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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

चक्रव्यूह में दरार

देहरी के पार, कड़ी - 32
ईसीआई फैक्ट्री के गेट से 100 मीटर परे पिकेटिंग के लिए लगाया गया शामियाना आखिर 44वें दिन हटा लिया गया. अगले दिन 23 अप्रैल को हड़ताल के दिनों का वेतन मजदूरों-कर्मचारियों के बैंक खातों में आने वाला था और 24 अप्रैल को उन्हें ड्यूटी पर उपस्थित होना था.

23 अप्रैल को ही क्लोजर की परमिशन के मुकदमे में एएसएल के यहाँ सुनवाई होनी थी. इतनी सारी घटनाओं के बाद इस सुनवाई में मजदूरों-कर्मचारियों की रुचि बढ़ गई थी. उनमें से हर कोई इस सुनवाई में हाजिर रहना चाहता था. सुबह साढ़े दस बजे ही एएसएल के दफ्तर के बाहर मजदूरों का हुजूम इकट्ठा हो गया. इतने लोगों के लिए न इजलास में जगह थी और न ही बाहर के गलियारों और दफ्तर के दालान में. धूप बहुत तेज थी और बाहर सड़क किनारे छाँह का कोई नामोनिशान नहीं. पौने ग्यारह बजे जब यूनियन के अध्यक्ष-सचिव, प्रशांत बाबू के साथ वहाँ पहुँचे तो इस विकट स्थिति को देखते हुए तुरन्त एएसएल से संपर्क किया और उनकी अनुमति लेकर दफ्तर के बाहर दिन भर के लिए शामियाना लगाने और पीने के पानी की व्यवस्था करवाई.

इसी वजह से आज एएसएल (Assistant Secretary Labour) के यहाँ कार्रवाई शुरू होने में एक घंटे की देरी हुई. हड़ताल खत्म हो जाने और फेयर वेजेज का मामला अब औद्योगिक न्यायाधिकरण के पास चले जाने से प्रबंधन दबाव मुक्त था. उनकी टीम के चेहरों पर एक कुटिल 'विजेता' वाली मुस्कान थी. वकील मनोज भट्ट आज बहुत आत्मविश्वास में दिखाई दे रहे थे.

एएसएल ने ठीक 12 बजे इजलास में प्रवेश किया. प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने खड़े होकर बोलना आरंभ किया, "हुज़ूर, जैसा कि आप जानते हैं, सरकार ने हड़ताल और तालाबंदी पर पाबंदी लगा दी है. हमारे क्लाइंट ने बड़ा दिल दिखाते हुए मजदूरों को हड़ताल अवधि का 'एडवांस वेतन' देना भी स्वीकार कर लिया है. दोपहर तक सभी मजदूरों-कर्मचारियों के खातों में यह राशि पहुँच जाएगी. अब जबकि फेयर वेजेज का विवाद ट्रिबुनल को रेफर हो चुका है और औद्योगिक शांति बहाल हो रही है, तो इस क्लोजर परमिशन को भी 'मानवीय आधार' पर देखा जाना चाहिए. हम फैक्ट्री चलाना चाहते हैं, लेकिन हमारे पास संसाधन नहीं हैं."

एएसएल ने अपनी फाइल पलटते हुए स्वर में पूछा, "मिस्टर भट्ट, संसाधन से आपका क्या तात्पर्य है? जरा समझाइए.”

“सर, मेरा कहना था कि पिछली आर्थिक हानियों के कारण कंपनी के एसेट्स के मुकाबले लाएबिलिटीज बहुत अधिक हैं. बैंकों के कर्जे ओवरड्यू हो चुके हैं. यह बकाया हमें तुरंत चुकाना है. जिसके कारण कुछ महीनों बाद कंपनी की स्थिति अपने एम्पलॉइज को वेतन चुकाने तक की नहीं रहेगी. हम चाहते हैं उसके पहले ही हमें उद्योग बंद कर देने की अनुमति दी जाए. जिससे हम अपने एम्पलॉइज को कानूनी रूप से देय राशियाँ दे सकें और वे अन्यत्र रोजगार तलाश सकें. यदि क्लोजर की अनुमति नहीं दी गयी तो फाइनेंशियल इन्स्टीट्यूशन हमें लिक्विडेशन में जाने को बाध्य कर देंगे.”

“वकील साहब, आप जो कुछ कह रहे हैं उसे आपको साक्ष्य से साबित करना होगा. केवल कहने से काम नहीं चलेगा. फिलहाल आप ये बताइए कि पिछली सुनवाई में आपसे कुछ विशिष्ट विसंगतियों पर स्पष्टीकरण मांगा गया था. क्या वे तैयार हैं?"

वकील रमेश चव्हाण तुरंत अपनी जगह से खड़े हुए. "सर! प्रबंधन 'मानवीय आधार' का मुखौटा पहनकर अदालत को गुमराह करना चाहता है. एडवांस वेतन देना उनकी महानता नहीं, बल्कि धारा 25-यू के आपराधिक मुकदमे से बचने की विवशता है. और जहाँ तक विसंगतियों की बात है..."

चव्हाण साहब ने प्रिया की ओर इशारा किया. प्रिया ने तुरंत तीन नई फाइलें एएसएल के रीडर को सौंपीं.

"हुज़ूर, प्रबंधन ने सोमवार को जो दस्तावेज इस अदालत में प्रस्तुत किए हैं, वे 'साइफनिंग' के आरोपों को झुठलाने के बजाय उन्हें पुख्ता करते हैं. इन्होंने मार्च के स्टॉक रजिस्टर में जो 5,000 वेफर्स गायब दिखाए थे, उन्हें अब 'प्रोसेस लॉस' (प्रक्रियात्मक हानि) बताया गया है. लेकिन हुज़ूर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट निर्माण में 80% का प्रोसेस लॉस असंभव है! यह नहीं हो सकता कि आप मनमाने लॉस बता दें. लॉसेस की भी कोई सीमा है, कारखाने और गोदाम में आग तो लगी नहीं थी. यह साफ़ तौर पर हेराफेरी है."

प्रिया ने अपनी डायरी से एक और बिंदु वकील साहब को धीरे से बताया. चव्हाण साहब मुस्कुराए और बोले, "एक और बात हुज़ूर. प्रबंधन ने दावा किया है कि उनके पास वर्किंग कैपिटल नहीं है. लेकिन कल ही इन्होंने 350 मजदूरों को एडवांस वेतन देने के लिए करीब 50 लाख रुपये का प्रावधान किया है. यदि पैसा नहीं था, तो यह अचानक कहाँ से आया? क्या यह वही पैसा नहीं है जिसे 'शेल कंपनियों' में डाइवर्ट किया गया था और अब जब फँसने का मौका आया तो उसे वापस लाया जा रहा है?"

एएसएल ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, "मैनेजमेंट का यह तर्क कि 'सब सामान्य हो रहा है', क्लोजर के आवेदन को वैध नहीं बनाता. यदि उत्पादन की क्षमता और कच्चा माल मौजूद था, तो क्लोजर का आवेदन 'दुर्भावनापूर्ण' (Mala fide) माना जाएगा. मिस्टर भट्ट आज आपके जीएम दिखाई नहीं दे रहे हैं. आज उनसे शेष जिरह होनी थी. क्या उनके सिवा आपके अन्य गवाह आज हाजिर हैं?”

“हुजूर, प्रबंधन का कल का पूरा दिन सेक्रेटेरिएट में बीता. शाम चार बजे बाद सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया. उस आदेश की पालना आज ही करनी है. जीएम साहब आज उसी व्यवस्था में लगे हैं. दूसरे दोनों गवाह भी मजदूरों के हड़ताल अवधि का वेतन बनाने और उसे उनके खातों तक पहुँचाने में व्यस्त हैं. इस कारण प्रबंधन आज अपनी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकेगा. हम अगली पेशी पर सभी गवाहों को हाजिर रखेंगे. हम चाहते हैं इस मामले का निर्णय हर हालत में 14 मई के पहले हो जाए.” वकील भट्ट ने अपनी सफाई पेश की.

“देखिए मैं आपको साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए अंतिम अवसर दे रहा हूँ. आप को 26 अप्रैल को सुबह 11 बजे के पहले अपने सभी गवाह हाजिर रखने हैं, वरना उस दिन आपकी साक्ष्य समाप्त कर यूनियन की साक्ष्य आरंभ कर दूंगा. मिस्टर चव्हाण आप उस दिन आप अपने गवाह और उनके शपथ पत्र तैयार रखिए.”

“जी, हम तैयार रहेंगे.” वकील चव्हाण ने कहा.

इजलास से बाहर निकलते समय प्रिया ने देखा कि मनोज भट्ट और एजीएम के बीच तीखी बहस हो रही थी. प्रशांत बाबू ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा, "प्रिया, तुमने सही पकड़ा था. एडवांस वेतन का दांव उन्हीं पर उल्टा पड़ गया. अब उनके पास छिपाने के लिए जगह नहीं बची है."

प्रिया ने आसमान की ओर देखा. 'चक्रव्यूह' अभी टूटा नहीं था, लेकिन उसकी दीवार में पहली दरार साफ़ दिखाई दे रही थी.
... क्रमशः

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

चक्रव्यूह

देहरी के पार, कड़ी - 31
क्लोजर परमिशन के मामले में 19 अप्रैल को हुई जिरह के बाद ईसीआई प्रबंधन बुरी तरह हड़बड़ा गया था. एएसएल के सामने सुनवाई के दौरान 'Siphoning' और 'बिजली खपत' का जो कच्चा चिट्ठा खुला था, उसने प्रबंधन के अहंकार को हिलाकर रख दिया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसका संकट केवल क्लोजर की परमिशन का आवेदन निरस्त हो जाने की संभावना तक सीमित नहीं था. मुख्य श्रम आयुक्त (CLC) के दफ्तर ने भी उसके सिर पर तलवार लटका रखी थी.

दस साल पहले जब मजदूरों ने वेतन बढ़ोतरी की मांग की थी, तब प्रबंधन ने यूनियन के साथ समझौता कर ट्रक सिस्टम लागू किया तभी उसने यूनियन को मान्यता दे दी थी. हर साल उसी के साथ वह बोनस का समझौता करता था. उसी मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियन के साथ लगातार तीन वार्ताओं में उपस्थित न होने को सीएलसी ने सामूहिक सौदेबाजी की उपेक्षा मानते हुए 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट' की पाँचवीं अनुसूची के भाग प्रथम के आइटम नं. 15 में अनुचित श्रम आचरण मान लिया था और धारा 25-यू में अपराधिक मुकदमा चलाए जाने के लिए प्रबंधन को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था.

कंपनी का कोई भी निदेशक नहीं चाहता था कि उनमें से किसी पर भी कोई अपराधिक मुकदमा चले. निदेशक मंडल की मीटिंग में कंपनी के लीगल मैनेजर मिस्टर दास को बहुत हड़काया गया था कि आपके रहते हुए यह स्थिति कैसे पैदा हुई? मीटिंग के दौरान ही कंपनी के वकील मनोज भट्ट से बात की गई तो उन्होंने पल्ला झाड़ लिया कि उनसे इस मामले में कोई सलाह नहीं ली गई. अब दोनों को जिम्मेदारी दी गयी थी कि किसी भी स्थिति में अपराधिक मुकदमा किसी निदेशक के विरुद्ध नहीं चलना चाहिए.

मुख्य श्रम आयुक्त ने समझौता वार्ता को असफल घोषित कर राज्य सरकार को जो गोपनीय रिपोर्ट भेजी थी, वह और भी घातक थी. उन्होंने स्पष्ट सिफारिश की थी कि वेतन वृद्धि और बोनस के विवाद को तुरंत 'एडजुडिकेशन' (न्याय-निर्णयन) के लिए लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण को प्रेषित कर दिया जाए और उद्योग में मौजूदा हड़ताल व तालाबंदी पर धारा 10 (3) के अंतर्गत तत्काल पाबंदी लगा दी जाए. यदि सरकार इस सिफारिश को मान लेती—जिसकी पूरी संभावना थी—तो प्रबंधन के पास मजदूरों को बाहर रखने का कोई विधिक बहाना नहीं था.

मामला राज्य सचिवालय तक पहुँच चुका था. प्रबंधन के प्रतिनिधि के रूप में फैक्ट्री जीएम मिस्टर सरकार, सोमवार 22 अप्रैल को लीगल मैनेजर मिस्टर दास और वकील मनोज भट्ट सुबह ठीक साढ़े दस बजे सेक्रेट्रिएट में थे. उन्होंने जैसे-तैसे श्रम मंत्री के निजी सचिव को प्रसन्न कर मंत्री जी से मुलाकात कराने का जुगाड़ किया. मंत्री जी ने उनसे मिलने के पहले श्रम सचिव को बुलाकर मंत्रणा की. उसके बाद ही प्रबंधन प्रतिनिधियों को भीतर बुलाया गया. माहौल में भारी तनाव था. श्रम सचिव ने मेज पर एक फाइल पटकते हुए कड़े लहजे में कहा, "मिस्टर भट्ट, आपकी कंपनी केवल कानून ही नहीं तोड़ रही, बल्कि सरकार की छवि भी खराब कर रही है. हड़ताल को 44 दिन हो चुके हैं. 350 परिवार सड़कों पर हैं और आपकी बैलेंस शीट में जो गड़बड़ियाँ सामने आई हैं, वे आपराधिक जांच का विषय बन सकती हैं."

प्रबंधन के पास अब सौदेबाजी की कोई ताकत नहीं बची थी. अंततः एक 'बीच का रास्ता' (Interim Arrangement) प्रस्तावित किया गया. श्रम सचिव ने दो टूक शब्दों में कहा, "सरकार मजदूरों के वेतन में वृद्धि का मामला औद्योगिक न्यायाधिकरण को एडजुडिकेशन के लिए संप्रेषित करने और उसके साथ ही हड़ताल व तालाबंदी पर पाबंदी का आदेश जारी करने की सोच रही है. लेकिन मजदूर तब तक काम पर नहीं लौटेंगे जब तक उनके हाथ में कुछ पैसा न हो. आपको हड़ताल की अवधि का वेतन 'एडवांस' के रूप में मजदूरों के बैंक खाते में हस्तांतरित करना पड़ेगा. यह वेतन मजदूरों के खातों में जाने के अगले दिन वे काम पर लौटेंगे. मजदूरों की हड़ताल वैध थी या अवैध और वे हड़ताल अवधि के वेतन के हकदार हैं या नहीं—यह प्रश्न भी वेतन वृद्धि के विवाद के साथ न्यायाधिकरण को प्रेषित किया जाएगा. जिसमें न्यायाधिकरण तीन महीने में अपना फैसला देगा."

आपराधिक मुकदमे में जेल जाने और क्लोजर के मामले में अपनी किरकिरी से बचने के लिए प्रबंधन ने कांपते हाथों सरकार के प्रस्ताव पर सहमति दे दी. अपरान्ह चार बजे सरकार ने औद्योगिक न्यायाधिकरण को रेफ्रेंस करने, हड़ताल-तालाबंदी पर पाबंदी का नोटिफिकेशन जारी कर दिया. इसके साथ ही यह आदेश पृथक से जारी किया कि हड़ताल अवधि के वेतन की राशि के बराबर राशि नियोजक एडवांस के रूप में मजदूरों के बैंक खाते में ट्रांसफर करेगी. अगले दिन से मजदूर काम पर लौट आएंगे. पाँच बजे के रेडियो और टीवी समाचारों में यह खबर सरकार की महत्वपूर्ण कार्यवाही के रूप में प्रसारित हुई.

प्रशांत बाबू ने यह खबर (IIDEA) ऑफिस में सुनी. सारा माहौल बदल गया था. उन्होंने वकील रमेश चव्हाण से फोन पर परामर्श किया. तय हुआ की तुरन्त फैक्ट्री गेट पहुँचा जाए. दोनों ने वहाँ ईसीआई एम्पलॉइज यूनियन की कार्यसमिति के उपस्थित सदस्यों के साथ मीटिंग की और आगे की रणनीति पर विचार किया. खबर मजदूरों तक कानोंकान पहुँच चुकी थी और वे पिकेटिंग स्थल पहुँच रहे थे. कार्यसमिति की मीटिंग चल ही रही थी कि श्रम मंत्रालय का एक क्लर्क विभागीय कार से वहाँ पहुँचा नोटिफिकेशन की एक प्रति यूनियन अध्यक्ष को थमा दी. हड़ताल प्रतिबंधित की जा चुकी थी. उसे तुरंत समाप्त करना आवश्यक हो चुका था. पिकेटिंग स्थल पर कारखाने के तीन चौथाई से अधिक मजदूर इकट्ठा हो चुके थे. रामजी को मेवाड़ भोजनालय पर यह समाचार मिला तो वे भी पहुँच गए. मीटिंग में तुरन्त आमसभा कर हड़ताल को समाप्त करने की घोषणा करना तय हुआ. उधर श्रम मंत्रालय का क्लर्क नोटिफिकेशन की एक प्रति फैक्ट्री में भी दे कर जा चुका था.

उपस्थित मजदूरों की आमसभा शुरू हुई. प्रशांत बाबू ने आमसभा में बोलते हुए बताया, “साथियों, हमारे संघर्ष के सामने सरकार और फैक्ट्री मालिकों को मजबूर होना पड़ा. उन्होंने हड़ताल और तालाबंदी दोनों पर पाबंदी लगा दी. इसलिए हड़ताल खत्म कर मजदूरों को काम पर जाना होगा. लेकिन उसके पहले हड़ताल की अवधि का वेतन मजदूरों के बैंक खातों में होगा. वेतन कितना और कब से बढ़ेगा, इसका फैसला अब औद्योगिक न्यायाधिकरण करेगा और तीन माह में निर्णय लेगा. ‘फेयर वेजेज’ की हमारी लड़ाई थमी नहीं है. यह अदालत में चली गई है. हम वहाँ भी पूरी मुस्तैदी से लड़ेंगे. अभी क्लोजर की तलवार हम पर लटकी हुई है. कल मंगलवार को फिर सुनवाई है. प्रबंधन का आवेदन निरस्त हो इसकी पूरी कोशिश है. लेकिन अभी हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि आगे क्या होगा.”

प्रशांत बाबू बोल ही रहे थे कि किसी ने उनके पास जाकर उनके कान में कुछ कहा. उसके बाद उन्होंने अपना भाषण जारी रखा. “फैक्ट्री प्रबंधन ने फैक्ट्री गेट नोटिस लगाया है कि’ वह हड़ताल अवधि का वेतन कल दोपहर तक सभी कर्मचारियों के बैंक खातों में हस्तांतरित कर देगा.’ कर्मचारियों को परसों की पहली शिफ्ट से ड्यूटी पर उपस्थित होने का आदेश दिया है.’ सभी मजदूर परसों ड्यूटी पर जाएंगे. कल ज्यादा से ज्यादा लोग एएसएल के दफ्तर में सुनवाई के वक्त पहुँचें. वहाँ मजदूरों की उपस्थिति हमारे मामले को मजबूत करती है. हम अगले शनिवार कार्यकारिणी की मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार करेंगे फिर अगले रविवार को आमसभा में आप सबसे विचार विमर्श करके आगे का निर्णय लेंगे.”

प्रिया, को यह समाचार अपने ऑफिस में मिला. उसने दूसरे साथियों को भी बताया. साढ़े सात बजे अपना काम पूरा कर ऑफिस से निकलने के पहले प्रिया ने प्रशांत बाबू से फोन पर बात की. पता लगा कि पिकेटिंग समाप्त कर दी गई है. अब वे और रामजी काका आठ बजे तक मेवाड़ भोजनालय पहुँचेंगे. प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य चारों मेवाड़ भोजनालय पहुँचे तब तक दोनों वहाँ पहुँच चुके थे. प्रशांत बाबू ने उन्हें विस्तार से सारी स्थिति बताई.

प्रिया ने सब कुछ गंभीरता से सुना. उसने महसूस किया कि यह जीत विधिक से ज्यादा रणनीतिक है. उसने प्रशांत बाबू से पूछा, "क्या यह एडवांस वेतन देना उनकी कोई नई चाल तो नहीं? क्या वे इसके जरिए क्लोजर वाले मामले को कमजोर करना चाहते हैं और फैक्ट्री मालिकों और सरकार के बीच की जुगलबंदी कोई चक्रव्यूह न रच रही हो?"

प्रशांत बाबू उसका सवाल सुन कर मुस्कुराए, “तुम बहुत होशियार हो, एकदम सही बिन्दु पर पहुँच जाती हो प्रिया. वे एएसएल के सामने कल यह कह सकते हैं कि 'देखिए, हमने तो मजदूरों को एडवांस दे दिया है, हम उनके भले की सोच रहे हैं, लेकिन घाटे के कारण अब हम चला नहीं सकते'. वे अपनी छवि सुधारने की कोशिश करेंगे. लेकिन हम कल उन्हें इस जाल में नहीं फंसने देंगे. कल हमें यह साबित करना ही होगा कि क्लोजर का आवेदन केवल एक ढोंग है."
... क्रमशः

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

कटघरे में झूठ

देहरी के पार, कड़ी - 30
19 अप्रैल, 2019 शुक्रवार.

असिस्टेंट सैक्रेटरी लेबर (ASL) के कार्यालय का सुनवाई वाला इजलास आज छोटा लग रहा था. आगे की दो बैंचों को छोड़कर बाकी सभी पर मजदूर बैठे थे. यहाँ तक कि इजलास की बैंचों के दाएँ, बाएँ और पीछे की ओर जो तीन-तीन फुट के करीब स्थान था उसमें भी मजदूर खड़े थे. इजलास के बाहर की गैलरी और उसके आगे जो खुली जगह थी वहाँ सभी ओर मजदूर ही मजदूर थे. आगे दो बैंचों में से दायीं ओर की बैंचों पर प्रबंधन के गवाह, फैक्ट्री का लीगल मैनेजर, वकील मनोज भट्ट और उसके दो सहायक थे. बायीं और की बैंचों पर वकील रमेश चव्हाण, एक सहायक और दूसरे सहायक के रूप में प्रिया अपने वकील वाले आउट फिट में, , प्रशांत बाबू और यूनियन के अध्यक्ष, सचिव बैठे थे. वकील रमेश चव्हाण अपनी फाइलों के साथ जिरह के लिए एकदम तैयार थे. प्रिया का दिल आज एक अलग ही लय में धड़क रहा था. यह डर नहीं, बल्कि उस सच को बाहर लाने का रोमांच था जिसे उसने दस्तावेजों के ढेर से खोद निकाला था. इजलास में उपस्थित लोगों की आपसी बातचीत से हॉल में मधुमक्खियों के झुंड जैसी आवाज गूंज रही थी.

एएसएल ने कमरे में प्रवेश करते ही यह आवाजों की गूंज थम गई. एएसएल कुर्सी पर बैठे, कार्यवाही शुरू हुई. “मिस्टर भट्ट आपके गवाह तैयार हैं.” एएसएल ने पूछा.

“हाँ बिलकुल तैयार हैं.” मिस्टर भट्ट ने कहा, और फैक्ट्री के जनरल मैनेजर (GM) को इशारा किया वह कटघरे में आकर खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर वही पुराना आत्मविश्वास था, जो फैक्ट्री में और पिछली कई सुनवाइयों से मजदूरों को डराने के काम आता रहा था.

वकील चव्हाण ने जिरह शुरू की. शुरुआती सवाल सामान्य थे, जैसे प्रबंधन को ढीला छोड़ने की रणनीति हो. उन्होंने इन सवालों के जवाबों से यह स्थापित कर लिया कि फैक्ट्री में सिलिकॉन वेफर्स कच्चे माल के रूप में काम में लिए जाते हैं. और कारखाने के कामों में जो भी काम किए जाते हैं उनके लिए ऊर्जा का एकमात्र स्रोत बिजली है. यहाँ तक कि बिजली चले जाने जैसी आपात स्थितियों के लिए कारखानों में दो डीजल जनरेटर स्थापित हैं जो काम कर रहे हैं.

अचानक चव्हाण साहब ने एसीएल से उनकी केस फाइल ली और उसमें से गवाह का शपथ-पत्र निकाल कर पूछा, "मिस्टर जीएम, यह आपका शपथ पत्र है आपने इसके पैरा 4 में कहा है कि पिछले तीन महीनों से कच्चा माल, विशेषकर सिलिकॉन वेफर्स की वैश्विक कमी के कारण उत्पादन पूरी तरह ठप है. क्या यह सही है?"

जीएम ने गला साफ किया, "जी, बिल्कुल सही है. माल ही नहीं था तो फैक्ट्री में उत्पादन कैसे होता?"

चव्हाण साहब ने एक ग्राफ एएसएल की मेज पर रखा, "देखिए मिस्टर जीएम यह दस्तावेज आपके उद्योग के स्टॉक का ही ग्राफ है?”

“जी हाँ, यह हमारे ही स्टॉक का ग्राफ है.”

“इस ग्राफ में मार्च 2019 के क्लोजिंग स्टॉक में सिलिकॉन वेफर्स की 5,000 यूनिट्स का बैलेंस दिख रहा है, उसका क्या हुआ? क्या वह हवा में गायब हो गया?”

सवाल सुन कर जीएम के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आई, गला सूख गया, हालाँकि एसीएल का इजलास पूरा एयरकंडीशंड था. उसने जेब से रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा और अपने सहायक को इशारा किया कि उसे पानी लाकर दे.

सहायक के पास टेबल के नीचे ही पानी की बोतल रखी थी. लेकिन या तो उसे उसकी याद नहीं आई, या फिर वह अधिक समय लेना चाहता होगा. उसने तुरन्त अपने साथ के एक क्लर्क को पानी लाने को कहा. क्लर्क तुरन्त उठकर पानी लेने बाहर भागा. चव्हाण के सहायक ने जीएम के सहायक को इशारा किया कि उनकी पानी की बोतल टेबल के नीचे रखी है. जीएम का सहायक सकपका गया. उसने टेबल के नीचे से पानी की बोतल निकाल कर जीएम को दी. जीएम ने पानी के चार-छह घूँट गले से नीचे उतारे. वे फिर सवालों के जवाब देने को तैयार थे.

चव्हाण ने एक और चार्ट फाइल से निकाल कर जीएम को दिखाया. “देखिए, क्या यह बिजली की खपत का चार्ट आपकी फैक्ट्री का ही है?”

“जी, हाँ हमारी फैक्ट्री का ही है.” जीएम ने उत्तर दिया.

“गौर से देखिए, क्या यह सही है कि, इसमें फैक्ट्री की मार्च 2019 में बिजली खपत जनवरी और फरवरी की बिजली खपत से कुछ अधिक ही दर्ज है?”

“जी, सही है.”

“तो फिर, आप अदालत को समझाएँ, कि यदि उत्पादन ठप था, तब भी मार्च 2019 में फैक्ट्री की बिजली की खपत 'पीक' पर कैसे थी? क्या आपकी मशीनें बिना उत्पादन के ही बिजली पी रही थीं?"

जीएम के माथे पर पसीने की पहली बूंद चमकी. उनके वकील, मनोज भट्ट ने आपत्ति जताने की कोशिश की, लेकिन एएसएल ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया.

चव्हाण साहब ने आवाज़ और बुलंद की, "हुज़ूर, असलियत यह है कि उत्पादन बंद नहीं था. उत्पादन को 'ऑफ द रिकॉर्ड' किया जा रहा था. यह साइफनिंग ऑफ स्टॉक (Siphoning of Stock!) है. तैयार आईसी (IC) को 'वेस्ट डिस्पोजल' के फर्जी बिलों के नाम पर फैक्ट्री से बाहर भेजा गया और मुनाफे को शेल कंपनियों में डाइवर्ट किया गया. यह घाटा प्राकृतिक नहीं है, इसे 'क्रिएट' किया गया है ताकि इन 350 मजदूरों की 'फेयर वेजेज' की मांग को कुचला जा सके."

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया. एएसएल ने चश्मा उतारकर जीएम की ओर देखा, "मिस्टर जीएम, क्या आपके पास बिजली के इन बिलों और गायब हुए 5,000 वेफर्स का कोई तार्किक जवाब है?"

जीएम अपने वकील की ओर देखने लगे, लेकिन भट्ट साहब खुद फाइलों में कुछ ढूंढने का नाटक कर रहे थे. प्रिया ने गौर किया कि जीएम के हाथ कांप रहे थे.

चव्हाण साहब ने अंतिम प्रहार किया, "हुज़ूर, यह मामला केवल क्लोजर का नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक अपराध और Siphoning of Funds का है. प्रबंधन ने पिछले तीन साल से अकाउंट्स को दूषित किया है ताकि मजदूरों को उनके स्वाभिमान की कीमत न चुकानी पड़े."

एएसएल ने गंभीर मुद्रा में नोटिंग की और आदेश दिया, "मैनेजमेंट सोमवार तक इन विसंगतियों पर चाहे तो अपना लिखित स्पष्टीकरण पेश कर सकता है."

कोर्ट रूम से बाहर निकलते समय मजदूरों ने चव्हाण साहब और प्रिया को घेर लिया. रामजी काका की आँखों में आँसू थे. उन्होंने प्रिया के सिर पर हाथ रखा, "बिटिया, आज तुम्हारी मेहनत ने उन चूल्हों में फिर से आग जला दी है जो बुझने वाले थे."

“नहीं काका, यह मेरी अकेले की मेहनत नहीं है. इसमें राहुल, स्नेहा और आदित्य का भी बराबर का योगदान है.”
... क्रमशः

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

आँकड़ों के पीछे

देहरी के पार, कड़ी - 29
वकील रमेश चव्हाण के ऑफिस से बाहर निकलकर प्रिया ने देखा कि घड़ी में साढ़े नौ बज रहे हैं. घर जाकर खाना बनाने में ग्यारह बज जाएंगे. वहाँ से ऑटो पकड़कर वह एमबी (मेवाड़ भोजनालय) पहुँची. रामजी काका काउंटर पर ही मिल गए. डिनर का पीक टाइम था. दोनों हॉल खचाखच भरे थे. उसने स्थिति देखकर कहा, “काका, आज बहुत भागदौड़ हो गयी है. सुबह एएसएल का ऑफिस, फिर अपना ऑफिस, फिर चव्हाण साहब के यहाँ. अब इन्तजार करना मुश्किल है. आप खाना पैक करवा दो.”

“बिटिया, तुम्हारे लिए एमबी में हमेशा जगह है. तुम्हें पता है पीछे यहाँ काम करने वालों का रेस्टरूम है, इस वक्त खाली है तुम वहाँ पहुँचो, मैं वहीं खाना लगवाता हूँ. बस बता दो क्या खाओगी?”

भोजन की व्यवस्था ऐसे होगी. प्रिया ने सोचा नहीं था. वह भोजन करके सीधे अपने फ्लैट पहुँची. शरीर की थकान कह रही थी कि वह कपड़े बदले बिना ही सो जाए. लेकिन दिमाग कहता था कि एक बार सरसरी तौर पर शपथ पत्र और उनके साथ पेश किए दस्तावेज देख लिए जाएँ, जिससे उन पर सोचने की प्रक्रिया आरंभ हो ले. वह जानती थी कि दिमाग कभी विश्राम नहीं करता. सोते समय वह मेमोरी को संगठित करके पक्का (Memory Consolidation) करता है. दिन भर की जानकारियों को छांटता है. जरूरी बातें लॉन्ग-टर्म मेमोरी में भेजता है और फालतू चीजें हटा देता है. इसके अलावा वह नींद में भी सक्रिय रूप से समस्याओं और प्रश्नों के समाधान तलाशता है.

प्रिया ने शपथ पत्र पढ़े और साथ के साथ जहाँ उनमें दस्तावेजों का उल्लेख आता गया वह दस्तावेजों को भी संदर्भ के साथ देखती गयी. रात बारह बजे बाद जब वह सोने गई तब उसके दिमाग में पूरा ख़ाका बन गया था कि प्रबंधन इनसे क्या साबित करना चाहता है. अब उसके दिमाग में प्रश्न था कि उसे कौनसी सूचनाएँ तलाशनी चाहिए जिनसे वह प्रबंधन के मुद्दों को असिद्ध कर सके और श्रमिक पक्ष को सिद्ध कर सके. इसी प्रश्न को जेहन में लिए उसे नींद आ गई.

पूरे सात घंटे की नींद लेकर सुबह सवा सात बजे उसकी नींद खुली. नित्य की तरह दो गिलास पानी पीकर उसने गैस पर चाय के लिए पानी चढ़ाकर, मंजन करते करके उसे ध्यान आया कि फैक्ट्री इलेक्ट्रॉनिक सर्किट (IC) बनाती है, इसलिए यहाँ काम आने वाला कच्चा माल सिलिकॉन वेफर्स और फोटोरेसिस्ट केमिकल्स जैसे संवेदनशील सामान की हेरफेर को पकड़ना ही प्रबंधन को बेनकाब करने का रास्ता हो सकता है. आज यदि वह सुबह का नाश्ता एमबी में करे तो उसे समय मिल जाएगा. जिसमें वह कल मिले दस्तावेजों की सामग्री को डिजिटल डाटा में बदल सकती है. इस डाटा और शपथ पत्रों की प्रतियों को वह राहुल, स्नेहा और आदित्य को भी दे दे तो वे भी कोई काम की चीज तलाश सकते हैं. इससे आज की शाम चार लोग काम करके कुछ न कुछ ऐसा जरूर तलाश सकते हैं जो प्रबंधन के गवाहों के लिए सरप्राइजिंग हो और जिससे क्लोजर के आधार को मिथ्या सिद्ध किया जा सके. उसने यही किया. उस शाम चारों ने एमबी से अपना डिनर पैक करवाया और घर जाकर इस काम में जुट गए.

रात दस बजे आदित्य की वीडियो काल आई, उसने चारों को कॉन्फ्रेंस पर ले रखा था.

“ईसीआई फैक्ट्री के 'इन्वेंट्री डेटा' और 'परचेज़ लेज़र' के डाटा को एक साथ खोल कर देखो.” आदित्य ने कहा.

तीनों ने अपने लैपटॉप पर इन्हें खोला.

“अब शपथ पत्र से इन्हें मिलाकर देखो.”

प्रिया ने मिलान करके देखा तो वह उछल पड़ी. वहाँ जीएम के शपथ-पत्र में लिखा था, 'सिलिकॉन वेफर्स' की वैश्विक कमी के कारण उत्पादन ठप पड़ा है. लेकिन मार्च के 'स्टॉक रजिस्टर' 5,000 यूनिट्स का ओपनिंग बैलेंस दिखा रहा था. उधर अप्रैल की शुरुआत में कोई 'सेल्स एंट्री' नहीं थी. अगर माल नहीं बना, तो ये वेफर्स कहाँ गायब हो गए थे?"

“ये तो बहुत जबर्दस्त बात है. मैं नोट कर रही हूँ.”

“इसके आगे कुछ और भी है,” आदित्य ने कहा. “प्रिया, IC बनाने में इस्तेमाल होने वाले फोटोरेसिस्ट रसायनों की शेल्फ-लाइफ बहुत कम होती है. हड़ताल के कारण फैक्ट्री में तो उत्पादन बंद था. फिर पिछले हफ्ते इन महंगे रसायनों को 'डिस्पोज' करने का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं है? फैक्ट्री में चोरी छिपे तो उत्पादन हो नहीं सकता. मजदूर गेट से चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं. यह माल जरूर कहीं और डाइवर्ट किया जा रहा है."

“तुम ठीक कह रहे हो आदित्य. सुबह चव्हाण साहब को बताते हैं. किसी और के पास और कुछ न हो तो अब काम बन्द करके सोने जाया जाए?”

“हाँ बिलकुल.” सबने उत्तर दिया. कॉन्फ्रेंस समाप्त हुई.

अगली सुबह जयपुर से आकाश का फोन आया. वह पिछले दो दिनों से कोटा में प्रिया के घर के आसपास ही था. उसने बताया कि वह काली संदिग्ध गाड़ी अब वहाँ नहीं दिख रही है. आकाश ने मयंक और पापा को स्थानीय पुलिस स्टेशन ले जाकर 'सर्विलांस' की अनौपचारिक शिकायत दर्ज करवा दी थी.

आकाश ने प्रिया को ढाढस बंधाया, "प्रिया, यहाँ अब सब शांत है. मयंक अब डरा हुआ नहीं है, बल्कि वह उन जासूसों की फोटो खींचने की ताक में है. तुम मुंबई की इस कानूनी लड़ाई पर ध्यान दो. कल 19 अप्रैल का दिन तुम्हारा होना चाहिए."

उस शाम, प्रिया ऑफिस से लौटते हुए यूनियन ऑफिस पहुँची, वहाँ उसने देखा कि रामजी काका और प्रशांत बाबू कुछ पर्चियों का मिलान कर रहे थे. यह हड़ताल का 38वां दिन था और मजदूरों के सब्र का बाँध अब टूटने को था.

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराकर प्रिया को बताया, "आइडिया (IIDEA) से जुड़ी अन्य यूनियनों ने हमारे 350 परिवारों के लिए रसद का इंतजाम किया है. आज रात दस बजे बाद अनाज के बीस-बीस किलो के कट्टे मजदूरों के घरों तक पहुँचना शुरु हो जाएंगे."

रामजी काका ने भावुक होकर कहा, "बेटा, पेट की आग बड़ी जालिम होती है. प्रबंधन ने सोचा था कि भूख हमें घुटनों पर ले आएगी, पर अब कल तुम जब कॉमरेड चव्हाण के साथ अदालत में खड़ी होगी, तब इन 350 परिवारों की एकता की तुम्हारे साथ होगी."

कुछ ही देर बाद वकील रमेश चव्हाण वहाँ पहुँच गए. प्रिया ने 19 अप्रैल के लिए उनके सामने अपना नोट रख दिया जिसमें तीन मुख्य सवाल थे:

1. यदि उत्पादन बंद था, तो क्लीन रूम (Clean Room) को मेंटेन करने के लिए बिजली की खपत 'पीक' पर क्यों थी?

2. स्टॉक रजिस्टर से गायब हुए 5,000 सिलिकॉन वेफर्स का विधिक स्पष्टीकरण क्या है?

3. क्या 'वेस्ट डिस्पोजल' के नाम पर असल में तैयार IC को फैक्ट्री से बाहर भेजा गया?

प्रिया ने खिड़की के बाहर देखा. दूर फैक्ट्री की लाइटें जल रही थीं. उसे यकीन हो गया कि कल की जिरह केवल एक विधिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस 'सत्य' की स्थापना होगी जिसे प्रबंधन ने फाइलों के नीचे दबा रखा था.
... क्रमशः

रविवार, 19 अप्रैल 2026

कानूनी बिसात

देहरी के पार, कड़ी - 28
मंगलवार, 16 अप्रैल, 2019.

सुबह के 11 बज चुके थे. एएसएल (Assistant Secretary Labour) के दफ्तर में आज का माहौल पिछली पेशी से भी ज्यादा तनावपूर्ण था. करीब सवा सौ मजदूर. दफ्तर के अहाते में खड़े थे. वकील चव्हाण, प्रशांत बाबू , प्रिया, और यूनियन के अध्यक्ष व सचिव एएसएल के इजलास में सुनवाई शुरू होने का इन्तजार कर रहे थे. कंपनी की टीम, उनका वकील और उसके सहायक अभी तक नहीं आए थे और असिस्टेंट सेक्रेटरी भी अभी अपने चैंबर में थे.

प्रिया कल रात आकाश से कोटा के अपडेट लेती रही थी, आज थोड़े कम उत्साह में थी. लेकिन उसकी आँखों में जिद और संकल्प वैसे ही थे. घर की देहरी लांघने के बाद के संघर्ष ने उसे अनेक नए पाठ सिखाए थे. वह जानने लगी थी कि संघर्ष में साथ और एकता जरूरी चीजें हैं. उसके संघर्ष में लोगों ने उसका साथ दिया था क्योंकि वे एक जैसे लोग थे; उनके संघर्ष एक थे. आज उसे मजदूरों की बड़ी एकता में अपना योगदान करना था. यही एकता उन्हें मजबूत और भयमुक्त बनाती थी. आकाश कल रात कोटा पहुँच गया था और उसने बताया था कि वह गाड़ी 'स्थानीय' नहीं थी. आकाश की उपस्थिति और जानकारियों से मयंक अब थोड़ा राहत महसूस कर रहा था.

कंपनी की टीम अपने वकील के साथ सवा ग्यारह के बाद इजलास में दाखिल हुई. उन्हें देख कर रीडर ने एएसएल को सूचना दी. दस मिनट बाद वह इजलास में था.

जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, एएसएल ने कड़क लहजे में पूछा, "मिस्टर भट्ट, पिछली पेशी पर हर्जाने की शर्त के साथ आपको आज शपथ पत्र (Affidavits) और उनकी कॉपियाँ यूनियन को देनी थी. क्या वे तैयार हैं?"

प्रबंधन के वकील, मनोज भट्ट ने एक भारी फ़ाइल मेज पर रखी, "जी हुज़ूर, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से हम केवल मुख्य डायरेक्टर का ही शपथ पत्र तैयार कर पाए हैं. बाकी दो के लिए हमें थोड़ा और समय चाहिए."

वकील चव्हाण तुरंत अपनी जगह से खड़े हुए, "सर! यह साफ़ तौर पर 'डिले टैक्टिक्स' है. 14 मई की डेडलाइन नजदीक है और ये जानबूझकर मामले को खींच रहे हैं. पिछली बार का 10 हजार रुपये का हर्जाना भी इन्होंने अदा नहीं किया है."

एएसएल ने जीएम की ओर देखा, जो पसीना पोंछ रहे थे. "मिस्टर जीएम, कानून किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. आप क्लोजर का आवेदन लेकर आए हैं. साढ़े तीन सौ से अधिक कर्मचारियों की रोजी-रोटी दाँव है. मुझे 60 दिन पूरे होने से पहले अपने फैसले की कॉपी आपके हाथ में देनी है. आज 32वाँ दिन है मेरे पास सुनवाई के लिए 25 दिन भी नहीं बचे हैं. मुझे निर्णय देना है. मैं ढाई बजे फिर बैठूंगा. तब तक सभी गवाहों के शपथपत्र यहाँ रिकॉर्ड पर होने चाहिए और उनकी कॉपियाँ चव्हाण साहब के पास. हर्जाना अदा किया हुआ होना चाहिए.”

“जी", एएसएल की बात को अब तक चुपचाप सुन रहा प्रबंधन का वकील बोला. “हम ढाई बजे यहाँ होंगे हुजूर. तब हम जो भी शपथ पत्र हमें पेश करने हैं पेश कर देंगे.”

प्रबंधन की टीम इतना कहकर दफ्तर से बाहर निकल आई.

“चव्हाण सर.” प्रिया बोली. “अब आज केवल शपथ पत्र ही आएंगे. जिरह के लिए संभवतः शुक्रवार की पेशी दी जाएगी. आज मेरा कोई काम नहीं है. अभी 12 नहीं बजे हैं. मैं आधे घंटे में अपने ऑफिस पहुँच जाउंगी. मैं आज की छुट्टी बचा सकती हूँ?”

“हाँ, तुम जा सकती हो. आज शपथ पत्र आ जाएंगे. तुम अपने ऑफिस से निकलो तो मेरे ऑफिस होते हुए घर जाना. मैं वहाँ तुम्हें शपथ पत्रों की प्रतियाँ दे दूंगा. तुम उस पर अपनी रिसर्च शुरू कर सकती हो.”

“जी सर, मैं शाम में आपके ऑफिस आती हूँ.” इतना कहकर प्रिया तेजी से वहाँ से निकल गई.

...

अपने ऑफिस से निकलकर रात साढ़े आठ बजे प्रिया चव्हाण साहब के ऑफिस पहुँची. चव्हाण साहब के चैंबर में कोई और मुवक्किल बैठा था. प्रशांत बाबू बाहर उनके वेटिंग रूम में मिल गए. प्रिया ने उनसे पूछ लिया, “ढाई बजे क्या रहा?”

“ज्यादा कुछ नहीं, उन्होंने तीन शपथ पत्र और कुछ दस्तावेज पेश किए हैं. दस हजार रुपए हर्जे के अदा किए हैं. चव्हाण साहब ने तुम्हारे लिए उनकी कॉपियाँ करवा दी हैं. तुम ले लेना जिससे तुम उनकी खोजबीन कर सको.” प्रशांत बाबू ने बताया.

“और हाँ, पेशी होने के बाद हम लोग बाहर निकले तो प्रबंधन के वकील का जूनियर बाहर ही खड़ा था. उसने बताया कि जीएम साहब और वकील भट्ट कैंटीन में ही बैठे हैं, आपसे बात करना चाहते हैं. हम कैंटीन में गए. वहाँ उनसे बात हुई.”

“क्या कुछ पॉजिटिव बात हुई?”

प्रशांत बाबू मुस्कुराते हुए बताने लगे. “भट्ट ने मुझे कहा कि, “प्रशांत बाबू, क्यों न हम इस मामले को बाहर ही सुलझा लें? क्लोजर तो होकर रहेगा, लेकिन अगर आप और आपके वकील साहब मान जाएँ, तो हम मजदूरों के मुआवजे में थोड़ी बढ़ोतरी कर सकते हैं. आखिर कब तक ये लोग भूखे पेट पिकेटिंग करेंगे?"

“मैंने उनसे पूछा था कि, ‘यदि मजदूर क्लोजर को मान लें तो वे कितना मुआवजा और दे सकते हैं?’ तो वह बता रहा था कि वे सामान्य छंटनी के मुआवजे से दुगना दे सकते हैं.”

“फिर आपने क्या कहा?” प्रिया ने पूछा.

“मैंने कहा, ‘एक तो क्लोजर को मानने का फैसला हम नहीं बल्कि मजदूर उनकी आमसभा में लेंगे. दूसरा यह कि मुश्किल है कि मजदूर इतने मुआवजे पर क्लोजर को मान ले. हमें मजदूरों की आमसभा में उनकी राय लेनी पड़ेगी.’ मेरे इतना कहने पर वे कहने लगे ‘आप अगली पेशी के पहले आमसभा करके हमें बता सकते हैं’ इस पर मैंने उसे कह दिया कि हम कोशिश करेंगे.”

चव्हाण साहब अपने क्लाइंट से फ्री हो लिए थे वे दोनों उनके पास जा बैठे. उन्होंने प्रिया को शपथ पत्रों और दस्तावेजों की प्रतियाँ दीं. प्रिया ने उनसे पूछ लिया, “सर, उन्होंने प्रशांत जी को प्रस्ताव दिया है उस बारे में आपकी क्या राय है?”

“कुछ नहीं, वे फिलहाल हमारा ध्यान क्लोजर की सुनवाई से भटकाना चाहते हैं. लेकिन हम समझौते का रास्ता भी बंद नहीं करेंगे. इसलिए हम अपना पूरा ध्यान सुनवाई पर रखते हुए उनसे बात करते रहेंगे.”

“और हाँ प्रिया, चव्हाण साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “वकील भट्ट तुम्हारे लिए पूछ रहा था कि, ‘आपकी नयी असिस्टेंट दिखाई नहीं दी.’ मैंने उसे कह दिया कि उसे किसी काम से हाईकोर्ट भेजा है.”

इस पर प्रिया को भी हँसी छूट गई. वह कहने लगी, “आपने तो मुझे सचमुच का वकील बना दिया उनके लिए.”

“और मैं क्या कहता?”

“ठीक है सर, मैं शपथ पत्र और दस्तावेज ले जा रही हूँ. इन्हें डिजिटाइज करके अपना काम शुरू करती हूँ. शुक्रवार में केवल दो दिन बीच में हैं. मुझे तेजी से काम करना होगा. कोटा की मुझे अब फिक्र नहीं है, आकाश ने वहाँ संभाल लिया है. अब मेरा पूरा ध्यान इन कागजों में छिपे उन झूठों को पकड़ने पर है जिनके सहारे वे साढ़े तीन सौ से अधिक परिवारों का भविष्य लील जाना चाहते हैं."
... क्रमशः

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

परछाइयों का पीछा

देहरी के पार, कड़ी - 27
जनरल मैनेजर से सफल जिरह के बाद ईसीआई के मजदूरों का मनोबल सातवें आसमान पर था. एएसएल के दफ्तर से बाहर निकलने के बाद मजदूरों के लगाए नारों में जो खनक थी, वह सालों के शोषण के विरुद्ध एक हूँकार जैसी लग रही थी. शामियाने के नीचे अब डर की जगह जीत की चर्चा थी. वह अब केवल धरना स्थल नहीं, बल्कि एक 'कम्युनिटी सेंटर' बन चुका था जहाँ मजदूर अपने हक की बारीकियाँ समझ रहे थे.

प्रिया वहीं से अपने फ्लैट के लिए रवाना हुई. रास्ते भर वह जिरह के दृश्यों को जेहन में दोहराती रही. उसे अपनी नई पहचान—काली पैंट, सफेद शर्ट और वह कोट—किसी कवच जैसी लग रही थी. उसने महसूस किया कि वह 'विक्रांत के डर' की देहरी के बहुत पार निकल आई है. अब उसे विक्रांत की याद डराती नहीं, बल्कि उसकी बेवकूफी भरी हरकतों पर उसे हँसी आने लगी थी.

गुरुवार, 11 अप्रैल को मुख्य श्रम आयुक्त (CLC) के यहाँ समझौता वार्ता नियत थी. प्रबंधन दो बार से वार्ता में नहीं आ रहा था. इसे कलेक्टिव बारगेनिंग में असहयोग मानते हुए श्रम विभाग अनुचित श्रम आचरण के लिए फैक्ट्री की मालिक कंपनी के निदेशकों पर अपराधिक मुकदमा चला सकता था. प्रशांत बाबू और यूनियन की टीम को उम्मीद थी कि आपराधिक मुकदमे के डर से शायद प्रबंधन बातचीत की मेज पर आ जाए. लेकिन जैसा कि अंदेशा था, प्रबंधन नदारद रहा. रामजी काका ने जब शाम को फोन पर प्रिया को बताया कि श्रम आयुक्त ने जनरल मैनेजर और डायरेक्टरों को 'आपराधिक नोटिस' जारी कर दिए हैं, तो प्रिया को एक विधिक जीत का अहसास हुआ. इसका मतलब था कि अब प्रबंधन पर मजदूरों को अंतरिम राहत देने के लिए दबाव बढ़ेगा.

शुक्रवार की रात जब प्रिया अपने फ्लैट पर लौटी, तो थकान के बावजूद उसने वकील चव्हाण से फोन पर बात की. उन्होंने एक नई चुनौती सामने रख दी, "प्रिया, आज प्रबंधन ने शपथ पत्र पेश नहीं किए. उन्होंने चतुराई से समय मांग लिया. हालांकि एएसएल ने उन पर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है, लेकिन असली खेल 'समय' का है. 15 मार्च को नोटिस मिला था और 14 मई की डेडलाइन में अब सिर्फ 29 दिन बचे हैं. वे मामले को लटकाना चाहते हैं ताकि 'डीम्ड क्लोजर' (Deemed Closure) की कानूनी अनुमति मिल जाए."

रविवार की शाम IIDEA ऑफिस में जब बैठक चल रही थी, तभी प्रिया का फोन घनघना उठा. कोटा से पापा की कॉल थी. प्रिया का दिल धड़क गया, क्योंकि पापा उसे रात नौ बजे से पहले कभी फोन नहीं करते थे.

प्रिया ने कांपते हाथों से फोन उठाया और उसे स्पीकर पर लिया. "बेटा, कल से घर के बाहर एक काली गाड़ी खड़ी है," पापा की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, "आज दो आदमी आए थे, पूछ रहे थे कि क्या तुम वाकई किसी लॉ फर्म में काम कर रही हो? वे मयंक के बिजनेस के बारे में भी सवाल पूछ रहे थे. मयंक थोड़ा डरा हुआ है."

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. प्रशांत बाबू और चव्हाण साहब ने एक-दूसरे की ओर देखा. प्रिया को समझ आ गया कि 9 अप्रैल की जिरह के बाद प्रबंधन ने उसकी 'जड़ें' खोदना शुरू कर दिया है. वह विधिक लड़ाई को व्यक्तिगत हमले से रोकने की कोशिश में जुटा था.

प्रिया ने तुरंत जयपुर से आकाश को कॉन्फ्रेंस कॉल पर लिया. आकाश ने स्थिति की गंभीरता भांपते हुए कहा, "प्रिया, तुम विचलित मत हो. मैं आज रात की बस से कोटा निकल रहा हूँ. मैं देखूँगा कि ये 'जासूस' किस एजेंसी के हैं. मयंक और अंकल अकेले नहीं हैं. तुम बस अपनी इस लड़ाई पर ध्यान दो."

आकाश के आश्वासन ने प्रिया को संबल दिया, पर उसे अहसास हुआ कि ईसीआई प्रबंधन अब केवल उसके 'डेटा' से नहीं, उसके 'अस्तित्व' से लड़ रहा है.

बैठक खत्म होने के बाद जब यूनियन के सदस्य चले गए, तब रामजी काका और प्रशांत बाबू अकेले रह गए. रामजी काका ने धीमी आवाज़ में अपना डर साझा किया, जो पिछले कुछ दिनों से उन्हें खाए जा रहा था.

"प्रशांत, हड़ताल को आज 35 दिन पूरे हो गए. मार्च की आखिरी पगार जो मजदूरों को मिली थी, वह अब अंतिम सांसें ले रही है. कल फैक्ट्री गेट की पिकेटिंग पर कल्ला और रामदीन राशन की मदद के बारे में पूछ रहे थे. शिंदे सही कहता था, मुंबई की दूरियों में 'सामूहिक रसोई' संभव नहीं है, लेकिन हमें इन 350 परिवारों तक आटा-दाल पहुँचाने का कोई रास्ता ढूंढना होगा. स्वाभिमान की लड़ाई भूखे पेट नहीं लड़ी जा सकती."

प्रशांत बाबू ने लंबी सांस ली, "यह दोहरी घेराबंदी है काका. एक तरफ क्लोजर की कानूनी डेडलाइन और दूसरी तरफ मजदूरों की खाली होती रसोइयाँ. इन्होंने प्रिया के परिवार को डराकर उसे तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है. सरकार मामले को एक दो रोज में न्याय निर्णयन के लिए लेबर कोर्ट को भेजेगी, हड़ताल और तालाबंदी पर पाबंदी लगाएगी. ऐसे में मजदूरों को काम पर जाना होगा. बस मिनिस्टर दबाव डालकर कुछ अंतरिम राहत दिला दे तो ठीक, नहीं तो हमें आइडिया से सम्बद्ध यूनियनों से मदद लेनी पड़ेगी."

प्रिया, जो फाइलें समेटने के लिए कमरे में दाखिल हुई थी, उसने यह बात सुन ली. उसकी आँखों में आँसू नहीं, बल्कि एक योद्धा वाली चमक थी. उसने मेज पर अपना लैपटॉप रखते हुए कहा, "सर, अगर वे मेरे घर तक पहुँच रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हम जीत रहे हैं. वे बुरी तरह डरे हुए हैं. जिरह के दौरान जब उनकी चोरी पकड़ी गई, तभी उन्होंने यह रास्ता चुना है. अब हमें रुकना नहीं है."

प्रिया ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अब और भी मजबूती से 'निजी दौरों और फर्जी खर्चों' का ब्यौरा अदालत के पटल पर रखने की तैयारी करेगी. उसे अहसास हुआ कि उसकी जड़ें केवल कोटा की मिट्टी में नहीं, बल्कि मुंबई के उन मजदूरों के चूल्हों की आग में भी हैं जो आज उसकी ओर उम्मीद से देख रहे थे.

प्रिया ने मन ही मन खुद से कहा— 'देहरी के उस पार का डर अब बीत चुका है, अब इस पार की ज़मीन को मज़बूत करना ही मेरा इष्ट है.'
... क्रमशः

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

खेद

कथा श्रृंखला : देहरी के पार
प्रिय पाठकों,

मेरा मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है. मैंने बचपन से ही बहुत पढ़ा, और जब भी विदेशी साहित्य पढ़ा तो उनकी 'तथ्यात्मक सटीकता' ने मुझे प्रभावित किया. इसके उलट, अक्सर भारतीय फिक्शन, सिनेमा और टीवी में स्थान, काल, विज्ञान और विशेषकर 'कानूनी प्रक्रियाओं' को लेकर गंभीर त्रुटियाँ देखने को मिलती हैं. एक पाठक अक्सर इन जानकारियों को सत्य मान लेता है, जिसका खामियाजा उसे वास्तविक जीवन में उठाना पड़ सकता है.

एक लेखक और एक पेशेवर वकील होने के नाते, मेरा यह सदैव प्रयास रहता है कि मेरे लेखन में 'फिक्शन' भले हो, पर 'तथ्य' पूरी तरह सत्य हों. मेरे ब्लॉग 'अनवरत' पर चल रही कथा श्रृंखला "देहरी के पार" इसी शोध और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी जा रही है. इसकी हर कड़ी बिल्कुल ताज़ा होती है—लिखने और प्रकाशित करने के बीच मुश्किल से 24 से 48 घंटों का अंतर होता है.

परंतु, कभी-कभी शोध की गहनता या कुछ अपरिहार्य व्यवधानों के कारण यह लय टूट जाती है. कल इसी कारण और कुछ प्रोफेशनल व्यस्तता के कारण श्रृंखला की अगली कड़ी समय पर प्रकाशित नहीं हो सकी. मुझे पता है कि आप उत्सुकता से इसका इंतज़ार करते हैं और आपके व्यक्तिगत संदेशों ने मुझे आपकी इसी प्रतीक्षा और स्नेह का अहसास कराया.

आपके समय और इस 'इंतज़ार' के प्रति मैं अपनी संवेदनशीलता व्यक्त करता हूँ. पाठकों को हुई निराशा के लिए मुझे खेद है. मेरी कोशिश रहेगी कि यह सिलसिला नियमपूर्वक चलता रहे और मैं अपने शोध पूर्ण लेखन के माध्यम से निरंतर आपके साथ बना रहूँ.

स्नेह और आभार,

@दिनेशराय द्विवेदी