@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

बुधवार, 3 जून 2026

प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 62

सुबह नींद टूटी तो कमरे में धूप प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया की निगाह सामने दीवार पर टंगी डिजिटल घड़ी की ओर गई. वह समय : साढ़े सात, दिन : रविवार 31 मई 2019 दिखा रही थी. उसे आज कहीं नहीं जाना था. आज वह खूब सोई थी, लगभग सात घंटे. उसने रसोई में जाकर दो गिलास पानी पिया और चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ाकर ब्रश करने लगी. आज उसे कहीं नहीं जाना था, कोई अपॉइंटमेंट नहीं था. आधे घंटे बाद सफाई वाली मेड आ जाएगी. आज उसे रोककर डस्टिंग करवाएगी. कपड़े न जाने कितने बिना धुले हो रहे होंगे? चाय पीने के बाद उन्हें छाँटकर धोने के लिए मशीन में डाल देगी. सब कामों से निपटने के बाद खाना बनाकर खाएगी और दिन में कम से कम दो घंटे जरूर सोएगी. फिर उठकर चाय पीएगी और शाम को कोई किताब पढ़ेगी.

पर सोचा हुआ कब होता है? मेड के जाने के बाद उसने स्नान किया. कुकर में दाल और चावल दोनों पकने के लिए छोड़ दिए. तभी फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे, “तुमसे तुम्हारे घर आकर मिलना है, कब आ सकता हूँ?”

“सर, कभी भी. आज दिनभर घर पर ही हूँ.”

“शाम सात बजे ठीक रहेगा?”

“हाँ, क्यों नहीं. पर सर, कुछ खास काम है?’

“नहीं, कुछ खास नहीं. पर तुमसे बातें करनी हैं. हम जब भी मिलते हैं हमेशा काम की बातें होती हैं, मैं तुमसे जो बातें करना चाहता हूँ वे रह जाती हैं. आज यूनियन ऑफिस से शाम छह बजे तक फ़ारिग हो लूंगा. फिर आता हूँ तुम्हारे यहाँ”

“सर, मैं इंतज़ार करूंगी.”

कॉल कट जाने के बाद वह सोचने लगी. आखिर क्या बात हो सकती है. प्रशांत बाबू आखिर उससे क्या बातें करना चाहते हैं? सवाल तो दिमाग में आते हैं यह दिमाग का उसूल है. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. फिर उसने इस पर सोचना बंद कर दिया और वाशरूम में वाशिंग मशीन संभालने चल दी.

खाने में दाल-चावल थे. उसने सलाद तैयार कर लिया था, अचार का मर्तबान भी उतारकर टेबल पर रख लिया और खाना खाने बैठी. अचानक उसे आकाश की याद आई. कल का पूरा दिन वह साथ था. उसके जाने के बाद वह उसके साथ अपने संबंध और आपसी व्यवहार के बारे में सोचती रही थी. पता नहीं आकाश ने उसके बारे में क्या सोचा होगा? उसकी इच्छा हुई कि वह आकाश को कॉल लगाकर बात करे. फिर रुक गई. अक्सर वही आकाश को पूछती रही है. इस बार आकाश को ही फोन करने दो.

शाम सवा सात बजे करीब प्रशांत बाबू प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया. एक ट्रे में पानी से भरे दो गिलास और ठंडे पानी की एक बोतल टेबल पर लाकर रखी और पूछा, “सर चाय या कॉफी कुछ बनाऊँ?”

“चलो बिना चीनी के ब्लैक कॉफी बना लो.”  प्रशांत बाबू ने कहा तो वह कॉफी बना लाई, साथ ही बिस्कुट भी ले आई.”

“प्रिया, तुम्हारी नौकरी कैसी चल रही है?” प्रशांत बाबू ने ही बात आरंभ की.

“ठीक है सर, कोई व्यवधान नहीं है. मैं हमेशा अपना काम समय से पूरा करती हूँ, तब भी जब मुझे बीच में किसी काम से अवकाश लेना पड़ता है. फिर देसाई साहब मैनेजर हैं तो कोई समस्या नहीं है.”

“फिर ठीक है. इस बीच तुमने ईसीआई  के आंदोलन में बहुत मदद की. उसके लिए अदालत तक जाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाई. मैं जानना चाहता था कि उससे तुम्हारी नौकरी में कोई परेशानी तो नहीं हुई.”

“नहीं सर, आप उसकी चिंता न करें. जब मैंने घर छोड़ा, माता-पिता और भाई से किसी तरह की मदद की कोई आशा भी उसी के साथ छोड़ दी थी. मैं जानती हूँ कि अपना जीवन मुझे ही चलाना है. यह नौकरी मुझे आत्मनिर्भर बनाती है, और यह आत्मनिर्भरता मुझे एक स्वतंत्र व्यक्ति बनाती है. मैं स्वतंत्रता का मूल्य जानती हूँ. मैं इसे खोने जैसा कोई काम जानबूझकर तो नहीं करूंगी.”

“तुम बहुत समझदार हो, प्रिया. फिर भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम खुद को नुकसान न पहुँचा लो.” प्रशांत बाबू ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा.

“नहीं सर ऐसा नहीं होगा. यदि कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो उससे पहले आपको पता लग जाएगा.”

“तुमने इस बीच यूनियन लाइब्रेरी से लाकर बहुत किताबें पढ़ी हैं, उनके बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?”

“सभी किताबें अच्छी हैं. बहुत कुछ सिखाती हैं. बस उन्हें समझने के लिए अक्सर कई बार पढ़ना पड़ता है. कुछ के बारे में ऐसा लगता है कि वे मेरे पास होनी चाहिए. मैंने ऐसी कुछ किताबें ऑनलाइन खरीद लीं है”

“हाँ, उनमें से अनेक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, मेरे पास भी बहुत किताबें हैं. वैसे इनमें से तुम्हें सबसे अधिक किस किताब ने प्रभावित किया?”

“मुझे ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति”  ने बहुत कुछ सिखाया. मैं समझ पाई कि कैसे मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद उसके परिवार का विकास हुआ है. असल में मार्क्सवाद के एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत को समझने के लिए यह सबसे बेहतरीन प्रारंभिक पुस्तक है. उसे पढ़ने के बाद मैंने एल.एच.मोर्गन की किताब “प्राचीन समाज” मंगा ली है, उसे पढ़ रही हूँ. मुझे इस किताब से समझ आया कि मनुष्य समाज लगातार विकसित हुआ है और उसका विकास जारी है. उसी से निजी संपत्ति की उत्पत्ति और उसके कारण समाज में वर्गों की उत्पत्ति समझ सकी. यह भी जाना कि वर्ग-संघर्ष ने समाज को कैसे उत्तरोत्तर उन्नत समाज व्यवस्थाओं तक पहुँचाया है.”

“तुमने ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ भी तो पढ़ी हैं.?”

“पढ़े हैं सर, घोषणापत्र तो मैंने पहले भी पढ़ा था, पर तब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. उनसे ही समझ आया कि मजदूर वर्ग की मुक्ति तमाम अन्य शोषित वर्गों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है. इस तरह मजदूर वर्ग को खुद अपनी मुक्ति के लिए तमाम वर्गों को मुक्त करना होगा. इस प्रक्रिया में वह मनुष्य समाज के वर्गों को समाप्त कर सकता है. तर्क के स्तर पर यह प्रस्थापना पूरी तरह उचित लगती है. उसी से मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी का महत्व समझ आता है.”

“यह अच्छी बात है कि तुम मजदूर वर्ग की पार्टी का महत्व समझा है.”

प्रशांत बाबू ने कॉफी का कप उठाया, लेकिन उसकी कॉफी समाप्त हो चुकी थी. प्रिया देखकर मुस्कुराई, “सर, एक कॉफी बनाऊँ.”

“नहीं उसकी जरूरत नहीं. खाने का समय हो रहा है, फिर भूख मर जाएगी.” प्रशांत बाबू ने मना किया और अपनी बात जारी रखी. “प्रिया, असल में मैं एक महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ. जब से ईसीआई के मजदूरों का आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से तुम उसमें शामिल रही हो और आंदोलन के महत्वपूर्ण काम किए हैं. कॉमरेड कुलकर्णी हमारी पार्टी के राज्य सचिव हैं उन्होंने तुम्हें परखा है. उनका कहना है कि मैं तुम्हें हमारी पार्टी की मेंबर बनने का प्रस्ताव दूँ.”

सुनकर प्रिया स्तब्ध रह गई और सोच में पड़ी बहुत देर तक प्रशांत बाबू के चेहरे की ओर देर तक देखती रही.

“सर मैं जानती हूँ कि मजदूर वर्ग की पार्टी के सदस्य होने का अर्थ क्या होता है. उसे मजदूर वर्ग के हितों को सर्वोपरि रखने की शपथ लेनी होती है और उस पर खरा उतरना होता है. उसका जीवन पूरी तरह मजदूर वर्ग को समर्पित होता है, उसे हमेशा बलिदान के लिए तैयार रहना होता है. मैं समझती हूँ कि वह आसान नहीं है. मैं उसके लिए अभी खुद को उसके लिए तैयार नहीं पाती. सर उसके लिए मुझे सोचना पड़ेगा.” प्रिया ने उन्हें बहुत स्पष्ट उत्तर दिया.

“तुम्हारा कहना बिलकुल सही है. हर व्यक्ति को जिसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिले उसे सोच समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए. मुझे कॉमरेड कुलकर्णी ने जिम्मेदारी दी थी. उसका एक हिस्सा मैंने पूरा कर दिया है. मैं आगे भी कोशिश करता रहूँगा.” यह कहते हुए प्रशांत बाबू मुस्कुराए.

प्रिया हँस पड़ी. “सर, आप कोशिश करते रहिए. मैं भी लायक बनने की कोशिश करती रहूँगी.”

“प्रिया, साढ़े आठ बज रहे हैं. खाने का क्या करोगी?” प्रशांत बाबू ने पूछा.

“बस अब बनाऊंगी. वैसे भी मैं ऑफिस से लौटते हुए यही समय हो जाता है. मेरे लिए नॉर्मल है.”

“मैं रोज की तरह अपना डिनर ‘एमबी’ में करूंगा. तुम भी साथ चलो. मेरे पास आज कार है. तुम्हें वापस छोड़ दूंगा. इस बीच कुछ बातें और हो जाएंगी.”

“ठीक है सर, आप रुकिए. मैं कपड़े चेंज करके आती हूँ.” प्रिया कह कर अंदर अपने कमरे में चली गई.

आधे घंटे बाद दोनों ‘एमबी’ में डिनर कर रहे थे. खाते हुए भी प्रशांत बाबू अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे. और प्रिया गंभीरता से उन्हें सुन रही थी.

... क्रमशः

सोमवार, 1 जून 2026

आकाश

देहरी के पार, कड़ी - 61
टैक्सी पवई की ओर आगे बढ़ी. प्रिया पीछे छूट गई. लेकिन आकाश की आँखों में फोर्ट एरिया की गोथिक इमारतों की छाँव से लेकर गेटवे ऑफ इंडिया पर आती समंदर की हवाओं तक, प्रिया के साथ बिताया गया आज का एक-एक पल किसी चलचित्र की तरह गतिशील था. उसने टैक्सी से बाहर की ओर देखा, वहाँ तमाम रोशनियाँ पीछे प्रिया की ओर दौड़ी जा रही हैं. कुछ ही देर में टैक्सी उसकी सोसायटी के गेट पर खड़ी थी. उसने टैक्सी को भाड़ा देकर विदा किया.

फ्लैट का दरवाज़ा खोला, तो वहाँ उसका स्वागत करने के लिए सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं था… दो सप्ताह पहले एक सुबह सूर्योदय के ठीक पहले बोरिवली स्टेशन पर उतरने के पहले तक वह सोच रहा था कि इस विशाल महानगर की दौड़ती हुई अजनबी भीड़ में वह तैरने के लिए अकेला होगा. लेकिन कुछ क्षण बाद प्लेटफॉर्म पर उतरते ही प्रिया का अपने किसी अजीज की तरह उसका स्वागत करना, जबरन उसे अपने फ्लैट ले जाना, वहाँ पहुंचते ही अपने हाथों चाय बनाकर देना. दैनिक प्रातःकालीन कर्मों से निवृत्त होने के बाद अपने हाथों पोहा और चाय बनाकर उसे देना, दोपहर एमबी ले जाकर लंच करना और फिर अपने परिचित ड्राइवर के आटो में बिठाकर कंपनी के गेस्ट हाउस भेजना. इन सबने उसे स्नेहसिक्त कर दिया था. उसके बाद इस नए फ्लैट का अंतिम चुनाव उसी ने किया. उसने जूते उतारे, कपड़े बदले और बालकनी में आकर खड़ा हो गया. सामने पवई झील का शांत पानी में लहरें बहुत हल्की उठ रही थीं. दूर हीरानंदानी की गगनचुंबी इमारतें रात के अंधेरे में जगमगा रही थीं. बदन में दिनभर की दौड़-भाग की वजह से अच्छी-खासी थकान थी, लेकिन आँखों से नींद कोसों दूर थी.

उसने रेलिंग पर हाथ टिकाए हुए गहरी साँस ली. आज वह खुद को बहुत अलग और अजीब-सी कशमकश में पा रहा था।

अपने घर से काम कर रही प्रिया एक बहुत ही शांत, गंभीर और अपने काम से काम रखने वाली कलीग थी. फिर अचानक उसे मुख्यालय के आदेश से उसे प्रिया के घर जाकर उसे आवंटित लैपटॉप लेने जाना पड़ा. उसके बाद उसकी सहेली ऋचा के फ्लैट पर पहली बार वह प्रिया से प्रत्यक्ष हुआ. तब उसकी आँखों में उसने बेबसी और छटपटाहट के साथ कुछ कर गुजरने का संकल्प भी देखा था. कोटा से जयपुर तक की चार घंटे की वह कार यात्रा आकाश को आज भी हूबहू याद थी, जहाँ प्रिया बाहरी दुनिया से बेखबर, चुपचाप अपने तमाम अहसासों को दबाए खिड़की से बाहर देखती रही थी, एकदम गुमसुम. वह उसकी खामोशी तोड़ने को उससे कुछ न कुछ कहता रहा. लेकिन वह केवल हाँ- हूँ करके जवाब देती रही.

जयपुर में तीन दिन दो रात वह उसके घर रही. तब उसे लगा था कि प्रिया मुसीबत में फंसी लड़की है जिसे सुरक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है और वह उसकी 'मदद' कर रहा है. उसका मंगेतर विक्रांत उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा भी, लेकिन पापा की सूझबूझ से उसे गिरफ्तार होना पड़ा. उसी दिन कंपनी ने उसकी पोस्टिंग मुख्यालय मुंबई में कर दी और अगली सुबह ही वह फ्लाइट लेकर मुंबई चली आई. इस बीच उसके अवचेतन में कहीं न कहीं प्रिया के रक्षक वाली भूमिका बनी रही.

"लेकिन आज..." आकाश ने बुदबुदाते हुए अपना सिर झटका.

यहाँ मुंबई में प्रिया का रूप कुछ और ही था. वह बिंदास तरीके से उसे लेने बोरिवली स्टेशन पहुँची और उसे अपने फ्लैट ले गई. चार घंटों में वहाँ उसने प्रिया का एक और रूप देखा. एक गृहस्थिन की तरह उसकी मेहमाननवाजी का, ‘एमबी’ में रामजी काका और फिर ऑटो ड्राइवर बब्बन के चरित्र, वे उसके क्या थे? मित्र, साथी या शुभचिंतक? वह उनके उस संबंध को अभी तक नहीं समझ सकता था. और आज, फोर्ट एरिया में उसने प्रिया का एक और बिल्कुल अलग और विराट रूप देखा. कंप्यूटर स्क्रीन पर मज़दूरों के शोषण के आंकड़ों को एक वैज्ञानिक हथियार में बदल देना, एडवोकेट रमेश चव्हाण जैसी कड़क और नामचीन शख्सियत से पूरी तार्किकता और आत्मविश्वास के साथ बात करना. वह लड़की जो कुछ महीने पहले अपने घर की देहरी लांघने के बाद सहमी हुई थी, आज मुंबई के इस ऐतिहासिक विधिक हलके में बड़े-बड़े दिग्गजों को प्रभावित कर रही थी.

कैफे मिलिट्री की दोपहर आकाश की आँखों के सामने तैर गई. चाय की चुस्कियों के बीच अचानक उसके मुंह से निकल गया था—‘एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं.’

आकाश ने बालकनी की दीवार पर हल्का सा मुक्का मारा. उसने खुद से सवाल किया कि आखिर उसके भीतर यह डर क्यों आया था? आया भी था तो उसने उसे उसके सामने अभिव्यक्त क्यों कर दिया था? तब उसका पुरुष वादी अहंकार कहाँ जा छिपा था. क्या वह प्रिया की इस बढ़ी हुई शख्सियत और उसकी अद्भुत प्रतिभा से सहम गया था? या फिर यह डर उस सम्मान से उपजा था जो उसके दिल में प्रिया के लिए पल-पल गहरा होता जा रहा था? क्या वह एक सच्चे इंसान का विस्मय था जो अपनी कलीग की इस ऊँचाई देखकर पैदा हुआ था?

उसे पलटकर दिया गया प्रिया का जवाब याद आया, जिसने उसके सारे संशयों को शांत कर दिया था—‘हम जीवनयात्रा में कहीं भी अपने आप को असहाय पा सकते हैं... वैसे, क्या हम एक दूसरे को सहारा नहीं दे सकते? हम कोई प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?’

आकाश ने सोचा कि प्रिया के इन शब्दों का असल अर्थ क्या था? उसने उसकी बात को, उस डर को किस रूप में लिया था. क्या वह एक मित्र की सांत्वना मात्र थी, या उसके अंतर्मन में भी अब आकाश को लेकर कोई नया अंकुर पनप रहा था? क्या प्रिया ने इसे भविष्य के किसी बंधन या विवाह के संकेत के रूप में तो नहीं देख लिया है?

विचारों का यह ताना-बाना उसे और गहरे ले गया. वह जानता था कि उसके मम्मी-पापा और छोटी बहन तान्या प्रिया को उन दो रातों से ही चाहने लगे थे. उसके मुंबई चले आने के बाद,माँ ने बार-बार उसकी सादगी और उसकी हिम्मत की सराहना की थी. लेकिन क्या प्रिया जैसी आज़ाद, स्वाभिमानी और बौद्धिक रूप से समृद्ध लड़की उसके सीधे-साधे, पारंपरिक परिवार के माहौल में पूरी तरह सहज होने के लिए स्वयं को तैयार कर पाएगी? और सबसे बड़ा और कड़वा सवाल—विक्रांत के उस कुरूप और थोपे गए रिश्ते के अनुभव के बाद, क्या प्रिया इतनी जल्दी किसी भी पुरुष पर दोबारा पूरा और अटूट भरोसा करने को तैयार होगी?

आकाश ने टेबल पर रखे फोन को देखा. मन हुआ कि अभी प्रिया को कॉल करे और पूछ ले कि वह सोई या नहीं. लेकिन उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया. वह जानता था कि प्रिया कोई साधारण लड़की नहीं है. उसे किसी भावुकता, जल्दबाजी या सतरंगी वादों से प्रभावित नहीं किया जा सकता. उसे समय चाहिए, और सबसे बढ़कर उसे एक ऐसा साथी चाहिए जो उसकी आत्मनिर्भरता की देहरी का सम्मान करे, न कि उसे विवाह के पवित्र बंधन के नाम पर किसी नए दायरे में बांधना चाहे.

घड़ी की घंटे की सुई बारह के अंक को पार कर चुकी थी. अचानक आकाश के चेहरे पर एक शांत और गंभीर मुस्कान छा गई. उसके मन का बवंडर अब थमने लगा था. उसने मन ही मन एक बेहद परिपक्व निर्णय लिया. वह प्रिया पर किसी भी बात का दबाव नहीं बनाएगा. वह उसकी राह का प्रतियोगी नहीं, बल्कि उसकी हर कठिनाई में उसका सबसे मजबूत सहारा बनने की कोशिश करेगा.

उसने बालकनी का दरवाज़ा बंद किया, कमरे की बत्ती बुझाई और बिस्तर पर लेट गया. पवई झील के पानी से टकराकर आने वाली हवा हल्के से खिड़की के परदों को सहलाए जा रही थी. उसके और प्रिया के बीच कोई वादा नहीं था, कोई इकरार नहीं था, लेकिन इस रात आकाश अपने अंतर्मन के समंदर को पार करने के लिए छलांग लगा चुका था.
... क्रमशः

रविवार, 31 मई 2026

उलझे सवाल

देहरी के पार, कड़ी - 60
टैक्सी हाईवे पर दौड़ी चली जा रही थी. दायीं ओर छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिखाई देने लगा. टैक्सी हाईवे से उतरकर अंधेरी ईस्ट में प्रवेश करने वाली थी. प्रिया ने घड़ी देखी, साढ़े आठ बजे थे. हल्की भूख महसूस होने लगी थी. दिनभर घूमते हुए वह इतनी थक चुकी थी कि फ्लैट पर जाकर खाना बनाना अब उसके बस का नहीं था.

“भूख लगने लगी होगी तुम्हें,” उसने आकाश से पूछा.

“हाँ, क्या तुम्हें भी?”

“हाँ, मुझे भी. तभी तो पूछा है. मन तो कर रहा था कि घर पहुँचकर कुछ हल्का बनाकर खाएँ. लेकिन थकान इतनी है कि नहीं बनेगा.” प्रिया ने कहा.

“तो फिर तुम्हारी सोसायटी के नजदीक किसी रेस्टोरेंट के पास टैक्सी छोड़ते हैं.” वहाँ कुछ खाकर तुम अपने फ्लैट चले जाना और मैं पवई के लिए टैक्सी या ऑटो ले लूंगा.”

“यह ठीक है.” प्रिया ने कहा. तब तक टैक्सी अंधेरी ईस्ट में प्रवेश कर चुकी थी. रास्ता प्रिया ने बताया फिर उसे रुकवाकर दोनों उतर लिए. सामने ही रेस्टोरेंट था, “चपाती”. एकदम सादा और आकर्षक नाम.

दोनों ने अंदर प्रवेश किया. सजावट और पुराने फर्नीचर से रेस्टोरेंट 50-60 साल पुराने जमाने का अहसास दिलाता था. साफ-सफाई में उसे अव्वल कहा जा सकता था. सभी टेबल भरी हुई थीं. वे काउंटर के सामने खड़े रह गए. काउंटर के सामने दो सोफे रखे थे. जिनमें से एक पर तीन लोग बैठे थे, दूसरा खाली था. काउंटर वाले ने कहा, “सर, आप सोफे पर बैठिए. टेबल थोड़ी देर में खाली हो जाएगी.”

तभी प्रिया ने आकाश को कहा, “तुम बैठो मैं अभी आती हूँ.” वह काउंटर से कुछ आगे जाकर दाहिनी और स्थित वाशरुम चली गई.

कुछ देर में टेबलें खाली हुईं. बेयरा उन्हें एक टेबल तक ले गया.

खाना स्वादिष्ट और सुपाच्य था. खाने के बाद बेयरे से बिल मांगा तो उसने बताया कि बिल काउंटर पर ही मिलेगा. दोनों ने काउंटर पर बिल का भुगतान किया. पूछने पर काउंटर वाले ने बताया कि, ‘वे नहीं चाहते कोई हमारे स्टाफ को कोई टिप दे. बिल बहुत वाजिब था, जितने की आकाश ने बिल्कुल अपेक्षा नहीं की थी.

वे ‘चपाती’ से बाहर आए और टैक्सी का इंतजार करने लगे. तब आकाश ने प्रिया से पूछा, “तुम ‘चपाती’ और ‘एमबी’ जैसी अच्छी जगहें कैसे तलाश कर लेती हो?”

प्रिया ने हँस पड़ी. उसने उत्तर दिया, “एक तो लड़की हूँ, दूसरे मजदूरों के साथ रहती हूँ. उन्हें अच्छी और किफायती जगहों का पता रहता है, वे बता देते हैं.” तभी प्रिया की निगाह एक खाली टैक्सी पर पड़ी, उसने आवाज देकर उसे रुकवाया और आकाश को विदा किया.

फ्लैट पहुँचकर प्रिया ने कपड़े बदले और बिस्तर पर ढेर हो गई. थकान बहुत थी. आज उसने और आकाश ने घूमने के चक्कर में अपने शरीरों के साथ अति कर दी थी. बदन दर्द कर रहा था. वह जानती थी कि आज जल्दी नींद नहीं आने वाली. उसे मम्मी-पापा और मयंक की याद आई, उनसे बात किए बहुत दिन हो गए हैं. आज बहुत देर हो गयी. लेकिन वह कल जरूर उनसे बात करेगी. फिर उसके जेहन में आकाश की तस्वीरें उभरने लगीं.

आकाश और प्रिया एक ही टीम का हिस्सा थे. काम के दौरान वे अक्सर कानों पर चढ़े हेडफोनों पर एक-दूसरे की आवाजें सुनते थे. जानते थे कि सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में वह अच्छा है. कामकाजी बातों के सिवा बातचीत का कोई सिलसिला नहीं था. फिर अचानक पापा ने उसकी शादी विक्रांत से तय कर दी, एक पारिवारिक समारोह में दोनों की सगाई हो गयी. वह विक्रांत के संपर्क में आई तो पता लगा कि उसके साथ जीवन नहीं निभाया जा सकता. माँ को बताया, माँ ने पापा को. पापा ने साफ मना कर दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता सगाई तोड़ने पर बदनामी होगी. शादी तो वहीं करनी पड़ेगी. जल्दी में शादी की तारीख तय हो गयी. दो दिन पहले तक वह प्रयत्न करती रही कि किसी तरह रिश्ता खत्म हो जाए, विवाह न हो. पर पापा टस से मस नहीं हुए. उसने घर छोड़ने का निर्णय किया. वह एक बैग में कपड़े लेकर घर से निकल आई. दोस्तों ने उसे सहारा दिया. वह अपनी सहेली ऋचा के घर रही. कंपनी का लैपटॉप घर छूट गया. कंपनी ने जयपुर से आकाश को उसका लैपटॉप लेने भेजा. वह लैपटॉप लाने के बाद ऋचा के यहाँ आया प्रिया की उससे प्रत्यक्ष भेंट हुई. वहाँ तय हुआ कि उसे आकाश के साथ ही कोटा छोड़ देना चाहिए. आकाश उसे अपनी कार से जयपुर अपने घर ले गया. वह होटल में ठहरना चाहती थी लेकिन आकाश के माता-पिता ने उसे होटल में नहीं ठहरने दिया, वह उनके यहाँ रुकी. वहीं उसकी मुलाकात आकाश की छोटी बहन तान्या से हुई. विक्रम ने जयपुर तक उसका पीछा किया और आकाश के घर पहुँच गया. आकाश के पिता की सूझ बूझ से विक्रम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. प्रिया को कंपनी ने मुंबई कार्यालय में काम करने का ऑफर मिला तो वह मुंबई आ गई. अकेले में दोनों का साथ केवल चार घंटे कोटा से जयपुर की कार यात्रा में और चार घंटे प्रिया के फ्लैट में कुल आठ घंटे का साथ था. उसमें वह उसे कितना जान सकती थी. उसने आकाश को फ्लैट तय करने में मदद की. आज अचानक उसने आकाश को अपने साथ घूमने का निमंत्रण दे डाला. दोनों खूब साथ घूमे, लंच और डिनर साथ किए.

जब आकाश ने उसे कहा था कि ‘एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं’ तब उसने पलटकर सवाल किया था कि ‘हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?’

क्या सोचा होगा आकाश ने? कहीं उसने इसे विवाह के प्रस्ताव के रूप में तो नहीं लिया होगा?

दिन का अंत होते-होते आकाश का यह कहना कि, ‘प्रिया, मैं जान गया हूँ कि तुम एक ऐसा व्यक्तित्व बन चुकी हो जो अपने जीवन में जो भी फैसले लेगी, उससे कोई भी उसे डिगा नहीं सकता.’ आखिर आकाश के इस कथन का क्या अर्थ हो सकता है? क्या उसने अपने आपको उसका जीवनसाथी बनने को तैयार होने का मन बनाना शुरु कर दिया है? उसने बहुत सोचा लेकिन बहुत सारे सवालों ने उसे घेर लिया.

‘क्या वह खुद आकाश को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करने को तैयार है?’ यह सवाल उसका खुद से था. उसके पास जवाब था कि वह इतनी जल्दी निर्णय नहीं ले सकती. उसकी आकाश के बारे में जानकारी अभी बहुत उथली है, और उसके परिवार के बारे में भी वह कितना कम जानती है. दो दिन के मेहमान के साथ तो हर कोई अच्छा व्यवहार करता है. मुसीबत में घर आए मेहमान की मदद भी कोई भी कर सकता है. लेकिन यदि वह आकाश की पत्नी होकर उस परिवार में जाए तो उनका व्यवहार क्या होगा? वह नहीं सोच सकती थी. अंत में उसने निर्णय लिया कि वह इस मामले में कोई भी निर्णय धीरज से लेगी. अभी उसे आकाश और उसके परिवार के बारे में बहुत कुछ जानना शेष है.

उसने घड़ी देखी, बारह बजने को थे. ओह! अब सोना होगा. सोचना छोड़ना होगा. वरना नींद नहीं आएगी. उसने उठकर दो घूंट पानी पिया, टॉयलेट होकर आई, कमरे की बत्ती बुझाई. अंधेरा हो गया था. लेकिन अधूरा. खिड़की के पर्दे से छन कर मुंबई की रोशनियों का नैनो अंश भीतर प्रवेश कर रहा था जिससे नींद के बाद अचानक खुली आँखें कमरे में सब कुछ देख सकती थीं.
... क्रमशः

सोमवार, 25 मई 2026

दिलों में पहुँच

 देहरी के पार, कड़ी - 59
आकाश के सवाल के जवाब में प्रिया मुस्कुराकर रह गई. आकाश ने दुबारा पूछा, “किधर ले चलने इरादा है इस नाचीज को आज.”

“बस चलते चलो मेरे साथ. तुम्हें किसी तिलिस्म में नहीं ले जा रही हूँ. बस यह इलाका महानगर मुंबई का दिल है और फिलहाल हम इसके अंदर हैं.” प्रिया ने मुस्कुराते हुए अपने बैग के स्ट्रैप को कंधे पर सँभालते हुए आकाश की ओर देखा. धूप अब तीखी होने लगी थी, इसलिए उसने आकाश का हाथ हल्के से थामते हुए कहा, "प्लान बहुत सिंपल है आकाश. धूप तेज़ है, तो सबसे पहले हम यहाँ के एक बहुत पुराने और ऐतिहासिक पारसी कैफे चलेंगे. वहाँ की कड़क ईरानी चाय और बन-मस्क खाए बिना दक्षिण मुंबई आना अधूरा माना जाता है."

वे दोनों टहलते हुए फोर्ट की एक शांत लेन में स्थित 'कैफे मिलिट्री' के भीतर दाखिल हो गए. कैफे के भीतर कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे वक्त का पहिया अचानक पीछे की ओर घूम गया है. दीवारों पर लगे पुराने शीशे, महोगनी की गोल मेजें, लकड़ी की मुड़ी हुई कुर्सियाँ और छत पर बेहद धीमे घूमते पुराने ज़माने के पंखे—सब मिलकर मुंबई के एक अलग ही दौर की दास्तान बयां कर रहे थे.

प्रिया ने दो ईरानी चाय, बन-मस्क और वेज पफ का ऑर्डर दिया. टेबल पर आते ही बन-मस्क की खुशबू हवा में तैर गई. प्रिया ने चम्मच उठाकर आकाश की चाय में चीनी घोलनी शुरू की, लेकिन आकाश चुपचाप उसे ही देखता रहा. उसके चेहरे पर अभी भी एक अनजानी खामोशी और विचारमग्नता थी.

"क्या बात है आकाश? चैंबर से निकलने के बाद से तुम बहुत शांत रहे हो. ऐसा लग रहा है कि कुछ गंभीर सोच रहे हो?" प्रिया ने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए पूछा.

आकाश ने चाय की एक चुस्की ली और खिड़की से बाहर देखते हुए बेहद संजीदगी से कहा, "प्रिया, सच कहूँ तो आज चव्हाण साहब के चैंबर में जो कुछ हुआ, उसे देखकर मुझे जो अहसास हुआ उससे मैं भीतर तक हिल गया हूँ. अब तक मैं तुम्हें सिर्फ एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और कंपनी में अपने घर कोटा से काम कर रही अपनी कलीग के रूप में देखता था. लेकिन आज मैंने देखा कि कॉर्पोरेट की इस नौकरी के साथ तुमने मज़दूरों के इतने बड़े आंदोलन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को सहज ही संभाला हुआ है. सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण जैसी हस्ती तुम्हें लॉ ग्रेजुएट बनने की सलाह दे रहे हैं… मुझे एक पल के लिए लगा कि तुम मुझसे बहुत ऊपर निकल चुकी हो. तुम्हारी प्रतिभा की ऊँचाई के सामने मुझे अपनी कॉर्पोरेट के साथ काम करने की योग्यता बहुत बौनी लगने लगी. एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं."

प्रिया ने आकाश की आँखों में झाँका, वहाँ एक सच्चे मनुष्य का सहज असमंजस और आदर दिखाई दे रहा था. उसने मुस्कुराते हुए कहा, "आकाश, तुम अपनी तुलना मुझसे क्यों कर रहे हो? जयपुर से निकलकर सीधे मुंबई जैसे शहर में आने का साहसिक फैसला करना, एक बिल्कुल नई कंपनी में दो हफ्ते के भीतर अपनी जगह बनाना और अपनी पहचान साबित करना—क्या यह तुम्हारी काबिलीयत नहीं है? हम व्यक्तिगत जीवन में दो अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम प्रतिस्पर्धी हैं. हम दोनों में बहुत कमियाँ हो सकती हैं. हम जीवनयात्रा में कहीं भी अपने आप को असहाय पा सकते हैं. वैसे में क्या हम एक दूसरे को सहारा नहीं दे सकते? हम कोई प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?”

प्रिया की इस आत्मीय और परिपक्व बात ने आकाश के मन के सारे संशयों को एक झटके में धो दिया. उसके चेहरे पर एक सहज और निश्चिंत मुस्कान लौट आई.

कैफे से निकलने के बाद वे दोनों 'काला घोड़ा' की तरफ बढ़ गए. सड़क किनारे फुटपाथ पर सजे हुए स्थानीय चित्रकारों के कैनवस देखते हुए वे 'जहाँगीर आर्ट गैलरी' के भीतर चले गए. गैलरी के शांत कमरों में लगी खूबसूरत कलाकृतियों को देखते हुए दोनों की बचपन की यादें ताजा होने लगीं. आकाश ने अपने बचपन में जयपुर में की गई अपनी किसी बेवकूफी वाली घटना सुनाई तो प्रिया ने उत्तर में कोटा की गई अपनी मूर्खता सुना दी. दोनों अपने बचपन की इन मूर्खताओं को याद कर खूब हँसे भी. दोनों ने मुंबई जैसे महानगर में अपने भविष्य को लेकर बहुत सारी बातें कीं. बीच में वे बिना बोले खामोशी से चलते भी रहे. ऐसा लगा जैसे दोनों एक-दूसरे के और करीब आ रहे हैं.

शाम ढलते-ढलते दोनों पैदल ही टहलते हुए 'गेटवे ऑफ इंडिया' के सामने आ पहुँचे. ढलते सूरज की लालिमा के बीच अरब सागर की लहरें ताज होटल की दीवारों से टकरा रही थीं. समंदर से आने वाली ठंडी और ताज़ा हवा ने दोपहर की सारी थकान को चंद लम्हों में सोख लिया. दोनों रेलिंग के सहारे खड़े होकर दूर समंदर के पानी में डोलती नावों को देखने लगे.

प्रिया ने समंदर की लहरों को देखते हुए अचानक थोड़े गंभीर स्वर में कहा, "जानते हो आकाश, चव्हाण साहब जो कह रहे थे, वो बात पूरी तरह गलत भी नहीं थी. इस सांख्यिकीय सर्वे को करते हुए मुझे पहली बार महसूस हुआ कि हमारे आईटी और सॉफ्टवेयर के ज्ञान का इस्तेमाल अगर उन मज़दूरों के जीवन को बदलने में हो जो अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी तरस रहे हैं, तो उससे मिलने वाला सुकून कॉर्पोरेट के किसी बड़े से बड़े इंसेंटिव या बोनस से कहीं बड़ा होगा."

आकाश ने प्रिया की तरफ देखा. उसकी आँखें इस समय समंदर की तरह ही गहरी और किसी बड़े संकल्प से भरी लग रही थीं. आकाश ने आगे बढ़कर पूरी आत्मीयता और हौसले के साथ प्रिया का हाथ थाम लिया और कहा, "प्रिया, मैं जान गया हूँ कि तुम एक ऐसा व्यक्तित्व बन चुकी हो जो अपने जीवन में जो भी फैसले लेगी, उससे कोई भी उसे डिगा नहीं सकता.”

गेटवे ऑफ इंडिया पर शाम की रोशनियाँ एक-एक कर जगमगाने लगी थीं. मुंबई की उस ढलती शाम में, समंदर की लहरों के शोर के बीच, उन दोनों ने एक-दूसरे से कोई वादा नहीं किया, लेकिन उन्होंने एक दूसरे के दिलों में अपनी पहुँच बना ली थी.
... क्रमशः

रविवार, 24 मई 2026

नया चेहरा

 देहरी के पार, कड़ी - 58

शनिवार सुबह सोकर उठने के बाद प्रिया रसोई में अपने लिए चाय बना रही थी कि प्रशांत बाबू का फोन आ गया. उसने फोन उठाया,  “प्रिया, हड़ताल के दिनों के वेतन और फेयर वेजेज का जो औद्योगिक विवाद राज्य सरकार ने इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल को रेफ्रेंस किया था, उसमें यूनियन को मंगलवार 18 जून तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम पेश करना है, इसे तैयार करने के लिए हमारे पास केवल दो सप्ताह हैं. कल कणिका की सांख्यिकीय रिपोर्ट भी मिल गई है. मैं जल्दी से जल्दी चव्हाण साहब से मिलना चाहता हूँ. उन्होंने आज ग्यारह बजे का समय दिया है. वे तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे कि प्रिया कैसी है, मैंने उन्हें कहा है कि हो सका तो वह भी मेरे साथ आएगी. तुम चल रही हो न?”

“चलना तो चाहती हूँ सर, पर आज आकाश से भी मिलना है. खैर मैं आपको आधे घंटे में बताती हूँ.” प्रिया ने इतना कहकर फोन काट दिया. उसने आकाश को फोन लगाया. देर तक घंटी जाने के बाद उधर से आवाज आई, “हेलो, कौन प्रिया? तुम बड़ी जल्दी उठ गई.” ऐसा लगा जैसे घंटी की आवाज सुनकर ही आकाश की नींद टूटी है.

“तो तुम अभी तक सो ही रहे थे?”

“हाँ तो, आज छुट्टी है, आज तो नींद निकालने का ही दिन है.” आकाश ने अलसाई आवाज में कहा.

“तो सुनो, मैं दस बजे फोर्ट के लिए निकल रही हूँ, वहाँ सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण का चैंबर है. उन्होंने ग्यारह बजे का समय दिया है. मैं सोचती हूँ तुम भी साथ चलो. आज हम दक्षिण मुंबई में घूमते हैं. वहीं कहीं लंच करेंगे और शाम तक लौट आएंगे. तुम चलोगे?” प्रिया ने अपने मन का बता दिया.”

“क्या? क्या? आज घूमने चलना है. वह तो सही है.  पर चव्हाण साहब के चैम्बर में मैं क्या करूंगा?”

“कुछ नहीं करना, बस सबसे मिलना और हमारी बातें सुनना. वहाँ आधे घंटे से अधिक नहीं लगेगा.”

“ठीक है, मैं तैयार होता हूँ, तुम मेरे फ्लैट पर आ रही हो या मुझे तुम्हारे फ्लैट पर आना है? आकाश ने पूछा.”

“वैसे तो तुम्हें ही आना चाहिए, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे इधर से पास है, यहाँ से फोर्ट जाना अधिक सही है.”

“ठीक है, मैं ही आता हूँ.” आकाश ने कहा.

“पर दस बजे के पहले पहुँच जाना. हम समय से चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच जाएँ.” प्रिया ने कहा और फोन काट दिया.

उसके बाद उसने प्रशांत बाबू को भी फोन करके बता दिया कि वह और आकाश सीधे चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच रहे हैं. ग्यारह बजने के पहले दोनों सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण के चैम्बर में थे.

चव्हाण साहब ने प्रिया का स्वागत किया और जानना चाहा कि उसके साथ कौन है?

“सर, ये आकाश हैं, मेरी कंपनी में मेरे कलीग थे. मैंने जब अपने घर से पलायन किया, तब इन्होंने मेरी बहुत मदद की. अब तक जयपुर अपने घर से काम कर रहे थे. अब इन्होंने कंपनी स्विच कर ली है और दो सप्ताह पहले मुंबई आ गए हैं. पवई में रह रहे हैं. आज मैं इन्हें साउथ मुंबई घुमाने ले आई.”

“वेलकम आकाश! प्रिया ने तुम्हारे बारे में पहले भी बताया था. उसने क्लोजर वाले केस में मेरी सहायक की भूमिका अदा की थी. यह बहुत प्रतिभाशाली है, यदि यह लॉ में ग्रेजुएशन कर ले तो मैं इसे स्थायी सहायकों में स्थान दे सकता हूँ. तुम्हें जब भी मेरी जरूरत हो, मुझे याद कर सकते हो. बेझिझक मुझसे मिल सकते हो.” चव्हाण साहब ने जो कुछ भी कहा, उससे आकाश असमंजस में आ गया. वह समझ ही नहीं पा रहा था कि, 'आखिर यह लड़की प्रिया है क्या?' जहाँ भी जाती है, अपने लिए जगह बना लेती है. उसने आकाश के दिल में स्थान बना लिया था. पर क्या वह भी उसके दिल में जगह बना सकेगा? यह सवाल मन में लिए ही उसने चव्हाण साहब को नमस्ते किया.

“नमस्ते सर, प्रिया ऐसी ही है. यह दो रात हमारे घर रुकी थी लेकिन आज भी मम्मी-पापा और छोटी बहन इसे याद करते ही रहते हैं.”

तभी प्रशांत बाबू और यूनियन सचिव शिंदे ने चैम्बर में प्रवेश किया. उन्होंने कणिका की तैयार की हुई सांख्यिकीय सर्वे की रिपोर्ट चव्हाण साहब को दी और कहा, “सर, फेयर वेजेज के केस में अठारह जून तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम प्रस्तुत करना है.”

चव्हाण साहब सर्वे रिपोर्ट लेकर उसके पन्ने पलटने लगे. रिपोर्ट के अंत में वे रिजल्ट पर रुके और उसे गंभीरता से पढ़ा. फिर बोले, “रिपोर्ट गंभीर है, 92 फीसदी मज़दूरों का कारखाने के नारकीय माहौल से पूरी तरह टूट जाने और 78 फीसदी का साहूकारों के भयंकर कर्ज़ के जाल में फँसे होने के पुख्ता आंकड़े हमारे इस केस में यह मजबूत साक्ष्य होंगे. बस कणिका को गवाही देने के लिए दो-तीन बार आना पड़ सकता है.”

“वह आ जाएगी सर, कॉमरेड कुलकर्णी जी की भांजी है. बस उसे आने की तारीख सप्ताह भर पहले मिल जाए जिससे वह इसके लिए समय रख सके.”

“ठीक है, पहले इस मामले में जो समझौता वार्ता हुई थी, उसका सारा रिकार्ड और हड़ताल के दौरान जो पत्राचार प्रबंधन, लेबर कमिश्नर, पुलिस, स्थानीय प्रशासन आदि से हुआ था वह सब मुझे चाहिए. लाए हो?”

“नहीं सर, अभी तो नहीं है. पर हम आज ही शाम तक या कल दोपहर तक भिजवा देंगे.”

“आप सोमवार को शाम सात से नौ बजे के बीच भिजवाएँ.” मेरा चैम्बर आज दो बजे के बाद सोमवार को ही खुलेगा. आपका रिकॉर्ड आने के बाद मैं यह सब अपने सहायकों को सौंप दूंगा जिससे वे स्टेटमेंट ऑफ क्लेम तैयार कर सकें.”

मुलाकात यहीं खत्म हो गई. वापस लौटते वक्त चव्हाण साहब ने आकाश को फिर कहा, “आप आते रहिएगा. और यदि प्रिया को लॉ ग्रेजुएट होने के लिए प्रेरित करें तो देश को एक बेहतरीन वकील मिल सकता है.”

सुनकर प्रिया हँस पड़ी. कहने लगी, “सर, आप मजाक अच्छा करते हैं. मैं कानून के सागर में गोता लगाने का कतई इरादा नहीं रखती. मैं सॉफ्टवेयर में अच्छी हूँ. मेरे लिए वही ठीक है.”

“प्रिया यह हँसने की बात नहीं, मैं कोई विनोद नहीं कर रहा. बल्कि सीरियसली कह रहा हूँ. तुम्हारा ये सॉफ्टवेयर और आईटी का अनुभव तुम्हें इस क्षेत्र का श्रेष्ठ वकील बना सकता है. एक बार सोचकर देखना.” चव्हाण साहब ने उसे फिर कहा.

“ठीक है सर, आपका आशीर्वाद बना रहे. आज तो मैं बिलकुल नहीं सोचूंगी. मुझे और आकाश को साउथ मुम्बई घूमना है.” प्रिया ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया. उसकी बात सुनकर चव्हाण साहब भी हँसने लगे.

चैंबर की सीढ़ियों से नीचे उतरते ही की दोपहर की धूप और समुद्री हवा ने आकाश और प्रिया का स्वागत किया. शनिवार की दोपहर होने के कारण फोर्ट की सड़कों पर दफ्तरों की भीड़ नहीं थी. ओल्ड विक्टोरियन गोथिक शैली और आर्ट डेको वास्तुकला की गर्व से खड़ी ऐतिहासिक इमारतें, चौड़ी सड़कें और शांत माहौल अब पूरी तरह उन नजरों के सामने था.

"चलो प्रिया, तुम्हारा आज का काम तो अच्छे से मुकम्मल हो गया," आकाश ने गहरी साँस लेते हुए मुस्कुराकर कहा. "अब बताओ, इस खूबसूरत फोर्ट एरिया को एक्सप्लोर करने का तुम्हारा क्या प्लान है?

प्रिया ने अपने बैग को कंधे पर सँभाला और आकाश की ओर देखकर आत्मीयता से मुस्कुरा दी.

... क्रमशः

शनिवार, 23 मई 2026

आत्मीयता के रंग

देहरी के पार, कड़ी - 57
जब आकाश का फोन आया, तब डेटा फीड करने का काम लगभग समाप्त हो चुका था. कणिका ने डेटा देखकर कहा, “प्रिया, लगता है ये नतीजे तुम्हारे रैंडम सर्वे से बहुत अलग नहीं होंगे. तुमने जो औचक सर्वे किया था वह भी काफी बढ़िया था, तुमने भी वैज्ञानिक और सांख्यिकीय सिद्धांतों का बखूबी इस्तेमाल किया था.”

“नहीं, मैं इन सिद्धांतों के बारे में अधिक कुछ नहीं जानती. पर बचपन से सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए पढ़ने की आदत पड़ गयी और जब से इंटरनेट और सर्च इंजन हत्थे चढ़े हैं, जिज्ञासा को मैं दबाती नहीं. मुझे तुरंत उत्तर चाहिए. वहाँ मिली जानकारी जीवन का हिस्सा बन जाती है. वह सर्वे भी हमने अपनी जिज्ञासावश ही किया था.” प्रिया ने कहा.

“खैर, इस सर्वे को पूरा होने दो. इस बीच हम मिलते रहेंगे. तुम्हारी जिज्ञासाएँ तुम्हें बहुत कुछ सिखाएंगी और मुझे भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“वह तो है. साथ काम करते हैं तो एक दूसरे से सीखते ही हैं.” प्रिया ने कणिका से सहमति जताई.

उधर सोफे पर बैठे कुलकर्णी जी से बात करते हुए प्रशांत बाबू कह रहे थे. “देखो कॉमरेड, इन दोनों लड़कियों को देखकर लगता ही नहीं कि ये कल पहली बार मिली थीं. ऐसे बातें कर रही हैं जैसे कई महीनों से एक दूसरे को जानती हैं.”

“कॉमरेड प्रशांत, यही बात है, जब दो या अधिक व्यक्ति एक समान उद्देश्य के लिए साथ काम करते हैं तो उनमें जानकारियों का आदान प्रदान होता है और वे तेजी से नजदीक आते हैं. रक्त संबंध हमें जन्म से मिलते हैं. लेकिन उनके बाद साथ मिलकर काम करने का रिश्ता ही सबसे अधिक मजबूत होता है....” वे बात कर ही रहे थे कि तभी डोरबेल बज उठी.

प्रिया ने उठकर दरवाज़ा खोला. सामने पैकिंग बैग में खाना लिए आकाश खड़ा था. उसने अंदर प्रवेश किया. प्रिया ने दरवाजा बंद कर खाने का बैग उसके हाथ से लेकर किचन में चली गई. कणिका भी उसी के साथ किचन की ओर बढ़ गई. प्रशांत बाबू ने अपनी कुर्सी से उठकर मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ आकाश का हाथ थाम लिया.

“आप आकाश ही हैं न? प्रिया ने बताया था कि आपने आज ही फ्लैट में सामान रखा है. आपको फ्लैट प्रवेश की बहुत बधाई.”

“मैं गलती नहीं कर रहा हूँ तो आप प्रशांत बाबू हैं.”

“जी, मैं ही हूँ. आपने ठीक ही पहचाना.”

“नमस्ते सर, प्रिया ने आपके बारे में मुझे अनेक बार बताया है. वह अक्सर कहती है कि मुंबई में आप और रामजी काका ही उसके गार्जियन हैं. आज से मैं भी आपका वार्ड हूँ. और सर, ये ‘आप’ के स्थान पर मुझे ‘तुम’ कहें तो मुझे अच्छा लगेगा.”

“आकाश! ऐसा लगता है प्रिया ने तुमसे मेरी कुछ अधिक की तारीफ कर दी है. मैं उसका गार्जियन नहीं, एक अच्छा साथी जरूर हूँ, और हम एक दूसरे की परवाह करते हैं. आज से तुम भी हमारे साथी हुए.” प्रशांत बाबू की इस आत्मीयता ने आकाश की सारी झिझक को पल भर में दूर कर दिया. 'एमबी' में खाना पैक करवाने के बाद जब रामजी ने उसके दाम लेने से इन्कार करते हुए कहा कि यह खाना मेरे घर ही जा रहा है, तब वह चौंका था कि उन्हें कैसे खबर थी कि खाना कहाँ जा रहा है. रामजी ने बताया था कि प्रशांत बाबू का फोन आया था.

डाइनिंग टेबल से सर्वे के कागज़ात और लैपटॉप को हटाकर जल्दी से खाना लगा दिया गया. भोजन के दौरान माहौल पूरी तरह अनौपचारिक और पारिवारिक हो गया. कॉमरेड कुलकर्णी और कणिका ने आकाश से उसके नए फ्लैट और विक्रोली के ऑफिस के काम के बारे में बहुत सहजता से बातें कीं. आकाश चुपचाप उनके चेहरों को देख रहा था. कॉर्पोरेट जगत में उसने अब तक केवल नफा-नुकसान की भाषा सुनी थी, लेकिन यहाँ बैठे ये लोगों के बारे में उसके मन में केवल 'कट्टर मज़दूर नेता' की छवि थी. आज उसे पहली बार अहसास हुआ कि वे भीतर से कितने संवेदनशील, आत्मीय और सहृदय थे और क्यों प्रिया उनकी इतनी तारीफ करती थी. खाना टेबल पर लगा देने के बाद प्रिया ने आकाश को कणिका का परिचय दिया और बताया कि वह भी उससे कल ही मिली है.

बातचीत जब ईसीआई कारखाने और 'ट्रक सिस्टम' पर पहुँची, तो एक प्रोफेशनल के नाते आकाश ने अपना नज़रिया रखा कि कैसे आज के दौर में कोई भी मैनेजमेंट बिना आर्थिक संतुलन के उद्योग नहीं चला सकता. प्रशांत बाबू ने उसकी बात को काटा नहीं, बल्कि बहुत धीरज से उसे मज़दूरों के उस मानवीय यथार्थ से जोड़कर समझाया जो आज के सर्वे में सामने आया था. आकाश के लिए यह बातचीत एक नई वैचारिक खिड़की खोलने जैसा था. प्रिया खाना खाते हुए चुपचाप उन्हें देख रही थी, उसकी आँखों में आकाश के प्रति एक गहरा आदर और गर्व साफ़ झलक रहा था. भोजन के बाद प्रशांत बाबू, कुलकर्णी जी और कणिका ने आत्मीयता से विदा ली. थोड़ी देर प्रिया से बातचीत करने के बाद प्रिया आकाश को छोड़ने नीचे सड़क तक आई. वहाँ दोनों ने एक साथ आइसक्रीम खाने के बाद एक दूसरे को विदा किया.

अगले तीन दिन यूनियन और प्रिया दोनों के लिए बेहद व्यस्तता भरे रहे. कार्यकर्ताओं ने पूरी लगन से कारखाने के भीतर और बाहर चाय की दुकानों, बस्तियों और चालों में जाकर सर्वे किया. मज़दूरों का डर अब पूरी तरह खत्म हो चुका था, और वे खुद आगे बढ़कर फार्म भरवा रहे थे. तीन सौ बयालीस फार्म पूरी तरह और सही-सही भरे जा चुके थे. केवल चार-पाँच मजदूर ही रह गए थे जिन्होंने फार्म नहीं भरा था. यहाँ तक कि कुछ सुपरवाइजरों ने भी बदले हुए नामों से फार्म भर दिया था.

प्रिया का रोज़ को यूनियन ऑफिस से भरे हुए फार्म लेती हुई घर लौटती. कपड़े बदलकर तुरंत लैपटॉप खोलकर बैठ जाती और एक-एक मज़दूर का डेटा, उनकी बीमारी, साहूकारों का कर्ज़ और ट्रक सिस्टम से हुए नुकसान के आंकड़े दर्ज करती जाती.

गुरुवार रात पूरी डेटा शीट तैयार हो चुकी थी. शुक्रवार को कणिका के विश्लेषण के बाद जब उन्होंने परिणाम देखे तो चौंकाने वाले सांख्यिकीय आंकड़े सामने आए. साफ़ था कि 92 फीसदी मज़दूर इस कारखाने के नारकीय माहौल से इस कदर टूट चुके थे कि वे तुरंत यह नौकरी छोड़ना चाहते थे, बशर्ते उन्हें एक सम्मानजनक और बेहतर 'गोल्डन हैंडशेक' (मुआवजा) मिले. इसके अलावा, 78 फीसदी मज़दूर अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए साहूकारों के भयंकर कर्ज़ के जाल में डूबे हुए थे.

प्रशांत बाबू ने रिपोर्ट की समरी देखी तो उनकी आँखों में एक विजयी चमक तैर गई. उन्होंने बेहद संतुष्ट स्वर में कहा, "अद्भुत! तुम दोनों ने कमाल कर दिया है. अब इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में मैनेजमेंट के झूठ और कपट को बेनकाब करने के लिए एक अकाट्य और वैज्ञानिक हथियार है. मैं कल ही रिपोर्ट के साथ चव्हाण साहब से मिलता हूँ.

उस रात खाना खाने के बाद प्रिया ने खिड़की खोलकर बाहर झाँक कर देखा. मुंबई की रात रोशनियों से भरपूर थी. शीतल समुद्री हवा चल रही थी. वह सोच रही थी कि रिसर्च से प्राप्त ये आँकड़े क्या मज़दूरों के जीवन की दिशा बदल सकेंगे?
... क्रमशः

शुक्रवार, 22 मई 2026

नए रिश्ते

देहरी के पार, कड़ी - 56
प्रॉपर्टी डीलर संदीप ने आकाश को सोमवार सुबह नौ बजे पवई के उस सुसज्जित फ्लैट वाली बिल्डिंग पर बुलाया था. आकाश वहाँ दस मिनट पहले ही पहुँचकर बिल्डिंग के रिसेप्शन पर संदीप का इंतज़ार करने लगा. संदीप करीब आधे घंटे बाद फ्लैट ओनर के साथ पहुँचा, और आकाश को अपनी गाड़ी में बिठाकर दस्तावेज तैयार करने वाले ऑफिस पहुँचा. वहाँ करीब दस लोग कंप्यूटर पर बैठकर कुछ न कुछ टाइप कर रहे थे. संदीप ने उनमें से एक ऑपरेटर से पूछा, “कितनी देर लगेगी?”

“आप आ ही जाइए, मैं तो शाम को देने वाले दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ.” ऑपरेटर ने कहा. संदीप ने आकाश से आधार कार्ड और दो फोटो मांगे, ऑपरेटर ने रिसेप्शन से एक दस्तावेजी स्टाम्प लेकर एग्रीमेंट टाइप कराया. वहीं एक अलग चैम्बर में बैठे नोटेरी के सामने दस्तावेज पर आकाश से दस्तखत कराए, नोटेरी ने अपने रजिस्टर में उसके और फ्लैट ओनर के दस्तखत करवाकर दस्तावेज को प्रमाणित कर दिया. डिपॉजिट की राशि फ्लैट ओनर को दी तो उसने आकाश को फ्लैट की चाबियाँ दीं. आधे घंटे बाद उसने गेस्ट हाउस से सूटकेस लाकर फ्लैट में प्रवेश किया और सूटकेस को टेबल पर रख दिया. अब उसे लग रहा था कि इस मुंबई जैसे बेगाने शहर में उसका भी एक 'ठिकाना' है. ठीक ग्यारह बजे वह विक्रोली के अपने ऑफिस के लिए निकल गया, जहाँ नए प्रोजेक्ट की चुनौतियाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं.

यूनियन ने जिन बीस कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी थी उनमें से नौ कार्यकर्ताओं की ड्यूटी सोमवार को सुबह की शिफ्ट में थी. सुबह दस बजे जब पहली शिफ्ट का विश्राम हुआ तब ये कार्यकर्ता अपने विभाग में श्रमिकों से सर्वे का फार्म भरवाने लगे. आधे घंटे में केवल इक्कीस मजदूर फार्म पूरा भर सके, कुछ के फार्म अधूरे रह गए. कुछ मजदूर जानना चाहते थे कि यूनियन आखिर ये फार्म क्यों भरवा रही है. उन्हें समझाने में समय लगा. कुछ मज़दूर फॉर्म देखकर कतराने लगे—"कॉमरेड, इस कागज़ पर हस्ताक्षर करने से हमारी नौकरी या मिलने वाले लाभों पर तो फर्क नहीं पड़ेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि मैनेजमेंट को पता लग जाए तो वे हमें गेट पर ही कार्ड पंच करने से न रोक दें." लेकिन जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि यह फॉर्म पूरी तरह गुप्त है और इसमें न तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत है और न ही उनका नाम कहीं उजागर होगा, बल्कि यह हम मजदूरों की कानूनी लड़ाई का कवच बनेगा. विश्राम के बाद मजदूरों में फार्म भरने की खबर आम हो गई. शिफ्ट छूटने के बाद कुछ कार्यकर्ता गेट के बाहर की चाय की दुकानों पर रुके तो बहुत सारे मजदूर भी रुक गए और वहीं फार्म भरवाने लगे.

फॉर्म भरते समय कारखाने के भीतर 'ट्रक सिस्टम' के जरिए होने वाले शोषण का वह खौफनाक यथार्थ सामने आया, जिसने मज़दूरों को भीतर तक निचोड़ दिया था. एक बुजुर्ग मज़दूर ने फॉर्म भरवाते हुए भर्राई आवाज़ में कहा, "कॉमरेड, इस नौकरी से तो मौत भली. वेतन के नाम पर मालिक अपनी दुकान का सड़ा हुआ अनाज और कूपन थमा देता है. महीने के अंत में जेब में एक रुपया नकद नहीं बचता. बच्चों की फीस और दवाइयों के लिए भी साहूकारों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है. अगर ये सेठ हमारे इतने बरस का हिसाब राजी-राजी दे दे, तो हम यह नौकरी कल छोड़ दें. कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. नहीं मिलेगी तो फुटकर मजदूरी कर लेंगे या अपना ही कोई काम कर लेंगे." लगभग हरेक मज़दूर का यही दर्द था. वे इस नारकीय स्थिति से बाहर निकलना चाहते थे.

प्रिया अपने ऑफिस का काम निपटाकर रात साढ़े आठ बजे घर लौटी. कपड़े बदलकर कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेटी, सोच रही थी कि खाने में क्या बनाया जाए. तभी डोर-बेल बजी. उसने उठकर दरवाजा खोला तो वहाँ प्रशांत बाबू, कणिका और कॉमरेड कुलकर्णी खड़े थे. उसने उन्हें हॉल में बिठाया. वे पहले दिन दूसरी शिफ्ट के विश्राम-काल तक भरे हुए फॉर्म लेकर आए थे. पहले ही दिन करीब चौहत्तर फॉर्म भरे जा चुके थे. वे चाहते थे कि रोज के फार्मों को रोज ही कणिका की सुझाई एक्सेल शीट में फीड कर दिया जाए और यह काम प्रिया अपने लैपटॉप पर रोज कर ले. इससे तीन चार दिन में डाटा शीट विश्लेषण के लिए तैयार हो जाएंगी और जल्दी ही कणिका रिपोर्ट तैयार कर सकेगी. प्रिया ने अपने हॉल की डाइनिंग टेबल को जल्दी से 'डेटा सेंटर' में बदल डाला.

कणिका ने अपने पेन ड्राइव से प्रिया के लैपटॉप में तैयार एक्सेल शीट ट्रांसफर की. इस शीट में प्रत्येक मजदूर के लिए एक रो (Row) आवंटित की गयी थी, और प्रत्येक प्रश्न के दो कॉलम बने हुए थे. जिसमें मजदूर की रो में एक में हाँ या ना वाला उत्तर अंकित करना था और दूसरे कॉलम में उनके विशिष्ट उत्तर लिखने थे कणिका फार्मों को व्यवस्थित कर रही थी और यह देख रही थी कि मज़दूरों ने कर्ज, बीमारी और ट्रक सिस्टम से जुड़े कॉलम सही-सही भरे हैं या नहीं. प्रिया ने अपने लैपटॉप पर एक्सेल शीट खोलकर मज़दूरों के उस दर्द को आंकड़ों के रूप में दर्ज करना शुरू किया. जैसे-जैसे डेटा स्क्रीन पर उभर रहा था, यह साफ़ हो गया कि नब्बे फीसदी से अधिक मज़दूर इस कारखाने को तुरंत छोड़ना चाहते थे.

करीब नौ बजे प्रिया के फोन की स्क्रीन चमक उठी, आकाश का फोन था. उसने सबको कहा, “जरूरी फोन है, मैं बात करके लौटती हूँ.” वह बेडरूम में आ गई.

“हाँ, आकाश, कैसे हो? फ्लैट का क्या किया?”

“सुबह पजेशन ले लिया था. मेरा सूटकेस रखकर ही ऑफिस गया था. अभी फ्लैट से फ्रेश होकर ‘एमबी’ आया हूँ खाने के लिए. तुमने खाने का क्या किया?”

“कुछ नहीं, आकर सोच ही रही थी क्या बनाऊँ? तभी प्रशांत सर, कणिका और कुलकर्णी जी आ गए. अब आज के कलेक्ट किए हुए फार्मों के डाटा मेरे कंप्यूटर की एक्सेल शीट में डाल रहे हैं.”

“ये बढ़िया है, मैं पाँच लोगों का खाना पैक करवाकर उधर ही आ जाता हूँ. मेरे फ्लैट का गृह प्रवेश सेलिब्रेट कर लेंगे.” आकाश ने कहा तो प्रिया फोन लिए हुए ही हॉल में आ गई. “आकाश का फोन है वह ‘एमबी’ से खाना लेकर आ रहा है. आप लोग खाना खाएंगे न.” उसने सभी से पूछा. प्रशांत बाबू ने कणिका और कुलकर्णी जी से पूछा तो उन्होंने हाँ कर दी.

“हाँ, ले आओ. सभी खाएंगे,” प्रिया ने आकाश को कह दिया और फोन बंद किया.”

प्रशांत बाबू ने तुरन्त रामजी काका को फोन लगाया. “हैलो रामजी, प्रिया का दोस्त आकाश आपके यहाँ हम सबके लिए खाना पैक करवा रहा है. उससे कहना भुगतान हो गया है.” इतना कहकर उन्होंने फोन काट दिया. प्रिया उन्हें असमंजस भरी नजरों से देखती रह गयी.

प्रशांत बाबू ने प्रिया को अपनी ओर इस तरह देखते हुए कहा, “प्रिया, आकाश तुम्हारा दोस्त है, उससे तुम्हारे भावनात्मक संबंध हैं. वह हमारे लिए उतना ही बेशकीमती है, जितनी तुम. आज उससे इसी तरह पहचान होने दो”

प्रिया सोच रही थी कि, आकाश को भी 'एमबी' से अनजान नए रिश्ते मिलने वाले हैं.
... क्रमशः