@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

वापसी की तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 74
प्रिया ने दो दिन के लिए ऑफिस से छुट्टी मयंक को मुंबई की सैर कराने के लिए नहीं ली थी. उसे मयंक और मम्मा-पापा के लिए कुछ खरीददारी भी करनी थी. गुरुवार, सुबह उसने जल्दी उठकर नाश्ते की तैयारी कर ली. फिर चाय के लिए पतीली गैस चूल्हे पर चढ़ाकर मयंक को जगाया. “तुम जल्दी से ब्रश करो, चाय तैयार है. उसके बाद जल्दी से तैयार हो लो, तब तक मैं नाश्ता तैयार कर लूंगी. हम नाश्ता करके बाजार चलेंगे. हमें आज बहुत सारी शॉपिंग भी करनी है.”

नाश्ते के बाद दोनों भाई-बहन दादर बाज़ार के लिए निकल लिए. प्रिया की इच्छा थी कि जब मयंक शनिवार को कोटा लौटे, तो उसके साथ न केवल उसके लिए बल्कि मम्मा पापा के लिए उपहार भी हों.

बाज़ार की चहल-पहल के बीच घूमते हुए प्रिया ने मयंक की पसंद से उसके लिए चार बेहतरीन फॉर्मल शर्टें खरीदीं और दो जींस भी. फिर दोनों एक बड़ी साड़ियों की दुकान में गए, यहाँ से प्रिया ने अपनी माँ के लिए एक औरंगाबादी हिमरू साड़ी, एक पुणे की पुणेरी साड़ी और एक खुन साड़ी खरीदी.

"दीदी, आपने मेरे और मम्मा के लिए तो खरीदी कर दी. क्या पापा के लिए कुछ नहीं लेंगी?” मयंक ने साड़ी की दुकान से निकलते हुए पूछा.

"पापा के लिए क्यों न लेंगे? उनके लिए एक शानदार सूती कुर्ता-पायजामा लेंगे. मंडी के कामों के लिए उन्हें आरामदायक रहेगा. मैं सोच रही हूँ एक सफारी सूट का कपड़ा भी ले लूं. वे पहनकर किसी शादी या पार्टी में जाएंगे तो लोगों को फक्र के साथ कहेंगे कि यह उन्हें प्रिया ने गिफ्ट में दिया है, वह क्षण उनके लिए बहुत प्यारा होगा," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा.

“एक बात है दीदी, आप मम्मा, पापा और मुझे भी खूब समझती हैं.”

उसके बाद उन्होंने एक दुकान से कुर्ता-पायजामा खरीदा, दूसरी से सफारी सूट के दो सेट खरीदे. खरीददारी के बाद कॉफी पीने के लिए कैफे की तरफ जा ही रहे थे कि बीच में एक घड़ियों की दुकान दिखने पर प्रिया उसमें घुस गई. मयंक को भी उसके पीछे जाना पड़ा. घड़ी की दुकान में उसने एक इलेक्ट्रॉनिक स्पोर्ट कलाई घड़ी पसंद करते हुए उसे मयंक को पहनने को कहा. मयंक के घड़ी पहनने के बाद प्रिया ने पूछा, “कैसी लगी?”

“लगी तो अच्छी दीदी, पर महंगी भी बहुत है. मैंने तो कभी पाँच सौ से अधिक की घड़ी न पहनी. यह तो छह हजार की है.”

“महंगी सस्ती छोड़, तुझे अच्छी लगी है, तो पैक करवा. इसे पहनना. यह रोज तुम्हारी मॉर्निंग वाक और वर्कआउट वगैरा का ध्यान रखेगी. मुझे पता है जैसे ही पापा का काम संभालोगे तुम्हारा पेट बाहर निकलने लगेगा, इसलिए दैनिक वर्कआउट बहुत जरूरी है. यह ब्लड ऑक्सीजन, पल्स-रेट वगैरा भी बताती रहेगी. इससे तुम्हारा दिन नियमित होगा. यदि पापा को फ्री करना है तो तुम्हें यह सब करना होगा.”

खरीदारी के बाद वे सिद्धि विनायक मंदिर पहुँचे. वहाँ बहुत लंबी कतार थी. उन्हें मुख्य मंदिर तक पहुँचने में करीब 20 मिनट लगे. मयंक को वहाँ आश्चर्य हुआ कि मंदिर में सभी दर्शनार्थी सीधे गर्भगृह तक जा सकते हैं. उसने कोटा और उत्तर भारत के मंदिरों में ऐसा नहीं देखा था. दर्शन करके बाहर निकले तब तीन बज रहे थे. मयंक को भूख महसूस होने लगी थी.

“दीदी, सुबह का नाश्ता तो पच गया. भूख लग रही है. कहीं लंच करना चाहिए.”

“हाँ, मंयक, भूख ही नहीं लगी होगी. आज खूब चले हैं, तुम्हें थकान भी होने लगी होगी. चल, सामने ही यहाँ का प्रसिद्ध शिवराज ढाबा है. आज का लंच वहीं करते हैं.”

थोड़ी दूर पैदल चलने पर ही शिवराज ढाबा आ गया. वे अंदर गए. तीन बजे भी वहाँ लगभग सभी टेबलें भरी थीं. बायीं ओर की एक टेबल खाली हो रही थी. दो मिनट इंतजार करने पर वह उन्हें मिल गई.

टेबल पर बैठते हुए मयंक ने कहा, "दीदी, आप चिंता मत करना. मैं कोटा पहुँचते ही आढ़त का काम पूरी तरह समझूंगा और पापा को जल्द से जल्द मुनीम जी के भरोसे से मुक्त कर दूंगा. उन्हें आराम के लिए पूरा समय मिलेगा.” प्रिया ने भाई के चेहरे को देखा; उसमें अब एक परिपक्व वयस्क की दृढ़ता और पारिवारिक ज़िम्मेदारी साफ़ झलक रही थी.

ढाबे का भोजन उसके नाम जैसा ही स्वादिष्ट था. भरपेट खाने के बाद मयंक ने डकार लेते हुए कहा, “दीदी अब तो सीधे घर चलना होगा. अपनी हिम्मत नहीं अब घूमने की.”

अगले दिन, शुक्रवार 28 जून 2019 की सुबह आठ बजे ही, प्रशांत बाबू वादे के मुताबिक कोर्ट जाने से पहले प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. मयंक ने लपक कर उनके पैर छुए. प्रशांत बाबू ने उसके सिर पर हाथ रखकर बहुत आत्मीयता से आशीर्वाद दिया, "खुश रहो बेटा! मुझे तुम्हारी दीदी से पता चला कि तुम कल वापस कोटा लौट रहे हो. यह बहुत अच्छी बात है कि तुम अब अपने पिता के साथ उनके मोर्चे पर खड़े होने जा रहे हो."

प्रिया रसोई से चाय और नाश्ता ले आई. चाय की चुस्कियाँ लेते हुए प्रशांत बाबू का रुख तुरंत आज होने वाली ट्रिब्यूनल की सुनवाई की तरफ मुड़ गया. उनके चेहरे पर थोड़ी चिंता की रेखाएँ थीं.

"प्रिया, कल शाम मेरी यूनियन सचिव कॉमरेड शिंदे से लंबी बात हुई," प्रशांत बाबू ने गंभीर आवाज़ में कहा. "प्रबंधन ने जो 'गोल्डन हैंड शेक' का प्रस्ताव उनके सामने रखा है, उसने शिंदे जी को बहुत गहरे असमंजस और डर में डाल दिया है."

"क्या शिंदे जी प्रबंधन के प्रभाव में आ रहे हैं सर?" प्रिया ने आशंकित होकर पूछा.

"नहीं प्रिया, ऐसा बिल्कुल नहीं है," प्रशांत बाबू ने तुरंत स्पष्ट किया. "शिंदे यूनियन के निर्वाचित सचिव हैं, बरसों से मज़दूरों के सुख-दुख के साथी रहे हैं. उनका डर दरअसल बहुत वाजिब और ज़मीनी है, जिसे वे मज़दूरों के सामने भी प्रकट कर रहे हैं. शिंदे जी का कहना है कि प्रबंधन एकमुश्त ठीक-ठाक रकम दे रहा है. अगर आज कोर्ट में हमने जवाब दाखिल करवा दिया और मामला आगे बढ़ा, तो ये मिल मालिक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे. कानूनी लड़ाई में सालों खिंच जाएंगे. इस बीच अगर मिल बंद रही और मज़दूरों को कुछ नहीं मिला, तो उनके परिवारों का पेट कैसे पलेगा? परिवारों को पालने में सारे मजदूर छिन्न-भिन्न हो जाएंगे. इससे मजदूरों की जो एकता अभी है वह नहीं रहेगी, कमजोर होगी और उसके साथ ही यूनियन की संघर्ष की शक्ति भी. एक मज़दूर नेता के तौर पर उनका यह सोचना और डरना गलत नहीं है."

प्रिया ने गहराई से सोचते हुए कहा, "मैं समझ सकती हूँ सर. शिंदे जी का डर उचित और बिल्कुल व्यावहारिक है. मुझे भी लगता है कि प्रस्ताव बेहतर है. लेकिन हमें इसमें मजदूरों को मिलने वाले लाभों को बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा देनी चाहिए. मिल मालिक इस बेशकीमती ज़मीन के टके करना चाहता है तो उसमें मजदूरों को हिस्सा मिलना चाहिए. आज यदि कोर्ट का रुख कड़ा रहे तो हम प्रबंधन से बढ़िया बारगेनिंग कर सकते हैं."

"बिल्कुल ठीक! चलो, दोपहर ढाई बजे की पेशी है. आज चव्हाण साहब भी कोर्ट में मज़बूत तैयारी के साथ आ रहे हैं," प्रशांत बाबू ने घड़ी देखते हुए कहा और मयंक से हाथ मिलाकर कोर्ट के लिए विदा ली. जाते वक्त वे प्रिया को कहना नहीं भूले कि, ‘उसने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या तय किया’. प्रिया ने उसका कोई उत्तर दिए बिना मुस्कुराते हुए उन्हें विदा किया.

इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में प्रबंधन ने जवाब के लिए और वक्त देने की गुजारिश की. इस पर चव्हाण साहब ने अपने तर्क रखते हुए विरोध किया. जज ने चव्हाण साहब के तर्कों को बहुत ध्यान से सुना. उन्होंने प्रबंधन के वकील की तरफ देखा और उनका रुख बेहद कड़ा हो गया.

"मिस्टर काउंसिल, यह कोर्ट किसी भी सूरत में अपनी तय की गई तीन महीने की समय-सीमा का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करेगी," जज साहब ने फाइल पर पेन चलाते हुए सख्त लहजे में कहा. "दस्तावेज़ आपके पास पिछले दस दिनों से हैं. यह समय का अपव्यय करने की कोशिश है."

जज साहब ने आदेश लिखवाया, "प्रबंधन का समय मांगने का आवेदन खारिज किया जाता है. प्रबंधन पर पाँच हजार रुपए का जुर्माना (Costs) लगाया जाता है. लिखित जवाब (Written Statement) दाखिल करने के लिए जुलाई के पहले सप्ताह की अगली तारीख दी जाती है, जो कि 'अंतिम और आखिरी मौका' होगा. यदि उस दिन भी जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो प्रबंधन का जवाब देने का विधिक अधिकार बंद (Right Closed) मान लिया जाएगा."

कोर्ट रूम के बाहर निकलते ही शिंदे के चेहरे पर भी एक बड़ी राहत थी. उन्होंने प्रशांत बाबू और चव्हाण साहब का हाथ थामते हुए कहा, "चव्हाण साहब, आज कोर्ट ने जो कड़ा रुख दिखाया है, उससे हमारी बारगेनिंग पावर बढ़ गई है. उनके वकील बाहर मुझसे कह रहे थे कि हमें अगले दो-तीन दिनों में ही बैठकर किसी समझौते तक पहुँचने के लिए बात करनी होगी. कोर्ट की इस कड़ाई ने मज़दूरों के मन के डर को बहुत हद तक कम कर दिया है."

प्रिया को यह समाचार प्रशांत बाबू ने फोन पर दिया. प्रिया ने मयंक को भी इस लड़ाई के बारे में विस्तार से बताया.

"दीदी, पर मेरा कोटा का अपना अनुभव कहता है कि यदि “गोल्डन हैंडशेक” में मजदूरों को अच्छा मुआवजा और दूसरे कानूनी लाभ तुरन्त मिल जाते हैं तो यही बेहतर होगा.” मयंक ने अपनी राय देते हुए कहा. फिर उसने मुस्कुराते हुए याद दिलाया, "वैसे दीदी, कल शनिवार है. शाम को मेरी ट्रेन है. लेकिन उससे पहले, सुबह नौ बजे हमें गेटवे पर आकाश भैया से मिलना है. हमारी मुंबई डायरी का आखिरी पन्ना अभी बाकी है."

प्रिया ने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुंबई की बत्तियाँ जगमगा रही थीं. उसे विश्वास था कि ‘ईसीआई’ फैक्ट्री के मजदूरों के संघर्ष की जीत होगी. और कल समंदर की लहरों के बीच मयंक की इस मुंबई यात्रा का एक सुंदर समापन होने वाला था.
...क्रमशः

शनिवार, 4 जुलाई 2026

समझौता प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 73
'चपाती' रेस्टोरेंट में अच्छी-चहल-पहल थी. दो टेबलों से लोग अभी उठकर गए थे, उनकी सफाई की जा रही थी. प्रिया और मयंक को कुछ देर रिसेप्शन में इंतजार करना पड़ा. मयंक ने सादी चपाती, दाल-तड़का और टिंडा मसाला का ऑर्डर दे दिया.

पापा से फोन पर हुई बातचीत के बाद प्रिया के भीतर एक अजीब सी खामोशी पसर गई थी. मयंक अपनी दीदी के मन की इस हलचल को बहुत अच्छी तरह समझ रहा था. वह जानता था कि बरसों का संकोच और ग्लानि जब एक झटके में पिघलती है, तो मन को संभलने में थोड़ा वक्त लगता है. उसने माहौल को हल्का करना चाहा.

"दीदी, सच बताऊँ तो मुझे तो अभी से कोटा की फिक्र होने लगी है," मयंक ने मुस्कुराते हुए चपाती का पहला निवाला तोड़ते हुए कहा.

प्रिया ने चश्मे के पीछे से उसे उत्सुकता से देखा, "जब कोई किसी जिम्मेदारी को उठाने को तैयार हो जाता है तो फिर फिक्र भी होने लगती है, यह सामान्य बात है. पर यह सब कोटा पहुँच कर सोचना, जब तक यहाँ है, तू फिक्र को अलग रख."

"अरे दीदी, पापा की आढ़त की फिक्र है," मयंक ने शरारत से आँखें नचाईं. "अब जब आपके कहे मुताबिक पापा और मम्मी दोनों एक सप्ताह के लिए मुंबई घूमने आएंगे, तो वहाँ कोटा में पूरी आढ़त और चाबियाँ मेरे पास होंगी. मैं तो सोच रहा हूँ कि सबसे पहले मुनीम जी की छुट्टी कर दूँ और सारा हिसाब-किताब अपने कंप्यूटर पर ले आऊँ. पापा लौटकर वहाँ आएंगे, तब तक सब कुछ बदलकर अपने हिसाब से कर दूंगा.”

मयंक की इस बचकानी लेकिन बेहद आत्मीय शरारत को सुनकर प्रिया के चेहरे पर हफ़्तों बाद एक खिलखिलाती हुई राहत भरी मुस्कान आ गई.

"चल, पागल जैसी बातें मत कर. मुनीम जी की छुट्टी करेगा? उलटे वो तेरी छुट्टी कर देंगे. मुनीम जी को पापा के साथ काम करते पैंतीस साल से भी अधिक हो गए. मैंने तो आँखें खोलीं, तब से उन्हें वहीं देखा है. जानता भी है? सारा काम वही संभालते हैं. पापा तो केवल गद्दी पर बैठकर निगरानी करते हैं. तू बच्चा है उनके सामने. आढ़त संभालेगा तो उनके सहायक की हैसियत से, ज्यादा कुछ किया तो वे तेरा मंडी में आना बंद कर देंगे.” प्रिया ने मज़े लेते हुए कहा और फिर उसका लहजा थोड़ा गंभीर हुआ, "वैसे तूने अच्छा सोचा, मयंक. पापा-मम्मी को सचमुच इस भागदौड़ और मानसिक तनाव से बाहर निकलकर कुछ दिन आराम की सख्त ज़रूरत है. मेरा भी प्रोजेक्ट कल-परसों में खत्म हो रहा है, मैं भी ऑफिस से कुछ दिन की छुट्टी का मन बना रही हूँ. जब वे आएंगे, तो मैं उन्हें अपने साथ घुमाऊंगी."

"हाँ दीदी, बिल्कुल. और गाइड के पैसे बचाने के लिए आकाश भाई भी तो हैं." मयंक ने एक और पासा फेंका. प्रिया ने कृत्रिम गुस्से से उसे घूरा, पर उसके गालों पर आई हल्की सी सुर्खी मयंक की नज़रों से बच नहीं सकी.

सोमवार सुबह प्रिया उठी और जल्दी से तैयार होने लगी. वह चाहती थी कि प्रोजेक्ट का काम 25 जून की डेडलाइन से एक दिन पहले, आज ही पूरा हो ले. उसकी पूरी टीम पिछले कई हफ़्तों से दिन-रात एक किए हुए थी, कोडिंग के कुछ अंतिम छोरों को आपस में जोड़ कर री-टेस्टिंग करना शेष था. वह चाहती थी कि आज रात तक यह सारा काम पूरा हो ले और अगले दिन केवल क्लाइंट को डिलीवरी ही शेष रहे.

उस दिन काम करते हुए उसे आधी रात हो गई. उसके साथ तीन टीम मेंबर और रुके हुए थे. ऑफिस से बाहर निकलकर सभी ने कॉमन टैक्सी की. वह रात एक बजे के बाद घर पहुँची. तब तक मयंक एक नींद ले चुका था. उसे अपनी दीदी के इस कड़े कॉर्पोरेट यथार्थ को देखकर समझ आ रहा था कि चाहे कारखाने का मज़दूर हो या लाखों का पैकेज पाने वाला सॉफ्टवेयर इंजीनियर, काम के अमानवीय घंटे और अपनी रीढ़ निचोड़ देने वाली मेहनत दोनों जगह एक जैसी ही है.

25 जून को प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक डिलीवर और टेस्ट हो गया. वह घर पहुँची, तब उसके चेहरे पर एक बड़ी जंग फतह करने जैसा सुकून था. वह चाहती तो थी कि अगले तीन दिन वह छुट्टी लेकर मयंक के साथ मुंबई घूम ले. लेकिन प्रोजेक्ट डिलीवर करने के अगले दिन यह ठीक नहीं था. प्रोजेक्ट में कुछ भी शिकायत आती तो सबसे पहले उसी को क्लाइंट से बात करनी होती. लेकिन उसने मयंक के साथ के लिये 27-28 जून को अवकाश ले लिया.

बुधवार की शाम ऑफिस से लौटकर प्रिया रसोई में चाय बना रही थी, तभी प्रशांत बाबू की कॉल आ गई.

"बधाई हो प्रिया! मुझे बब्बन भाई से पता चला कि तुम्हारा प्रोजेक्ट कल रात सफलतापूर्वक मुकम्मल हो गया," प्रशांत बाबू की आवाज़ में हमेशा की तरह वही पितातुल्य स्नेह था.

"जी सर, कल देर रात सब ठीक से डिलीवर हो गया था. आज भी शाम क्लाइंट से बात हुई तो उसने बताया कि सब कुछ अपेक्षा से भी अधिक फास्ट चल रहा है. बस अभी ऑफिस से लौटी हूँ. एकदम हल्का महसूस हो रहा है," प्रिया ने कहा.

"बहुत अच्छा. लेकिन प्रिया, इधर मिल मालिकों ने एक नया और बहुत ख़तरनाक पासा फेंका है," प्रशांत बाबू का लहजा तुरंत गंभीर हो गया. "तुम्हें याद है न कि पिछले मंगलवार, 18 जून को हमारी 'ऑटो चालक यूनियन' की बैठक से ठीक पहले, हमारे वकीलों ने ट्रिब्यूनल के मुंसरिम (Court Clerk) के सामने मिल मज़दूरों का 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' और सारे अकाट्य सांख्यिकीय दस्तावेज़ पेश किए थे? और जज साहब ने इस विवाद को सुलझाने के लिए सितंबर के मध्य तक की कड़ी समय-सीमा तय करते हुए प्रबंधन को अपना लिखित जवाब (Written Statement) देने के लिए महज़ दस दिन की मोहलत दी थी?"

"जी सर, मुझे अच्छी तरह याद है. परसों, यानी शुक्रवार 28 जून को कोर्ट में उनकी पेशी है और उन्हें अपना लिखित जवाब दाखिल करना है," प्रिया ने विधिक बारीकी को दोहराया.

प्रशांत बाबू ने आगे बताया, "बात यह है प्रिया कि तुमने मज़दूरों के घरेलू खर्चों, बाज़ार भाव और मिल के गुप्त मुनाफे का जो अकाट्य गणित (Data) तैयार किया है, उसका कोई तोड़ मिल मालिकों के वकीलों को नहीं मिल रहा है. ऊपर से अक्टूबर में राज्य के विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए सरकार के मंत्रियों ने भी उन्हें पिछले दरवाजे से मिल बंद करने का चांस देने से साफ़ मना कर दिया है. वे चुनावी माहौल में वोट बैंक को नाराज़ करने का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते. कोर्ट में अपनी निश्चित हार देखकर, मिल प्रबंधन ने अब कानूनी लड़ाई से भागने का रास्ता चुना है."

"तो वे क्या कर रहे हैं सर?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

"उन्होंने हमारी यूनियन के सचिव शिंदे के सामने 'गोल्डन हैंडशेक' (Golden Handshake) का एकमुश्त समझौता प्रस्ताव आधिकारिक रूप से रखा है. "वे चाहते हैं कि ट्रिब्यूनल का कोई भी प्रतिकूल निर्णय आने से पहले, उद्योग बंदीकरण पर जो भी लाभ मजदूरों के बनते हैं उनसे लाख-पचास हजार अधिक देकर मज़दूरों से स्वेच्छा से इस्तीफ़ा लिखवा लिया जाए और इस पूरे मामले को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया जाए. वे मज़दूरों के बीच यह अफवाह भी उड़ा रहे हैं कि अगर मामला कोर्ट में लंबा खिंचा, तो मिल बंद हो जाएगी और किसी को फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी."

प्रिया का चेहरा गंभीर हो गया, "सर, यह पूंजीपतियों की बहुत पुरानी और आजमाई हुई चाल है. जब वे कानूनी शिकंजे में फंसते हैं, तो पैसों के दम पर मज़दूरों का सब्र और उनकी रीढ़ तोड़ने की कोशिश करते हैं. वे कोर्ट के बाहर ही इस आंदोलन को खत्म करना चाहते हैं."

"बिल्कुल प्रिया. मज़दूरों के भीतर इस छलावे को लेकर एक असमंजस और अंतर्द्वंद्व की स्थिति बनने लगी है. हमें बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा. खैर, परसों शुक्रवार को कोर्ट की कार्यवाही बहुत कुछ साफ़ करेगी कि उनके वकील क्या रुख अपनाते हैं. और हाँ, मयंक अभी यहीं है न?”

“नहीं सर, उसकी शनिवार शाम को कोटा की टिकट बुक करवा दी है. पापा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. वहाँ जाकर उनकी मदद करेगा. आगे सब कुछ इसे ही देखना है. मैंने भी दो दिन की छुट्टी ले ली है. उसे मुंबई की कुछ और जगहें दिखा दूंगी. चाहती हूँ उसके लिए और मम्मी-पापा के लिए कुछ खरीद दूँ. उसका खाली हाथ जाना ठीक नहीं है.”

“प्रिया, यह तुमने अच्छा सोचा. इससे तुम्हारे मम्मी-पापा से रिश्ता नॉर्मल होने में मदद मिलेगी. हो सका तो मैं शुक्रवार तक तुम्हारे फ्लैट पर आता हूँ. एक बार मयंक से मिल लूंगा.”

“सर, फोन करके आइए. कहीं ऐसा न हो कि हम बाहर से नहीं लौट पाएँ और आप परेशान हों.” प्रिया ने कहा.

“नहीं फोन करके ही आऊंगा. और तुमने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या सोचा?” प्रशांत बाबू ने फिर वही सवाल पूछा जिसने प्रिया को असमंजस में डाल दिया था.

“उस बारे में मैं अभी निर्णय नहीं ले पाई हूँ. मयंक के यहाँ होने और प्रोजेक्ट पूरा करने के चक्कर में सोच ही नहीं पाई.”

“ठीक है. मयंक के जाने के बाद संभवतः रविवार को तुम्हारे यहाँ फिर आता हूँवहीं चाय के साथ हम तुम्हारी पार्टी मेंबरशिप के उस संकोच और मज़दूरों के इस नए संकट, दोनों पर विस्तार से बात करेंगे."

"जी सर, मुझे आपका बेसब्री से इंतज़ार रहेगा," प्रिया ने दृढ़ता से कहा.

फोन रखने के बाद प्रिया खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई. बाहर मुंबई की उमस भरी हवा थी. एक तरफ उसका अपना प्रोजेक्ट पूरा हो चुका था, लेकिन दूसरी तरफ पूंजीपतियों के इस 'गोल्डन हैंडशेक' के नए दांव ने कानूनी मोर्चे की तपिश को और बढ़ा दिया था. यह वीकेंड और आने वाला सप्ताह बहुत निर्णायक चीजें सामने लाने वाला था.

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

पिघलती बर्फ

देहरी के पार, कड़ी - 72
प्रिया चाय बनाने रसोई में चली गई, मयंक ने अपने मोबाइल से पापा को कॉल लगाई. पाँच लंबी रिंग के बाद माँ की आवाज़ गूंजी, “हेलो.”

"नमस्ते मम्मी, आप कैसी हैं? और पापा कैसे हैं?" मयंक ने बहुत आत्मीयता से पूछा.

"हम ठीक हैं बेटा, पापा बाथरूम में नहा रहे हैं, तू बता. मुंबई कैसी लगी? प्रिया कैसी है? तू तो मुंबई की चमक में प्रिया की तरह हमें भी भूल गया, वहाँ पहुँचा तब फोन किया था, उसके बाद आज कर रहा है.” उधर से माँ का ममता भरा उलाहना मिला, लेकिन माँ की आवाज़ में हमेशा जैसी खनक नहीं थी, एक थकान सी घुली हुई थी.

"मैं ठीक हूँ, मम्मी. दीदी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं."

माँ ने एक हल्की सी सांस ली, "पापा अभी आधा घंटा पहले मंडी से लौटे हैं. चाय पी और अब बाथरूम में नहाने गए हैं. मंडी में गर्मी के मारे दिन में हालत खराब हो जाती है. तुझे तो पता है उनका स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहता, दिनभर की भागदौड़ में जल्दी थक जाते हैं. पॉलिश फैक्ट्री में भी बस एक ही मशीन चल रही है, बाकी बंद कर दी हैं. खान से ही अच्छा पत्थर कम आ रहा है. बाजार में तरह-तरह की टाइलें आ गई हैं, कोटा स्टोन का क्रेज़ यहाँ कोटा में ही नहीं रहा. कई पॉलिश फैक्टरियाँ बंद हो गईं. तेरे पापा कहते हैं कि कोई अच्छा ग्राहक मिलते ही पॉलिश फैक्ट्री बेच देना चाहिए, वरना बाद में मशीनें कबाड़ में बिकेंगी."

माँ की बातें सुनकर मयंक का चेहरा गंभीर हो गया. माँ जो कह रही थी, वह कोई ताजा स्थिति नहीं थी. दो सप्ताह पहले जब वह कोटा में था, तब भी यही हाल था. लेकिन ये बातें माँ ने पहले कभी नहीं कही थीं. इन बातों से उसे चिंता होने लगी. उसकी आँखों के सामने पिता का वह थका हुआ चेहरा तैर गया जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अकेले परिवार का आर्थिक मोर्चा थामे हुए थे. मयंक ने महसूस किया कि उसका एमबीए अब पूरा हो चुका है, रिजल्ट भी हफ्ते भर में आने वाला है. उसे तुरंत कोटा लौटना चाहिए. “हाँ मम्मी-पापा की बात तो सही है. पॉलिश फैक्ट्री का तो कोई मतलब नहीं रहा.”


“तेरे पापा कह रहे थे कि बेहतर है कि फैक्ट्री बेचकर उसकी जगह टाइलों के स्टॉकिस्ट बन जाएँ. पूरा हाड़ौती का एरिया रहेगा. सब जगह माल सप्लाई करेंगे तो कई गुना कमाया जा सकता है.”

“हाँ माँ, उनकी बात सही है. पर मैं वहाँ आऊंगा, तब ये बातें करेंगे.”

“अच्छा प्रिया कहाँ है? उससे बात करा.”

“वह रसोई में चाय बना रही है.”

“चल ठीक है, तेरे पापा नहाकर आते ही बात कराती हूँ.”

मयंक ने फोन रखा ही था कि प्रिया ट्रे में चाय के कप लिए रसोई से बाहर आई. उसने मयंक के गंभीर चेहरे को देखा और पूछा, "क्या हुआ मयंक? पापा से बात हो गई?"

चाय का कप थामते हुए मयंक ने गहरी आवाज़ में कहा, "हाँ दीदी. पापा नहा रहे थे, मम्मी से बात हुई. अब वे थकने लगे हैं. उनका स्वास्थ्य अब उतना अच्छा नहीं रहता. पॉलिश फैक्ट्री में केवल एक मशीन चल रही है. उसका कोई भविष्य नहीं रहा. आढ़त में कॉम्पिटीशन बहुत हो गया है, वो तो किसानों से पुराने रिश्ते हैं, इसलिए सब ठीक चल रहा है. कोटा में बिज़नेस की स्थिति भी ठीक नहीं है. लगता है कि मुझे अब तुरंत वापस कोटा जाना चाहिए. वहाँ पापा को मेरी ज़रूरत है. मुंबई खूब घूम लिया हूँ. बाकी कुछ रहा होगा तो फिर कभी घूम लूंगा.

प्रिया ने अपने छोटे भाई को देखा. कद में तो उसने ऊँचाई प्राप्त कर ही ली थी. लेकिन आज उसकी बातों में जिस वैचारिक समझ और ज़िम्मेदारी का भाव था, उससे प्रिया का दिल भर आया. उसका छोटा भाई अब सचमुच समझदार हो चला था. हालांकि भाई के जाने की बात से उसके मन में उदासी की हल्की सी लहर उठी. पर उसका अहसास उसने मयंक को नहीं होने दिया. तभी मयंक के फोन की घंटी बज उठी. पापा थे.

मयंक ने लपक कर उसे लिया और कहा, ‘हेलो पापा, प्रणाम.”

“हाँ, मयंक कैसा है? मुंबई घूम लिया.”

“हाँ पापा, पहली बार में जितना घूमा जा सकता है उससे कुछ अधिक ही घूम लिया.”

“फिर कब आ रहा है?”

“बस अभी रिजर्वेशन देखता हूँ, जिस दिन का टिकट मिलेगा रवाना हो जाऊंगा.”

“अच्छा ठीक है. प्रिया कहाँ है? वह हो तो उसे फोन दे.”

“देता हूँ पापा.”

मयंक ने तुरन्त फोन प्रिया की ओर बढ़ाया. “दीदी, पापा, आपसे बात करेंगे.” प्रिया ने फोन ले लिया.”

“हाँ पापा, प्रणाम¡ आप कैसे हैं?

“मैंने फोन किया तो पूछ रही है, पापा कैसे हैं? तू इतनी नाराज है मुझसे? कि कभी सोचती भी नहीं कि पापा के हाल ही पूछ लें?”

“नहीं पापा ऐसी बात नहीं है. बस हिम्मत नहीं पड़ती.”

“बड़ी अजीब है तू, शादी को बीच में छोड़कर घर से निकलने में डर नहीं लगा, पर पापा से बात करने में लगता है?”

“नहीं पापा वो बात नहीं है.”

“तो फिर क्या है? क्या तू ये सोचती है कि पापा क्या बात करेंगे? ... अब मैं जानता हूँ, विक्रांत को समझने में मैंने बहुत बड़ी गलती की थी. मैं समझता था वह संस्कारी लड़का है. पर उसने बहुत बड़ा धोखा दिया. हमें तो दिया ही, कोटा के सारे व्यापार जगत को भी धोखा दिया. आज उसकी हालत ये है कि वह कोटा में किसी तरह का धंधा नहीं कर सकता. यहाँ की प्रोपर्टी बेचने की फिराक में है. यहाँ कभी-कभी चुपके से आता है, उसका पता भी तब लगता है जब वह चला जाता है. सुना है स्थायी रूप से मुंबई ही शिफ्ट हो जाएगा. तूने अच्छा किया जो शादी से भाग गई. तेरी शादी हो जाती, और तो मैं तो जीते जी मर जाता. तूने मुझे भी बचा लिया. मैं तेरा गुनहगार हूँ.” इतना बोलते-बोलते पापा की आवाज रुंध गई थी. प्रिया सन्न होकर सुन रही थी.

“पापा ये आप क्या कह रहे हैं? मैं जानती थी कि आप जल्दी ही समझ जाएंगे. उसकी बहुत सी बातें तो मुझे भी पता नहीं थीं. आप शान्ति रखें. ऐसी बातें न सोचें. मैं भी छुट्टी लेकर कोटा आऊंगी, तब सब नॉर्मल हो जाएगा. बस आप अपना ध्यान रखें.”

“हाँ बेटा, मैं क्या कहूँ? मैं तो तुमसे कुछ भी कहने का नहीं रहा. यह घर पहले तेरा है, हमारा और मयंक का बाद में. तू आ तो सही.”

“पापा, अब आप ये फिजूल की बातें छोड़ें. मयंक अभी जल्दी लौटने की कह रहा था. मैं उसका टिकट बुक करवा देती हूँ. वह जल्दी कोटा पहुँच जाएगा. एक बात और पापा. मयंक वहाँ पहुँच जाए. कुछ दिन वहाँ का काम ये देख लेगा. आप और मम्मी दोनों मुंबई आ जाइए, कम से कम एक सप्ताह के लिए. मैं भी छुट्टी ले लूंगी. साथ रहेंगे.”

“नहीं प्रिया अभी मुश्किल है. एकदम सब कुछ मयंक कैसे संभालेगा?”

“जैसे आपके बीमार होने पर संभालता था, वैसे ही संभाल लेगा. मैं मयंक को कहती हूँ. वहाँ जाकर यह आपको फ्री करेगा और आप और मम्मी मुंबई आ रहे हैं.”

“ठीक है, पहले मयंक को यहाँ आने दे, फिर सोचेंगे. तू ठीक से रहना और अपना ध्यान रखना.”

“हाँ, पापा.” उसने कहा. तभी उधर से फोन कट गया. प्रिया ने फोन मयंक को लौटा दिया.

“दीदी, अब मुझे जल्दी कोटा लौटना पड़ेगा.” मयंक ने फोन लेते हुए कहा.

"मैं समझ सकती हूँ मयंक," प्रिया ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा. "तू बिल्कुल सही सोच रहा है. चल, मैं अभी तेरा रिजर्वेशन देखती हूँ."

प्रिया ने तुरंत अपना लैपटॉप खोला और आईआरसीटीसी (IRCTC) की वेबसाइट पर जाकर अगले शनिवार, 29 जून 2019 की रात की ट्रेन में मयंक का टिकट बुक कर दिया.

"ले मयंक, अगले शनिवार का रिजर्वेशन पक्का हो गया. इस तरह तेरे पास मुंबई में अभी चार-पाँच दिन और हैं. मेरा प्रोजेक्ट पूरा होने को है. कोई अड़चन न आई तो कल के बाद मेरे पास कुछ दिन कोई खास काम न रहेगा. मैं भी छुट्टी ले लूंगी, साथ घूमेंगे." प्रिया ने लैपटॉप बंद करते हुए कहा.

“हाँ दीदी, आप साथ रहेंगी तो घूमने का आनंद कुछ और ही होगा,” मयंक ने कह दिया, लेकिन अचानक उसे अहसास हुआ कि पापा से बात और उसके कोटा लौटने की बात से प्रिया उदास हो चली है. उसने तुरन्त बात बदली. “दीदी, हमने चाय तो पी ली. पर अब तेज भूख लगी है.”

“चल तू बैठकर टीवी देख. मैं खाना बनाने की तैयारी करती हूँ.”

“नहीं दीदी, आप रहने दो. क्यों न हम ‘चपाती’ रेस्टोरेंट चलें.”

“तू यही चाहता है तो चल तू अपने कपड़े बदल मैं भी तैयार होकर आती हूँ.” यह कहते हुए प्रिया अपने बेडरूम की ओर चल दी.
... क्रमशः

शुक्रवार, 26 जून 2026

सीख

देहरी के पार, कड़ी - 71
प्रिया और मयंक यूनियन ऑफिस से बाहर निकले, तब तक मुंबई की रात गहरा चुकी थी. ऑटो में बैठते ही मयंक ने एक लंबी और गहरी सांस ली. उसके चेहरे पर अपनी दीदी के लिए गर्व का एक ऐसा भाव था, जिसे वह छुपा नहीं पा रहा था.

"दीदी, मुझे तो आज पता लगा, आप तगड़ी वाली स्पीच भी देती हैं. मैं तो सुनकर दंग ही रह गया. मैंने आपको कभी इस रूप में नहीं सोचा था. मुंबई जैसे महानगर की सबसे बड़ी ऑटो चालक यूनियन की वर्किंग कमेटी को आप सहज होकर संबोधित कर रही थीं. उन्हें उनके अधिकारों का अहसास तो कराया ही, वे जिस संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए हैं उसे पूरी ताकत से चलाने के लिए उन्हें प्रेरित भी किया. दीदी, यह सब आपने कब सीख लिया?”

“कहीं नहीं सीखा, मयंक, इसे सीखने की जरूरत ही नहीं थी. आज जो भी मैंने कहा, वह सब मेरे अंदर से स्वतः ही निकल पड़ा था. जब हम किसी के साथ दिल से जुड़ते हैं, उनकी तकलीफों को समझने लगते हैं, तब यह भी पता लगता है कि इन तकलीफों का कारण क्या है? और इनसे निकलने का रास्ता क्या है? मैं इनमें से किसी को नहीं जानती थी. लेकिन विक्रांत के दखल से निपटने के दौरान इन सबने मेरी तकलीफ को समझा. मुझे बिना जाने मेरे साथ दिया और मुझे उस बड़े संकट से निकाला. उन सबने मेरे साथ एक रिश्ता कायम किया था. मैं उनकी ऋणी हो गई थी. इस ऋण को केवल तकलीफों में और उनसे निकलने की लड़ाई में एक दूसरे का साथ देकर ही चुकाया जा सकता था. असल में यह ऋण जैसी चीज भी नहीं थी. यह एक दूसरे के कामों को सम्मान से देखने, किसी मेहनत करने वाले को कमतर न समझने और उनके साथ मिलकर एक हो जाने की बात है.” प्रिया ने उसे समझाने की कोशिश की.

“दीदी, वह सब तो ठीक है, लेकिन तुम एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो. दिनभर ऑफिस में बैठकर काम करती हो, सालाना 30-35 लाख कमाती हो. ये ऑटो ड्राइवर सड़कों पर ऑटो चलाते हुए मुश्किल से पाँच-सात सौ रोज का कमाते होंगे. आपका और उनका साथ कैसे हो सकता है?”

“क्यों नहीं हो सकता? उनके और हमारे श्रम में क्या फर्क है? यही नहीं कि हमें अपने श्रम का मूल्य अधिक मिलता है और उन्हें बहुत कम. हम भी श्रम करते हैं और वे भी. दोनों के श्रम एक ही हैं. हमारा श्रम शारीरिक कम और बौद्धिक अधिक है, उनका शारीरिक अधिक, बौद्धिक कम. उन्हें अपने श्रम का मूल्य कम मिलता है और हमें अधिक. तो यह सब हमारे सिस्टम का दोष है, यह हमारे सिस्टम का अन्याय है. सभी को श्रम का इतना मूल्य तो मिलना ही चाहिए कि वह अपने परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन दे सके.”

“दीदी, मुझे कुछ ज्यादा समझ नहीं आया. आपकी और ऑटो ड्राइवरों की लड़ाई में क्या समानता हो सकती है?”

“है, समानता है. तुम्हें मेरे जीवन में तो नौकरी से संबंधित कोई संघर्ष ही नहीं दिखाई दिया होगा. पर है. हम यहाँ रोज ऑफिस जाते हैं, वहाँ जाने का समय तो निश्चित है, लेकिन लौटने का नहीं. यदि किसी दिन कोई काम उलझ पड़ा तो रात भर चलता रहता है और रात को ऑफिस में ही रुकना पड़ता है. जब मैं घर से काम कर रही थी तो तुमने नोट किया होगा कि महीने में कम से कम चार पाँच दिन ऐसे होते थे जब मेरा काम रात में कब पूरा हुआ, तुम्हें पता नहीं लगता था. सुबह तुम पूछते थे, ‘दीदी रात को कितने बजे सोई?’ कभी-कभी तो रात को मैं और मेरी टीम दो-तीन बजे रेस्ट पर जाते थे और सुबह अलार्म लगाकर पाँच बजे फिर उठते और काम पर लग जाते थे. क्या हमारे काम की यह स्थितियाँ वाजिब हैं? क्या अधिक वेतन पाने से हमारा रोज 8 घंटे से अधिक और सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम नहीं करने का अधिकार समाप्त हो जाता है? ”

“नहीं, बिल्कुल नहीं.” मयंक ने जवाब दिया.

“हमारे पास यह अधिकार है, लेकिन हमारी ओर से इसके विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा जाता. हमारे काम की शर्तें भी अमानवीय हैं. यदि हमारी कंपनी के पास किसी कारण से काम कम हो जाए, तो तुरंत हजारों लोगों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया जाता है. एक इंजीनियर जो रोज दस हजार से अधिक कमा रहा था, अगले ही दिन बेरोजगार हो जाता है. कुल मिलाकर हम भी उजरती मजदूर ही हैं. हम भी अपने श्रम को ही बेचते हैं, जैसे कारखानों के मजदूर, जैसे आटो ड्राइवर. हम सभी की लड़ाई एक ही है. हमारे ज्यादातर सॉफ्टवेयर इंजीनियर ऐसा नहीं समझते. लेकिन मैं समझ गई हूँ. मेरे कुछ और साथी भी समझ गए हैं. वे यूनियन के मेंबर बने हैं. वक्त के साथ बाकी भी समझ जाएंगे. हमें भले ही वेतन अच्छा मिलता हो, लेकिन हैसियत हमारी भी मजदूर जैसी ही है. एक दिन वक्त बाकी को भी सिखा देगा. कि वे क्या हैं. उस दिन वे भी यूनियन के मेंबर होंगे और अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे.”

ऑटो प्रिया की सोसायटी पहुँच गया था. प्रिया ने ऑटो को रुकने को कहा. आटो रुका तो दोनों नीचे उतरे. प्रिया भाड़ा देने के लिए मीटर देखकर अपने पर्स को खंगालने लगी. तभी ऑटो चालक बोल पड़ा.

“दीदी., भाड़ा रहने दो. आज आपने आपस में बातें करते हुए मुझे बहुत कुछ सिखा दिया. मुझे पता था जहाँ से आप बैठी थीं वहाँ यूनियन ऑफिस है और वहाँ आज ऑटो चालकों की यूनियन की मीटिंग थी. मैं अभी तक यूनियन का मेंबर नहीं बना हूँ. मुझे समझ ही नहीं आता था कि यूनियन का मेंबर क्यों होना चाहिए. पर जब आपकी बातें सुनी कि आप एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर होते हुए भी एक ऑटो ड्राइवर में और खुद में भेद नहीं समझतीं और दोनों की लड़ाई एक है तो समझ में आया कि यूनियन से ही हमारी ताकत बनती है. अब मैं कल ही यूनियन का मेंबर बनूंगा. आज का भाड़ा, मुझे यह सब सिखाने की फीस समझ लें. मैं भाड़ा नहीं लूंगा.”

“नहीं भैया, आटो में पेट्रोल, डीजल भी जलता है और तुम्हारी मेहनत भी है. भाड़ा तो आपको लेना होगा.” इतना कहते हुए प्रिया ने पचास रुपए का नोट निकालकर आटो चालक को पकड़ाते हुए बोली. “ भैया आप कल सुबह यूनियन ऑफिस जाकर मेंबरशिप लेंगे और आने वाले आंदोलन में साथ देंगे तो मेरी फीस मुझे मिलेगी. इस फीस की कोई कीमत नहीं है.”

“दीदी, ठीक है. मैं ले लेता हूँ. पर ये पचास का नोट मैं अपने मोबाइल कवर में लगाकर रखूंगा. ताकि आपसे मिलना मुझे हमेशा याद रहे.”

दोनों फ्लैट में पहुँचे तो मयंक कहने लगा, “दीदी आज मम्मी-पापा से बात करते हैं. न जाने क्यों पापा की तरफ से अब डर लगने लगा है. उनका स्वास्थ्य अब उतना बढ़िया नहीं रहता, फिर भी आढ़त का काम वे खुद देखते हैं. फैक्ट्री तो अब बंद होने जैसी है. बाजार में कोटा स्टोन का क्रेज खत्म हो गया है. इलाके में अच्छा पत्थर कम रह गया है. एक दिन पापा कह रहे थे कि कारखाना ग्राहक मिलते ही बेच देना चाहिए. फिर पॉलिश मशीनों की कौड़ियाँ भी नहीं मिलेंगी. पर मम्मी उन्हें मना कर देती हैं. कहती हैं, ‘आपने फैक्ट्री खड़ी की, आप ही बेच दोगे. कुछ तो बच्चों के लिए भी रहने दो.’ फिर पापा कहते हैं, ‘आढ़त है तो.’ फिर मम्मी शुरू हो जाती हैं ... ‘इस आढ़त में क्या रखा है, आप हैं तो आढ़त है…’ वगैरा वगैरा.”

“अच्छा, मैं चाय बना रही हूँ. एक-एक कप चाय पीते हैं, फिर खाने की तैयारी करेंगे. तब तक तू चाहे तो पापा से फोन पर बात कर ले.” प्रिया कहते हुए रसोई में चली गई.
... क्रमशः

शनिवार, 20 जून 2026

नया विचार

देहरी के पार, कड़ी - 70
रविवार, शाम छह बजने से पहले प्रिया और मयंक अंधेरी ईस्ट यूनियन कार्यालय के बाहर खड़े थे. मयंक ने देखा कि इमारत के मुख्य द्वार पर ‘एआईसीसीटीयू’ का बोर्ड लगा है. लेकिन साथ ही अनेक छोटे छोटे बोर्ड भी वहाँ लगे थे जिनमें ‘ईसीआई मजदूर यूनियन’ 'ऑटो चालक यूनियन' और 'आईटी एंड टेक्निकल एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन' के बोर्ड भी थे.

"दीदी, यहाँ आईटी और टेक्निकल कर्मचारियों और ऑटो चालकों का दफ्तर एक ही जगह है?" अपनी समझ के हिसाब से आटो चलाने वाले और टेक्निकल उत्पादों के फैक्ट्री मजदूरों और सूचना प्रोद्योगिकी के कर्मचारियों की यूनियनों को एक साथ एक ही जगह देख मयंक अचरज में पड़ गया था.

प्रिया ने मुस्कुराते हुए ऑफिस के भीतर कदम बढ़ाया, "हाँ मयंक. ये तीनों ही संगठन केंद्रीय मज़दूर संगठन 'एआईसीसीटीयू' (AICCTU) से संबद्ध हैं. मुंबई जैसे शहर में जहाँ जगह की किल्लत है, वहाँ अलग-अलग यूनियनें इस परिसर का साझा उपयोग करते हैं. चाहे कंप्यूटर पर कोड लिखने वाली उँगलियाँ हों या ऑटो का स्टीयरिंग थामने वाले हाथ, या फिर हथौड़ा चलाने वाले फैक्ट्री मजदूर, सभी की लड़ाइयाँ एक जैसी हैं. सभी मेहनत करते हैं उसके बदले वेतन पाते हैं. कानून भी शारीरिक, तकनीकी, ऑपरेशनल और क्लैरिकल काम करने वाले लोगों को श्रमिक ही कहता है. सबके विधिक अधिकार समान हैं. इनमें से केवल सुपरवाइजरी और प्रबंधकीय काम करने वालों को जरूर अलग किया गया है."

“दीदी, बाकी सब तो समझ गया पर ये ऑपरेशनल काम क्या हैं?”

“तू बता, ऑटो चालक क्या करते हैं?” प्रिया ने मयंक से पलटकर सवाल किया.

“आटो रिक्शा चलाते हैं.”

“आटो रिक्शा से लेकर हवाई जहाज तक सभी मशीनें हैं. कारखानों में भी बहुत मशीनें होती हैं जिन्हें लोग चलाते हैं. कंप्यूटर को भी कमांड देना होता है तब वह काम करता है. ये सब ऑपरेशनल काम हैं. ”

भीतर दाखिल होते ही बब्बन भाई ने उनका बेहद आदर से स्वागत किया. प्रशांत बाबू वहाँ पहले से मौजूद थे और कुछ वरिष्ठ चालकों के साथ किसी दस्तावेज़ पर चर्चा कर रहे थे. बैठक शुरू होने में अभी कुछ मिनट बाकी थे, इसलिए बब्बन भाई मयंक को दफ्तर के एक हिस्से में बनी 'लाइब्रेरी' दिखाने ले गए.

मयंक लाइब्रेरी में रखी अलमारियों को देखकर दंग रह गया. उसे उम्मीद थी कि यहाँ केवल कुछ पुरानी पत्रिकायें या अख़बार होंगे. लेकिन वहाँ 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट', 'मोटर व्हीकल एक्ट', 'एम्पलॉइज कम्पेन्सेशन एक्ट', ‘आई टी एक्ट’ जैसी कानूनी किताबों के साथ-साथ कार्ल मार्क्स, लेनिन और शहीद-ए-आजम भगत सिंह का वैचारिक साहित्य, विश्व के अनेक नामवर साहित्यकारों के उपन्यास और इतिहास की पुस्तकें बेहद करीने से सजी हुई दिखाई दे रही थीं. मेज़ पर दो-तीन ऑटो चालक अपनी खाकी वर्दी में पूरी एकाग्रता से कुछ नोट्स पढ़ रहे थे. मयंक को समझ आया कि इस महानगर का श्रमजीवी वर्ग केवल शारीरिक श्रम नहीं कर रहा, बल्कि अपनी विधिक और वैचारिक लड़ाई के लिए बौद्धिक रूप से भी खुद को समृद्ध बनाने में लगा है.

ठीक छह बजे 'ऑटो चालक यूनियन' की कार्यकारिणी की बैठक शुरू हुई. यह यूनियन उस 'ऑटो रिक्शा चालक-मालक संघटना संयुक्त कृती समिती' की एक मुख्य घटक थी, जिसे आगामी संघर्ष के लिए एक मोर्चे के रूप में गठित किया गया था. बैठक में 9 जून को सरकार को दिए गए 'हड़ताल के नोटिस', किराया दर संशोधन और चालकों के लिए 'कल्याण बोर्ड' के गठन जैसी मांगों और हड़ताल का संचालन किस तरह से होना है जैसे मुद्दों पर अनुशासित और गंभीर चर्चा होने लगी. प्रिया और मयंक पीछे की कुर्सियों पर बैठकर इस चर्चा को देख-सुन रहे थे.

जब बैठक अपने अंतिम चरण में पहुँची, तो बब्बन भाई अचानक माइक पर आए. उनकी आवाज़ में एक अलग ही खनक थी, "साथियों! आज की इस कार्यकारिणी की बैठक में हमारे बीच एक ऐसी शख्सियत मौजूद हैं, जिन्होंने टेक्सटाइल मिल मज़दूरों की कानूनी लड़ाई में प्रबंधन के पसीने छुड़ा दिए. वे 'आईटी एंड टेक्निकल एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन' की एक प्रखर नेता हैं. मैं गुज़ारिश करूँगा हमारी प्रिया दीदी से कि वे आएँ और हमारे साथियों का मार्गदर्शन करें."

प्रिया के नाम की घोषणा होते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा. मयंक ने चकित होकर दीदी की तरफ देखा. प्रिया के चेहरे पर कोई हड़बड़ाहट नहीं थी; उसके हाव-भाव में एक परिपक्व श्रमिक नेता की गंभीरता थी. वह सधे हुए कदमों से माइक पर पहुँची.

प्रिया ने कोई पारंपरिक, उत्तेजक या राजनीतिक भाषण नहीं दिया. उसने बेहद तार्किक और विधिक भाषा में बात शुरू की, "साथियों, जब आप सड़क पर ऑटो लेकर निकलते हैं, तो आप सिर्फ एक गाड़ी नहीं चला रहे होते, आप इस मुंबई महानगर की आर्थिक रीढ़ को गति दे रहे होते हैं. इसलिए, जब आप किराया संशोधन या कल्याण बोर्ड की मांग करते हैं, तो वह कोई भीख नहीं है, बल्कि इस व्यवस्था में आपके श्रम का जायज कानूनी हिस्सा है. सरकार को दिया गया 9 जून को हड़ताल का नोटिस आपकी ताकत है, लेकिन इस ताकत की असली सफलता आपके सांगठनिक अनुशासन और विधिक स्पष्टता में है. हमें 9 जून के पहले कानून के दायरे में रहते हुए अपनी मांगों को इतनी मज़बूती से सरकार और जनता के सामने रखना होगा कि प्रशासन के पास झुकने के अलावा कोई चारा न बचे."

पीछे बैठा मयंक मंत्रमुग्ध होकर अपनी दीदी को देख रहा था. कल समंदर की लहरों के बीच आकाश भैया ने जो कहा था, वह आज उसकी आँखों के सामने सच हो रहा था—बदलाव रातों-रात नहीं आते, उनके पीछे कड़ा अनुशासन और दृढ़ वैचारिक धरातल होता है. दीदी का यह रूप देखकर मयंक का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था.

मीटिंग समाप्त होने के बाद, हॉल में थोड़ी चहल-पहल कम हुई. मयंक लाइब्रेरी जाकर कुछ चालकों के साथ उनके अनुभवों पर चर्चा करने लगा. इसी बीच, दफ्तर के एक शांत कोने में प्रशांत बाबू और प्रिया को बात करने के लिए कुछ पल का एकांत मिल गया.

प्रशांत बाबू ने अपनी आँखों पर चश्मा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बेहद आत्मीय लहजे में पूछा, "तो प्रिया... आज रविवार भी बीतने को है. उस दिन मैंने तुमसे पार्टी मेंबरशिप के बारे में बात की थी, उस पर क्या फैसला किया तुमने? अपने भीतर के द्वंद्व से बाहर आ पाईं?"

प्रिया ने कुछ पल के लिए अपनी नजरें झुकाईं, फिर प्रशांत बाबू की ओर देखते हुए पूरी ईमानदारी और परिपक्वता के साथ अपना असमंजस सामने रख दिया, "सर, मैं इस आंदोलन से, इन मज़दूरों से और साम्यवाद के महान आदर्शों से दिल से जुड़ी हूँ. लेकिन जब बात औपचारिक रूप से पार्टी मेंबरशिप लेने की आती है... तो मेरे भीतर एक गहरा संकोच और असमंजस खड़ा हो जाता है. मुझे लगता है कि क्या मैं अभी इस सांगठनिक अनुशासन और इसकी राजनीतिक ज़िम्मेदारियों के लिए पूरी तरह तैयार हूँ? मेरी अपनी कुछ पारिवारिक सीमाएँ और संकोच भी हैं, जिन्हें मैं अनदेखा नहीं कर सकती."

प्रशांत बाबू को उसकी बात सुनकर मन ही मन बहुत प्रसन्नता हुई. उनके चेहरे पर एक आत्मीय और गम्भीर मुस्कान उभर आई. वे हल्के से हँसे और बोले, "प्रिया, मुझे लगता है कि तुमने पार्टी मेंबरशिप को बहुत अधिक गंभीरता से ले लिया है. खैर, यह तुम्हारा अपनी वैचारिक ईमानदारी के प्रति सम्मान ही है कि तुम इसे इतनी गहराई से सोच रही हो."

उन्होंने प्रिया के कंधे पर थपकी देते हुए आगे कहा, "कोई बात नहीं. इस तरह के वैचारिक द्वंद्व बहुत स्वाभाविक हैं. मैं अगले वीकेंड पर तुम्हारे फ्लैट पर ही आ जाऊँगा. वहीं बैठकर, चाय के साथ हम एक बार फिर इस विषय पर विस्तार से बात करेंगे. तब तक तुम शांत मन से विचार करो."

प्रशांत बाबू के इस आश्वासन और बड़प्पन से प्रिया के मन का एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया. उसने राहत की सांस ली. बाहर मुंबई की रात घनी हो रही थी, लेकिन अंधेरी ईस्ट के इस दफ्तर से निकलते हुए प्रिया और मयंक के भीतर विचारों की एक नई रोशनी टिमटिमा रही थी.
... क्रमशः

शुक्रवार, 19 जून 2026

लहरों के बीच

देहरी के पार, कड़ी - 69
शुक्रवार रात घर लौटते वक्त ऑटो स्टैंड पर बब्बन भाई अपना ऑटो लिए मिल गए. “नमस्ते दीदी, घर चलना है?”

“हाँ, घर ही चलना है.” उसने ऑटो में बैठते हुए कहा.

“मीटिंग रविवार शाम छह बजे यूनियन ऑफिस में ही है. आपको आना ही है. हमारे ड्राइवरों का हौसला बढ़ जाएगा.” बब्बन भाई ने फिर आग्रह किया.

“बब्बन भाई, आपको पता ही है, मयंक यहीं है. वह बस एक-दो सप्ताह और रुकेगा. उसके साथ रहने या घूमने को बस शनिवार रविवार ही मिलते हैं. कल भी एलिफेंटा जा रहे हैं. परसों का पता नहीं.” प्रिया ने मना तो नहीं किया. लेकिन उसने आने का वादा भी नहीं किया.

“मयंक भैया अभी घर ही होंगे तो उनसे मैं बात कर लूंगा. आप उन्हें भी साथ ले आना.” बब्बन भाई ने अपना आग्रह नहीं छोड़ा.

“हो सकता है घर मिल जाए, वह रोज घूमने निकलता है और मेरे घर लौटने के वक्त ही लौटता है. वह शायद ही वहाँ मिले.”

“आप उनका फोन नंबर दे देना, मैं फौरन ही बात कर लूंगा.”

सोसायटी के गेट पर ऑटो रुका, प्रिया उतरी तो मयंक उसे गेट पर ही दिखाई दिया. उसने मीटर देखकर बब्बन भाई को भाड़ा देते हुए कहा, “मयंक भी यहीं है.”

तब तक मयंक भी निकट आ चुका था. बब्बन भाई भी ऑटो से उतर कर नीचे आ चुके थे.

“मयंक भैया, नमस्ते. पहचाना मुझे?”

“अरे, बब्बन भाई, आप?”

“अब पहचान तो लिया ही है आपने. परसों शाम यूनियन ऑफिस में हमारी यूनियन की मीटिंग है. प्रिया दीदी आएंगी, आप भी आइए. इस बहाने यूनियन ऑफिस देख लेंगे. वहाँ अच्छी लाइब्रेरी है और आप हमारे ऑटो ड्राइवरों से भी मिल लेंगे.”

अब मयंक उनसे क्या कहता, उसने कहा, “दीदी आईं तो मैं भी जरूर आऊंगा.”

“फिर ठीक है मैं चलता हूँ, परसों मिलते हैं.” इतना कहकर बब्बन भाई ऑटो में बैठ चल दिए.
...

शनिवार की सुबह मुंबई के मिज़ाज के हिसाब से बहुत सुहानी थी. समंदर की तरफ से आ रही हवाओं में एक हल्की सी ठंडक थी जिनके कारण जून की उमस दबी हुई थी. तय कार्यक्रम के अनुसार, आकाश सुबह टैक्सी लेकर प्रिया की सोसायटी आ गया था. पौने नौ बजे तीनों गेटवे ऑफ इंडिया की जेटी (घाट) पर इकट्ठा हो चुके थे. आकाश ने वादे के मुताबिक एलीफेंटा जाने वाली लॉन्च (बोट) के टिकट पहले से ही खरीद रखे थे. प्रिया ने आकाश को कहला तो दिया था कि बाकी व्यवस्था करना उसके बस का नहीं फिर भी उसने सुबह जल्दी उठकर तीनों के लिए लंच बना लिया था. पानी की बोतलें और कुछ हल्के स्नैक्स आकाश अपने बैग में साथ लेता आया था.

गेटवे ऑफ इंडिया का विशाल द्वार और उसके ठीक सामने खड़े भव्य ताज होटल को देखते हुए मंयक ने कहा, “क्या दृश्य है? इस भव्य निर्माण में कितने मैन-डेज लगे होंगे? तब तो निर्माण के लिए इतनी बड़ी मशीनें भी नहीं थीं.”

“मयंक, इसकी परिकल्पना 1911 में तब की गई जब ब्रिटिश सम्राट राजा-सम्राट जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी पहली बार भारत आए. तब सम्राट को एक कार्डबोर्ड का दरवाजा बनाकर बधाई दी गयी थी. 1913 में इसकी आधार शिला रखी गई और 1914 में इसकी डिजाइन तैयार हुई. पहले यहाँ स्थानीय मछुआरों की जेटी थी. 1915 और 1919 के बीच यहाँ समुद्री दीवार का निर्माण करके यह जमीन तैयार हुई जिस पर इसे बनाया जाना था. इसकी नींव 1920 में पूरी हुई जबकि निर्माण 1924 में पूरा हुआ.” प्रिया ने गेटवे का इतिहास बता दिया.

“दीदी, तुम्हें यह सब कैसे याद रह जाता है?” मयंक ने विस्मय से पूछा.

“कुछ नहीं. कल रात सोने से पहले वेब पर एलीफेंटा के बारे में खोज रही थी, तभी इसका इतिहास भी देखा. अब रात का पढ़ा सुबह तक याद न रहे तो किसी परीक्षा में पास होना मुश्किल हो जाए. हमें तो वैसे भी हजारों कोड्स याद रखने पड़ते हैं तो आदत हो गई है.”

“मतलब अब आप एलीफेंटा में भी वहाँ का इतिहास बताती चलेंगी?”

“हाँ, क्यों नहीं?” प्रिया ने मुस्कुराकर उत्तर दिया.

“अब इससे बढ़िया कुछ नहीं है. जब भी किसी ऐतिहासिक स्थान घूमने जाओ, प्रिया को साथ लेते जाओ. गाइड के पैसे बच जाएंगे.” आकाश ने मजाक में कहा. प्रिया और मयंक ठहाका लगाकर हँस पड़े.

पहली बोट लग चुकी थी. वे उसकी ऊपरी मंजिल (Upper Deck) पर जाकर बैठ गए, जहाँ से समंदर का नज़ारा बिल्कुल खुला हुआ था. बोट ने एक लंबा हॉर्न बजाया और जेटी छोड़कर गहरे पानी की तरफ बढ़ी, जेट इंजनों की आवाज़ के साथ लहरों पर उसका डोलना मयंक के भीतर एक रोमांच भर गया. धीरे-धीरे गेटवे ऑफ इंडिया और मुंबई की गगनचुंबी इमारतों का कोलाहल पीछे छूटने लगा और चारों तरफ नीले पानी का विस्तार फैलने लगा.

मयंक कौतूहल से कभी समंदर में लंगर डाले खड़े बड़े-बड़े माल-वाहक जहाजों को देखता, तो कभी भारतीय नौसेना के युद्धपोतों को. आकाश मयंक के पास ही खड़ा होकर उसे मर्चेंट नेवी और उन जहाजों के काम करने के तरीकों के बारे में कुछ बुनियादी बातें बहुत सरल भाषा में समझा रहा था. मयंक उसकी बातों को बहुत ध्यान से सुन रहा था. साथ ही सोच रहा था कि जानकारी में आकाश भी कम नहीं है.

प्रिया उन दोनों से थोड़ी दूरी पर, रेलिंग के सहारे हाथ टिकाए खड़ी थी.  उसे तेज़ हवाओं से उड़ते बालों को संभालना पड़ रहा था. उसकी आँखें दूर उस क्षितिज को निहार रही थीं जहाँ समंदर और आसमान आपस में मिलते हुए लग रहे थे. वह सोच रही थी कि समंदर ऊपर से कितना शांत और एक-सा दिखता है, पर इसके भीतर एक विशाल जैविक संसार भी पलता है.

लगभग पौने घंटे के सफर के बाद बोट टापू की जेटी पर जाकर लगी. घाट से मुख्य पहाड़ियों की तलहटी तक जाने के लिए एक छोटी सी टॉय-ट्रेन उपलब्ध थी, जो मयंक को बहुत मज़ेदार लगी. ट्रेन से उतरकर जब गुफाओं तक पहुँचने वाली सीढ़ियों की चढ़ाई शुरू हुई, तो रास्तों के दोनों तरफ लगी स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानें और पेड़ों पर उछल-कूद करते बंदरों ने मयंक का ध्यान पूरी तरह भटका दिया.

मयंक अब जानबूझकर कभी तस्वीरें खींचने के बहाने पीछे रह जाता, तो कभी दुकानों पर कुछ देखने के लिए रुक जाता. वह बहुत अच्छी तरह समझ रहा था कि उसकी दीदी और आकाश को इस अजनबी भीड़ के बीच कुछ पल का सहज एकांत मिलना कितना ज़रूरी है. उसके मन की इच्छा थी कि उन दोनों के बीच पनपता मौन प्रेम जल्दी ही अपनी ऊँचाई छूने लगे.

वे जैसे ही एलीफेंटा की मुख्य गुफा के विशाल पत्थर के प्रवेश द्वार से भीतर दाखिल हुए, बाहर की चिलचिलाती रोशनी एक रहस्यमयी और ठंडी खामोशी में बदल गई. सातवीं सदी के कारीगरों द्वारा ठोस चट्टानी पहाड़ियों को भीतर से काटकर बनाई गई वह विशाल मूर्तिकला और स्तंभ देखकर तीनों निःशब्द रह गए. गुफा के केंद्र में स्थित भगवान शिव की 'त्रिमूर्ति' के सामने खड़े होकर मयंक और प्रिया स्तब्ध थे.

आकाश कुछ दूरी पर खड़ा प्रिया के चेहरे को देख रहा था. मूर्तियों की प्राचीन भव्यता के बीच प्रिया के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और आदर का भाव था. आकाश के अंतर्मन में फिर वही विचार कौंधा—इतिहास गवाह है कि जो भी चीज़ें अमर और बड़ी होती हैं, चाहे वे पत्थरों को तराश कर बनाई गई ये अमर कलाकृतियाँ हों या समाज को बदलने वाले महान आंदोलन, वे रातों-रात नहीं बनते. उनके पीछे पीढ़ियों का कड़ा अनुशासन, अटूट धीरज और चट्टानों को काटने जैसा अथक परिश्रम होता है. प्रिया जिस वैचारिक धरातल पर खड़ी होकर दुनिया को देखती है, उसे समझने के लिए उसे खुद को भी इसी तरह दृढ़ और परिपक्व बनाना होगा. यह बात उसने प्रिया से कही नहीं, बस उसकी आँखों का संकल्प और गहरा हो गया.

पूरा टापू एक बार में घूमना संभव नहीं था. लेकिन वे सभी मुख्य स्थानों, खास तौर पर कैनन पहाड़ी पर गए. जहाँ एक बड़ी पुरानी तोप स्थापित थी और टापू के चारों ओर का समुद्र दिखाई देता था. वे स्तूप पहाड़ी पर भी गए जहाँ उन्होंने बौद्ध गुफाएँ देखीं. पूरे टापू पर अनेक संस्कृतियों के चिह्न बिखरे पड़े थे. टापू का पुराना नाम घरापुरी था. यहाँ ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में ही बौद्ध भिक्षुओं ने अपनी बस्ती बना ली थी.

केनन पहाड़ी पर ही उचित स्थान देखकर प्रिया ने अपने बैग से चादर निकालकर बिछा दी। वहीं उन्होंने दोपहर का लंच किया. शाम ढले वे वापस मुंबई लौटने वाली बोट में सवार हुए. लौटते समय डूबते सूरज की आखिरी किरणें अरब सागर के पानी पर बिखरकर उसे सुनहरा बना रही थीं.

बोट की रेलिंग के पास बैठे हुए मयंक ने एक लंबी सांस ली और बोला, "दीदी, आकाश भैया... आज का दिन सचमुच बहुत अद्भुत था. ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया में घूमकर लौट रहा हूँ."

प्रिया ने मयंक की ओर देखते हुए मुस्कुराकर कहा, "हाँ मयंक, मुंबई में जब भागदौड़ से मन थकने लगे, तो यह समंदर ही है जो इंसान को दोबारा सँभालता है."

आकाश ने प्रिया की तरफ देखा. समंदर की लहरों पर डोलती बोट अब वापस मुंबई के गेटवे की रोशनियों की तरफ बढ़ रही थी. आकाश ने महसूस किया कि प्रकृति और एकांत में प्रिया और मयंक के साथ बिताया खूबसूरत वीकेंड उसे हमेशा याद रहेगा.
... क्रमशः

गुरुवार, 18 जून 2026

अदृश्य धागे

देहरी के पार, कड़ी - 68
प्रिया की व्यस्तता कम नहीं हुई थी. प्रोजेक्ट डेडलाइन पर था. पूरी टीम उसी पर लगी हुई थी. रविवार रात ‘एमबी’ से डिनर करके लौटने के बाद उसने मयंक को बताया कि उसकी टीम को जून माह के अंत तक अपना प्रोजेक्ट पूरा करके टेस्टिंग भी कर लेना है. इस कारण से अब सप्ताहांत के सिवा वह अपने ऑफिस में व्यस्त रहेगी.

“आप चिन्ता क्यों करती हैं दीदी, अब मुझे पोस्ट ग्रेजुएट होने में बस रिजल्ट की ही तो देरी है. मैं खुद घूम सकता हूँ. कल से जब आप ऑफिस के लिए निकलेंगी, मैं भी निकल पड़ूंगा, और शाम को नौ बजे तक लौट आऊंगा. तब तक आप भी आ जाएंगी.” मयंक ने कहा.

“मैं जानती हूँ कि मेरा भाई दुनिया भर में अकेला घूम कर आ सकता है. लेकिन दोपहर के खाने का क्या करेगा?” प्रिया ने पूछा.

“दीदी, आप भी न, मुझे आदत कहाँ है दिन में खाने की. कोटा में तो सभी की यही आदत है. दिन में भूख लगती है तो वहाँ तो हर नुक्कड़ पर कचौरी मिल जाती है.”

“तुझे तीन दिन में ही कोटा की कचौरी की याद भी आने लगी. यहाँ तो कचौरी मिलने से रही.”

“तो क्या हुआ, वैसे भी कचौरी तो कोटा की शान है, यहाँ मिलेगी भी तो वैसा स्वाद कहाँ होगा. पर मुंबई में अपने स्नैक्स की कोई कमी थोड़े ही है. यहाँ कचौरी नहीं तो वड़ा पाव, पाव भाजी, बॉम्बे सैंडविच, सेव-पूरी और रगड़ा-पैटिस पता नहीं क्या-क्या हैं. रोज एक-एक भी ट्राई करूंगा तो हफ्ता तो कट ही जाएगा.” मयंक ने मजा लेते हुए कहा.

“वाह, क्या बात है, मयंक. ऐसा लगता है तू इन सब पर कोटा से ही रिसर्च करके चला है?”

“और नहीं तो क्या, मैं यहाँ अपनी दीदी को परेशान करने थोड़े ही आया हूँ.” मयंक ने प्रिया को चिढ़ाते हुए उत्तर दिया.

“अच्छा, अब ऐसा लगता है तुझे दीदी की चपत खाए बहुत दिन हो गए, तुझे वही चाहिए क्या.”

“अरे, दीदी, ऐसा मत करना. वरना मुझे बाकी दिन आपके फ्लैट के बजाय आकाश जी.. आकाश भैया के यहाँ बिताने पड़ेंगे.”

इस बार प्रिया ने आगे बढ़कर मयंक का बायाँ कान पकड़ लिया और डाँटने के स्वर में बोली, “तू क्या बोलना चाह रहा था?

“कुछ नहीं दीदी, बस मन की बात होंठों पर आने वाली थी कि फिर मैंने रोक ली.”

प्रिया ने मयंक का कान छोड़ दिया. “अच्छा तो यह बात है. तू मुझे गलत समझ रहा है, मयंक. आकाश को मैंने घर छोड़ने से पहले देखा तक नहीं था. वह कंपनी की प्रोपर्टी लेने कोटा आया था. तब मैं उसके साथ कार में जयपुर गई और दो दिन- तीन रात मुझे जयपुर में उसके घर रहना पड़ा. उसके बाद करीब दो-तीन सप्ताह से वह मुंबई में है. इसके अलावा हम कभी मिले तक नहीं. हमारे बीच कुछ नहीं है. हाँ इतना जरूर है कि वह योग्य व्यक्ति है. मुझे लगता भी है कि शायद वह मेरा अच्छा जीवन साथी हो सकता है. संभव है कि वह भी ऐसा ही सोचता हो. लेकिन यह इतनी आसान बात नहीं है. अभी हमारे बीच बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम दोनों को समझना पड़ेगा. यदि हमने अभी यह नहीं सोचा और उस पर खुल कर बात नहीं की, तो हो सकता है हमारा साथ होना दोनों के लिए परेशानी का सबब बन जाए.”

इतना कहकर प्रिया चुप हो गई. उसके चेहरे और आँखों में मयंक को उदासी की परत दिखाई दी. उसे लगा कि दीदी को कुछ चुभा है. यह सोचकर वह खुद भी उदास हो गया. कुछ देर सोचकर बोला, “दीदी, आपको बुरा लगा हो तो मैं माफी चाहता हूँ. कल और आज के दो दिनों में मुझे लगने लगा था कि आप दोनों साथ हो जाएँ तो सोने में सुहागा हो जाए. मम्मी-पापा ने आकाश को देखा है, जब वह काली कार घर के आसपास खड़ी कर कोई उनकी रेकी कर रहा था, वह कोटा आया था. उसी ने मम्मी पापा को हिम्मत दी थी. तभी से वे सोचते हैं कि आकाश आपके लिए अच्छा जीवन साथी हो सकता है. दोनों इस बारे में आपस में चर्चा भी कर चुके हैं. पर वे आपसे कुछ भी कहने से डरते हैं.” मयंक इतना कहकर चुप होकर प्रिया को देखता रहा.

“चल छोड़ इन बातों को अब सो जा. सुबह मुझे समय से ऑफिस जाना है और तू भी तो घूमने जाएगा. एक बात और, यहाँ आने के दिन तेरी मम्मी से बात हुई थी. उसके बाद तुमने मम्मी-पापा से बात भी की या नहीं?”

“मम्मी से तो रोज ही बात हो रही है, एक बार पापा से भी कर चुका हूँ.” मयंक ने बताया.

“चल ठीक है, अब तू सोने जा, मैं भी सोती हूँ. कल ऑफिस में बहुत काम रहेगा.” मयंक उठकर हॉल में सोने चला गया.

अगले दिन से दोनों का यह रूटीन हो गया. प्रिया सुबह साढ़े दस बजे ऑफिस के लिए निकलती और मयंक घूमने. वह रात को साढ़े आठ तक लौटती, मयंक उसके बाद पहुँचता.

गुरुवार आ चुका था.
...
मंगलवार, 18 जून 2019 को ईसीआई यूनियन के सचिव शिंदे और एडवोकेट रमेश चव्हाण का एक सहायक इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल पहुँचा. उन्होंने मुंसरिम को स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और उसे साबित करने के लिए सभी जरूरी दस्तावेज पेश किए. प्रबंधन की ओर से उनके विधि विभाग का एक सीनियर क्लर्क पहले से ही वहाँ मौजूद था. उसने स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और दस्तावेजों की प्रतियाँ प्राप्त करके चला गया फैक्ट्री प्रबंधन को अपना लिखित जवाब (Written Statement) पेश करने के लिए महज दस दिन का समय देते हुए अगली तारीख 28 जून दे दी गई.
...
गुरुवार रात प्रिया ऑफिस से आकर फ्लैट का दरवाजा खोल ही रही थी कि मयंक भी आ गया. दोनों बैठकर चाय पी रहे थे. तभी आकाश की कॉल आ गई.

“हेलो प्रिया, कैसी हो? और मयंक के क्या हाल हैं?”

“मेरा तो तुम्हें पता है, मेरे प्रोजेक्ट की डेडलाइन 25 जून है. मुझे साँस कैसे आ सकती है.”

“हाँ, वह तो है. फिर मयंक क्या कर रहा है?”

“वह अकेले घूम रहा है. लोकल ट्रेन और बसें, पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम लिया है. पर मुंबई को समझने लगा है. महानगर का भय उसमें से जाता रहा. बेहतर है उसी से पूछो, फोन दे रही हूँ.” प्रिया ने फोन मयंक को थमा दिया.

“हाँ, आकाश भैया, मैं मयंक बोल रहा हूँ, आप कैसे हैं.”

“मैं ठीक हूँ मयंक. तुम्हारी बताओ तुम कहाँ-कहाँ घूम लिए हो?”

“कुछ अधिक नहीं, सुबह दीदी के साथ निकलता हूँ. अंधेरी स्टेशन से लोकल पकड़ता हूँ. जहाँ जमती है वहाँ निकल जाता हूँ. इतना जरूर है कि मैं मुंबई के लोगों को जानने लगा हूँ. यहाँ के ज्यादातर लोग सहयोग करते हैं. खाना-पीना सस्ता है.”

“वो तो है.” आकाश ने उससे सहमति जताई. “हाँ, शनिवार का क्या कार्यक्रम है?”

“अभी तक कुछ नहीं है. आप बताओ.”

“मैं सोचता हूँ, हम क्यों न शनिवार को एलीफेंटा केव्ज देखने चलें?”

“पर वे तो समंदर में किसी टापू पर हैं.”

“हाँ, टापू पर हैं. पर टापू अधिक दूर नहीं है. गेट-वे से सुबह नौ बजे से बोट लगती हैं, आधे घंटे में वहाँ पहुँचा देती हैं. इस बहाने थोड़ा बहुत समुद्र तुम अंदर से भी देख लोगे. और मुंबई के समुद्र का क्या हाल है यह भी देख लोगे. तुम्हें लंगर डाले बहुत से जहाज भी देखने को मिलेंगे.”

“तो फिर चलते हैं. पर दीदी चलेंगी तब है. बिना दीदी के चलने का तो कोई मतलब नहीं है.”

“तो तुम पूछो प्रिया से.”

“आप क्यों नहीं पूछते?”

“नहीं, तुम ही पूछो. मुझे अभी वह प्रोजेक्ट की डेडलाइन बता चुकी है. वही कहेगी तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं होगा.”

“फिर ठीक है. मैं फोन रखता हूँ.”

मयंक ने फोन काट कर प्रिया को देते हुए कहा, “आकाश भैया शनिवार को एलीफेंटा चलने की कह रहे हैं. लेकिन कह रहे हैं कि आप भी चलेंगी तो प्रोग्राम बना लेंगे.”

प्रिया कुछ पल के लिए सोच में पड़ गई कि आकाश ने ऐसा क्यों कहा? और उसने सीधे उससे क्यों नहीं कहा. फिर कुछ सोचकर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई. वह जानती थी कि आकाश उसके इन्कार से डर रहा है. उसने मयंक को कह दिया, “आकाश से कह दो चल चलेंगे. पर सारी तैयारी उसे ही करनी पड़ेगी. मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी.”

मयंक प्रिया की ‘हाँ’ सुनकर खुश हो गया और अपने फोन से आकाश को कॉल लगाने लगा.
... क्रमशः