2019 की रात की ट्रेन में मयंक का टिकट बुक कर दिया.

"ले मयंक, अगले शनिवार का रिजर्वेशन पक्का हो गया. इस तरह तेरे पास मुंबई में अभी चार-पाँच दिन और हैं. मेरा प्रोजेक्ट पूरा होने को है. कोई अड़चन न आई तो कल के बाद मेरे पास कुछ दिन कोई खास काम न रहेगा. मैं भी छुट्टी ले लूंगी, साथ घूमेंगे." प्रिया ने लैपटॉप बंद करते हुए कहा.

“हाँ दीदी, आप साथ रहेंगी तो घूमने का आनंद कुछ और ही होगा,” मयंक ने कह दिया, लेकिन अचानक उसे अहसास हुआ कि पापा से बात और उसके कोटा लौटने की बात से प्रिया उदास हो चली है. उसने तुरन्त बात बदली. “दीदी, हमने चाय तो पी ली. पर अब तेज भूख लगी है.”

“चल तू बैठकर टीवी देख. मैं खाना बनाने की तैयारी करती हूँ.”

“नहीं दीदी, आप रहने दो. क्यों न हम ‘चपाती’ रेस्टोरेंट चलें.”

“तू यही चाहता है तो चल तू अपने कपड़े बदल मैं भी तैयार होकर आती हूँ.” यह कहते हुए प्रिया अपने बेडरूम की ओर चल दी.
... क्रमशः

शुक्रवार, 26 जून 2026

सीख

देहरी के पार, कड़ी - 71
प्रिया और मयंक यूनियन ऑफिस से बाहर निकले, तब तक मुंबई की रात गहरा चुकी थी. ऑटो में बैठते ही मयंक ने एक लंबी और गहरी सांस ली. उसके चेहरे पर अपनी दीदी के लिए गर्व का एक ऐसा भाव था, जिसे वह छुपा नहीं पा रहा था.

"दीदी, मुझे तो आज पता लगा, आप तगड़ी वाली स्पीच भी देती हैं. मैं तो सुनकर दंग ही रह गया. मैंने आपको कभी इस रूप में नहीं सोचा था. मुंबई जैसे महानगर की सबसे बड़ी ऑटो चालक यूनियन की वर्किंग कमेटी को आप सहज होकर संबोधित कर रही थीं. उन्हें उनके अधिकारों का अहसास तो कराया ही, वे जिस संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए हैं उसे पूरी ताकत से चलाने के लिए उन्हें प्रेरित भी किया. दीदी, यह सब आपने कब सीख लिया?”

“कहीं नहीं सीखा, मयंक, इसे सीखने की जरूरत ही नहीं थी. आज जो भी मैंने कहा, वह सब मेरे अंदर से स्वतः ही निकल पड़ा था. जब हम किसी के साथ दिल से जुड़ते हैं, उनकी तकलीफों को समझने लगते हैं, तब यह भी पता लगता है कि इन तकलीफों का कारण क्या है? और इनसे निकलने का रास्ता क्या है? मैं इनमें से किसी को नहीं जानती थी. लेकिन विक्रांत के दखल से निपटने के दौरान इन सबने मेरी तकलीफ को समझा. मुझे बिना जाने मेरे साथ दिया और मुझे उस बड़े संकट से निकाला. उन सबने मेरे साथ एक रिश्ता कायम किया था. मैं उनकी ऋणी हो गई थी. इस ऋण को केवल तकलीफों में और उनसे निकलने की लड़ाई में एक दूसरे का साथ देकर ही चुकाया जा सकता था. असल में यह ऋण जैसी चीज भी नहीं थी. यह एक दूसरे के कामों को सम्मान से देखने, किसी मेहनत करने वाले को कमतर न समझने और उनके साथ मिलकर एक हो जाने की बात है.” प्रिया ने उसे समझाने की कोशिश की.

“दीदी, वह सब तो ठीक है, लेकिन तुम एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो. दिनभर ऑफिस में बैठकर काम करती हो, सालाना 30-35 लाख कमाती हो. ये ऑटो ड्राइवर सड़कों पर ऑटो चलाते हुए मुश्किल से पाँच-सात सौ रोज का कमाते होंगे. आपका और उनका साथ कैसे हो सकता है?”

“क्यों नहीं हो सकता? उनके और हमारे श्रम में क्या फर्क है? यही नहीं कि हमें अपने श्रम का मूल्य अधिक मिलता है और उन्हें बहुत कम. हम भी श्रम करते हैं और वे भी. दोनों के श्रम एक ही हैं. हमारा श्रम शारीरिक कम और बौद्धिक अधिक है, उनका शारीरिक अधिक, बौद्धिक कम. उन्हें अपने श्रम का मूल्य कम मिलता है और हमें अधिक. तो यह सब हमारे सिस्टम का दोष है, यह हमारे सिस्टम का अन्याय है. सभी को श्रम का इतना मूल्य तो मिलना ही चाहिए कि वह अपने परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन दे सके.”

“दीदी, मुझे कुछ ज्यादा समझ नहीं आया. आपकी और ऑटो ड्राइवरों की लड़ाई में क्या समानता हो सकती है?”

“है, समानता है. तुम्हें मेरे जीवन में तो नौकरी से संबंधित कोई संघर्ष ही नहीं दिखाई दिया होगा. पर है. हम यहाँ रोज ऑफिस जाते हैं, वहाँ जाने का समय तो निश्चित है, लेकिन लौटने का नहीं. यदि किसी दिन कोई काम उलझ पड़ा तो रात भर चलता रहता है और रात को ऑफिस में ही रुकना पड़ता है. जब मैं घर से काम कर रही थी तो तुमने नोट किया होगा कि महीने में कम से कम चार पाँच दिन ऐसे होते थे जब मेरा काम रात में कब पूरा हुआ, तुम्हें पता नहीं लगता था. सुबह तुम पूछते थे, ‘दीदी रात को कितने बजे सोई?’ कभी-कभी तो रात को मैं और मेरी टीम दो-तीन बजे रेस्ट पर जाते थे और सुबह अलार्म लगाकर पाँच बजे फिर उठते और काम पर लग जाते थे. क्या हमारे काम की यह स्थितियाँ वाजिब हैं? क्या अधिक वेतन पाने से हमारा रोज 8 घंटे से अधिक और सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम नहीं करने का अधिकार समाप्त हो जाता है? ”

“नहीं, बिल्कुल नहीं.” मयंक ने जवाब दिया.

“हमारे पास यह अधिकार है, लेकिन हमारी ओर से इसके विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा जाता. हमारे काम की शर्तें भी अमानवीय हैं. यदि हमारी कंपनी के पास किसी कारण से काम कम हो जाए, तो तुरंत हजारों लोगों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया जाता है. एक इंजीनियर जो रोज दस हजार से अधिक कमा रहा था, अगले ही दिन बेरोजगार हो जाता है. कुल मिलाकर हम भी उजरती मजदूर ही हैं. हम भी अपने श्रम को ही बेचते हैं, जैसे कारखानों के मजदूर, जैसे आटो ड्राइवर. हम सभी की लड़ाई एक ही है. हमारे ज्यादातर सॉफ्टवेयर इंजीनियर ऐसा नहीं समझते. लेकिन मैं समझ गई हूँ. मेरे कुछ और साथी भी समझ गए हैं. वे यूनियन के मेंबर बने हैं. वक्त के साथ बाकी भी समझ जाएंगे. हमें भले ही वेतन अच्छा मिलता हो, लेकिन हैसियत हमारी भी मजदूर जैसी ही है. एक दिन वक्त बाकी को भी सिखा देगा. कि वे क्या हैं. उस दिन वे भी यूनियन के मेंबर होंगे और अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे.”

ऑटो प्रिया की सोसायटी पहुँच गया था. प्रिया ने ऑटो को रुकने को कहा. आटो रुका तो दोनों नीचे उतरे. प्रिया भाड़ा देने के लिए मीटर देखकर अपने पर्स को खंगालने लगी. तभी ऑटो चालक बोल पड़ा.

“दीदी., भाड़ा रहने दो. आज आपने आपस में बातें करते हुए मुझे बहुत कुछ सिखा दिया. मुझे पता था जहाँ से आप बैठी थीं वहाँ यूनियन ऑफिस है और वहाँ आज ऑटो चालकों की यूनियन की मीटिंग थी. मैं अभी तक यूनियन का मेंबर नहीं बना हूँ. मुझे समझ ही नहीं आता था कि यूनियन का मेंबर क्यों होना चाहिए. पर जब आपकी बातें सुनी कि आप एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर होते हुए भी एक ऑटो ड्राइवर में और खुद में भेद नहीं समझतीं और दोनों की लड़ाई एक है तो समझ में आया कि यूनियन से ही हमारी ताकत बनती है. अब मैं कल ही यूनियन का मेंबर बनूंगा. आज का भाड़ा, मुझे यह सब सिखाने की फीस समझ लें. मैं भाड़ा नहीं लूंगा.”

“नहीं भैया, आटो में पेट्रोल, डीजल भी जलता है और तुम्हारी मेहनत भी है. भाड़ा तो आपको लेना होगा.” इतना कहते हुए प्रिया ने पचास रुपए का नोट निकालकर आटो चालक को पकड़ाते हुए बोली. “ भैया आप कल सुबह यूनियन ऑफिस जाकर मेंबरशिप लेंगे और आने वाले आंदोलन में साथ देंगे तो मेरी फीस मुझे मिलेगी. इस फीस की कोई कीमत नहीं है.”

“दीदी, ठीक है. मैं ले लेता हूँ. पर ये पचास का नोट मैं अपने मोबाइल कवर में लगाकर रखूंगा. ताकि आपसे मिलना मुझे हमेशा याद रहे.”

दोनों फ्लैट में पहुँचे तो मयंक कहने लगा, “दीदी आज मम्मी-पापा से बात करते हैं. न जाने क्यों पापा की तरफ से अब डर लगने लगा है. उनका स्वास्थ्य अब उतना बढ़िया नहीं रहता, फिर भी आढ़त का काम वे खुद देखते हैं. फैक्ट्री तो अब बंद होने जैसी है. बाजार में कोटा स्टोन का क्रेज खत्म हो गया है. इलाके में अच्छा पत्थर कम रह गया है. एक दिन पापा कह रहे थे कि कारखाना ग्राहक मिलते ही बेच देना चाहिए. फिर पॉलिश मशीनों की कौड़ियाँ भी नहीं मिलेंगी. पर मम्मी उन्हें मना कर देती हैं. कहती हैं, ‘आपने फैक्ट्री खड़ी की, आप ही बेच दोगे. कुछ तो बच्चों के लिए भी रहने दो.’ फिर पापा कहते हैं, ‘आढ़त है तो.’ फिर मम्मी शुरू हो जाती हैं ... ‘इस आढ़त में क्या रखा है, आप हैं तो आढ़त है…’ वगैरा वगैरा.”

“अच्छा, मैं चाय बना रही हूँ. एक-एक कप चाय पीते हैं, फिर खाने की तैयारी करेंगे. तब तक तू चाहे तो पापा से फोन पर बात कर ले.” प्रिया कहते हुए रसोई में चली गई.
... क्रमशः

शनिवार, 20 जून 2026

नया विचार

देहरी के पार, कड़ी - 70
रविवार, शाम छह बजने से पहले प्रिया और मयंक अंधेरी ईस्ट यूनियन कार्यालय के बाहर खड़े थे. मयंक ने देखा कि इमारत के मुख्य द्वार पर ‘एआईसीसीटीयू’ का बोर्ड लगा है. लेकिन साथ ही अनेक छोटे छोटे बोर्ड भी वहाँ लगे थे जिनमें ‘ईसीआई मजदूर यूनियन’ 'ऑटो चालक यूनियन' और 'आईटी एंड टेक्निकल एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन' के बोर्ड भी थे.

"दीदी, यहाँ आईटी और टेक्निकल कर्मचारियों और ऑटो चालकों का दफ्तर एक ही जगह है?" अपनी समझ के हिसाब से आटो चलाने वाले और टेक्निकल उत्पादों के फैक्ट्री मजदूरों और सूचना प्रोद्योगिकी के कर्मचारियों की यूनियनों को एक साथ एक ही जगह देख मयंक अचरज में पड़ गया था.

प्रिया ने मुस्कुराते हुए ऑफिस के भीतर कदम बढ़ाया, "हाँ मयंक. ये तीनों ही संगठन केंद्रीय मज़दूर संगठन 'एआईसीसीटीयू' (AICCTU) से संबद्ध हैं. मुंबई जैसे शहर में जहाँ जगह की किल्लत है, वहाँ अलग-अलग यूनियनें इस परिसर का साझा उपयोग करते हैं. चाहे कंप्यूटर पर कोड लिखने वाली उँगलियाँ हों या ऑटो का स्टीयरिंग थामने वाले हाथ, या फिर हथौड़ा चलाने वाले फैक्ट्री मजदूर, सभी की लड़ाइयाँ एक जैसी हैं. सभी मेहनत करते हैं उसके बदले वेतन पाते हैं. कानून भी शारीरिक, तकनीकी, ऑपरेशनल और क्लैरिकल काम करने वाले लोगों को श्रमिक ही कहता है. सबके विधिक अधिकार समान हैं. इनमें से केवल सुपरवाइजरी और प्रबंधकीय काम करने वालों को जरूर अलग किया गया है."

“दीदी, बाकी सब तो समझ गया पर ये ऑपरेशनल काम क्या हैं?”

“तू बता, ऑटो चालक क्या करते हैं?” प्रिया ने मयंक से पलटकर सवाल किया.

“आटो रिक्शा चलाते हैं.”

“आटो रिक्शा से लेकर हवाई जहाज तक सभी मशीनें हैं. कारखानों में भी बहुत मशीनें होती हैं जिन्हें लोग चलाते हैं. कंप्यूटर को भी कमांड देना होता है तब वह काम करता है. ये सब ऑपरेशनल काम हैं. ”

भीतर दाखिल होते ही बब्बन भाई ने उनका बेहद आदर से स्वागत किया. प्रशांत बाबू वहाँ पहले से मौजूद थे और कुछ वरिष्ठ चालकों के साथ किसी दस्तावेज़ पर चर्चा कर रहे थे. बैठक शुरू होने में अभी कुछ मिनट बाकी थे, इसलिए बब्बन भाई मयंक को दफ्तर के एक हिस्से में बनी 'लाइब्रेरी' दिखाने ले गए.

मयंक लाइब्रेरी में रखी अलमारियों को देखकर दंग रह गया. उसे उम्मीद थी कि यहाँ केवल कुछ पुरानी पत्रिकायें या अख़बार होंगे. लेकिन वहाँ 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट', 'मोटर व्हीकल एक्ट', 'एम्पलॉइज कम्पेन्सेशन एक्ट', ‘आई टी एक्ट’ जैसी कानूनी किताबों के साथ-साथ कार्ल मार्क्स, लेनिन और शहीद-ए-आजम भगत सिंह का वैचारिक साहित्य, विश्व के अनेक नामवर साहित्यकारों के उपन्यास और इतिहास की पुस्तकें बेहद करीने से सजी हुई दिखाई दे रही थीं. मेज़ पर दो-तीन ऑटो चालक अपनी खाकी वर्दी में पूरी एकाग्रता से कुछ नोट्स पढ़ रहे थे. मयंक को समझ आया कि इस महानगर का श्रमजीवी वर्ग केवल शारीरिक श्रम नहीं कर रहा, बल्कि अपनी विधिक और वैचारिक लड़ाई के लिए बौद्धिक रूप से भी खुद को समृद्ध बनाने में लगा है.

ठीक छह बजे 'ऑटो चालक यूनियन' की कार्यकारिणी की बैठक शुरू हुई. यह यूनियन उस 'ऑटो रिक्शा चालक-मालक संघटना संयुक्त कृती समिती' की एक मुख्य घटक थी, जिसे आगामी संघर्ष के लिए एक मोर्चे के रूप में गठित किया गया था. बैठक में 9 जून को सरकार को दिए गए 'हड़ताल के नोटिस', किराया दर संशोधन और चालकों के लिए 'कल्याण बोर्ड' के गठन जैसी मांगों और हड़ताल का संचालन किस तरह से होना है जैसे मुद्दों पर अनुशासित और गंभीर चर्चा होने लगी. प्रिया और मयंक पीछे की कुर्सियों पर बैठकर इस चर्चा को देख-सुन रहे थे.

जब बैठक अपने अंतिम चरण में पहुँची, तो बब्बन भाई अचानक माइक पर आए. उनकी आवाज़ में एक अलग ही खनक थी, "साथियों! आज की इस कार्यकारिणी की बैठक में हमारे बीच एक ऐसी शख्सियत मौजूद हैं, जिन्होंने टेक्सटाइल मिल मज़दूरों की कानूनी लड़ाई में प्रबंधन के पसीने छुड़ा दिए. वे 'आईटी एंड टेक्निकल एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन' की एक प्रखर नेता हैं. मैं गुज़ारिश करूँगा हमारी प्रिया दीदी से कि वे आएँ और हमारे साथियों का मार्गदर्शन करें."

प्रिया के नाम की घोषणा होते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा. मयंक ने चकित होकर दीदी की तरफ देखा. प्रिया के चेहरे पर कोई हड़बड़ाहट नहीं थी; उसके हाव-भाव में एक परिपक्व श्रमिक नेता की गंभीरता थी. वह सधे हुए कदमों से माइक पर पहुँची.

प्रिया ने कोई पारंपरिक, उत्तेजक या राजनीतिक भाषण नहीं दिया. उसने बेहद तार्किक और विधिक भाषा में बात शुरू की, "साथियों, जब आप सड़क पर ऑटो लेकर निकलते हैं, तो आप सिर्फ एक गाड़ी नहीं चला रहे होते, आप इस मुंबई महानगर की आर्थिक रीढ़ को गति दे रहे होते हैं. इसलिए, जब आप किराया संशोधन या कल्याण बोर्ड की मांग करते हैं, तो वह कोई भीख नहीं है, बल्कि इस व्यवस्था में आपके श्रम का जायज कानूनी हिस्सा है. सरकार को दिया गया 9 जून को हड़ताल का नोटिस आपकी ताकत है, लेकिन इस ताकत की असली सफलता आपके सांगठनिक अनुशासन और विधिक स्पष्टता में है. हमें 9 जून के पहले कानून के दायरे में रहते हुए अपनी मांगों को इतनी मज़बूती से सरकार और जनता के सामने रखना होगा कि प्रशासन के पास झुकने के अलावा कोई चारा न बचे."

पीछे बैठा मयंक मंत्रमुग्ध होकर अपनी दीदी को देख रहा था. कल समंदर की लहरों के बीच आकाश भैया ने जो कहा था, वह आज उसकी आँखों के सामने सच हो रहा था—बदलाव रातों-रात नहीं आते, उनके पीछे कड़ा अनुशासन और दृढ़ वैचारिक धरातल होता है. दीदी का यह रूप देखकर मयंक का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था.

मीटिंग समाप्त होने के बाद, हॉल में थोड़ी चहल-पहल कम हुई. मयंक लाइब्रेरी जाकर कुछ चालकों के साथ उनके अनुभवों पर चर्चा करने लगा. इसी बीच, दफ्तर के एक शांत कोने में प्रशांत बाबू और प्रिया को बात करने के लिए कुछ पल का एकांत मिल गया.

प्रशांत बाबू ने अपनी आँखों पर चश्मा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बेहद आत्मीय लहजे में पूछा, "तो प्रिया... आज रविवार भी बीतने को है. उस दिन मैंने तुमसे पार्टी मेंबरशिप के बारे में बात की थी, उस पर क्या फैसला किया तुमने? अपने भीतर के द्वंद्व से बाहर आ पाईं?"

प्रिया ने कुछ पल के लिए अपनी नजरें झुकाईं, फिर प्रशांत बाबू की ओर देखते हुए पूरी ईमानदारी और परिपक्वता के साथ अपना असमंजस सामने रख दिया, "सर, मैं इस आंदोलन से, इन मज़दूरों से और साम्यवाद के महान आदर्शों से दिल से जुड़ी हूँ. लेकिन जब बात औपचारिक रूप से पार्टी मेंबरशिप लेने की आती है... तो मेरे भीतर एक गहरा संकोच और असमंजस खड़ा हो जाता है. मुझे लगता है कि क्या मैं अभी इस सांगठनिक अनुशासन और इसकी राजनीतिक ज़िम्मेदारियों के लिए पूरी तरह तैयार हूँ? मेरी अपनी कुछ पारिवारिक सीमाएँ और संकोच भी हैं, जिन्हें मैं अनदेखा नहीं कर सकती."

प्रशांत बाबू को उसकी बात सुनकर मन ही मन बहुत प्रसन्नता हुई. उनके चेहरे पर एक आत्मीय और गम्भीर मुस्कान उभर आई. वे हल्के से हँसे और बोले, "प्रिया, मुझे लगता है कि तुमने पार्टी मेंबरशिप को बहुत अधिक गंभीरता से ले लिया है. खैर, यह तुम्हारा अपनी वैचारिक ईमानदारी के प्रति सम्मान ही है कि तुम इसे इतनी गहराई से सोच रही हो."

उन्होंने प्रिया के कंधे पर थपकी देते हुए आगे कहा, "कोई बात नहीं. इस तरह के वैचारिक द्वंद्व बहुत स्वाभाविक हैं. मैं अगले वीकेंड पर तुम्हारे फ्लैट पर ही आ जाऊँगा. वहीं बैठकर, चाय के साथ हम एक बार फिर इस विषय पर विस्तार से बात करेंगे. तब तक तुम शांत मन से विचार करो."

प्रशांत बाबू के इस आश्वासन और बड़प्पन से प्रिया के मन का एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया. उसने राहत की सांस ली. बाहर मुंबई की रात घनी हो रही थी, लेकिन अंधेरी ईस्ट के इस दफ्तर से निकलते हुए प्रिया और मयंक के भीतर विचारों की एक नई रोशनी टिमटिमा रही थी.
... क्रमशः

शुक्रवार, 19 जून 2026

लहरों के बीच

देहरी के पार, कड़ी - 69
शुक्रवार रात घर लौटते वक्त ऑटो स्टैंड पर बब्बन भाई अपना ऑटो लिए मिल गए. “नमस्ते दीदी, घर चलना है?”

“हाँ, घर ही चलना है.” उसने ऑटो में बैठते हुए कहा.

“मीटिंग रविवार शाम छह बजे यूनियन ऑफिस में ही है. आपको आना ही है. हमारे ड्राइवरों का हौसला बढ़ जाएगा.” बब्बन भाई ने फिर आग्रह किया.

“बब्बन भाई, आपको पता ही है, मयंक यहीं है. वह बस एक-दो सप्ताह और रुकेगा. उसके साथ रहने या घूमने को बस शनिवार रविवार ही मिलते हैं. कल भी एलिफेंटा जा रहे हैं. परसों का पता नहीं.” प्रिया ने मना तो नहीं किया. लेकिन उसने आने का वादा भी नहीं किया.

“मयंक भैया अभी घर ही होंगे तो उनसे मैं बात कर लूंगा. आप उन्हें भी साथ ले आना.” बब्बन भाई ने अपना आग्रह नहीं छोड़ा.

“हो सकता है घर मिल जाए, वह रोज घूमने निकलता है और मेरे घर लौटने के वक्त ही लौटता है. वह शायद ही वहाँ मिले.”

“आप उनका फोन नंबर दे देना, मैं फौरन ही बात कर लूंगा.”

सोसायटी के गेट पर ऑटो रुका, प्रिया उतरी तो मयंक उसे गेट पर ही दिखाई दिया. उसने मीटर देखकर बब्बन भाई को भाड़ा देते हुए कहा, “मयंक भी यहीं है.”

तब तक मयंक भी निकट आ चुका था. बब्बन भाई भी ऑटो से उतर कर नीचे आ चुके थे.

“मयंक भैया, नमस्ते. पहचाना मुझे?”

“अरे, बब्बन भाई, आप?”

“अब पहचान तो लिया ही है आपने. परसों शाम यूनियन ऑफिस में हमारी यूनियन की मीटिंग है. प्रिया दीदी आएंगी, आप भी आइए. इस बहाने यूनियन ऑफिस देख लेंगे. वहाँ अच्छी लाइब्रेरी है और आप हमारे ऑटो ड्राइवरों से भी मिल लेंगे.”

अब मयंक उनसे क्या कहता, उसने कहा, “दीदी आईं तो मैं भी जरूर आऊंगा.”

“फिर ठीक है मैं चलता हूँ, परसों मिलते हैं.” इतना कहकर बब्बन भाई ऑटो में बैठ चल दिए.
...

शनिवार की सुबह मुंबई के मिज़ाज के हिसाब से बहुत सुहानी थी. समंदर की तरफ से आ रही हवाओं में एक हल्की सी ठंडक थी जिनके कारण जून की उमस दबी हुई थी. तय कार्यक्रम के अनुसार, आकाश सुबह टैक्सी लेकर प्रिया की सोसायटी आ गया था. पौने नौ बजे तीनों गेटवे ऑफ इंडिया की जेटी (घाट) पर इकट्ठा हो चुके थे. आकाश ने वादे के मुताबिक एलीफेंटा जाने वाली लॉन्च (बोट) के टिकट पहले से ही खरीद रखे थे. प्रिया ने आकाश को कहला तो दिया था कि बाकी व्यवस्था करना उसके बस का नहीं फिर भी उसने सुबह जल्दी उठकर तीनों के लिए लंच बना लिया था. पानी की बोतलें और कुछ हल्के स्नैक्स आकाश अपने बैग में साथ लेता आया था.

गेटवे ऑफ इंडिया का विशाल द्वार और उसके ठीक सामने खड़े भव्य ताज होटल को देखते हुए मंयक ने कहा, “क्या दृश्य है? इस भव्य निर्माण में कितने मैन-डेज लगे होंगे? तब तो निर्माण के लिए इतनी बड़ी मशीनें भी नहीं थीं.”

“मयंक, इसकी परिकल्पना 1911 में तब की गई जब ब्रिटिश सम्राट राजा-सम्राट जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी पहली बार भारत आए. तब सम्राट को एक कार्डबोर्ड का दरवाजा बनाकर बधाई दी गयी थी. 1913 में इसकी आधार शिला रखी गई और 1914 में इसकी डिजाइन तैयार हुई. पहले यहाँ स्थानीय मछुआरों की जेटी थी. 1915 और 1919 के बीच यहाँ समुद्री दीवार का निर्माण करके यह जमीन तैयार हुई जिस पर इसे बनाया जाना था. इसकी नींव 1920 में पूरी हुई जबकि निर्माण 1924 में पूरा हुआ.” प्रिया ने गेटवे का इतिहास बता दिया.

“दीदी, तुम्हें यह सब कैसे याद रह जाता है?” मयंक ने विस्मय से पूछा.

“कुछ नहीं. कल रात सोने से पहले वेब पर एलीफेंटा के बारे में खोज रही थी, तभी इसका इतिहास भी देखा. अब रात का पढ़ा सुबह तक याद न रहे तो किसी परीक्षा में पास होना मुश्किल हो जाए. हमें तो वैसे भी हजारों कोड्स याद रखने पड़ते हैं तो आदत हो गई है.”

“मतलब अब आप एलीफेंटा में भी वहाँ का इतिहास बताती चलेंगी?”

“हाँ, क्यों नहीं?” प्रिया ने मुस्कुराकर उत्तर दिया.

“अब इससे बढ़िया कुछ नहीं है. जब भी किसी ऐतिहासिक स्थान घूमने जाओ, प्रिया को साथ लेते जाओ. गाइड के पैसे बच जाएंगे.” आकाश ने मजाक में कहा. प्रिया और मयंक ठहाका लगाकर हँस पड़े.

पहली बोट लग चुकी थी. वे उसकी ऊपरी मंजिल (Upper Deck) पर जाकर बैठ गए, जहाँ से समंदर का नज़ारा बिल्कुल खुला हुआ था. बोट ने एक लंबा हॉर्न बजाया और जेटी छोड़कर गहरे पानी की तरफ बढ़ी, जेट इंजनों की आवाज़ के साथ लहरों पर उसका डोलना मयंक के भीतर एक रोमांच भर गया. धीरे-धीरे गेटवे ऑफ इंडिया और मुंबई की गगनचुंबी इमारतों का कोलाहल पीछे छूटने लगा और चारों तरफ नीले पानी का विस्तार फैलने लगा.

मयंक कौतूहल से कभी समंदर में लंगर डाले खड़े बड़े-बड़े माल-वाहक जहाजों को देखता, तो कभी भारतीय नौसेना के युद्धपोतों को. आकाश मयंक के पास ही खड़ा होकर उसे मर्चेंट नेवी और उन जहाजों के काम करने के तरीकों के बारे में कुछ बुनियादी बातें बहुत सरल भाषा में समझा रहा था. मयंक उसकी बातों को बहुत ध्यान से सुन रहा था. साथ ही सोच रहा था कि जानकारी में आकाश भी कम नहीं है.

प्रिया उन दोनों से थोड़ी दूरी पर, रेलिंग के सहारे हाथ टिकाए खड़ी थी.  उसे तेज़ हवाओं से उड़ते बालों को संभालना पड़ रहा था. उसकी आँखें दूर उस क्षितिज को निहार रही थीं जहाँ समंदर और आसमान आपस में मिलते हुए लग रहे थे. वह सोच रही थी कि समंदर ऊपर से कितना शांत और एक-सा दिखता है, पर इसके भीतर एक विशाल जैविक संसार भी पलता है.

लगभग पौने घंटे के सफर के बाद बोट टापू की जेटी पर जाकर लगी. घाट से मुख्य पहाड़ियों की तलहटी तक जाने के लिए एक छोटी सी टॉय-ट्रेन उपलब्ध थी, जो मयंक को बहुत मज़ेदार लगी. ट्रेन से उतरकर जब गुफाओं तक पहुँचने वाली सीढ़ियों की चढ़ाई शुरू हुई, तो रास्तों के दोनों तरफ लगी स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानें और पेड़ों पर उछल-कूद करते बंदरों ने मयंक का ध्यान पूरी तरह भटका दिया.

मयंक अब जानबूझकर कभी तस्वीरें खींचने के बहाने पीछे रह जाता, तो कभी दुकानों पर कुछ देखने के लिए रुक जाता. वह बहुत अच्छी तरह समझ रहा था कि उसकी दीदी और आकाश को इस अजनबी भीड़ के बीच कुछ पल का सहज एकांत मिलना कितना ज़रूरी है. उसके मन की इच्छा थी कि उन दोनों के बीच पनपता मौन प्रेम जल्दी ही अपनी ऊँचाई छूने लगे.

वे जैसे ही एलीफेंटा की मुख्य गुफा के विशाल पत्थर के प्रवेश द्वार से भीतर दाखिल हुए, बाहर की चिलचिलाती रोशनी एक रहस्यमयी और ठंडी खामोशी में बदल गई. सातवीं सदी के कारीगरों द्वारा ठोस चट्टानी पहाड़ियों को भीतर से काटकर बनाई गई वह विशाल मूर्तिकला और स्तंभ देखकर तीनों निःशब्द रह गए. गुफा के केंद्र में स्थित भगवान शिव की 'त्रिमूर्ति' के सामने खड़े होकर मयंक और प्रिया स्तब्ध थे.

आकाश कुछ दूरी पर खड़ा प्रिया के चेहरे को देख रहा था. मूर्तियों की प्राचीन भव्यता के बीच प्रिया के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और आदर का भाव था. आकाश के अंतर्मन में फिर वही विचार कौंधा—इतिहास गवाह है कि जो भी चीज़ें अमर और बड़ी होती हैं, चाहे वे पत्थरों को तराश कर बनाई गई ये अमर कलाकृतियाँ हों या समाज को बदलने वाले महान आंदोलन, वे रातों-रात नहीं बनते. उनके पीछे पीढ़ियों का कड़ा अनुशासन, अटूट धीरज और चट्टानों को काटने जैसा अथक परिश्रम होता है. प्रिया जिस वैचारिक धरातल पर खड़ी होकर दुनिया को देखती है, उसे समझने के लिए उसे खुद को भी इसी तरह दृढ़ और परिपक्व बनाना होगा. यह बात उसने प्रिया से कही नहीं, बस उसकी आँखों का संकल्प और गहरा हो गया.

पूरा टापू एक बार में घूमना संभव नहीं था. लेकिन वे सभी मुख्य स्थानों, खास तौर पर कैनन पहाड़ी पर गए. जहाँ एक बड़ी पुरानी तोप स्थापित थी और टापू के चारों ओर का समुद्र दिखाई देता था. वे स्तूप पहाड़ी पर भी गए जहाँ उन्होंने बौद्ध गुफाएँ देखीं. पूरे टापू पर अनेक संस्कृतियों के चिह्न बिखरे पड़े थे. टापू का पुराना नाम घरापुरी था. यहाँ ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में ही बौद्ध भिक्षुओं ने अपनी बस्ती बना ली थी.

केनन पहाड़ी पर ही उचित स्थान देखकर प्रिया ने अपने बैग से चादर निकालकर बिछा दी। वहीं उन्होंने दोपहर का लंच किया. शाम ढले वे वापस मुंबई लौटने वाली बोट में सवार हुए. लौटते समय डूबते सूरज की आखिरी किरणें अरब सागर के पानी पर बिखरकर उसे सुनहरा बना रही थीं.

बोट की रेलिंग के पास बैठे हुए मयंक ने एक लंबी सांस ली और बोला, "दीदी, आकाश भैया... आज का दिन सचमुच बहुत अद्भुत था. ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया में घूमकर लौट रहा हूँ."

प्रिया ने मयंक की ओर देखते हुए मुस्कुराकर कहा, "हाँ मयंक, मुंबई में जब भागदौड़ से मन थकने लगे, तो यह समंदर ही है जो इंसान को दोबारा सँभालता है."

आकाश ने प्रिया की तरफ देखा. समंदर की लहरों पर डोलती बोट अब वापस मुंबई के गेटवे की रोशनियों की तरफ बढ़ रही थी. आकाश ने महसूस किया कि प्रकृति और एकांत में प्रिया और मयंक के साथ बिताया खूबसूरत वीकेंड उसे हमेशा याद रहेगा.
... क्रमशः

गुरुवार, 18 जून 2026

अदृश्य धागे

देहरी के पार, कड़ी - 68
प्रिया की व्यस्तता कम नहीं हुई थी. प्रोजेक्ट डेडलाइन पर था. पूरी टीम उसी पर लगी हुई थी. रविवार रात ‘एमबी’ से डिनर करके लौटने के बाद उसने मयंक को बताया कि उसकी टीम को जून माह के अंत तक अपना प्रोजेक्ट पूरा करके टेस्टिंग भी कर लेना है. इस कारण से अब सप्ताहांत के सिवा वह अपने ऑफिस में व्यस्त रहेगी.

“आप चिन्ता क्यों करती हैं दीदी, अब मुझे पोस्ट ग्रेजुएट होने में बस रिजल्ट की ही तो देरी है. मैं खुद घूम सकता हूँ. कल से जब आप ऑफिस के लिए निकलेंगी, मैं भी निकल पड़ूंगा, और शाम को नौ बजे तक लौट आऊंगा. तब तक आप भी आ जाएंगी.” मयंक ने कहा.

“मैं जानती हूँ कि मेरा भाई दुनिया भर में अकेला घूम कर आ सकता है. लेकिन दोपहर के खाने का क्या करेगा?” प्रिया ने पूछा.

“दीदी, आप भी न, मुझे आदत कहाँ है दिन में खाने की. कोटा में तो सभी की यही आदत है. दिन में भूख लगती है तो वहाँ तो हर नुक्कड़ पर कचौरी मिल जाती है.”

“तुझे तीन दिन में ही कोटा की कचौरी की याद भी आने लगी. यहाँ तो कचौरी मिलने से रही.”

“तो क्या हुआ, वैसे भी कचौरी तो कोटा की शान है, यहाँ मिलेगी भी तो वैसा स्वाद कहाँ होगा. पर मुंबई में अपने स्नैक्स की कोई कमी थोड़े ही है. यहाँ कचौरी नहीं तो वड़ा पाव, पाव भाजी, बॉम्बे सैंडविच, सेव-पूरी और रगड़ा-पैटिस पता नहीं क्या-क्या हैं. रोज एक-एक भी ट्राई करूंगा तो हफ्ता तो कट ही जाएगा.” मयंक ने मजा लेते हुए कहा.

“वाह, क्या बात है, मयंक. ऐसा लगता है तू इन सब पर कोटा से ही रिसर्च करके चला है?”

“और नहीं तो क्या, मैं यहाँ अपनी दीदी को परेशान करने थोड़े ही आया हूँ.” मयंक ने प्रिया को चिढ़ाते हुए उत्तर दिया.

“अच्छा, अब ऐसा लगता है तुझे दीदी की चपत खाए बहुत दिन हो गए, तुझे वही चाहिए क्या.”

“अरे, दीदी, ऐसा मत करना. वरना मुझे बाकी दिन आपके फ्लैट के बजाय आकाश जी.. आकाश भैया के यहाँ बिताने पड़ेंगे.”

इस बार प्रिया ने आगे बढ़कर मयंक का बायाँ कान पकड़ लिया और डाँटने के स्वर में बोली, “तू क्या बोलना चाह रहा था?

“कुछ नहीं दीदी, बस मन की बात होंठों पर आने वाली थी कि फिर मैंने रोक ली.”

प्रिया ने मयंक का कान छोड़ दिया. “अच्छा तो यह बात है. तू मुझे गलत समझ रहा है, मयंक. आकाश को मैंने घर छोड़ने से पहले देखा तक नहीं था. वह कंपनी की प्रोपर्टी लेने कोटा आया था. तब मैं उसके साथ कार में जयपुर गई और दो दिन- तीन रात मुझे जयपुर में उसके घर रहना पड़ा. उसके बाद करीब दो-तीन सप्ताह से वह मुंबई में है. इसके अलावा हम कभी मिले तक नहीं. हमारे बीच कुछ नहीं है. हाँ इतना जरूर है कि वह योग्य व्यक्ति है. मुझे लगता भी है कि शायद वह मेरा अच्छा जीवन साथी हो सकता है. संभव है कि वह भी ऐसा ही सोचता हो. लेकिन यह इतनी आसान बात नहीं है. अभी हमारे बीच बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम दोनों को समझना पड़ेगा. यदि हमने अभी यह नहीं सोचा और उस पर खुल कर बात नहीं की, तो हो सकता है हमारा साथ होना दोनों के लिए परेशानी का सबब बन जाए.”

इतना कहकर प्रिया चुप हो गई. उसके चेहरे और आँखों में मयंक को उदासी की परत दिखाई दी. उसे लगा कि दीदी को कुछ चुभा है. यह सोचकर वह खुद भी उदास हो गया. कुछ देर सोचकर बोला, “दीदी, आपको बुरा लगा हो तो मैं माफी चाहता हूँ. कल और आज के दो दिनों में मुझे लगने लगा था कि आप दोनों साथ हो जाएँ तो सोने में सुहागा हो जाए. मम्मी-पापा ने आकाश को देखा है, जब वह काली कार घर के आसपास खड़ी कर कोई उनकी रेकी कर रहा था, वह कोटा आया था. उसी ने मम्मी पापा को हिम्मत दी थी. तभी से वे सोचते हैं कि आकाश आपके लिए अच्छा जीवन साथी हो सकता है. दोनों इस बारे में आपस में चर्चा भी कर चुके हैं. पर वे आपसे कुछ भी कहने से डरते हैं.” मयंक इतना कहकर चुप होकर प्रिया को देखता रहा.

“चल छोड़ इन बातों को अब सो जा. सुबह मुझे समय से ऑफिस जाना है और तू भी तो घूमने जाएगा. एक बात और, यहाँ आने के दिन तेरी मम्मी से बात हुई थी. उसके बाद तुमने मम्मी-पापा से बात भी की या नहीं?”

“मम्मी से तो रोज ही बात हो रही है, एक बार पापा से भी कर चुका हूँ.” मयंक ने बताया.

“चल ठीक है, अब तू सोने जा, मैं भी सोती हूँ. कल ऑफिस में बहुत काम रहेगा.” मयंक उठकर हॉल में सोने चला गया.

अगले दिन से दोनों का यह रूटीन हो गया. प्रिया सुबह साढ़े दस बजे ऑफिस के लिए निकलती और मयंक घूमने. वह रात को साढ़े आठ तक लौटती, मयंक उसके बाद पहुँचता.

गुरुवार आ चुका था.
...
मंगलवार, 18 जून 2019 को ईसीआई यूनियन के सचिव शिंदे और एडवोकेट रमेश चव्हाण का एक सहायक इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल पहुँचा. उन्होंने मुंसरिम को स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और उसे साबित करने के लिए सभी जरूरी दस्तावेज पेश किए. प्रबंधन की ओर से उनके विधि विभाग का एक सीनियर क्लर्क पहले से ही वहाँ मौजूद था. उसने स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और दस्तावेजों की प्रतियाँ प्राप्त करके चला गया फैक्ट्री प्रबंधन को अपना लिखित जवाब (Written Statement) पेश करने के लिए महज दस दिन का समय देते हुए अगली तारीख 28 जून दे दी गई.
...
गुरुवार रात प्रिया ऑफिस से आकर फ्लैट का दरवाजा खोल ही रही थी कि मयंक भी आ गया. दोनों बैठकर चाय पी रहे थे. तभी आकाश की कॉल आ गई.

“हेलो प्रिया, कैसी हो? और मयंक के क्या हाल हैं?”

“मेरा तो तुम्हें पता है, मेरे प्रोजेक्ट की डेडलाइन 25 जून है. मुझे साँस कैसे आ सकती है.”

“हाँ, वह तो है. फिर मयंक क्या कर रहा है?”

“वह अकेले घूम रहा है. लोकल ट्रेन और बसें, पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम लिया है. पर मुंबई को समझने लगा है. महानगर का भय उसमें से जाता रहा. बेहतर है उसी से पूछो, फोन दे रही हूँ.” प्रिया ने फोन मयंक को थमा दिया.

“हाँ, आकाश भैया, मैं मयंक बोल रहा हूँ, आप कैसे हैं.”

“मैं ठीक हूँ मयंक. तुम्हारी बताओ तुम कहाँ-कहाँ घूम लिए हो?”

“कुछ अधिक नहीं, सुबह दीदी के साथ निकलता हूँ. अंधेरी स्टेशन से लोकल पकड़ता हूँ. जहाँ जमती है वहाँ निकल जाता हूँ. इतना जरूर है कि मैं मुंबई के लोगों को जानने लगा हूँ. यहाँ के ज्यादातर लोग सहयोग करते हैं. खाना-पीना सस्ता है.”

“वो तो है.” आकाश ने उससे सहमति जताई. “हाँ, शनिवार का क्या कार्यक्रम है?”

“अभी तक कुछ नहीं है. आप बताओ.”

“मैं सोचता हूँ, हम क्यों न शनिवार को एलीफेंटा केव्ज देखने चलें?”

“पर वे तो समंदर में किसी टापू पर हैं.”

“हाँ, टापू पर हैं. पर टापू अधिक दूर नहीं है. गेट-वे से सुबह नौ बजे से बोट लगती हैं, आधे घंटे में वहाँ पहुँचा देती हैं. इस बहाने थोड़ा बहुत समुद्र तुम अंदर से भी देख लोगे. और मुंबई के समुद्र का क्या हाल है यह भी देख लोगे. तुम्हें लंगर डाले बहुत से जहाज भी देखने को मिलेंगे.”

“तो फिर चलते हैं. पर दीदी चलेंगी तब है. बिना दीदी के चलने का तो कोई मतलब नहीं है.”

“तो तुम पूछो प्रिया से.”

“आप क्यों नहीं पूछते?”

“नहीं, तुम ही पूछो. मुझे अभी वह प्रोजेक्ट की डेडलाइन बता चुकी है. वही कहेगी तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं होगा.”

“फिर ठीक है. मैं फोन रखता हूँ.”

मयंक ने फोन काट कर प्रिया को देते हुए कहा, “आकाश भैया शनिवार को एलीफेंटा चलने की कह रहे हैं. लेकिन कह रहे हैं कि आप भी चलेंगी तो प्रोग्राम बना लेंगे.”

प्रिया कुछ पल के लिए सोच में पड़ गई कि आकाश ने ऐसा क्यों कहा? और उसने सीधे उससे क्यों नहीं कहा. फिर कुछ सोचकर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई. वह जानती थी कि आकाश उसके इन्कार से डर रहा है. उसने मयंक को कह दिया, “आकाश से कह दो चल चलेंगे. पर सारी तैयारी उसे ही करनी पड़ेगी. मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी.”

मयंक प्रिया की ‘हाँ’ सुनकर खुश हो गया और अपने फोन से आकाश को कॉल लगाने लगा.
... क्रमशः

सोमवार, 15 जून 2026

साझा संघर्ष

देहरी के पार, कड़ी - 67
प्रिया ने लैपटॉप की स्क्रीन पर 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' का फाइनल ड्राफ्ट पढ़ लिया. सब कुछ ठीक था. कुछ भी ऐसा न था जिसे जोड़े जाने का सुझाव वह दे सकती. उसने स्क्रीन से नजरें हटाकर मयंक की तरफ देखा, वह अभी भी बिस्तर पर अपने पैर फैलाए बेखबर सो रहा था. ‘मुंबई पहली बार हर किसी को थका डालती है.’ यह सोचकर वह मुस्कुराई और नहाने चली गई. वह तैयार होकर फिर से हॉल में आई, तब भी मयंक वैसे ही सो रहा था. रसोई में जाकर उसने नाश्ते के लिए मयंक की पसंद का पोहा तैयार करके दो प्लेटों में सजाया ऊपर से कोटा से मयंक के लाए रतलामी सेव से गार्निशिंग कर डाइनिंग पर रखे. फिर मयंक के कंधे को धीरे से हिलाकर उसे जगाते हुए कहा, "उठ भाई, निपट ले. सूरज कब का सिर पर आ गया है."

मयंक आँखें मलते हुए उठा और दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा. "ओह! नौ बज गए. दीदी, आज तो मैं वाकई घोड़े बेचकर सोया. कल की थकान ही ऐसी थी कि कुछ होश ही नहीं रहा."

"कोई बात नहीं, चाय और नाश्ता तैयार है. तुम जल्दी से ब्रश कर लो," प्रिया ने टेबल पर प्लेटें सजाते हुए कहा.

दोनों नाश्ते के बाद चाय पीते हुए बातें कर ही रहे थे कि प्रिया के फोन की रिंगटोन बज उठी. स्क्रीन पर आकाश का फोटो था. प्रिया ने कॉल रिसीव किया तो उधर से आवाज आई, "गुड मॉर्निंग प्रिया! संडे स्पेशल का क्या कार्यक्रम है आज?"

प्रिया ने हँसते हुए जवाब दिया, "गुड मॉर्निंग आकाश! कार्यक्रम का हाल यह है कि तुम्हारा मयंक भैया अभी-अभी सोकर उठा है और नाश्ता कर रहा है. उसे नहाने और तैयार होने में कम से कम एक घंटा लगेगा. तब तक ग्यारह बज चुके होंगे."

"फिर, आज दिनभर का क्या कार्यक्रम है?" आकाश ने पूछा.

"एक काम करो, मैं फोन मयंक को देती हूँ. तुम दोनों बात करके तय कर लो कि क्या करना है. जो भी तुम दोनों तय करोगे, मैं उसमें शामिल हो जाऊँगी," प्रिया ने फोन मयंक की तरफ बढ़ा दिया.

मयंक ने फोन कान से लगाया, "हेलो आकाश भैया! ..... भैया, कल की भागदौड़ और सफर मैं तो बुरी तरह थक गया. अभी सोकर उठा हूँ, दीदी न जगातीं तो न जाने कब तक सोता रहता. मेरा तो शरीर भी अकड़ा पड़ा है. आज दिनभर धूप में घूमने के बजाय क्यों न आराम किया जाए? घूमना अगले वीकेंड तक के लिए पोस्टपोन कर देते हैं. आज शाम को हम सब साथ मिलकर कहीं बढ़िया डिनर कर लेंगे."

आकाश भी तुरंत सहमत हो गया. उसने कहा, "तुम्हारा यह विचार बिल्कुल उत्तम है. तो फिर डिनर के लिए 'एमबी' (मेवाड़ भोजनालय) सबसे बढ़िया रहेगा. इसी बहाने तुम रामजी काका से भी मिल लोगे और वहाँ घर जैसा और स्पेशल दोनों तरह का खाना मिल जाएगा है." मयंक ने प्रिया की और देखकर बताया कि आकाश भैया कह रहे हैं कि दिन में आराम करें और शाम को एमबी में डिनर कर लें. प्रिया ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया. शाम का कार्यक्रम तय हो चुका था.

दिन भर के आराम के बाद मयंक ने शाम को स्नान किया और तैयार होने लगा. रात साढ़े आठ बजे आकाश का फोन आया कि वह विक्रोली से सीधे 'एमबी' के लिए निकल रहा है. इधर प्रिया और मयंक अपने फ्लैट नीचे आकर फुटपाथ पर किसी टैक्सी या ऑटो का इंतज़ार करने लगे. मुंबई की शाम ढल चुकी थी और सड़कों पर रात की रोशनियाँ बिखर गई थीं. तभी एक ऑटो रिक्शा की रफ्तार धीमी हुई और ठीक उनके सामने आकर रुक गया.

ड्राइवर की सीट पर बैठे अधेड़ शख्स ने अपना सिर ऑटो से बाहर निकाला और प्रिया से मुस्कुराकर पूछा, "नमस्ते दीदी! कहाँ चलना है?" वे बब्बन भाई थे.

"नमस्ते बब्बन भाई! हम 'एमबी' तक जा रहे हैं वहीं छोड़ दीजिए," प्रिया ने ऑटो में बैठते हुए कहा. मयंक भी उसके पीछे ही आ बैठा.

ऑटो जैसे ही मुख्य सड़क पर दौड़ा, प्रिया ने आगे झुककर पूछा, "और सुनाइए बब्बन भाई, आजकल सब कैसा चल रहा है?"

बब्बन भाई ने सामने देखते हुए ऑटो चलाते हुए बोले, "अपना तो बताता हूँ दीदी, पहले आप बताइए... आपके साथ यह छोटा भाई है न?"

"हाँ, बब्बन भाई, आपने सही पहचाना, यह मेरा छोटा भाई मयंक है, परसों कोटा से आया है," प्रिया ने मयंक की तरफ देखा और फिर मयंक से कहा, "मयंक, ये बब्बन भाई हैं. तुम्हें जो मैंने मुंबई ऑटो रिक्शा यूनियन के बारे में बताया था, ये उसके उपाध्यक्ष हैं." मयंक ने अचरज और गहरे आदर के साथ बब्बन भाई की तरफ देखा. एक आदमी मुंबई जैसे महानगर के हजारों ऑटो चालकों की यूनियन का उपाध्यक्ष है और खुद सभी की तरह आटो चला रहा है. ‘नमस्ते बब्बन भाई, मैं आपको नहीं जानता था इसलिए पहले नमस्ते नहीं किया.

बब्बन भाई ने मुस्कुराकर शीशे में मयंक को देखा और फिर बोले, “कोई बात नहीं मयंक भैया. अब आगे से मिलें तो पहचान लेना और नमस्ते भी कर लेना.” अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रिया से बोले "दीदी, मुंबई तमाम ऑटो रिक्शा चालकों और मालिकों के संगठनों ने मिलकर 'ऑटो रिक्शा चालक-मालक संघटना संयुक्त कृती समिती' के नाम से संयुक्त मोर्चा बना लिया है. हमने इसी 9 जून को सरकार को 'हड़ताल का नोटिस' दे दिया है. इस बार हम आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं हम लोग."

"9 जून को हड़ताल का नोटिस दे दिया है? और मुझे अभी तक पता नहीं लगा. प्रशान्त बाबू ने भी जिक्र नहीं किया. हो सकता है ट्रिब्यूनल के लिए ईसीआई का क्लेम तैयार करने की बात में भूल गए हों. खैर, बब्बन भाई, आपकी मांगें क्या हैं?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

बब्बन भाई ने विस्तार से समझाते हुए कहा, "मांगें बिल्कुल जायज और कानूनी हैं दीदी. पहली तो यह कि बढ़ती महंगाई के अनुपात में हमारी किराया दर (Fare Rate) तुरंत बढ़ाई जाए. दूसरी, हम चालकों के सामाजिक और आर्थिक भविष्य की सुरक्षा के लिए एक 'कल्याण बोर्ड' (Welfare Board) का गठन हो. और तीसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो निजी वाहन बिना कमर्शियल परमिट के, अवैध रूप से सार्वजनिक परिवहन का काम कर रहे हैं, उनके खिलाफ सरकार जिला स्तर पर एक गश्ती दल बनाए और उनका संचालन तुरंत रोके. वे हमारे पेट पर लात मार रहे हैं."

मयंक चुपचाप बब्बन भाई की बातें सुन रहा था. उसे अहसास हो रहा था कि इस चमक-दमक वाले महानगर का हर एक पहिया, चाहे वह मिल के चक्के हों या ऑटो रिक्शा के टायर, गहरे आर्थिक और विधिक संयोजनों के सहारे घूम रहे हैं. जैसे ही इनमें कोई संयोजन बिगड़ता है, ये चरमराने लगते हैं. उन्हें फिर से संयोजित करना पड़ता है.

'एमबी' आ गया था. बब्बन भाई ने अपना ऑटो रोक दिया. मीटर पढ़कर प्रिया ने भाड़ा चुकाया. तभी बब्बन भाई ने प्रिया से आग्रह किया, "दीदी, इस बार हमारी मीटिंग में आइए न. आपके आने से हमारे चालकों का हौसला बहुत बढ़ जाएगा."

प्रिया ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, "बब्बन भाई, मैं भी कंपनी की नौकरी करती हूँ. शनिवार और इतवार के अलावा मेरे लिए समय निकालना बहुत मुश्किल होता है."

बब्बन भाई ने तुरंत कहा, "दीदी, अगले रविवार को ही हमारे ऑफिस में हमारी यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक है. आप उसमें आ जाएँ तो हमारा उत्साह दोगुना हो जाएगा, आप हमारी कार्यकारिणी के बाकी मेंबरों से भी मिल लेंगी."

प्रिया ने मयंक की तरफ देखा और फिर बब्बन भाई से कहा, "अगले रविवार का कार्यक्रम मैं आपको शनिवार को ही पक्का बता पाऊँगी. आजकल मयंक भी यहीं आया हुआ है."

"कोई बात नहीं दीदी, मैं शनिवार को खुद आपको फोन करके पूछ लूंगा," बब्बन भाई ने हाथ की मुट्ठी बना कर अभिवादन किया प्रिया ने वैसे ही उसका जवाब दिया. बब्बन भाई अपना ऑटो लेकर आगे बढ़ गए.

प्रिया और मयंक जैसे ही 'एमबी' में दाखिल हुए, उन्होंने देखा कि आकाश पीछे एक बीच की टेबल पर पहले से मौजूद था. होटल में कदम रखते ही काउंटर पर बैठे रामजी काका के चेहरे पर वात्सल्य उभर आया. उन्होंने ज़ोर से कहा, "आओ बिटिया! आओ आज तो मयंक भैया भी साथ हैं." मयंक को आश्चर्य हुआ कि उन्होंने उसे पहचाना कैसे और उसका नाम कैसे याद है.

होटल में सिर्फ रामजी काका ही नहीं, पानी की बोतल लाने वाले लड़के से लेकर ऑर्डर लेने वाले वेटर तक, होटल का सारा स्टाफ प्रिया को देखते ही बेहद आदर से 'दीदी, नमस्ते' कहने लगा. उनके लहजे में वही अपनापन था, जो किसी सगे भाई की आवाज़ में होता है. वे कोने की टेबल पर आकाश के पास आ बैठे. उनके पीछे ही रामजी काका भी आए और कहने लगे. मयंक, बेटा, ‘एमबी’ को अपनी ही जगह समझो और मुझे अपना चाचा। मैं भी कोटा के पास भैंसरोड़गढ़ से ही हूँ.

मयंक अपनी डाइनिंग चेयर पर बैठा, चुपचाप चकित होकर चारों ओर देख रहा था. वह भीतर तक निःशब्द था. कोटा से अपनी अनचाही शादी को ठुकरा कर आधी रात को घर से निकल जाने वाली उसकी दीदी प्रिया इस अजनबी, विशाल और क्रूर माने जाने वाले मुंबई महानगर के आम मेहनतकशों, दुकानदारों और मज़दूरों के दिलों में अपने लिए इतना गहरा, सम्मान और स्थान बना लेगी, इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी. दीदी के इस वृहत और सम्माननीय व्यक्तित्व को देखकर मयंक को उस पर गर्व हो रहा था. वह सोच रहा था कि काश मम्मी-पापा यहाँ आएँ और देखें कि उनकी बेटी क्या है.
... क्रमशः

शनिवार, 13 जून 2026

मौन संकल्प

देहरी के पार, कड़ी - 66
मुंबई की सुबह हल्की धुंध में लिपटी थी. खिड़की से आती रोशनी ने कमरे की दीवारों पर सुनहरी परछाइयाँ बना दी थीं. प्रिया ने चाय का कप हाथ में लिया और बालकनी में आ खड़ी हुई. नीचे सड़क पर मजदूरों का एक छोटा समूह अपने औज़ारों के साथ जा रहा था — वही चेहरे, वही गति, वही उम्मीद.

उसके भीतर कुछ हिलने लगा. कल आकाश और मयंक के साथ बिताई वह सहज, हँसती हुई शाम अब किसी दूर के सपने जैसी लग रही थी. उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था, ‘क्या मैं उस राह पर चल सकती हूँ जहाँ प्रेम और संघर्ष दोनों साथ हों?’

प्रशांत बाबू का पार्टी की सदस्यता के लिए प्रस्ताव ने उसके मस्तिष्क में स्थान बना लिया था. हवा में नमक और धुएँ की मिली-जुली गंध थी. शहर जाग रहा था, और उसके भीतर भी कुछ जाग रहा था — एक निर्णय, जो शायद उसके जीवन की दिशा तय करेगा.

उसने धीरे से खुद से कहा, “हर चौराहा एक नई राह देता है... बस हिम्मत चाहिए उसे चुनने की.” कप की आखिरी चुस्की लेकर वापस हॉल में आ गई. अभी तक सो रहे मयंक को जगाया. “उठ भाई, निपट ले. नौ बजे आकाश टैक्सी लेकर पहुँच जाएगा, तब तक निपटकर तैयार रहना है.

आकाश सुबह टैक्सी लेकर अंधेरी पहुँचा तो सवा नौ हो रहे थे. प्रिया, मयंक और आकाश—सीधे गेटवे ऑफ इंडिया के लिए निकल पड़े. मयंक के लिए मुंबई की यह पहली सुबह कौतूहल से भरी थी. आकाश ने महाराष्ट्र पर्यटन (MTDC) की टूरिस्ट बस' मुंबई दर्शन' के टिकट पहले से ही बुक करवा लिए थे.

मयंक बस की खुली छत (Open Deck) वाली सीट पर बैठने के लिए बच्चों की तरह उत्साहित था. बस जैसे ही कोलाबा की विक्टोरियन इमारतों, मरीन ड्राइव के घुमावदार रास्तों और फोर्ट के ऐतिहासिक रास्तों से गुज़रने लगी, बस का गाइड हाथ में माइक सँभाले लाउडस्पीकर पर हर एक इमारत, राजाबाई क्लॉक टॉवर और इस महानगर के बनने का जीवंत इतिहास सुनाने लगा. आकाश और मयंक, दोनों ही इस शहर के लिए नए मुसाफिर थे, इसलिए वे बिना किसी औपचारिकता के एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाए गाइड की बातों को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे.

दोपहर में अपने ठहराव के दौरान बस कोलाबा में रुकी. सामने वही पुराना, धीमे संगीत वाला ईरानी कैफे था. वे उसमें दाखिल हो गए. बन-मस्का और कड़क ईरानी चाय का स्वाद लेते हुए, मयंक अपनी पारखी और शरारती नज़रों से चुपचाप अपनी दीदी और आकाश को नोटिस कर रहा था. उसने देखा कि जब भी गाइड ने रास्ते में मुंबई की किसी ऐतिहासिक मज़दूर चाल या गिरणी कामगारों के पुराने आंदोलनों का ज़िक्र करता था, तो प्रिया की आँखें चमक उठी थीं. और ठीक उसी पल, आकाश किस तरह अपनी सारी दुनिया भूलकर प्रिया के उस बदलते, प्रखर चेहरे को अगाध आदर और मौन प्रेम से निहार रहा था. मयंक अपनी दीदी को समझता था; वह भाँप गया कि उन दोनों के बीच अब केवल पुरानी कलीग वाली औपचारिकता नहीं रह गई थी. वे गहराई के साथ एक दूसरे से जुड़े महसूस हो रहे थे, उनमें आपस में गहरा प्रेम चुपचाप अपनी जड़ें जमाने लगा था.

शाम को बस का सफर खत्म हुआ. तीनों नरीमन पॉइंट पर समंदर के किनारे पत्थरों पर आकर बैठ गए. समंदर की ठंडी हवा के झोंके उनके चेहरों को छू रहे थे. मयंक पानी की बोतलें और कुछ स्नैक्स लेने के लिए थोड़ी दूर बनी एक दुकान की तरफ चला गया. आकाश और प्रिया वहीं बैठे रहे.

प्रिया एकटक समंदर की उठती-गिरती लहरों को देख रही थी. उसके चेहरे पर ढलते सूरज की मद्धिम लालिमा बिखर गई थी. आकाश ने उसकी ओर देखा. उसके भीतर पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सी छटपटाहट चल रही थी. प्रिया जिस तेज़ी से खुद को बदल रही थी, मज़दूरों के हक की लड़ाइयों और उसके अध्ययन के वैचारिक धरातल पर उसका जो व्यक्तित्व पनप रहा था, उसे देखकर आकाश के मन में एक अनकहा संशय पैदा होता था. वह सोच रहा था कि वह एक सीधा-सादा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, अपने और परिवार का जीवन चलाने के लिए दिनभर काम करता है, शाम को थककर निढाल हो जाता है. सुबह जब थकान उतरती है तो फिर से तैयार होकर काम में जुट जाता है. उसे अपने घर-परिवार से इतर देखने की फुरसत तक नहीं, वहीं प्रिया, वह बिलकुल उसका जैसा काम करते हुए भी खुद को कैसे मेहनतकशों के संघर्षों में पूरी ऊर्जा के साथ योगदान करती है. ऐसा लगता है उसने अपना जीवन चलाने के सिवा वर्गोत्थान को अपना लक्ष्य बना लिया है. वह खुद को इस योग्य कैसे बनाए कि प्रिया जैसी अद्भुत लड़की का जीवनसाथी बन सके? उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कुछ ठोस तो करना होगा. कुछ ऐसा जिससे वह कम से कम प्रिया के वैचारिक आधार को समझ सके. आकाश को फिलहाल इतना भी साहस नहीं हो पा रहा था कि वह अपने इस डर को प्रिया के सामने रख सके, इसलिए उसने कुछ नहीं कहा, बस मौन बैठा उसे निहारता रहा. लेकिन समंदर की लहरों की गूँज के बीच उसके भीतर खुद को बदलने का एक 'मौन संकल्प' आकार लेने लगा था.

प्रिया ने मुस्कुराकर आकाश की तरफ देखा. उसकी आँखों में आकाश के लिए निश्चल प्रेम था. वह केवल आकाश को नहीं चाहती थी, वह उसके उस सीधे-सादे और आत्मीय परिवार को भी उतना ही चाहती थी, जिसने मुसीबत के दिनों में जयपुर में उसे अपनी बेटी समझकर सँभाला था. उस सादगी से बड़ा कोई व्यक्तित्व नहीं होता. दोनों के बीच बिना कुछ कहे भी एक गहरी, आत्मीय खामोशी पसरी रही.

अगले दिन, रविवार की सुबह बेहद अलसाई हुई थी. मयंक अभी भी कारपेट पर बिछे बिस्तर पर गहरी नींद में सोया हुआ था. प्रिया ने रसोई में जाकर चाय बनाई और अपना लैपटॉप स्टार्ट किया. कल रात ही फोर्ट के एडवोकेट रमेश चव्हाण ने 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' के फाइनल ड्राफ्ट को हरी झंडी दे दी थी, और प्रशांत बाबू ने उसका फाइनल मसौदा प्रिया को ई-मेल कर दिया था और साथ में एक छोटी सी टिप्पणी थी, ‘इसे एक बार देख लेना.’ मंगलवार 18 जून, को यूनियन को इसे इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में पेश करना था. जिसमें उसकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी. लेकिन इस पूरे मामले की रीढ़ वही सांख्यिकीय सर्वे और डेटा था जिसे तैयार करने में प्रिया की भूमिका थी. शायद इसीलिए यह फाइनल ड्राफ्ट उसे भेजा गया था. वह लैपटॉप की स्क्रीन पर निगाहें जमाए स्टेटमेंट ऑफ क्लेम को शब्द-दर-शब्द पढ़ने लगी.

जैसे-जैसे वह उसे पढ़ती जा रही थीं, उसे ईसीआई फैक्ट्री के मज़दूरों के उस पूरे इतिहास, उनकी दशा, उनके जमीनी और कानूनी संघर्षों की थाह मिल रही थी. अनेक तथ्य ऐसे निकलकर आए थे जिनकी उसे जानकारी नहीं थी. वह समझ रही थी कि संगठित कामगारों का जीवन भी कितना संघर्षमय होता है, कैसे उन्हें उनके कानूनी हक देने में भी पूंजीपति को बहुत जोर आता है. बाजार भावों के उतार-चढ़ाव को तो वह किसी तरह सहन कर जाता है लेकिन अपने एम्पलॉई को एक रुपया भी अधिक देने में वह प्राणांतक दर्द महसूस करने लगता है, जैसे ही उसे लगता है इस उद्योग से दूसरा उद्योग बेहतर मुनाफा देगा, तो वह उस उद्योग में काम कर रहे सैंकड़ों-हजारों कर्मचारियों को बेरोजगार छोड़ अपना नया उद्यम सजाने लगता है. सीनियर वकील चव्हाण साहब के निर्देशन में सहायकों ने जो मसौदा तैयार किया था उसमें मज़दूरों का छिपा हुआ दर्द बखूबी स्पष्ट दिखाई देता था. सांख्यिकीय रिपोर्ट का कोई महत्वपूर्ण तथ्य ऐसा नहीं था जो छूट गया हो. यह दस्तावेज अब कोर्ट के रिकॉर्ड पर जाने के लिए तैयार था. वह जानती थी कि इस स्टेटमेंट ऑफ क्लेम के तथ्यों को साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज वे जुटा चुके हैं उन्हें प्रमाणित करने को यूनियन पदाधिकारियों और मजदूरों के बयान पर्याप्त होंगे. उसने ई-मेल का उत्तर देते हुए केवल एक वाक्य लिखा, ‘ऑल करेक्ट एण्ड सफिशियंट’ और सेंड पर क्लिक कर दिया.

प्रिया ने चाय का मग होंठों से लगाया और खिड़की से बाहर देखा, मुंबई की सुबह धीरे-धीरे जवान हो रही थी. उसने अंदर देखा, मयंक अभी भी गहरी नींद में था. शायद कल की थकान उसके लिए स्वाभाविक नहीं थी. सोमवार से उसे फिर से काम पर जाना था. उसके पास बस आज का दिन था जब वह मयंक को कुछ मुंबई घुमा सकती थी और उसे इतना निर्देशित कर सकती थी कि आने वाले सप्ताह के पहले पाँच दिनों में वह अकेले भी मुंबई की थाह ले सके.
... क्रमशः