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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

एवरेज

  पिंजरा और पंख-36

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
​अगस्त की उमस भरी दोपहर थी. बादल घुमड़ते थे लेकिन बरसते न थे, धूप निकल आती थी. 'संबल कोचिंग' के नोटिस बोर्ड पर मंथली टेस्ट की रैंकिंग लिस्ट चस्पा कर दी गई थी. आयुष भीड़ से थोड़ा दूर खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था. उसके दिल की धड़कनें उसके कानों में साफ़ सुनाई दे रही थीं. जैसे ही भीड़ छंटी, उसने अपनी उंगली लिस्ट पर दौड़ाई.

​रैंक

101’ ... .................

.

.

104’ ... .................

105' ... आयुष गुप्ता

​उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. टॉप-100 रैंक वालों का जो 'एलिट' क्लब बन गया था, वह उससे मात्र पांच कदम दूर रह गया. तभी पीछे से रोहित की आवाज़ आई, "अरे यार आयुष, तू तो 'बॉर्डर-लाइनर' निकला. 105? भाई, कोटा में 100 के बाहर होने का मतलब है 'एवरेज'. और एवरेज लोगों को यहाँ कोई याद नहीं रखता. वे बस भीड़ का हिस्सा होते हैं."

​रोहित का वह 'एवरेज' शब्द आयुष को तीर सा चुभा. उसने मुड़ कर रोहित की आँखों में देखा. वह उसका मखौल उड़ा रहा था. वह बिना कुछ बोले अपने रूम पर आ गया. मेज पर रखी फिजिक्स की मोटी किताबें उसे चिढ़ाने लगीं. उसने पंखे की ओर देखा, जो एक अजीब सी घरघराहट के साथ घूम रहा था—ठीक वैसी ही जैसी उसके दिमाग में चल रही थी. कमरे की दीवारों पर चिपके 'फॉर्मूला चार्ट' उसे अपनी ही असफलताओं के विज्ञापन जैसे लगने लगे. दिन मुश्किल से गुजरा.

​शाम को उसने भारी मन से शगुन को फोन लगाया.

​"दीदी... मेरी रैंक 105 आई है," आयुष की आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था.

​"आयुष, 105 कोई बुरी रैंक नहीं है! हज़ारों बच्चों में तुम यहाँ तक पहुँचे हो," शगुन ने उसे दिलासा देने की कोशिश की.

​"नहीं दीदी, यहाँ सब कहते हैं कि जो टॉप-100 में नहीं, वह रेस से बाहर है. रोहित कह रहा था कि मैं 'एवरेज' हूँ. क्या वाकई मैं बस एक औसत लड़का हूँ? क्या मेरी पहचान सिर्फ इस रैंक से तय होगी?" आयुष का गला भर आया.

​शगुन को तुरंत डॉ. शास्त्री की क्लास याद आ गई. उसने गहरी सांस ली और कहा, "आयुष, मेरी क्लास में 'स्टीरियोटाइपिंग' के बारे में पढ़ाया गया था. कोटा के उस सिस्टम ने तुम पर एक 'एवरेज' होने का लेबल लगा दिया है. यह एक मानसिक साँचा है, जिसमें वे हर उस बच्चे को डाल देते हैं जो उनकी उम्मीदों के मुताबिक 'मशीन' नहीं बन पाता. तुम औसत नहीं हो आयुष, तुम बस एक इंसान हो जिसे इस वक्त रैंक की नहीं, चैन की ज़रूरत है."

​"पर दीदी, यहाँ तो चैन भी रैंक से ही मिलता है," आयुष बुदबुदाया.

​"सुन आयुष," शगुन ने स्वर कोमल करते हुए कहा, "हमें एक असाइनमेंट मिला था—अपने भीतर के पूर्वाग्रहों को पहचानने के लिए. इस असाइनमेंट का उद्देश्य यही था कि छात्राएँ अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना सीखें और उन्हें नष्ट करने की कोशिश करें. मैं पूरी ईमानदारी से यह किया और कर रही हूँ. ये पूर्वाग्रह हमें हमारे परिवार, समाज, यहाँ तक कि स्कूल-कॉलेज भी सिखाते हैं. बेहतर और योग्य इंसान बनने के लिए इनसे मुक्त होना जरूरी है. तुम्हें भी पूर्वाग्रह सिखाए जा रहे हैं, ‘जो टॉप 100 में नहीं है वह एवरेज है’, जो कहता है कि मेरा भाई सिर्फ तभी सफल है जब वह आईआईटी जाए. तू सुन रहा है न? तू आईआईटी न भी जाए, तो भी तू मेरा वही प्यारा आयुष रहेगा. तू कोई अंक (Digit) नहीं है."

“पर दीदी,...”

“तू टॉप 100 में भी आएगा, तू अपने सब्जेक्ट्स के नियमों सिद्धान्तों को समझने की कोशिश कर. विज्ञान सचाई की निरन्तर खोज है, विज्ञान के नियम सचाई हैं, अनेकानेक प्रयोगों ने उन्हें बारंबार सिद्ध किया है, उन्हें हमें सचाई के रूप में अंगीकार करना होगा, केवल परीक्षा के लिए रटना नहीं. एक बार वे समझ आ जाते हैं तो सब आसान होता जाता है, इतना आसान कि तू रोहित को भी पछाड़ सकता है. लेकिन उससे, या किसी और से कंपीटीशन कर के यह नहीं कर सकता. यह खुद को बेहतर बनाकर होगा. तुम्हें खुद पता नहीं लगेगा, तुम कब उससे आगे निकल गए हो.”

“बात तुम्हारी सही लगती है दीदी. पर यहाँ कोचिंग में तो रटने के तरीके खूब सिखाए जाते हैं.”

“वह ठीक है, डाटा रटने पड़ते हैं, पर नियम और सिद्धांत निर्देश हैं और अंगीकार करने से आते हैं. वे सोच का स्थायी अंग बन जाते हैं.

“समझ गया, दीदी यही करता हूँ. अब रखता हूँ.

​फोन रखने के बाद आयुष देर तक खिड़की के बाहर देखता रहा. शगुन की बातों ने उसके भीतर के घाव पर मरहम ही नहीं लगाया था बल्कि, उसे एक नयी बात सिखा दी थी, “विज्ञान सत्य है, अनेकानेक प्रयोगों से बारंबार परखा हुआ. उसे सचाई के रूप में स्वीकार करो, परीक्षा के लिए रटो मत.”

उसने अपनी रफ कॉपी उठाई और गणित के सवालों के बीच, एक खाली पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा—

​"मैं कोई रैंक नहीं, बल्कि इंसान हूँ. मेरा लक्ष्य बेहतर और योग्य इंसान बनना है, विज्ञान एक सचाई है, बारंबार परखी हूई, मुझे उसे रटना नहीं, समझना है. सचाइयों को अंगीकार करना है."

​लिखने के बाद, आयुष कुछ देर सोचता रहा. खिड़की के बाहर आसमान में बादल दिखाई दे रहे थे. एक दिशा में धीरे-धीरे सरकते हुए. फिर बादलों के बीच एक बड़ा सा सूराख आया, और चांद दिखने लगा. वह आधा था. उसे पूरा होने में अभी सात-आठ दिन थे. सात-आठ दिन बाद तो रक्षाबंधन का त्यौहार है. रामगंजमंडी में हमेशा शगुन उसे राखी बांध कर मिठाई मुहँ में रख देती थी. उसे लगा कि दीदी ने यह मिठाई आज ही उसके मुहँ में रख दी है. एक दो दिनों में उसे दीदी की भेजी राखी मिल जाएगी. मम्मा दीदी को देने को हमेशा सौ का नोट उसे देती थी. यहाँ वह क्या देगा? फिर उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी. इस सात दिनों में वह विज्ञान के सच को अंगीकार करने की कोशिश करेगा. तब तक जितने भी सच वह अंगीकार करेगा. वही दीदी के लिए उपहार होंगे.
... क्रमशः

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

दरकती दीवारें

  पिंजरा और पंख-35

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

तीनों जब मेस से अपने रूम में लौटीं तो सब यही बात कर रही थीं कि प्रियंका उनके साथ नहीं खाना चाहती थी. उसका कारण शर्म थी या गुस्सा इसमें तीनों के बीच मतभेद था. प्रियंका जैसे ही खाना खाकर लौटी सब चुप हो गयीं. प्रियंका भी वापस लौट कर चुपचाप कपड़े ले बाथरूम चली गयी. कपड़े बदल कर लौटने पर ‘भगवद्गीता’ निकालकर अपने बिस्तर पर इस तरह करवट लेकर लेटकर पढ़ने लगी कि उसका चेहरा दीवार की ओर रहे.

शगुन ने गौर किया कि पिछले पंद्रह मिनट से प्रियंका ने एक भी पन्ना नहीं पलटा था. वह पढ़ नहीं रही थी, अपितु वह खुद को उस मानसिक हमले से बचाने की कोशिश कर रही थी जो डॉ. शास्त्री के लेक्चर ने उसकी 'पंडिताई' पर किया था.

शगुन अपनी मेज पर बैठी डायरी लिख रही थी, तभी सीमा उसके पास आकर धीरे से बैठ गई. आज उसकी आँखों में हमेशा वाली झिझक नहीं थी.

"शगुन," सीमा ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "आज पहली बार ऐसा लगा जैसे क्लास में मेरी ही ज़िन्दगी के बारे में बात हो रही है. मैम ने जब 'लेबल्स' की बात की, तो मुझे लगा जैसे मेरे कंधे से सदियों पुराना कोई बोझ उतर गया हो. क्या वाकई हम सिर्फ एक लेबल नहीं हैं?"


शगुन ने सीमा का हाथ थाम लिया. उसी पल दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई. फातिमा खड़ी थी, उसके चेहरे पर भी वैसे ही सवाल थे जो सीमा की आँखों में तैर रहे थे.

"क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" फातिमा ने पूछा और सीमा के पास ही शगुन के बिस्तर पर बैठ गई. "आज डॉ. शास्त्री ने जो कहा, उसने मुझे डरा दिया शगुन. अगर 'स्टीरियोटाइप्स' ही हमारी पहचान तय करते हैं, तो क्या फातिमा होना हमेशा एक संदेह के दायरे में रहना ही रहेगा? प्रियंका का आज मेस से भागना... क्या वह भी इसी स्टीरियोटाइप का हिस्सा था कि वह हमारे साथ बैठकर 'अशुद्ध' नहीं होना चाहती?"

वे तीनों फुसफुसा कर बातें कर रही थीं, फिर भी शायद उनकी फुसफुसाहट प्रियंका तक पहुँच गयी थी. उसके शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई, पर वह मुड़ी नहीं.

शगुन ने कहा, “बादल हो रहे हैं उससे यहाँ कमरे में उमस हो रही है, क्यों न हम बाहर टैरेस पर चल कर बैठें? दोनों समझ गयीं कि शगुन स्वतंत्रता से बातें करना चाहती है. तीनों बाहर टैरेस पर आ गईं और मुंडेर पर बैठ कर बातें करने लगीं.

"देखो फातिमा, सीमा... प्रियंका का भागना असल में उसका डर है. उसे डर है कि अगर उसने हमारी मौलिकता को पहचान लिया, तो उसकी अपनी 'श्रेष्ठता' का महल ढह जाएगा. डॉ. शास्त्री ने आईना दिखाया है, और आईना सबसे पहले उन्हें डराता है जिनके चेहरे पर नकाब होते हैं." शगुन ने कहा.

"मुझे तो डर लगता है शगुन," फातिमा ने लंबी सांस लेते हुए कहा. "यहाँ बनस्थली में खादी के वस्त्रों में भी मुझे अक्सर अपनी पहचान छुपानी पड़ती है जिससे कोई मुझे 'कट्टर' न समझ ले. मैं हर वक्त मुस्कुराती रहती हूँ ताकि कोई मेरे धार्मिक स्टीरियोटाइप से न डरे."

सीमा ने पहली बार फातिमा के कंधे पर हाथ रखा. "फातिमा, हम दोनों अलग-अलग वजहों से एक ही किनारे पर खड़ी हैं. मुझे अपनी जाति छुपानी पड़ती है ताकि कोई मुझे कमतर न समझे, और तुम्हें अपनी पहचान ताकि कोई तुम्हें पराया न समझे. शगुन सही कह रही है, कंडीशनिंग ने हमें दुश्मन नहीं, बल्कि 'कैदी' बना रखा है."

“पर किसी को अपनी आइडेंटिटी छुपाने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? दूसरे उसे उसी रूप में एक इंसान के रूप में स्वीकार क्यों नहीं कर सकते?” फातिमा ने सवाल रख दिया.

“मैं ठीक से नहीं बता सकती, लेकिन मुझे लगता है यह हमारी अपनी कंडीशनिंग के कारण भी है और पूरे समाज की कंडीशनिंग के कारण भी.” शगुन ने उत्तर देने का प्रयास किया. “लेकिन कल की क्लास में डॉ. शास्त्री से पूछने के लिए यह सबसे बेहतर सवाल जरूर है.

अगली सुबह जब वे अपनी क्लास के लिए निकलीं तो रास्ते में सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सामूहिक प्रार्थना के स्वर गूंज रहे थे. जब 'हिंद देश के निवासी...'. शगुन ने गौर किया कि खादी की एक जैसी रंग-योजना वाले वस्त्र पहने पंक्तियों में खड़ी एक सुर में गा रही थीं, पर उन पंक्तियों के बीच भी अदृश्य दीवारें थीं. प्रियंका को प्रार्थना का प्रकरण हमेशा प्रिय लगता. वह कहती भी थी कि आखिर कॉलेज में सुबह सामूहिक प्रार्थना क्यों नहीं होती?

क्लास में डॉ. शास्त्री ने कहा, “कल हमने पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता के बारे में जाना था. आप सभी ने उस पर विचार अवश्य किया होगा. कुछ प्रश्न भी जन्मे होंगे. यदि कोई प्रश्न पूछना चाहे तो पूछे.

शगुन ने रात वाला प्रश्न ही उनके सामने रख दिया. “मैम, हमारे समाज में और यहाँ भी क्यों कुछ लोगों को अपनी जातीय या वर्गीय आइडेंटिटी छुपाने की जरूरत पड़ती है?”

“यह बेहतर सवाल है. लेकिन इसका उत्तर मैं अभी नहीं दूंगी. आज मैं आप सबको एक असाइनमेंट दे रही हूँ, नोट कीजिए. आपको अपने स्वयं के तीन ऐसे पूर्वाग्रह (Prejudices) पहचानने हैं जो आपको अपने परिवार या समाज से मिले हैं, और उन पर एक ईमानदार रिपोर्ट लिखनी है. यह रिपोर्ट गुप्त रहेगी. इससे मुझे यह समझने में मदद मिलेगी कि हमें आगे की क्लासेज में किन चीजों पर अधिक ध्यान देना है."

शगुन ने प्रियंका की ओर देखा. उसने अपनी नोटबुक में खाली पृष्ठ पर सबसे ऊपर ऊँ लिखा. फिर नीचे ही जैसे वह तीन पूर्वाग्रह लिखने लगी उसके हाथ में पकड़ा हुआ पेन काँपने लगा. यह प्रोजेक्ट उसके लिए अपनी आत्मा के उन कोनों में झाँकने जैसा था जहाँ उसने 'अशुद्धता' और 'श्रेष्ठता' के भूत पाल रखे थे.

शगुन ने अपनी कॉपी में पहला वाक्य लिखा— "कंडीशनिंग को पहचानना ही उसे तोड़ने का पहला कदम है. मुझे अपने पूर्वाग्रहों की कोई जानकारी नहीं, जिनकी हुई उन्हें मैंने त्याग दिया. फिर भी मैं अपने तीन पूर्वाग्रह तलाश करूंगी और उन पर रिपोर्ट लिखूंगी."
... क्रमशः

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

पूर्वाग्रह

 पिंजरा और पंख-34

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली विद्यापीठ में सत्र 2005-06 आरंभ हुआ. तीन जुलाई को द्वितीय वर्ष बीएससी (मनोविज्ञान) की पहली क्लास लगी. हॉल में करीब तीस-पैंतीस लड़कियां खादी के परिधान में अनुशासित बैठीं. खादी के इन लिबासों के नीचे छिपे उनके संस्कार और पूर्वाग्रह उतने ही विविध थे जितनी उनकी पृष्ठभूमि.

प्रोफेसर डॉ. नीलम शास्त्री ने क्लास में प्रवेश किया. उनकी आँखों में वह चमक थी जो केवल किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि इंसानी व्यवहार की गहरी समझ से आती है. उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा— 'पूर्वाग्रह' (Prejudice) और 'रूढ़िवादिता' (Stereotypes).

"पूर्वाग्रह क्या है?" उन्होंने क्लास की ओर देखते हुए पूछा.

शगुन ने हाथ उठाया, "मैम, बिना किसी ठोस आधार या अनुभव के किसी व्यक्ति या समूह के बारे में पहले से ही कोई धारणा बना लेना ही पूर्वाग्रह है."

"बिल्कुल," डॉ. शास्त्री ने आगे बढ़ते हुए कहा, "पर पूर्वाग्रह से पहले जन्म लेता है— 'Stereotypes' अर्थात रूढ़िवादिता. रूढ़िवादिता वह 'मानसिक साँचा' है जिसमें हम पूरी की पूरी कम्युनिटी को फिट कर देते हैं. जैसे ही हम कहते हैं कि 'सारे बनिए कंजूस होते हैं' या 'सारे क्षत्रिय गुस्सैल होते हैं' या 'मुस्लिम कट्टर होते हैं', हम पूरे एक समुदाय की स्टीरियोटाइपिंग कर रहे होते हैं. हम उस समूह के हर व्यक्ति की मौलिकता छीनकर उस पर एक जनरल 'लेबल' लगा देते हैं."

क्लास में सन्नाटा गहरा गया. किरण ने टोका, "पर मैम, बहादुर होना तो अच्छी बात है न? अगर हम कहें कि 'राजपूत वीर होते हैं', तो इसमें गलत क्या है?"

प्रोफेसर शास्त्री मुस्कुराईं, "इसमें गलत यह है किरण, कि यह स्टीरियोटाइपिंग उस राजपूत लड़के पर 'वीर' दिखने का इतना दबाव डाल देता है कि वह अपनी कमजोरी या डर ज़ाहिर नहीं कर पाता. वह खुद को चोट पहुँचाता है ताकि समाज की उस छवि में फिट हो सके. स्टीरियोटाइपिंग चाहे सकारात्मक दिखे, वह अंततः पूरे समुदाय के लिए 'मानसिक जेल' बन जाती है."

तभी अपनी 'पंडिताई' के लिए प्रसिद्ध प्रियंका बोल पड़ी, "पर मैम, कुछ बातें तो हमारे पूर्वजों के अनुभवों पर आधारित होती हैं न? जैसे शुद्धता और खान-पान के नियम. क्या उन्हें भी आप पूर्वाग्रह कहेंगी?"

डॉ. शास्त्री प्रियंका की मेज के पास जाकर रुक गईं. "प्रियंका, जब तुम्हारा 'शुद्धता का नियम' तुम्हें किसी दूसरे इंसान से हाथ मिलाने या उसके साथ बैठने से रोकता है, तो वह संस्कार नहीं, बल्कि 'डिस्क्रिमिनेशन' यानी भेदभाव है. पूर्वाग्रह (मानसिक धारणा), स्टीरियोटाइपिंग (दिमाग में छवि) और डिस्क्रिमिनेशन (व्यवहार में भेदभाव)—ये तीनों एक ही सिक्के के पहलू हैं."

कोने में बैठी सीमा की आँखों में एक अजीब सी चमक थी. वह दलित समुदाय से थी और उसने जब से पैदा हुई तब से इन 'लेबल्स' को झेला था.

डॉ. शास्त्री ने आगे कहा, "एक और स्टीरियोटाइप लीजिए—लड़कों पर लदा 'सफलता' का बोझ. समाज ने सांचा बना दिया है कि 'लड़के रोते नहीं' और 'सफल वही है जो आईआईटी जाए' इंजीनियर या डाक्टर बने. क्या यह स्टीरियोटाइप उस लड़के की जान नहीं ले लेता जो शायद संगीतज्ञ बनना चाहता था?"

शगुन को तुरंत कल रात की आयुष से हुई बात याद आ गई. उसने खड़े होकर कहा, "मैम, क्या ये स्टीरियोटाइप्स इतने गहरे होते हैं कि इंसान अपनी संवेदना भी खो देता है? मेरा भाई कल बता रहा था कि कोटा में आईआईटी जी और इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे लड़कों के होस्टलों में उनके कमरों से रातों को रोने की सिसकियां आती हैं, पर दिन में उनमें से हर कोई 'मजबूत' होने का नाटक करता है."

"हाँ शगुन," शास्त्री मैम ने गंभीर होकर कहा, "क्योंकि स्टीरियोटाइपिंग हमें सोचने की मेहनत से बचा लेती हैं. हमें लगता है कि हमने किसी को 'लेबल' दे दिया, तो हम उसे जान गए. लेबल लगा देना सबसे आसान है, इंसान को समझना सबसे मुश्किल. याद रखिए, जब आप किसी को उसकी जाति, धर्म या जेंडर के चश्मे से देखते हैं, तो आप उसे नहीं, बल्कि अपनी खुद की 'कंडीशनिंग' को देख रहे होते हैं."

क्लास खत्म होने के बाद जब वे सब मेस की ओर बढ़ रही थीं, तो प्रियंका का तमतमाया हुआ उसकी नाराजगी को उजागर कर रहा था. "मैम तो हमारे संस्कारों को ही बीमारी बता रही हैं," वह बुदबुदाई.

शगुन ने रुककर उसे देखा, "संस्कार बीमार नहीं होते प्रियंका, पर जब वे किसी को इंसान समझने से रोकें, तो वे ज़हर ज़रूर बन जाते हैं. कल मेस में हम सबने फातिमा के लाए खाने से परहेज किया था, आज क्लास में उसे 'प्रेजुडिस' और 'स्टीरियोटाइप' का नाम मिल गया है. अब तय हमें करना है कि हम यहाँ कुछ सीख रहे हैं या सिर्फ किताबों के पन्ने पलट रहे हैं."

रात के खाने के लिए चारों अपने रूम से साथ निकलीं. लेकिन मेस पहुँचते ही अचानक प्रियंका यह कह कर वापस चल दी कि, “मैं अपना फोन भूल आई हूँ, लेकर आती हूँ. हो सकता है इस बीच माँ का फोन आ जाए.” फिर वह तब तक नहीं लौटी जब तक कि वे तीनों भोजन करके मैस से बाहर नहीं आ गयीं. जब वे अपने रूम की ओर लौट रही थीं, तब प्रियंका उन्हें रास्ते में मैस की ओर तेजी से जाती मिली. किरण के पूछने पर कहने लगी, माँ का फोन आ ही गया था, बात करने में लेट हो गयी.”

प्रियंका का इस तरह मैस के ठीक बाहर से फोन के बहाने लौट जाना और उनके भोजन के बाद बाहर आने तक न लौटना सबको अजीब लगा था. सब समझ रहे थे कि वह जानबूझकर उनके साथ खाने पर साथ नहीं थी. शायद इसलिए कि कहीं उसकी रूम मेट ही उसके अपने पूर्वाग्रहों पर कोई मजाक न बनाने लगें.

शाम को डायरी में शगुन ने लिखा— "आज डॉ. शास्त्री ने हमारे दिमागों की सालों से बंद खिड़कियों पर दस्तक दी. किरण की असहजता, सीमा की आँखों की वह चमक और प्रियंका की चिढ़ और शाम को सबके साथ भोजन करने से बचने की उसकी कोशिश बता रही है कि द्वंद्व शुरू हो चुका है—किताबों के बीच नहीं, बल्कि हमारी अपनी पुरानी आदतों और नई चेतना के बीच."
... क्रमशः

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

संकल्प

 पिंजरा और पंख-33

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
कोटा अब एक बदला हुआ शहर था. एक वक्त की औद्योगिक नगरी 1980 के बाद लगातार उद्योग बन्द होने से अपनी लय खोने लगी थी. लेकिन जल्दी ही इसने लय पकड़ ली. यह इंजीनियरिंग, आईआईटी, और मेडीकल कालेजों के प्रवेश परीक्षाओं की कोचिंग के लिए जाना जाने लगा. यहाँ के वातावरण में परफॉर्मेंस, नंबर, परसेंटाइल और रेंक जैसे शब्द गूंजने लगे. शहर की अर्थव्यवस्था फिर से दौड़ने लगी.

आयुष पिछले साल 11वीं की तैयारी के साथ ही संबल कोचिंग में आईआईटी जेईई की तैयारी करने रामगंजमंडी से कोटा आया था. इस साल ‘सीनियर सेकेंडरी बोर्ड’ परीक्षा के साथ उसे ‘आईआईटी जेईई’ का तिलिस्म भी तोड़ना था, जिसे भेदने का सपना लेकर हज़ारों लड़के-लड़कियाँ यहाँ की गलियों में अपनी मासूमियत खो देते थे.

इस बार आयुष का हॉस्टल बदल गया था. पिछले होस्टल का रूम नंबर 103 अब किसी 'नए और रसूखदार' विद्यार्थी को पसंद आ गया था. अपना पुराना रूम न मिलने से आयुष ने होस्टल ही छोड़ दिया. अब वह इसी साल शुरू हुए होस्टल ‘शाह रेजीडेंसी’ में आ गया था. यहाँ सेकंड फ्लोर का रूम नंबर 208 उसका था. यहाँ उसका कोई पूर्व परिचित न था. उसे रह-रह कर पिछले साल के पड़ोसी विशाल की याद आती, वह कोटा छोड़ कर अपने शहर बूंदी लौट गया था. विशाल ने हथियार डाल दिए थे; उसने मान लिया था कि वह इंजीनियरिंग की इस अंधी दौड़ का दबाव सहने के लिए नहीं बना है। उसने बूंदी में ही 12वीं जोइन कर ली. बस वह अच्छे नंबरों से सीनियर सेकेंडरी कर लेना चाहता था.

विशाल दबाव क्यों नहीं सह सका? यह सवाल उसे बार-बार परेशान करता था. क्या वह खुद दबाव सहन कर सकेगा. पापा और चाचा दोनों को उससे अपेक्षा थी, पापा प्रोत्साहित करते किन्तु उसने उसके पीछे कोई दबाव महसूस नहीं किया. चाचा जरूर कहते कि आईआईटी-जी उसने क्रैक किया तो उसकी मर्दानगी साबित हो जाएगी जो बोर्डिंग स्कूल में उसके सर्वश्रेष्ठ कैडेट बनने और ऊपर होगी. बचपन में चाचा उसे ताड़ पर चढ़ा देते थे. पर अब उसने उनकी परवाह करना बंद कर दिया था. शगुन के साथ ने यह मर्द शब्द उसके शब्दकोश से बाहर कर दिया था. वह इस कंडीशनिंग से बाहर आ चुका था.

कोटा आने के पहले सप्ताह में उसे रोहित मिला. जो पिछले साल कभी भी 'टॉप टेन' रैंक से बाहर नहीं हुआ था. उसका आत्मविश्वास उसकी चाल में दिखता था. उसे पूरा यकीन था कि वह टॉप रैंक के साथ आईआईटी क्रैक कर लेगा. रोहित जैसे लड़के उस सफल कंडीशनिंग का चेहरा थे, जो बाकी सबको 'औसत' होने का अहसास दिलाते थे. आयुष खुद को देखता, वह पिछले साल टॉप 100 में भी शामिल नहीं हो सका था. पर उसके भीतर एक खामोश जिद अंगड़ाइयाँ ले रही थी. वह जानता था कि कई 'ड्रॉपर्स' (जो पहली बार में सफल नहीं हुए) इस बार फिर मैदान में हैं, पर आयुष ने मन बना लिया था कि उसे इसी साल यह दीवार तोड़नी है.

रात के ग्यारह बज रहे थे. हॉस्टल की खिड़की से बाहर देखते हुए आयुष को रामगंजमंडी के घर की याद आई, साथ ही याद आई चाचा और पापा की उम्मीदें. उसने वनस्थली फोन लगाया.

"हेलो, दीदी?" आयुष की आवाज़ में अपनी जिद को शब्दों में ढालने की कोशिश थी.

शगुन ने फोन उठाते ही उसकी उत्तेजना को पहचान लिया. उसने कभी उसे दीदी नहीं कहा था. हमेशा उसका नाम लेकर उसे शगुन ही कहता, यह पहली बार था जब उसने उसे दीदी कह कर संबोधित किया था. शगुन के चेहरे पर एक मुस्कुराहट फैल गयी. "आयुष, कैसे हो? पढ़ाई का क्या हाल है?"

"दीदी, यहाँ सब अपनी-अपनी श्रेणियों में बंटे हैं. रोहित जैसे लड़के हैं जिन्हें अपनी जीत का यकीन है, और विशाल जैसे भी थे जो बीच रास्ते से लौट गए. मैं अभी लिस्ट में कहीं नहीं हूँ दीदी, पर मैंने तय कर लिया है. मुझे इसी साल आईआईटी क्रैक करना है. मुझे उस लिस्ट में अपनी जगह बनानी है."

शगुन की आँखों में अपने छोटे भाई के लिए गर्व की एक चमक उभरी. "आयुष, पता है लड़कों के साथ सबसे बड़ी समस्या क्या है? उन्हें सिखाया जाता है कि उनकी कीमत सिर्फ उनकी सफलता से है. पर मैं जानती हूँ कि तुम्हारी यह जिद किसी को 'दिखाने' के लिए नहीं, बल्कि खुद को 'साबित' करने के लिए है. अगर तूने ठान लिया है, जिद कर ली है, तो तू अवश्य कर लेगा. याद है, तूने कैसे बोर्डिंग स्कूल में बेस्ट एनसीसी कैडेट बनने के लिए रात-दिन एक कर दिए थे? तेरी वह एनसीसी वाली अनुशासन और जिद ही तुझे इस भंवर से बाहर निकालेगी."

शगुन की बातों ने आयुष के भीतर के उस डर को उसके दिमाग से निकाल फैंका, जो विशाल की हार को देखकर पैदा हुआ था.

“हाँ, दीदी, मैंने वहाँ किया था, मुझे यहाँ भी कोशिश करनी चाहिए.

“आयुष, तू डरा हुआ तो नहीं है, न?”

“नहीं दीदी, अब नहीं, बस मैं विशाल की बात सोच कर मायूस जरूर हूँ. आखिर उसने यह रेस छोड़ दी. वह वापस बूंदी चला गया. वह केवल सीनियर सेकेंडरी करेगा, बाद में सोचेगा क्या करना है?”

“आयुष¡ उसका रेस छोड़ना भी एक मजबूत निर्णय है, जैसे तुम्हारा संकल्प कि, ‘मैं कर दिखाऊंगा’. तुम्हें उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए.

"दीदी, यहाँ चाचा की तरह सब कहते हैं कि लड़के रोते नहीं, पर यहाँ कोटा में रातों को कमरों से सिसकियों की आवाज़ें आती हैं. मैं ने तो बोर्डिंग में ही रोने से पीछा छुड़ा लिया था. अब इसे वापस नहीं लौटने दूंगा, मैं लड़ूँगा," आयुष ने दृढ़ता से कहा.

“ये कोई बात हुई न. तुम रेस की फिक्र छोड़ो, अपने आप पर केंद्रित करो और सोचो कि तुम्हें अपने आप को मजबूत करते हुए सबसे आगे जाना है. फिर कोशिश करते जाओ, तुम कर लोगे.”

फोन काटने के बाद आयुष ने अपनी मेज पर रखे 'मैथ्स' के रजिस्टर को खोला. अब उसे रोहित की रैंक या विशाल की हार से मतलब नहीं था. वह समझ गया था कि उसकी लड़ाई किसी और से नहीं, बल्कि उस 'कंडीशनिंग' से है जो यहाँ सभी को डरा कर रखती है.
  ... क्रमशः


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

खादी का खोल

 पिंजरा और पंख-32

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
रामगंजमंडी से वनस्थली विद्यापीठ तक का सड़क दुरुस्त थी. बूंदी से बनस्थली तक कुछ बरसात भी हो चुकी थी. गुप्ताजी की कार को बनस्थली विद्यापीठ के गेट से अंदर पहुँची तब शाम के 5 बजने को थे. शगुन कार का गेट खोल कर नीचे उतरी तो बाहर की गर्म हवा महसूस की. यह रामगंजमंडी की बंदिशों से अलग थी, पर क्या वाकई आज़ाद थी? वह गेट ऑफिस पर प्रवेश दर्ज कराने के लिए बढ़ी तभी एक आटो रिक्शा आकर रुका और उससे किरण, उसकी माँ और पिता मंगलसिंह उतरे.


उतरते ही मंगलसिंह ने गेट ऑफिस के पास सहायक मैनेजर गुप्ताजी को देखा और अपना भारी बैग कंधे पर लटकाए लपककर पास आए. उनके चेहरे पर वही 'दफ्तर वाली विनम्रता' चिपकी थी.

"साहब, आप भी आ गए! हमें लगा आप कल निकलेंगे," मंगलसिंह ने झुककर अभिवादन किया. गुप्ताजी ने हमेशा की तरह अपनी 'साहब वाली गरिमा' बनाए रखते हुए सिर हिलाया. "हाँ, सोचा कि भीड़भाड़ से पहले बिटिया को छोड़ आएँ. आप भी ठीक समय पर आ गए. वापसी का तो तय है न? बस में क्यों धक्के खाना, हमारी कार में पर्याप्त जगह रहेगी."

शगुन ने एक नज़र किरण की ओर देखा. किरण अपनी माँ का हाथ पकड़कर खड़ी थी, उसकी आँखें ज़मीन पर गड़ी थीं. वह अपने पिता की उस "साहब-साहब" वाली रट से भीतर तक छिल रही थी. उसे लग रहा था जैसे उसके पिता की 'जीहुज़ूरी' उसके अपने वजूद को छोटा कर रही है. जब गुप्ताजी ने वापसी में उन्हें कार में बिठाने की पेशकश की, तो किरण के चेहरे पर एक क्षण के लिए नफरत की लकीर उभरी और फिर गायब हो गई. वह जानती थी कि उसके स्वाभिमानी क्षत्रिय होने के दावों के बीच उसके पिता की यह मजबूरी एक ऐसी गांठ थी जिसे वह चाहकर भी नहीं खोल सकती थी.

शाम के धुंधलके में जब शगुन ने रूम नंबर 106 का दरवाजा खोला, तो पुरानी परिचित गंध ने उसका स्वागत किया—मिट्टी, पुरानी किताबों और अगरबत्ती की मिली-जुली महक. कमरे में प्रियंका पहले ही पहुँच चुकी थी और अपनी 'शुद्धिकरण' की रस्म में व्यस्त थी.

"शगुन! आ गई तू? देख, इस बार मैंने मेज का मुख एकदम सटीक पूर्व की ओर रखा है. पिछले साल मुझे लगा कि वास्तु ठीक नहीं था, इसलिए शायद मनोविज्ञान के कुछ सिद्धांत समझ नहीं आ रहे थे," प्रियंका ने अपनी विशेष 'पंडिताइन' वाली मुस्कान के साथ कहा. उसके लिए शिक्षा भी धर्म के चश्मे से ही होकर गुज़रती थी. वह गंगाजल की एक बोतल साथ लाई थी और कमरे के हर कोने में उसका छिड़काव कर रही थी.

सीमा, जो हमेशा की तरह एक कोने में चुपचाप बैठी अपनी अलमारी ठीक कर रही थी, प्रियंका की इस हरकत पर बस एक फीकी नज़र डालकर रह गई. दलित समुदाय से आने वाली सीमा, इस कमरे की सबसे बड़ी 'खामोश गवाह' थी. वह जानती थी कि प्रियंका का यह गंगाजल दरअसल एक अदृश्य बाड़ थी, जो उसे और उसकी पहचान को बाकी सबसे अलग रखती थी.

तभी तमतमाई हुई किरण ने कमरे में प्रवेश किया. अपना बैग ज़ोर से मेज पर पटका. "प्रियंका, बंद कर यह पानी छिड़कना. हम यहाँ पढ़ने आए हैं या शुद्धि करने? और वैसे भी, बाहर जो 'अशुद्धि' मेरे स्वाभिमान के साथ हो रही है, उसे तेरा यह गंगाजल नहीं धो सकता."

अभी किरण की बात पूरी ही हुई थी कि फातिमा ने कमरे में कदम रखा. "सलाम! क्या बहस हो रही है पहले ही दिन?" फातिमा के हाथ में एक टिफिन था. "मैं घर से सेवइयाँ लाई हूँ, माँ ने सबके लिए भेजी हैं."

प्रियंका ने तुरंत अपनी पूजा की थाली को हाथ से ढँक लिया. "फातिमा, देख... बुरा मत मानना, पर अभी-अभी शुद्धि की है. और वैसे भी, हम ब्राह्मण सावन के महीने में बाहर का खाना..." प्रियंका की बात अधूरी रह गई, पर उसका संदेश साफ़ था.

किरण, जिसे अपना गुस्सा निकालने के लिए बस एक माध्यम चाहिए था, फातिमा की ओर मुड़ी. "फातिमा, तू भी क्यों अपनी पहचान हर जगह ले आती है? क्या ज़रूरी है कि हम हर बार खाने और धर्म के नाम पर ही मिलें? और तू प्रियंका, तेरी यह 'पंडिताई' तब कहाँ जाती है जब तू परीक्षा में नकल करने के लिए किसी की भी मदद लेने को तैयार रहती है?"

कमरे में एक भारी सन्नाटा पसर गया. सीमा ने पहली बार अपनी किताबें छोड़ीं और सिर उठाकर सबको देखा. "हम सब एक ही कमरे में हैं," सीमा की आवाज़ धीमी पर स्पष्ट थी, "पर हम सब अपनी-अपनी खिड़कियों से अलग-अलग दुनिया देख रहे हैं. किरण को अपने पिता की नौकरी की शर्म है, प्रियंका को अपनी जाति का अहंकार, और फातिमा को अपनी पहचान साबित करने की ज़रूरत. और मैं... मैं बस यह सोच रही हूँ कि क्या इस कमरे में कोई ऐसा कोना है जहाँ मैं सिर्फ 'सीमा' रह सकूँ, बिना किसी लेबल के?"

शगुन खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई. बाहर जून की शाम अब धीरे-धीरे काली पड़ रही थी. उसने महसूस किया कि वनस्थली के खादी-वस्त्र भ्रम मात्र हैं. इस खादी के नीचे वही पुराने घाव, उसी पुरानी श्रेष्ठता और हीनता के भाव छिपे थे.

"हम मनोविज्ञान के छात्र हैं," शगुन ने बिना पीछे मुड़े कहा. "परसों 3 जुलाई को जब हम क्लास में बैठेंगे, तो प्रोफेसर साहब हमें 'प्रेजुडिस' (पूर्वाग्रह) और 'स्टीरियोटाइप्स' के बारे में पढ़ाएंगे. वे बताएंगे कि कैसे समाज हमारी सोच को कंडीशन्ड करता है. पर क्या हममें इतनी हिम्मत होगी कि हम आईने में खुद को देख सकें? किरण, तेरा गुस्सा तेरे पिता की मजबूरी से है, प्रियंका तेरा डर तेरी शुद्धता से है. हम यहाँ शिक्षा लेने आए हैं, पर हम अपने साथ वही गाँवों और छोटे शहरों की सँकरी गलियां ले आए हैं."

रात को डायरी लिखते समय शगुन की कलम रुक-रुक कर चली— "आज मेरे और किरण के माता-पिता गेस्ट हाउस में होंगे. वहाँ क्या उनके बीच संवाद हुआ होगा. ऐसे संवाद क्या इस देश की असलियत हैं. और यहाँ रूम नंबर 106 में, हम चार लड़कियां चार अलग-अलग धाराओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. खादी का खोल शरीर पर चढ़ाना आसान है, मन पर, शायद नामुमकिन."

  ... क्रमशः

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

विदा होती गूंज

 पिंजरा और पंख-31

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

 जून का आखिरी सप्ताह में एक दिन अचानक देसी घी में बेसन सेकने की खुशबू घर में फैल गयी. सबको अहसास हो गया कि अब शगुन के बनस्थली जाने का वक्त आ गया है. तीन जुलाई से उसका सत्र आरंभ होने वाला था और उसे दो दिन पहले तीस जून को ही जाना था. जिससे वह दो दिन में खादी का कपड़ा खरीद कर विद्यापीठ में पहनने के लिए कुछ सूट सिलवा ले. आयुष के जाने के बाद शगुन अपने कमरे में अकेली थी. वह जानती थी कि उसके जाने के बाद यदि घर में कोई मेहमान आएगा तो उस के ठहरने के लिए इस कमरे की जरूरत पड़ेगी. इसलिए वह चाहती थी कि दीवार पर लगी तस्वीरों के अलावा शेष सामानों को अलमारी में संभाल कर रख रही थी. इस कमरे में रहते हुए उसने और आयुष ने मिल कर घर में कुछ बदलने की कोशिश की थी. उसे आशंका थी कि उसके जाने के बाद कहीं फिर से यह घर उसी पुराने ढर्रे पर न लौट आए.


अगले दिन दोपहर में, जब घर के लोग सुस्ता रहे थे, शगुन ने देखा कि चाचा बरामदे में अकेले बैठे तम्बाकू के साथ खाने के लिए सुपारी काट रहे थे. शगुन ने मन कड़ा किया और उनके पास जाकर बैठ गई.

"चाचा, दो-तीन दिन में मैं बनस्थली चली जाउंगी," शगुन ने स्वर को बहुत सहज और नरम रखते हुए कहा.

चाचा ने सुपारी का एक टुकड़ा मुहँ में डाला और चश्मा उतारकर शगुन की ओर देखा. उनके चेहरे पर एक कृत्रिम, चाशनी भरी ममता उभरी, "हाँ बेटा, तेरे जाने के बाद घर फिर सूना हो जाएगा. आयुष गया तो लगा कि हाथ कट गया, अब तुम भी चली जाओगी. मन तो नहीं है कि तुम्हें इतनी दूर भेजा जाए, पर पढ़ाई करना भी तो जरूरी है. आजकल उसके बिना लड़कियों को अच्छे वर कहाँ मिलते हैं."

"चाचा, मन तो मेरा भी नहीं है," शगुन ने उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा, "पर मैं चाहती हूँ कि मेरे पीछे घर में सब खुश रहें. खासकर चाची. उनकी सेहत अभी बहुत नाजुक है, उनकी बहुत देखभाल करनी होगी. और मैं देखती हूँ कि वे अक्सर तनाव में रहती हैं. हमें उन्हें थोड़ा और खुलापन देना चाहिए, जिससे वे तनाव मुक्त रहें. आखिर वे एक इंसान हैं, कोई अमानत नहीं जिसे ताले में सहेजकर रखा जाए."

चाचा ने एक लंबी आह भरी, जैसे शगुन की बात ने उन्हें बहुत गहरी चोट पहुँचाई हो. "बेटा, तुम अभी छोटी हो. तुम जिसे 'खुलापन' कहती हो, वह हमारे खानदान में 'मर्यादा' का उल्लंघन माना जाता है. खैर, तुम कह रही हो तो मैं ध्यान रखूँगा. अब मैं इतना भी पत्थर-दिल नहीं हूँ जितना तुम मुझे समझती हो. नीतू का ध्यान तो तुमसे ज्यादा मुझे है, आखिर हमारे वंश की बेल उसी के सहारे आगे बढ़ेगी. मेरा वंश तो उसी से आरंभ होने वाला है."

शगुन को उनके 'वंश' शब्द से कोफ्त हुई, पर उसने खुद को काबू में रखा. वह जानती थी कि यह 'समझने और न समझने' का नाटक मात्र है.

शाम को उसने मम्मी और पापा को अपने कमरे में बुलाया. पापा के चेहरे पर दरा घाटी वाला वह वादा अब भी एक झिझक बनकर टिका हुआ था.

"पापा, मैं जा रही हूँ, पर मेरा मन चाची में अटका रहेगा," शगुन ने पापा का हाथ थामते हुए कहा. "मैंने कल चाचा से बात की थी और कहा था कि वे चाची को कुछ खुलापन दें. उन्होंने हाँ तो कहा, लेकिन जैसी उनकी सोच बन चुकी है, वह इतनी आसानी से नहीं पिघल सकती. वे अभी मुझ से बात करते हुए नरम बन रहे थे और उसके बाद भी, पर मेरे जाने के बाद वे फिर से अपनी खुराफात शुरू करेंगे. मम्मा, आप कम से कम इतना तो कर सकती हैं कि जब चाचा उन पर दबाव डालें, तो आप चाची के साथ खड़ी हों. और पापा, आपने कहा था कि आप अब चाचा को 'प्रोत्साहन' नहीं देंगे. याद रखिएगा, आपकी चुप्पी ही चाचा की ताकत है."

पापा ने एक गहरी सांस ली और शगुन के सिर पर हाथ रखा, "तू बेफिक्र होकर पढ़ाई कर बेटा. मैंने अनिल से कह दिया है कि अब हर बात में उसकी जिद नहीं चलेगी. नीतू को कोई तकलीफ नहीं होगी."

शगुन बहुत अधिक तो नहीं पर थोड़ी तो आश्वस्त हुई. आखिर उसने कोशिश तो की थी. इससे उसे भी संतोष मिला.

विदाई की सुबह अजीब थी. चाचा सबसे ज्यादा सक्रिय थे. जब शगुन के बैग तैयार हुए और गुप्ताजी उन्हें मारुति 800 की डिक्की में रखने के लिए उठाने लगे तो चाचा दौड़ कर आए और शगुन के बैग उठा लिए. कहने लगे, "अरे भैया, आप रहने दो, मैं रख देता हूँ. बिटिया हमारी शान है, इसे कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए." वे ऐसा जता रहे थे जैसे वे ही शगुन के सबसे बड़े रक्षक और शुभचिंतक हैं.

जब शगुन चाची के पैर छूने झुकी, तो चाची ने उसे गले लगा लिया और कान में धीरे से फुसफुसाया, "तूने जो हिम्मत दी है, उसे मैं संभाल कर रखूँगी शगुन. तू अपनी चिंता करना, मेरी नहीं."

गाड़ी स्टार्ट हुई. चाचा खिड़की के पास आकर खड़े हो गए, "शगुन बेटा, वहाँ पहुँचकर फोन करना. और हाँ, कुछ भी चाहिए हो तो अपने इस चाचा को याद करना. तुरन्त किसी से भी भिजवा देंगे. हम हैं न!" उनके स्वर में एक ऐसी 'ओवर-एक्टिंग' थी जो शगुन को भीतर तक चुभी, फिर भी उनकी इस हरकत पर हँसी आयी, पर वह मुस्कुराकर रह गयी.

“हाँ चाचा, आप सक्षम हैं, बस आप चाची का ख्याल रखना.” शगुन ने कहा.

जैसे ही कार चली, शगुन ने पीछे मुड़कर उस पुराने घर को देखा. उसे लगा कि वह वहां से हारकर नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक चिंगारी' छोड़कर जा रही है. अब वहां 'अनुमान' और 'मर्यादा' के नाम पर होने वाले जुल्मों को एक 'प्रत्यक्ष' चुनौती मिलने वाली थी.

  ... क्रमशः

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

वैचारिक आग

पिंजरा और पंख-30
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
आयुष के जाने के बाद कमरा अचानक बड़ा लगने लगा. कल तक यह कमरा दो दोस्तों की वैचारिक दुनिया था, जहाँ वे चाचा के पुराने ख्यालों का मजाक उड़ाते थे और अपने सपने बुनते थे. अब वहां सिर्फ सन्नाटा था, जिसे नीचे लिविंग रूम से आती चाचा की ऊँची आवाज बार-बार तोड़ रही थी.

लिविंग रूम में फिर से 'पवित्रता' और 'अनुमान' लौटने लगे थे. चाचा किसी पंडित से फोन पर बात कर रहे थे, "हाँ महाराज, पितृदोष है तो क्या हुआ? आप तो बस उपाय बताइए जिससे कुल का वारिस सुरक्षित रहे. पिछली बार की गलती नहीं दोहरानी है."

शगुन के कान खड़े हो गए. 'पिछली बार की गलती'—चाचा का मतलब साफ था कि वे लड़कियों के जन्म को 'गलती' मानते थे. उसके मन में कड़वाहट उभर आई. वह अपनी किताब बंद की कर बाहर निकल आई.

रसोई में चाची को आज फिर एक विशेष काढ़ा पिलाया जा रहा था. मम्मी पास खड़ी थीं, उनकी आँखों में दुविधा थी पर वे कुछ बोल नहीं रही थीं.


"चाची, यह क्या है?" शगुन ने पास आकर पूछा.

"बेटा, तेरे चाचा लाए हैं. कहते हैं इसे पीने से गर्भ पुष्ट रहता है और... संतान तेजस्वी होती है," चाची ने बुझे हुए स्वर में कहा.

शगुन ने प्याले की गंध सूंघी. वह किसी जड़ी-बूटी जैसा तीखा और अजीब था. "चाचा, आप बिना किसी डॉक्टरी सलाह के यह क्या पिला रहे हैं?"

रसोई की दहलीज पर खड़े चाचा अपनी भौंहें सिकोड़कर बोले, "शगुन, हर चीज डॉक्टर की सलाह से नहीं चलती. यह पीढ़ियों का तजुरबा है. तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, घरेलू मामलों में दखल मत दो."

"घरेलू मामला या अंधविश्वास, चाचा?" शगुन का स्वर ऊंचा हो गया. "आप चाची की सेहत के साथ खेल रहे हैं सिर्फ इसलिए कि आपको 'दीपक' चाहिए? अगर इस काढ़े से चाची को कुछ हो गया तो?"

चाचा ने गुस्से में लिविंग रूम में अखबार पढ़ रहे बड़े भाई की ओर देखा. "भाई साहब, देखिए शगुन को! कैसे जुबान लड़ा रही है? कल तक ठीक थी, आयुष को कोटा छोड़कर आने के बाद से इसके तेवर ही बदल गए हैं. आप चुप क्यों हैं?"

गुप्ताजी ने अखबार नीचे किया. शगुन को लगा कि शायद वे फिर 'घर की शांति' वाला राग अलापेंगे. लेकिन दरा में किया वादा उनके भीतर कहीं जाग रहा था. उन्होंने चश्मा उतारा और शांत स्वर में कहा, "अनिल, शगुन ने सही कहा. बिना डॉक्टर से पूछे ऐसी चीजें देना ठीक नहीं है. नीतू को आराम की जरूरत है, इन सब प्रपंचों की नहीं."

रसोई में सन्नाटा छा गया. यह पहली बार था जब गुप्ताजी ने अनिल चाचा की 'विशेषज्ञता' को नकारा था. चाचा का चेहरा तमतमा उठा. उन्हें लगा जैसे उनके किले की एक ईंट खिसक गई हो. वे बिना कुछ कहे जूते पहनकर पैर पटकते हुए घर के बाहर निकल गए. उनके जूतों की आवाज घर के तनाव को बयान कर रही थी.

चाचा के जाने के बाद दीवार से लगकर खड़ी मम्मा काँपते हाथों से आटा ढँकने लगी. उनकी आँखों में गहरा डर था. चाची उनके कमरे में चली गईं. मम्मा शगुन खींचकर एक कोने में ले गयीं.

"यह क्या किया तूने शगुन? क्यों बात को इतना बढ़ा दिया?" उनकी आवाज़ दबी हुई थी, जैसे दीवारें भी सुन रही हों.

शगुन ने हैरानी से माँ को देखा, "माँ, आप देख रही थीं कि वे चाची को बिना डॉक्टरी सलाह के क्या पिला रहे थे. क्या आप चाहती थीं कि मैं चुप रहूँ?"

"अरे बेटा, घर-गृहस्थी में इतना तो चलता है," सरोज ने माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए कहा. "तू तो अगले महीने बनस्थली चली जाएगी. आज चाचा के अहंकार को चोट लगी है. वे इसका बदला चाची पर निकालेंगे. उन्हें ताने देंगे, उन्हें तंग करेंगे. तेरे जाने के बाद यहाँ शांति नहीं, एक अंतहीन क्लेश बचेगा."

सरोज का यह 'भीरु तर्क' शगुन के भीतर तेजाब की तरह उतरा. उसे समझ आया कि इस घर में अन्याय केवल चाचा नहीं कर रहे थे, बल्कि माँ की 'मौन सहमति' और 'डर' भी उस अन्याय को से रहा था.

शगुन माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर दृढ़ता से बोली, "माँ, ऐसी 'शांति' कुछ नहीं बदलेगा. चाचा तो अभी भी चाची को कर रहे हैं—मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से. बस फर्क इतना है कि चाची अकेली सह रही थीं, अब उन्हें पता है कि कोई उनके हक के लिए खड़ा हो सकता है."

"तू नहीं समझेगी. हम औरतें ससुराल में अपनी मर्जी से नहीं, अपनी किस्मत से आती हैं. और किस्मत से लड़ना महंगा पड़ता है."

"माँ, किस्मत से नहीं, हम उस सोच से लड़ रहे हैं जो खुद को बेबस मानने पर मजबूर करती हैं," शगुन ने अंतिम वार किया. "मैं बनस्थली जाने से पहले चाची को इतना मजबूत बनाकर जाऊँगी कि वे खुद अपने लिए खड़ी हो सकें. लड़ना महंगा पड़ता है माँ, लेकिन घुट-घुट कर जीना उससे भी ज्यादा महंगा है."

सरोज चुप हो गई, उसके पास शगुन के इस 'प्रत्यक्ष' तर्क का कोई उत्तर नहीं था. उसे लगा जैसे उसकी अपनी बेटी उससे कई साल बड़ी हो गई है. शगुन ऊपर चली गई, पर उसने महसूस किया कि उसकी अनुपस्थिति में चाची का कवच और भी मजबूत होना चाहिए.

शगुन चाची को लेकर अपने कमरे में आई. उन्हें बिस्तर पर बैठाया, उनकी आँखों में आंसू थे.

"शगुन, तू क्यों लड़ती है इनसे? ये नहीं बदलेंगे," चाची ने सिसकते हुए कहा.

शगुन ने चाची के हाथ थाम लिए. "बदलना तो पड़ेगा चाची. अगर आज हम नहीं बोले, तो आने वाली संतान भी इसी घुटन में पैदा होगी. अगर वह लड़की हुई, तो उसे जन्म से पहले ही 'गलती' मान लिया जाएगा, और अगर लड़का हुआ, तो उसे 'मर्दानगी' के पिंजरे में कैद कर दिया जाएगा. मैं नहीं चाहती कि आयुष की तरह कोई और बच्चा भी सिर्फ 'वारिस' बनने के लिए जिए."

चाची ने शगुन को गौर से देखा. उन्हें लगा जैसे उनके सामने शगुन नहीं, बल्कि वह हिम्मत खड़ी है जो वे खुद कभी नहीं जुटा पाईं.

रात को जब शगुन सोने के लिए लेटी, तो उसे महसूस हुआ कि अब वह अकेली नहीं है. पापा का साथ मिलना एक छोटी जीत थी, लेकिन वह जानती थी कि असली लड़ाई अभी बाकी है. रात गहरा गयी थी, और उस पुराने घर की दीवारों में अब 'मर्यादा' के पहरों के खिलाफ एक वैचारिक आग सुलगने लगी थी.
 ... क्रमशः