देहरी के पार, कड़ी - 20
प्रशांत बाबू ने पिछली रात ही प्रिया को फोन पर बता दिया था कि, “तैयार रहना, ईसीआई इंडस्ट्री का मालिक कल कोई बड़ा धमाका करने वाला है." काम पर पहुँचते ही उसने आदित्य, स्नेहा और राहुल को भी सूचना दे दी कि आज कुछ बड़ा हो सकता है, और हमें कोई नया टास्क मिल सकता है. अब वे इस बड़ी की सूचना के इन्तजार में थे.
ईसीआई फैक्ट्री के गेट पर शुक्रवार की सुबह एक अजीब सी उदासी के साथ शुरू हुई, पिकेटिंग स्थल पर मज़दूरों की गतिविधियाँ उनकी दिनचर्या बन चुकी थी. अदालती आदेश ने जो 'सौ मीटर' की लक्ष्मण रेखा खींची थी, उसके दोनों ओर मज़दूर शामियानों पर शांति से बैठे थे. दूसरे शामियाने के लिए ऑफिस का साउंड सिस्टम ले आया गया था. अब दोनों ओर से नारेबाजी, भाषण, क्रान्तिकारी गीत बारी-बारी से गूंजने लगे थे. एक ओर का स्पीकर बंद होता तो दूसरी ओर का शुरू हो जाता. कभी दोनों ओर से सवाल जवाब होने लगते.
सुबह नौ बजे फैक्ट्री में जब जनरल शिफ्ट का स्टाफ—मैनेजर, सुपरवाइजर और अकाउंट विभाग के लोग गेट के अंदर दाखिल हुए, तो मज़दूरों ने कोई नारेबाजी नहीं की. वे बस उन्हें देखते रहे. मजदूरों के मन में नौकरी खोने का कोई भय नहीं था, बल्कि एक गहरी विरक्ति थी. वे उस 'ट्रक पद्धति' से इतने तंग आ चुके थे कि उनके लिए कारखाना चालू रहना या बंद होना, दोनों ही संघर्ष के दो अलग रास्ते थे. वे महंगाई के इस दौर में केवल अपने पसीने की सही कीमत 'फेयर वेजेज' चाहते थे.
दोपहर बाद चार बजे तक माहौल सामान्य था. तभी सड़क के दक्षिणी छोर से एक डाकिया अपनी साइकिल की घंटी बजाता हुआ पिकेटिंग स्थल पर आया. उसके पास 'स्पीड पोस्ट ए.डी.' का एक भारी-भरकम पीला लिफाफा था. डाकिया अक्सर खुशियाँ लाता है, पर उस लिफाफे पर 'जनरल मैनेजर' की सील देखकर यूनियन कार्यसमिति के सदस्य सतर्क हो गए. अध्यक्ष ने हस्ताक्षर कर ए.डी. का कार्ड लौटा दिया. यूनियन कार्यसमिति के सभी सात सदस्य एक शामियाने में गोल घेरा बनाकर बैठ गए.
लिफाफा खुला और उसके साथ ही प्रबंधन का वह 'अदृश्य हमला' सबके सामने आ गया. प्रबंधन ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-O का सहारा लेते हुए राज्य सरकार को उद्योग बंद करने (Closure) के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था. आवेदन के साथ पिछले छह वर्षों की बैलेंस शीटों का एक पूरा जखीरा नत्थी किया गया था.
प्रशांत बाबू को तुरंत खबर दी गयी. वे अपने काम से जल्दी छूट कर शाम छह बजे पहुँचे. उन्होंने डाक से मिले दस्तावेजों को सरसरी तौर पर देखा. उनकी आँखों के सामने पिछले छह सालों का एक सुनियोजित 'वित्तीय प्रपंच' घूमने लगा. प्रबंधन ने आंकड़ों को बड़ी सफाई से पेश किया था, पहले दो वर्ष: मुनाफ़े को धीरे-धीरे गिरता हुआ दिखाया गया. तीसरे वर्ष एक 'मामूली लाभ' की तस्वीर पेश की गई. चौथे से छठे वर्ष तक एक खड़ी ढलान की तरह बढ़ता हुआ घाटा दिखाया गया था.
प्रशांत बाबू ने गंभीर स्वर में साथियों को समझाया, "यह आंकड़ों की बाजीगरी है. प्रबंधन ने सरकार को यह दिखाने की कोशिश की है कि यह संस्थान अब 'इकोनॉमिकली वायबल' नहीं रहा. और सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को इसपर फैसला सुनाकर उसकी सूचना इस आवेदन को देने के 60 दिनों के भीतर फैक्ट्री प्रबंधन को देनी है. अगर साठ दिन बीत गए और सरकार ने प्रबंधन को कोई जवाब नहीं दिया, तो कानूनन इसे उद्योग को बंद करने की 'डीम्ड परमिशन' मान लिया जाएगा. उसके बाद आवेदन प्रस्तुत करने से 90 दिन बाद उद्योग को बंद कर दिया जाएगा.”
यूनियन अध्यक्ष ने यह खबर मजदूरों को दी तो उनमें से कोई भयभीत नहीं हुआ. बल्कि उनके बीच से किसी ने नारा लगाया, “इंकलाब ज़िंदाबाद.” मजदूरों ने पूरी बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया.
“हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है.” यह दूसरा नारा था जिसका और जोश के साथ मजदूरों ने जवाब दिया.
नारों के बाद एक पुराने मज़दूर ने खड़े होकर अध्यक्ष के हाथ से माइक ले लिया. कहने लगा, साथियों हमें कारखाने के बंद हो जाने का कोई डर नहीं है. हम वेतन के ‘ट्रक सिस्टम’ में घुट-घुट कर मर जाने से बेहतर समझते हैं कि एक बार में ही हिसाब हो जाए. जितना ये हमें वेतन देते हैं, उससे अधिक तो हम फुटकर मजदूरी करके भी कमा लेंगे. अगर कारखाना बंद होता है तो हम इस कैद से आज़ाद हो जाएंगे.”
पुराने मजदूर के चुप होते ही मजदूरों ने फिर से नारा लगाया, “इंकलाब जिन्दाबाद.”
इस बार तमाम मजदूरों ने पहले से भी अधिक बुलंदी के साथ उसका जवाब दिया. ...
ज़्यादातर मज़दूर पुरानी वेतन पद्धति से इतने परेशान थे कि अब वे 'फेयर वेजेज' से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं थे. हाँ, कुछ युवा मज़दूर थोड़े विचलित ज़रूर थे कि अचानक काम बंद हुआ तो शहर में गुज़ारा कैसे होगा, लेकिन सामूहिक स्वर 'आर या पार' का ही था.
कार्यसमिति ने प्रशांत बाबू के साथ मिल कर तय किया कि शनिवार शाम चार बजे पिकेटिंग स्थल पर ही मज़दूरों की 'आम सभा' बुलाई जाए. उन्हें इस कानूनी आवेदन का तकनीकी सच बताना ज़रूरी था.
प्रशांत बाबू को मेवाड़ भोजनालय पहुँचने में नौ बज गए, वहाँ प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य उन्हें इन्तजार करते मिले. कारखाना बंदी का आवेदन और उसके साथ के दस्तावेजों को चारों ने देखा.
प्रिया ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "सर¡ यह घाटा पूरी तरह 'मेन्युफेक्चर' किया लग रहा है. हमें इनकी बैलेंस शीटों का एनालिसिस करना पड़ेगा. क्या हम इस आवेदन और दस्तावेजों को अपने साथ ले जा सकते हैं?”
“हाँ, बिलकुल ले जाएँ, पर हमें एनालिसिस कल दो-तीन बजे तक मिल जाए.” प्रशांत बाबू ने कहा. “पर तुम लोग अब मुझे ‘सर’ कहने से मुझे मुक्ति दो. हम एक दूसरे के साथी हैं. तुम सब मुझे ‘कॉमरेड’ कह सकते हो.”
‘बिलकुल, हम आपको अपना एनालिसिस कल दो बजे तक दे देंगे, कॉमरेड.” प्रिया ने ‘कॉमरेड’ इतना सहज तरीके से कहा था कि बाकी चारों की हँसी छूट पड़ी और ठहाके में बदल गयी.
तभी रामजी काका भी आ गए. भोजनालय के कर्मचारी उनके लिए खाना लगाने लगे.
... क्रमशः