@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

रविवार, 22 मार्च 2026

कवच

 देहरी के पार कड़ी - 4:

उस डरावनी धमकी के बाद कोशिश करके भी प्रिया सो नहीं सकी. उसकी रात करवटें बदलते ही गुजरी. तान्या के कमरे की खिड़की से उसे जयपुर की सड़कें शांत नजर आ रही थीं, बस कभी कोई वाहन सड़क से गुजर जाता. उसके मन में विक्रांत की वह आवाज़ गूंज रही थी— "पराई अमानत". वह किसी की अमानत कैसे हो सकती थी? उसका स्वतंत्र अस्तित्व था. वह एक स्वतंत्र नागरिक थी. लेकिन उसे लगा कि उसे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए बहुत लड़ाइयाँ लड़नी पड़ेंगी. घर से निकल लेना तो केवल आग़ाज था. सुबह जैसे ही उसे लगा कि आकाश की माँ विमलाजी जाग गयी हैं, वह भी उठ बैठी. वे रसोई में थीं और अपने लिए चाय गैस पर चढ़ा चुकी थीं. प्रिया को देख पूछा, “तुम्हारे लिए भी बना लूँ चाय?”

प्रिया ने ‘हाँ’ कह दी और डाइनिंग की कुर्सी खिसका कर वहीं विमलाजी के पास बैठ गयी. 

चाय पीकर लौटी तब तक तान्या जागी नहीं थी. प्रिया बाथरूम में घुस गयी. वह स्नान करके लौटी तब तान्या कमरे में नहीं थी. वह सुबह 8:00 बजे वह तैयार होकर निपटी. तभी तान्या आ पहुँची.


“दीदी नाश्ता तैयार है आकाश और पापा डाइनिंग में आपका इन्तजार कर रहे हैं. मैं बस फ्रेश हो कर पाँच मिनट में मैं भी आती हूँ, आप चलिए.”

वह डाइनिंग में पहुँची तो आकाश और के पापा, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी, प्रकाश मल्होत्रा  बैठे नाश्ता कर रहे थे. मल्होत्राजी ने प्रिया को भी बैठने को कहा. विमलाजी उसके लिए नाश्ता रख गईं.

"देखो बच्चों, कानून डरपोक के लिए नहीं, जागरूक नागरिक के लिए बना है,"मल्होत्राजी ने गंभीर स्वर में कहा. "विक्रांत ने जो 'अमानत' शब्द इस्तेमाल किया है, वह उसकी कुंठित मानसिकता है. हम सबसे पहले 'पुलिस थाना' में एक इन्फोर्मेटिव रिपोर्ट (Informative Report) दर्ज करवाएंगे. इसमें हम साफ़ लिखेंगे कि प्रिया बालिग है, अपनी मर्ज़ी से यहाँ रह रही है और उसे एक अज्ञात नंबर से जान का खतरा है. इससे यह होगा कि हमें फोन करते ही तुरन्त मदद मिल सकेगी."

प्रिया को पहली बार महसूस हुआ कि सुरक्षा केवल बंद दरवाजों में नहीं, बल्कि सही कानूनी प्रक्रिया में है. वह आकाश और उसके पापा तुरन्त पुलिस स्टेशन गए. दस बजने के पहले रिपोर्ट की एक कॉपी उनके हाथ में थी.

लौटते ही प्रिया ने सबसे पहले अपने मैनेजर और एचआर (HR) हेड को एक 'अर्जेंट मीटिंग' के लिए मैसेज किया. आकाश भी पास ही बैठा था. कुछ देर बाद हुई वीडियो कान्फेंस पर प्रिया ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी:

"सर, मेरे मंगेतर ने मेरे सहकर्मी को फोन पर धमकी दी है. मुझे लगता है कि मेरी जान और प्राइवेसी खतरे में है. मुझे तुरंत मुम्बई ऑफिस शिफ्ट होने की अनुमति चाहिए और मेरा बेस लोकेशन कोटा से मुम्बई बदल दिया जाए."

मैनेजर ने उसकी हिम्मत की दाद दी और तुरंत आईटी (IT) टीम को निर्देश दिए कि प्रिया के क्रेडेंशियल्स को 'हाई-सिक्योरिटी' पर रखा जाए ताकि कोई बाहरी व्यक्ति उसे ट्रेस न कर सके.

दोपहर के ठीक तीन बजे थे. प्रिया और तान्या ऊपर वाले कमरे की धूल झाड़ रही थीं, जिसे प्रिया का नया 'होम ऑफिस' बनना था. तभी अचानक बाहर एक भारी एसयूवी (SUV) के टायर चरचराए. प्रिया ने खिड़की से नीचे झांका और उसका खून जम गया. नीचे विक्रांत खड़ा था, उसके साथ दो और गठीले बदन के युवक थे.

"आकाश! बाहर निकल!" विक्रांत का गला फटने को था. "मेरी अमानत को लेकर तू बहुत बड़ा सूरमा बन रहा है? इज़्ज़त से उसे बाहर भेज दे, वरना तेरा ये छोटा सा घर और तेरी सरकारी नौकरी... दोनों मिट्टी में मिला दूंगा."

विक्रांत को वहाँ देख उसके शरीर में सिहरन दौड़ गयी. उसने दो मिनट बैठ कर अपने आपको शान्त किया और नीचे की ओर चल दी.

मल्होत्राजी ने आकाश को कहा कि वह थाने को फोन करे. फिर शांत भाव से कुर्ता पहना और बिना किसी घबराहट के गेट की ओर बढ़े.  आकाश ने थाने फोन किया, "सर, वे आ गए हैं. सिद्धार्थ नगर, मकान नंबर 42." फोन जेब में डालकर वह भी अपने पिता के पीछे चल दिया.

मल्होत्राजी ने गेट की जाली के पीछे से ही कहा, "बेटा विक्रांत, यह घर है, कोई मंडी नहीं जहाँ तुम 'अमानत' लेने आए हो. यहाँ स्वतंत्र नागरिक हैं. तुम मर्यादा लांघ रहे हो, बेहतर होगा यहाँ से चले जाओ."

विक्रांत ने गेट पर जोर से लात मारी, "बुड्ढे, ज्ञान मत दे! वो मेरी होने वाली पत्नी है. मेरा उस पर कानूनी और सामाजिक हक है." उसके साथी डराने के लिए अपनी जेबों में हाथ डालकर आगे बढ़े, जैसे कोई हथियार छिपा हो.

तभी दूर से सायरन की आवाज़ गूँजी. विक्रांत के चेहरे का रंग यकायक उड़ गया. अगले ही पल पुलिस की एक जीप तेज़ी से मुड़कर उनके ठीक सामने रुकी. जीप से एक इंस्पेक्टर और चार हट्टे-कट्टे कांस्टेबल उतरे.

"क्या तमाशा है यह?" इंस्पेक्टर ने अपनी बेल्ट ठीक करते हुए कड़क आवाज़ में पूछा.

विक्रांत की अकड़ धुआं हो गई. वह हकलाने लगा, "सर... वो... पारिवारिक मामला है. मेरी मंगेतर यहाँ छिपी है."

"मंगेतर? बालिग लड़की को तुम 'अमानत' बोलकर डराओगे?" इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर विक्रांत की कलाई पकड़ ली.  . "सुबह ही रिपोर्ट दर्ज हुई है तुम्हारी धमकी की. चलो, अब थाने में बैठकर विस्तार से बताना कि 'अमानत' की परिभाषा क्या है."

इंस्पेक्टर ने एक कांस्टेबल को निर्देश दिया कि वह विक्रांत की गाड़ी खुद ड्राइव करके थाने ले आए. विक्रांत और उसके साथियों को अपराधियों की तरह जीप में बिठाया गया. जिस गली में वे शोर मचा रहे थे, अब वहाँ सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा खौफ का नहीं, सुकून का था.

प्रिया ड्राइंगरूम की खिड़की से यह सब देख रही थी. उसकी आँखें नम हो गईं. उसने अपने रूमाल से उन्हें पोंछा और बाहर बरामदे में आ गई. आकाश के पिता ने प्रिया को देखा और धीरे से मुस्कुराए. प्रिया ने समझ लिया था कि अब वह अकेली नहीं है. अंदर कमरे में पहुँच कर उसने अपना लैपटॉप खोला और मुम्बई ऑफिस के मैनेजर को मेल किया— "मैं कल सुबह से ही काम पर हूँ. और हाँ, मेरा मुम्बई शिफ्टिंग का प्रोसेस शुरू कर दीजिए."

... क्रमशः

शनिवार, 21 मार्च 2026

आश्रय

देहरी के पार कड़ी : 3
आकाश की कार ने चंबल के पुल को पार कर महाराणा प्रताप की प्रतिमा वाले गोल चक्कर से आगे जयपुर रोड पर बढ़ गयी थी. प्रिया खिड़की से बाहर देखती रही. बहुमंजिला इमारतें हर तरफ उग रही थीं. शहर कितना विस्तार कर गया था. बड़गाँव बावड़ी तक बस्तियाँ हो गई थीं. यहाँ से बूंदी जिला आरंभ हुआ और कार हाईवे पर आ गई और उसके साथ ही उसकी गति भी बढ़ गई. प्रिया ने मुड़कर एक बार अपने शहर को देखा. यहीं पैदा हुई, यहीं सारी पढ़ाई हुई, बस एमसीए करने के लिए उसे तीन वर्ष इंदौर में रहना पड़ा था. इस शहर ने उसे पाला-पोसा, लेकिन अंत में वही उसका सौदा करने पर आमादा हो गया. चंबल का पानी शांत था, पर प्रिया के मन में समंदर उमड़ रहा था.

अगले चार घंटे खामोशी और बीच-बीच में आकाश से कंपनी के कामों से संबंधित हुई बातों के बीच निकल गए. टोंक पहुँचे तो दोनों को कुछ भूख सी महसूस हुई. आकाश न प्रिया से पूछ कर सड़क किनारे एक रेस्टोरेंट पर कार खड़ी कर दी. वे नाश्ता और चाय पीकर उठे तो प्रिया को कुछ दूर नया सिम बेचने वाले सड़क पर ही स्टाल लगाए दिख गए. उसने अपने लिए दो सिम ले लिए और अपने फोन के सिम बदल कर उसने फोन चालू किया. अपना फोन उसने घर से निकलने के बाद ऋचा से बात होते ही बंद कर दिया था. "अब कम से कम लोकेशन ट्रेस नहीं होगी," उसने एक लंबी सांस लेते हुए कहा.

रात के आठ बजे, कार जयपुर के गोपालपुरा बाईपास के निकट एक शांत कॉलोनी 'सिद्धार्थ नगर' में रुकी. आकाश ने कार बाहर साइड में खड़ी की. घर का गेट खोला, गेट खुलने की आवाज सुन कर ही आकाश के माता-पिता और उसकी छोटी बहन, तान्या बाहर बरामदे में निकल आए, जैसे वे तीनों बहुत देर से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हों. तीनों ने प्रिया का स्वागत किया. आकाश के मम्मी-पापा उसके साथ ही ड्राइंगरूम में बैठ गए, उससे बातें करने लगे. आकाश फ्रेश होने चला गया. थोड़ी देर में तान्या चाय बनाकर कुकीज़ के साथ ले आई. चाय पर आकाश के मम्मी पापा प्रिया से उसकी पढ़ाई, और कैरियर सम्बन्धी बातें करते रहे. एक बार भी उसके अचानक घर छोड़ने और विवाह से संबंधित बातों का उल्लेख तक नहीं किया. प्रिया को लगा कि आकाश के परिवार का माहौल बेहतर है, उसके मम्मी पापा बच्चों की असहजता के बारे में सजग रहते हैं.

चाय आने के कुछ देर बाद आकाश भी फ्रेश होकर आ गया. आते ही उसने कहा कि, "मैंने मुम्बई ऑफिस सूचित कर दिया है कि मैं प्रिया के लैपटॉप के साथ प्रिया स्वयं भी जयपुर आ गयी है. यह भी बता दिया है कि तुम सोमवार को जयपुर से लॉग-इन करोगी".

चाय खत्म हुई. प्रिया ने कहा, तुम मुझे होटल छोड़ने को तैयार हो जाओ मैं बाथरूम हो कर आती हूँ. होटल की बात सुनते ही. आकाश की माँ ने उसका अपने हाथ में ले लिया.

"बेटे, इस शहर में तुम अकेली होटल में रहोगी, यह हमें मंज़ूर नहीं. मैं जानती हूँ, आकाश तुम्हें जो होटल बताएगा, वह सुरक्षित ही होगा. लेकिन जिस परिस्थिति में तुम्हें घर छोड़ना पड़ा है, उसमें होटल में ठहरना किसी तरह सुरक्षित नहीं है. यहाँ तुम हर तरह सुरक्षित हो, घर में तुम्हारे सिवा चार और लोग हैं. आज रात तुम तान्या के साथ उसके कमरे में सो जाओ. ऊपर एक कमरा खाली है, कल सफाई करवाकर उसे पेइंग गेस्ट की तरह तैयार कर देंगे. तुम यहीं रहकर अपना 'वर्क फ्रॉम होम' कर सकती हो," माँ के शब्दों में वैसी ममता थी जैसी प्रिया अपनी सगी माँ से इस समय उम्मीद कर रही थी. प्रिया इस निस्वार्थ आग्रह को टाल न सकी. प्रिया को होटल जाने का इरादा छोड़ना पड़ा . तान्या उसे अपने कमरे में ले गयी. कमरा करीने से सजा हुआ था जिसमें एक वर्किंग टेबल और एक डबल बेड था जिसे दो अलग-अलग बिस्तरों के रूप में भी उपयोग में लिया जा सकता था.

“दीदी वैसे तो हम दोनों इस डबल बेड पर सो सकते हैं. लेकिन आपको अच्छा न लगे तो मैं इसके दोनों हिस्सों को अलग करके उन पर सिंगल बेड चादर लगा दूंगी.”

“नहीं, तान्या, उसकी जरूरत नहीं. हम दोनों साथ सो लेंगे. हमें दोस्ती भी तो करनी है.”

कुछ देर बाद तान्या प्रिया को खाने के लिए डाइनिंग में ले आई. आकाश और उसके पापा टेबल पर थे; आकाश की माँ किचन में चपातियाँ उतारने की तैयारी कर रही थी. प्रिया टेबल पर बैठने के बजाय किचन में चली गई.

“माँ मैं आपके साथ खाना खाऊंगी, पहले इन तीनों को खा लेने दें.” माँ ने प्रिया को बहुत कहा कि वह भी सब के साथ बैठ जाए. लेकिन वह नहीं बैठी. तान्या ने फुर्ती से खाना खाया और हाथ धोकर रसोई में पहुँच गई.

“माँ, आप और प्रिया दीदी भी खाना खाइए, मैं गर्म चपातियाँ लाती हूँ.”

खाने में रात के करीब 11 बज गए. सभी ड्राइंग रूम में बैठ कर बातें कर रहे थे. तभी आकाश के फोन की स्क्रीन जगमगा उठी. एक अनजान नंबर था. आकाश ने फोन उठाया, "हेलो?"

"सुन बे आकाश!" दूसरी तरफ से एक भारी और अहंकार से भरी आवाज़ गूंजी. वह प्रिया का मंगेतर, विक्रांत था. "हमें पता है प्रिया को तू जयपुर ले गया है. गुप्ता जी भले ही सीधे आदमी हों, पर मैं नहीं हूँ. उसे समझा दे कि अपनी मर्ज़ी से कोटा लौट आए, वरना जयपुर ज्यादा दूर नहीं है. और तू... पराई अमानत पर हाथ डालने की कोशिश मत कर, वरना नौकरी और सलामती दोनों खतरे में पड़ जाएंगे."

आकाश ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया, पर उसके चेहरे पर तनाव की लकीरें उभर आईं. प्रिया ने शायद सब सुन लिया था.

"वह मुझे अपनी 'अमानत' समझता है, "प्रिया की आवाज़ में कंपन था, पर इरादा चट्टान जैसा. "उसे लगता है कि वह डराकर मुझे वापस ले जाएगा."

आकाश ने दृढ़ता से कहा, "उसे गलतफहमी है प्रिया. कल सुबह लॉग-इन करते ही हम सबसे पहले तुम्हारी मुम्बई शिफ्टिंग की बात पक्की करेंगे. और जब तक तुम यहाँ हो, यह घर तुम्हारा किला है."                              ... क्रमशः

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पहचान

देहरी के पार कड़ी : 2
तलवंडी कोटा के ‘ए’ सेक्टर की मोहन विला में अभी भी मातम और गुस्से का मिला-जुला माहौल था. गृहस्वामी ब्रज मोहन गुप्ता जवाहर नगर थाना में रिपोर्ट कराने गए थे, किन्तु उनकी सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटी प्रिया के बालिग होने के कारण पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने से इन्कार कर दिया. बोले लड़की खुद कहीं भी जा सकती है. हाँ हम 24 घंटे बाद गुमशुदा रिपोर्ट दर्ज कर सकते है, यह नियम की बात है. वे घर लौट आए. अगले दिन सुबह फिर थाने गए तो उन्हें पता लगा कि प्रिया खुद एक वकील के साथ आकर बयान दे चुकी है कि, “उसने खुद अपनी मर्ज़ी से घर छोड़ा है. वह अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह नहीं करना चाहती, उसका कोई अफेयर नहीं है.” गुप्ताजी मायूस हो कर फिर लौट आए. यह पहली बार था जब उनकी किसी शिकायत पर पुलिस ने काम करने से इन्कार कर दिया हो. वे अनेक वर्ष से स्माल स्केल इंडस्ट्री ऑनर्स एसोसिएशन के सचिव थे, शहर के एसपी और रेंज के आईजी तक उनका सम्मान करते थे. लेकिन इस मामले में कोई उनके लिए सहायक सिद्ध न हो सका. उन्होंने प्रिया के कमरे को ताला लगा दिया, जैसे स्मृतियों को कैद करने से लज्जा मिट जाएगी.

लेकिन शुक्रवार की दोपहर जयपुर से प्रिया की कंपनी के किसी प्रतिनिधि, आकाश का फोन आया कि “प्रिया से संपर्क नहीं हो रहा है. तो पिता के पास उसे टालने का कोई बहाना नहीं था. कंपनी के लिए वह 'उद्योगपति की बेटी' नहीं, बस एक महत्वपूर्ण कर्मचारी थी जिससे संपर्क नहीं हो पा रहा था. “उसकी सहेली बीमार होने के कारण उसे अचानक इन्दौर जाना पड़ा, कंपनी का लैपटॉप तक ले कर नहीं गयी.” गुप्ताजी ने यही जवाब दिया. आकाश ने बताया कि “प्रिया की टीम जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी, वह उसकी वजह से अटक गया है, उसके लैपटॉप की तुरन्त जरूरत है, वह कल लेने कोटा आ रहा है.”

शनिवार की दोपहर, जब आकाश कोटा पहुँचा, तो उसे अंदाज़ा नहीं था कि वह एक सामाजिक रणभूमि में कदम रख रहा है. प्रिया के पिता ने भारी मन से उसे लैपटॉप सौंपा, यह कहते हुए कि "सहेली की बीमारी के कारण उसे अचानक जाना पड़ा. फिर भी फोन पर संपर्क तो करना चाहिए था. उनका भी उससे फोन संपर्क नहीं हो पा रहा है. अब तो उन्हें भी चिन्ता होने लगी है."

लेकिन आकाश, प्रिया की टीम का हिस्सा था, उसे पता था कि प्रिया के ड्यूटी न करने से प्रोजेक्ट को अधिक फर्क नहीं पड़ा था. उसकी मैनेजर ने बस इतनी हिदायत दी थी कि प्रिया ने घर में विवाद के कारण घर छोड़ दिया है और कोटा में ही किसी सहेली के यहाँ है. उसे उसके पिता के यहाँ से लैपटॉप लाकर प्रिया को सौंपना है.

प्रिया ने अपनी मैनेजर को फोन पर पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी थी कि उसका विवाह उसकी मर्जी के बिना किया जा रहा था, जिसके कारण उसे घर छोड़ना पड़ा. मैनेजर ने संवेदनशीलता दिखाते हुए आकाश को केवल 'लैपटॉप कलेक्ट' करने के बहाने भेजा था, ताकि कंपनी से आवंटित लैपटॉप प्रिया को मिल जाए और वह काम शुरू कर सके.

ऋचा के फ्लैट पर माहौल कम गरम नहीं था. अमित, समीर और नेहा वहाँ पहले से मौजूद थे. सभी का विचार था कि परिवार से विवाद चलते प्रिया का कोटा में रहकर शांतिपूर्वक काम करना संभव नहीं होगा. या तो वह अपना ‘वर्क फ्रॉम होम’ समाप्त करके मुम्बई अपनी ड्यूटी जॉइन कर ले या फिर जयपुर या उदयपुर में किसी वर्किंग वूमन होस्टल में या कहीं पेइंग गेस्ट स्पेस में रह कर काम करे. एक-दो माह का समय मिल जाएगा. तब माहौल देख कर आगे के निर्णय ले. जब आकाश वहां लैपटॉप लेकर पहुँचा और प्रिया की निगाह अपने लैपटॉप पर पड़ी, तो उसकी आँखें चमक उठीं. कंपनी का लैपटॉप इस समय केवल एक मशीन नहीं था, उसकी 'आज़ादी का औज़ार' था.

समीर कह रहा था, "कोटा अब तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है प्रिया. यहाँ हर मोड़ पर कोई न कोई तुम्हें पहचानता है. पुलिस और तुम्हारे पापा के रसूख वाले दोस्त तुम्हें चैन से जीने नहीं देंगे."

नेहा ने ठोस दलील दी, "जयपुर बड़ा शहर है. बढ़िया तो यह है कि कोटा से काम करने के बजाय, तुम जयपुर चली जाओ. इससे तुम्हें सुरक्षा भी मिलेगी और एक नया सामाजिक दायरा भी."

आकाश ने भी साथ दिया, "हाँ प्रिया, कंपनी तुम्हारी स्थिति समझती है. मेरे घर के पास ही वर्किंग वुमन हॉस्टल या पेइंग गेस्ट स्पेस मिल जाएगी. मैं अपनी कार लेकर आया हूँ. तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो. मैं वहाँ अपने घर से नजदीक ही किसी होटल में कमरा बुक करवा देता हूँ."

खिड़की से हवा के एक झोंके ने अंदर प्रवेश किया. कोटा की यह हवा जो कभी उसे अपनी लगती थीं, अब उसे अजनबी लग रही थी. उसने तय किया कि वह आज ही आकाश के साथ प्रस्थान करेगी. कल से वह जयपुर शहर में काम करने वाली एक प्रोफेशनल होगी
... क्रमशः

गुरुवार, 19 मार्च 2026

देहरी के पार

रात डेढ़ बजे ऋचा को प्रिया का व्हाट्सएप मैसेज मिला, “मैंने घर छोड़ दिया है. मुझे छुपना नहीं है, बस खड़ा होना है.”

दो दिन बाद ही तो प्रिया की शादी होने वाली थी. उसे पता भी था कि प्रिया को लड़का पसंद नहीं था, उसने अपने मम्मी पापा को बता भी दिया था कि वह इस लड़के से शादी नहीं करना चाहती. फिर भी वे न केवल रिश्ता पक्का कर आए, बल्कि शादी की तारीखें भी तय हो गयीं. पापा के सामने कभी प्रिया ने अपनी इच्छा प्रकट नहीं की, लेकिन माँ से अवश्य वह रोज कहती रही कि, मैं यह शादी किसी हालत में न करूंगी. उसके बावजूद उसके पापा को न जाने क्यों ऐसा विश्वास था कि उन्होंने जो वर और घर देखा है उससे बेहतर कोई प्रिया के लिए कोई और नहीं हो सकता. वे दहेज और शादी पर भी लाखों खर्च कर रहे थे.

... तो आखिर प्रिया के सब्र का बांध टूट ही गया. उसने फौरन प्रिया को फोन लगाया और कहा, “तुम जहाँ भी हो वहाँ से फौरन मेरे फ्लैट में आ जाओ”. इसके बाद उसने तीनों दोस्तों अमित, समीर और नेहा को मैसेज किया कि, “प्रिया मेरे यहाँ पहुँच रही है, तुम भी पहुँचो.”

कुछ देर बाद प्रिया ऋचा के वन बीएचके फ्लैट में थी. आधे घंटे में अमित और समीर नेहा भी पहुँच गए. सबने मिल कर तय किया कि प्रिया रात को ऋचा के साथ उसके बेडरूम में रहेगी और अमित और समीर बाहर हॉल में रहेंगे. जिससे कोई आए तो उसे संभाला जा सके. समीर ने बताया कि उसने नेहा को अपने घर पर रुकने और सुबह जल्दी से जल्दी उसकी कंपनी के वकील को संपर्क करने को कहा है.

प्रिया अपने साथ ज्यादा कुछ नहीं लायी थी. उसने शाम को ही एक पुराने झोले में अपनी ज़रूरी डिग्रियाँ, लैपटॉप और कुछ जोड़ी कपड़े एक ठूँस कर रख लिए थे. घर के बाहर शामियाना लग रहा था, हलवाई की कड़ाही में चाशनी उबल रही थी और घर के बड़े-बुजुर्ग 'लाखों के लेनदेन' और 'खानदान की नाक' की चर्चा में मशगूल थे. प्रिया के लिए यकायक अपना ही घर एक ऐसी जेल बन चुका था जिसकी दीवारें नोटों और गहनों से चुनी गई थीं.

जिस लड़के से उसकी शादी तय हुई थी, उससे प्रिया दो बार मिली थी. दूसरी मुलाक़ात में ही उसने साफ़ कह दिया था, "नौकरी छोड़ देना, हमारे यहाँ बहुएं बाहर हाथ-पैर नहीं मारतीं." पिता ने जब यह सुना तो मुस्कुराकर बोले थे, "राज करेगी मेरी बेटी, कमाने की ज़रूरत ही क्या है?"

प्रिया के लिए वह 'राज' नहीं, अपनी पहचान की आहुति थी.

वह रात सवा बजे जब पूरा घर थकान और उत्सव के बीच गहरी नींद में था, हलवाई भी घर जा चुका था, प्रिया ने अपनी सैंडल हाथ में ली और पिछले दरवाज़े से बाहर निकल आई. उसके पास कोई 'ठिकाना' नहीं था. उसे पता था कि सुबह होते ही वह एक 'भगोड़ी' कहलाएगी.

शहर की पुलिस, समाज और खुद उसका परिवार—सब एक तरफ होंगे. उसके भागने को किसी 'अफेयर' या 'चरित्रहीनता' से जोड़ने की कोशिशें शुरू हो जाएंगी, क्योंकि समाज यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि एक लड़की सिर्फ अपनी आज़ादी के लिए भी घर छोड़ सकती है.

सुबह होते ही तूफान आया. पुलिस स्टेशन में प्रिया के पिता दहाड़ रहे थे, "बहला-फुसलाकर ले गया है कोई उसे!" पुलिस का पहला सवाल था, "लड़के का नंबर दो, किससे बात करती थी?" किसी ने यह नहीं पूछा कि क्या वह अपनी मर्ज़ी से गई है.

प्रिया के पुलिस के पास जाकर संरक्षण मांगने के प्रस्ताव को उसके दोस्तों ने खारिज कर दिया था. उन्हें पता था कि वहां उसे 'समझा-बुझाकर' वापस घर पहुँचा दिया जाएगा या फिर उसके पेरेंट्स को सूचना दी जाएगी और वे खुद पहुँच जाएंगे.

अगले तीन दिन प्रिया के लिए अग्निपरीक्षा जैसे निकले. मोहल्ले में चर्चाएँ हो रही थी, "इतना पैसा खर्च कर रहे थे माँ-बाप, नमकहराम निकली." प्रिया ने फेसबुक पर एक छोटा सा वीडियो पोस्ट किया:

"मैं किसी के साथ नहीं भागी हूँ. मैं उस शादी से भागी हूँ जहाँ मेरा वजूद खरीदा जा रहा था. मैं बालिग हूँ, कमाती हूँ और मुझे अपनी ज़िंदगी का फैसला लेने का हक है. पुलिस से मेरी विनती है कि इसे 'अपहरण' का रंग न दें."

यह वीडियो जंगल की आग की तरह फैल गया. कुछ ने उसे 'कुलटा' कहा, तो कुछ कामकाजी लड़कियों ने उसके साहस की तारीफ की.

चौथे दिन, प्रिया अपने दोस्तों और कंपनी के वकील के दफ्तर के एक सहायक वकील के साथ खुद पुलिस स्टेशन पहुँची. वहाँ उसके पिता और होने वाले ससुराल वाले मौजूद थे. माहौल तनावपूर्ण था. पुलिसवालों ने उसे झिड़का, "पागल हो गई हो? मां-बाप की इज़्ज़त की धूल उड़ा दी."

प्रिया ने शांति से अपना आई कार्ड और बैंक स्टेटमेंट मेज़ पर रखा. उसने कहा, "सर, मैं बालिग हूँ. कानून मुझे अपनी मर्ज़ी से रहने का अधिकार देता है. न तो मेरा अपहरण हुआ है, न मैं किसी दबाव में हूँ. मैं बस उस घर में नहीं रह सकती जहाँ मेरी मर्ज़ी के बिना मेरा सौदा हो रहा हो."

पुलिस के पास उसे रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं था. प्रिया के पिता की आँखों में गुस्सा था, पर प्रिया की आँखों में एक अजीब सी शांति. वह जानती थी कि अब उसके पास परिवार नहीं है, समाज का समर्थन नहीं है और न ही कोई बड़ा एनजीओ उसके पीछे खड़ा है.

उसके पास बस उसके चंद दोस्त थे और वह 'खुद' थी. उस रात प्रिया ने एक नए शहर के एक छोटे से हॉस्टल में सिर छिपाया. वह अकेली थी, डरी हुई भी थी, लेकिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसकी साँसों पर सिर्फ उसका हक है.

बुधवार, 18 मार्च 2026

बंकर महाराज


नगर के मध्य में स्थित 'ज्ञान निकेतन' स्कूल की दीवारों पर अब कालिख और भित्तिचित्रों का कब्जा था. जहाँ कभी गणित के सूत्र गूँजते थे, वहाँ अब भारी पर्दों के पीछे 'चमत्कारों की कार्यशाला' चल रही थी. स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बड़ा बोर्ड लगा था— "तर्क त्यागिए, मोक्ष पाइए."

मंच पर भव्य रेशमी वस्त्रों में लिपटे 'महाराज' विराजमान थे. उनके गले में स्फटिक की मालाएँ थीं, लेकिन आँखों में व्यापारिक धूर्तता और रह-रहकर उभरने वाला एक अनजाना भय था. उनके सामने हजारों की भीड़ मंत्रमुग्ध बैठी थी, पर उस भीड़ की आँखों में भी एक अजीब सा द्वंद्व था—वे मानना तो चाहते थे कि उनके हाथ में हीरा है, पर कोयले की कालिख उनके अंतर्मन को कचोट रही थी.

"भक्तों!" महाराज दहाड़े, "ये स्कूल, ये किताबें, ये सब भ्रम हैं! देखो इस पत्थर को!" उन्होंने हाथ में कोयले का एक काला टुकड़ा उठाया. "तुम्हारी आँखों को यह कोयला दिख रहा होगा, क्योंकि तुम्हारी दृष्टि मैली है. पर वास्तव में यह हीरा है."

भीड़ में से एक युवक खड़ा हुआ. उसके चेहरे पर डर नहीं, एक शांत दृढ़ता थी. "पर महाराज, यह तो कोयला ही है. आप इजाजत दें तो हम इसे जला कर सिद्ध कर देंगे कि यह कोयला है, हीरा नहीं..."

महाराज के माथे पर पसीने की एक बारीक बूंद उभरी. उसके साथ ही मन द्वंद्व से घिर गया. महाराज को लगा कि अगर इस युवक को बोलने दिया गया, तो बरसों से खड़ा किया गया झूठ का यह महल ढह जाएगा. उन्हें उस युवक में अपना 'काल' नजर आया.

"मूर्ख!" महाराज ने उसे बीच में ही काट दिया. उनकी आवाज में अब क्रोध कम और असुरक्षा ज्यादा थी. "तुम परास्त विज्ञानियों के दूत हो! तुम इस युग के विद्रोही हो. सैनिकों, इसे पकड़ो!"

युवक को घसीटते हुए ले जाया गया. भीड़ के कुछ लोग खड़े हुए, फिर सहमकर बैठ गए. उनके भीतर एक युद्ध चल रहा था—सत्य का साथ दें या सुरक्षित झूठ का? अंततः 'सुरक्षा' जीत गई और वे फिर से जय-जयकार करने लगे.

महाराज की भृकुटियाँ तनी रहीं, पर जैसे ही युवक ओझल हुआ, उनके चेहरे पर एक कुटिल सुकून फैल गया. वे पुनः भीड़ से मुखातिब हुए, नेत्रों से बनावटी स्नेह-वर्षा करते हुए बोले, "हमने तर्क के स्कूल बंद कर दिए हैं. बनावटी इतिहास हटा कर इतिहास की पुस्तकों को निर्मल कर दिया है. अब वहाँ हमारा बताया हुआ 'सच्चा' इतिहास पढ़ाया जाएगा. हमारे प्राचीन गौरव की गाथाएँ गूँजेंगी."

मंच के पीछे खड़े वृद्ध शिक्षक ने देखा कि महाराज के हाथ हल्के से काँप रहे थे. पास खड़ा दरबारी हंसा, "देख रहे हो मास्टर जी? महाराज विश्व गुरु बन गए हैं!"

शिक्षक ने ठंडी आह भरी, "नायक का अभिनय करना और नायक होना, दो अलग बातें हैं. क्या तुम्हें भागवत पुराण के पात्र पौंड्रक का स्मरण है?? वह भी अपने मुकुट में मोर पंख खोंसकर, हाथ में नकली सुदर्शन चक्र लिए खुद को कृष्ण कहता था. जिसने भी उसकी असलियत उजागर कर खिल्ली उड़ाई, उसे कारागार में डाल दिया या मृत्युदंड दे दिया. भीतर से वह जानता था कि वह नकली है, और यही डर उसे विदूषक-खलनायक बनाता था. ये महाराज भी शेर की खाल ओढ़े सियार हैं. खाल के भीतर का सियार हमेशा काँपता रहता है."

तभी अचानक, बाहर भारी शोर मचा. सीमा पर संकट की घोषणा हुई. भीड़ की नजरें अपने 'रक्षक' पर टिक गईं. उन्हें उम्मीद थी कि अब 'चमत्कार' होगा.

परंतु, जैसे ही खतरे की पदचाप सुनाई दी, महाराज के भीतर का 'सियार' जाग गया. उनका 'वैश्विक नायक' वाला मुखौटा दरकने लगा.

"अंगरक्षकों! जल्दी करो!" वे फुसफुसाए. उनकी आँखों में वही पुरानी कायरता थी जो वे अब तक सत्ता के मुखौटे के पीछे छिपाते आए थे.

"पर महाराज, जनता आपकी वीरता देखना चाहती है!"

"वीरता भी देखेगी जनता, पहले सुरक्षा आवश्यक है." महाराज एक वातानुकूलित अभेद्य बंकर की ओर भागे. जाते-जाते उन्होंने चिल्लाकर वह अंतिम पाखंड किया, "मैं ध्यान मुद्रा में हूँ! सैनिकों की बलवृद्धि और उनकी विजय के लिए साधना-रत हूँ."

भीड़ ने देखा कि उनका 'शेर' बंकर के लोहे के पीछे लुप्त हो गया है. सन्नाटा पसर गया. अब वहाँ केवल धूल थी, धुआँ था और था कोयलों का ढेर, जिसकी कालिख अब सबके चेहरों पर साफ दिखने लगी थी.

वृद्ध शिक्षक ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और लिखा:

"यह कोयला युग है. यहाँ नायक के वेश में सियार और लोमड़ विचर रहे हैं. पर याद रहे, इतिहास केवल मंच को नहीं देखता, वह बंकरों के अंधेरे में छिपी कायरता को भी पढ़ना जानता है."

शनिवार, 14 मार्च 2026

पटकथा

'लघुकथा'
कोटा से बाराँ जाने वाली सड़क पर 50 किलोमीटर दूर बसे अंता कस्बे में भँवर का बचपन बीता. वहाँ घरों की बनावट कस्बे का माहौल ही ऐसा था कि मर्दानगी के लिए अलग से कोई पाठशाला नहीं खोलनी पड़ती थी; वह तो वहाँ की हवा और मर्दों की बैठकों के धुएँ में रची-बसी थी. भँवर ने बचपन से देखा कि घर के बड़े 'हुकम' उचारते थे और औरतों के स्वर घूंघट की ओट में कहीं लुप्त हो जाते थे.

भंवर की पूरी पढ़ाई एक 'लड़कों के स्कूल' में हुई. स्कूल एक ऐसा किला था जहाँ औरतों का प्रवेश वर्जित तो नहीं था, पर उनकी अनुपस्थिति एक 'सांस्कृतिक ज़रूरत' बना दी गई थी. स्कूल के लड़कों के लिए लड़कियां कोई हाड-माँस का इंसान नहीं, बल्कि 'इज्जत' या 'आफत' के दो खानों में बँटी हुई कल्पित आकृतियाँ थीं. वहाँ मर्दानगी का पैमाना था—बिना पलक झपकाए किसी की आँखों में देखना और अपनी जाति के रसूख को अपनी कमीज के कॉलर पर टांगे रखना.

फिर भंवर का सामना कुलदीप से हुआ. कुलदीप, जिसके पास अपनी जाति और अपने 'मर्दाना' होने का एक गहरा अहंकार था.

"देख भँवर, चंबल का पानी और हाड़ौती का खून... दोनों में उबाल रहना चाहिए," कुलदीप अक्सर अपनी बाइक को रेस देते हुए कहता. उसके लिए दबदबा ही एकमात्र सद्गुण था.

एक दिन, पुराने कस्बे के स्कूल से लौट रही लड़कियां कुएं की जगत पर बैठकर कुछ बातचीत करने लगी थीं. उनमें मास्टर जी की मंजरी भी थी. मास्टर जी कुछ चार साल कोटा में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के दफ्तर में सहायक रहे थे. मंजरी चार साल कोटा के किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ कर लौटी थी. उसकी चाल में दबी हुई सहम नहीं थी, होंठों पर मुस्कान बसती और आँखों में प्यार झलकता. उसकी काया में बेबसी की वह रेखा नहीं थी जिसे भँवर ने अपने घर की औरतों में देखा था. उसके बोल में 'हुकम' की गुलामी नहीं, बराबरी का आत्मविश्वास था. उसका स्वर कस्बे में पसरा सदियों का सन्नाटा तोड़ता लगता था. उस दिन कुलदीप ने उसे देखते ही अपनी बाइक का पहिया उसकी ओर मोड़ा और एक भद्दा मज़ाक उछाला.

"अरे भाई, ये तो शहर जाकर ज़्यादा ही पढ़ ली है," सड़क से गुजरते लड़के ठहर गए और ठहाका मारकर हँसे.

भंवर वहीं से गुजर रहा था. उसे लगा कि उसे भी इस ठहाके में शामिल होना चाहिए, क्योंकि यही उस 'पटकथा' की मांग थी जो उसे पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी गई थी. लेकिन उस पल मंजरी ने अपनी नज़रें नीचे नहीं कीं. उसने रुककर कुलदीप की आँखों में सीधे झांका. उस नज़र में नफरत से ज़्यादा एक गहरी 'घृणा' थी, ऐसी घृणा जो किसी ताकतवर को बौना बना दे और बरसती आग सा क्रोध.

मंजरी ने सिर्फ इतना कहा, "कुलदीपे, ये जो तुम 'मर्दानगी' दिखा रहे हो न... ये तुम्हारे भीतर का डर है. तुम डरे हुए हो कि अगर हम तुम्हारे बराबर खड़े हो गए, तो तुम्हारी ये विरासत पसर जाएगी."

कुलदीप तिलमिला गया. उसने हाथ उठाया, लेकिन भंवर में, न जाने कहाँ से हिम्मत आ गई, उसने आगे बढ़ कर कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.

"छोड़ दे कुलदीप," भँवर की आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें एक ठहराव था. उसे न जाने क्या हुआ था. जैसे ही मंजरी ने कुलदीप की मर्दानगी को डर कहा, उसका दिमाग झनझना उठा था. फिर उसका हाथ बढ़ा और उसने कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.

"तू पागल हो गया है? एक लड़की के लिए अपने दोस्त और अपनी बिरादरी के खिलाफ जाएगा?" कुलदीप की आवाज़ में पारंपरिक रोब था.

"बिरादरी के खिलाफ नहीं, खुद के खिलाफ जा रहा हूँ," भंवर ने जवाब दिया. "हम सालों से यही तो कर रहे हैं. चुप रहना, डराना और इसे ही मर्द होना समझना. पर हम ही तो डरते रहते हैं हर पल कि कोई बराबरी पर न आ खड़ा हो. मुझे अब ये डर का बोझ नहीं ढोना."

उस शाम भँवर जब घर लौटा, तो बैठक में सन्नाटा था. उसके पिता हुक्का पी रहे थे. भंवर ने पहली बार गौर किया कि उस सन्नाटे में कितनी घुटन थी. उसने अपनी माँ को देखा, जो रसोई की गर्मी में बिना पंखे के रोटियाँ बेल रही थी. वह अपनी माँ के पास जाकर बैठ गया, वहाँ, जहाँ अमूमन घर के 'मर्द' नहीं बैठते.

"माँ, आज से मैं स्कूल के बाद आपका हाथ बँटाऊँगा," उसने धीरे से कहा.

माँ ने रोटी बेलते बेलन को रोक कर भँवर की आँखों में देखा, वहाँ उसके प्रति शाब्दिक आदर नहीं बल्कि प्यार था.

उसके पिता ने चौंककर हुक्का छोड़ दिया. उनकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन भँवर की आँखों की 'भावनात्मक चुप्पी' टूट चुकी थी. उसे समझ आ गया था कि जिस मर्दानगी को वह अब तक अपना कवच समझता था, वह दरअसल उसके खुद के व्यक्तित्व की बेड़ियाँ थीं.

हाड़ौती की उस तपती दोपहर में चंबल के पानी ने भले अपना रास्ता न बदला हो, लेकिन भँवर ने पीढ़ियों से लिखी जा रही अपनी 'पटकथा' फाड़ दी थी. उसे अब समझ आ गया था कि असली मर्दानगी किसी को दबाने में नहीं, बराबरी से खड़े होने में है.

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

नेह का धागा

सूरज की तपिश जब झालरापाटन के सात सहेलियों के मंदिर की प्राचीन इमारतों के बारिश में भीगे पत्थरों से टकराती है, तो हवा में एक अजीब सी सोंधी गंध फैल जाती है. नई बन रही एक सरकारी कॉलोनी में 23 साल का सलीम, बन रही दीवार के लिए बनाए गए पेड़े पर खड़ा ईंटों पर सूत बाँध रहा था. वह मनोहरथाना के निकट के एक छोटे से गाँव से यहाँ राजमिस्त्री का काम करने आया था. जबकि नीचे से 19 साल की सपना नीचे बनाए हुए मसाले को तगाती में भरकर उसे ऊपर पकड़ा रही थी.

सपना का परिवार डग कस्बे के पास के गाँव से मजदूरी के लिए यहाँ डेरा डाले हुए था. कोरी परिवार की वह दुबली-पतली लड़की, जिसके हाथों की चूड़ियाँ सीमेंट की धूल से सफेद पड़ी हुई थीं.

"सपना, हाथ थोड़ा बचा के. मसाला तेज़ है, खाल काट देगा," सलीम ने दीवार से झुककर कहा.

सपना ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछा और उसे देखकर मुस्कुरा दी. "तुझे दीवार की पड़ी है, या मेरे हाथों की? जल्दी काम निबटाओ, अभी ठेकेदार आता होगा."

उनके बीच का यह रिश्ता किसी 'डेट' या 'कॉफी' का मोहताज नहीं था. वह दोपहर की तपती धूप में एक ही पेड़ की छाँव में बैठकर आधी-आधी रोटी बाँटने और काम के बीच आँखों ही आँखों में मुस्कुरा लेने से बना था. सलीम ने सपना के लिए शहर के मेले से एक बार हरे कांच की चूड़ियाँ लाकर दी थीं, जिन्हें वह काम के वक्त अपनी ओढ़नी के नीचे छिपाकर रखती थी. दोनों के बीच नेह का एक अदृश्य धागा बनने लगा था, जिसका शायद खुद उन्हें भी अहसास नहीं था. यह धागा उनके बीच किस रिश्ते को आकार देने वाला था यह उन्हें भी पता नहीं था.

लेकिन बन रही सरकारी इमारत की अधबनी दीवारों के भी कान थे.

सलीम का 'मियां' होना और सपना का 'कोरी' होना, पास के चाय के खोखे पर बैठने वाले कुछ 'स्थानीय रक्षकों' की आँखों में खटकने लगा था. उनके लिए यह दो मज़दूरों का साथ काम करना नहीं, बल्कि 'जनसांख्यिकीय हमला' था.

एक दोपहर, जब सलीम और सपना निर्माणाधीन छत के नीचे बैठकर गुड़-रोटी खा रहे थे, तभी तीन-चार मोटर साइकिलें धूल उड़ाती हुई वहाँ रुकीं. अगुआ विक्रम था, जो इलाके में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में अक्सर 'मुद्दों' की तलाश में रहता था.

"ओए मिस्त्री! नीचे उतर!" विक्रम की आवाज़ में नफ़रत का उबाल था.

सलीम घबराकर नीचे आया. "जी भाई साब, क्या हुआ?"

"क्या हुआ? ये लड़की कौन है? इसके साथ बैठ के क्या खिचड़ी पका रहा है?" विक्रम ने पास पड़ी एक ईंट को लात मारकर गिरा दिया.

"ये सपना है भाई साब, हमारे साथ कुली का काम करती है..." सलीम की आवाज़ धीमी पड़ गई.

"नाम पता है हमें! तेरा भी और इसका भी. मनोहरथाना से यहाँ मजदूरी करने आए हो या हमारी लड़कियों को बहलाने?" भीड़ में से एक ने सपना की तरफ इशारा किया, जो सहमी हुई एक कोने में खड़ी थी.

"भाई साब, हम तो गरीब लोग हैं, काम से काम रखते हैं..." सपना ने हिम्मत जुटाकर बोलना चाहा.

"चुप रह! तुझे समझ नहीं आता ये तुझे फँसा रहा है? कल को ये तेरा धरम बदलवा देगा, तब अक्ल आएगी?" विक्रम ने चिल्लाकर पास खड़े एक लड़के से कहा, "फोटो खींच इसकी और डाल ग्रुप पे. लिख दे कि झालावाड़ में भी 'वही' खेल शुरू हो गया है."

शाम होते-होते झालावाड़ जिले के व्हाट्सएप ग्रुपों में एक फोटो वायरल हो गई. फोटो में सलीम और सपना एक साथ बैठे थे, और नीचे कैप्शन था— "जिहाद का नया ठिकाना: मज़दूरी की आड़ में शिकार."

तनाव फैल गया. सपना के पिता को डराया-धमकाया गया. उसे काम पर आने से रोक दिया गया और समाज की 'इज्जत' का वास्ता देकर घर में कैद कर दिया गया. सलीम को ठेकेदार ने उसी रात हिसाब करके भाग जाने को कह दिया— "भाई, मुझे काम करना है, दंगा नहीं करवाना. तू निकल यहाँ से."

अगली सुबह, सलीम अपना झोला उठाकर बस स्टैंड की तरफ जा रहा था. उसके झोले में अब भी वो हरे कांच की चूड़ियाँ थीं जो वह सपना को देने वाला था क्योंकि पुरानी टूट गई थीं. उसने मुड़कर उस अधूरी दीवार को देखा जिसे उसने और सपना ने मिलकर उठाया था.

वह दीवार खड़ी थी, लेकिन वह नहीं जानता था कि उस पर चिपकाया गया 'नफ़रत का पलस्तर' अब न जाने कितने बरस वहाँ से नहीं उखड़ने वाला था.

दो युवाओं की पसंद, उनकी मर्जी और उनके पेट की भूख को एक 'राजनीतिक लेबल' ने कुचल दिया था. सलीम बस में बैठ गया, और सपना अपने घर की कोठरी में बैठी उस सीमेंट की धूल को देख रही थी जो अब उसकी चूड़ियों से उतर चुकी थी, लेकिन उसकी किस्मत पर जम गई थी.

सात सहेलियों के सूर्य मंदिर के पत्थरों का रंग वैसा ही था, पर उनके निकट ही कहीं बनता नेह का वह महीन धागा टूट कर वहीं कहीं बिखरे मसाले में विलीन हो चुका था.