देहरी के पार, कड़ी - 54
अकेले रहने वालों के लिए वीकेंड कुछ राहत लेकर आता है, उन्हें उन दो दिनों में ऑफिस नहीं जाना होता. लेकिन घर के काम भी बहुत होते हैं. फ्लैट की सफाई करनी है, कपड़े धोने हैं, यदि किचन, बाथरूम, वार्डरोब वगैरा में चीजें खत्म हो रही हैं तो उन्हें लाना है या किसी से मिलने जाना है. प्रिया की भी लगभग ऐसी स्थिति थी. फिर भी वह तमाम काम करते हुए अपनी रुचि के कामों के लिए समय निकाल लेती थी. इस शनिवार दोपहर एक बजे रिसर्च एनालिस्ट को आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर आना था. वह उससे मिलने को उत्सुक थी. वह जानना चाहती थी कि आखिर ये दुनिया भर के अध्ययन (स्टडी) कैसे होते हैं? उसे पढ़ी हुई किताबें भी यूनियन लाइब्रेरी में लौटानी थीं और नई लानी थीं. वह आधे घंटे पहले ही वहाँ पहुँच गई. दफ्तर का माहौल शांत था. वह सीधे यूनियन की लाइब्रेरी वाले कमरे की ओर बढ़ गई. उसके हाथ में लौटाए जाने वाली तीन पुस्तकें थीं. इन किताबों को पढ़ने के बाद मनुष्य समाज और प्रकृति तथा उसके सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को देखने का उसके नजरिए में बहुत परिवर्तन आया था.
वह अभी अपनी पुस्तकें जमा ही करा रही थी कि तभी प्रशांत बाबू ने लाइब्रेरी में प्रवेश किया. प्रिया को देखकर वे मुस्कुराए. जमा कराए जाने वाली किताबें देखकर उन्होंने उत्साह से पूछा, “एंगेल्स की इन दोनों पुस्तकों को पढ़ने से कैसा लगा?”
“इन्हें पढ़ने का अनुभव बहुत ही जबर्दस्त है. मेरा नजरिया डार्विन और लुइस हेनरी मॉर्गन जैसा होता जा रहा है. मुझे मॉर्गन की Ancient Society हिन्दी में ऑनलाइन ‘प्राचीन समाज' के नाम से मिल गई है. मैंने इसे ऑर्डर भी कर दिया है.”
“क्या? यह किताब हिन्दी में उपलब्ध है तो मुझे भी बताओ, मैं एक अपने लिए और एक यहाँ लायब्रेरी के लिए मंगाता हूँ. यह मनुष्य और परिवार के विकास को समझने के लिए जरूरी किताब है. यहाँ होनी चाहिए.”
प्रशांत बाबू ने मेज पर हाथ टिकाते हुए बहुत आत्मीय स्वर में कहा, "और के. दामोदरन की किताब भारतीय चिंतन परंपरा कैसी लगी?”
“यह भी बढ़िया और जरूरी किताब है, पूरी नहीं पढ़ पायी, लेकिन यह मेरे पास होनी चाहिए, इसलिए मैंने इसे भी ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया है.”
“प्रिया, मुझे लगता है अब तुम्हें मार्क्स-एंगेल्स का ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’, कार्ल मार्क्स की 'फ्रांस में गृहयुद्ध' और लेनिन की 'राज्य और क्रांति' जरूर पढ़नी चाहिए. ये बुनियादी किताबें हैं जो मनुष्य समाज में वर्ग पैदा हो जाने से लेकर आज तक मौजूद रहे वर्ग संघर्ष को समझने में मदद करती हैं.”
प्रिया ने उत्सुकता से उनकी ओर देखा. प्रशांत बाबू ने शेल्फ से ये तीनों किताबें निकालीं और मेज पर रख दीं.
"इनको पढ़ने के बाद तुम जान सकोगी कि मज़दूरों की लड़ाई केवल वेतन और अपने लिए सुविधाएँ हासिल करने तक की नहीं है, अपितु यह व्यवस्था के चरित्र को बदलने के ऐतिहासिक दायित्व तक जाती है," प्रशांत बाबू ने कहा. प्रिया ने सम्मान और कौतुक के साथ उन किताबों को छुआ और तीनों पुस्तकें अपने नाम पर इश्यू करवा लीं. उन किताबों को अपने बैग में रखते हुए उसे महसूस हुआ कि ज्ञान अर्जित करने की कोई सीमा नहीं, मनुष्य जीवन में प्रत्येक समय ज्ञान अर्जित कर रहा होता है, यदि उसने अपनी ज्ञानेन्द्रियाँ ही अवरुद्ध न कर रखी हों.
एक बजे की बैठक के लिए प्रशांत बाबू, और सचिव शिंदे पहले से ही मेज के गिर्द कुर्सियों पर बैठे थे. प्रिया वहाँ आयी और बैठने को थी कि कॉमरेड कुलकर्णी ने करीब 25 वर्ष उम्र की साँवली लड़की के साथ कमरे में प्रवेश किया. उन्हें देख सभी खड़े हो गए, कॉमरेड कुलकर्णी को अभिवादन किया, वे कुर्सी पर बैठे और सबको बैठने को कहा. कुलकर्णी जी ने लड़की का परिचय दिया, “ये कणिका जोशी, मेरी भांजी है. इसने अभी साल भर पहले पॉपुलेशन साइंस (जनसंख्या विज्ञान) में मास्टर डिग्री की है और अपने इंस्टीट्यूट के ही एक प्रोजेक्ट में काम कर रही है. यह इस तरह की रिसर्च के लिए प्रोफेशनली ट्रेंड है. यह हमारे अध्ययन को पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से करने में हमारी मदद करेगी. यह खुद भी इस रिसर्च के लिए बहुत उत्सुक है.”
सभी ने कणिका को अभिवादन किया और फिर अपना-अपना परिचय उसे दिया. प्रिया का परिचय सुनकर कणिका के मुँह से निकला, “अरे वाह! आपसे तो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”
“अभी तो मैं यहाँ आपसे सीखने के लिए आई हूँ.” प्रिया ने उत्तर दिया. उसे लगा कि मुंबई में उसे एक स्थानीय मित्र मिलने वाली है.
कणिका ने सबसे पहले प्रशांत बाबू और कुलकर्णी जी से सर्वे के मूल उद्देश्य को समझा. उसने पूछा, "हमें यह डेटा सिर्फ आंतरिक रणनीति के लिए चाहिए या कोर्ट और इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में चल रहे मुकदमों में अपना पक्ष साबित करने के लिए भी?"
कुलकर्णी जी ने जवाब दिया, "दोनों के लिए, कणिका. लेकिन मुख्य उद्देश्य ट्रिब्यूनल में यह साबित करना है कि मैनेजमेंट मजदूरों की आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें जबरन वीआरएस (VRS) की तरफ धकेल रहा है."
इसके बाद प्रश्नावली पर चर्चा शुरू हुई. कणिका ने अपनी वैज्ञानिक समझ के हिसाब से कुछ बेहतरीन प्रश्नों का सुझाव दिया जो मजदूरों की जन-सांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति को सांख्यिकीय (Statistical) रूप से पुख्ता करते थे. प्रिया ने भी बीच में हस्तक्षेप करते हुए कुछ अत्यंत व्यावहारिक प्रश्नों का सुझाव दिया, जो उसने पिछले दिनों मज़दूरों की बस्तियों और रामजी काका के यहाँ बातचीत के दौरान महसूस किए थे—जैसे ट्रक सिस्टम के कारण उन पर बढ़ा साहूकारों का कर्ज और बच्चों की पढ़ाई का खर्च.
कणिका, प्रिया की इस जमीनी पकड़ से बहुत प्रभावित हुई. उसने अपने नोट्स समेटते हुए कहा, "उद्देश्य अब पूरी तरह स्पष्ट है. आज रात मैं इन सभी बिंदुओं को मिलाकर अंतिम प्रश्नावली और डेटा फॉर्म तैयार कर लूंगी. कल, यानी रविवार को, मैं सर्वे के लिए जाने वाले यूनियन के कार्यकारिणी सदस्यों के साथ बैठक करूंगी. मैं उन्हें यह फॉर्म सौंपूंगी और बाकायदा ट्रेनिंग दूंगी कि मज़दूरों के घरों या चालों में जाकर उनसे कैसे मिलना है, उनका भरोसा कैसे जीतना है और बिना किसी पूर्वाग्रह के इस प्रश्नावली को सही-सही कैसे भरवाना है."
दोपहर डेढ़ बजे आकाश अंधेरी ईस्ट में सातवाँ फ्लैट देखने के बाद नीचे सड़क पर आया. वह एक अजीब कशमकश और असमंजस में घिरा हुआ था. उसने आज दो बिल्कुल विपरीत विकल्प देखे थे. पहला विकल्प पवई में था—एक बेहद सभी जरूरी सुविधाओं और आधुनिक उपकरणों ए.सी., पंखे, फ्रिज, वाशिंग मशीन, बेड, किचन के सभी उपकरणों से लैस फ्लैट था जिसमें उसे केवल बेड के चादर बदलने थे और अपना सूटकेस जाकर रखना था. यह विक्रोली में उसके नए ऑफिस के बिल्कुल नजदीक था. वहाँ जाने-आने का समय और खर्चा बचता, लेकिन उसका रेंट अधिक था.
दूसरा विकल्प उसने अभी अंधेरी ईस्ट में देखा था—सीलन की हल्की गंध वाला छोटा 1BHK, जिसका किराया उसके बजट में था. हालांकि वह ऑफिस से दूर था, लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि यह इलाका प्रिया के फ्लैट के बेहद नजदीक था. पवई की सुख-सुविधाएं और ऑफिस की नजदीकी एक तरफ थीं, और प्रिया का सामीप्य तथा बजट दूसरी तरफ.
आकाश इस दुविधा का फैसला अकेले नहीं कर पा रहा था. वह चाहता था कि कोई भी निर्णय फाइनल करने से पहले वह ये दोनों फ्लैट एक बार प्रिया को दिखाए और उसकी राय ले. उसने अपनी इस कशमकश को साझा करने के लिए जेब से मोबाइल निकाला और प्रिया का नंबर डायल किया...
... क्रमशः