देहरी के पार, कड़ी - 62
सुबह नींद टूटी तो कमरे में धूप प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया की निगाह सामने दीवार पर टंगी डिजिटल घड़ी की ओर गई. वह समय : साढ़े सात, दिन : रविवार 31 मई 2019 दिखा रही थी. उसे आज कहीं नहीं जाना था. आज वह खूब सोई थी, लगभग सात घंटे. उसने रसोई में जाकर दो गिलास पानी पिया और चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ाकर ब्रश करने लगी. आज उसे कहीं नहीं जाना था, कोई अपॉइंटमेंट नहीं था. आधे घंटे बाद सफाई वाली मेड आ जाएगी. आज उसे रोककर डस्टिंग करवाएगी. कपड़े न जाने कितने बिना धुले हो रहे होंगे? चाय पीने के बाद उन्हें छाँटकर धोने के लिए मशीन में डाल देगी. सब कामों से निपटने के बाद खाना बनाकर खाएगी और दिन में कम से कम दो घंटे जरूर सोएगी. फिर उठकर चाय पीएगी और शाम को कोई किताब पढ़ेगी.
पर सोचा हुआ कब
होता है? मेड के जाने के बाद उसने स्नान किया. कुकर में दाल और चावल दोनों पकने के
लिए छोड़ दिए. तभी फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे, “तुमसे तुम्हारे घर आकर मिलना
है, कब आ सकता हूँ?”
“सर, कभी भी. आज
दिनभर घर पर ही हूँ.”
“शाम सात बजे ठीक
रहेगा?”
“हाँ, क्यों नहीं.
पर सर, कुछ खास काम है?’
“नहीं, कुछ खास
नहीं. पर तुमसे बातें करनी हैं. हम जब भी मिलते हैं हमेशा काम की बातें होती हैं,
मैं तुमसे जो बातें करना चाहता हूँ वे रह जाती हैं. आज यूनियन ऑफिस से शाम छह बजे
तक फ़ारिग हो लूंगा. फिर आता हूँ तुम्हारे यहाँ”
“सर, मैं इंतज़ार
करूंगी.”
कॉल कट जाने के बाद वह सोचने लगी. आखिर क्या बात हो सकती है. प्रशांत बाबू आखिर उससे क्या बातें करना चाहते हैं? सवाल तो दिमाग में आते हैं यह दिमाग का उसूल है. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. फिर उसने इस पर सोचना बंद कर दिया और वाशरूम में वाशिंग मशीन संभालने चल दी.
खाने में दाल-चावल
थे. उसने सलाद तैयार कर लिया था, अचार का मर्तबान भी उतारकर टेबल पर रख लिया और खाना
खाने बैठी. अचानक उसे आकाश की याद आई. कल का पूरा दिन वह साथ था. उसके जाने के बाद
वह उसके साथ अपने संबंध और आपसी व्यवहार के बारे में सोचती रही थी. पता नहीं आकाश
ने उसके बारे में क्या सोचा होगा? उसकी इच्छा हुई कि वह आकाश को कॉल लगाकर बात
करे. फिर रुक गई. अक्सर वही आकाश को पूछती रही है. इस बार आकाश को ही फोन करने दो.
शाम सवा सात बजे
करीब प्रशांत बाबू प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया.
एक ट्रे में पानी से भरे दो गिलास और ठंडे पानी की एक बोतल टेबल पर लाकर रखी और
पूछा, “सर चाय या कॉफी कुछ बनाऊँ?”
“चलो बिना चीनी के ब्लैक
कॉफी बना लो.” प्रशांत बाबू ने कहा तो वह
कॉफी बना लाई, साथ ही बिस्कुट भी ले आई.”
“प्रिया, तुम्हारी
नौकरी कैसी चल रही है?” प्रशांत बाबू ने ही बात आरंभ की.
“ठीक है सर, कोई
व्यवधान नहीं है. मैं हमेशा अपना काम समय से पूरा करती हूँ, तब भी जब मुझे बीच में
किसी काम से अवकाश लेना पड़ता है. फिर देसाई साहब मैनेजर हैं तो कोई समस्या नहीं
है.”
“फिर ठीक है. इस
बीच तुमने ईसीआई के आंदोलन में बहुत मदद
की. उसके लिए अदालत तक जाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाई. मैं जानना चाहता था कि उससे
तुम्हारी नौकरी में कोई परेशानी तो नहीं हुई.”
“नहीं सर, आप उसकी
चिंता न करें. जब मैंने घर छोड़ा, माता-पिता और भाई से किसी तरह की मदद की कोई आशा
भी उसी के साथ छोड़ दी थी. मैं जानती हूँ कि अपना जीवन मुझे ही चलाना है. यह नौकरी
मुझे आत्मनिर्भर बनाती है, और यह आत्मनिर्भरता मुझे एक स्वतंत्र व्यक्ति बनाती है. मैं
स्वतंत्रता का मूल्य जानती हूँ. मैं इसे खोने जैसा कोई काम जानबूझकर तो नहीं करूंगी.”
“तुम बहुत समझदार
हो, प्रिया. फिर भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम खुद को नुकसान न पहुँचा लो.”
प्रशांत बाबू ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा.
“नहीं सर ऐसा नहीं
होगा. यदि कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो उससे पहले आपको पता लग जाएगा.”
“तुमने इस बीच यूनियन
लाइब्रेरी से लाकर बहुत किताबें पढ़ी हैं, उनके बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?”
“सभी किताबें अच्छी
हैं. बहुत कुछ सिखाती हैं. बस उन्हें समझने के लिए अक्सर कई बार पढ़ना पड़ता है.
कुछ के बारे में ऐसा लगता है कि वे मेरे पास होनी चाहिए. मैंने ऐसी कुछ किताबें ऑनलाइन
खरीद लीं है”
“हाँ, उनमें से
अनेक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, मेरे पास भी बहुत किताबें हैं. वैसे इनमें से
तुम्हें सबसे अधिक किस किताब ने प्रभावित किया?”
“मुझे ‘परिवार,
निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति” ने
बहुत कुछ सिखाया. मैं समझ पाई कि कैसे मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद उसके
परिवार का विकास हुआ है. असल में मार्क्सवाद के एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत को
समझने के लिए यह सबसे बेहतरीन प्रारंभिक पुस्तक है. उसे पढ़ने के बाद मैंने एल.एच.मोर्गन
की किताब “प्राचीन समाज” मंगा ली है, उसे पढ़ रही हूँ. मुझे इस किताब से समझ आया
कि मनुष्य समाज लगातार विकसित हुआ है और उसका विकास जारी है. उसी से निजी संपत्ति
की उत्पत्ति और उसके कारण समाज में वर्गों की उत्पत्ति समझ सकी. यह भी जाना कि वर्ग-संघर्ष
ने समाज को कैसे उत्तरोत्तर उन्नत समाज व्यवस्थाओं तक पहुँचाया है.”
“तुमने ‘कम्युनिस्ट
घोषणा पत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ भी तो पढ़ी हैं.?”
“पढ़े हैं सर, घोषणापत्र तो मैंने पहले भी पढ़ा था, पर तब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. उनसे ही समझ आया
कि मजदूर वर्ग की मुक्ति तमाम अन्य शोषित वर्गों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है.
इस तरह मजदूर वर्ग को खुद अपनी मुक्ति के लिए तमाम वर्गों को मुक्त करना होगा. इस
प्रक्रिया में वह मनुष्य समाज के वर्गों को समाप्त कर सकता है. तर्क के स्तर पर यह
प्रस्थापना पूरी तरह उचित लगती है. उसी से मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी का महत्व
समझ आता है.”
“यह अच्छी बात है
कि तुम मजदूर वर्ग की पार्टी का महत्व समझा है.”
प्रशांत बाबू ने
कॉफी का कप उठाया, लेकिन उसकी कॉफी समाप्त हो चुकी थी. प्रिया देखकर मुस्कुराई, “सर,
एक कॉफी बनाऊँ.”
“नहीं उसकी जरूरत
नहीं. खाने का समय हो रहा है, फिर भूख मर जाएगी.” प्रशांत बाबू ने मना किया और अपनी
बात जारी रखी. “प्रिया, असल में मैं एक महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ. जब से ईसीआई
के मजदूरों का आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से तुम उसमें शामिल रही हो और आंदोलन के
महत्वपूर्ण काम किए हैं. कॉमरेड कुलकर्णी हमारी पार्टी के राज्य सचिव हैं उन्होंने
तुम्हें परखा है. उनका कहना है कि मैं तुम्हें हमारी पार्टी की मेंबर बनने का प्रस्ताव
दूँ.”
सुनकर प्रिया
स्तब्ध रह गई और सोच में पड़ी बहुत देर तक प्रशांत बाबू के चेहरे की ओर देर तक
देखती रही.
“सर मैं जानती हूँ
कि मजदूर वर्ग की पार्टी के सदस्य होने का अर्थ क्या होता है. उसे मजदूर वर्ग के
हितों को सर्वोपरि रखने की शपथ लेनी होती है और उस पर खरा उतरना होता है. उसका
जीवन पूरी तरह मजदूर वर्ग को समर्पित होता है, उसे हमेशा बलिदान के लिए तैयार रहना
होता है. मैं समझती हूँ कि वह आसान नहीं है. मैं उसके लिए अभी खुद को उसके लिए
तैयार नहीं पाती. सर उसके लिए मुझे सोचना पड़ेगा.” प्रिया ने उन्हें बहुत स्पष्ट
उत्तर दिया.
“तुम्हारा कहना
बिलकुल सही है. हर व्यक्ति को जिसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिले उसे सोच
समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए. मुझे कॉमरेड कुलकर्णी ने जिम्मेदारी दी थी. उसका
एक हिस्सा मैंने पूरा कर दिया है. मैं आगे भी कोशिश करता रहूँगा.” यह कहते हुए
प्रशांत बाबू मुस्कुराए.
प्रिया हँस पड़ी.
“सर, आप कोशिश करते रहिए. मैं भी लायक बनने की कोशिश करती रहूँगी.”
“प्रिया, साढ़े आठ
बज रहे हैं. खाने का क्या करोगी?” प्रशांत बाबू ने पूछा.
“बस अब बनाऊंगी.
वैसे भी मैं ऑफिस से लौटते हुए यही समय हो जाता है. मेरे लिए नॉर्मल है.”
“मैं रोज की तरह
अपना डिनर ‘एमबी’ में करूंगा. तुम भी साथ चलो. मेरे पास आज कार है. तुम्हें वापस
छोड़ दूंगा. इस बीच कुछ बातें और हो जाएंगी.”
“ठीक है सर, आप
रुकिए. मैं कपड़े चेंज करके आती हूँ.” प्रिया कह कर अंदर अपने कमरे में चली गई.
आधे घंटे बाद दोनों
‘एमबी’ में डिनर कर रहे थे. खाते हुए भी प्रशांत बाबू अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे.
और प्रिया गंभीरता से उन्हें सुन रही थी.
... क्रमशः