@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

प्रेम और मुक्ति

पिंजरा और पंख-42

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
8 अप्रेल 2007. सुबह आयुष की आँख खुली, उसने घड़ी देखी, छह बजने में तीन मिनट. उसने अपनी दिमागी घड़ी को धन्यवाद दिया और अलार्म बन्द किया. आज शरीर बहुत हल्का लगा उसमें मॉक टेस्ट के दिनों जैसा भारीपन नहीं था. पैरों में चप्पल डाल कर वह बाहर आया तो देखा होस्टल में सभी छात्र न केवल जाग चुके थे, बल्कि कुछ परीक्षा केन्द्र जाने के लिए तैयार हो रहे थे तो कुछ अभी से तैयार होकर नोट्स देखने में लगे थे. वह तसल्ली से सीढ़ियाँ उतर कर नीचे मैस में गया. पारलेजी का सबसे छोटा बिस्कुट पैक लिया और चाय के साथ गटके. फिर एक चाय और लेकर पी. लौटते ही बाथरूम में घुसा. वह ठीक आठ बजे बिलकुल तैयार था. उसकी नजर दीवार पर लगे कैलेंडर पर पड़ी जिस पर आठ अप्रेल के नीचे उसने लाल स्केच पेन से लिखा था— "सत्य से साक्षात्कार का दिन, युद्ध का नहीं." उसके चेहरे पर अनायास ही मुस्कान आ गयी. उसने महसूस किया कि पिछले दो सालों में उसने जो हज़ारों पन्ने काले किए थे, वे सिर्फ फॉर्मूले नहीं थे, वे प्रकृति की भाषा को समझने की कोशिश थी.

परीक्षा आरंभ होने के पच्चीस मिनट पहले वह परीक्षा हॉल में था. जब पहला पेपर सामने आया, तो चारों ओर पन्ने पलटने की सरसराहट और छात्रों की तेज होती सांसें सुनाई देने लगीं. आयुष ने कलम उठाई. जटिल कैलकुलस के सवालों के बीच वह उलझा नहीं, बल्कि उसे उनमें एक लय (Rhythm) दिखाई देने लगी. उसे लगा जैसे संख्याएँ उससे बात कर रही हैं.तीन घंटे कब बीते, पता नहीं चला.

अगला पेपर दो घंटे बाद दो बजे था. बीच के अंतराल में बाहर की सड़कों पर किसी मेले जैसा माहौल था, छात्र दूसरे के उत्तरों को 'चेक' कर रहे थे. आयुष इस शोर से दूर, एक रेस्टोरेंट में बैठा, उसने हल्का भोजन किया, कॉफी पी और एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया. उसने आँखें मूँद लीं. उसे शगुन से कही अपनी ही बात याद आई—"मैंने विज्ञान में विराट देखा है. क्या नहीं है वहाँ" आयुष के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गयी, विज्ञान की ये तमाम थ्योरियाँ इस विराट प्रकृति की व्याख्या के सिवा और क्या हैं. विज्ञान 'सत्य की तलाश' ही तो था. हर नया सत्य एक और नए सत्य की तलाश के रास्ते खोल देता है. उसे पिछले साल के शुरू में रैंक की जो चिन्ता होती थी वह याद आई, फिर उसके होंठों पर मुस्कान तैर गयी. वह 'रैंक' की चिंता अब एकदम तुच्छ चीज लग रही थी.

इस दौरान उसका मन एकदम साफ था. फिजिक्स के पेचीदा सवालों को हल करते वक्त उसे लगा था जैसे वह कोई युद्ध नहीं जीत रहा, बल्कि एक पुराने दोस्त से सुलह कर रहा है. शाम पाँच बजे की 'लॉन्ग बेल' बजी, उसके पहले आयुष की आज की आखिरी आंसर शीट तैयार थी. उसने पेन अपनी जेब में लगाया और एक लंबी, गहरी सांस लेकर उठा, आंसर शीट परीक्षा निरीक्षक के हवाले हॉल से बाहर निकला तो उसका शरीर में थकान तो थी, लेकिन कोई बोझा नहीं. वह परिणाम के बोझ, 'एवरेज' होने के भय और दूसरों की उम्मीदों से पूरी तरह मुक्त था.

हॉल से एक साथ निकलने के कारण परीक्षार्थी एक छोटी भीड़ में बदल गए थे. उसे बाहर जाने की कोई जल्दी नहीं थी. वह धीरे-धीरे परीक्षा केन्द्र से बाहर निकला. धूल, धुएँ और शोर के बीच उसने खुद को अकेला महसूस किया. उसके दिमाग में अब बस एक ही बात थी—होस्टल से बैग उठा कर बस स्टैंड जाना है, रामगंजमंडी के लिए बस पकड़नी है.

तभी भीड़ के उस पार उसे पहचानी सी 'कोरल रेड मारुति 800' दिखी. कार के पास सफेद शर्ट में खड़े उसके पापा ही थे. उनके बगल में खड़ी शगुन, पागलों की तरह उसकी तरफ हाथ हिला रही थी.

आयुष की आँखों में अचानक नमी उतर आई. यह वही 'रामगंजमंडी में स्टोन-डस्ट मिली धूल से सना हुआ लड़का था, जो आज खुद को ‘प्रकृति' का हिस्सा महसूस कर रहा था. जब वह पास पहुँचा, तो शगुन ने उसे लपक कर गले लगा लिया. आयुष की थकान शगुन की इस झप्पी ने हवा में उड़ा दी.

पापा ने बस इतना पूछा, "थक गया होगा?" आयुष बस मुस्कुरा दिया. पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा, इस हाथ में उसे आज पहली बार 'दबाव' नहीं, बल्कि 'सराहना' थी.

वे होस्टल पहुँचे, आयुष ने अपना बैग लिया और कुछ ही देर में उनकी कार झालावाड़ रोड पर थी. पौन घंटे बाद गुप्ताजी ने कार दरा-स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे लगाई. लाला जी का होटल सामने ही था. कारीगर ने कढ़ाई से गर्म-गर्म कचौड़ियाँ अतिरिक्त तेल हट जाने के लिए निकाल कर झारी पर ही रख रखी थीं. गुप्ताजी ने सभी को दो-दो कचौड़ियाँ देने के लिए कहा. कुछ ही समय में कचौड़ियाँ खट्टी-मीठी चटनियों के साथ उनकी टेबल पर थीं. तभी शगुन ने पूछा, “यहाँ का तो कलाकंद भी मशहूर है न पापा?

गुप्ताजी ने शगुन के सवाल के जवाब में सभी के लिए कलाकंद भी मंगा लिया. चाय पीकर जब वे खड़े हुए तो. शगुन ने कहा, “पापा कलाकंद वाकई बहुत स्वादिष्ट है. गुप्ताजी ने किलो भर कलाकंद घर के लिए और लिया. कार ने रामगंजमंडी में प्रवेश किया तब रात के आठ बज रहे थे. जैसे ही कार घर के सामने रुकी, मम्मा दरवाज़े पर खड़ी मिलीं. उनकी गोद में नन्ही 'मुक्ति' थी.

आयुष ने कार से उतरकर मम्मा के पैर छुए और फिर मुक्ति को अपनी बाहों में ले लिया. वह आयुष की गोद में आते ही मुस्कुराई. मुक्ति की इस छोटी सी मुस्कान ने जैसे आयुष के 'सत्य-साक्षात्कार' पर अपनी मुहर लगा दी. उसे अहसास हुआ कि विज्ञान का असली आनंद तो इस 'प्रेम' और 'मुक्ति' में ही छुपा है.

उस रात रामगंजमंडी के उस पुराने घर में 'आईआईटी' की कोई चर्चा नहीं हुई. वहाँ सिर्फ एक परिवार था, जो महीनों बाद एक साथ खाना खा रहा था—एक ऐसे आयुष के साथ, जो अब 'रैंक' की रेस से आज़ाद हो चुका था. 
... क्रमशः

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

विराट

पिंजरा और पंख-41

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
8 अप्रैल 2006, वनस्थली में सूरज की पहली किरण के साथ ही शगुन उठ बैठी. अपने रूम में वह अकेली थी.. यह उसके कोटा जाने का दिन था. प्रियंका, किरण और सीमा कल ही जा चुकी थी. गुप्ताजी बेटी को लेने रात आठ बजे पहुँचे. रात गेस्ट हाउस में रुके. सुबह तैयार हो कर चाय पी और ठीक 10 बजे शगुन के होस्टल पहुँच गए. शगुन ने अपना सारा सामान कार की डिक्की में सहेज दिया. होस्टल वार्डन को नमस्ते कह दोनों कार में आ बैठे. शगुन के मन में रह-रहकर आयुष का ख्याल आ रहा था. ठीक इसी समय, कोटा के किसी परीक्षा केंद्र में आयुष अपना पहला पेपर दे चुका होगा.

"पापा, थोड़ा जल्दी निकलें? हमें 5:00 बजे तक कोटा पहुँचना ही होगा," शगुन ने कार में बैठते हुए कहा.

“हमारे पास बहुत समय है” कहते हुए पापा ने मुस्कुराकर इग्निशन चालू किया. वनस्थली विद्यापीठ की मुख्य सड़क से होते हुए वे गेट से बाहर आ गये. शगुन विद्यापीठ में अपने जीवन के 2 महत्वपूर्ण साल बिता चुकी थी. हाईवे पर आने के बाद भी गुप्ताजी कार को आराम से चला रहे थे. करीब 11 बजे वे टोंक पहुँचे. हाईवे के किनारे एक साधारण से रोड-साइड रेस्टोरेंट पर गुप्ताजी की कोरल रेड मारुति 800 रुकी. दोनों ने वहाँ गर्म समोसे खा कर कॉफी पी और आगे बढ़ गए.

"अभी दूसरा पेपर शुरू होने वाला होगा," पापा ने पहली बार आयुष का ज़िक्र किया. उनकी आवाज़ में वह पुरानी कड़क नहीं, बल्कि एक अजीब सी बेचैनी थी. शगुन ने देखा कि पापा ने अपना चश्मा उतारकर रुमाल से साफ़ किया—यह घबराहट छुपाने का उनका पुराना तरीका था.

कल शाम ही आयुष से बात हुई थी. उसके स्वर में परीक्षा का बिलकुल तनाव नहीं था. कह रहा था, “दीदी मैंने पूरी कोशिश की है. जितना कोर्स है उस सबको खूब अच्छी तरह समझा है. मुझे इस तैयारी के बीच समझ आया कि साइंस क्या है? वह तो असली जीवन की खोज है. हर कहीं जीवन है. जिसे हम निर्जीव पदार्थ कहते हैं उसके भी कण-कण में गति है, जीवन है. मैंने बहुत दिन पहले किसी कहानी में पढ़ा था कि यशोदा ने कृष्ण के मुख में विराट को देखा था. मैंने विज्ञान में विराट देखा है. क्या नहीं है वहाँ? वह सीखने और आगे बढ़ने का रास्ता है.”

आयुष की बातें सुन कर वह दंग रह गयी थी. आखिर इसने विज्ञान के संसार में घुसने में सफलता पा ली. अध्ययन और परीक्षा के बीच की दूरी तय कर ली. आयुष ने कहा था, “अब परिणाम से मुझे बिलकुल डर नहीं लगता. वह मेरे लिए बेमतलब है. जो कुछ मैंने जान लिया है उसे बुरा परिणाम नहीं छीन सकता. अच्छा परिणाम मुझे कुछ सिखा नहीं सकता.” इस बात के बाद उसे आयुष की चिन्ता नहीं रही थी. उसने ऐसा रास्ता पकड़ लिया था जो उसे कभी धोखा नहीं दे सकता था.

देवली पहुँचे तब एक बज रहा था. यह खाने का समय था. गुप्ताजी ने कार को एक ढाबे पर रोका. दोनों नीचे उतरे. गुप्ताजी ने नल पर जाकर हाथ मुहँ धोए, ड्राइविंग की थकान कुछ कम हुई. ढाबे की दाल और चपाती का स्वाद अलग ही था. खाने के साथ शगुन ने सड़क पर जाते ट्रकों के पीछे उड़ती धूल देखी. उसे याद आ गया कि कैसे आयुष बचपन में ज़रा सी धूल से डरता था, आज वही आईआईटी-जी की तपती 'रेसिंग ट्रैक' पर दौड़ रहा है.

शाम के जब कार ने कोटा शहर की सीमा में प्रवेश किया तो 4:30 बज रहे थे. कोचिंग के बड़े-बड़े होर्डिंग्स और छात्रों की भीड़ बता रही थी कि यह शहर केवल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि उम्मीदों और दबावों का शहर है. पापा ने गाड़ी सीधे आयुष के परीक्षा केंद्र के बाहर पहुँच कर स्थान देख कर पार्क कर दी.

अभी शाम का आखिरी पेपर खत्म होने में बीस मिनट थे. केंद्र के बाहर अभिभावकों का हुजूम बढ़ता जा रहा था. कोई-कोई ठंडे पानी की बोतल लिए हुए थे. शगुन और गुप्ताजी कार में बैठ कर परीक्षा केन्द्र के लोहे के भारी दरवाज़े के खुलने का इन्तजार करने लगे.

"पापा, आयुष थक गया होगा न? सुबह 9 बजे से, शाम के 5 बजने वाले हैं... दो पेपर, वह भी आईआईटी के," शगुन ने फुसफुसाकर कहा.

पापा ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप गेट की ओर देखते रहे. सूरज ढलान पर था, मई की धूप कमजोर पड़ गयी थी और सताने की क्षमता खो चुकी थी. शगुन को लगा जैसे वह 5 बजने की घंटी का इंतज़ार नहीं कर रही, बल्कि अपने उस भाई के 'पुनर्जन्म' का इंतज़ार कर रही है जिसे उसने महीनों पहले इस शहर को सौंपा था.

भीड़ में हलचल शुरू हुई. अंदर से 'लॉन्ग बेल' की आवाज़ आई—परीक्षा समाप्त हो गई थी. शगुन की साँसें थम गईं. लड़के-लड़कियाँ अंदर भवन से बाहर मैदान में आने लगे. कुछ ही देर में वे एक बड़े समूह में बदल गए. लोहे का भारी दरवाजा खुला. बाहर निकलते चेहरों के हुजूम में वह उस एक चेहरे को ढूंढने लगी जिसे यह अंदाज़ा भी नहीं होगा कि उसके 'शब्दों का संबल' उसके स्वागत के लिए दरवाज़े पर ही खड़ा है.
... क्रमशः

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

प्रश्न-स्वातंत्र्य

 पिंजरा और पंख-40

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली विद्यापीठ में वार्षिक परीक्षाओं की आहट थी. देर रात तक होस्टलों की रोशन खिड़कियाँ बताती कि छात्राएँ परीक्षा की तैयारी में जुट गयी हैं. मार्च के मध्य में गर्म हवा भी दस्तक देने लगी थी. इस बीच कैंपस में 'नारी शक्ति' पर एक विशेष व्याख्यान सभा का आयोजन किया गया. सभा में आमंत्रित विदुषी जो एक प्रतिष्ठित समाजशास्त्री थी, बोलने खड़ी हुई. शगुन सभागार के एक कोने में बैठी वक्ताओं को सुन रही थी. समाजशास्त्री बड़े गर्व से कह रही थीं, "वनस्थली की बेटियाँ सशक्त हैं क्योंकि वे परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम हैं. वे कंप्यूटर भी चलाती हैं और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भी जानती हैं."

शगुन को व्याख्यान का 'लक्ष्मण रेखा' शब्द खटक गया. उसकी आँखों के सामने डॉ. शास्त्री का चेहरा आ खड़ा उन्होंने कहा था कि “शब्द अक्सर बेड़ियाँ बनकर आते हैं”. उस रात शगुन जब सोने के लिए बिस्तर पर गयी तब भी उसके दिमाग में ‘लक्ष्मण रेखा’ शब्द गूंज रहा था.

दो दिन बाद कॉलेज की पत्रिका के लिए एक परिचर्चा थी, विषय था—'शिक्षित नारी : समाज का आधार'. बेबाक विचारों वाली शगुन की सहेली, अनन्या ने अपना हाथ उठाया.

"मैम, मेरा एक सवाल है," अनन्या ने शांत स्वर में कहा. "यहाँ हमें सिखाया जाता है कि शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है. लेकिन क्या यह आत्मनिर्भरता सिर्फ आर्थिक है? अगर मैं अपनी पसंद का जीवन साथी चुनना चाहूँ, या शादी के बाद अपना उपनाम न बदलना चाहूँ, या 'कन्यादान' जैसी प्रथा को अपनी गरिमा के विरुद्ध मानूँ—तो क्या हमारा यह सिस्टम मेरा साथ देगा? या तब मुझे 'अमर्यादित' और 'विद्रोही' कहकर चुप करा दिया जाएगा?"

सभागार में एक सन्नाटा पसर गया. मंच पर बैठी पत्रिका की संपादक और कुछ वरिष्ठ शिक्षिकाओं के माथे पर सिलवटें उभर आईं. संपादक ने माइक संभाला और मुस्कराते हुए कहा, "अनन्या, शिक्षा हमें विनम्र बनाती है, उद्दंड नहीं. हमारी संस्कृति हमें त्याग और सामंजस्य सिखाती है. सवाल पूछना अच्छा है, लेकिन परंपराओं की नींव खोदना प्रगति नहीं है. एक अच्छी शिक्षित स्त्री वह है जो घर को जोड़कर रखे."

शगुन सोच रही थी, वह बोले या न बोले? वह तनिक ठिठकी. लेकिन फिर उससे रहा नहीं गया. वह अपनी जगह पर खड़ी हुई. सबकी निगाहें उस पर टिक गईं.

"मैम, सामंजस्य और समर्पण सिर्फ स्त्रियों के लिए ही क्यों हैं?" शगुन की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था. "अगर शिक्षा हमें केवल 'बेहतर होम-मेकर' या 'संस्कारी बहू' बनने के लिए तैयार कर रही है, तो यह सशक्तिकरण कैसे है? यह तो कंडीशनिंग का एक और परिष्कृत रूप है. क्या यह अंतर्विरोध नहीं है कि एक तरफ हम लड़कियों को ऊँचे आसमान में उड़ने के सपने दिखाते हैं, और दूसरी तरफ उनके पंखों पर 'मर्यादा' का भारी वजन बाँध देते हैं? असली मुक्ति तो तब होगी जब सवाल पूछने वाली लड़की को 'उद्दंड' नहीं, बल्कि 'जागरूक' माना जाएगा."

संपादक का चेहरा सख्त हो गया. "शगुन, यह बहस का मंच नहीं है. हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए."

"मैम, जड़ें हमें पोषण देने के लिए होती हैं, जकड़ने के लिए नहीं," शगुन ने शालीनता से जवाब दिया और बैठ गई.

उस शाम अनन्या शगुन के कमरे में आयी. अनन्या ने बताया कि उसे संपादक मेम ने ऑफिस बुलाकर 'अनुशासन' का पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि विद्यापीठ में इस तरह किसी भी परिचर्चा में विषय से इतर प्रश्न करना अनुशासन के विपरीत है और यह दोहराया गया तो विद्यापीठ उसके अभिभावकों को लिख सकता है.

दोनों देर बात करती रहीं. फिर तय किया कि वे डॉ. शास्त्री से मिलेंगी. अनन्या के जाने के बाद शगुन की निगाह खिड़की से बाहर गयी. बाहर सड़क पर लड़कियाँ आ जा रही थीं. उसे लगा कि वनस्थली की यह विशाल चारदीवारी, जो कभी उसे सुरक्षा का अहसास देती थी, वही आज उसे फिर से एक ‘सोने का पिंजरा’ लग रही थी.

उसने अपनी डायरी निकाली और लिखा— "सिस्टम हमें पंख तो देता है, पर उड़ान की दिशा खुद तय करना चाहता है. लेकिन जिसे आज़ाद होना है, उसे अपनी उड़ान का नक्शा खुद बनाना होगा."

उसे रामगंजमंडी में पालने में सोई अपनी नन्ही बहन 'मुक्ति' का ख्याल आया. उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह कोशिश करेगी कि मुक्ति को ऐसी शिक्षा मिले जो उसे सिर्फ 'उत्तर' देना ही नहीं, बल्कि सबसे कठिन 'सवाल' पूछने का साहस भी दे.

लंच ब्रेक में शगुन और अनन्या डॉ. शास्त्री से मिलीं. वे उनकी गंभीर शक्लें देखकर मुस्कुराईं. शगुन ने संक्षेप में कल की घटना और संपादक मैम की चेतावनी के बारे में बताया.

डॉ. शास्त्री ने अपना चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और कुछ देर शांत रही. फिर धीमे स्वर में बोलीं, "तुम्हें दुखी नहीं बल्कि खुश होना चाहिए. तुम शिक्षा के असली उद्देश्य तक पहुँच गई हो. सिस्टम जब तुम्हें 'अनुशासन' और 'परंपरा' के नाम पर डराने लगे, तो समझ लेना कि तुम्हारे तर्क बहुत गहरे हैं."

अनन्या ने धीरे से पूछा, "पर सर, क्या सवाल पूछना सच में उद्दंडता है?"

डॉ. शास्त्री ने उसे गौर से देखा, "अनन्या, समाज हमेशा उन लड़कियों से डरता है जो सोचती हैं. 'लक्ष्मण रेखा' का उपयोग सुरक्षा के लिए कम और नियंत्रण के लिए ज़्यादा किया जाता है. वनस्थली जैसे संस्थान तुम्हें कौशल (Skills) तो दे देंगे, पर वे 'स्वतंत्र विचार' देने से कतराएंगे, क्योंकि स्वतंत्र विचार अक्सर स्थापित ढाँचों को हिला देते हैं. याद रखना, असली विद्रोह चिल्लाने में नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक स्पष्टता पर टिके रहने में है. वे तुम्हारी बात मैगजीन में नहीं छापेंगे क्योंकि वे नहीं चाहते कि यह आग दूसरी लड़कियों के मन तक पहुँचे."

शगुन को लगा जैसे उसके मन का बोझ उतर गया हो. डॉ. शास्त्री ने आगे कहा, "मुक्ति का रास्ता हमेशा 'असुविधाजनक' होता है शगुन. तुम जो आज कर रही हो, वही तुम्हारी बहन 'मुक्ति' के लिए भविष्य का रास्ता साफ करेगा."

वहाँ से निकलते वक्त शगुन के कदमों में एक नई ऊर्जा थी. उसे अब मैगजीन में जगह न मिलने का मलाल नहीं था; उसे खुशी थी कि उसने सिस्टम की उस चुप्पी को तोड़ दिया था जिसे सब 'मर्यादा' समझ बैठे थे.
... क्रमशः

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

शब्दों का संबल

 पिंजरा और पंख-39

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
मार्च का पहला ही सप्ताह था. वार्षिक परीक्षा के टाइमटेबल भी आ गए थे. शगुन का आखिरी पेपर छह अप्रैल को था. उसका मन कर रहा था कि उसी दिन शाम को या अगले दिन दुपहर होते होते वह बनस्थली से घर के लिए निकल ले. फिर उसे फौरन आयुष का ध्यान आया. वह अपने जीवन की पहली बड़ी परीक्षा की दहलीज़ पर खड़ा था. राजस्थान बोर्ड की सीनियर सेकेंडरी 12वीं कक्षा की परीक्षा मार्च के दूसरे सप्ताह से शुरू हो कर मार्च के अंत में समाप्त होनी थी और उसके करीब डेढ़ माह बाद, सात अप्रेल 2007 को वह तारीख थी जिसके लिए कोटा के हज़ारों बच्चे रातों की नींद और दिन का चैन बेच चुके थे—आईआईटी-जी (IIT-JEE).

शगुन ने सोचा क्यों न वह पापा से कहे कि वे सात अप्रेल की रात कार से बनस्थली आ जाएँ, फिर वे आठ अप्रैल को 10-11 बजे बनस्थली से निकलें तो 4, 4:30 बजे तक कोटा पहुँच जाएँ और फिर वहाँ से आयुष को साथ ले कर रामगंजमंडी जाएँ. उसने आयुष को फोन लगाया. दो-तीन रिंग के बाद आयुष ने फोन उठाया. उसकी आवाज़ में वही पुराना भारीपन था जो दिवाली की छुट्टियों के समय गायब हो गया था.

"तैयारी कैसी है आयुष? बोर्ड के एडमिट कार्ड मिल गए?" शगुन ने उत्साह भरने की कोशिश की.

"हाँ दीदी, बोर्ड की तैयारी बिलकुल ठीक है... पर 8अप्रेल वाली बात दिमाग से निकल ही नहीं रही. कोचिंग में अब रोज़-रोज़ 'मॉक टेस्ट' हो रहे हैं. रोहित की रैंक अब टॉप-50 में आने लगी है और वह कहता है कि जो आखिरी महीने में नहीं जी-जान लगाएगा, उसका एक साल सीधे बर्बाद होगा. दीदी, क्या सच में एक परीक्षा से साल बर्बाद हो जाता है?" आयुष का स्वर लड़खड़ाया.

शगुन ने गहरी सांस ली. उसने खिड़की से बाहर देखा जहाँ लड़कियां मैदान में खेल रही थीं. उसने डॉ. शास्त्री की उस क्लास को याद किया, जिसमें उन्होंने 'टाइम और वैल्यू' पर बात की थी.

"आयुष, मेरी बात ध्यान से सुन. समय कभी 'बर्बाद' नहीं होता, वह केवल 'अनुभव' में बदलता है. तूने अगस्त में मुझसे एक वादा किया था कि तू विज्ञान को 'अंगीकार' करेगा, उसे परीक्षा के लिए रटेगा नहीं. क्या तुझे अपनी समझ पर भरोसा है?"

"समझ तो है दीदी, पर जब टेस्ट पेपर सामने आता है और घड़ी की सुइयाँ भागने लगती हैं, तब सब धुंधला होने लगता है. ऐसा लगता है जैसे मैं फिर से वही 'एवरेज' लड़का बन रहा हूँ."

"नहीं आयुष!" शगुन ने दृढ़ता से कहा. "तूने दिवाली पर 'मुक्ति' को अपनी गोद में लिया था, याद है? तूने कहा था कि हम उसे लेबल्स से मुक्त रखेंगे. अगर तू खुद को 'एवरेज' के लेबल से मुक्त नहीं कर पाएगा, तो उसे क्या सिखाएगा? आठ अप्रैल एक युद्ध नहीं है, वह सिर्फ तेरे और उन सिद्धांतों के बीच की एक बातचीत है जिन्हें तूने पिछले छह महीनों में जिया है. तू बस उन सिद्धांतों को कागज़ पर उतार देना, परिणाम के बारे में सोचने पर समय खराब मत करना."

फोन के दूसरी तरफ थोड़ी देर सन्नाटा रहा. फिर आयुष की धीमी आवाज़ आई, "दीदी, यहाँ कोटा में सब कहते हैं कि, यही एक मौका है. इसके बाद ज़िंदगी खत्म है."

शगुन मुस्कुराई, "ज़िंदगी  'आठ अप्रैल' से शुरू होगी आयुष, उस पर खत्म नहीं होगी. तूने 'ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' पढ़ी है, क्या उसके लेखक ‘स्टीफन हॉकिंग’ ने हार मानी थी? तुझे बस 'आज' में रहना है. मार्च की बोर्ड परीक्षा को अपनी नींव बना और आठ अप्रैल को अपना शिखर. तू मेरा वही प्यारा साहसी भाई है जो सच्चाई की खोज में निकला है, न कि किसी रैंक की."

"दीदी... अब थोड़ा हल्का महसूस हो रहा है. मुक्ति न जाने कैसी होगी?" आयुष ने विषय बदलते हुए पूछा.

"मुक्ति अब पहचानने लगी है. कल मम्मा से बात हुई थी, वे कह रही थीं कि मुक्ति तेरी तस्वीर को देख कर मुस्कुराती है. वह अपने 'आईआईटी वाले भैया' का इंतज़ार कर रही है, लेकिन इसलिए नहीं कि तू उसे कोई रैंक दिखाए, बल्कि इसलिए कि तू घर लौटकर आए और उसे फिर से अपनी गोद में ले."

आयुष ने फोन रख दिया. वह अपनी मेज़ पर रखे उस पुराने चार्ट को देखने लगा. उसने टेबल से लाल स्याही का पेन उठाया और ‘आठ अप्रैल’ की तारीख के नीचे छोटे अक्षरों में लिखा—"मेरा सत्य से साक्षात्कार का दिन, युद्ध का नहीं."

आयुष ने पेन वापस मेज़ पर रखा. अजीब बात थी, हर बार, जब वह 'आठ अप्रैल' के बारे में सोचता था, उसके हाथ काँपने लगते थे, लेकिन आज उसकी हथेलियाँ स्थिर थीं. उसने कमरे की खिड़की खोल दी. सड़क पर कुछ छात्र भारी बैग टाँगे, झुके हुए कंधों के साथ जा रहे थे. आयुष को उन पर तरस आया; वे छात्र नहीं, 'रैंक के बोझे’ से दबे हुए लड़के लग रहे थे.

उसने अपनी फिजिक्स की किताब उठाई. इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म का एक जटिल सवाल, जो सुबह उसे उलझा रहा था, अब उसे एक 'दुश्मन' की तरह नहीं लगा, बल्कि 'सत्य' का एक हिस्सा लग रहा था. उसने अपनी आँखें मूँद लीं और फिजिक्स के नियमों को महसूस किया—जैसे वे नियम उसके आसपास की हवा में तैर रहे हों. शगुन ने सही कहा था, विज्ञान रटने की चीज़ नहीं, जीने की चीज़ है.

आयुष ने सवाल हल कर लिया था. सोने का समय था. उसने कमरे की लाइट बंद कर दी. कमरा फिर भी पूरा अंधेरा नहीं था. खिड़की के शीशों से रोशनी छन कर आ रही थी. दीवार पर चिपके फॉर्मूला चार्ट अब उसे डरावने विज्ञापनों जैसे नहीं, बल्कि पुराने परिचित दोस्तों जैसे लग रहे थे. उसे लगा जैसे 'मुक्ति' उसके बगल में सोई हुई है, और उसकी सांसों की लय के साथ उसके मन में भरा हुआ 'एवरेज' होने का तमाम शोर शांत हो गया है. उस रात, महीनों बाद आयुष कोई सपना नहीं देखा. वह बिना किसी डर के गहरी नींद सोया.

अगली सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह पूरी तरह तरोताजा था.  'आठ अप्रैल' अब उसके लिए डर की रेखा नहीं रह गया था. अब उसे खुद को साबित करना था, और उसके लिए वह बिलकुल तैयार था.
... क्रमशः

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

मुक्ति

  पिंजरा और पंख-38

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
अस्पताल के लेबर रूम से बाहर आकर नर्स वहीं दरवाजे के बाहर खड़ी रह गयी. उसके चेहरे पर थकान के चिन्ह थे, साथ ही एक संतोष की मुस्कान भी. श्रीमती गुप्ता, अनिल चाचा, आयुष और शगुन उसे देख एक झटके में अपनी बेंच से उठ खड़े हुए. उनके चेहरे पर एक ही प्रश्न था.

"बधाई हो! दीवाली के दिन लक्ष्मी आई है... बहुत सुंदर स्वस्थ बिटिया हुई है,"नर्स ने अपनी आवाज़ में एक स्वाभाविक उत्साह भरने की कोशिश की.”

शगुन ने मम्मा के चेहरे की ओर देखा. उस एक पल के लिए मम्मा के चेहरे पर वही भाव आया जिसे डॉ. शास्त्री 'अनकही निराशा' कहते थे. यह वर्षों की उस कंडीशनिंग का स्वाभाविक प्रभाव था, जो 'लड्डू गोपाल' के आगमन की रट लगा रही थी.

अगले ही पल, नर्स ने कहा, “जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं”.

चाची की सलामती की खबर ने मम्मा के चेहरे पर आए उस निराशा भाव को ढक लिया.

कुछ ही देर में लेबर रूम से एक ट्रॉली बाहर निकली. उस पर चाची लेटी थीं, आँखें बन्द किए हुए. ट्रॉली को उन्हें एलॉट हुए कमरे की ओर ले जाया जाने लगा. नर्स ने बताया कि बच्ची को वे लेकर आ रहीं हैं.

कमरे में लाकर चाची को ट्रॉली से उनके बिस्तर पर शिफ्ट किया गया. कमरा अचानक डिटॉल की गंध से भर गया. चाची के चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जैसे वे बहुत बड़ा युद्ध जीत कर लौटी हों. श्रीमती गुप्ता ने पूछा, कैसी हो नीतू? चाची ने आँखें खोली ठीक हूँ, लेकिन मेरी बच्ची?

“चाची, उसे नर्स लेकर आ ही रही है.” शगुन की आवाज सुनकर चाची की आँखों में चमक आ गयी.

कुछ ही देर में नर्स एक गुलाबी कपड़े में लिपटे हुए शिशु को अपनी गोद में लेकर आयी और चाची की बगल में लिटा दिया. वह नन्हा सा वजूद बिलकुल चुप था.

मम्मा ने नर्स की ओर देखा. “खूब रो ली है, थक कर सो गयी है.” मम्मा ने संतोष की साँस ली.

तभी चाचा अंदर आ गए. श्रीमती गुप्ता ने पूछा, “अनिल जी, आपके भैया को फोन कर दिया कि नहीं?”

“कर दिया है पर वे तब आएंगे जब यहाँ से कोई घर जाएगा. दीवाली के दिन घर खाली कैसे छोड़ेंगे?” जवाब देते वक्त उनकी निगाहें बिस्तर की ओर थीं. चाचा, जो हमेशा 'खानदान के वारिस' की बातें करते थे, अपनी बेटी को देखकर सन्न रह गए थे. मम्मा समझ गयीं. उन्होंने नन्ही सी जान को बड़ी सलाहियत से उठाया और चाचा की गोद रख दिया. चाचा की भारी मूंछों के नीचे दबी मुस्कान और गीली होती आँखें बता रही थीं कि उनके भीतर का 'पितृसत्ता-जनित अहंकार' कुछ तो पिघला है.

शगुन ने आयुष की कोहनी को छुआ. आयुष मंत्रमुग्ध होकर उस बच्ची की मुड़ी हुई नन्ही उँगलियों को देख रहा था.

"देख रहे हो आयुष? यह इस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर इंसान है," शगुन ने फुसफुसाते हुए कहा.

"क्यों दीदी?" आयुष ने अपनी नज़रें बच्ची से बिना हटाए पूछा.

"क्योंकि इसके पास अभी कोई नाम नहीं है, कोई जाति नहीं है, और न ही कोई रैंक है. यह एक कोरी स्लेट है. न यह 'एवरेज' है, न 'एलीट'." शगुन की आवाज़ में एक दृढ़ता थी.

आयुष बुदबुदाया, "सच दीदी... पर क्या हम इसे ऐसे ही रहने देंगे? कल जब यह बड़ी होगी, क्या मम्मा और चाची इसे रसोई के सबक नहीं देंगी? क्या चाचा इसे भी किसी रेस का हिस्सा नहीं बनाएंगे?"

शगुन ने चाची की ओर देखा, जिन्होंने अपनी थकी हुई आँखों से शगुन को ही निहारा था. उन आँखों में एक मौन सहमति थी.

शगुन ने आयुष से कहा, "यह हमारे ऊपर है आयुष. हम इसे एक 'डिजिट' या 'लेबल' नहीं बनने देंगे. हम इसे 'इंसान' बनना सिखाएंगे."

तभी मम्मा ने पास आकर कहा, "नाम क्या सोच रखा है, अनिल जी? यह पहली संतान है, कुछ अच्छा सा नाम होना चाहिए."

चाचा ने अपनी रुँधी हुई आवाज़ में कहा, "शगुन बताएगी... आखिर इसके आने से सबसे ज़्यादा खुश वही है."

शगुन ने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ दीवाली की रात अब ढल रही थी. बिजली की रोशनियाँ बरकरार थीं, कुछ मिट्टी के दीपक अभी भी टिमटिमा रहे थे, सुबह का हल्का उजाला क्षितिज से बाहर निकलने लगा था. उसने मुस्कुराकर कहा, " चाचा, इसका नाम 'मुक्ति' कैसा रहेगा? पूर्वाग्रहों से मुक्ति, लेबल्स से मुक्ति."

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया. यह नाम घर के पुराने ढाँचे के लिए भारी था, लेकिन तभी नन्ही जान के पहली किलकारी निकली, जैसे उसने इस सन्नाटे को नामंजूर कर दिया. आयुष और शगुन की खुशी का कोई ठिकाना न था. उन्हें लगा, जैसे उनके मन में दीवाली के पटाखे फूट रहे हैं—खुशी के, उम्मीद के.
... क्रमशः 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

रोशनियों के बीच

  पिंजरा और पंख-37

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

 दीवाली की छुट्टियाँ शुरु हो गयी थीं. घर के दोनों किशोर छुट्टियाँ बिताने और त्यौहार मनाने आ चुके थे. घर में हलचल बढ़ गयी थी और माहौल में उत्सुकता. पिछली मई-जून में आयुष और शगुन कोटा और वनस्थली गए तब घर की परिस्थितियाँ अलग थीं. घर की देहली पर खड़ी शगुन को सब कुछ पहले जैसा ही लग रहा था, लेकिन मन में डॉ. शास्त्री के समझाए हुए 'लेबल्स' और 'पूर्वाग्रह' शब्दों के अर्थ गूंज रहे थे.

चाची को नौवां महीना शुरू हो गया था. वे लिविंग रूम में सोफे पर बैठी बेसन के लड्डू बांध रही थीं. इस बीच मम्मा दो-तीन बार रसोई से निकलकर उनके पास आयी थीं. पहली बार उन्होंने चाची को डाँटा था, “ये लड्डू तुझे बांधने की क्या जरूरत है. तुझे आराम करना चाहिए.” चाची ने “काम में मन लगा है, और काम भारी नहीं है” कहकर वापस कर दिया. दूसरी बार आईं तो चाची को सीधे आराम की हिदायत दे डाली. तब चाची ने “बस थोड़े से और हैं इन्हें बांधकर चली जाऊंगी” कहा. तीसरी बार मम्मा गुस्सा हो गयीं, “तू उठ, बाकी के लड्डू शगुन बांध लेगी”. तब शगुन ने माँ को समझाया, “माँ थोड़ा बहुत काम करते रहना अच्छा होता है, पेशियाँ मजबूत बनी रहती हैं और डिलीवरी आसान हो जाती है. मैं उनका साथ दे ही रही हूँ.”

"अभी भारी काम मत कर, बस दो चार दिन की बात है. फिर घर में 'लड्डू गोपाल’ आएंगे, दीवाली की खुशियाँ चौगुनी हो जाएंगी.

'लड्डू गोपाल', बस यही शब्द शगुन को खटक गया. उसने देखा कि मम्मा जिस तरह चाचा और पापा से बातें करती उनसे होने वाले बच्चे का जेंडर तय कर दिया गया था. यदि लड़की हुई तो क्या उससे खुशियाँ कम हो जाएंगी? उसका मन खराब हो गया. उसने नीतू चाची की ओर देखा. आँखें मिलीं तो चाची समझ गयीं. बोलीं, “भाभी की बातों पर तू ध्यान मत दे. कंडीशनिंग झेलते उनकी उम्र गुजर गयीं, वे आदतन ऐसा कहती हैं. और मुझे इन बातों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता. तेरे चाचा भी अब मेरे सामने लड़का या लड़की होने की बात नहीं करते. हाँ, बाहर जरूर डींगें हाँकते होंगे.”

तभी आयुष जीने से नीचे उतरा. उसके हाथ में इस बार 'संबल' कोचिंग के नोट्स की जगह एक किताब थी, 'ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम'. शगुन ने उसे गौर से देखा; उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे लगभग गायब थे और वह पहले से कहीं अधिक शांत दिख रहा था.

"दीदी, मांडणा बहुत सुंदर बनाई है, आपने," आयुष ने शगुन की बनाई रंगोली देख कर मुस्कुराते हुए कहा.

"थैंक्यू आयुष! कोटा की क्या खबर है? इस बार रैंक क्या रही? डर तो नहीं लगा?" शगुन ने धीरे से पूछा.

"दीदी, रैंक अब बस एक नंबर है. आपने सही कहा था, जब से मैंने फॉर्मूले रटने के बजाय नियमों और सिद्धांतों को समझना शुरू किया, तब से फिजिक्स के प्रश्न पहेली लगने लगे हैं, जिन्हें सुलझाने में मज़ा आता है. मैं सच को अंगीकार कर रहा हूँ.”

“तू इधर-उधर की बातें करने के बजाय ये बता कि तेरी रैंक का क्या हाल है?

“बस दीदी, ये समझ लो कि रोहित अब मुझे 'एवरेज' नहीं कहता, और मुझे अब रैंक से कोई फर्क नहीं पड़ता.”

“मतलब, तू बताएगा नहीं?” यह कहते हुए शगुन खड़ी हो गयी, “पहले की तरह तेरे कान उमेठूँ”

“नहीं दीदी, उसमें बहुत दर्द होता है.” इतना कह कर वह शगुन के नजदीक गया और कान में फुसफुसाकर कहा, “89 आयी है.”

“अरे वाह, क्या बात? फिर तो आज डबल जश्न होगा.”

“हुआ क्या है? कुछ मुझे भी बताओगे?” चाची ने हाथ से लड्डू का चूरमा झाड़ते हुए पूछा.”

“अरे चाची, खबर ही ऐसी है कि आप नाचने लगेंगी.” शगुन की आवाज रसोई में मम्मा तक पहुँच गयी. वे बाहर निकलीं और दोनों को डाँटने लगीं. “तुम दोनों चाची को तंग मत करो. परेशानी हो जाएगी.”

“भाभी, कोई परेशानी नहीं होगी, हम केवल बातें कर रहे हैं.” चाची ने हँसते हुए कहा.”

शगुन बहुत खुश थी, उसका भाई न केवल चक्रव्यूह से निकल आया था, बल्कि प्रगति पर भी था.

शाम को घर दीयों और बिजली की रोशनियों से जगमगा उठा. सबने एक साथ बैठ कर लक्ष्मी पूजन करके भोजन किया. बाहर पटाखे चलने लगे. शगुन और आयुष सोच ही रहे थे कि शहर की रोशनी देख आएँ. तभी कमरे से चाची की चीख सुनाई दी. उत्सव पल भर में तनाव में बदल गया. चाची को दर्द शुरू हो गए थे.

आनन-फानन में चाचा ने मारुति बाहर निकाली. मम्मा ने सहारा दे कर चाची को पिछली सीट पर बिठाया और खुद साथ बैठ गयी. पापा ने स्टीयरिंग संभाली, चाचा पास बैठे. पटाखों के धमाकों के बीच कार अस्पताल की और बढ़ चली. घर पर आयुष और शगुन ही रह गए. कुछ देर बाद पापा ने लौटकर बताया कि डाक्टर ने कहा अभी कुछ घंटे लगेंगे. शगुन ने उनसे पूछा कि आप घर पर हैं तो मैं और आयुष अस्पताल चले जाएँ? गुप्ताजी ने, “वैसे भी वहाँ मेरी कोई जरूरत नहीं”, कहते हुए अनुमति दे दी.

थोड़ी देर बाद दोनों अस्पताल में चाची के बिस्तर के पास थे. चाची को दर्द तेज हुआ तो नर्स उनका हाथ पकड़ कर लेबर रूम ले गयीं. मम्मा उनके पीछे गयीं. वे दोनों भी लेबर रूम के बाहर की बैंच पर जा बैठे.

आयुष वहाँ दीवार पर लगा चार्ट देखने लगा जिसमें भ्रूण विकास की प्रक्रिया समझाई गई थी.

"डर लग रहा है आयुष?" शगुन ने पूछा.

"डर नहीं दीदी, बस सोच रहा हूँ कि जो अभी इस दुनिया में आने वाला है, उसे हम सबसे पहले कौन सा लेबल देंगे? क्या उसे भी हम अपनी उम्मीदों के बोझ तले दबा देंगे?"

शगुन ने आयुष का हाथ थाम लिया. उसे अहसास हुआ कि छह महीने पहले जो भाई संबल ढूँढ रहा था, आज वह खुद दूसरों के लिए संबल बन रहा है.

तभी लेबर रूम का दरवाज़ा खुला और नर्स बाहर आई. दोनों की साँसें थम गईं.

... क्रमशः 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

एवरेज

  पिंजरा और पंख-36

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
​अगस्त की उमस भरी दोपहर थी. बादल घुमड़ते थे लेकिन बरसते न थे, धूप निकल आती थी. 'संबल कोचिंग' के नोटिस बोर्ड पर मंथली टेस्ट की रैंकिंग लिस्ट चस्पा कर दी गई थी. आयुष भीड़ से थोड़ा दूर खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था. उसके दिल की धड़कनें उसके कानों में साफ़ सुनाई दे रही थीं. जैसे ही भीड़ छंटी, उसने अपनी उंगली लिस्ट पर दौड़ाई.

​रैंक

101’ ... .................

.

.

104’ ... .................

105' ... आयुष गुप्ता

​उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. टॉप-100 रैंक वालों का जो 'एलिट' क्लब बन गया था, वह उससे मात्र पांच कदम दूर रह गया. तभी पीछे से रोहित की आवाज़ आई, "अरे यार आयुष, तू तो 'बॉर्डर-लाइनर' निकला. 105? भाई, कोटा में 100 के बाहर होने का मतलब है 'एवरेज'. और एवरेज लोगों को यहाँ कोई याद नहीं रखता. वे बस भीड़ का हिस्सा होते हैं."

​रोहित का वह 'एवरेज' शब्द आयुष को तीर सा चुभा. उसने मुड़ कर रोहित की आँखों में देखा. वह उसका मखौल उड़ा रहा था. वह बिना कुछ बोले अपने रूम पर आ गया. मेज पर रखी फिजिक्स की मोटी किताबें उसे चिढ़ाने लगीं. उसने पंखे की ओर देखा, जो एक अजीब सी घरघराहट के साथ घूम रहा था—ठीक वैसी ही जैसी उसके दिमाग में चल रही थी. कमरे की दीवारों पर चिपके 'फॉर्मूला चार्ट' उसे अपनी ही असफलताओं के विज्ञापन जैसे लगने लगे. दिन मुश्किल से गुजरा.

​शाम को उसने भारी मन से शगुन को फोन लगाया.

​"दीदी... मेरी रैंक 105 आई है," आयुष की आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था.

​"आयुष, 105 कोई बुरी रैंक नहीं है! हज़ारों बच्चों में तुम यहाँ तक पहुँचे हो," शगुन ने उसे दिलासा देने की कोशिश की.

​"नहीं दीदी, यहाँ सब कहते हैं कि जो टॉप-100 में नहीं, वह रेस से बाहर है. रोहित कह रहा था कि मैं 'एवरेज' हूँ. क्या वाकई मैं बस एक औसत लड़का हूँ? क्या मेरी पहचान सिर्फ इस रैंक से तय होगी?" आयुष का गला भर आया.

​शगुन को तुरंत डॉ. शास्त्री की क्लास याद आ गई. उसने गहरी सांस ली और कहा, "आयुष, मेरी क्लास में 'स्टीरियोटाइपिंग' के बारे में पढ़ाया गया था. कोटा के उस सिस्टम ने तुम पर एक 'एवरेज' होने का लेबल लगा दिया है. यह एक मानसिक साँचा है, जिसमें वे हर उस बच्चे को डाल देते हैं जो उनकी उम्मीदों के मुताबिक 'मशीन' नहीं बन पाता. तुम औसत नहीं हो आयुष, तुम बस एक इंसान हो जिसे इस वक्त रैंक की नहीं, चैन की ज़रूरत है."

​"पर दीदी, यहाँ तो चैन भी रैंक से ही मिलता है," आयुष बुदबुदाया.

​"सुन आयुष," शगुन ने स्वर कोमल करते हुए कहा, "हमें एक असाइनमेंट मिला था—अपने भीतर के पूर्वाग्रहों को पहचानने के लिए. इस असाइनमेंट का उद्देश्य यही था कि छात्राएँ अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना सीखें और उन्हें नष्ट करने की कोशिश करें. मैं पूरी ईमानदारी से यह किया और कर रही हूँ. ये पूर्वाग्रह हमें हमारे परिवार, समाज, यहाँ तक कि स्कूल-कॉलेज भी सिखाते हैं. बेहतर और योग्य इंसान बनने के लिए इनसे मुक्त होना जरूरी है. तुम्हें भी पूर्वाग्रह सिखाए जा रहे हैं, ‘जो टॉप 100 में नहीं है वह एवरेज है’, जो कहता है कि मेरा भाई सिर्फ तभी सफल है जब वह आईआईटी जाए. तू सुन रहा है न? तू आईआईटी न भी जाए, तो भी तू मेरा वही प्यारा आयुष रहेगा. तू कोई अंक (Digit) नहीं है."

“पर दीदी,...”

“तू टॉप 100 में भी आएगा, तू अपने सब्जेक्ट्स के नियमों सिद्धान्तों को समझने की कोशिश कर. विज्ञान सचाई की निरन्तर खोज है, विज्ञान के नियम सचाई हैं, अनेकानेक प्रयोगों ने उन्हें बारंबार सिद्ध किया है, उन्हें हमें सचाई के रूप में अंगीकार करना होगा, केवल परीक्षा के लिए रटना नहीं. एक बार वे समझ आ जाते हैं तो सब आसान होता जाता है, इतना आसान कि तू रोहित को भी पछाड़ सकता है. लेकिन उससे, या किसी और से कंपीटीशन कर के यह नहीं कर सकता. यह खुद को बेहतर बनाकर होगा. तुम्हें खुद पता नहीं लगेगा, तुम कब उससे आगे निकल गए हो.”

“बात तुम्हारी सही लगती है दीदी. पर यहाँ कोचिंग में तो रटने के तरीके खूब सिखाए जाते हैं.”

“वह ठीक है, डाटा रटने पड़ते हैं, पर नियम और सिद्धांत निर्देश हैं और अंगीकार करने से आते हैं. वे सोच का स्थायी अंग बन जाते हैं.

“समझ गया, दीदी यही करता हूँ. अब रखता हूँ.

​फोन रखने के बाद आयुष देर तक खिड़की के बाहर देखता रहा. शगुन की बातों ने उसके भीतर के घाव पर मरहम ही नहीं लगाया था बल्कि, उसे एक नयी बात सिखा दी थी, “विज्ञान सत्य है, अनेकानेक प्रयोगों से बारंबार परखा हुआ. उसे सचाई के रूप में स्वीकार करो, परीक्षा के लिए रटो मत.”

उसने अपनी रफ कॉपी उठाई और गणित के सवालों के बीच, एक खाली पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा—

​"मैं कोई रैंक नहीं, बल्कि इंसान हूँ. मेरा लक्ष्य बेहतर और योग्य इंसान बनना है, विज्ञान एक सचाई है, बारंबार परखी हूई, मुझे उसे रटना नहीं, समझना है. सचाइयों को अंगीकार करना है."

​लिखने के बाद, आयुष कुछ देर सोचता रहा. खिड़की के बाहर आसमान में बादल दिखाई दे रहे थे. एक दिशा में धीरे-धीरे सरकते हुए. फिर बादलों के बीच एक बड़ा सा सूराख आया, और चांद दिखने लगा. वह आधा था. उसे पूरा होने में अभी सात-आठ दिन थे. सात-आठ दिन बाद तो रक्षाबंधन का त्यौहार है. रामगंजमंडी में हमेशा शगुन उसे राखी बांध कर मिठाई मुहँ में रख देती थी. उसे लगा कि दीदी ने यह मिठाई आज ही उसके मुहँ में रख दी है. एक दो दिनों में उसे दीदी की भेजी राखी मिल जाएगी. मम्मा दीदी को देने को हमेशा सौ का नोट उसे देती थी. यहाँ वह क्या देगा? फिर उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी. इस सात दिनों में वह विज्ञान के सच को अंगीकार करने की कोशिश करेगा. तब तक जितने भी सच वह अंगीकार करेगा. वही दीदी के लिए उपहार होंगे.
... क्रमशः