किरण, जो अपने बिस्तर को व्यवस्थित कर रही थी, मुस्कुराई. "अरे, यहाँ सब कुछ तो बहुत सही है, शगुन! हमें पाला जा रहा है. बाहर की दुनिया कितनी खतरनाक है! और साख की बात... कक्की सही कहती हैं. हम लड़कियों की साख ही तो सब कुछ है. इसे बचाना ही चाहिए."
अनवरत
क्या बतलाएँ दुनिया वालो! क्या-क्या देखा है हमने ...!
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
सोने का पिंजरा
किरण, जो अपने बिस्तर को व्यवस्थित कर रही थी, मुस्कुराई. "अरे, यहाँ सब कुछ तो बहुत सही है, शगुन! हमें पाला जा रहा है. बाहर की दुनिया कितनी खतरनाक है! और साख की बात... कक्की सही कहती हैं. हम लड़कियों की साख ही तो सब कुछ है. इसे बचाना ही चाहिए."
सोमवार, 2 फ़रवरी 2026
मंत्र
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
होस्टल नं. सात
सुबह का सूरज बनस्थली के आँगन में सुनहरी किरणें बिखेर रहा था. गेस्ट हाउस से निकलकर, तीनों एक बार फिर विद्यापीठ के प्रशासनिक भवन की ओर चले. होस्टल आवंटन का दिन था. ग्यारह बजे होस्टल आवंटित हुआ. नाम था शांता निकेतन : होस्टल नं. सात. यहाँ सभी होस्टलों के नाम ‘शांता’ नाम से आरंभ होते थे. शांता विद्यापीठ के संस्थापक हीरालाल शास्त्री की पुत्री थी, जिसका बारह वर्ष की उम्र में असमय देहान्त हो गया. उसी की स्मृति में इस विद्यापीठ की स्थापना हुई.
वे शांता निकेतन पहुँचे. रिसेप्शन पर खादी की गहरी नीली साड़ी पहने एक स्त्री ने स्वागत किया. रिसेप्शन पर सूचना अंकित थी, “होस्टल में पुरुष प्रवेश वर्जित” है. रिसेप्शनिस्ट ने बताया शगुन को कमरा नं. 106 मिला है.
उस पल शगुन ने समझा, रिसेप्शन एक सीमा है. जहाँ से उसकी पुरानी दुनिया पीछे छूट गयी थी, और एक नई, अज्ञात दुनिया शुरू होगी. माँ ने उसका हाथ थाम लिया. एक परिचारिका उन्हें रूम नं. 106 ले गयी.
हॉस्टल एक सुंदर, तीन मंज़िला इमारत थी. वे 106 के सामने पहुँचे, दरवाज़ा खुला था. अंदर तीन लड़कियाँ थीं. एक अपना सामान अलमारी में लगा रही थी, दूसरी खिड़की से बाहर देख रही थी, और तीसरी, दुबली पतली, आँखें लाल कर चारपाई पर पालथी लगाए बैठी थी.
"नमस्ते," शगुन ने आवाज़ लगाई.
तीनों ने मुड़कर देखा. परिचय संक्षिप्त और शर्मीला था. खिड़की वाली लड़की अलवर से थी. अलमारी वाली उत्तराखंड से. और लाल-आँखों वाली लड़की, किरण, मोड़क से थी.
"मोड़क?" माँ ने आश्चर्य से पूछा, "तुम्हारे पापा का नाम?"
"मंगलसिंह जी," किरण ने धीरे से कहा.
"वही जो सीमेंट फैक्ट्री में फोरमैन हैं?
“जी.” लड़की ने कहा.
“शगुन के पापा वहीं काम करते हैं.”
एक जान-पहचान की डोर, इस विशाल, अजनबी जगह में मिल गई थी. शगुन ने एक पल के लिए किरन की ओर देखा. उसकी आँखों से आँसू अब भी बाहर निकलने को तत्पर थे. पर वह शगुन को देख मुसकुराई, एक फीकी-सी मुस्कान. जान-पहचान से उसे थोड़ी तसल्ली हुई थी, शगुन ने सोचा.
सामान रखने में थोड़ा वक्त लगा. दोपहर हो चुकी थी. लंच का वक्त हो चुका था. शगुन को आज लंच होस्टल में नहीं मिलना था. वे तीनों गेस्ट हाउस पहुँचे. लंच किया और थोड़ा विश्राम. शगुन को होस्टल छोड़ मम्मा पापा को वापसी यात्रा करनी थी. वे शगुन के साथ होस्टल पहुँचे. रिसेप्शन में रामसिंह मौजूद थे. शगुन मम्मा के साथ अपने रूम गयी. कुछ ही देर में दोनों वापस लौटीं, उनके साथ किरन और उसकी माँ भी थीं.
आखिर विदाई का पल आया. दोनों लड़कियाँ होस्टल के बाहर तक माता-पिता को छोड़ने आयीं. निकट ही गुप्ता जी की कार खड़ी थी. अचानक किरन अपनी माँ से लिपट कर रोने लगी. उसकी आवाज भी तेज थी. माँ भी न बची वे भी बिलख पड़ीं. शगुन आश्चर्य से उन्हें देख रही थी. यह रोना साधारण विदाई का दुख नहीं लग रहा था. इसमें एक गहरी हार, एक मजबूरी, एक अनचाही दूरी की पीड़ा थी. किरण का शरीर हिल रहा था, जैसे वह टूट रहा हो.
वहीं बिल्कुल अलग, शगुन और मम्मा खड़ी थीं. माँ की आँखें नम जरूर थीं, लेकिन वे उसे बहने नहीं दे रही थीं. उन्होंने शगुन के कंधों को मज़बूती से पकड़ा. शगुन ने माँ से फुसफुसाकर कहा, "माँ, किरन यहाँ मन से नहीं आई. बस... एक मौका मिल गया, तो भेज दी गई. मर्जी से आती तो ऐसे नहीं रोती."
माँ ने जवाब देने के स्थान पर शगुन को कहा, "संभलकर रहना, बेटा, खाने-पीने का ध्यान रखना. फोन करना."
शगुन ने उन्हें गले लगा लिया. उसकी आँखें सूखी थीं. उसने माँ के कंधे पर सिर रखा और एक गहरी सांस ली. इस आलिंगन में प्यार था, विश्वास था, और एक सचेतन दृढ़ता थी. उसे रोना नहीं आ रहा था. उसे पता था कि यह एक जरूरी विछोह है जो उसकी नींव को मजबूत करेगा.
आखिर मंगलसिंह ने अपनी पत्नी से कहा, हो भी गया, अब चलना भी है बस छूट जाएगी. माँ-बेटी अलग हुईं. माँ पल्लू से किरन के आँसू पोंछने लगी.
“रामसिंह, आप बस से जाएंगे?” शगुन के पापा ने पूछा.
“हाँ सर, बस से ही आए थे.”
क्यों न हमारे साथ चलो. कार में पिछली सीटें खाली हैं. आपको मोड़क छोड़ते जाएंगे.”
“नहीं सर, हम बस से चले जाएंगे.”
“जब कार जा ही रही है तो आप बस से कैसे चले जाएंगे. आप पिछली सीट पर बैठें.”
अचानक गुप्ता जी को याद आया कि शगुन के पास तो फोन है ही नहीं. उन्होंने तुरन्त अपने फोन की सिम निकाली, फोन में शगुन के लिए ली गयी नयी सिम डाली और शगुन को दिया.
“पापा, ये तो आपका फोन है?”
“हाँ, मैंने सोचा था कोटा से तुम्हारे लिए नया ले दूंगा. फिर ध्यान आया कि आज तो रविवार है. अब तुम मेरा रखो. मैं कोटा से नया ले लूंगा.”
जब कार मोड़क पहुँची और मंगल सिंह उतरे, तो उन्होंने जेब से कुछ नोट निकालकर गुप्ता जी की ओर बढ़ाए. "पेट्रोल का... थोड़ा सा हिस्सा, गुप्ताजी."
गुप्ताजी ने मुस्कुराकर उनका हाथ हल्के से धकेल दिया. "अरे, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, सिंह साहब. देना ही है तो... दोस्ती दीजिए. बस इतना ही काफी है."
पापा की कार चल पड़ी. यहाँ होस्टल शांता निकेतन था, विद्यापीठ था, एक भरा-पूरा परिसर. जहाँ शगुन अब अपने नए जीवन के साथ अकेली थी. कमरे में लौटकर, शगुन ने देखा, किरण अब भी सिसक रही थी. अलवर वाली लड़की अपनी किताबें व्यवस्थित कर रही थी, और उत्तराखंड वाली खिड़की के पास खड़ी चुपचाप बाहर देख रही थी.
शगुन अपनी चारपाई पर बैठ गई. उसने अपनी डायरी निकाली, और आखिरी पन्ने पर लिखा:
"आज मुझे नया पता मिला: ‘शांता निकेतन’ हॉस्टल नंबर सात, कमरा 106.
मेरी तीन रूममेट हैं. एक सिसक रही है... शायद उसकी लड़ाई मेरी लड़ाई से अलग है
कल से मेरी क्लास. मेरा विज्ञान. मेरी पसंद.
और... मैं रोई नहीं."
वह डायरी बंद करके खिड़की के पास गई. बाहर, बनस्थली की शाम धीरे-धीरे उतर रही थी. दूर कहीं, एक घोड़े की टापों की आवाज़ सुनाई दी. उसे एक नई सुबह, एक नई शुरुआत का इंतज़ार था.
... क्रमशः
शनिवार, 31 जनवरी 2026
फिर विज्ञान
पिंजरा और पंख-17
लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी
घर से निकलते नौ बज गए, आयुष के होस्टल पहुँचे
तब साढ़े दस बजे थे. सबसे पहले कार से उतर कर शगुन होस्टल में घुसी. आयुष होस्टल
के रिसेप्शन पर ही मिल गया, टेस्ट देकर लौटा ही था. उसकी आँखों के नीचे गहरे घेरे
थे, टेस्ट की तैयारी ने उन्हें कुरेद दिया हो. शगुन की ओर
देखकर वह मुस्कुराने की कोशिश भर कर पाया.
"टेस्ट कैसा रहा?"
आयुष ने कंधे उचकाए. "पता नहीं. पर टॉप
रेंक तो नहीं आएगी." उसकी आवाज़ में खालीपन था, जैसा
रामगंजमंडी से आते समय था. शगुन का दिल भारी हो गया.
“बात तो तेरी सही है... और, मम्मी पापा?”
“मैं फौरन अंदर आ गयी. वे आते होंगे.” शगुन ने
कहा.
“बाहर ही चलते हैं. उधर ही चाय पी लेंगे.”
“चल.” शगुन ने कहा. वे दोनों बाहर आए. कार के
पास मम्मी-पापा आपस में कुछ कह रहे थे.
“क्या हुआ मम्मा?
“कुछ नहीं, बस यूँ ही.” आयुष को सामने देखा तो मम्मा
ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. पूछने लगी, “कैसा है? तेरी शकल कैसी हो गयी है?
तू ठीक से खाया पिया कर. दस-पाँच दिन में जब भी पापा कोटा आएंगे तेरे लिए चाची से
बनवा कर बेसन के लड्डू और मठरी भिजवा दूंगी.
माँ के स्नेह से आयुष की आँखें भी नम हो गईं. शगुन
ठीक थी. उसका लक्ष्य आईआईटी एंट्रेंस क्रैक करना है, न कि बीच के टेस्ट.
तभी पापा ने कहा, “माँ बेटे का मिलन हो गया हो
तो, चल कर चाय पी लें? आगे भी चलना है.”
माँ-बेटे अलग हुए. आयुष उन्हें पास ही सड़क
किनारे एक ठेले पर ले गया. पास रखी बैंचों पर बैठ कर चाय पी. चाय स्वादिष्ट थी.
आयुष से मिल कर वे आगे चले. राजमार्ग नं. 12,
बढ़िया सड़क, नयी कार दौड़ पड़ी. एक अच्छी बारिश हो चुकी थी. खेतों में धान की
रोपाई होते दिखी. बूंदी से देवली तक पहाड़ी इलाका, फिर आगे मैदान था. किसान खेतों
में काम करते दिखे. आगे इकलौता पहाड़ दिखा. गुप्ताजी ने बताया कि इसी की तलहटी में
निवाई कस्बा है और इससे बायें मुड़ कर 9
किलोमीटर बनस्थली.
निवाई और पहाड़ खत्म हुए. बायीं ओर बनस्थली
विद्यापीठ का विशालकाय बोर्ड दिखा गुप्ताजी ने कार बायीं और जाने वाली सड़क पर डाल
दी. कुछ ही देर में वे बनस्थली विद्यापीठ के विशाल प्रवेशद्वार के अंदर थी. यहाँ
गार्ड ने उन्हें रोक कर कार साइड में लगवाई. गेट रजिस्टर में विवरण अंकित करने को
कहा गया. पापा जब तक विवरण अंकित करते शगुन कार से उतरकर परिसर को निहारने लगी.
सीधी जाती सड़क, जिसके दोनों ओर सघन वृक्षावली और उनके बीच से झाँकते तीन-चार
मंजिले भवन.
दोपहर ढलने लगी थी. गेस्ट हाउस में कमरा लिया,
सामान रखा, वहीं के कैंटीन में लंच लिया. विद्यापीठ के प्रवेश कार्यालय पहुँचे तब
तक तीन बज चुके थे.
शगुन ने काउंटर पर बैठे कर्मचारी से "ऑनर्स
मनोविज्ञान” के लिए फार्म मांगा."
शगुन ने फॉर्म भरना शुरू किया. नाम, पता, विषय... फिर अचानक उसकी नज़र एक विकल्प पर अटक
गई.
स्नातक कार्यक्रम चुनें:
- बी.ए. (ऑनर्स) मनोविज्ञान
- बी.एससी. (ऑनर्स) मनोविज्ञान
उसने पलकें झपकाईं. बी.एससी.? मनोविज्ञान में?
"सर, यह बी.एससी.
वाला..." उसने कर्मचारी से पूछा.
"हाँ, यह भी है.
बी.एससी. ऑनर्स लेना है तो पहले साल कुछ फिजिक्स, केमिस्ट्री,
मैथ्स और बायोलॉजी भी पढ़नी होगी. दूसरे साल से पूरा फोकस मनोविज्ञान पर."
एक पल के लिए सब कुछ थम सा गया. फिर एक गर्म लहर
उसके भीतर से उठी. यह वह रास्ता था जिसकी उसे कल्पना भी नहीं थी. वह विज्ञान पढ़
सकती थी¡. अपनी मर्जी से. बिना किसी के कहने पर.
"पापा," उसकी
आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी, "मैं बी.एससी. ऑनर्स ले लूँ?"
मिस्टर गुप्ता ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा. "पर...
इतने विषय? तू संभाल पाएगी?"
"संभाल लूंगी." शगुन का जवाब तत्काल
और स्पष्ट था. उसकी आँखों में वह चमक थी जो किसी नए अवसर के सामने आती है; “आकांक्षा
और उत्साह का मिश्रण.”
पापा ने एक लंबी साँस ली. उन्होंने शगुन के
चेहरे पर वह निश्चय देखा जो उन्होंने कार खरीदते समय अपने चेहरे पर महसूस किया था.
एक अजीब सा गर्व उनके भीतर उमड़ा.
उन्होंने कहा, "जो
ठीक लगे."
फॉर्म भरा गया. फीस जमा हुई. शाम पाँच बजने को
थे. फीस जमा करने वाले कैशियर ने कहा, “देर हो गयी, पाँच बजने को हैं, होस्टल का
आवंटन कल सुबह हो सकेगा.
गेस्ट हाउस लौटते हुए, सड़क से अंदर जाती सड़क पर
एक कैंटीन सी दिखी. वहाँ कुछ लड़कियाँ बैठ
कर चाय पीते हुए बातें कर रही थीं. गुप्ता जी ने कैंटीन के निकट ले जा कर करा रोक
दी. “उतरो, चाय पी लेते हैं, पता भी लगेगा कि यहाँ कैंटीन में क्या मिल जाते हैं.
"बहुत कठिन कोर्स है, बेटा," माँ ने बैंच पर बैठते हुए चिंतित स्वर
में कहा, "पर तू कर लेगी."
"तुमने सही चुना," पापा ने कहा, "आजकल साइंस के क्षेत्र में बहुत
संभावनाएँ हैं."
शगुन मुस्कुराई. उनके शब्दों में एक नई समझ थी.
वे उसे अब केवल एक 'लड़की' के रूप में
नहीं, बल्कि एक 'छात्रा' के रूप में देख रहे थे.
तभी माँ ने कहा, "आयुष
का चेहरा देखा तुमने? कितना थका हुआ लग रहा था."
“तुम भी क्या बातें करने लगीं? गेस्ट-हाउस जाकर
खूब बतिया लेना.
की थकी आँखों की याद ने शगुन की खुशी पर एक छाया
डाल दी. उसके भाई के लिए विज्ञान एक बोझ था, एक जेल. उसके
लिए यह एक चुनाव था, एक चाबी. एक ही सिक्के के दो पहलू.
रात को कमरे में अकेले, शगुन
ने अपनी डायरी खोली.
आज मैंने खुद चुना. बी.एससी.. पापा मान गए. यह
कोई छोटी जीत नहीं. कल होस्टल मिलने पर मम्मा पापा चले जाएंगे. होस्टल मेरे लिए
नया घर होगा.
उसने खिड़की से बाहर देखा. विद्यापीठ की मुख्य
सड़क पर रोशनी थी. दोनों ओर वृक्षों के पीछे भवनों से कुछ रोशनियाँ फैली हुई थीं. उनमें से एक रोशनी उसके
होस्टल की भी है, जिसमें कल से उसे रहना होगा.
... क्रमश:
गुरुवार, 29 जनवरी 2026
कार, लिफाफा और लड्डू
पिंजरा और पंख-16
लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी
बुधवार, 28 जनवरी 2026
प्रोसेसिंग प्लांट
पिंजरा और पंख-15
लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी
अभिषेक के भाई ने चश्मे के पीछे से थकी आँखें उठाईं. “जैसा सुना है वैसा ही है. दिन में चौदह घंटे क्लास, रात को दो टेस्ट. शुरुआत में लगता है सब कुछ कर लेंगे… फिर धीरे-धीरे पता चलता है कि तुम नहीं, तुम्हारा दिमाग ही दौड़ रहा है रेस में.”
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
दो राहें, दो निर्णय
पिंजरा और पंख-14
लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी