पिंजरा और पंख-29
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
सुबह हवा में एक अजीब सा भारीपन था. 10 बज गए थे. घर के सामने, गुप्ता परिवार की मध्यमवर्गीय प्रतिष्ठा और उनकी सीमाओं की प्रतीक कोरल रेड रंग की मारुति 800 खड़ी थी. गुप्ताजी ने डिक्की का दरवाजा सावधानी से बंद किया, जिसमें आयुष का भविष्य—एक बड़ा सा सूटकेस और किताबों से ठसाठस भरा कार्टन था.
श्रीमती गुप्ता ने दही-चीनी का कटोरा हाथ में ले रखा था. आयुष को चम्मच भर खिलाते हुए उनकी आँखों में ममता कम और 'निवेश' के असुरक्षित होने का डर ज्यादा दिख रहा था.
चाचा बरामदे में खड़े होकर आयुष को निर्देश दे रहे थे, ध्यान रहे, कोटा की भीड़ में खोना नहीं है. तुम्हें वहाँ मर्द बनना है, रैंक दुरुस्त हो जिससे आईआईटी में अच्छी ब्रांच मिले. आयुष ने सिर झुका लिया. उसे महसूस हुआ कि वह कोटा नहीं जा रहा, बल्कि उसे एक ऐसे कारखाने में भेजा जा रहा है जहाँ उसे एक 'ब्रांडेड प्रोडक्ट' बनना है.
शगुन पीछे की सीट पर बैठी थी. चाची ने खिड़की के रास्ते उसका हाथ थामा. दोनों की निगाहें मिलीं—बिना कुछ कहे चाची ने शगुन को बहुत कुछ कह दिया. गुप्ताजी ने जैसे ही कार स्टार्ट की, चाचा ने कहा, भाई साहब, गाड़ी आराम से चलाना, खास तौर से दरा घाटी में. गुप्ताजी ने बिना कोई उत्तर दिए गाड़ी आगे बढ़ा दी.
पापा पूरी एकाग्रता से स्टीयरिंग थामे थे. उनके लिए यह सफर केवल एक बच्चे को छोड़ने जाना नहीं था, बल्कि अपनी जमा-पूंजी को एक ऐसे दांव पर लगाना था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था.
श्रीमती गुप्ता ने पीछे मुड़कर देखा, "आयुष, वह जो ताबीज चाची ने दिया था, वह बैग में रख लिया है न? पंडित जी ने कहा था कि पढ़ाई में मन लगा रहेगा."
आयुष ने खिड़की के बाहर भागते हुए सूखे पेड़ों को देखते हुए कहा, "जी मम्मी, रख लिया है."
शगुन ने टोका, "मम्मी, पढ़ाई के लिए ताबीज से ज्यादा दिमाग और सुकून चाहिए. घर में जो माहौल है, उसमें तो किसी का भी मन उचट जाए."
पापा ने रियर-व्यू मिरर में शगुन को देखा. उनकी 'ढुलमुल' प्रवृत्ति यहाँ भी दिखी. उन्होंने बस इतना ही कहा, "शगुन, अब पुरानी बातें छोड़ो. आज आयुष का दिन है. घर की बातें घर पर ठीक लगती हैं."
दोपहर होते-होते कोटा की बहुमंजिला इमारतों और बड़े-बड़े होर्डिंग्स ने उनका स्वागत किया. हर होर्डिंग पर किसी न किसी छात्र की तस्वीर थी, जिसके नीचे उसके 'रैंक' लिखे थे. शगुन को लगा जैसे यह कोई मंडी है जहाँ इंसानों की नहीं, उनके नंबरों की बोली लगती है.
विज्ञान नगर के उसके पिछले साल वाले होस्टल के कमरे में सामान रखते समय शगुन ने देखा कि आयुष का चेहरा उतरा हुआ है. मम्मा-पापा होस्टल मैनेजर से नए साल की फीस और मेस के खाने के बारे में बात करने नीचे गए , तब शगुन आयुष से कहने लगी. "तुम यहाँ आ गए, अब घर में चाचा अपना प्रवचन किसे सुनाएंगे?" शगुन ने मजाक करने की कोशिश की.
आयुष ने धीमे से कहा, "शगुन, मुझे डर लग रहा है. यहाँ सब एक जैसे दिख रहे हैं—हाथ में मॉड्यूल और आँखों में थकान. और घर पर... चाचा की वह 'वंशज' वाली बात मुझे सोने नहीं देगी."
शगुन ने उसका हाथ दबाया, "तुम यहाँ अपने लिए पढ़ना, उनके 'वंश' के लिए नहीं. घर की फिक्र मत करना."
आयुष होस्टल में सेट करके वहाँ से निकलने में कोई दो घंटे लग गए. जब तीनों वापस कार में बैठे, तो सूटकेस वाली जगह खाली थी, पर वह खालीपन भारी लग रहा था. श्रीमती गुप्ता खामोश थीं, शगुन खिड़की के बाहर देख रही थी कि कैसे हर साल कुछ न कुछ बदलता रहता है.
गुप्ताजी ने अचानक कहा, "चलो, आयुष को तो छोड़ दिया, अगले महीने शगुन को भी छोड़ने जाना होगा. उसके बाद अनिल की उम्मीदें भी पूरी हो जाएं तो घर में खुशहाली आए."
शगुन की कड़वाहट अब जुबान पर आ गई, "पापा, आप 'खुशहाली' किसे कह रहे हैं? चाची को 'कीमती संदूक' समझकर कमरे में बंद रखने को या आने वाले बच्चे पर अभी से 'दीपक' होने का लेबल चिपकाने को? क्या आप नहीं देख रहे कि चाचा किस तरह को तर्कों का ढोंग करके सबको नचा रहे हैं?"
पापा ने गाड़ी की रफ्तार थोड़ी बढ़ाई, जैसे वे शगुन के सवालों से दूर भागना चाहते हों. "शगुन, समाज में रहना है तो कुछ चीजें माननी पड़ती हैं. अनिल छोटा भाई है, उसकी अपनी सोच है."
"समाज या प्रिविलेज?" शगुन ने तीखा सवाल किया. "आप सिर्फ इसलिए चुप हैं क्योंकि आप भी उसी सत्ता का हिस्सा बने हुए हैं जिसे हिलाने की हिम्मत आपमें नहीं है."
दरा में गुप्ताजी ने गाड़ी लालाजी की दुकान पर रोकी और उतरते हुए बोले, “सरोज जी, आपकी इजाजत हो तो यहाँ चाय पी लें और घर के लिए यहाँ के पेड़े भी ले लेते हैं. चाय पीने बैठे तो गर्म निकलते समोसे भी मंगवा लिये. टेबल पर एक शगुन और मम्मी थी दूसरी तरफ गुप्ता जी. समोसा खाते हुए शगुन बोली, “पापा, आप चाचा को नाराज नहीं करना चाहते, नाराज तो उन्हें मैं भी नहीं करना चाहती. आप पर मेरा और आयुष की पढ़ाई का खर्च भी है और चाचा का घर में आर्थिक योगदान है. लेकिन आप की बातों से उन्हें प्रोत्साहन मिलता है, चाची दबाव में आ जाती हैं. कम से कम उन्हें प्रोत्साहन तो मत दीजिए.”
शगुन की बात सुन कर थोड़ी देर चुप रह कर गुप्ता जी बोले, “शगुन तू एक साल में इतनी समझदार हो जाएगी सोचा न था. अब से मैं अनिल को प्रोत्साहन नहीं दूंगा.”
मंडी पहुँचते-पहुँचते सूरज ढल चुका था और धूल के बरबूले शांत होकर जमीन पर बैठ गए थे. शगुन को अहसास हुआ कि अब घर में आयुष नहीं होगा, सिर्फ वह होगी और घर-शहर का सामंती ढाँचा होगा.
घर पहुँचते ही चाचा ने पहला सवाल किया, "छोड़ आए कुल दीपक को? अब बस एक और 'दीपक' आ जाए तो तसल्ली हो."
... क्रमशः