देहरी के पार, कड़ी - 49
बुधवार रात प्रिया थकी हुई तो थी ही एमबी में खाना खा लेने से उसे नींद घेरने लगी थी. वह आकाश से बात करना चाहती थी, पर एक अजीब सी हिचकिचाहट ने उसे रोक लिया. गुरुवार की शाम घर पहुँचते ही प्रिया ने आकाश को फोन लगाया, मन में हिचकिचाहट अब भी थी. वह जानती थी कि आकाश अपनी 'मर्यादा' और 'समाज' वाले तर्क पर अडिग है, लेकिन उसका मन यह मानने को कतई तैयार नहीं था कि आकाश मुंबई आए और उसके यहाँ न आकर सीधे किसी अनजान गेस्ट हाउस में चला जाए.
"आकाश, मैं तुम्हारी बात का सम्मान करती हूँ," प्रिया ने फोन पर धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, "लेकिन जयपुर में जिस तरह तान्या और मम्मी-पापा ने मुझे लगभग जबरन तुम्हारे घर रोक लिया था. उसके बाद दो दिन और तीन रातें मैं तुम्हारे परिवार के साथ रही. मुझे लगने लगा था कि मैं उस परिवार का अभिन्न हिस्सा हूँ. मुझे यह सोचकर ही बुरा लग रहा है कि तुम सुबह बोरिवली स्टेशन पर उतरोगे और वहाँ से टैक्सी करके सीधे गेस्ट हाउस चले जाओगे. लगभग बीच में मेरा फ्लैट पड़ेगा और तुम मुझसे मिले बिना निकल जाओगे.”
“लेकिन प्रिया....” आकाश ने कुछ कहने की कोशिश की थी. लेकिन प्रिया ने उसे बोलने नहीं दिया.
“कुछ नहीं, तुम्हारी ट्रेन पहुँचने के पहले मैं बोरिवली स्टेशन पहुँच रही हूँ. वहाँ से हम सीधे मेरे फ्लैट आएंगे. तुम थोड़ा आराम करना, नाश्ता करना और फिर तैयार होकर अपने गेस्ट हाउस निकल जाना. क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते?"
फोन के दूसरी तरफ सन्नाटा था. आकाश को समझ नहीं आया कि वह प्रिया की इस छोटी सी जिद का क्या जवाब दे. शायद वह उसके भावनात्मक तर्क को काट नहीं पा रहा था. कुछ पल बाद उसकी आवाज़ आई, "ठीक है प्रिया. मैं रविवार सुबह बोरिवली पहुँच रहा हूँ. तुम लेने मत आना, मैं टैक्सी से पहुँच जाऊँगा."
प्रिया मुस्कुराई. "नहीं, मैं स्टेशन आ रही हूँ. वरना तुम टैक्सी में बैठे मेरे फ्लैट रास्ता ढूंढ रहे होगे. तुम परेशान होकर सीधे गेस्ट हाउस का रास्ता भी पकड़ सकते हो."
“ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी.” आकाश ने कहा, प्रिया ने उसके लिए कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा था.
रविवार, 19 मई की सुबह. बोरिवली स्टेशन आने के पहले ही आकाश अपना सामान लिए डिब्बे के दरवाजे पर आकर खड़ा हुआ. मुंबई की हवा में हमेशा रहने वाली नमी और समुद्र की नमकीन गंध उसके नथुनों में घुस गई. ट्रेन की गति धीमी हुई, वह प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर जा रही थी. वहाँ खड़े लोगों के बीच उसे प्रिया दिखाई दी, तो उसे लगा जैसे इस भीड़ भरे अनजान शहर में उसका कोई अपना है. प्रिया के चेहरे पर एक ऐसी राहत थी जो पिछले कई हफ्तों के तनाव के बाद पहली बार दिखाई दी थी.
प्रिया के फ्लैट पर पहुँचते ही माहौल बदल गया. जयपुर में उसके घर बिताए गए दो दिन बहुत तनाव के थे. तब उसे प्रिया पूरी तरह एक जिम्मेदारी की तरह लगी थी और जब उसने उसे मुंबई आने के लिए एयरपोर्ट छोड़ा था तो उस जिम्मेदारी को ठीक से निभा देने और उससे मुक्ति के अहसास के साथ एक राहत महसूस हुई थी. उसके बाद यह पहली बार था जब वे किसी 'लैपटॉप स्क्रीन' या 'ऑफिस कॉल' के बिना आमने-सामने थे. प्रिया ने पोहा और चाय बनाई. नाश्ते की मेज पर बातें कम थीं और एक-दूसरे की उपस्थिति का अहसास ज़्यादा. आकाश को तैयार होते देख प्रिया को महसूस हुआ कि जिस व्यक्ति को उसने अब तक केवल एक 'सहकर्मी' के रूप में देखा था, वह अब उसके निजी जीवन की 'देहरी' के भीतर कदम रख चुका है.
वहाँ कोई अंतरंगता नहीं थी, बस एक दूसरे के प्रति अगाध सम्मान था. आकाश की वही सादगी, उसकी वही मर्यादित बातचीत, प्रिया को बार-बार यह अहसास करा रही थी कि उसका चुनाव गलत नहीं है. आकाश जब तैयार होकर बाहर निकला, तो प्रिया ने उसे गौर से देखा. "मुंबई तुम्हें थोड़ा बदलेगी आकाश, पर उम्मीद है तुम अपनी यह सादगी बचाकर रखोगे."
आकाश बस मुस्कुराया. "कोशिश तो यही रहेगी."
साढ़े बारह बजे दोनों फ्लैट से निकले. प्रिया उसे सीधे 'मेवाड़ भोजनालय' (MB) ले गई. वह चाहती थी कि आकाश उसकी उस दुनिया को देखे जहाँ उसकी अनेक शामें कटी थीं, जहाँ उसने मेहनतकशों के एक अलग ही रूप के साक्षात्कार किए थे.
भोजनालय में हमेशा की तरह हलचल थी. रामजी काका काउंटर पर बैठे हिसाब देख रहे थे. प्रिया को एक युवक के साथ देखकर उनकी अनुभवी आँखों में एक चमक सी कौंधी.
"काका, ये आकाश हैं. जयपुर से आए हैं और कल से अपनी नई कंपनी जॉइन कर रहे हैं," प्रिया ने परिचय कराया.
रामजी काका ने उठकर आकाश का स्वागत किया. "आओ बेटा, बैठो. प्रिया बिटिया ने तुम्हारे बारे में बताया था." उन्होंने आकाश को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर प्रिया की ओर देखकर बोले, "प्रिया, तुम्हारा दोस्त अच्छा है. इसके के चेहरे पर वैसी ही ईमानदारी है जैसी मेवाड़ भोजनालय के खाने में."
सुनकर प्रिया हँस पड़ी और आकाश थोड़ा झेंप गया, पर रामजी की बेबाकी ने उसे सहज कर दिया. लंच के दौरान रामजी काका ने बातों-बातों में उसे ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष के बारे में भी बताया. "बेटा, यह शहर सिर्फ भागता नहीं है, यह लड़ता भी है. प्रिया ने इस लड़ाई में जो भूमिका निभाई, वह किसी सिपाही से कम नहीं थी."
आकाश ने प्रिया की ओर देखा. उसे पहली बार अंदाज़ा हुआ कि जिस लड़की को वह केवल कोडिंग और फाइलों में उलझी हुई समझता था, वह अंधेरी की सड़कों पर मजदूरों के लिए उम्मीद की एक किरण बनी हुई थी. प्रिया के प्रति उसका सम्मान और गहरा हो गया.
डेढ़ बज चुका था. लंच खत्म हुआ. दोनों भोजनालय के बाहर आकर खड़े हुए, कुछ ही दूर एक आटोरिक्शा खड़ा था जिसके ड्राइवर की आँखें ग्राहक तलाश रही थीं. प्रिया उसे आवाज देने ही वाली थी कि उसकी नज़र इन दोनों पर पड़ी और उसने अपना ऑटोरिक्शा इन दोनों के पास आकर रोक दिया.
ड्राइवर अपना मुहँ बाहर निकालकर बोला. “ नमस्ते दीदी, बैठो. कहाँ चलना है?”
“बब्बन भाई, मैं नहीं, आकाश जा रहे हैं.” प्रिया ने आकाश की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये मेरे मित्र हैं, जयपुर से आए हैं. इन्हें विक्रोली में अपनी कंपनी के गेस्ट हाउस जाना है. आप छोड़कर आइएगा.”
“बिलकुल, दीदी.”
आकाश, प्रिया और आटोरिक्शा चालक के बीच के वार्तालाप को चकित होकर देख रहा था. उसके विस्मय को देखकर प्रिया ने आकाश को कहा, “आकाश, बब्बन भाई आटोरिक्शा चालक यूनियन के कार्यकर्ता हैं. ये तुम्हें ठीक गेस्ट हाउस ले जाकर छोड़ेंगे.”
आकाश के चेहरे से विस्मय अब कम नहीं हुआ था. वह प्रिया के व्यक्तित्व के विस्तार को देखते हुए ही आटोरिक्शा में बैठ गया.
"प्रिया, अब मुझे निकलना चाहिए. गेस्ट हाउस में रिपोर्ट करना है और कल जॉइनिंग भी है," आकाश ने कहा.
“ठीक, आकाश, फिर मिलते हैं.”
"ज़रूर. और तुम्हारी मीटिंग के लिए ऑल द बेस्ट," आकाश ने टैक्सी में बैठते हुए कहा.
टैक्सी जैसे ही आँखों से ओझल हुई. दोपहर की धूप अब तेज़ हो गई थी. उसके मन में आकाश के साथ बिताए उन छह घंटों की कोमलता ताज़ा थी, लेकिन तभी उसके मोबाइल की स्क्रीन पर प्रशांत बाबू का मैसेज चमका— "प्रिया, हम पहुँच गए हैं. आ रही हो न."
प्रिया ने एक लंबी सांस ली. फोन पर प्रशांत बाबू को कॉल करके कहा, “मैं दस मिनट में पहुँच रही हूँ.”
... क्रमशः