देहरी के पार, कड़ी - 53
सोमवार सुबह प्रिया की आँखें खुलीं तो उसने आदत के मुताबिक बेड साइड टेबल पर रखा मोबाइल उठा कर समय देखा, ठीक छह बजे थे. उठने का समय हो गया था, लेकिन उसे लगा कि अभी शरीर से थकान पूरी तरह निकली नहीं है. अगले शुक्रवार तक उसके पास रूटीन कामों के सिवा करने को कुछ नहीं था. उसने फिर से करवट लेकर आँखें मूंद लीं. सोने की कोशिश करने पर भी दुबारा आँख नहीं लगी. आखिर आधे घंटे में ही उठकर चाय के लिए पानी चढ़ा दिया और खुद बाथरूम के बाहर वाले वाशबेसिन पर खड़ी होकर ब्रश करने लगी. आकाश को आज अपनी नई नौकरी पर जॉइन करना है. उसे अपने रहने के लिए जल्दी ही कोई फ्लैट भी देखना होगा. उसे ध्यान आया कि किचन और बाथरूम में बहुत से सामान समाप्त होने को हैं. पूरे सप्ताह वह घर से बाहर वाले कपड़े नहीं धो पाई थी, उन्हें धोना है. यूनियन ऑफिस की लायब्रेरी से वह कुछ पुस्तकें लाई थी, उन्हें भी पढ़कर लौटाना है. चाय का कप लेकर बैठी तो वह मन ही मन हँस पड़ी कि वह सोचती थी, इस सप्ताह खूब फुरसत रहेगी. लेकिन जब खुद अपने बारे में सोचा तो इतने काम निकल आए जो उसे पूरे सप्ताह व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त थे.
आकाश ने सोमवार सुबह जॉइन कर लिया. ऑफिस में अपने बैठने की जगह और कंप्यूटर संभाला, ऑफिस के सहकर्मियों से परिचय किया और काम की प्रकृति को समझने की कोशिश की. इसी में दिन पूरा हो गया. उसकी किस प्रोजेक्ट पर क्या भूमिका होगी, यह अगले कुछ दिनों में तय होना था. ऑफिस से निकलकर वह गेस्ट हाउस पहुँचा तो रात के नौ बज चुके थे. उसने कपड़े बदले, गेस्ट हाउस कैंटीन को फोन करके रात के खाने के लिए ऑर्डर किया. तभी फोन की घंटी बज उठी, प्रिया थी.
"नमस्ते आज का दिन कैसा रहा, आकाश?" दिनभर की थकान के बाद फोन पर प्रिया की आवाज़ सुनना ऐसा लगा जैसे अजनबियों के साथ यात्रा करते हुए बीच के किसी स्टेशन पर अचानक कोई परिचित सामने आ खड़ा हुआ हो.
“नमस्ते प्रिया, दिन बिलकुल वैसा ही था जैसा किसी भी नई नौकरी में होता है, बिलकुल रूटीन. ऐसा लगता है यह सप्ताह तो नई कंपनी और नए काम को समझने में निकल जाएगा. असली काम तो अगले सप्ताह तक ही शुरू होगा.” आकाश ने उत्तर दिया.
“फ्लैट के बारे में क्या सोचा?”
“ऑफिस के लोगों ने अंधेरी से पवई तक के बीच काम करने वाले दो प्रोपर्टी डीलरों के नंबर दिए हैं. सुबह आठ से नौ के बीच उनसे बात करूंगा, उसके बाद देखता हूँ कब फ्लैट देखने जा सकूंगा. मुझे लगता है यह शनिवार के पहले संभव नहीं होगा.” आकाश ने हंसते हुए कहा, लेकिन प्रिया ने उसकी आवाज़ में एक अनजानी घबराहट साफ़ की.
“तुमने कल रामजी काका का नंबर लिया था. उनसे फोन पर पूछना. वे उसी इलाके में काम करने वाला प्रोपर्टी डीलर बता देंगे. वे लंबे समय से इस इलाके में हैं, प्रोपर्टी डीलर उनका लिहाज भी करेगा.” प्रिया ने सुझाया.
“हाँ, यह ठीक है. मैं उनसे भी बात करता हूँ.” आगे बात हो पाती उससे पहले ही फोन वाइब्रेट करने लगा, जयपुर से माँ का फोन था. उसने प्रिया को कहा, “जयपुर से माँ का फोन आ रहा है. उसे लेता हूँ. हम कल बात करते हैं” और फोन काट दिया.
वह पूरे सप्ताह समय के पहिये के साथ चलता रहा. ग्यारह से आठ कॉर्पोरेट शिफ्ट को साधना, आकाश की पहली जरूरत थी. रात गेस्ट हाउस पहुँचकर खाने का ऑर्डर करना, फ्रेश होकर खाने के इंतजार में टीवी देखना. खाने के बाद पंद्रह मिनट में उसे नींद आने लगती. वह सो जाता फिर सुबह छह बजे ही उसकी आँखें खुलतीं. नया प्रोजेक्ट, नए कलीग और उनके बीच खुद को साबित करने की होड़. इस पूरे मशीनी चक्र के बीच, उसके भीतर एक छटपटाहट लगातार बनी हुई थी—जल्द से जल्द इस शहर में अपना एक खूँटा गाड़ना, एक अदद फ्लैट ढूँढना.
प्रिया की स्थिति उससे कुछ अलग नहीं थी. ऑफिस से लौटकर वह खाना बनाती, खाती तब तक रात के दस बज जाते. बरतन और किचन साफ करके वह किताब लेकर बिस्तर पर लेट जाती और नींद आने तक पढ़ती रहती. उसने सुबह के समय लगातार दो दिन अपने बाहर वाले कपड़ों की धुलाई करके उन्हें प्रेस के लिए दिया. सामानों की सूची बनाई जिन्हें उसे अगले शनिवार बाजार से लाना था. उसने इस सप्ताह फ्रेडरिक एंगेल्स की दो किताबें ‘वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका’ और ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ पढ़ डाली थी. इन दोनों किताबों ने उसकी आँखें खोल दीं. वह अब जानती थी कि श्रम ने ही मनुष्य को मनुष्य बनाया और कैसे मानव परिवार विकसित होते हुए आज के समाज में बदला. इन दो किताबों को पढ़कर उसने अपने सोचने के नजरिए में गहरा बदलाव महसूस किया था. दूसरी किताब का एक आधार अमरीकी नृवंशशास्त्री लेविस हेनरी मोर्गन की लंबे शोध के बाद लिखी पुस्तक ‘प्राचीन समाज’ (Ancient Society) थी. इनके साथ ही वह के. दामोदरन की पुस्तक ‘भारतीय चिंतन परंपरा’ भी लाई थी. लेकिन वह उसके दो ही अध्याय पढ़ सकी. उसे लगा कि ये चारों किताबें हमेशा पास होना चाहिए. चारों किताबें इंटरनेट पर उपलब्ध मिल गयीं. उसने चारों ऑर्डर कर दीं. अब वह इन किताबों को लौटाकर कुछ दूसरी किताबें और ला सकती थी. इस व्यस्त हफ्ते में आकाश और प्रिया के पास एक-दूसरे के लिए सिर्फ रात के साढ़े नौ बजे के बाद के कुछ मिनट ही होते थे, जब दोनों फोन पर मिलते.
आखिर शुक्रवार की शाम मुम्बई की नम और पसीना टपकाती गर्मी में ठंडी फुहार की तरह आई. दोनों ने समय निकाला और रात के नौ बजे 'मेवाड़ भोजनालय' में मिले. रामजी काका ने दूर से ही दोनों के चेहरों की थकान भाँप ली थी. उन्होंने बिना पूछे ही उनके लिए आमरस और भात के साथ सादा भोजन लगवा दिया. वहाँ कोई लंबी वैचारिक या दार्शनिक बातें नहीं हुईं. बस, अपने घर जैसे खाने, आत्मीयता भरी गपशप और एक-दूसरे के साथ का सुकून मिला. वहीं रामजी काका से आकाश के लिए फ्लैट तलाश करने और प्रोपर्टी डीलर बताने की बात भी हुई.
डिनर के बाद बाहर निकलते हुए आकाश ने कहा, "प्रिया, कल जब मैं फ्लैट देखने निकलूंगा, तो मुझे ऐसा लगेगा जैसे मैं इस शहर का नागरिक होने की कवायद कर रहा हूँ." प्रिया ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, "कल ही यूनियन ऑफिस में एनालिस्ट आने वाला है. उसके साथ बैठकर मजदूरों की राय जाने के लिए होने वाले सर्वे का कायदा और प्रश्नावली तय करनी है. मुझे अनेक नई बातें सीखने को मिलेंगी.”
खाने के बाद जब वे अपने-अपने आशियाने के लिए रवाना हुए, तो दोनों के मन में शनिवार को लेकर एक अजीब सा प्रतीक्षा और परीक्षा का भाव था.
शनिवार की सुबह ठीक दस बजे, आकाश के फोन की घंटी बजी. कोई प्रोपर्टी डीलर संदीप था जिसे रामजी काका ने उसका नंबर दिया था. कुछ ही देर में वह हाथ में चाबियों का एक बड़ा गुच्छा लिए अपनी कार सहित गेस्ट हाउस में था.
"सर, बजट के हिसाब से कुछ 1BHK मैंने शॉर्ट लिस्ट किए हैं, वे इन्हीं तीनों इलाकों में हैं. मुंबई में जगह छोटी मिलती है, लेकिन यहाँ लाइफ बड़ी है" संदीप ने अपनी पेशेवर मुस्कान के साथ कहा.
आकाश को संदीप ने डेढ़ बजे तक तीनों इलाकों में करीब सात फ्लैट दिखाए. अंत में उसने अंधेरी की एक सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल के एक फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर भीतर कदम रखा. कमरा इतना छोटा था कि कोटा या जयपुर के किसी बड़े मकान का छोटे से छोटा कमरा भी इससे बड़ा होता. दीवारें सीलन की हल्की गंध और मुंबई की हवा की नमी से भरी थीं. उसने खिड़की खोलकर बाहर देखा—सामने इमारतों का एक अनंत जंगल था, जिसमें हर खिड़की के पीछे एक अलग संघर्ष चल रहा था.
आकाश ने गहरी सांस ली और सोचने लगा, "क्या इस माचिस की डिब्बी जैसे स्पेस में मैं अपना घर देख पाऊँगा? क्या यही वह देहरी है, जहाँ से मुझे अपने नए जीवन की शुरुआत करनी है?"
... क्रमशः