@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

अदृश्य हमला

देहरी के पार, कड़ी - 20
प्रशांत बाबू ने पिछली रात ही प्रिया को फोन पर बता दिया था कि, “तैयार रहना, ईसीआई इंडस्ट्री का मालिक कल कोई बड़ा धमाका करने वाला है." काम पर पहुँचते ही उसने आदित्य, स्नेहा और राहुल को भी सूचना दे दी कि आज कुछ बड़ा हो सकता है, और हमें कोई नया टास्क मिल सकता है. अब वे इस बड़ी की सूचना के इन्तजार में थे.

ईसीआई फैक्ट्री के गेट पर शुक्रवार की सुबह एक अजीब सी उदासी के साथ शुरू हुई, पिकेटिंग स्थल पर मज़दूरों की गतिविधियाँ उनकी दिनचर्या बन चुकी थी. अदालती आदेश ने जो 'सौ मीटर' की लक्ष्मण रेखा खींची थी, उसके दोनों ओर मज़दूर शामियानों पर शांति से बैठे थे. दूसरे शामियाने के लिए ऑफिस का साउंड सिस्टम ले आया गया था. अब दोनों ओर से नारेबाजी, भाषण, क्रान्तिकारी गीत बारी-बारी से गूंजने लगे थे. एक ओर का स्पीकर बंद होता तो दूसरी ओर का शुरू हो जाता. कभी दोनों ओर से सवाल जवाब होने लगते.

सुबह नौ बजे फैक्ट्री में जब जनरल शिफ्ट का स्टाफ—मैनेजर, सुपरवाइजर और अकाउंट विभाग के लोग गेट के अंदर दाखिल हुए, तो मज़दूरों ने कोई नारेबाजी नहीं की. वे बस उन्हें देखते रहे. मजदूरों के मन में नौकरी खोने का कोई भय नहीं था, बल्कि एक गहरी विरक्ति थी. वे उस 'ट्रक पद्धति' से इतने तंग आ चुके थे कि उनके लिए कारखाना चालू रहना या बंद होना, दोनों ही संघर्ष के दो अलग रास्ते थे. वे महंगाई के इस दौर में केवल अपने पसीने की सही कीमत 'फेयर वेजेज' चाहते थे.

दोपहर बाद चार बजे तक माहौल सामान्य था. तभी सड़क के दक्षिणी छोर से एक डाकिया अपनी साइकिल की घंटी बजाता हुआ पिकेटिंग स्थल पर आया. उसके पास 'स्पीड पोस्ट ए.डी.' का एक भारी-भरकम पीला लिफाफा था. डाकिया अक्सर खुशियाँ लाता है, पर उस लिफाफे पर 'जनरल मैनेजर' की सील देखकर यूनियन कार्यसमिति के सदस्य सतर्क हो गए. अध्यक्ष ने हस्ताक्षर कर ए.डी. का कार्ड लौटा दिया. यूनियन कार्यसमिति के सभी सात सदस्य एक शामियाने में गोल घेरा बनाकर बैठ गए.

लिफाफा खुला और उसके साथ ही प्रबंधन का वह 'अदृश्य हमला' सबके सामने आ गया. प्रबंधन ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-O का सहारा लेते हुए राज्य सरकार को उद्योग बंद करने (Closure) के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था. आवेदन के साथ पिछले छह वर्षों की बैलेंस शीटों का एक पूरा जखीरा नत्थी किया गया था.

प्रशांत बाबू को तुरंत खबर दी गयी. वे अपने काम से जल्दी छूट कर शाम छह बजे पहुँचे. उन्होंने डाक से मिले दस्तावेजों को सरसरी तौर पर देखा. उनकी आँखों के सामने पिछले छह सालों का एक सुनियोजित 'वित्तीय प्रपंच' घूमने लगा. प्रबंधन ने आंकड़ों को बड़ी सफाई से पेश किया था, पहले दो वर्ष: मुनाफ़े को धीरे-धीरे गिरता हुआ दिखाया गया. तीसरे वर्ष एक 'मामूली लाभ' की तस्वीर पेश की गई. चौथे से छठे वर्ष तक एक खड़ी ढलान की तरह बढ़ता हुआ घाटा दिखाया गया था.

प्रशांत बाबू ने गंभीर स्वर में साथियों को समझाया, "यह आंकड़ों की बाजीगरी है. प्रबंधन ने सरकार को यह दिखाने की कोशिश की है कि यह संस्थान अब 'इकोनॉमिकली वायबल' नहीं रहा. और सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को इसपर फैसला सुनाकर उसकी सूचना इस आवेदन को देने के 60 दिनों के भीतर फैक्ट्री प्रबंधन को देनी है. अगर साठ दिन बीत गए और सरकार ने प्रबंधन को कोई जवाब नहीं दिया, तो कानूनन इसे उद्योग को बंद करने की 'डीम्ड परमिशन' मान लिया जाएगा. उसके बाद आवेदन प्रस्तुत करने से 90 दिन बाद उद्योग को बंद कर दिया जाएगा.”

यूनियन अध्यक्ष ने यह खबर मजदूरों को दी तो उनमें से कोई भयभीत नहीं हुआ. बल्कि उनके बीच से किसी ने नारा लगाया, “इंकलाब ज़िंदाबाद.” मजदूरों ने पूरी बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया.

“हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है.” यह दूसरा नारा था जिसका और जोश के साथ मजदूरों ने जवाब दिया.

नारों के बाद एक पुराने मज़दूर ने खड़े होकर अध्यक्ष के हाथ से माइक ले लिया. कहने लगा, साथियों हमें कारखाने के बंद हो जाने का कोई डर नहीं है. हम वेतन के ‘ट्रक सिस्टम’ में घुट-घुट कर मर जाने से बेहतर समझते हैं कि एक बार में ही हिसाब हो जाए. जितना ये हमें वेतन देते हैं, उससे अधिक तो हम फुटकर मजदूरी करके भी कमा लेंगे. अगर कारखाना बंद होता है तो हम इस कैद से आज़ाद हो जाएंगे.”

पुराने मजदूर के चुप होते ही मजदूरों ने फिर से नारा लगाया, “इंकलाब जिन्दाबाद.”

इस बार तमाम मजदूरों ने पहले से भी अधिक बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया. ...

ज़्यादातर मज़दूर पुरानी वेतन पद्धति से इतने परेशान थे कि अब वे 'फेयर वेजेज' से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं थे. हाँ, कुछ युवा मज़दूर थोड़े विचलित ज़रूर थे कि अचानक काम बंद हुआ तो शहर में गुज़ारा कैसे होगा, लेकिन सामूहिक स्वर 'आर या पार' का ही था.

कार्यसमिति ने प्रशांत बाबू के साथ मिल कर तय किया कि शनिवार शाम चार बजे पिकेटिंग स्थल पर ही मज़दूरों की 'आम सभा' बुलाई जाए. उन्हें इस कानूनी आवेदन का तकनीकी सच बताना ज़रूरी था.

प्रशांत बाबू को मेवाड़ भोजनालय पहुँचने में नौ बज गए, वहाँ प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य उन्हें इन्तजार करते मिले. कारखाना बंदी का आवेदन और उसके साथ के दस्तावेजों को चारों ने देखा.

प्रिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "सर¡ यह घाटा पूरी तरह 'मेन्युफेक्चर' किया लग रहा है. हमें इनकी बैलेंस शीटों का एनालिसिस करना पड़ेगा. क्या हम इस आवेदन और दस्तावेजों को अपने साथ ले जा सकते हैं?”

“हाँ, बिलकुल ले जाएँ, पर हमें एनालिसिस कल दो-तीन बजे तक मिल जाए.” प्रशांत बाबू ने कहा. “पर तुम लोग अब मुझे ‘सर’ कहने से मुझे मुक्ति दो. हम एक दूसरे के साथी हैं. तुम सब मुझे ‘कॉमरेड’ कह सकते हो.”

‘बिलकुल, हम आपको अपना एनालिसिस कल दो बजे तक दे देंगे, कॉमरेड.” प्रिया ने ‘कॉमरेड’ इतना सहज तरीके से कहा था कि बाकी चारों की हँसी छूट पड़ी और ठहाके में बदल गयी.

तभी रामजी काका भी आ गए. भोजनालय के कर्मचारी उनके लिए खाना लगाने लगे.
... क्रमशः

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

निषेधाज्ञा

देहरी के पार, कड़ी - 19
मंगलवार की सुबह भी प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी की उसी शांत सड़क पर, कारखाने के गेट से कुछ दूर उसी बेंच पर आकर बैठे. लेकिन कुछ ही मिनट बाद प्रिया का फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे. उन्होंने कहा, "बैठने का स्थान बदलो, जरूरी है." वे तुरंत वहाँ से उठकर फैक्ट्री गेट के सामने होते हुए दूसरी और पहुँचे वहाँ ऐसी ही एक बैंच देखकर बैठ गए. हड़ताल का जोश दूसरे ही दिन एक 'अनुशासन' में बदल चुका था. गेट पर मज़दूरों की टोलियाँ शांतिपूर्ण तरीके से वहाँ लगाए गए शामियाने में बैठी रहीं. मजदूरों के पास लाउडस्पीकर सिस्टम था. कोई न कोई उस पर भाषण देता रहता. बीच-बीच में जोशीले नारे भी लगते. मजदूरों के बीच बहुत से अच्छे गायक भी थे, वे क्रांतिकारी गीत गाते. इसी तरह उनका समय गुजरता. शाम छह बजे पिकेटिंग समाप्त कर दी जाती. दस-पंद्रह लोग शामियाने में रात रहते. मजदूरों की आँखों में दृढ़ संकल्प दिखाई देता.

बुधवार सुबह आठ बजे के कुछ पहले प्रशांत बाबू पिकेटिंग के स्थान से टहलते हुए उस बेंच तक पहुँचे, जहाँ प्रिया और उसके साथी बैठे थे. उन्हें देख राहुल और आदित्य खड़े होने लगे तो उन्होंने इशारे से मना कर दिया. फिर खड़े-खड़े ही उन्होंने गंभीरता से कहा, "साथियों, अब तुम्हें यहाँ आने की जरूरत नहीं है. तुमने तीन दिन इस संघर्ष को जीकर महसूस कर लिया है. यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं, तुम 'अदृश्य' रहकर हमारे सूचना तंत्र को संभालो.” चारों स्तब्ध होकर सुन रहे थे. “मैं यहाँ से टहलते हुए कुछ दूर जाकर वापस लौटूंगा. मैं वापस शामियाने तक पहुँच जाऊँ, तब तुम यहाँ से निकल लेना. रामजी काका ने तुम्हें याद किया है उनसे मिलते हुए जाना.”

वहाँ से वापस लौटते हुए चारों मेवाड़ भोजनालय पहुँचे. रामजी काका उन्हें देखते ही चहक उठे. “आओ बच्चों, लगता है आज सुबह-सुबह रास्ता भूल गए हो, मैं तो तुम्हें देखने को ही तरस गया था.”

“नहीं काका, हम सुबह तो रोज वैसे ही लेट उठते हैं और जैसे तैसे समय से काम पर पहुँचते हैं. यह तो तीन दिनों से हम जल्दी उठकर छह बजे ही ईसीआई के मजदूरों की हड़ताल देखने पहुँच जाते थे. वहाँ से वापस घर होकर ऑफिस पहुँचते थे. सुबह जल्दी उठने की वजह से शाम को ऑफिस से छूटते ही सीधे घर पहुँचना ही सूझता था. आज भी वहीं गए थे, प्रशांत बाबू ने ही कहा कि हम लौटते हुए आपसे मिलकर जाएँ. आप हमें बहुत याद कर रहे हैं.” प्रिया ने सफाई देने की कोशिश की.

“हाँ बिटिया, प्रशांत बाबू न भेजते तो तुम लोग तो आज भी नहीं आते. खैर छोड़ो, तुम अंदर चलकर बैठो, आज तुम सबका ब्रेक फास्ट यहीं है. मैं भी आता हूँ.

वे अंदर जाकर बैठे. कुछ देर बाद रामजी भी वहाँ आ गए. तब तक सबके लिए पोहा और जलेबी का नाश्ता आ गया था.

“देखो बच्चों, तुम अभी वाकई नासमझ हो।” रामजी काका ने परिवार के बुजुर्ग की तरह बोलना शुरू किया. “तुम तीन दिन से हड़ताल देखने जा रहे हो, यह ठीक नहीं है. जो काम तुम अपने ऑफिस या घर से कर सकते हो, उसके लिए हड़ताल की जगह जाना जरूरी नहीं. यह पूंजीपति और मजदूरों की लड़ाई है और निजाम पूरी तरह पूंजीपति का है. वह अभी तुम पर हाथ नहीं डालेगा. लेकिन जैसे ही उसे पता लगेगा कि तुम मजदूरों के संघर्ष को धारदार बनाते हो, तो वह तुम्हें नहीं बख्शेगा. इसलिए जरूरी है कि इस लड़ाई का हर सिपाही यथाशक्ति इसके लिए काम भी करे और खुद को बचाकर भी रखे. तुम अब मजदूर वर्ग के सिपाही हो, तुम्हें उसी के हिसाब से सोचने की आदत डालनी चाहिए. तुम शाम के समय यहाँ आ सकते हो. तुम्हें हड़ताल की सारी सूचनाएँ यहीं मिलेंगी.”

चारों अवाक थे कि 'रामजी मजदूरों की लड़ाई के बारे में इतने गंभीर कैसे हैं?' रामजी उनकी जिज्ञासा समझ कर बोले. “अभी मेरे बारे में कुछ मत पूछना. तुम्हें घर होकर अपने ऑफिस जाना है. मेरी कहानी फिर किसी दिन फुरसत में सुनाऊंगा.”

नाश्ता करके चारों चल दिए.

गुरुवार सुबह आठ बजे, जब मज़दूर रोज़ की तरह गेट पर जमा थे, अचानक दो पुलिस गाड़ियाँ वहाँ आकर रुकीं. इस बार पुलिस का रवैया सख्त था. इंस्पेक्टर ने हाथ में एक कागज़ लहराते हुए यूनियन अध्यक्ष और सैक्रेटरी को बुलाया.

"यह सिविल कोर्ट का अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) आदेश है," इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज़ में कहा. "कारखाना मालिक की अर्जी पर अदालत ने आदेश दिया है, 'कोई भी मज़दूर या प्रदर्शनकारी कारखाने के मुख्य द्वार के 100 मीटर के दायरे में पिकेटिंग नहीं करेगा.' आप लोग तुरंत पीछे हटिए, वरना हमें बल प्रयोग करना पड़ेगा."

यूनियन अध्यक्ष ने कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) पढ़ी. उन्होंने देखा कि कानून की कलम ने मज़दूरों को उनके अपने ही कारखाने की देहरी से 'दूर' कर दिया था.

अब मज़दूरों ने अपनी पिकेटिंग को दो हिस्सों में बाँट लिया. अनुशासन ऐसा था कि बिना किसी शोर-शराबे के, आधे मज़दूर सड़क के उत्तरी छोर पर चले गए और आधे दक्षिणी छोर पर. 100 मीटर की वह खाली सड़क अब 'मालिक के अहंकार' और 'मज़दूरों के धैर्य' के बीच की एक सरहद बन गई थी.

प्रिया को यह खबर अपने ऑफिस के केबिन में मिली. उसने राहुल को मैसेज किया— "कोर्ट के आदेश ने मजदूरों को शारीरिक रूप से दूर किया है, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि डिजिटल दुनिया में 100 मीटर की दूरी का कोई अस्तित्व नहीं है."

प्रिया की टीम ने तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर एक नया संदेश प्रसारित किया: "दूरी बढ़ी है, हौसला नहीं. हम गेट से दूर हुए हैं, लक्ष्य से नहीं."

शाम को मेवाड़ भोजनालय में रामजी काका ने प्रशांत बाबू से कहा, "बाबू, 100 मीटर दूर होने से क्या होता है? हमारी निगाहें तो अभी भी गेट पर ही हैं. हम गेट पर ही 'सामूहिक रसोई' शुरू करेंगे. हड़ताल करने वाले मजदूर वहीं सड़क के किनारे बैठकर खाना बनाएंगे और खाएंगे."

प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए प्रिया को फोन किया, "प्रिया, अब असली परीक्षा शुरू हुई है. कल शुक्रवार है, और मुझे लग रहा है कि मालिक कोई बड़ा धमाका करने वाला है. तैयार रहना."
... क्रमशः

रविवार, 5 अप्रैल 2026

टूटती जंजीरें

देहरी के पार, कड़ी - 18
सुबह पाँच बजे, अंधेरी की सड़कें अभी सुबह की पहली किरण की प्रतीक्षा में थीं. राहुल, स्नेहा और आदित्य अपने-अपने आवासों से निकल कर प्रिया के यहाँ पहुँचे थे और वहाँ से वे एक कॉमन टैक्सी लेकर रवाना हुए. उनके लिए सोमवार की यह सुबह बहुत खास थी. विक्रांत को छकाने और उसे पकड़कर पुलिस के हवाले करने के दौरान वे सामूहिक कोशिशों की ताकत को समझ चुके थे. उन चारों की टैक्सी 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के मुख्य द्वार से कुछ दूर आकर रुकी. वे चारों उतरकर वहीं पास में एक पेड़ के निकट सड़क के किनारे लगी बेंच पर बैठ गए. वे अपनी पहचान गुप्त रखते हुए उस संघर्ष को अपनी आँखों से देखना और महसूस करना चाहते थे, जिसे उन्होंने अब तक केवल किस्सों, कोडिंग और डेटा में जिया था.

कारखाने का विशाल लोहे का गेट अभी बंद था. सामने वाली पूरी सड़क अभी सन्नाटे में डूबी थी. कुछ ही देर में हलचल होने लगी. दो-दो चार-चार की संख्या में मज़दूर आकर फैक्ट्री के गेट के आसपास जमा होने लगे. कारखाने में प्रोडक्शन की दो ही शिफ्टें चलती थीं. सुबह छह बजे से दोपहर दो बजे तक और दो बजे से रात दस बजे तक. ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों की शिफ्ट सुबह आठ बजे से शाम पाँच बजे तक की होती. छह बजने में अभी देर थी, लेकिन उससे पन्द्रह मिनट पहले ही वहाँ सुबह की शिफ्ट में आने वाले मजदूरों से अधिक मजदूर इकट्ठा हो चुके थे. दूसरी शिफ्ट के भी बहुत मजदूर सुबह ही आ गए थे. तभी एक पुलिस कार वहाँ पहुँची और उससे एक इंस्पेक्टर, एक असिस्टेंट इंस्पेक्टर, एक हेड कांस्टेबल और दो सिपाही उतरे. कार के पीछे ही एक पुलिस बस आकर गेट से कोई पचास मीटर पहले ही खड़ी हो गई. उससे करीब तीस सिपाही नीचे उतरे. उनमें से अधिकांश के कंधे पर पथराव से बचने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बेंत की बनी केन-शील्ड लदी थीं.

“अभी गाँव बसा नहीं कि लुटेरे पहले आ गए.” राहुल ने कहा. “पुलिस पहले ही आ गई. हमारे तो बुलाते-बुलाते नहीं आती.”

प्रिया को अचानक अपने शहर कोटा की याद आई. उसने बचपन में सुना था कि कैसे वहाँ के जे.के. सिंथेटिक्स कारखाने के मज़दूरों ने 1971 में कानूनी सीमा से अधिक बोनस देने की मांग के लिए फौलादी लड़ाई लड़ी थी. जिसे तोड़ने के लिए वहाँ के एसपी के इशारे पर कारखाने के गार्डों ने पिकेटिंग कर रहे मजदूरों पर गोलियाँ चलवा दी थीं और आठ मजदूर शहीद हो गए. आज भी उस उजाड़ फैक्ट्री के दरवाजे के सामने आम सड़क के किनारे उन मजदूरों की याद में शहीद स्मारक खड़ा है जहाँ हर वर्ष गोलीकांड के दिन मजदूर इकट्ठा होकर अपने शहीद साथियों को याद करते हैं.

“पुलिस अपने आप नहीं आई होगी.” प्रिया ने कहा, “इसके लिए जरूर कारखाना मालिक ने पहले से मुंबई पुलिस कमिश्नर को आवेदन किया होगा और एडवांस में खर्चा जमा कराया होगा. हालाँकि पूछने पर पुलिस यही कहेगी कि वह किसी भी संभावित हिंसा की रोकथाम के यहाँ आई है.”

“मुझे तो लगता है जैसी यूनियन और मजदूरों की तैयारी है खाकी वर्दियाँ यहाँ पिकनिक ही मनाकर ही लौटेंगे.” राहुल ने पुलिस की खिल्ली उड़ाने के लहजे में कहा.

“पुलिस की इस तरह खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं. वह हमारी मदद भी करती है, जैसे विक्रांत के मामले में की थी.” आदित्य बोला.

“वह सही है, पर जहाँ मामला किसी पूंजीपति का हो वह उसी का पक्ष लेती है, मजदूरों का साथ देने का उदाहरण तो मैंने कभी नहीं देखा न सुना.” राहुल ने पलट कर जवाब दिया.

“हाँ, ये तो है,” प्रिया ने कहा. आदित्य और स्नेहा ने भी इस पर अपनी सहमति व्यक्त की.

छह बजने के कुछ ही देर बाद राहुल को कंपनी की एक बस कारखाने के पिछले गेट की ओर जाने वाले संकरे रोड पर मुड़ती दिखी. उसमें करीब पंद्रह-बीस मज़दूर थे. जरूर प्रबंधन इन्हें कुछ डराकर और लालच देकर लाया होगा. उसने तुरंत अपने तीनों साथियों को बताया. आदित्य ने अपने मोबाइल से संदेश भेजा. तुरंत 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' पर अलर्ट गूँजा. बीस-तीस मज़दूर जो सतर्कता के लिए पिछली गली में तैनात थे, उन्होंने बस को रोक लिया.

कोई हिंसा नहीं हुई, कोई धक्का-मुक्की नहीं. बस तीन-चार वरिष्ठ मज़दूर आगे आए, बस के अंदर झाँका और बड़े धीरज से बोले, "साथियों, आज अंदर जाओगे तो कल की रोटी और महंगी हो जाएगी. आओ, शामियाने में बैठो." वे मज़दूर, जो डर और लालच के मारे आए थे, अपने साथियों का हाथ थामकर बस से नीचे उतर आए. मैनेजर और सुपरवाइजरों को किसी ने नहीं रोका, वे आराम से कारखाने के अंदर पहुँच गए. लेकिन मजदूरों के बिना कोई प्रोडक्शन नहीं हो सकता था. वे किसे सुपरवाइज करते और क्या मैनेज करते. जिन्हें किया था वे तो अपने साथियों के चेहरे देखकर बस से उतर चुके थे.

नौ बजते-बजते यह साफ हो गया कि हड़ताल शत-प्रतिशत सफल है. कारखाने के अंदर सन्नाटा पसरा था. प्रिया और उसकी टीम वहाँ से निकलकर अपने ऑफिस की ओर चल दी. ग्यारह बजे उन्हें अपनी ड्यूटी पर पहुँच कर लॉग-इन करना था.

ऑफिस पहुँचने के बाद भी उनके फोन और लैपटॉप शांत नहीं थे. वे अपने काम के बीच-बीच में 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' और 'पर्दाफाश' संदेशों का प्रबंधन कर रहे थे. प्रिया ने गौर किया कि उसके ऑफिस के वातावरण और कारखाने के गेट के उस माहौल में कितनी दूरी थी, फिर भी एक 'श्रम' ही था जो उन्हें आपस में जोड़ रहा था.

शाम चार बजे प्रशांत बाबू का मैसेज आया "पहला दिन हमने जीत लिया, ज़ंजीरें टूट रही हैं." प्रिया के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई. उसने कोड लिखना शुरू किया. उसे महसूस हुआ कि आज उसकी कोडिंग में एक अलग तरह की ऊर्जा है. वह अब केवल एक 'सॉफ्टवेयर इंजीनियर' नहीं रह गई थी, वह अब उस बड़े 'सिस्टम' का हिस्सा थी जो न्याय की मांग कर रहा था. उसकी आँखों के सामने कतारों में लाल झंडे लिए जलूस निकालते कोटा के मजदूरों की तस्वीरें तैरने लगीं. उसने महसूस किया कि मजदूरों और शहीद स्मारक की यादों ने उसके अंदर एक अजीब सी शांति और साहस भर दिया है.
... क्रमशः

तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 17
'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के प्रबंधक को अंतिम सूचना दे दी गई थी कि उनकी मांगें नहीं माने जाने पर सोमवार से फैक्ट्री के सभी मजदूर हड़ताल पर चले जाएंगे. इस बीच राहुल ने प्रिया को बताया कि फैक्ट्री प्रबंधन के पास सभी मजदूरों के व्हाट्सएप नंबर हैं, वह संदेशों के माध्यम से मिथ्या सूचनाएँ प्रसारित करके मजदूरों में भ्रम उत्पन्न कर सकता है. हम ऐसी सूचनाओं के फैक्ट-चेक करके मजदूरों को सावधान कर सकते हैं. किन्तु इसके लिए हमें सभी मजदूरों के नंबर और यूनियन के किसी ऑफिसर का फोन नंबर चाहिए जिससे मजदूरों को यह संदेश भेजा जा सके.

शनिवार को प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य एक साथ एसोसिएशन के ऑफिस पहुँचे. उन्होंने यह बात प्रशांत बाबू को बताई. उन्होंने बताया कि, “कारखाने के सभी मजदूरों का व्हाट्सएप ग्रुप बना हुआ है. उसमें यूनियन के सभी पदाधिकारी जुड़े हुए हैं.”

प्रिया ने कहा, “अब काम आसान है. यूनियन के सभी पदाधिकारी संदिग्ध संदेश प्राप्त होते ही मेरे नंबर पर फॉरवर्ड करेंगे. हम उसका फैक्ट चेक करके संदेश यूनियन के अध्यक्ष के नंबर से सभी मजदूरों के व्हाट्सएप नंबर पर भेज देंगे. हम इस संदेश को ‘पर्दाफाश’ शीर्षक देंगे और हर संदेश को एक क्रमांक देंगे. जैसे ‘पर्दाफाश- नं.1’.

प्रशांत बाबू ने इस काम के लिए यूनियन ऑफिस में एक कमरा उन्हें देने का प्रस्ताव दिया. किन्तु प्रिया ने इसके लिए मना कर दिया. उसने कहा कि हम यह काम कहीं से भी कर लेंगे, जिससे किसी को कुछ पता नहीं लगेगा. इस तरह से 'IIDEA' के ये नए चार सदस्य मिलकर एक ‘अदृश्य कमांड सेंटर’ बन गए थे. जिन्हें हड़ताल के लिए एक डिजिटल ढ़ाल का काम करना था. हालाँकि इन चारों की एसोसिएशन सदस्यता गोपनीय रखी गई थी.

रविवार सुबह से ही 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के मज़दूरों के व्हाट्सएप में हलचल बढ़ गई. मजदूरों के व्हाट्सएप में अनजान नंबरों से संदेश तैरने लगे— "पंजाब में नई फैक्ट्री का काम शुरू हो गया है, मुंबई की मशीनें रविवार रात तक ट्रक में लद जाएंगी.

प्रिया ने अपने लैपटॉप पर इन संदेशों का 'मेटा-डेटा' और पैटर्न चेक किया. उसने पाया कि सभी मैसेज एक ही 'बल्क मैसेजिंग सॉफ्टवेयर' से भेजे जा रहे थे. उसने तुरंत प्रशांत बाबू को सूचित किया. प्रशांत बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, "प्रबंधक डरा हुआ है, प्रिया. जब तर्क खत्म होते हैं, तो वे अफ़वाहों का सहारा लेते हैं." प्रिया की टीम ने तुरंत उन संदेशों का खंडन करने वाला सटीक 'फैक्ट-चेक' मैसेज ‘पर्दाफाश-1’ तैयार किया, जिसे यूनियन के अध्यक्ष और सचिव ने सभी मज़दूरों तक पहुँचाया.

रविवार की दोपहर तक खबर आई कि कारखाने के कुछ 'जॉबर्स' वरिष्ठ मज़दूरों के घर जाकर उन्हें 'पर्सनल प्रमोशन' और पंजाब वाले प्लांट में ऊँचे ओहदे का लालच दे रहे हैं. मालिक की कोशिश थी कि सोमवार की सुबह गेट पर भीड़ कम रहे.

राहुल और स्नेहा ने पिछले तीन सालों के 'प्रोडक्टिविटी डेटा' और 'वेतन वृद्धि' के पुराने रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया. उन्होंने दिखाया कि कैसे ये वही पुराने मज़दूर हैं जिनका वेतन दस साल से 'एम्पलॉइज शॉप' के नाम पर स्थिर रखा गया था. इस डेटा को एक सरल ग्राफ में बदलकर जब मज़दूरों को दिखाया कि उनका वेतन वर्तमान में मिल रहे वेतन से चार गुना से कुछ अधिक होना चाहिए था, तो उनका संकल्प और मजबूत हो गया. "दस साल की गुलामी का इनाम अब केवल एक खोखला वादा है," यह बात मज़दूरों के बीच बिजली की तरह फैल गई.

आदित्य ने मज़दूरों के लिए एक 'इमरजेंसी अलर्ट' सिस्टम बनाया. इसे 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' नाम दिया गया. इसका उद्देश्य था कि अगर सोमवार सुबह गेट पर पुलिस या बाउंसरों का हस्तक्षेप हो, तो पलक झपकते ही सभी मज़दूरों और यूनियन के नेताओं तक लोकेशन के साथ जानकारी पहुँच जाए. इस तरह 'अकाट्य एकता' को अपना 'डिजिटल सुरक्षा कवच' मिला.

रविवार शाम, यूनियन ऑफिस के नजदीकी पार्क में मजदूरों की आम सभा हुई. इस सभा में कारखाने के मजदूरों की संख्या साढ़े तीन सौ के करीब थी, जो कारखाने के मजदूरों की संख्या के नब्बे प्रतिशत थे. सभी ने मांगें मंजूर होने तक हड़ताल में बने रहने के साथ इस बात का भी संकल्प लिया कि इस बार मालिक फेयर वेजेज देने को तैयार नहीं होता है तो वे इस कारखाने में काम पर नहीं जाएंगे चाहे कारखाना बंद क्यों न हो जाए. मजदूरों के पूरे जोश के साथ मीटिंग खत्म हुई. ‘मजदूर एकता ज़िंदाबाद’, ‘हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’ और ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के नारों से सारा इलाका गूंज उठा. सभा आरंभ होने से समाप्त होने और मजदूरों के चले जाने तक एक सब इंस्पेक्टर के साथ लगभग बीस पुलिस वाले पार्क के पास तैनात रहे.

सभा के बाद यूनियन ऑफिस के भीतरी कमरे में प्रशांत बाबू, सीनियर वकील, यूनियन अध्यक्ष-सचिव और प्रिया की टीम के बीच एक गुप्त मीटिंग हुई. सोमवार सुबह 6 बजे की पहली शिफ्ट से हड़ताल शुरू होनी थी.

प्रशांत बाबू ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा, "कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो गेट पर केवल मज़दूर आत्म-सम्मान के साथ खड़े होंगे. हमें हड़ताल को अहिंसक बनाए रखना है, इसका ध्यान यूनियन के पदाधिकारियों को रखना है. अफवाहों का खंडन करने के लिए समय-समय पर ‘पर्दाफाश’ संदेश और हर आधा घंटे में 'आईडिया न्यूज़ अपडेट' व्हाट्सएप पर आते रहेंगे. प्रबंधन मजदूरों को उकसाने के लिए गुंडों या बाउंसरों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन हमें पूरा ध्यान रखना होगा कि हम उत्तेजित न हों. यदि मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाने की कोई कार्यवाही हो तो हम उससे तुरन्त निपटेंगे और अपनी ओर से हिंसा न करेंगे. हमारे मजदूरों को हर हाल में हिंसा से बचना है. हमारी शांति ही हमारा सबसे बड़ा हथियार होगी."

प्रिया और उसके साथियों ने महसूस किया कि वे पहली बार किसी 'सिस्टम' को क्रैश होने से बचाने का काम नहीं कर रहे थे, बल्कि एक नए, न्यायपूर्ण सिस्टम को जन्म लेने में मदद कर रहे थे. दफ्तरों और घरों में घंटों कोडिंग के जालों से उलझने के दौरान जिस तरह की बोरियत और ऊब उन्हें सामना करना पड़ता था,वैसी यहाँ नहीं थी. उसके विपरीत उन्हें अपने कोडिंग के ज्ञान की ताकत और उसके उपयोग का एक नया मानवीय चेहरा नज़र आ रहा था.
... क्रमशः

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

पुर्जा नहीं, इंसान

देहरी के पार, कड़ी - 16
रविवार शाम चार बजे मुंबई की उमस के बीच, प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी वेस्ट के एक पुराने औद्योगिक इलाके में 'IIDEA' के कार्यालय पहुँचे. बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर एक लंबे कमरे के अंत में एक टेबल लगी थी, जिसके पीछे की कुर्सी पर एक अधेड़ व्यक्ति बैठा था. कमरे में दोनों ओर दो-दो बेंचें रखी थीं जिन पर कुछ लोग बैठे थे. उन्होंने टेबल के पीछे बैठे व्यक्ति से कहा, “हमें प्रशांत बाबू से मिलना है.”

“वे ऊपर मीटिंग में हैं.” वहाँ बैठे व्यक्ति ने जवाब दिया. “आप कहाँ से आए हैं? और क्या नाम हैं? बता दें, मैं उन्हें खबर भिजवा दूंगा.”

“बस उन्हें कहिए ‘डाटाप्रोस’ से प्रिया और उसके साथी आए हैं.”

उसने एक व्यक्ति को अंदर भेजा. पाँच मिनट बाद वह लौटा और बोला, “आपको ऊपर बुलवाया है.”

चारों उसी व्यक्ति के साथ कमरे के अंदर के दरवाजे से अंदर गए, वहाँ एक छोटे आंगन से सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं. फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में प्रशांत बाबू बैठे मिले, इस कमरे के पास ही एक हॉल था जिसमें कम से कम दो सौ लोग बैठ सकते थे. वहाँ कोई बैठक चल रही थी.

“आओ, तुम लोग बिलकुल समय से आए हो. कुछ देर बाद एक महत्वपूर्ण मीटिंग शुरू होने वाली है. मैं चाहता हूँ तुम सब उसमें दर्शक के रूप में बैठो. बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“हम उसमें शामिल होंगे, लेकिन पहले हम यूनियन की सदस्य बनना चाहते हैं.”

“मैं तुम्हें फॉर्म देता हूँ, इन्हें भर दीजिए और उस पर बने क्यूआर कोड को स्कैन करके अपनी सदस्यता शुल्क पे कर दीजिए.” प्रशांत बाबू ने चार फॉर्म निकाल कर प्रिया को दिए, चारों ने वहीं बैठकर उन्हें भरा, शुल्क भुगतान की. प्रशांत बाबू ने फार्म के निचले हिस्से पर अपने हस्ताक्षर करके उन्हें रसीद दे दी.

“आपकी यूनियन का नाम ‘डेमोक्रेटिक आईटी एम्पलॉइज एसोसिएशन’ यह 'IIDEA' से एफिलिएटेड है. मैं इस यूनियन की मुम्बई इकाई का सैक्रेटरी हूँ. एसोसिएशन के सदस्य बन कर तुम सब एक व्यापक ‘श्रम शक्ति’ का हिस्सा बन गए हो.”

कुछ देर में पास वाले हॉल में मीटिंग आरंभ हो गयी. वे सब भी उसी हॉल में जा बैठे.

मीटिंग में 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के लगभग 150 मज़दूर जमा थे. यह कारखाना इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) बनाता था. चर्चा से पता चला कि दस साल पहले मालिक ने एक अजीब समझौता किया था. जब मज़दूरों ने महंगाई के कारण वेतन बढ़ाने की मांग की, तो मालिक ने कहा— "मैं वेतन नहीं बढ़ाऊंगा, लेकिन कारखाने की अपनी 'एम्प्लॉइज शॉप' पर आपको राशन और दूसरी सब जरूरी चीजें उसी पुराने दाम पर मिलेंगी जो आज हैं."

शुरू में यह लुभावना लगा, लेकिन वक्त के साथ दुकान के बाहर की दुनिया में 'महंगाई' आग लगा चुकी थी. बच्चों की स्कूल फीस, अस्पताल का खर्च और बस का किराया उस से नहीं मिल सकता था. मज़दूरों ने अब फिर से यूनियन बनाई और अपना मांग-पत्र दिया.

मांग पत्र पर मालिक का जवाब सीधा और क्रूर था— "हड़ताल की, तो मैं यह यूनिट पंजाब ले जाऊँगा. तुम सब सड़क पर आ जाओगे."

मीटिंग में 'IIDEA' के कानूनी सलाहकार, एक सीनियर वकील मौजूद थे उन्होंने अपनी राय मजदूरों के सामने रखी: "कानूनी रूप से मालिक को अपना व्यापार कहीं भी ले जाने का हक है. अगर उसने ऐसा किया, तो आप सब बेरोजगार हो जाएंगे. यह आपको सोचना है कि क्या आप फिर भी हड़ताल का जोखिम उठाने को तैयार हैं या नहीं?"

कुछ पल की खामोशी के बाद एक अधेड़ उम्र का मज़दूर खड़ा हुआ. उसके हाथ आईसी बनाने के काम से कुछ काले पड़ गए थे. उसने कड़क आवाज़ में कहा— "साहब, बेरोज़गारी का डर दिखाकर वह हमें गुलाम बनाए रखना चाहता है. इन शर्तों पर काम करना भी तो धीरे-धीरे मरने जैसा ही है. हम कुछ भी कर लेंगे, फुटकर मजदूरी कर लेंगे, लेकिन इस ज़िल्लत में काम नहीं करेंगे. हम हड़ताल करेंगे!"

उसके बाद मजदूरों का आव्हान किया गया कि, ‘वे हड़ताल के विषय अपनी मंच पर आकर रखें. और वे मजदूर अवश्य अपनी बात रखें जो हड़ताल के विरुद्ध राय रखते हों. यदि हड़ताल होती है तो बाद में कोई यह नहीं कहे कि वह हड़ताल के विरुद्ध है’. इसके बाद कुछ हाथ उठे, उन सब मजदूरों ने मंच पर आकर एक-एक करके अपनी राय रखी. अंत में यूनियन के पदाधिकारियों ने आपस में कुछ बात की, फिर सैक्रेटरी ने सब मजदूरों से कहा, “यूनियन कार्यसमिति की राय है कि हमें मालिक को एक सप्ताह का समय और देना चाहिए और उसके बाद के सोमवार से हड़ताल कर देना चाहिए. जो भी इस राय के विरुद्ध हो वह हाथ खड़ा करे, उसे अपनी राय रखने का अवसर दिया जाएगा.

किसी मजदूर ने हाथ नहीं उठाया. कुछ देर इंतजार करने के बाद सैक्रेटरी ने कहा जो हड़ताल के साथ है वे हाथ उठाएँ. मजदूरों ने हाथ उठाए. हाथ गिने गए. उसके बाद सैक्रेटरी ने कहा कि, “सर्वसम्मत राय है कि आज से ठीक आठवें दिन सोमवार को सुबह की शिफ्ट के साथ हड़ताल आरंभ होगी.”

इसके बाद सैक्रेटरी ने नारा लगाया, ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद¡’ सब मजदूरों ने नारे का बुलंदी से जवाब दिया. उनकी आवाज़ों में एक अजीब सा तालमेल था, बिलकुल 'हीरे के अणुओं' की उस मजबूती जैसा जिसके बारे में प्रशांत बाबू ने उन्हें बताया था.

प्रशांत बाबू मंच पर आए. उनकी नज़रें प्रिया पर पड़ीं, जो सन्न होकर यह सब देख रही थी. प्रशांत बाबू ने गरजती हुई आवाज़ में कहा: "जब जीवन का संकट बेरोज़गारी के डर से बड़ा हो जाए, तो नेतृत्व का काम रास्ता दिखाना होता है. हम यहाँ केवल चंद रुपयों के लिए नहीं, बल्कि अपने 'अधिकारों' और 'मनुष्य की गरिमा' के लिए लड़ेंगे. सारा मज़दूर एकमत है, IIDEA इस लड़ाई का नेतृत्व करेगा. हम हड़ताल करेंगे!"

हॉल फिर से 'मजदूर एकता ज़िंदाबाद' के नारों से गूंज उठा. प्रिया ने एक सच्चा जनतंत्र वाद देखा था उसे अहसास हुआ कि 'देहरी के पार' की दुनिया केवल जैसे विक्रांत व्यक्तिगत दुश्मनों से लड़ने के बारे में नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था से टकराने के बारे में भी है जो इंसान को मशीन का एक पुर्जा समझती है.
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

एकता

देहरी के पार, कड़ी - 15
प्रिया ऑटो से मेवाड़ भोजनालय पहुँची, तब रात के साढ़े दस बज चुके थे. मुंबई की सड़कों पर ट्रैफिक कम था. वाहन अपनी गति से दौड़ने लगे थे. राहुल और आदित्य भी उसके पीछे ही पहुँच गए. 'मेवाड़ भोजनालय' में कुछ और ही चल रहा था. कर्मचारियों ने रामजी काका के निर्देश पर भोजनालय के अंदर वाले हॉल की मेजों और कुर्सियों को फुर्ती से जोड़कर एक विशाल 'राउंड टेबल' की शक्ल दे दी थी. अब हॉल में बीस लोग एक साथ बैठकर डिनर कर सकते थे. ऐसा लगता था कि आज हॉल में किसी खास क्लाइंट के ऑर्डर पर मीटिंग और डिनर होने वाला था.

हॉल तैयार होते ही प्रशांत बाबू और उनकी 'आइडिया' एसोसिएशन के चार पाँच साथियों ने सबसे पहले हॉल में प्रवेश किया. प्रिया के सभी साथियों को भी रामजी काका ने अंदर के हॉल में जाने को कहा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि आज क्या होने वाला है. लेकिन कुछ ही देर में सबको समझ आ गया कि पिछले चार दिन से जो लोग विक्रांत को सबक सिखाने के ऑपरेशन में लगे थे वे सब इस डिनर में शामिल होने वाले हैं. प्रशांत बाबू राउंड टेबल की मुख्य कुर्सी पर बैठे. उनके पास दोनों ओर की एक-एक कुर्सी छोड़ कर एक तरफ प्रिया और उसकी टीम के लोग थे तो दूसरी तरफ एसोसिएशन के सदस्य. उनके साथ ही ऑटो चालक फरीद भाई और मोड़ पर विक्रांत को रुकने पर मजबूर करने वाले मिनी-ट्रक के चालक डेनियल भी मौजूद थे. प्रिया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब प्रिया और उसके मैनेजर मिस्टर देसाई भी वहाँ पहुँच गए. प्रिया और उसके साथियों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया. प्रशांत बाबू ने उन्हें अपने पास प्रिया की टीम के साथ बैठने का न्यौता दिया. उनके दूसरी ओर की कुर्सी अब भी खाली थी. हॉल के दरवाजे के पास खड़े रामजी को उन्होंने इशारे से अपने पास बुलाया और कहा, “रामजी भाई, ये खाली कुर्सी आपकी है, आप कब तक हमसे बचते रहेंगे. आज के असली हीरो तो आप ही हैं. आप न होते तो यह आपरेशन ही नहीं होता. आज आपको भी हमारे साथ डिनर करना है.” उन्होंने खड़े होकर रामजी का हाथ पकड़ा और लगभग जबरन पास की खाली कुर्सी पर बिठा दिया.

प्रशांत बाबू ने गले में पड़ा गमछा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बोले, "साथियों, आज हमने जो किया, वह केवल एक अपराधी को पकड़वाना नहीं था. इस 'ऑपरेशन' में फरीद भाई के ऑटो ने रास्ता दिखाया तो डेनियल भाई के मिनी-ट्रक ने दीवार खड़ी की." उन्होंने आगे बढ़कर दोनों का परिचय कराया. ये दोनों अपनी-अपनी यूनियनों के बेहतरीन कार्यकर्ता हैं जो हमारी एसोसिएशन के बिरादराना संगठन हैं.

"यह दृश्य देखिए," प्रशांत बाबू ने कमरे की ओर इशारा किया, "यहाँ हिंदू, मुस्लिम और क्रिश्चियन साथी एक साथ बैठे हैं. और ताज्जुब देखिए, यह सब मेरे जैसे एक 'नास्तिक' के कहने पर आपस में जुटे हैं. आज दुनिया भर के ज्यादातर राजनीतिज्ञ धर्म, जाति और नस्लों के आधार पर लोगों को बाँटने के चलन पर हैं तब हम सबका इस तरह एक उद्देश्य के लिए एकजुट होकर सफल हो जाने को लोग चमत्कार कह सकते हैं. हम सब अपने संगठनों में तो काम करते ही हैं, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर हमारे 'बिरादराना संगठन' श्रमजीवियों के एक विशाल परिवार की तरह एकजुट हो जाते हैं. आज विक्रांत इसलिए हारा क्योंकि वह अपने उद्देश्य में अकेला था. उसके साथ जो थे वे उसके साथी नहीं, कर्मचारी थे, उनमें उद्देश्य और लक्ष्य की एकता नहीं थी, उनकी एकता गीली रेत के लड्डू जैसी भुरभुरी थी. और हम, इसलिए जीते क्योंकि हम संगठित थे और हमारा उद्देश्य और लक्ष्य एक था, हमारी एकता हीरे के अणुओं जैसी मजबूत और अकाट्य थी."

माहौल की गरमाहट और सुरक्षा का अहसास ऐसा था कि राहुल और आदित्य अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए. राहुल ने हिचकिचाते हुए पूछा, "सर, क्या हम लोग भी आपकी एसोसिएशन के सदस्य बन सकते हैं? आज जो ताकत हमने देखी, वह किसी कंपनी की पॉलिसी में नहीं है."

प्रशांत बाबू ने हलकी मुस्कुराहट और शरारत भरी नज़रों से कोने में बैठे देसाई जी को देखा और मज़ाक में कहा, "आप सबका एसोसिएशन में स्वागत है, मेंबरशिप फार्म भरने की औपचारिकता कभी भी की जा सकती है. पर पहले सोच लीजिए, देसाई जी जरूर आपसे नाराज हो जाएंगे. कहीं वे इसे 'बगावत' न समझ लें!"

हॉल में हल्का ठहाका गूँज उठा. देसाई जी, जो अब तक केवल आंकड़ों और फाइलों में जी रहे थे, भावुक होकर बोले, "नाराजगी कैसी प्रशांत जी? सच कहूँ तो मन तो मेरा भी कर रहा है कि मैं भी आप लोगों की इस एसोसिएशन में शामिल हो जाऊँ. लेकिन भला एक मैनेजर का वहाँ क्या काम?"

प्रशांत बाबू ने गर्मजोशी से उनके कंधे पर हाथ रखा, "देसाई साहब, आप अकेले क्यों? आप जैसे कम से कम दस मैनेजर तैयार करिए, फिर हम 'मैनेजर्स एसोसिएशन' बनाएंगे. हमारी यूनियनों के बीच 'बिरादराना ताल्लुक' (Fraternal Relations) रहेंगे. मज़दूर हो या मैनेजर, हम सभी इस सिस्टम में वर्किंग पीपुल्स ही हैं, जब तक हम एक-दूसरे के हक़ के लिए खड़े हैं, कोई हमारा शोषण नहीं कर सकता."

रामजी काका के कर्मचारियों ने गरम-गरम मेवाड़ी दाल-बाटी और चूरमा परोसना शुरू कर दिया. माहौल उत्सव जैसा हो गया था. फरीद और डेनियल एक-दूसरे को 'ऑपरेशन काली स्कॉर्पियो' के किस्से सुना रहे थे. प्रिया ने महसूस किया कि मुंबई उसके लिए अब 'पराया' नहीं रहा.

इसी जश्न के बीच, प्रशांत बाबू का फोन बजा. उन्होंने कुछ देर बात की और उनका चेहरा गंभीर हो गया. वे धीरे से प्रिया के पास आए और बोले, "प्रिया, विक्रांत के पिता ने मुंबई के एक नामी वकील से संपर्क किया है. कल सुबह वे 'जमानत' की अर्जी डालेंगे. उन्होंने ‘फेक आईडी’ वाले मामले को बंद करा देने तैयारी की है."

प्रिया के हाथ में निवाला रुक गया. उसने प्रशांत बाबू की आँखों में देखा और शांत आवाज़ में बोली, "सर, वह बाहर आए या अंदर रहे, अब मैं अकेली नहीं हूँ. मेरे पास फरीद भाई का रास्ता है, डेनियल की दीवार है और हमारी एसोसिएशन का सुरक्षा कवच है. अब वह 'बग' मेरा सिस्टम क्रैश नहीं कर पाएगा."
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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

शिकंजा

देहरी के पार, कड़ी - 14
योजना के अनुसार, रात साढ़े आठ बजे प्रिया ऑफिस से निकली. उसके कदम सधे हुए थे. उनमें किसी तरह की कोई घबराहट नहीं, बल्कि एक तरह की लापरवाही थी. उसने अपनी स्मार्टवॉच पर 'लोकेशन शेयरिंग' ऑन की और टीम को 'रेडी' का सिग्नल भेजा. कुछ दूर चलकर उसने ऑटो लिया. ऑटो चालक यूनियन का कार्यकर्ता था जिसे इस तरह के कामों की आदत थी. ऑटो मेवाड़ भोजनालय से विपरीत दिशा में जा रहा था. एक किलोमीटर बाद ऑटो एक छोटी गली में मुड़ गया. दूसरी सड़क पर आकर विपरीत दिशा में चलकर उसके पहले वाली गली में तीन मकान आगे आकर खड़ा हो गया. प्रिया ऑटो में बैठी रही, ड्राइवर ने उतर कर सड़क पर जाकर देखा स्कॉर्पियो उस गली से सड़क पर आकर रुक गयी थी. उसके चालक को पता नहीं लग रहा था कि आटो कहाँ चला गया. ड्राइवर वापस आकर बताया कि स्कॉर्पियो वाला कन्फ्यूज है, अब मैं आपको फ्लैट पर छोड़ देता हूँ.

अगले दिन सुबह उन्होंने प्रोजेक्ट क्लाइंट के सर्वर पर शिफ्ट करके उसे सौंप दिया. क्लाइंट को किसी तरह की समस्या आने पर उसे देखने के लिए एक डेवलपर काफी था. प्रिया की टीम के बाकी साथी उसके साथ योजना में शामिल थे. सबने लंच एक साथ लिया. काली स्कॉर्पियो बदस्तूर ड्यूटी पर थी. उसे थोड़ा काम देने के लिए प्रिया, स्नेहा और राहुल ऑफिस से बाहर निकले, आटो लिया और डेढ़ किलोमीटर दूर एक कैफे में कॉफी पीकर लौट आए. स्कॉर्पियो ने उनका पीछा किया. प्रिया ने यह जान लिया कि आज स्कॉर्पियो को विक्रांत ड्राइव कर रहा है, उसके दो लोग पीछे बैठे थे.

शाम ठीक आठ बजे प्रिया अकेली अपने ऑफिस से निकली. उसने स्टैंड से ऑटो लिया. यह कल वाला ऑटो नहीं था, लेकिन चालक वही वाला था. ऑटो जानबूझकर उस रास्ते पर मुड़ा जहाँ 'मेवाड़ भोजनालय' से पहले एक चौड़ी सड़क और फिर एक सुरक्षित मोड़ आता था. काली स्कॉर्पियो किसी भूखे शिकारी की तरह पीछे लग गई. जैसे ही स्कॉर्पियो मोड़ पर पहुँची, अचानक सामने से एक बड़ा मिनी-ट्रक आकर खड़ा हो गया और पीछे से राहुल और आदित्य की गाड़ियों ने रास्ता ब्लॉक कर दिया. मिनी-ट्रक का चालक भी नीचे उतर गया.

स्कॉर्पियो के पहिए चीखते हुए रुक गए. घेराबंदी पूरी थी. स्कॉर्पियो न आगे जा सकती थी, न पीछे और न ही मुड़ने का कोई ऑप्शन था. इस 'घेराबंदी' से विक्रांत बुरी तरह तिलमिला गया वह ड्राइविंग सीट से नीचे उतरा. उसके चेहरे पर वही कोटा वाली सनक थी. उसे लगा कि वह धौंस से इन मिनी-ट्रक वाले को डरा देगा.

उसने चिल्लाकर कहा, ये क्या बदतमीजी है? ट्रक को इस तरह बीच में क्यों खड़ा किया है? अपना ट्रक हटाओ, पीछे जाम लग रहा है.

मैं क्या करूँ बाबूजी, इंजन बंद हो गया है, देखना पड़ेगा या फिर किसी मिस्त्री को बुलाना पड़ेगा. इतना कहकर उसने ट्रक का बोनट खोला और उसके अंदर गड़बड़ी देखने लगा.

विक्रांत यह देखकर झुंझला गया. वह पीछे राहुल और आदित्य की ओर बढ़ा, “तुम अपने स्कूटर एक तरफ करो मैं अपनी गाड़ी थोड़ा पीछे लेकर निकालता हूँ, वरना ट्रैफिक रुक जाएगा. वे दोनों उतर कर स्कूटर को एक तरफ करने लगे. तभी उसे ध्यान आया कि प्रिया का ऑटो तो निकल चुका होगा. उसने ट्रक के आगे जाकर देखा तो प्रिया का ऑटो रुका हुआ था, वह बाहर निकल कर खड़ी थी.

प्रिया को इस तरह खड़ी देख कर उसे गुस्सा आ गया. उसने चिल्लाकर कहा, "प्रिया, ये क्या तमाशा है? जयपुर में भी तुमने यही किया था. पुलिस बुलाकर क्या उखाड़ लोगी? वहाँ तुमने मुझे शांति भंग (170 BNS) में गिरफ्तार करवाया था. क्या हुआ? शाम को मजिस्ट्रेट ने जमानत ले ली. आधी रात तक तो कोटा पहुँच गया था. यहाँ तुम क्या कर लोगी? यहाँ भी बॉन्ड भरकर बाहर आ जाऊँगा."

प्रिया ने शांत भाव से अपना फोन ऊपर किया. "विक्रांत, तुमने सही कहा. जयपुर में तुम केवल 'शांति भंग' के मामले में छूट गए थे. लेकिन वहाँ तुमने अपना एक रिकॉर्ड (Criminal Record) छोड़ दिया था. उसके बाद तुमने सोशल साइट्स से मेरे फोटो लेकर उन्हें डिस्टॉर्ट करके जो अपराध किया था उसकी जाँच मुम्बई पुलिस लगभग पूरी कर चुकी है उसे बस अब तुम्हारी तलाश है, उम्मीद है वह जल्दी ही तुम्हें तलाश कर लेगी. इसके अलावा मेरे पास पिछले 48 घंटों की तुम्हारी 'स्टॉकिंग' (Stalking) का वीडियो सबूत है, तुम्हारे मूवमेंट के डिजिटल लॉग्स हैं और तुम्हारे कारिंदों की गवाही है."

प्रिया कुछ आगे बढ़कर विक्रांत के एकदम नजदीक आ गई और कड़क आवाज़ में बोली, "एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के लिए तुम केवल एक 'ट्रैकेबल बग' (Trackable Bug) हो. अब तुम्हारा एक और अपराध मुम्बई पुलिस की डायरी में दर्ज होने को तैयार है. अब तुम एक 'रिपीटर ऑफेंडर' (Repeater Offender) हो."

तभी सड़क पर नजदीक ही नीली-लाल बत्तियाँ चमकने लगीं. प्रशांत बाबू ने पहले ही पुलिस को सारे डिजिटल सबूत और विक्रांत की लाइव लोकेशन भेज दी थी. पुलिस की गाड़ी ठीक प्रिया के पीछे आकर रुकी, गाड़ी से मुम्बई पुलिस का एक इंस्पेक्टर और दो सिपाही बाहर निकले. तीनों ने विक्रांत को दबोचा और उसे जबरन धकिया कर कार की पिछली सीट पर ठेलकर दरवाजा बंद किया और डोर लॉक कर दिए. अब वह पुलिस गाड़ी से नीच नहीं उतर सकता था.

इंस्पेक्टर ने प्रिया को कहा, “आपको कुछ देर के लिए पुलिस स्टेशन आना पड़ेगा. हमने आपकी सूचना दर्ज कर ली थी. आपको आकर दस्तखत करने होंगे. फिर हम उसे एफआईआर के रूप में दर्ज कर आपको उसकी एक प्रति दे देंगे.

प्रिया अपने ही ऑटो से पुलिस स्टेशन पहुँची, कुछ देर बाद ही राहुल और आदित्य भी पहुँच गए. इंस्पेक्टर ने सूचना पर प्रिया के हस्ताक्षर लिए फिर एफआईआर दर्ज कर उसपर और एक प्रति प्रिया को दी. फाइल देखकर उसने कहा, “जयपुर का पुराना रिकॉर्ड, मुम्बई में फेक प्रोफाइल का मामला और अब स्टॉकिंग का नया मामला... इस बार विक्रांत साहब का बिना सजा काटे जेल से बाहर आना मुश्किल होगा. प्रिया, राहुल ओर आदित्य बाहर आए. राहुल ने प्रिया से पूछा, “अब?”

“अब क्या? अब मेवाड़ भोजनालय चलना है, सब वहाँ प्रतीक्षा कर रहे होंगे. आज डिनर वहीं होगा.”
... क्रमशः