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रविवार, 3 मई 2026

रणनीति

देहरी के पार, कड़ी - 42
अंधेरी स्थित आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर के दोनों सीलिंग फैन चल रहे थे उसके बावजूद उमस से किसी तरह की राहत नहीं मिल पा रही थी. ऐसा लगता था कि कभी भी बारिश आ जाएगी. दफ्तर का माहौल भी आज कुछ अधिक अनुशासन में था. आज यहाँ ईसीआई यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक में ट्रेड यूनियनों के अखिल भारतीय केंद्र (AICCTU) के महाराष्ट्र स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी मौजूद थे—गहरा सांवला रंग, खादी का सफेद कुर्ता और आँखों पर मोटा चश्मा. उनके बगल में प्रशांत बाबू और शिंदे साहब थे. दूसरी तरफ प्रिया, स्नेहा और राहुल, भी बैठे थे.

प्रशांत बाबू ने मीटिंग की औपचारिक शुरुआत करते हुए कॉमरेड कुलकर्णी को बताया कि ईसीआई फैक्ट्री के क्लोजर परमिशन की फाइल को लेबर सेक्रेटरी ने 'लॉ डिपार्टमेंट' को भेज दी है और वहाँ पैंडिंग है.

"कुलकर्णी जी, स्थिति नाजुक है. एएसएल के यहाँ सुनवाई के दौरान हमने कोई कसर नहीं रखी. हमें पूरा विश्वास है कि सरकार ने मेरिट पर फैसला किया तो मैनेजमेंट का आवेदन निरस्त होगा, लेकिन उसका 14 मई के पहले सरकार का आदेश पारित करना और मैनेजमेंट तक पहुँचना आवश्यक है." प्रशांत बाबू का स्वर गंभीर था. "अगर ११ मई तक फाइल कानून मंत्रालय से बाहर नहीं आती तो यह सब होना मुमकिन नहीं होगा और 15 मई को सुबह ईसीआई के सभी मजदूर बेरोजगार होंगे. मैनेजमेंट पूरी जुगत में है कि फाइल 'लॉ डिपार्टमेंट' में अटकी रहे."

कुलकर्णी जी ने मेज पर रखे पानी के गिलास को हाथ लगाया, फिर बिना उठाए छोड़ दिया. "मैनेजमेंट चाहता है कि हम आखिरी वक्त में घुटने टेक दें. उनके वकील भट्ट ने जो लीगल क्वेरी (कानूनी सवाल) खड़ी की है, वह सिर्फ समय काटने का तरीका है. वे जानते हैं कि एक बार 'डीम्ड क्लोजर' मिल गया, तो फिर हम कोर्ट-दर-कोर्ट भटकते रहेंगे और मजदूर सड़क पर होंगे."

तभी प्रिया ने धीरे से अपनी डायरी खोली. "सर, मैं कुछ साझा करना चाहती हूँ. मैं और मेरे दोनों साथी आईआईडीईए की नए सदस्य हैं. हम इस हड़ताल और मुकदमे के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते रहे हैं. हम पिछले दो दिनों से इस फैक्ट्री के मजदूरों के घरों में गए हैं और जानने की कोशिश की है कि मजदूरों के परिवार के सदस्य क्या सोचते हैं, हम यूनियन के सेक्रेटरी शिंदे साहब के घर भी होकर ए हैं."


सेक्रेटरी शिंदे सुनकर चौंक गए और उत्सुकता से प्रिया की ओर देखने लगे. प्रिया ने गहरी सांस ली, "सर, एक चौंकाने वाला सच यह है कि मजदूर और उनके परिवार के सदस्य फैक्ट्री का क्लोजर होने से बिलकुल नहीं डरते हैं. लेकिन वे उस 'अनिश्चितता' से डरे हुए हैं जिसमें वे पिछले दस साल से जी रहे हैं. मैंने सावित्री अम्मा और बिठ्ठल भाई जैसे लोगों से बात की. उनका कहना है कि ईसीआई की यह नौकरी अब उनकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन गई है. वे 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों से आज़ाद होना चाहते हैं."

कमरे में सन्नाटा छा गया. शिंदे साहब, जो खुद उसी फैक्ट्री के मजदूर थे, थोड़े असहज हुए. "प्रिया बेटा, हम और हमारा परिवार के बीच सोच एक अलग बात है लेकिन एक यूनियन के लिए मजदूरों की 'नौकरी अचानक चले जाना या छोड़ देना' इतना आसान नहीं होता. हमारा अस्तित्व ही नौकरी बचाने से जुड़ा है. अगर हम क्लोजर मान लेते हैं, तो क्या यह मैनेजमेंट की जीत नहीं होगी?"

यही वह बिंदु था जहाँ एक पुरानी विचारधारा और नई वास्तविकता टकरा रही थी.

राहुल ने बीच में हस्तक्षेप किया, "शिंदे साहब, जीत इसमें नहीं है कि हम एक डूबते हुए जहाज पर सवार रहें. जीत इसमें है कि डूबने से पहले हम मजदूरों को उनकी मेहनत का पूरा हिसाब दिलाकर उन्हें किनारे पर उतार दें. वे लोग बाहर जाकर कोई नई नौकरी तलाश कर सकते हैं या फिर छोटा-मोटा काम करके आज की तुलना में ज्यादा सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं. हमने देखा है कि उनके घरों में हुनर की कमी नहीं है, बस उनके पास नहीं है तो अपने हुनर और मेहनत का उपयोग करने के लिए संसाधन नहीं हैं."

कॉमरेड कुलकर्णी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और अपनी उँगलियों से माथा सहलाने लगे. "प्रिया का विश्लेषण चौंकाने वाला है, लेकिन इसमें एक कड़वी सच्चाई है. दुनिया ने हमेशा मजदूरों को 'मजदूर' के रूप में देखा, लेकिन वे भी 'इंसान' हैं और उसी रूप में अपनी पहचान और आज़ादी चाहते हैं. अगर वे खुद ट्रक सिस्टम जैसी गुलामी को और ढोना नहीं चाहते, तो हम उन पर अपनी पुरानी लड़ाई थोप नहीं सकते. जहाँ तक मुझे ईसीआई फैक्ट्री में मजदूरों की हड़ताल के आरंभ में सूचना दी गयी थी, उसके मुताबिक सारे मजदूर फैक्ट्री के बंद होने और नौकरी चले जाने का खतरा उठाते हुए ही हड़ताल पर गए थे."

कुलकर्णी की इस बात के बाद मीटिंग में लंबी बहस चली. सबने अपने-अपने विचार रखे कानूनी पहलुओं को खंगाला गया. प्रश्न यह था कि अगर यूनियन क्लोजर का विरोध करना छोड़ देती है, तो मैनेजमेंट के पास मोलभाव करने की क्या वजह बचेगी?

प्रिया ने अपना पक्ष मजबूती से रखा, "सर, हम क्लोजर का विरोध न करें, ऐसा मैंने नहीं कहा. मैं कह रही हूँ कि हमारी शर्तों को बदल दिया जाए. हम सरकार से कहें कि क्लोजर की अनुमति तभी मिले जब मैनेजमेंट हर मजदूर को पिछले दस साल से 'ट्रक सिस्टम' के अवैध उपयोग से किए गए शोषण का मुआवजा, बकाया ग्रेच्युटी और एक 'विशेष एक्जिट पैकेज' दे. हमें 'नौकरी' के बदले 'न्याय और मुक्ति' को अपना मुख्य मुद्दा बनाना होगा."

कुलकर्णी जी ने मेज थपथपाई. "यही रास्ता है! अगर हम मैनेजमेंट को इस बात पर मजबूर कर दें कि क्लोजर उनके लिए 'सस्ता' नहीं बल्कि 'बहुत महंगा' सौदा साबित होगा, तो वे खुद बातचीत की मेज पर आएंगे. हमें सरकार को यह बताना होगा कि यह सिर्फ एक फैक्ट्री बंद होने का मामला नहीं है, बल्कि दस साल से चल रहे एक अवैध श्रम-प्रथा (ट्रक सिस्टम) के निपटारे का मामला है. लेकिन अभी हमारे सिर पर क्लोजर परमिशन की तलवार लटकी हुई है, इसके लिए सीधे श्रम मंत्री से मिलकर उसे समझाना होगा. हो सकता है हमें, श्रम मंत्री के बंगले के सामने धरना प्रदर्शन भी करना पड़े."

अगले दो घंटों में रणनीति को अंतिम रूप दिया गया. निर्णय लिया गया कि कल सोमवार, 6 मई को यूनियन मंत्रालय को एक ऐसा 'अल्टीमेटम' देगी जो अब तक के उनके रुख से बिल्कुल अलग होगा.

यूनियन सरकार से मांग करेगी कि ईसीआई की क्लोजर की परमिशन वाले आवेदन को तुरंत निरस्त किया जाए. यदि फैक्ट्री के मालिक क्लोजर चाहते हैं तो यूनियन के साथ समझौते के माध्यम से ही संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं. लेबर कमिश्नर खुद मजदूरों के बीच जाकर उनके 'ट्रक सिस्टम' के दावों की जांच करें और रिपोर्ट सरकार को दें. यदि 8 मई तक ठोस जवाब नहीं मिलता, तो 11 मई को श्रम मंत्री के निवास पर प्रदर्शन और घेराव होगा.

कुलकर्णी जी ने कहा कि, “मैं व्यक्तिगत रूप से प्रयास करूंगा कि श्रम मंत्री 6 या 7 मई को मिलने का समय दें.”

मीटिंग खत्म हुई, तो रात के साढ़े आठ बज रहे थे. कुलकर्णी जी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा. "प्रिया, तुमने आज हमारी लड़ाई का रूप बदल दिया है, जो अधिक मानवीय है. लेकिन याद रखना, जो रास्ता हमने अब चुना है वह काँटों भरा है. मैनेजमेंट और लॉ डिपार्टमेंट अब और भी शातिराना चालें चलेंगे."

प्रिया ने अपनी डायरी बैग में रखी. "सर, 6 दिन बचे हैं. 11 मई तक हमें कुछ न कुछ हासिल करना होगा.
... क्रमशः

शनिवार, 2 मई 2026

बेड़ियाँ

देहरी के पार, कड़ी - 41
मई के महीने की तपिश और समंदर से उठती नमी से भरपूर हवा से वातावरण भारी था. पसीना किसी तरह रुकता नहीं था. शनिवार की सुबह, जब ज्यादातर मुंबईकर वीकेंड की सुस्ती में डूबे थे, प्रिया अंधेरी (पूर्व) के चकाला इलाके की एक तंग गली के मुहाने पर खड़ी थी. राहुल और स्नेहा भी उसके साथ थे.

दो मई को दोपहर बाद ही असिस्टेंट सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से कार्यवाही समाप्त हुई थी. उसी दिन उसे सेक्रेटरी को रिपोर्ट देनी थी लेकिन तीन मई की दोपहर ट्रैकिंग से पता लगा कि रिपोर्ट सुबह सेक्रेटरी को मिली थी और शाम को यह जानकारी कि फाइल को सेक्रेटरी ने राय देने के लिए लॉ सेक्रेटरी को भेज दिया है. अगले दो दिन अवकाश होने के कारण फाइल को वहीं रहना था, जिससे ट्रैकिंग से कुछ हासिल नहीं हो सकता था.

प्रिया को ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष के बीच हमेशा यह लगा कि जब वे फैक्ट्री में या संघर्ष के दौरान साथ रहते हैं तो नौकरी या फैक्ट्री के बंद होने के संबंध में उनका विचार लगभग एक जैसा रहता है. लेकिन इनके परिवार के लोग क्या सोचते हैं? और परिवार के बीच रहकर खुद मजदूर क्या सोचते हैं? इसे अवश्य जानना चाहिए. उसने अपना यह विचार अपने शेष तीनों साथियों के सामने रखा कि क्यों न इस वीकेंड पर इन मजदूरों के परिवारों के बीच जाया जाए. क्योंकि जब तक वह उन ३५० परिवारों के चूल्हों की आग और उनके संघर्ष की नमी को महसूस न किया जाए तब तक इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता कि आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

आदित्य का कार्यक्रम इस वीकेंड पर अपने किसी मित्र से मिलने पुणे जाने का था. स्नेहा फौरन इस काम के लिए तैयार हो गई. राहुल पहले तो आने में हिचकिचा रहा था, उसे चकाला और जे.बी. नगर की तंग गलियों में धूल फाँकने के विचार में कोई औचित्य नजर नहीं आता था. लेकिन प्रिया ने जब कहा कि, “औचित्य का पता तो वहीं जाकर लगेगा. हम शनिवार को चलते हैं, यदि हमें लगेगा कि यह औचित्यहीन है तो रविवार नहीं चलेंगे.” यह सुनने के बाद वह अनमने तरीके से ही सही पर तैयार हो गया था और अब साथ था.

जैसे-जैसे वे गलियों के भीतर बढ़े, शहर का शोर पीछे छूटता गया और एक अलग ही दुनिया सामने आई. यहाँ घर एक-दूसरे से सटे हुए थे, मानों एक-दूसरे का सहारा लेकर खड़े हों. उनके पास यूनियन सेक्रेटरी शिंदे का पता था. वे तलाश करके सबसे पहले वहाँ पहुँचे. दो कमरे, एक छोटी सी रसोई, एक टॉयलेट और एक कॉमन हॉल. हॉल में ही एक कोने में रखी मशीन पर शिंदे की पत्नी सावित्री कपड़े सिल रही थीं. मशीन की 'पच-पच' की आवाज़ हवा में एक लय पैदा कर रही थी. प्रिया को देखते ही वे मुस्कुराईं. उन्होंने मशीन रोक दी. उनसे पास ही रखे चीड़ की लकड़ी के ढाँचे पर बने स्प्रिंग वाले पुराने सोफे पर बैठने को कहा. राहुल के उस पर बैठते ही वह करीब आठ इंच अंदर बैठ गया. प्रिया और स्नेहा बहुत सावधानी से उस पर बैठे.

“दीदी, मैं दो तीन साल से शिंदे साहब से कह रही हूँ कि इसे ठीक करा लें. लेकिन वे कहते हैं बोनस मिलेगा तो नया ले लेंगे. जब बोनस आता है तो और दूसरे जरूरी खर्चे निकल आते हैं.” सावित्री जी ने कहा. उन्होंने बताया कि “शिंदे साहब की तो सुबह की शिफ्ट थी वे सुबह सवा पाँच बजे ही निकल गए थे. आप आईं, बहुत अच्छा लगा," सावित्री जी ने कहा. उनके हाथों की फुर्ती बता रही थी कि वे सिर्फ एक गृहिणी नहीं, बल्कि घर की आर्थिक रीढ़ भी हैं.

प्रिया ने देखा कि पास ही में एक 12-13 साल का लड़का, जिसे शिंदे का पोता 'छोटू' बताया गया, स्कूल का बस्ता एक तरफ रखकर कुछ पुराने रेडियो और बिजली के बोर्ड खोलकर बैठा था. राहुल ने उत्सुकता से पूछा, "बेटा, ये क्या कर रहे हो?"

छोटू ने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, " स्कूल से आने के बाद बिजली वाले चाचा की दुकान पर बैठता हूँ. तार जोड़ना और सोल्डरिंग करना सीख रहा हूँ. अगले साल तक मैं खुद के छोटे-मोटे काम करना सीख जाऊंगा.”

प्रिया के मन में एक टीस उठी. ये बच्चे बचपन से ही जानते हैं कि ज़िंदगी की लड़ाई उन्हें जल्दी शुरू करनी है. सावित्री जी ने चाय के प्याले बढ़ाते हुए कहा, "बेटा, ईसीआई की नौकरी ने हमें सिर्फ अनिश्चितता दी है. पिछले दस साल से उस 'ट्रक सिस्टम' ने उनको आधा कर दिया है. हफ़्ते के छहों दिन काम मिलता है, बस इसी लालच में वे वहां बंधे रहे. पर अब हम सब चाहते हैं कि बस बहुत हुआ."

डेढ़ बजे तक प्रिया और उसके साथी पाँच-छह घरों में जा चुके थे. स्नेहा, जो आमतौर पर काफी चुलबुली रहती थी, खामोशी से डायरी में कुछ नोट कर रही थी.

तीनों ने पास ही एक रेस्टोरेंट में दोपहर का लंच किया और फिर से बस्ती में घुस गए. एक घर में वे बिठ्ठल भाई से मिले, जो ईसीआई में करीब 15 साल से थे. उनके पैर में चोट थी, फिर भी वे एक कोने में बैठकर प्लास्टिक के कुछ खिलौने जोड़ रहे थे. बिठ्ठल भाई की राय ने प्रिया को चौंका दिया. उन्होंने कहा, "दीदी, सब कहते हैं कि यूनियन नौकरी बचाने के लिए लड़ती है. पर हम? हम इस नौकरी से 'मुक्ति' चाहते हैं. ईसीआई अब कारखाना नहीं, एक ऐसी जेल है जिसका जेलर हमें न मारता है, न जीने देता है. हमें बस हमारा हिसाब ठीक-ठीक मिल जाए, हम अपनी मेहनत से कहीं भी पेट पाल लेंगे."

प्रिया ने महसूस किया कि ये मजदूर हार नहीं मान रहे थे, बल्कि वे एक ऐसी आज़ादी माँग रहे थे जहाँ उनके पसीने की कीमत तय हो, न कि कोई प्रबंधन उन्हें 'ट्रक सिस्टम' की बेड़ियों में जकड़े रखे.

अगले दिन, रविवार सुबह भी तीनों अपनी इस 'जाँच' में जुटे रहे. अपने-अपने घरों को लौटने के पहले उन्होंने बाहर ही लंच किया. तीनों का मन विचारों से भरा हुआ था. खाना खाते समय प्रिया के फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. यह विक्रांत के किसी पुराने व्यावसायिक सहयोगी का सोशल मीडिया पोस्ट था. फोटो में विक्रांत एक आलीशान रेस्टोरेंट में कुछ लोगों के साथ बैठा था. चेहरे पर वही पुराना अहंकार वापस लौट रहा था.

प्रिया ने नोटिफिकेशन देखकर भी अनदेखा कर दिया. विक्रांत अब उसके लिए एक 'अदृश्य साया' था, जिससे वह डरती नहीं थी, पर सावधान जरूर थी. उसे पता था कि विक्रांत अपनी खोई हुई साख पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. लेकिन चकाला की उन गलियों में मिले अनुभवों ने उसे एक अलग ही सुरक्षा कवच दे दिया था.

शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया, "प्रिया, शाम छह बजे IIDEA ऑफिस में यूनियन की मीटिंग है उसमें एआईसीसीटीयू के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी भी होंगे. मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार होगा. तुम आ सको तो बेहतर होगा."

उसने तय किया कि वह इस मीटिंग में अवश्य जाएगी. दो दिनों में उसने जो कुछ मजदूरों के परिवारों से मिलकर जाना है, उसे सभी को बताया जाना आवश्यक है.
... क्रमशः

शुक्रवार, 1 मई 2026

अंदेशा

देहरी के पार, कड़ी - 40
प्रशांत बाबू और रामजी काका से दिन में हुई बहस का हाल जानने के बाद प्रिया डिनर के बाद ही घर लौट सकी. उसने कपड़े बदले ही थे कि फोन घनघना उठा. कोटा से मयंक था.

“हेलो मयंक कैसे हो? मम्मा और पापा कैसे हैं?”

“दीदी, फोन मैंने किया, तो पहले मुझे बोलने दो. मैं बोलता उसके पहले तीन सवाल दाग दिए आपने.”

“सॉरी मयंक, मैं पिछले दिनों बहुत व्यस्त रही, फोन नहीं कर सकी. आज ही कुछ फुरसत है तो फोन करने वाली ही थी कि तुम्हारा फोन आ गया, मैं खुद को रोक नहीं पाई.”

“रहने दो दीदी, असल बात तो ये है कि आप हमें भूल गई हैं. और वहाँ पता नहीं क्या-क्या करती रहती हैं. आकाश भाई ने सब बता दिया है मुझे. ....अच्छा अब सुनो, सबसे ताजा समाचार यह है कि हमारे भूतपूर्व होने वाले जीजाजी ‘श्रीमान विक्रांत जी’ की जमानत अर्जी आज मुम्बई हाईकोर्ट ने मंजूर कर ली है, एक दो दिन में आदेश निचली अदालत को पहुँचेगा और जमानत पेश करने पर वे छूट जाएंगे. वैसे तो आपने उनकी हुलिया बढ़िया कर दिया है इसलिए उनकी हिम्मत नहीं होगी, फिर भी अंदेशा तो बना रहेगा. सावधान रहने में बुराई क्या है?” मयंक ने बात परिहास से आरंभ की थी और गंभीरता से समाप्त की.”

“तू मेरी चिन्ता मत कर, यह मुम्बई है. इस महानगर में विक्रांत की हैसियत किसी गली के गुंडे बराबर भी नहीं है. फिर यहाँ मेरा साथ देने वाले बहुत हैं, मैं पूरी तरह सुरक्षित हूँ. तू बता, मम्मा-पापा कैसे हैं? पापा बिलकुल ठीक हैं, बिजनेस को पूरे जोर शोर से संभाल लिया है. मुझे अपनी पढ़ाई और आवारागर्दी के लिए पूरी छूट मिल गई है. माँ तुम्हारे ले दुखी रहती हैं. उनकी इच्छा होती है कि वे आपसे रोज बात करें. वे मेरे पास ही हैं, उन्हें फोन दे रहा हूँ.

“हेलो प्रिया, कैसी है बेटा? कितने दिन हुए तुझे मुझसे बात किए हुए? मुझे तेरी बहुत फिकर रहती है. तू रोज मुझसे बात किया कर, वरना मैं जल्दी ही बूढ़ी होकर चल दूंगी.” बात करते-करते मम्मा का स्वर रुआँसा हुआ तो प्रिया बोल पड़ी.

“माँ, तुम्हें पता है मैं कैसे घर से निकली, फिर कुछ दिन जयपुर रही. मुम्बई आई तो यहाँ भी विक्रांत ने मुझे चैन से न रहने दिया. वो तो मुझे ऐसे साथी मिल गए जिनकी वजह से वह कुछ नहीं कर सका और उसे जेल जाना पड़ा. उसके बाद जिन्होंने साथ दिया वे कुछ संकट में थे तो मुझे उनकी मदद करनी पड़ी.” आज ही फुरसत मिली थी. मैं फोन करने वाली थी कि मयंक का फोन आ गया. प्रिया ने माँ को समझाने की कोशिश की.”

“मैं जानती हूँ बेटा, तू काम में व्यस्त ही रही होगी. पर माँ का मन नहीं मानता. बस आज से नियम बना ले, रात को जब भी तूझे फुरसत मिले तू मुझे फोन जरूर करेगी.”

“हाँ माँ, आज से मैं रोज आपको फोन करूंगी.”

“और सुना है विक्रांत छूटने वाला है, तू सावधान रहना. यहाँ तो तेरे पापा अब वापस बिजनेस और समाज में सक्रिय हो गए हैं तो यहाँ उसकी हिम्मत नहीं पड़ेगी.”

“माँ, यहाँ भी उसकी जो दुर्गत हुई है वह हिम्मत नहीं करेगा. और कुछ करने की कोशिश की तो इस बार और अधिक मुहँ की खाएगा. अच्छा माँ, आप अपना खयाल रखना. मैं रखती हूँ.”

प्रिया फोन बंद करने के बाद सोच में पड़ गई कि विक्रांत आखिर छूटने के बाद क्या करेगा? निश्चय ही वह पहले अपने बिजनेस को संभालेगा. खैर, वह कल सुबह प्रशांत बाबू को कहेगी. विक्रांत के ऑफिस के इलाके में कुछ लोग तो यूनियन के जरूर होंगे, उसकी गतिविधियों की जानकारी मिल जाएगी.

प्रिया ने सुबह ऑफिस के लिए निकलने के पहले दस बजे प्रशांत बाबू को फोन किया और विक्रांत की जमानत की खबर दी.

“प्रिया, जिस तरह हमने उसे दबोच कर पुलिस के हवाले किया था. उसकी अब तुम्हारी तरफ नजर उठाने की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी. फिर भी मैं उसके दफ्तर के इलाके में रहने वाले लोगों को कह दूंगा. वे विक्रांत की गतिविधियों पर नजर रखेंगे. कुछ खास होगा तो हमें सूचना दे देंगे. तुम चाहो तो चव्हाण साहब को बता सकती हो वे हाईकोर्ट में अपने असिस्टेंट को कह देंगे कि वह विक्रांत की जमानत की शर्तों का पता लगा कर बताए.”

“ठीक है, मैं चव्हाण साहब से बात करती हूँ. कल एएसएल ने लेबर सेक्रेटरी को अपनी रिपोर्ट दे दी होगी. आगे की गतिविधि की क्या खबर है?” उसने ईसीआई के क्लोजर वाले मामले में प्रशांत बाबू से पूछा.

“अभी तक कोई खबर नहीं है, एएसएल की रिपोर्ट गोपनीय है इसलिए उसकी कोई खबर नहीं है लेकिन महाराष्ट्र सरकार मार्च 2012 से ई-फाइलिंग सिस्टम का उपयोग कर रही है. एएसएल के यहाँ सुनवाई की प्रत्येक पेशी की ‘ऑर्डर शीट’ भी वेब पर उपलब्ध है. एएसएल ने अपनी रिपोर्ट को भी इलेक्ट्रोनिकली सेक्रेटरी को भेजा होगा. यदि ऐसा है तो फाइल मूवमेंट ट्रेस किया जा सकता है. तुम चाहो तो कोशिश कर सकती हो.”

“यह तो बहुत अच्छी बात है. जरूर मैं आज कोशिश करती हूँ कि क्या हुआ है, यदि एक मूवमेंट का पता लगा तो फिर हर मूवमेंट पर नजर रखी जा सकती है.” प्रिया ने कहा.

“आज शाम ईसीआई यूनियन के सेक्रेटरी शिन्दे और मेरी एआईसीसीटीयू (All India Central Council of Trade Unions) के स्टेट सेक्रेटरी से मीटिंग है. वे इस मामले में क्या सुझाते हैं. मैं तुम्हें बताऊंगा. अच्छा मैं फोन रखता हूँ, जरूरी कॉल आ रही है.”

प्रिया ने घड़ी देखी, सवा दस बज चुके थे. वह आज नियमित समय पर ठीक ग्यारह बजे ऑफिस पहुँच जाना चाहती थी. उसने फ्लैट से बाहर आकर दरवाजा लॉक किया और तेजी से लिफ्ट की ओर बढ़ गई. लिफ्ट में उसका ध्यान फिर ईसीआई के मजदूरों की ओर चला गया. उनका जीवन कितना संघर्षशील रहा है? प्रबंधन ने उन्हें कितने लंबे समय तक ट्रक सिस्टम में जकड़े रखा. वे उससे मुक्त होना चाहते थे, यहाँ तक कि उससे मुक्त होने के संघर्ष में उनकी नौकरी चली जाए तो वे उसके लिए तैयार थे. कम से कम उसके बाद वे किसी बेहतर काम की तलाश करने की संभावनाएँ तो उनके पास थीं. इस संघर्ष को शुरू करते ही उन पर क्लोजर की लड़ाई थोप दी गई. मजदूरों और उनकी यूनियन ने अब तक इस लड़ाई को बेहतरीन तरीके से लड़ा था. फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि अब कारखाने के मजदूर अपने जीवन और भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं. उसने तय किया कि इस पर वह प्रशांत बाबू से बात भी करेगी और जब भी संभव हुआ मजदूरों से भी बात करने की कोशिश करेगी.
... क्रमशः

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

लाल बस्ता

देहरी के पार, कड़ी - 39
प्रिया की आँख खुली तो खिड़की से बहुत तेज प्रकाश अंदर आ रहा था. उसने अचकचाकर घड़ी देखी तो उसे डिजिटल घड़ी के अंक ठीक से दिखाई नहीं दिए. उसकी आँखें पूरी खुल ही नहीं पा रही थीं. उसने अपनी आँखों की पुतलियों पर हल्के से उंगलियाँ चलाकर उन्हें साफ किया. फिर सिरहाने की टेबल पर रखा चश्मा आँखों पर चढ़ाया, तब अंक दिखे. घड़ी सवा आठ बजा रही थी. ऐसी गहरी नींद उसे बहुत दिनों बाद आई थी. रात को एक बार भी उसकी नींद नहीं टूटी थी. आठ घंटे से भी अधिक सो लेने के बाद भी उसे लगा कि कल की थकान अभी निकली नहीं है. उसकी इच्छा हुई कि फिर से सो जाए. लेकिन कुछ देर लेटे रहने के बाद उठी. अपने लिए चाय बनाकर पीने बैठी.

आज दो मई थी. एएसएल के यहाँ सुनवाई की अंतिम तारीख. रात एमबी में बातचीत के बीच प्रशांत बाबू ने बातचीत में कहा था, कल अधिक कुछ नहीं होना है. एएसएल दोनों पक्षों के तर्क सुनेगा और फिर घंटे-दो घंटे में या फिर तीन मई को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय भेज देगा जहाँ श्रम मंत्री से सलाह के बाद लेबर सेक्रेटरी अंतिम निर्णय लेगा. उसे लगा, उसका आज वहाँ कोई काम नहीं है, बेहतर है कि वह ऑफिस चली जाए.

उसने चव्हाण साहब को फोन करके पूछ लिया, उन्हें उसकी कोई जरूरत नहीं थी. उसने तय किया कि वह आज सुनवाई में न जाकर अपने ऑफिस जाएगी. शाम को ऑफिस समाप्त होने के बाद एमबी होते हुए अपने फ्लैट लौटेगी. वहाँ उसे पता चल ही जाएगा कि आज एएसएल के यहाँ क्या हुआ.

प्रिया ऑफिस से छूटी तो आठ बज चुके थे. वह सीधे एमबी पहुँची. प्रशांत बाबू अपनी खास टेबल पर बैठे आज का अखबार पढ़ रहे थे. वह उनके सामने की कुर्सी पर जा बैठी.


प्रिया को देखते ही प्रशांत बाबू ने अखबार मेज पर रख दिया और चश्मा उतारते हुए मुस्कुराए. "आओ प्रिया, आज तुम कोर्ट नहीं आईं तो इजलास थोड़ा शांत लग रहा था."

प्रिया ने कुर्सी खींचते हुए पूछा, "शांत? मुझे तो लगा था आज भट्ट साहब ने आसमान सिर पर उठा लिया होगा. क्या हुआ आज?"

इससे पहले कि प्रशांत बाबू कुछ कहते, रामजी काका तीन कप चाय लेकर वहाँ पहुँच गए. उनके चेहरे पर एक अजब सी चमक थी, जैसे कोई बड़ी जंग जीतकर लौटे हों.

"बिटिया, आज तुम नहीं आई तो तुमने बहुत बड़ा तमाशा छोड़ दिया!" रामजी ने चाय मेज पर रखते हुए चहक कर कहा. "आज तो चव्हाण साहब ने वो धोबी पछाड़ दी है कि भट्ट साहब के चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया था जैसे सरकारी दफ्तरों की पुरानी दीवारों का चूना गिरता है."

प्रशांत बाबू ने बीच में टोकते हुए कहा, "रामजी, थोड़ा तसल्ली से बताओ. प्रिया, मुख्य बात यह है कि एएसएल ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुना. भट्ट ने अपनी वही पुरानी राग अलापी कि कंपनी 'वेंटिलेटर' पर है और उसे बंद करना ही एकमात्र रास्ता है."

"हाँ! और फिर देखो तमाशा..." रामजी काका ने अपनी चाय का एक बड़ा घूँट भरा और हाथ नचाते हुए बोले, "भट्ट साहब कह रहे थे कि मैनेजमेंट बहुत 'उदार' है, मजदूरों को पैसा दे रहा है. तभी चव्हाण साहब अपनी जगह से ऐसे खड़े हुए जैसे कोई शेर झाड़ी से निकलता है. उन्होंने एएसएल से कहा— 'सर, ये उदारता नहीं, ये तो कसाई का दाना है जो बकरे को हलाल करने से पहले डाला जाता है.' यह सुनते ही जीएम साहब, जो भट्ट के पीछे बैठे थे, उनके चेहरे का रंग एकदम उड़ गया, वे बार-बार अपनी टाई ढीली करने लगे. इजलास में एसी और पंखा चलते रहने के बावजूद वे पसीने-पसीने हो गए. "

प्रिया और प्रशांत बाबू दोनों हंस पड़े. रामजी काका ने आगे मजे लेते हुए कहा, "और वो भट्ट साहब! बहस के बीच में बार-बार अपनी फाइलें ऐसे टटोल रहे थे जैसे कोई चोर जेब काटने के बाद खुद पीड़ित का बटुआ ढूंढने लगता है. जब चव्हाण साहब ने 'ट्रक सिस्टम' और डिफेंस सप्लाई की बात छेड़ी, तो भट्ट साहब का गला ही सूख गया. वे बार-बार पानी की खाली हो गई बोतल को हाथ लगाने लगे. एएसएल ने उन्हें देखा तो अपने ही चपरासी को भेज कर उनके लिए पानी मंगा दिया."

प्रशांत बाबू ने बात को आगे बढ़ाया, "मजाक अपनी जगह है प्रिया, पर कानूनी रूप से चव्हाण साहब ने आज बेहतरीन काम किया. उन्होंने साबित कर दिया कि क्लोजर 'बोनाफाइड' नहीं है. अंत में एएसएल ने बता दिया कि वे मंत्रालय जाकर अपनी रिपोर्ट आज ही तैयार कर रहे हैं."

"और वो लाल पोटली!" रामजी काका ने आँखों को बड़ा करते हुए कहा. "प्रिया बिटिया, तुमने देखा नहीं... जैसे ही बहस खत्म हुई, एएसएल के रीडर ने इस केस की भारी-भरकम फाइल को लाल सूती कपड़े के बस्ते में लपेटा और चपरासी से उसे साहब की गाड़ी में रखने को बोला. जीएम और भट्ट साहब उस लाल बस्ते को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके घर की चाबी कोई छीन कर ले जा रहा हो."

रामजी काका की आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी. उन्होंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "गाड़ी जब मंत्रालय की तरफ रवाना हुई, तो भट्ट साहब का चेहरा देखने लायक था. कल तक जो शेर बने घूम रहे थे, आज भीगी बिल्ली बने अपनी चमचमाती कार में दुबक कर निकल गए."

प्रिया ने चाय का प्याला हाथ में लिया. उसे अहसास हुआ कि भले ही वह आज कोर्ट में मौजूद नहीं थी, लेकिन रामजी काका के इस 'आँखों देखे हाल' ने उसे उस पूरी विधिक लड़ाई का अहसास करा दिया था.

उसने प्रशांत बाबू की तरफ देखा, "तो अब गेंद मंत्रालय के पाले में है?"

प्रशांत बाबू गंभीर हो गए, "हाँ, और मंत्रालय की इमारत में एएसएल के इजलास से बहुत अधिक पेच हैं. वहां फाइलें बोलती नहीं हैं, दबाई जाती हैं. हम 14 मई तक इंतजार करते नहीं रह सकते, हमें कुछ ऐसा करना होगा कि सरकार हर हालत में 11 मई तक ही अपना निर्णय दे दे क्योंकि उसे फैक्ट्री प्रबंधन को पहुँचाकर उसका सबूत भी रखना होगा. 13-14 को शनिवार-रविवार हैं, इन दिनों वीकेंड के नाम पर कुछ भी गड़बड़ की जा सकती है."
... क्रमशः

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

लाल समंदर

देहरी के पार, कड़ी - 38
अंधेरी ईस्ट के चकाला औद्योगिक क्षेत्र की सड़कों पर आज सन्नाटा नहीं था. सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे, लेकिन रोशनी की पहली किरणों के साथ ही सड़कों पर मजदूर और लाल झंडों की हलचल दिखाई देने लगी थी. ईसीआई के मजदूरों पर उद्योग बंदी की तलवार लटकी थी. उनका साथ देने की गरज से चकाला क्षेत्र की लाल झंडे वाली मजदूर यूनियनों ने तय किया था कि इस बार पहली मई को मजदूर दिवस का जलसा ईसीआई फैक्ट्री गेट से ही आरंभ होगा. ईसीआई के गेट पर मजदूरों का जमावड़ा लगने लगा था. प्रिया व उसके तीनों साथी, जो अब तक केवल ऑफिस की फाइलों और विधिक बारीकियों तक सीमित थे—आज इस श्रमिक उत्सव का हिस्सा बनने के लिए समय से पहले ही वहाँ पहुँच गए थे. कुछ देर बाद ही प्रशांत बाबू और रामजी भी पहुँच गए.

ईसीआई फैक्ट्री के मुख्य द्वार से बायीं ओर हट कर जहाँ यूनियन का झंडा साल भर लहराता था. वहाँ का पुराना झंडा उतार दिया गया था. उसके स्थान पर एक नया झंडा चढ़ा दिया गया था, बस उसे लहराना शेष था. सूरज पूरब से झाँकने लगा था. कुछ देर बाद ठीक सवा छह बजे यूनियन के अध्यक्ष ने प्रशांत बाबू को आगे आने को कहा, उन्होंने आगे बढ़ कर झंडा लहरा दिया. तभी पास खड़े रामजी आगे आए और ‘इंटरनेशनल गान’ गाने लगे --- ‘उठ जाग ओ भूखे बंदी अब खींच लाल तलवार, कब तक सहोगे तुम जालिम का अत्याचार ......” रामजी एक पंक्ति गाते थे, उसके बाद सभी उसे दोहराते थे. गान खत्म होते ही यूनियन सेक्रेटरी ने नारे लगाना शुरू किया, मजदूर जवाब देने. ‘इंकलाब-जिन्दाबाद’, ‘दुनिया भर के मजदूरों एक हो’, ‘हमारे हक-ले के रहेंगे. ‘इंटरनेशनल गान’ के दौरान प्रिया के रोंगटे खड़े हो गए. उसने देखा कि जो मजदूर कल तक एएसएल के सामने झुकी कमर के साथ खड़े थे, आज एक नई ऊर्जा से लबरेज थे.

झंडा फहराने के बाद, फैक्ट्री गेट पर ही प्रबंधन के विरुद्ध एक जोरदार प्रदर्शन हुआ. "ट्रक सिस्टम बंद करो", "मैलाफाइड क्लोजर वापस लो" के नारों से पूरा औद्योगिक क्षेत्र गूँज उठा. उसके बाद सारे मजदूरों ने इस क्षेत्र की सड़कों पर प्रभावशाली जलूस निकाला. वे क्षेत्र के हर उद्योग के सामने से गुजरे. हर उद्योग के मजदूर अपने उद्योग पहुँचकर जलूस छोड़कर अपने कार्यक्रम के लिए रुक जाते थे.

जलूस वापस ईसीआई के गेट पर पहुँचा, तब उसमें केवल ईसीआई के ही मजदूर शेष रह गए थे. यहाँ उनकी एक आमसभा होनी थी. उससे पहले मजदूर बैठकर सुस्ताने लगे. सुस्ताते हुए मजदूरों में आपस में चर्चा होने लगी. प्रिया ने सुना कि कल शाम ही सुपरवाइजरों ने कुछ कमजोर कड़ियों को 'स्पेशल पैकेज' और 'कमीशन' का लालच दिया था. मैनेजमेंट का वह 'चारा' अभी भी उनके दिमाग में घूम रहा था.

कुछ देर बाद आमसभा शुरू हो गई. एक अधेड़ श्रमिक ने बोलना शुरू किया. उसने फैक्ट्री में सुपराइजरों और मैनेजरों द्वारा फैलाई जाने वाली भ्रामक बातों का उल्लेख करते हुए कहा, "साथियों, जब मालिक तुम्हें 'सेटलमेंट' का लालच दे, तो समझ लेना कि वह डर गया है. वह तुम्हारी एकता को खरीदना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि कानून की मेज पर वह हार चुका है. हमें इस तरह जो चंद रुपयों का लालच दिया जा रहा है वह हमारे स्वाभिमान और आने वाली पीढ़ियों के हक की कीमत है. क्या हम में से कोई बिकने को तैयार है?"

पूरे मैदान से एक स्वर में आवाज़ आई— "नहीं!" प्रिया ने देखा कि ईसीआई के वे मजदूर जो कल तक संशय में थे, अब मुट्ठियां भींचकर खड़े थे. मैनेजमेंट का वह 'समझौते का चारा' आज उस विराट एकता के सामने बौना साबित हो गया था.

आमसभा जल्दी ही खत्म हो गई. प्रशांत बाबू, रामजी काका, प्रिया और उसके तीनों साथियों ने पहले से तय कार्यक्रम के तहत अंधेरी स्टेशन का रुख किया.

अंधेरी स्टेशन से लोकल पकड़कर २८ किलोमीटर का सफर तय कर वे चर्चगेट स्टेशन उतरे. वहाँ से आजाद मैदान पहुँचने में उन्हें दस मिनट लगे. यहाँ अलग ही दृश्य था. यहाँ पूरे मुंबई और महाराष्ट्र से आए लाखों कामगारों का सैलाब था. चारों ओर लाल झंडों का एक ऐसा समंदर था लहरा रहा था जैसे अभी वह दुनिया के सारे सरमाए को निगल लेगा.

प्रिया ने पहली बार महसूस किया कि ईसीआई की लड़ाई कितनी बड़ी जंग का एक छोटा सा हिस्सा है. रामजी काका ने भीड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, "बिटिया, अंधेरी में हमने अपनी जमीन पर हक माँगा, लेकिन यहाँ हम यह बताने आए हैं कि यह पूरी दुनिया हमारे पसीने से चलती है. यहाँ पूंजीपतियों और उनके एजेंटों को यह अहसास कराया जाता है कि मजदूर अकेले नहीं हैं."

प्रिया के तीनों साथी—जो अब तक ईसीआई के बंदीकरण के मुकदमे को केवल एक 'असाइनमेंट' की तरह देख रहे थे—आज दंग थे. उन्होंने देखा कि कैसे एक अनपढ़ मजदूर भी विधिक अधिकारों और वर्ग-चेतना की बात कर रहा है. प्रिया को अहसास हुआ कि कानून की किताबों से बाहर भी एक बड़ी अदालत है—'जनता की अदालत'.

उसने प्रशांत बाबू से कहा, "अब तक मैं केवल विधिक रिपोर्टों की चिंता कर रही थी, लेकिन आज समझ आया कि असली ताकत इन मजदूरों का अपनी एकता पर भरोसा है. अगर हम सचिवालय में फाइल ट्रैक कर रहे हैं, तो हमें इन संघर्षरत मजदूरों की एकता और उनके जमीर की भी रक्षा करनी होगी."

शाम ढलते-ढलते जब वे वापस अंधेरी की ओर लौटने लगे, तब दिन भर की थकान के बावजूद, लेकिन उनमें से हर कोई अपने भीतर एक फौलादी संकल्प लिए हुए था. प्रिया ने मुड़कर पीछे छूटते आजाद मैदान को देखा. उसने आज सीखा था कि 'ट्रक सिस्टम' से आजादी की लड़ाई केवल कोर्ट-रूम में नहीं, बल्कि मजदूरों के एकजुटता से जीती जाएगी.

अंधेरी स्टेशन उतरते समय रात हो चुकी थी. प्रशांत बाबू को तो डिनर के लिए मेवाड़ भोजनालय ही जाना था. रामजी काका ने प्रिया और उनके साथियों को भी डिनर के लिए न्यौत दिया, “प्रिया तुम सब अब इतना थक चुके हो कि यदि सीधे घर चले गए तो कोई भी खाना नहीं बनाएगा. बेहतर है कि तुम भी एमबी पर ही डिनर कर लो. चारों ने एक दूसरे की ओर देखा, फिर आँखों ही आँखों में तय कर लिया कि न्यौता ठुकराना ठीक नहीं.

डिनर के बाद घर लौटते वक्त प्रिया की आँखों में एक नई चमक थी. वह जान चुकी थी कि अब वह केवल एक सहायक नहीं रह गयी है, बल्कि मजदूर वर्ग के संघर्षों का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.
... क्रमशः

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

दो मोर्चे

देहरी के पार, कड़ी - 37
तीस अप्रैल को जब इजलास में सुनवाई चल रही थी. दूसरी शिफ्ट के मजदूर फैक्ट्री में अपने काम पर पहुँच चुके थे. फैक्ट्री के भीतर एक अलग ही 'ऑपरेशन' शुरू हो चुका था. प्रबंधन ने अब अपनी रणनीति बदल दी थी. वह अपने चहेते सुपरवाइजर और मैनेजरों को अब मजदूरों को धमकाने के बजाय 'हमदर्द' बनकर उनके पास पहुँचने के लिए ट्रेंड कर रहा था.

दूसरी शिफ्ट शुरू होते ही कैंटीन और वर्कशॉप में काम के दौरान कुछ सुपरवाइजरों ने जुमले फेंकने शुरू किए. "अरे भाई, ये चव्हाण साहब और यूनियन के नेता तो अपनी राजनीति कर रहे हैं. आखिर में भुगतना तो हमें और तुम्हें ही है. सुना है एएसएल साहब को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को देनी है. लेकिन वहाँ तो पहले ही फैसला हो चुका है. मंत्री जी ने तो मौखिक परमिशन दे ही दी है, बस ये 15 मई की तारीख का इंतज़ार है."

मैनेजमेंट ने अब उन 'कमजोर कड़ियों' को निशाना बनाना शुरू किया जो कर्ज में डूबे थे या घर की मजबूरियों से परेशान थे. प्रोडक्शन फ्लोर के एक कोने में, मैनेजर खन्ना ने तीन मजदूरों को किनारे ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा. "देखो, तुम लोग पुराने और वफादार हो. मैं नहीं चाहता कि क्लोजर के बाद तुम सड़कों पर भटको. अगर तुम अपने साथ 10-15 मजदूरों की टोली तैयार कर लो, जो शांति से अपना हिसाब (Settlement) लेकर हटने को तैयार हों, तो मैं एमडी साहब से बात करके तुम्हें 'स्पेशल पैकेज' दिलाऊँगा. और हाँ, हर तैयार मजदूर के पीछे तुम्हें अलग से 'इनाम' भी मिलेगा."

मजदूरों के चेहरों पर दुविधा थी. एक तरफ सालों का साथ था, तो दूसरी तरफ सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य और हाथ में आने वाला पैसा. दीमक ने जड़ों पर वार करना शुरू कर दिया था.
...
एएसएल के यहाँ कार्यवाही समाप्त होने के बाद प्रिया ने राहत की एक लंबी सांस ली. उसे लगा कि आज का दिन जीत का दिन है. उसने उत्साह से चव्हाण साहब की ओर देखकर मुस्कुराना चाहा, लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. वे अपनी फाइलों को सहेजने में इतने मग्न थे जैसे उनके दिमाग में कोई और ही गणित चल रहा हो. प्रिया की नज़र प्रशांत बाबू पर पड़ी, उनके चेहरे पर भी उत्साह के स्थान पर चिंता की गहरी लकीरें दिखाई दीं. वह परेशान हो उठी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतनी शानदार जिरह और पुख्ता सबूतों के बाद भी ये लोग इतने गंभीर क्यों हैं?

शाम के छह बजने को थे. इजलास खाली हो चुका था, लेकिन प्रिया का अपने घर जाने का बिल्कुल मन नहीं हुआ. मन में उठते सवालों का जवाब चाहिए था. वह बाहर आई तो उसे रामजी काका दिखाई दिए. रामजी काका—जो इस पूरी विधिक यात्रा में बेनागा कार्यवाही में हाजिर होते थे और मजदूरों के सुख-दुख के साक्षी थे. वह उनकी ओर बढ़ गई.

“सुनवाई का क्या रहेगा काका? आप अपने अनुभव से बताएँ.” प्रिया ने सीधे मुद्दे की बात पूछी.

रामजी काका ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी टोपी ठीक करते हुए बोले, “बिटिया, यदि अंतिम फैसला इस एएसएल ने ही देना होता तो मजदूर ही जीतता. हमारे चव्हाण साहब ने उन्हें लाचार कर दिया है. लेकिन कानून का पेच समझो—यह केवल रिपोर्ट देगा, फैसला सेक्रेटरी और मंत्री करेंगे. सचिवालय सत्ता का गलियारा है बिटिया, वहाँ पूंजीपतियों और भूस्वामियों के एजेंट बैठे हैं जो हमेशा ध्यान रखते हैं कि उनके मालिकों को किसी तरह की हानि न हो. यदि होनी भी हो तो ऐसा रास्ता निकाला जाए कि कम से कम हो.”

रामजी की बात सुनकर प्रिया चिंतित हो उठी. उसे लगा कि वह जिस जीत को मुट्ठी में समझ रही थी, वह तो अभी कोसों दूर है. रामजी उसकी चिंता समझ गए. उन्होंने माहौल हल्का करने के लिए पूछा, “बिटिया, अब ऑफिस जाओगी?”

“नहीं काका, वहाँ से तो आज छुट्टी ली है. सोच रही हूँ घर चली जाऊँ.” प्रिया ने बुझे मन से कहा.

“वहाँ अकेले क्या करोगे? तुम ‘एमबी’ (मेवाड़ भोजनालय) चलो. गर्मी बहुत हो रही है. वहाँ बेहतरीन राजस्थानी ठंडाई पीएंगे. गर्मी से कुछ आराम मिलेगा.” रामजी काका ने स्नेह से कहा.

“आप ठंडाई के बहाने ले जाएंगे और डिनर के पहले आने नहीं देंगे.” प्रिया ने उलाहना दिया, पर उसके स्वर में एक अपनापन था.

“अब अपनी बेटी के लिए इतना तो करने का हक है काका को.” रामजी के इस तर्क के आगे प्रिया क्या कहती, उसे उनके साथ एमबी आना पड़ा.

मेवाड़ भोजनालय पहुँचते ही वहाँ के कर्मचारी खिल उठे. प्रिया इस जगह की पुरानी और चहेती ग्राहक थी. सब आते-जाते उसे नमस्ते करके कहने लगे, “दीदी अब के बहुत दिन में आई.” प्रिया भी अपनी चिंता भूलकर सबके हाल-चाल जानने में लग गई. कुछ देर में रामजी दो गिलास गाढ़ी और ठंडी ठंडाई बनवा कर ले आए. प्रिया को पता था कि साढ़े सात तक प्रशांत बाबू भी यहीं पहुँचते होंगे, वह उनसे बात करने के लिए रुकी रही.

प्रशांत बाबू आए, उनकी चाय आई तो प्रिया भी उनके साथ जा बैठी. इजलास की उस गर्माहट के बाद एमबी की शाम कुछ शांत थी.

“एएसएल के यहाँ हमारा परफॉर्मेंस बहुत अच्छा था. हमने प्रबंधक के आवेदन को हर काउंट पर ध्वस्त किया है. इसलिए उन्हें फैक्ट्री बन्द करने की परमिशन तो नहीं मिलेगी.” प्रिया ने चर्चा शुरू की.

प्रशांत बाबू ने चाय का घूँट लिया और धीमी आवाज़ में बोले, “परमिशन तो बिल्कुल नहीं मिलेगी, प्रिया. दो मई को बहस के बाद एक-दो दिन में एएसएल अपनी रिपोर्ट सचिवालय भेज देगा. बस वहीं असली चक्रव्यूह शुरू होगा. हमें अंदेशा है कि सचिवालय में जानबूझकर देरी करके मामले को डीम्ड परमिशन में बदलने का दुश्चक्र चलेगा. प्रबंधन का पूरा जोर अब इस बात पर होगा कि 14 मई की रात तक सरकार का आदेश प्रबंधन को न मिल पाए.”

प्रिया सन्न रह गई. "डीम्ड परमिशन? यानी अगर फैसला नहीं आया तो वे इसे अपनी जीत मान लेंगे?"

"हाँ प्रिया, और इसीलिए अब प्रबंधन अपनी रणनीति बदल रहा है. वे केवल मंत्रालय में फाइल नहीं रोकेंगे, बल्कि फैक्ट्री के भीतर कर्मचारियों के बीच भी दरार पैदा करने का पूरा प्रयत्न करेंगे." प्रशांत बाबू ने अपनी चिंता स्पष्ट की.

प्रिया ने एमबी की खिड़की से बाहर अंधेरे को देखते हुए पूछा, "तो अब हमारे पास रास्ता क्या है?"

प्रशांत बाबू ने गंभीर स्वर में कहा, "कानून के मैदान में हम तथ्यों से लड़ रहे थे, लेकिन अब मैनेजमेंट मजदूरों के 'जमीर' से लड़ रहा है. हमें दोनों मोर्चों पर लड़ना होगा—सचिवालय में फाइल की पल-पल की जानकारी रखनी होगी और फैक्ट्री के भीतर फैलने वाली इस दीमक को रोकना होगा. अगर मजदूर लालच में आकर टूट गए, तो एएसएल की यह जीत केवल कागजी रह जाएगी."

प्रिया ने देखा कि रामजी काका दूर खड़े होकर उन दोनों को देख रहे थे. उनकी आँखों में वही पुराना डर था जो सत्ता के गलियारों के नाम से आता है.

'चक्रव्यूह' अब इजलास से निकलकर मजदूरों के दिल और दिमाग तक पहुँच चुका था.
... क्रमशः

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

सर्जिकल स्ट्राइक

देहरी के पार, कड़ी - 36
ईसीआई फैक्ट्री के मजदूरों ने तय किया था कि मंगलवार, 30 अप्रैल, 2019 को दूसरी शिफ्ट वाले साढ़े दस बजे तक एएसएल ऑफिस पहुँच जाएंगे और शिफ्ट समय से आधे घंटे पहले वहाँ से रवाना होकर सीधे फैक्ट्री पहुँचेंगे और पहली शिफ्ट वाले फैक्ट्री से छूट कर सीधे एएसएल ऑफिस पहुँचेंगे. कुछ मजदूरों ने आज फैक्ट्री से अवकाश ले लिया था. वे एएसएल के यहाँ होने वाली आज की पूरी कार्यवाही देखना चाहते थे. सुबह ग्यारह बजे एएसएल (ASL) के इजलास में तिल रखने की जगह नहीं थी. प्रिया ने भी आज अपने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी.

कार्यवाही शुरू होते ही प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने एक प्रार्थना पत्र पेश किया. "हुज़ूर, यूनियन ने अपनी साक्ष्य में कल ही दो गवाहों के शपथ-पत्र पेश किए हैं उनके साथ कुछ दस्तावेज भी पेश किए हैं. हमें ये कल शाम साढ़े चार बजे मिले. उनके तकनीकी पहलुओं को समझने के लिए हमें समय चाहिए. जो दस्तावेज इंटरनेट से डाउनलोड करके पेश किए गए हैं, उनकी साक्ष्य में ग्राह्यता का भी प्रश्न है. इस कारण हम चाहते हैं कि कृपया सुनवाई अगले शुक्रवार तक स्थगित (Adjourn) कर दी जाए."

वकील रमेश चव्हाण, जो आज अपनी कोर्ट यूनिफॉर्म में बहुत प्रभावशाली लग रहे थे, तुरंत अपनी जगह से उठे. "सर, यह 'तकनीकी पहलू' केवल बहाना हैं. वे हमारे लिए अचंभा हो सकते थे लेकिन प्रबंधन के लिए इन्हें परखना और जाँचना मिनटों का काम है. यह शुद्ध रूप से डिले टेक्टिक्स (Delay Tactics) है. प्रबंधन का एकमात्र लक्ष्य 60 दिन की समय-सीमा को पार करना है ताकि 'डीम्ड परमिशन' का लाभ ले सकें. आज यूनियन के गवाह मौजूद हैं, इन्हें हर हालत में उनसे जिरह करनी चाहिए."

एएसएल ने घड़ी देखी और भट्ट की ओर सख्त नज़रों से देखा. "मिस्टर भट्ट, मैंने पहले ही कहा था कि यह टाइम-बाउंड मामला है. मैं सुनवाई नहीं टालूँगा. मैं जिरह के लिए दोपहर ढाई बजे तक का समय देता हूँ. यदि उस समय तक आप तैयार नहीं हुए, तो मैं जिरह का अवसर समाप्त मानकर कार्यवाही पूरी करूँगा."

दोपहर ढाई बजे तक के लिए कार्यवाही स्थगित होने की सूचना श्रमिकों को दे दी गई. जिससे दूसरी शिफ्ट वाले श्रमिक अपने काम पर चले जाएँ. कुछ ही देर में वहाँ मजदूरों की संख्या दस-बारह मात्र रह गई. लेकिन पहली शिफ्ट वाले लगभग सभी मजदूर ढाई बजे तक एएसएल के ऑफिस पहुँच गये थे और उनकी संख्या सुबह से अधिक थी.

ठीक ढाई बजे एएसएल इजलास में आ बैठे. पाँच मिनट बाद ही जिरह शुरू हो गई. प्रशांत बाबू कठघरे में थे. वकील भट्ट ने उन्हें उलझाने की कोशिश की. "क्या यह सच नहीं है कि मार्केट में मंदी के कारण आपके द्वारा बनाई गई आई.सी. (IC) का कोई खरीदार नहीं है और स्टॉक डंप पड़ा है?"

प्रशांत बाबू ने शांति से उत्तर दिया. "जी नहीं, यह कहना गलत है. सच तो यह है कि ईएसआई फैक्ट्री डिफेंस आर्म्स इंडस्ट्री के लिए 'क्रिटिकल कंपोनेंट्स' बनाती है. इन आई.सी. की मांग कभी कम नहीं होती क्योंकि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है."

वकील भट्ट हक्के-बक्के रह गए. "यह आप कैसे कह सकते हैं? आपके पास क्या सबूत है?"

चव्हाण साहब ने तुरंत प्रिया द्वारा तैयार किया गया वह 'कलर प्रिंटआउट' एएसएल की मेज पर रखा. "यह देखिए, सर, कंपनी का अपना प्रोफाइल और उनके पिछले सप्लाई ऑर्डर्स का डेटा. यह फैक्ट्री केवल निजी मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कल-पुर्जे बनाती है. इसका बंद होना 'जनहित' (Public Interest) के विरुद्ध है."

इजलास में सन्नाटा पसर गया. हर कोई समझ रहा था कि डिफेंस सप्लाई वाला तर्क एकदम सर्जिकल स्ट्राइक जैसा था. एएसएल ने उस दस्तावेज को बड़ी गंभीरता से पढ़ा. डिफेंस सप्लाई वाला यह तथ्य प्रबंधन के 'घाटे' और 'मंदी' वाले हर तर्क को काट चुका था.

प्रशांत बाबू के बाद यूनियन के सचिव शिंदे कठघरे में आए. उन्होंने अपने शपथ पत्र में बताया था कि बारह वर्ष पहले यूनियन के महंगाई के अनुसार वेतन बढ़ाने की मांग करने पर ‘ट्रक सिस्टम’ आरंभ हुआ था और कैसे वह समय के साथ अमानवीय होता गया था. उन्होंने समाप्त करने और फेयर वेजेज की मांग करने वाला मांग पत्र, हड़ताल का नोटिस, प्रबंधन द्वारा वार्ता से इन्कार करने संबंधी दस्तावेजों को प्रदर्शित किया और प्रबंधन के अड़ियल रवैये संबंधी तथ्य सामने रखे. प्रबंधन वकील भट्ट ने उनसे लंबी जिरह की जो शाम साढ़े पाँच बजे तक चलती रही. शिंदे से हुई जिरह के अंत में एएसएल ने अपनी फाइल पर दोनों पक्षों की साक्ष्य पूर्ण होने की नोटिंग की और आदेश सुनाया कि दोनों पक्ष इस मामले के कानूनी पक्ष पर जो कुछ कहना चाहते हैं उसका लिखित प्रतिवेदन दो मई दोपहर एक बजे तक प्रस्तुत कर दें. उसके उपरान्त यह एक सदस्यीय कमीशन अपनी जांच रिपोर्ट (Inquiry Report) और अनुशंसा तैयार करके सरकार के अंतिम निर्णय के लिए मंत्रालय को भेज देगा."

इस पर मजदूरों की ओर से वकील चव्हाण ने आपत्ति की, “नहीं सर, यह प्रक्रिया ठीक नहीं है. उद्योग बंद करने की अनुमति का आवेदन प्रबंधन का है. वह अपने लिखित प्रतिवेदन की प्रतिलिपि कल शाम 5 बजे तक मेरे कार्यालय पहुँचा दे. जिससे उनके तर्कों और कानूनी पक्ष पर मजदूर पक्ष भी अपनी राय दे सके. हम अगले दिन दो मई को दोपहर एक बजे तक अपने तर्क आपके कार्यालय में प्रस्तुत कर दें.”

एएसएल ने प्रबंधन वकील की ओर देखा, “मिस्टर भट्ट, आपकी क्या राय है?”

“सर, चव्हाण साहब की बात सही है, हमारे लिखित प्रतिवेदन के बाद उन्हें जवाबी लिखित प्रतिवेदन देना चाहिए. लेकिन जवाबी लिखित प्रतिवेदन के नए तथ्यों पर हमें पुनः जवाब का अवसर मिलना चाहिए. और सर, कल शाम तक अपना लिखित प्रतिवेदन तैयार करने के लिए बहुत कम समय है. हम यह दो मई को सुबह प्रस्तुत कर सकते हैं. वैसे भी कल महाराष्ट्र दिवस और मजदूर दिवस दोनों हैं. तो दोनों ही पक्ष कल सुबह व्यस्त रहेंगे.”

एएसएल समझ गए कि प्रबंधन देरी करने की जुगत में है. उन्होंने रीडर को डायरी देखकर बताने को कहा कि दो मई को कोई विशेष अपॉइंटमेंट तो नहीं है? रीडर ने बताया कि दो मई को शाम चार बजे मंत्रालय में मीटिंग है.

“ठीक है, दोनों पक्ष दो मई को सुबह 11 बजे उपस्थित हों. मैं दोनों के तर्क सुनूंगा. और मिस्टर भट्ट, आपको चव्हाण साहब की बहस का जवाब देने का उसी वक्त मौका दिया जाएगा. और यदि आप दोनों को लिखित में कुछ देना हो तो बहस के पहले उसे प्रस्तुत कर सकते हैं. दो मई को शाम तीन बजे के पहले हर हालत में कार्यवाही समाप्त कर दी जाएगी.

इजलास से बाहर निकलते वक्त मजदूरों ने 'इंकलाब' के नारे नहीं लगाए, बल्कि एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामा. प्रिया चव्हाण साहब की ओर देखकर मुस्कुराई, लेकिन प्रशांत बाबू का दिमाग अभी भी सचिवालय की ओर अटका हुआ था. वे जानते थे कि दो मई की शाम एएसएल की मेज से फाइल हटने के बाद 'मंत्रालय वाला असली चक्रव्यूह' शुरू होगा.
... क्रमशः