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शनिवार, 18 अप्रैल 2026

परछाइयों का पीछा

देहरी के पार, कड़ी - 27
जनरल मैनेजर से सफल जिरह के बाद ईसीआई के मजदूरों का मनोबल सातवें आसमान पर था. एएसएल के दफ्तर से बाहर निकलने के बाद मजदूरों के लगाए नारों में जो खनक थी, वह सालों के शोषण के विरुद्ध एक हूँकार जैसी लग रही थी. शामियाने के नीचे अब डर की जगह जीत की चर्चा थी. वह अब केवल धरना स्थल नहीं, बल्कि एक 'कम्युनिटी सेंटर' बन चुका था जहाँ मजदूर अपने हक की बारीकियाँ समझ रहे थे.

प्रिया वहीं से अपने फ्लैट के लिए रवाना हुई. रास्ते भर वह जिरह के दृश्यों को जेहन में दोहराती रही. उसे अपनी नई पहचान—काली पैंट, सफेद शर्ट और वह कोट—किसी कवच जैसी लग रही थी. उसने महसूस किया कि वह 'विक्रांत के डर' की देहरी के बहुत पार निकल आई है. अब उसे विक्रांत की याद डराती नहीं, बल्कि उसकी बेवकूफी भरी हरकतों पर उसे हँसी आने लगी थी.

गुरुवार, 11 अप्रैल को मुख्य श्रम आयुक्त (CLC) के यहाँ समझौता वार्ता नियत थी. प्रबंधन दो बार से वार्ता में नहीं आ रहा था. इसे कलेक्टिव बारगेनिंग में असहयोग मानते हुए श्रम विभाग अनुचित श्रम आचरण के लिए फैक्ट्री की मालिक कंपनी के निदेशकों पर अपराधिक मुकदमा चला सकता था. प्रशांत बाबू और यूनियन की टीम को उम्मीद थी कि आपराधिक मुकदमे के डर से शायद प्रबंधन बातचीत की मेज पर आ जाए. लेकिन जैसा कि अंदेशा था, प्रबंधन नदारद रहा. रामजी काका ने जब शाम को फोन पर प्रिया को बताया कि श्रम आयुक्त ने जनरल मैनेजर और डायरेक्टरों को 'आपराधिक नोटिस' जारी कर दिए हैं, तो प्रिया को एक विधिक जीत का अहसास हुआ. इसका मतलब था कि अब प्रबंधन पर मजदूरों को अंतरिम राहत देने के लिए दबाव बढ़ेगा.

शुक्रवार की रात जब प्रिया अपने फ्लैट पर लौटी, तो थकान के बावजूद उसने वकील चव्हाण से फोन पर बात की. उन्होंने एक नई चुनौती सामने रख दी, "प्रिया, आज प्रबंधन ने शपथ पत्र पेश नहीं किए. उन्होंने चतुराई से समय मांग लिया. हालांकि एएसएल ने उन पर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है, लेकिन असली खेल 'समय' का है. 15 मार्च को नोटिस मिला था और 14 मई की डेडलाइन में अब सिर्फ 29 दिन बचे हैं. वे मामले को लटकाना चाहते हैं ताकि 'डीम्ड क्लोजर' (Deemed Closure) की कानूनी अनुमति मिल जाए."

रविवार की शाम IIDEA ऑफिस में जब बैठक चल रही थी, तभी प्रिया का फोन घनघना उठा. कोटा से पापा की कॉल थी. प्रिया का दिल धड़क गया, क्योंकि पापा उसे रात नौ बजे से पहले कभी फोन नहीं करते थे.

प्रिया ने कांपते हाथों से फोन उठाया और उसे स्पीकर पर लिया. "बेटा, कल से घर के बाहर एक काली गाड़ी खड़ी है," पापा की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, "आज दो आदमी आए थे, पूछ रहे थे कि क्या तुम वाकई किसी लॉ फर्म में काम कर रही हो? वे मयंक के बिजनेस के बारे में भी सवाल पूछ रहे थे. मयंक थोड़ा डरा हुआ है."

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. प्रशांत बाबू और चव्हाण साहब ने एक-दूसरे की ओर देखा. प्रिया को समझ आ गया कि 10 अप्रैल की जिरह के बाद प्रबंधन ने उसकी 'जड़ें' खोदना शुरू कर दिया है. वह विधिक लड़ाई को व्यक्तिगत हमले से रोकने की कोशिश में जुटा था.

प्रिया ने तुरंत जयपुर से आकाश को कॉन्फ्रेंस कॉल पर लिया. आकाश ने स्थिति की गंभीरता भांपते हुए कहा, "प्रिया, तुम विचलित मत हो. मैं आज रात की बस से कोटा निकल रहा हूँ. मैं देखूँगा कि ये 'जासूस' किस एजेंसी के हैं. मयंक और अंकल अकेले नहीं हैं. तुम बस अपनी इस लड़ाई पर ध्यान दो."

आकाश के आश्वासन ने प्रिया को संबल दिया, पर उसे अहसास हुआ कि ईसीआई प्रबंधन अब केवल उसके 'डेटा' से नहीं, उसके 'अस्तित्व' से लड़ रहा है.

बैठक खत्म होने के बाद जब यूनियन के सदस्य चले गए, तब रामजी काका और प्रशांत बाबू अकेले रह गए. रामजी काका ने धीमी आवाज़ में अपना डर साझा किया जो पिछले कुछ दिनों से उन्हें खाए जा रहा था.

"प्रशांत, हड़ताल को आज 34 दिन पूरे हो गए. मार्च की आखिरी पगार जो मजदूरों को मिली थी, वह अब अंतिम सांसें ले रही है. कल फैक्ट्री गेट की पिकेटिंग पर कल्ला और रामदीन राशन की मदद के बारे में पूछ रहे थे. शिंदे सही कहता था, मुंबई की दूरियों में 'सामूहिक रसोई' संभव नहीं है, लेकिन हमें इन 350 परिवारों तक आटा-दाल पहुँचाने का कोई रास्ता ढूंढना होगा. स्वाभिमान की लड़ाई भूखे पेट नहीं लड़ी जा सकती."

प्रशांत बाबू ने लंबी सांस ली, "यह दोहरी घेराबंदी है काका. एक तरफ क्लोजर की कानूनी डेडलाइन और दूसरी तरफ मजदूरों की खाली होती रसोइयाँ. इन्होंने प्रिया के परिवार को डराकर उसे तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है. सरकार मामले को एक दो रोज में न्याय निर्णयन के लिए लेबर कोर्ट को भेजेगी, हड़ताल और तालाबंदी पर पाबंदी लगाएगी. ऐसे में मजदूरों को काम पर जाना होगा. बस मिनिस्टर दबाव डालकर कुछ अंतरिम राहत दिला दे तो ठीक, नहीं तो हमें आइडिया से सम्बद्ध यूनियनों से मदद लेनी पड़ेगी."

प्रिया, जो फाइलें समेटने के लिए कमरे में दाखिल हुई थी, उसने यह बात सुन ली. उसकी आँखों में आँसू नहीं, बल्कि एक योद्धा वाली चमक थी. उसने मेज पर अपना लैपटॉप रखते हुए कहा, "सर, अगर वे मेरे घर तक पहुँच रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हम जीत रहे हैं. वे बुरी तरह डरे हुए हैं. जिरह के दौरान जब उनकी चोरी पकड़ी गई, तभी उन्होंने यह रास्ता चुना है. अब हमें रुकना नहीं है."

प्रिया ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अब और भी मजबूती से 'निजी दौरों और फर्जी खर्चों' का ब्यौरा अदालत के पटल पर रखने की तैयारी करेगी. उसे अहसास हुआ कि उसकी जड़ें केवल कोटा की मिट्टी में नहीं, बल्कि मुंबई के उन मजदूरों के चूल्हों की आग में भी हैं जो आज उसकी ओर उम्मीद से देख रहे थे.

प्रिया ने मन ही मन खुद से कहा— 'देहरी के उस पार का डर अब बीत चुका है, अब इस पार की ज़मीन को मज़बूत करना ही मेरा इष्ट है.'
... क्रमशः

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

खेद

कथा श्रृंखला : देहरी के पार
प्रिय पाठकों,

मेरा मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है. मैंने बचपन से ही बहुत पढ़ा, और जब भी विदेशी साहित्य पढ़ा तो उनकी 'तथ्यात्मक सटीकता' ने मुझे प्रभावित किया. इसके उलट, अक्सर भारतीय फिक्शन, सिनेमा और टीवी में स्थान, काल, विज्ञान और विशेषकर 'कानूनी प्रक्रियाओं' को लेकर गंभीर त्रुटियाँ देखने को मिलती हैं. एक पाठक अक्सर इन जानकारियों को सत्य मान लेता है, जिसका खामियाजा उसे वास्तविक जीवन में उठाना पड़ सकता है.

एक लेखक और एक पेशेवर वकील होने के नाते, मेरा यह सदैव प्रयास रहता है कि मेरे लेखन में 'फिक्शन' भले हो, पर 'तथ्य' पूरी तरह सत्य हों. मेरे ब्लॉग 'अनवरत' पर चल रही कथा श्रृंखला "देहरी के पार" इसी शोध और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी जा रही है. इसकी हर कड़ी बिल्कुल ताज़ा होती है—लिखने और प्रकाशित करने के बीच मुश्किल से 24 से 48 घंटों का अंतर होता है.

परंतु, कभी-कभी शोध की गहनता या कुछ अपरिहार्य व्यवधानों के कारण यह लय टूट जाती है. कल इसी कारण और कुछ प्रोफेशनल व्यस्तता के कारण श्रृंखला की अगली कड़ी समय पर प्रकाशित नहीं हो सकी. मुझे पता है कि आप उत्सुकता से इसका इंतज़ार करते हैं और आपके व्यक्तिगत संदेशों ने मुझे आपकी इसी प्रतीक्षा और स्नेह का अहसास कराया.

आपके समय और इस 'इंतज़ार' के प्रति मैं अपनी संवेदनशीलता व्यक्त करता हूँ. पाठकों को हुई निराशा के लिए मुझे खेद है. मेरी कोशिश रहेगी कि यह सिलसिला नियमपूर्वक चलता रहे और मैं अपने शोध पूर्ण लेखन के माध्यम से निरंतर आपके साथ बना रहूँ.

स्नेह और आभार,

@दिनेशराय द्विवेदी

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

सचाई का घेरा

देहरी के पार, कड़ी - 26
रविवार को सीनियर वकील रमेश चव्हाण के साथ हुई मीटिंग में तय हुआ कि एएसएल (असिस्टेंट सैक्रेटरी लेबर) के यहाँ जीएम से जिरह में प्रशांत बाबू वकील साहब के साथ रहेंगे. वकील चव्हाण का आग्रह था कि ‘यदि प्रिया अपने एनालिसिस के चार्टों और ग्राफों सहित उनकी सहायक के रूप में उपस्थित रहे तो बेहतर होगा.’ यह कहते ही प्रशांत बाबू यूनियन के अध्यक्ष और मंत्री प्रिया की ओर देखने लगे. अभी तक प्रिया को एक्सपोज नहीं करना तय था. लेकिन ऐसा करने से वह एक्सपोज हो सकती थी. तभी प्रिया खुद बोल पड़ी. “मैं तैयार हूँ. बस मुझे एक छुट्टी लेनी पड़ेगी, वह मैं ले लूंगी.”

“नहीं प्रिया, अभी तुम्हारा एक्सपोजर ठीक नहीं होगा.” प्रशांत बाबू ने कहा.

“कामरेड, मैं उस फेज से निकल चुकी हूँ, मुझे अब अपने एक्सपोजर का कोई भय नहीं, और उसके बिना काम को आगे बढ़ाना भी संभव नहीं होगा.”

“कोई बात नहीं, हम प्रिया को एक्सपोज नहीं होने देंगे.” वकील चव्हाण बोले, “प्रिया तुम्हारे पास सफेद शर्ट और काली पैंट तो होगी ही, काला कोट या स्लीवलेस जैकेट भी हो तो और बढ़िया.”

“मैं समझ गयी.” प्रिया ने मुसकुराते हुए कहा, “आप मुझे अपना असिस्टेंट वकील दिखाना चाहते हैं. बस एक कोट की कमी है, तो कल मैं एक काला समर कोट खरीद लूंगी. अब तक यूनियन दफ्तर में जिन्होंने मुझे देखा है वे भी मुझे आपका असिस्टेंट वकील समझने लगेंगे.”

तय हुआ कि जिरह के वक्त प्रिया वकील के आउटफिट में चव्हाण की सहायता के लिए उपलब्ध रहेगी.

मंगलवार की सुबह मुंबई के एएसएल के दफ्तर में भारी गहमागहमी थी. प्रिया वकील चव्हाण की सहायक वकील के आउटफिट में मौजूद थी. बाहर चिलचिलाती धूप में ईसीआई फैक्ट्री के करीब साठ-पैंसठ मज़दूर शांत खड़े थे. वे नारेबाजी करते हुए वहाँ पहुँचे थे, लेकिन दफ्तर के बाहर पहुँचते ही उन्होंने नारेबाजी बंद कर दी थी. उनकी खामोश उपस्थिति भी अधिकारियों पर एक नैतिक दबाव बना रही थी.

अंदर, एएसएल के कक्ष में एयर-कंडीशनर की आवाज़ के बीच तनाव साफ़ महसूस किया जा सकता था. मेज के एक तरफ फैक्ट्री के जनरल मैनेजर (GM) और उनके कानूनी सलाहकार बैठे थे, और दूसरी तरफ वकील चव्हाण के साथ प्रशांत बाबू और प्रिया.

कार्यवाही शुरू हुई. वकील चव्हाण ने प्रिया का तैयार किया गया चार्ट पेश किया, जिसमें 'मैनेजमेंट कंसल्टेंसी' के नाम पर हुए खर्चों का ब्यौरा था.

चव्हाण साहब ने कड़क आवाज़ में पूछा, "मिस्टर जीएम, पिछले साल आपकी कंपनी ने 'एस.आर. एसोसिएट्स' को 18 लाख रुपये का भुगतान किया. क्या आप बता सकते हैं कि इस फर्म ने आपको क्या विशेष सलाह दी थी जिससे उत्पादन बढ़ा?"

जीएम साहब थोड़े हकलाए, "वह एक तकनीकी सलाहकार फर्म है. हमने उनसे सलाह ली थी कि हम कैसे प्रोडक्शन की लागत कम कर सकते हैं. जिससे हमारा घाटा समाप्त हो सके."

चव्हाण साहब ने तुरंत एक कागज़ मेज पर पटका, "मजे की बात यह है कि इस फर्म का पता वही है जो आपकी पत्नी के मायके का है, और इसकी एकमात्र डायरेक्टर आपकी पत्नी स्वयं हैं. क्या यह मजदूरों का पैसा निकालकर अपनी जेब भरने की 'फाइनेंशियल इंजीनियरिंग' नहीं है?"

पूरे कक्ष में सन्नाटा छा गया. एएसएल ने चश्मा उतारकर जीएम को गौर से देखा. प्रबंधन के वकील ने हस्तक्षेप करना चाहा, लेकिन एएसएल ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया.

“क्या यह सही है?”, इस बार खुद एएसएल ने जीएम से पूछा.

“जी यह बात सही है. लेकिन उस फर्म ने तकनीकी सलाहकारों की सलाह पर ही रिपोर्ट दी थी.”

“क्या आप अपनी पत्नी और उन तकनीकी सलाहकारों को उस रिपोर्ट के साथ पेश कर सकते हैं?” एएसएल ने पूछा?

“मुझे अपनी पत्नी से पूछना पड़ेगा. उनके द्वारा एंगेज किए गए सलाहकार अब भी उनके साथ काम कर रहे हैं या नहीं.”

“ठीक है, आप कोशिश कीजिए.”

सुनवाई के दौरान जब 15 मिनट का ब्रेक हुआ, तो प्रिया गलियारे में आकर खड़ी हुई. तभी उसके फोन की घंटी घनघना उठी. जयपुर से आकाश का कॉल था.

"हेलो प्रिया! जयपुर में बहुत गर्मी है, पर सुना है मुंबई में तुम्हारी बहस ने गर्मी बढ़ा रखी है?" आकाश की आवाज़ में हमेशा की तरह वही बेफिक्री थी.

प्रिया ने लंबी सांस ली, "आकाश, यहाँ हम सच के बहुत करीब हैं. आज पहली बार उन सफ़ेदपोश चोरों के चेहरे पीले पड़े देखे. बस दुआ करो कि ये विधिक लड़ाई समय पर पूरी हो जाए. और तुम्हें एक बात और बताऊँ. मैं आज सुनवाई में सीनियर वकील चव्हाण के असिस्टेंट वकील के आउटफिट में हूँ. इस नए रोल में मजा आ रहा है."

"दुआ साथ है प्रिया. वैसे, कोटा से मयंक का मैसेज था कि तुम बहुत थकी हुई लग रही हो. ध्यान रखना, जीत तब तक अधूरी है जब तक तुम खुद स्वस्थ न रहो. जयपुर आने पर पार्टी पक्की है, पर अभी लड़ाई जीतो!"

आकाश की बातों ने प्रिया के चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी. उसे लगा कि जयपुर की दोस्ती और कोटा की ममता उसके साथ यहाँ मुंबई में इस सुनवाई में मौजूद हैं.

ब्रेक के बाद, प्रिया की टीम ने 'विदेशी यात्राओं' के बिलों का बम फोड़ा. साबित हो गया कि फैक्ट्री के खर्चे पर डायरेक्टर यूरोप की सैर कर रहे थे. एएसएल ने सख्त लहजे में कहा, "प्रबंधन को इन सभी खर्चों का विस्तृत स्पष्टीकरण शपथ पत्र पर देना होगा. क्लोजर की अनुमति केवल घाटा होने पर नहीं, बल्कि 'ईमानदार घाटा' होने पर मिल पाएगी."

शाम चार बजे जब वे एएसएल के दफ्तर से बाहर निकले तो प्रशांत बाबू ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा, "प्रिया, तुम्हारी डेटा माइनिंग ने आज हमें वह बढ़त दिला दी है जिसकी उम्मीद प्रबंधन ने सपने में भी नहीं की होगी. तुम्हारी मेहनत के कारण ईसीआई का मजदूर आज सीना ताने अपने नियोजक के सामने खड़ा है."

प्रिया ने देखा कि सारे मजदूर दफ्तर के गेट के बाहर खड़े हो गए हैं. जैसे ही वे गेट के बाहर उनके बीच पहुँचे उन्होंने जोर से नारा लगाया, “इंकलाब जिन्दाबाद” “हम झूठ को हराएंगे-सचाई को लाएंगे.” प्रशांत बाबू ने अपने दोनों हाथ ऊँचे किए तो मजदूर चुप हुए. उनकी आँखें अब एक नई उम्मीद से चमक रही थीं.
... क्रमशः

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

हमारी जड़ें

देहरी के पार, कड़ी - 25
यह शनिवार प्रिया को करीब एक माह बाद नसीब हुआ था. उसे कहीं नहीं जाना था. लेकिन मुंबई के अंधेरी ईस्ट के जिस फ्लैट में वह रह रही थी, वहाँ उसके लिए बहुत था. फ्लैट की सफाई करनी थी, कपड़ों की धुलाई करनी थी. किराना और दूसरा जो भी सामान समाप्त हो गया था या होने वाला था और जरूरत का जो सामान वह मुम्बई आने के बाद से नहीं खरीद पाई थी, उसकी सूची बनानी थी. समय मिलने पर बाजार से खरीदकर लाना भी था. पिछले चार वीकेंड से वह यूनियन ऑफिस और ईसीआई फैक्ट्री के कामों में व्यस्त रही थी. फिलहाल इन कामों से उसके निजी जीवन का कोई वास्ता न था. लेकिन उसे इन कामों में सुकून मिल रहा था. वह समझ रही थी कि वह जो कर रही है, वह एक सही दिशा में बदलाव के लिए काम है. जिनके साथ वह काम कर रही थी उन्हीं लोगों ने उसे विक्रांत से लड़ने की हिम्मत दी थी और बराबर साथ दिया था. इसी कारण वह उससे निजात पा सकी थी. उसे तो अभी पता तक नहीं था कि विक्रांत अभी भी जेल में है अथवा जमानत पर छूटकर बाहर आ चुका है.

सुबह आठ से दस बजे तक उसने अपनी मैड के साथ मिलकर उसने फ्लैट की सफाई की. इससे उसे यह ठीक-ठीक पता भी लग गया कि उसे बाजार से किन वस्तुओं की खरीद करनी है. सामानों की सूची बनाकर ग्यारह बजे वह बाजार के लिए निकली तो सामान खरीदते हुए करीब एक बजे उसे भूख लगने लगी थी. वह पास ही मेवाड़ भोजनालय जा पहुँची.

रामजी काका वहाँ नहीं थे. लेकिन स्टाफ ने बेटी की तरह उसका स्वागत हुआ. उसने तुरंत खाना लगाने को कहा. उसने खाना शुरू भी नहीं किया था कि रामजी वहाँ पहुँच गए. जब तक उसने खाना खाया, उसके साथ बैठे बात करते रहे. उन्होंने उसके माता-पिता और भाई के बारे में पूछा. आकाश उसके माता-पिता और बहिन तान्या के बारे में पूछा. उसे पिछले दिनों अपनी प्रोफेशनल चुनौतियों और यूनियन के कामों के बीच उन सबसे बात करने का ध्यान ही नहीं रहा था. उधर से भी बस माँ के सिवा किसी का फोन इस बीच नहीं आया था. उसने रामजी काका को यह बात बताई तो वे बहुत नाराज हुए. कहने लगे, “हम बहुत ही अच्छे काम कर रहे हों. लेकिन हमें उन लोगों को कभी भूलना नहीं करना चाहिए जिनसे हमारी जड़ें जुड़ी हैं. थोड़ा सा समय निकाल कर उनसे भी बात करो. जब कुछ नहीं बचता वे ही काम आते हैं.”

काका की बात सुनकर उसकी आँखें नम हो गईं. उसे बहुत संतोष भी हुआ कि यहाँ मुम्बई में कोई तो है जो उसे परिवार के बुजुर्ग की तरह टोक सकता है और सलाह दे सकता है.

वह जब भी कोटा की बात करती तो अक्सर माँ के फोन पर कॉल करती. उसी पर पापा और मयंक से बात हो जाती थी. लेकिन शाम को उसने मयंक को फोन लगाया.

"नमस्ते दीदी! आज आपको मैं कैसे याद आ गया. मैं तो समझा था आप मुझे भूल ही गईं. सुना है आप वहाँ किसी 'मज़दूर नेता' के साथ मिलकर फैक्ट्री बंद करवा रही हैं?" मयंक की आवाज़ में छोटे भाई वाली शरारत थी, तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई, "अरे उसे डरा मत, पूछ खाना खाया कि नहीं!"

प्रिया मुस्कुरा दी. कोटा की उस स्थिर ज़िंदगी और मुंबई के इस उबलते संघर्ष के बीच का अंतर उसे आज साफ़ महसूस हुआ. "मयंक, मैं फैक्ट्री बंद नहीं करवा रही, जो बंद करना चाहते हैं उनसे लड़ रही हूँ. तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. और पापा को मदद करता है या नहीं? और मम्मी को बता दे कि मैं खाने में कभी चूक नहीं करती. आज भी खा लिया है.”

"ये सही है, तू टाइम से खा लिया कर वरना माँ हमें बात नहीं करने देंगी.”

“तू तेरी पढ़ाई की बता”

“दीदी, पढ़ाई भी ठीक है, पापा की मदद भी करता हूँ. अब तो वे कहते हैं, तेरी एम.कॉम. छोड़ और बिजनेस संभाल अब मुझसे इतना काम नहीं होता.”

“वे तो कहेंगे जब तक तू सब नहीं संभाल लेता. पर तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे और इसे पूरा कर. पता नहीं कब ये काम आ जाए.”

“देता हूँ पर आप जल्दी -जल्दी मुझे फोन किया करो. जयपुर से आकाश भाई का फोन आया था वह भी कह रहे थे कि प्रिया को क्या 'कानूनी भूत' सवार हो गया है जो फोन भी नहीं उठाती."

प्रिया ने खिड़की के बाहर देखा. दूर फैक्ट्री की चिमनियाँ रात के अंधेरे में किसी खामोश पहरेदार जैसी लग रही थीं. "मयंक, यहाँ जो मैं देख रही हूँ, वह किसी किताब में नहीं लिखा. जब हज़ारों लोगों का हक छीना जाता है, तो चुप रहना अपराध लगता है. माँ से कहना मैं ठीक हूँ. उनसे कल बात करूंगी."

अगली शाम को यूनियन ऑफिस में एक गंभीर बैठक हुई. रामजी ने सुझाव रखा, "प्रशांत बाबू, हड़ताल को चार सप्ताह हो चुके हैं. मजदूरों के घरों में राशन कम होने लगा होगा. क्यों न हम फैक्ट्री गेट पर जहाँ पिकेटिंग करते हैं वहीं 'सामूहिक रसोई' शुरू कर दें?"

प्रशांत बाबू ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और कुछ देर सोचा. यूनियन के सचिव शिंदे ने तुरंत टोक दिया, "काका, विचार अच्छा है पर व्यावहारिक नहीं. हमारे मज़दूर कल्याण और टिटवाला तक फैले हैं. वे यहाँ अकेले खाने आएंगे तो पीछे परिवार क्या करेगा? और आना-जाना खाने से महँगा पड़ेगा. अभी तो पिछले महीने की पगार हाथ में है, सबने हाथ खींचकर खर्च किया है, इसलिए एक महीना तो निकल जाएगा."

शिंदे की बात में दम था. रामजी काका थोड़ा ठिठके, "बात तो सही है शिंदे. लेकिन अगले 40-50 दिनों बाद जब जेब पूरी खाली होगी, तब क्या करेंगे? हमें कोई ऐसा तरीका सोचना होगा जिससे राशन हर घर तक पहुँचे, न कि लोग राशन तक आएँ."

तभी प्रशांत बाबू बोल उठे. “उस बारे में हम अगले सप्ताह बात करेंगे, रामजी. आज हमें क्लोजर वाले मुकदमे की रणनीति पर बात करनी है. चव्हाण भाई नीचे ऑफिस में प्रतीक्षा कर रहे हैं. यह मीटिंग हमें यहीं खत्म करनी होगी.”
... क्रमशः

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

कानूनी तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 24
शुक्रवार लंच के बाद से यूनियन के सैक्रेटरी अपने चार मजदूर साथियों के साथ एडीशनल सैक्रेटरी लेबर (एएसएल) के दफ्तर में बैठे हुए थे. यह दिन ईसीआई फैक्ट्री के प्रबंधन के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था. आज शाम तक एएसएल के सख्त आदेश के दबाव में उन्हें 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' के बिल-वाउचर्स की फाइलें जमा करानी थीं. वे ठीक पौने पाँच बजे पहुँचे, दो बोरे दस्तावेजों से भरे हुए थे, एएसएल के स्टाफ ने एक बोरा अपने यहाँ जमा किया और दस्तावेजों की लिस्ट फाइल के साथ नत्थी कर दी. दूसरा बोरा और दस्तावेजों की सूची यूनियन सैक्रेटरी को दी.

“क्या ये सारे दस्तावेज आपके पास डिजिटल फॉर्म में नहीं हैं?” एएसएल ने पूछा.

“सर हैं तो, पर आपने दस्तावेज पेश करने को कहा था. डिजिटल फॉर्म में पेश करने की हिदायत होती तो हम उसे पेश कर देते.” फैक्ट्री से आए लीगल मैनेजर मनोज भाट ने कहा.

“कोई बात नहीं, हम अब आदेश दे रहे हैं. आप उक्त सभी दस्तावेज डिजिटल फॉर्म में पेन ड्राइव में सेव करके दो प्रति में पेश करें. साथ में भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) की धारा 63 (4) का प्रमाण पत्र भी पेश करें.” एएसएल ने कहा. फिर पूछा, “कब तक कर देंगे?”

“सर, अगली डेट पर पेश कर देंगे.”

“ठीक है, अगले शुक्रवार तक पेश करें?”

“सर, इस आवेदन का फैसला 60 दिन में करके प्रबंधन को सूचित करना है. वरना डीम्ड परमिशन हो जाएगी. पूरे सप्ताह की तारीख देना उचित नहीं होगा. इसे सोमवार को रख लें.” यूनियन सैक्रेटरी ने सप्ताह भर बाद की पेशी नियत करने पर आपत्ति की. फिर भी एएसएल ने यह कहते हुए मंगलवार की तारीख दी कि वे केवल दो ही दिन यहाँ बैठते हैं, शेष दिन उन्हें सेक्रेट्रिएट में बैठकर मंत्रालय का काम निपटाना होता है. उन्होंने आश्वासन दिया कि वे 60 दिन नहीं होने देंगे.

शनिवार दोपहर प्रशांत बाबू, वकील चव्हाण और प्रिया यूनियन दफ्तर में मिले. दस्तावेजों का बोरा खोलकर देखा गया. दस्तावेज बहुत थे; फिजिकल जाँच में कई दिन लग सकते थे. तय किया गया कि डिजिटल रिकॉर्ड मिलने पर ही जाँच की जाए.

प्रिया ने बताया कि, “डिजिटल कॉपी मंगल को मिलेगी. शुक्रवार तक सभी दिन वर्किंग होंगे. उसकी टीम यदि रोज थोड़ा-थोड़ा 'डिटेल्स' मिलान करे तब भी शनिवार के पहले फाइनल करना संभव नहीं होगा.”

वकील चव्हाण साहिब ने बताया कि, “उसके बाद हमें जवाब तैयार करने में दो दिन लग सकते हैं. इसलिए बेहतर है कि जवाब पेश करने की तारीख अगले मंगलवार की ही लें. हम उस दिन जवाब पेश कर देंगे तो प्रबंधक की साक्ष्य के शपथ पत्र पेश करने के लिए फिर शुक्रवार की तिथि मिलेगी. तब तक हड़ताल शुरू हुए 27 दिन और क्लोजर के आवेदन को 20 दिन हो जाएंगे. हमें साक्ष्य के समय बहुत जल्दी करनी पड़ेगी, वरना डीम्ड परमिशन का संकट खड़ा हो सकता है और उसका कोई तोड़ नहीं है.”

मंगलवार को पेन ड्राइव में डिजिटल रेकॉर्ड मिल गया. क्लोजर परमिशन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत करने के लिए योजनानुसार अगले मंगल की पेशी तय कर दी गयी. डिजिटल रिकॉर्ड की पेन ड्राइव उसी दिन प्रिया को पहुँचा दी गयीं. प्रिया ने उसकी चार प्रतियाँ तैयार करके एक खुद रखी और बाकी राहुल, स्नेहा और आदित्य को बाँट दी.

प्रिया को डिनर के बाद रात दस बजे समय मिला. उसने पेन ड्राइव को लैपटॉप में लगा कर दस्तावेज देखना शुरू किया तो उसकी आँखें खुली रह गईं. पिछले पाँच वर्षों में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' को लगातार बढ़ाया गया था. जिस तरह हर साल खर्चे बढ़ते गए थे, उससे यह स्पष्ट हो चुका था कि ये जानबूझकर किया गया है.

अगले शनिवार चारों प्रिया के फ्लैट पर मिले. उन्होंने दस्तावेजों का अपने डिजिटल एनालिसिस रिपोर्ट से अंतिम मिलान शुरू किया. जैसे-जैसे बिलों का मिलान होता गया, सच की परतें खुलती चली गईं. चारों ने मिल कर लंच तक यह काम पूरा कर लिया. चारों बहुत थक गए थे उन्होंने लंच बाहर से मंगा लिया. प्रशांत बाबू से मीटिंग शाम पाँच बजे यूनियन ऑफिस में तय हुई.

यूनियन ऑफिस की मीटिंग में प्रशांत बाबू, ईसीआई यूनियन के अध्यक्ष और सैक्रेटरी तो मौजूद थे ही, उन्होंने वकील चव्हाण साहब को भी बुला लिया था. प्रिया ने उत्साह से बताना शुरू किया, "कॉमरेड प्रशांत, ये देखिए! मैनेजमेंट ने जिस 'कंसल्टेंसी फीस' के नाम पर जिस फर्म को लाखों रुपये भुगतान करना दिखाया है, वह असल में मालिक की पत्नी की एक कागजी फर्म है. ये 'ट्रैवल एक्सपेंस'? ये मजदूरों और स्टाफ के लिए नहीं, बल्कि डायरेक्टरों की विदेश यात्राओं के टिकट हैं जिन्हें कंपनी का बिजनेस खर्च में दिखा दिया गया है."

वकील रमेश चव्हाण ने डिजिटल दस्तावेज वाली पेन ड्राइव और उनके मिलान की पेन ड्राइव अपने ब्रीफकेस में रखते हुए कहा, "हम हर हाल में मंगलवार को प्रबंधन के क्लोजर की परमिशन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत कर देंगे. अगली पेशी पर वे गवाहों के शपथपत्र प्रस्तुत करेंगे. हमें अपने सीए से समान खर्चों के अन्य उद्योगों के ऑडिटेड दस्तावेज प्राप्त करने के लिए केवल एक सप्ताह का समय मिलेगा. जिससे अगली पेशी पर हम प्रबंधकों के गवाहों से जिरह कर सकें. हम यह मिलान और दूसरे उद्योगों के दस्तावेज जिरह के दौरान ही प्रस्तुत करेंगे, उस समय प्रबंधन की ओर से आए लोगों के चेहरे देखने लायक होंगे.”

मंगलवार को वकील चव्हाण ने यूनियन के अध्यक्ष के साथ एएसएल दफ्तर जाकर क्लोजर परमिशन की प्रबंधन के आवेदन का जवाब प्रस्तुत कर दिया. उससे अगले शुक्रवार की पेशी पर प्रबंधन ने अपनी साक्ष्य में अपने जनरल मैनेजर और सीए के शपथ पत्र प्रस्तुत किए.

इसी शुक्रवार को जोइंट लेबर कमिश्नर के यहाँ मजदूरों के मांग पत्र पर समझौता वार्ता थी. लेकिन प्रबंधन की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ. समझौता अधिकारी ने उन्हें टिप्पणी प्रस्तुत करने के लिए सोमवार की पेशी तय कर दी. मजदूर यूनियन की ओर से प्रशांत बाबू ने प्रबंधन के रवैये पर कड़ी आपत्ति करते हुए कहा कि “मजदूरों की हड़ताल वाजिब है और जारी है. इसलिए आपको सोमवार को कुछ न कुछ निर्णय लेना पड़ेगा.”
... क्रमशः

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

दोहरी लड़ाई

देहरी के पार, कड़ी - 23
'इलेक्ट्रो सर्किट इंडिया' (ECE) उद्योग के मजदूरों की आमसभा जज्बे और जोश के साथ हड़ताल को जारी रखने के निर्णय के साथ समाप्त हुई थी. रविवार का दिन आराम का नहीं बल्कि आगे की रणनीति तय करने और उस पर काम करने का था. प्रशांत बाबू, प्रिया, यूनियन के अध्यक्ष व मंत्री और सीनियर वकील रमेश चव्हाण के बीच लंबी बैठक चली.

राज्य के श्रम विभाग से फैक्ट्री के क्लोजर की अनुमति वाले मामले में अभी सुनवाई की तारीख की कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई थी. वकील चव्हाण का सुझाव था कि, “हमें आवेदन की सूचना प्राप्त हो चुकी है, सुनवाई की तारीख तय हो उससे पहले हमें 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स मैनेजमेंट से पेश कराए जाने और उनकी प्रतियाँ यूनियन को उपलब्ध कराने के लिए श्रम विभाग को आवेदन पेश कर देना चाहिए. इस रेकॉर्ड के मुकाबले अन्य उद्योगों के ऑडिटेड रिकार्ड से तुलना करके हम फर्जी बिलों के जरीए बड़े मुनाफे को घाटे में दिखाए जाने वाले फर्जीवाड़े को साबित कर सकेंगे. हम यह आवेदन कल ही दे दें तो हमारा समय बचेगा. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि सुनवाई आवेदन के 50वें दिन तक पूरी हो जाए जिससे डीम्ड क्लोजर की संभावना नहीं रहे.”

सुझाव एकदम सही था, सभी इससे सहमत थे. प्रशांत बाबू ने एक समस्या सामने रख दी. “लेकिन कॉमरेड चव्हाण, हम अन्य उद्योगों के खर्चों के ऑडिटेड रिकॉर्ड कहाँ से लाएंगे?”

“उसके लिए मैं एक सीए फर्म को जानता हूँ , जो अनेक उद्योगों का ऑडिट करती है. वह इस तरह का रिकार्ड उपलब्ध करवा सकती है और प्रमाणित करने वाला सीए यह बयान भी दे सकता है कि ये खर्चे उसने खुद उस कंपनी की बुक्स का ऑडिट करके प्रमाणित किए हैं. बस उसे इसका कुछ शुल्क देना पड़ेगा.”

“शुल्क हम यूनियन फंड से दे देंगे, बहुत अधिक तो नहीं होगा न?” यूनियन अध्यक्ष शिंदे ने पूछा.

“नहीं बहुत अधिक नहीं होगा. वे सीए मजदूरों के हमदर्द हैं. हमारी पार्टी को नियमित रूप से चंदा भी देते हैं. उनकी फीस बहुत मामूली होगी, वह भी रिकार्ड के लिए.” वकील चव्हाण ने कहा.

अगले दिन सुबह ग्यारह बजे ही यूनियन के अध्यक्ष और मंत्री वकील चव्हाण के साथ श्रम विभाग गए और एडीशनल सेक्रेटरी लेबर से मिलकर अपना आवेदन पेश किया. इतना ही नहीं उन्होंने क्लोजर परमिशन के आवेदन पर पहली सुनवाई के लिए तारीख तय करा दी और मैनेजमेंट तक नोटिस पहुँचाने की व्यवस्था भी कर आए. नोटिस में यह भी हिदायत दी थी कि वे उनके द्वारा पेश की गई बैलेंस शीटों में दिखाए गए 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' के खाते और उससे संबंधित बिल-वाउचर्स प्रस्तुत करें या यूनियन के आवेदन का जवाब दें. अब गेंद प्रबंधन के पाले में थी.

बुधवार की दोपहर ईसीई फैक्ट्री के गेट पर लगे शामियाने में एक सरकारी चपरासी ने आकर यूनियन अध्यक्ष शिंदे को एक पत्र दिया. श्रम विभाग ने सूचना भेजी थी कि मजदूरों के मांग पत्र और हड़ताल के मामले में प्रबंधन और यूनियन दोनों के प्रतिनिधि समझौता वार्ता के लिए जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में पहुँचें.

शुक्रवार को जोइंट लेबर कमिश्नर के दफ्तर में भारी तनाव था. एक तरफ प्रबंधन के सूट-बूट पहने प्रतिनिधि थे, दूसरी तरफ प्रशांत बाबू और यूनियन के पदाधिकारी.

कार्यवाही शुरू होते ही प्रबंधन प्रतिनिधि ने अपनी लिखित टिप्पणी प्रस्तुत की. उनका प्रस्ताव चालाकी से भरा था. प्रबंधन प्रतिनिधि ने मौखिक रूप से कहा, "हम 'ट्रक सिस्टम' को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते, लेकिन इसमें सुधार के लिए तैयार हैं. हम सामानों की एक सूची बनाएंगे—रोजमर्रा की जरूरत का किराना, स्टेशनरी आदि चीजें 'एम्पलॉइज शॉप' पर दस साल पहले वाली कीमतों पर मिलती रहेंगी, और बाकी चीजों के बदले हम वेतन में भत्ता (Allowance) जोड़ देंगे. लेकिन मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए हम मूल वेतन (Basic Salary) बढ़ाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं."

समझौता अधिकारी (Conciliation Officer) ने प्रबंधन की टिप्पणी को गौर से देखा. उन्होंने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और दो टूक लहजे में कहा, "देखिए, हमारा विभाग किसी भी ऐसी व्यवस्था को मान्यता नहीं देगा जो 'ट्रक सिस्टम' के किसी भी रूप को बरकरार रखती हो. यह पद्धति हमारी सरकार पूरी तरह से अनुचित घोषित कर चुकी है. वह इसके किसी भी रूप को बनाए रखने के लिए तैयार नहीं है. हम ऐसा कोई समझौता नहीं रजिस्टर नहीं करेंगे जिसमें मजदूरों को मजबूरन कंपनी की दुकान से सामान खरीदना पड़े. ट्रक पद्धति को तो खत्म करना ही होगा, इस पर किसी तरह का कोई मोलभाव नहीं होगा."

प्रबंधन प्रतिनिधि ने कुछ कहना चाहा, लेकिन अधिकारी ने उन्हें रोक दिया. "फिलहाल आप ट्रक पद्धति के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करें. वेतन वृद्धि और अन्य मांगों पर हम अगली बैठक में बात करेंगे."

उधर, एडीशनल सेक्रेटरी लेबर के यहाँ से भी प्रबंधन को तगड़ा झटका लगा. उन्हें आदेश मिला कि, “शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करें.”

फैक्ट्री गेट पर पिकेटिंग कर रहे मजदूरों को जब खबर दी गयी कि श्रम विभाग ने 'ट्रक सिस्टम' को सिरे से खारिज कर दिया है और एडीशनल सैक्रेटरी ने प्रबंधन को शुक्रवार शाम तक बैलेंस शीट में 'ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड अदर एक्सपेंस' से संबंधित खर्चों की पूरी 'डिटेल्स' बिल वाउचर्स सहित पेश करने का आदेश दिया गया है, तो वे उत्साह से भर उठे. पंडाल में मजदूरों के आपस में बोलने से कोलाहल बढ़ गया. इस शोर तथा मजदूरों को फिर से सभा के अनुशासन में लौटने के लिए सैक्रेटरी ने जोर से नारा लगाया.

“इंकलाब – ज़िंदाबाद.”

मजदूरों ने बिखरा सा उत्तर दिया, “इंकलाब जिन्दाबाद”.

सैक्रेटरी ने तीन बार यही नारा लगाया. हर बार मजदूरों की आवाज बढ़ती रही. चौथी बार में नारे ने औद्योगिक क्षेत्र गुंजा दिया.

इसी बीच मजदूरों के बीच किसी पंजाबी मजदूर ने नारा लगाया, “साड्डा हक़ ले के रहेंगे.”

“ले के रहेंगे... ले के रहेंगे. ” तमाम मजदूरों ने पूरे जोश से उत्तर दिया.
... क्रमशः

रविवार, 12 अप्रैल 2026

जज़्बा

देहरी के पार, कड़ी - 22
प्रशांत बाबू, प्रिया और उसके साथी लंच के दौरान भी ईसीआई फैक्ट्री के प्रबंधन के फर्जीवाड़े की बारीकियों पर बात करते रहे. फर्जीवाड़ा सामने आने से उनका हौसला बढ़ गया था. सबके चेहरों पर एक नई चमक थी. प्रशांत बाबू के पास आज कार थी. पाँचों उसी से फैक्ट्री गेट पहुँचे. चार बजने में समय था. आमसभा की तैयारी पूरी थी. दोनों शामियाने एक ही ओर तान कर एक लंबा पंडाल बना दिया गया था. अब उसमें ढाई सौ से अधिक लोग बैठ सकते थे. इतने ही मजदूरों के एकत्र होने की संभावना थी. लेकिन चार बजते-बजते पंडाल पूरा भर गया. उसके बाद भी मजदूर आते जा रहे थे. मंच से आग्रह हुआ कि लोग बीच की जगह को कम करते हुए आगे खिसकें. जिससे बाद में आने वालों को बैठने में परेशानी न हो. मजदूरों ने आगे खिसककर जगह बनाई तो आने वाले कुछ मजदूर वहाँ बैठ गए. फिर भी काफी लोग खड़े रह गए.

हड़ताल का सातवाँ दिन था. उमस भरे दिन और खाली जेबों की चिंता के बीच मज़दूरों के चेहरों पर एक गंभीर सन्नाटा था. 'ट्रक सिस्टम' के शोषण ने उनके पास बचत के नाम पर कुछ नहीं छोड़ा था. 'अगली 10 तारीख' का डर सबके मन में था, जब उन्हें मासिक वेतन नहीं मिलने वाला था. यदि क्लोजर मंजूर हो जाता तो छंटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी का पैसा उसके भी 65 दिन बाद उन्हें मिलता. इस तरह उनके सामने दो माह से अधिक घर चलाने की समस्या थी. सभी मजदूर वैसे ही बमुश्किल जी रहे थे. हड़ताल के दिन से ही उन्होंने हर तरह के खर्च पर लगाम लगा ली थी. खाने-पीने के बजट तक में कटौती कर दी थी.

प्रिया की टीम ने सभास्थल से 50 फुट दूर एक चाय की गुमटी के बाहर रखी बेंचों में से एक पर अपना अड्डा जमा लिया था. कुछ देर बाद रामजी काका भी आ गए वे भी उनके साथ बेंच पर बैठ गए और गुमटी वाले को पाँचों के लिए चाय देने को कहा.

यूनियन अध्यक्ष ने माइक संभाला, सभा शुरू हुई. आज उनका लहजा बदला हुआ था, आवाज में गुस्सा था और ऊँची थी, "साथियों, प्रबंधन कहता है कि कारखाना घाटे में है! जिसके कारण वे इसे चलाने में असमर्थ हैं, वे सरकार से इसे बंद करने की परमिशन मांग रहे हैं. लेकिन आज हमारे पास वो सच है जो इनके मुहँ बन्द कर देगा."

उन्होंने प्रिया की टीम की तैयार की हुई 'एनालिसिस रिपोर्ट' हवा में लहराई. "हमारे तकनीकी विशेषज्ञ मित्रों ने 24 घंटों से भी कम में कंपनी की बैलेंस शीटों का पोस्टमार्टम करके साबित कर दिया है कि जिसे ये 'घाटा' बता रहे हैं, वो असल में ''ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन' और 'अदर एक्सपेंसेस' के नाम पर की गई चोरी है. जिस साल आपका वेतन स्थिर रहा, उसी साल इन अफसरों के खर्चे चार गुना बढ़ गए! यह घाटा प्राकृतिक नहीं है, इसको मेन्युफेक्चर किया गया है. हमारे साथियों ने मैनेजमेंट के सारे फर्जीवाड़े को उजागर कर दिया है."

जैसे ही 'आंकड़ों के फर्जीवाड़े' की बात हुई, मज़दूरों के बीच एक गुस्से की लहर दौड़ गई. जो मज़दूर अब तक क्लोजर के नाम से डरे हुए थे, उनकी आँखों में अब गुस्से की चमक थी. एक ने नारा लगाया, "शेम-शेम" सबने ऊंची आवाज में  उसका उत्तर दिया, "शेम-शेम".

प्रशांत बाबू माइक पर आए. वे इस उद्योग के मजदूरों की यूनियन के सदस्य या पदाधिकारी न होते हुए भी मजदूरों के बीच सर्वप्रिय नेता थे, मजदूरों का उन पर भरोसा था. उन्होंने सीधा सवाल किया, "अगले माह वेतन नहीं मिलेगा. प्रबंधन ने क्लोजर का जाल बिछाया है ताकि आप डरकर घुटने टेक दें. यह भी हो सकता है कि सरकार क्लोजर की मंजूरी दे दे और 90 दिन बाद कारखाना बंद हो जाए. वैसी स्थिति में आपको छँटनी का मुआवजा और ग्रेच्युटी ही मिलेंगे. प्रोविडेंट फंड तो वैसे भी आपका ही है. इसलिए हमें एक बार फिर याद करना पड़ेगा कि इस सप्ताह के शुरू में जब हमने हड़ताल शुरू की थी तब आपने ही एक स्वर में कहा था कि, “हम ‘ट्रक सिस्टम’ समाप्त होने और फेयर वेजेज लागू किए बिना काम पर नहीं जाएंगे. चाहे नौकरी क्यों न चली जाए.”

अब हमारे पास दो रास्ते हैं—या तो हम इस फर्जीवाड़े के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ते हुए हड़ताल जारी रखें, या फिर फिलहाल पुरानी शर्तों पर काम पर लौट जाएं. और क्लोजर पर सरकार के फैसले तक इंतजार करें. इससे आपको अगले तीन माह के वेतन मिल जाएंगे. फैसला आपका है."

सभा में एक पल के लिए भारी खामोशी छा गई. तभी एक अधेड़ उम्र का मज़दूर, जिसके हाव-भाव से ही अनुभव और गंभीरता का अहसास होता था खड़ा हुआ माइक हाथ में लिया.

"साथियों," उन्होंने गूँजती आवाज़ में कहा, "मालिक कहता है कि कारखाना उसका है. अरे, इस कारखाने की एक-एक मशीन हमने अपने हाथों से लगाई है, इस कारखाने की ईंट-ईंट हमारे पसीने से भीगी है. जब हम निर्माण कर सकते हैं, तो हम मजदूर इसके असली मालिक हैं. और जो मालिक कहलाता है, वह बकौल बापू गांधी केवल ट्रस्टी है. अब ये ट्रस्टी एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर हमारे हक को निगल रहे हैं?"

मज़दूरों के बीच से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा गूँजा. अधेड़ मज़दूर ने आगे कहना जारी रखा, "उस 'ट्रक सिस्टम' की गुलामी में वापस जाने से बेहतर है कि हम बाहर फावड़ा चला लें, गड्ढे खोद लें. हम इस बेईमान मैनेजमेंट के आगे अपना आत्मसम्मान नहीं खोएंगे. हड़ताल जारी रहेगी और अब हम क्लोजर का जवाब कोर्ट में देंगे!"

मज़दूरों को हड़ताल होने से पहले की मीटिंग याद आई. जब फैसले के लिए हाथ उठवाए गए कि हड़ताल जारी रखी जाए या स्थगित कर दी जाए तो बहुमत ने एक स्वर में हड़ताल जारी रखने का निर्णय लिया. रामजी काका, सोच रहे थे, अब जब मजदूरों के घरों की रसोइयों पर संकट गहराएगा, तब 'सामूहिक रसोई' चालू करनी ही पड़ेगी.

प्रिया ने दूर से ही प्रशांत बाबू को सिर हिलाकर संकेत दिया. उसे अहसास हुआ कि कोडिंग और डेटा एनालिसिस केवल कागज थे, असली ताकत तो शोषण के विरुद्ध खड़े होने का वह 'जज़्बा' है जो इन मज़दूरों को खाली जेब होने के बावजूद सीना तानकर खड़े रहने की शक्ति दे रहा था.
... क्रमशः