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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

सर्जिकल स्ट्राइक

देहरी के पार, कड़ी - 36
ईसीआई फैक्ट्री के मजदूरों ने तय किया था कि मंगलवार, 30 अप्रैल, 2019 को दूसरी शिफ्ट वाले साढ़े दस बजे तक एएसएल ऑफिस पहुँच जाएंगे और शिफ्ट समय से आधे घंटे पहले वहाँ से रवाना होकर सीधे फैक्ट्री पहुँचेंगे और पहली शिफ्ट वाले फैक्ट्री से छूट कर सीधे एएसएल ऑफिस पहुँचेंगे. कुछ मजदूरों ने आज फैक्ट्री से अवकाश ले लिया था. वे एएसएल के यहाँ होने वाली आज की पूरी कार्यवाही देखना चाहते थे. सुबह ग्यारह बजे एएसएल (ASL) के इजलास में तिल रखने की जगह नहीं थी. प्रिया ने भी आज अपने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी.

कार्यवाही शुरू होते ही प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने एक प्रार्थना पत्र पेश किया. "हुज़ूर, यूनियन ने अपनी साक्ष्य में कल ही दो गवाहों के शपथ-पत्र पेश किए हैं उनके साथ कुछ दस्तावेज भी पेश किए हैं. हमें ये कल शाम साढ़े चार बजे मिले. उनके तकनीकी पहलुओं को समझने के लिए हमें समय चाहिए. जो दस्तावेज इंटरनेट से डाउनलोड करके पेश किए गए हैं, उनकी साक्ष्य में ग्राह्यता का भी प्रश्न है. इस कारण हम चाहते हैं कि कृपया सुनवाई अगले शुक्रवार तक स्थगित (Adjourn) कर दी जाए."

वकील रमेश चव्हाण, जो आज अपनी कोर्ट यूनिफॉर्म में बहुत प्रभावशाली लग रहे थे, तुरंत अपनी जगह से उठे. "सर, यह 'तकनीकी पहलू' केवल बहाना हैं. वे हमारे लिए अचंभा हो सकते थे लेकिन प्रबंधन के लिए इन्हें परखना और जाँचना मिनटों का काम है. यह शुद्ध रूप से डिले टेक्टिक्स (Delay Tactics) है. प्रबंधन का एकमात्र लक्ष्य 60 दिन की समय-सीमा को पार करना है ताकि 'डीम्ड परमिशन' का लाभ ले सकें. आज यूनियन के गवाह मौजूद हैं, इन्हें हर हालत में उनसे जिरह करनी चाहिए."

एएसएल ने घड़ी देखी और भट्ट की ओर सख्त नज़रों से देखा. "मिस्टर भट्ट, मैंने पहले ही कहा था कि यह टाइम-बाउंड मामला है. मैं सुनवाई नहीं टालूँगा. मैं जिरह के लिए दोपहर ढाई बजे तक का समय देता हूँ. यदि उस समय तक आप तैयार नहीं हुए, तो मैं जिरह का अवसर समाप्त मानकर कार्यवाही पूरी करूँगा."

दोपहर ढाई बजे तक के लिए कार्यवाही स्थगित होने की सूचना श्रमिकों को दे दी गई. जिससे दूसरी शिफ्ट वाले श्रमिक अपने काम पर चले जाएँ. कुछ ही देर में वहाँ मजदूरों की संख्या दस-बारह मात्र रह गई. लेकिन पहली शिफ्ट वाले लगभग सभी मजदूर ढाई बजे तक एएसएल के ऑफिस पहुँच गये थे और उनकी संख्या सुबह से अधिक थी.

ठीक ढाई बजे एएसएल इजलास में आ बैठे. पाँच मिनट बाद ही जिरह शुरू हो गई. प्रशांत बाबू कठघरे में थे. वकील भट्ट ने उन्हें उलझाने की कोशिश की. "क्या यह सच नहीं है कि मार्केट में मंदी के कारण आपके द्वारा बनाई गई आई.सी. (IC) का कोई खरीदार नहीं है और स्टॉक डंप पड़ा है?"

प्रशांत बाबू ने शांति से उत्तर दिया. "जी नहीं, यह कहना गलत है. सच तो यह है कि ईएसआई फैक्ट्री डिफेंस आर्म्स इंडस्ट्री के लिए 'क्रिटिकल कंपोनेंट्स' बनाती है. इन आई.सी. की मांग कभी कम नहीं होती क्योंकि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है."

वकील भट्ट हक्के-बक्के रह गए. "यह आप कैसे कह सकते हैं? आपके पास क्या सबूत है?"

चव्हाण साहब ने तुरंत प्रिया द्वारा तैयार किया गया वह 'कलर प्रिंटआउट' एएसएल की मेज पर रखा. "यह देखिए, सर, कंपनी का अपना प्रोफाइल और उनके पिछले सप्लाई ऑर्डर्स का डेटा. यह फैक्ट्री केवल निजी मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कल-पुर्जे बनाती है. इसका बंद होना 'जनहित' (Public Interest) के विरुद्ध है."

इजलास में सन्नाटा पसर गया. हर कोई समझ रहा था कि डिफेंस सप्लाई वाला तर्क एकदम सर्जिकल स्ट्राइक जैसा था. एएसएल ने उस दस्तावेज को बड़ी गंभीरता से पढ़ा. डिफेंस सप्लाई वाला यह तथ्य प्रबंधन के 'घाटे' और 'मंदी' वाले हर तर्क को काट चुका था.

प्रशांत बाबू के बाद यूनियन के सचिव शिंदे कठघरे में आए. उन्होंने अपने शपथ पत्र में बताया था कि बारह वर्ष पहले यूनियन के महंगाई के अनुसार वेतन बढ़ाने की मांग करने पर ‘ट्रक सिस्टम’ आरंभ हुआ था और कैसे वह समय के साथ अमानवीय होता गया था. उन्होंने समाप्त करने और फेयर वेजेज की मांग करने वाला मांग पत्र, हड़ताल का नोटिस, प्रबंधन द्वारा वार्ता से इन्कार करने संबंधी दस्तावेजों को प्रदर्शित किया और प्रबंधन के अड़ियल रवैये संबंधी तथ्य सामने रखे. प्रबंधन वकील भट्ट ने उनसे लंबी जिरह की जो शाम साढ़े पाँच बजे तक चलती रही. शिंदे से हुई जिरह के अंत में एएसएल ने अपनी फाइल पर दोनों पक्षों की साक्ष्य पूर्ण होने की नोटिंग की और आदेश सुनाया कि दोनों पक्ष इस मामले के कानूनी पक्ष पर जो कुछ कहना चाहते हैं उसका लिखित प्रतिवेदन दो मई दोपहर एक बजे तक प्रस्तुत कर दें. उसके उपरान्त यह एक सदस्यीय कमीशन अपनी जांच रिपोर्ट (Inquiry Report) और अनुशंसा तैयार करके सरकार के अंतिम निर्णय के लिए मंत्रालय को भेज देगा."

इस पर मजदूरों की ओर से वकील चव्हाण ने आपत्ति की, “नहीं सर, यह प्रक्रिया ठीक नहीं है. उद्योग बंद करने की अनुमति का आवेदन प्रबंधन का है. वह अपने लिखित प्रतिवेदन की प्रतिलिपि कल शाम 5 बजे तक मेरे कार्यालय पहुँचा दे. जिससे उनके तर्कों और कानूनी पक्ष पर मजदूर पक्ष भी अपनी राय दे सके. हम अगले दिन दो मई को दोपहर एक बजे तक अपने तर्क आपके कार्यालय में प्रस्तुत कर दें.”

एएसएल ने प्रबंधन वकील की ओर देखा, “मिस्टर भट्ट, आपकी क्या राय है?”

“सर, चव्हाण साहब की बात सही है, हमारे लिखित प्रतिवेदन के बाद उन्हें जवाबी लिखित प्रतिवेदन देना चाहिए. लेकिन जवाबी लिखित प्रतिवेदन के नए तथ्यों पर हमें पुनः जवाब का अवसर मिलना चाहिए. और सर, कल शाम तक अपना लिखित प्रतिवेदन तैयार करने के लिए बहुत कम समय है. हम यह दो मई को सुबह प्रस्तुत कर सकते हैं. वैसे भी कल महाराष्ट्र दिवस और मजदूर दिवस दोनों हैं. तो दोनों ही पक्ष कल सुबह व्यस्त रहेंगे.”

एएसएल समझ गए कि प्रबंधन देरी करने की जुगत में है. उन्होंने रीडर को डायरी देखकर बताने को कहा कि दो मई को कोई विशेष अपॉइंटमेंट तो नहीं है? रीडर ने बताया कि दो मई को शाम चार बजे मंत्रालय में मीटिंग है.

“ठीक है, दोनों पक्ष दो मई को सुबह 11 बजे उपस्थित हों. मैं दोनों के तर्क सुनूंगा. और मिस्टर भट्ट, आपको चव्हाण साहब की बहस का जवाब देने का उसी वक्त मौका दिया जाएगा. और यदि आप दोनों को लिखित में कुछ देना हो तो बहस के पहले उसे प्रस्तुत कर सकते हैं. दो मई को शाम तीन बजे के पहले हर हालत में कार्यवाही समाप्त कर दी जाएगी.

इजलास से बाहर निकलते वक्त मजदूरों ने 'इंकलाब' के नारे नहीं लगाए, बल्कि एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामा. प्रिया चव्हाण साहब की ओर देखकर मुस्कुराई, लेकिन प्रशांत बाबू का दिमाग अभी भी सचिवालय की ओर अटका हुआ था. वे जानते थे कि दो मई की शाम एएसएल की मेज से फाइल हटने के बाद 'मंत्रालय वाला असली चक्रव्यूह' शुरू होगा.
... क्रमशः

रविवार, 26 अप्रैल 2026

कसौटी

देहरी के पार, कड़ी - 35
शनिवार 27 अप्रैल 2019 की रात 11 बजे सीनियर एडवोकेट चव्हाण का दफ्तर एक ऑपरेशन थिएटर बना हुआ था. ईसीआई फैक्ट्री के क्लोजर की परमिशन के केस की फाइल उनकी चार गुणा आठ फुट की टेबल पर खुली पड़ी थी. चव्हाण साहब के अतिरिक्त उनका एक सहायक, प्रशांत बाबू, प्रिया, ईसीआई यूनियन का सचिव और रामजी काका मौजूद थे. रामजी काका अभी-अभी सबके लिए कॉफी बनाकर लाए थे. प्रबंधन के आवेदन और साक्ष्य का 'पोस्टमार्टम' जारी था. मेज पर औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के बेयर एक्ट की किताब खुली रखी थी. धारा 25-ओ (2) वाले पन्ने पर क्लिपर लगा हुआ था. प्रबंधन के आवेदन में फैक्ट्री के क्लोजर के कारणों को पर्याप्त और संतोषप्रद 'Adequate and Sufficient' होने की पहली कसौटी पर जाँचा जा रहा था. सभी के चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में आत्मविश्वास चमकता था.

चव्हाण साहब ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, प्रबंधन ने 'वर्किंग कैपिटल' की कमी को मुख्य कारण बताया है. क्या हमारी ऑडिट रिपोर्ट इसे ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है?"

प्रिया ने फाइल आगे बढ़ाई. "सर, उनकी बैलेंस शीट में 'देनदारियाँ' (Liabilities) कृत्रिम रूप से गुब्बारे की तरह फुलाकर पेश की गई हैं. सिंगापुर वाला ट्रांजैक्शन साबित करता है कि फंड्स की 'कमी' कृत्रिम है. वरना उद्योग संचालन के लिए उनके पास संसाधन पर्याप्त 'Adequate' हैं, बस उन्हें कहीं और दफ्न कर दिया गया है. उद्योग घाटे में नहीं बल्कि मुनाफे में है और मुनाफा भी कम नहीं है."

अगली कसौटी थी 'Good Faith' (नेक नियत). क्या उद्योग बंद करने की अनुमति का आवेदन नेक नियत से पेश किया गया है. "यहाँ हम मार करेंगे," प्रशांत बाबू ने मेज थपथपाई. "हड़ताल के पहले जिस तरह से उन्होंने मजदूरों को 'ट्रक सिस्टम' में फँसाए रखा और अब 'डीम्ड परमिशन' की ताक में बैठे हैं, यह 'Good Faith' कतई नहीं है. यह पूरी तरह से 'Mala fide' (दुर्भावनापूर्ण) है." यूनियन सचिव ने जोड़ा, "और सर, जीएम का जिरह में झूठ बोलना और 80% प्रोसेस लॉस का तकनीकी रूप से असंभव तर्क देना भी उनकी बदनीयती को साफ़ करता है."

तीसरी कसौटी थी अत्यंत अनुचित या अन्यायपूर्ण 'Grossly Unfair or Unjust'. इस पर प्रिया ने संवेदनशीलता के साथ पक्ष रखा. "सर, प्रबंधन का यूनियन की ट्रक सिस्टम को समाप्त कर फेयर वेजेज की मांग पर बिलकुल तवज्जोह नहीं देना और उन्हें हड़ताल पर जाने को विवश करना. हड़ताल पर जाने के कुछ ही दिन बाद इस कारखाने को बंद करने की अनुमति प्राप्त करने के इस आवेदन को पेश करना पूरी तरह अनुचित और अन्यायपूर्ण है. जबकि एम्पलॉइज को फेयर वेजेज देकर भी मुनाफे में चलाया जा सकता है."

“अब हमें देखना है कि एक इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने वाले कारखाने का बंद होना किस तरह सामान्य जनता के हितों 'Interest of the General Public' के विपरीत हो सकता है.” चव्हाण साहब ने प्रश्न सबके सामने रख दिया.

“सर, हमारा कारखाना डिफेंस आर्म इंडस्ट्रीज के लिए ऑर्डर पर इंटीग्रेटेड सर्किट बनाता है, उस काम में हमारी फैक्ट्री को महारत हासिल है. हमारी कंपनी का टेंडर कभी कैंसल नहीं हुआ. कई विदेशी फर्में आयीं, पर हमारे उद्योग का मुकाबला नहीं कर सकीं.” यूनियन सचिव हिमांशु शिंदे ने कहा.

उसकी बात सुनकर सबके-सब पूरी मीटिंग में अब तक बिल्कुल चुपचाप रहे शिंदे की ओर देखने लगे. कुछ पल के लिए ऑफिस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया.

फिर सबसे पहले चव्हाण साहब बोले, “मग बाबा, तुम्ही आतापर्यंत गप्प का राहिलात, मला आधी का नाही सांगितलंत?” ("तो अब तक चुप क्यों रहा मेरे बाप, पहले क्यों नहीं बताया.") उन्हें मराठी में बोलते देख रामजी काका को हँसी आ गई. वे बोल पड़े, “तुम्ही अगदी बरोबर म्हणालात चव्हाण साहेब.” (“तुमने खूब कहा चव्हाण साहब.”)

इस बार चव्हाण साहब सहित सभी हँस पड़े. फिर चव्हाण साहब कहने लगे, “वाकई यह अत्यन्त गंभीर बात है, इसे तो मुकदमे के शुरुआत में बतानी चाहिए थी. यदि पता होता तो उनके गवाह से पूछते कि ‘क्या आप डिफेंस आर्म इंडस्ट्री के ऑर्डर्स पर आई.सी. बनाते हैं?’ उनके जवाब से यह तथ्य आसानी से स्थापित हो जाता. अब हमें खुद इस तथ्य को स्थापित करना पड़ेगा. उसके लिए कुछ दस्तावेज तलाशने पड़ेंगे. मौखिक बयान की अहमियत कम होती है.”

तभी प्रिया बोल पड़ी. “डिफेंस इंडस्ट्री को आई.सी. सप्लाई करना व्यवसाय में महत्वपूर्ण तथ्य है यह जरूर कंपनी के प्रोफाइल में दर्ज होगा. मैं अभी ढूंढ निकालती हूँ. पर मुझे आपके कंप्यूटर का हैंडल चाहिए.” तभी चव्हाण साहब का सहायक विनय बोल पड़ा, “इधर कंप्यूटर पर आ जाओ दीदी, कंप्यूटर चालू है और लॉग-इन भी कर रखा है.”

प्रिया उठकर दफ्तर के कोने में रखे डेस्कटॉप पर जाकर बैठी, उसने कंपनी की प्रोफाइल तलाश की जहाँ सब कुछ मिल गया. पास ही रखे कलर प्रिंटर से उसने तुरंत प्रोफाइल का प्रिंट निकाला और उसे किसी झंडे की तरह लहराते हुए वापस टेबल की ओर आई. “ये देखिए चव्हाण सर!”

“वाह, क्या कमाल का काम किया है प्रिया तुमने. पर इस का श्रेय हमें कॉमरेड शिंदे को देना पड़ेगा कि उन्हें देर से ही सही पर ठीक वक्त पर यह सब याद आ गया. अब हम साबित कर सकते हैं कि इंडस्ट्री के क्लोजर से डिफेंस इंडस्ट्री को भी फर्क पड़ेगा और फौज के लिए जरूरी हथियारों के निर्माण में देरी हो सकती है. यह हमारा सबसे मजबूत पक्ष होगा. 350 परिवारों का सड़क पर आना केवल उन मजदूरों की हार नहीं है, बल्कि यह उस पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ढांचे और देश की सुरक्षा के लिए भी घातक है. यह 'Prejudicial to the public interest' है."

सबके बीच लंबी बहस के बाद तय हुआ कि यूनियन की साक्ष्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि 'टेक्निकल और डेटा-ड्रिवन' होगी. तय हुआ कि यूनियन की ओर से प्रशांत बाबू एक 'एक्सपर्ट विटनेस' (Expert Witness) के रूप में अपना विश्लेषण पेश करेंगे. दूसरे गवाह सचिव शिंदे होंगे. ये दोनों केवल अपनी बातें नहीं कहेंगे, बल्कि उन दस्तावेजों को साक्ष्य में लाएंगे जो साबित करेंगे कि प्रबंधन ने रिकॉर्ड्स के साथ छेड़छाड़ की है.

चव्हाण साहब ने फाइल बंद करते हुए कहा, "प्रबंधन ने अपना जाल बिछाया था, लेकिन अब हम उनके ही दस्तावेजों को उनके खिलाफ हथियार बनाएंगे. 30 अप्रैल को इजलास में हमारे गवाह 'सर्जिकल स्ट्राइक' के मोर्चे पर होंगे."
... क्रमशः

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सत्य दस्तावेज

देहरी के पार, कड़ी - 34
फोन की घंटी की आवाज से प्रिया की नींद खुली, वह उठ बैठी. देसाई साहब का फोन था. बोल रहे थे आज राइट 11 बजे ऑफिस पहुँचना है. उसकी टीम के बनाए सॉफ्टवेयर सोल्यूशन में कोई गड़बड़ी आई थी और क्लाइंट तुरंत समाधान चाहता था. क्लाइंट सही था. उसके अनेक काम रुके पड़े होंगे तो जल्दी तो करेगा. अब वह एएसएल के ऑफिस में होने वाली सुनवाई में नहीं जा सकती थी. उसने घड़ी देखी, सुबह के साढ़े नौ बजे थे. वह पाँच घंटे सो चुकी थी. फौरन तैयार होकर वह ठीक सवा दस बजे चव्हाण साहब के ऑफिस में थी. उन्हें बताया कि वह सुनवाई में साथ नहीं रह सकेगी. उसने और उसके साथियों ने रात इंटरनेट पर खोजकर जिन जरूरी दस्तावेजों के प्रिंट निकाले थे वे उन्हें सौंपे और उनकी अहमियत बतायी. वह ऑफिस में अपनी सीट पर पहुँची तो ठीक 11 बजे थे.

एएसएल (ASL) के इजलास में आज सबसे महत्वपूर्ण सुनवाई थी, प्रबंधन के लिए साक्ष्य (Evidence) पेश करने का आखिरी मौका था. फिर भी मजदूरों की उपस्थिति बहुत कम थी. फैक्ट्री चालू हो जाने से ज्यादातर मजदूर ड्यूटी पर थे. चव्हाण साहब और यूनियन चाहती थी कि आज जिरह हो और अगली पेशी यूनियन की साक्ष्य के लिए नियत हो जाए. जिससे उन्हें डिफेंस करने का पर्याप्त अवसर मिले और एएसएल समय पर अपना निर्णय प्रबंधन को कम्युनिकेट कर सके.

सवा ग्यारह बज चुके थे. यूनियन की ओर से वकील चव्हाण प्रशांत बाबू और यूनियन के अध्यक्ष-सचिव ग्यारह बजे के पहले से मौजूद थे. लेकिन नियोजक पक्ष लापता था. प्रशांत बाबू ने रीडर को कहा कि ‘आज नियोजक की साक्ष्य का अंतिम अवसर है और वह अभी तक नहीं पहुँचा है, यह डिले टेक्टिक्स है.’

तभी प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने अपने सहायकों सहित इजलास में प्रवेश किया. उन्होंने रीडर को बताया कि फैक्ट्री कई दिन बाद शुरू हुई है. काम शुरू होने में समस्या आने से जीएम साहब को देरी हो गई है. लेकिन वे बारह बजे के पहले हर हालत में पहुँच जाएंगे. रीडर ने एएसएल के चैम्बर में जाकर उन्हें सूचना दी. कुछ देर बाद वे इजलास में थे.

एएसएल ने आते ही पूछा जीएम साहब को देरी हो रही है तो आप अपने दूसरे गवाह को जिरह के लिए प्रस्तुत करें, आपके दूसरे गवाह कहाँ हैं?

“हूजूर, हमारे सभी दस्तावेज जीएम साहब प्रूव करेंगे. इस कारण और समय बचाने के लिए हमने तय किया कि हम जीएम साहब के अलावा कोई और गवाह प्रस्तुत नहीं करेंगे. और जीएम साहब 12 बजे तक अवश्य आ जाएंगे.” वकील मनोज भट्ट ने कहा.

“अब अदालत साढ़े बारह बजे बैठेगी, उस वक्त आपके गवाह हाजिर रहें, वरना आपकी साक्ष्य बंद कर दी जाएगी. आज दोपहर डेढ़ बजे मध्यान्ह अवकाश नहीं होगा और अदालत जब तक जिरह होगी बैठेगी.” इतना कहकर एएसएल साहब फिर से अपने चैम्बर में चले गए.

अब सुनवाई में समय था. चव्हाण साहब, प्रशांत बाबू और उनके साथी मध्यान्ह की चाय के लिए कैंटीन आ गए.

ठीक साढ़े बारह बजे एएसएल साहब ने इजलास में कदम रखा. अपनी सीट पर बैठते ही. आदेश दिया: मिस्टर भट्ट, आपके गवाह को कठघरे में भेजें, जिरह शुरू की जाए. जीएम साहब उठे और चुपचाप कठघरे में जा खड़े हुए. इजलास में एसी चल रहे थे, फिर भी जीएम के माथे पर पसीने की बूंदें उनकी घबराहट बयाँ कर रही थीं.

वकील मनोज भट्ट ने कार्यवाही शुरू करते हुए कहा, "हुज़ूर, जीएम साहब ने अपने शपथ-पत्र में स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी के पास कच्चा माल खरीदने के लिए भी वर्किंग कैपिटल नहीं है. बैंकों ने हाथ खींच लिए हैं. क्लोजर ही एकमात्र रास्ता है."

वकील रमेश चव्हाण मुस्कुराए और धीरे से अपनी जगह से उठे और जिरह के लिए कठघरे के नजदीक जा खड़े हुए. "हुज़ूर! प्रबंधन कह रहा है कि वे कंगाल हैं. लेकिन मेरे पास ईसीआई के पिछले तीन महीनों के डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट है." चव्हाण साहब की आवाज़ में गूँज थी.

उन्होंने जीएम की ओर रुख किया, "मिस्टर जीएम, आप पहले शपथ ले लें, कि आप यहाँ अदालत के सामने जो भी कहेंगे सच कहेंगे, सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे.”

जीएम ने शपथ ली, फिर उनकी जिरह आरंभ हुई. जीएम के शपथ पत्रों में दिए गए तथ्यों के बारे में सवाल पूछने के बाद चव्हाण साहब ने प्रिया और उसके साथियों द्वारा रात भर जागकर निकाली गई डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट अपनी मेज से उठाई. उसकी एक प्रति अदालत के सामने रखी, दूसरी वकील भट्ट को दी. तीसरी प्रति गवाह को दिखा कर सवाल पूछने लगे.

“देखिए यह आपकी कंपनी द्वारा किए गए भुगतान का सही-सही रिकार्ड है. इस रिकॉर्ड को देखिए. क्या आप यहाँ शपथ पर यह कह सकते हैं कि पिछले महीने आपकी कंपनी ने सिंगापुर की 'ईस्टर्न कंसल्टेंसी' को 2 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया? और क्या यह सच नहीं है कि उस कंसल्टेंसी कंपनी का डायरेक्टर आपकी कंपनी के एमडी का ही सगा साला है?"

अदालत में सन्नाटा छा गया. जीएम के हाथ कांपने लगे. उन्होंने पानी की बोतल की ओर देखा, पर वह खाली थी.

प्रबंधन का वकील भट्ट आगे आया और उसने स्थिति संभालने की कोशिश की, "हुज़ूर, यह कंपनी के एमडी के विरुद्ध व्यक्तिगत आरोप हैं. उनके पीछे से ऐसे आरोप पर सवाल नहीं पूछा जा सकता. हम इस सवाल का जवाब देने के लिए एमडी साहब को अगली पेशी पर पेश कर सकते हैं. इसलिए इनसे यह सवाल पूछने के बजाय दूसरे सवाल पूछ लिए जाएँ.

चव्हाण साहब तुरंत गरजे, "नहीं सर! यह नहीं हो सकता. आज प्रबंधन की गवाही के लिए अंतिम अवसर है. जो गवाह आज उपस्थित है उससे जिरह के बाद प्रबंधन की साक्ष्य बन्द होगी. यह कोई आम मुकदमा नहीं बल्कि एक उद्योग को बंद करने की परमिशन देने और न देने का मामला है, एक दम टाइम बाउंड. 60 दिनों में सरकार को अपना निर्णय देना ही नहीं, प्रबंधन को कम्युनिकेट भी करना है. प्रबंधन तो यही चाहता है कि ये दिन निकल जाएँ और वे (Deemed Permission) मानकर उद्योग को ताला लगा दें. सर, हम आज ही अपनी जिरह खत्म कर देंगे. हम न्याय की मांग करते हैं, तारीख की नहीं!"

एएसएल ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा. उनकी नज़रें सीधे वकील भट्ट से मिलीं. "देखिए, मिस्टर भट्ट, मैनेजमेंट ने इस अदालत का वक्त बर्बाद किया है. 80% प्रोसेस लॉस का तर्क और यह सिंगापुर ट्रांजैक्शन—'मेलाफाइड इंटेंशन' (Mala fide intention) साफ दिखाई देता है. यदि गवाह जवाब नहीं देना चाहता है तो मैं समझूंगा कि पूछा गया तथ्य सही है.”

“नहीं हुजूर, जिरह जारी रखिए.” मनोज भट्ट ने कहा और अपनी सीट पर बैठ गया. आगे की जिरह में जीएम ने दो करोड़ के ट्रांजैक्शन को ही नहीं पूरी ‘डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट रिपोर्ट’ को सही स्वीकार कर लिया.

एएसएल ने प्रबंधन साक्ष्य बंद (Close) करके आदेश दिया, "यूनियन अपनी साक्ष्य के शपथ पत्र सोमवार तक हर हालत में पेश करे. अगले मंगलवार 30 अप्रैल 2019 को सुबह 11 बजे यूनियन अपने गवाह हाजिर रखे और प्रबंधन उनसे जिरह के लिए तैयार रहे.

इजलास से बाहर निकलने के बाद आज मजदूरों ने 'इंकलाब-जिन्दाबाद' के नारे नहीं लगाए, बल्कि एक-दूसरे की आँखों में देखा. आज पहली बार उन्हें लगा कि कानून की देवी केवल अंधी नहीं है, वह सच देख भी सकती है.
... क्रमशः

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

साजिश

देहरी के पार, कड़ी - 33
प्रिया ने अपना कोड पूरा करके सिस्टम में छोड़ा. जब तक वह कंपाइल हो, उसके पास कुछ मिनटों की फुरसत थी. उसने अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़कर सिर के पीछे रखा और पेट व सीने को एक बार पूरी ताकत से आगे की ओर खींचकर छोड़ दिया. इससे उसके शरीर की अकड़न कुछ दूर हुई. उसने अपने वातानुकूलित ऑफिस की खिड़की से बाहर देखा. नीचे मुंबई की सड़क पर ट्रैफिक हमेशा की तरह दौड़ रहा था, लेकिन उसे लगा कि उसके भीतर कुछ अटक रहा है. उसके लैपटॉप की स्क्रीन पर कोड की पंक्तियाँ तैर रही थीं, पर उसका दिमाग उन 350 परिवारों के भविष्य के बीच उलझा था.

पिछले कुछ महीनों में वह गहरी 'लर्निंग और अनलर्निंग' से गुजरी थी. एक आईटी इंजीनियर होने के दौरान उसकी मध्यवर्गीय कंडीशनिंग ने उसे सिखाया था कि सफलता का मतलब व्यक्तिगत सुरक्षा और ऊँचा पैकेज है. लेकिन विक्रांत की उत्पन्न की गई परेशानियों से निपटने के दौरान रामजी काका, प्रशांत बाबू और IIDEA के उनके साथियों की अनकंडीशनल मदद ने उसे बहुत कुछ सिखाया था. उसके बाद ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष में बिताए वक्त ने उसकी कंडीशनिंग के खोल को तोड़ दिया था. वह समझ गई थी कि चाहे वह हाई-टेक सॉफ्टवेयर लिख रही हो या कोई मजदूर क्लीन-रूम में सर्किट बोर्ड जोड़ रहा हो या फिर किसी रेडीमेड क्लॉथ इंडस्ट्री में कपड़े सिल रहा हो—पूँजी की नज़र में वे सभी एक जैसे हैं. इन सबको मौजूदा खिचड़ी व्यवस्था 'डिस्पोजेबल' समझती है.

शाम साढ़े सात बजे अपने ऑफिस से छूटकर वह खुद को IIDEA के जाने से नहीं रोक सकी. वहाँ का माहौल किसी युद्ध-स्तर की तैयारी जैसा था. हड़ताल खत्म हो चुकी थी, लेकिन जीत का उत्साह पूरी तरह नदारद था. प्रशांत बाबू एक फाइल पर उंगलियाँ फेरते हुए गंभीर सोच में डूबे थे. वह चुपचाप प्रशांत बाबू के निकट जाकर खड़ी हो गई. जब उन्हें प्रिया के आने का अहसास हुआ तो उसे पास की कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए बोल पड़े.

"बैठो प्रिया, हड़ताल खत्म हो गयी है, मजदूरों को हड़ताल अवधि का वेतन एडवांस रूप में भी मिल गया है, वे फिर से काम पर हैं. फैक्ट्री को बंद करने की अनुमति के आवेदन की सुनवाई में प्रबंधन पूरी तरह नंगा हो गया है. फिर भी मजदूरों के हाथ में जो वेतन वही ट्रक सिस्टम वाला है जिससे छुटकारा पाने और फेयर वेजेज प्राप्त करने के लिए उन्होंने लड़ाई शुरू की थी.”


“लेकिन उसे तो अब ट्रिबुनल तय करेगा, वह भी तीन महीनों में.” प्रिया ने कहा.

“ट्रिबुनल और लेबर कोर्ट पर मजदूरों को अधिक विश्वास नहीं वे पिछले अनेक वर्षों के अपने अनुभवों से जानते हैं कि अदालतें भी मजदूरों को और प्रबंधन को समान पलड़ों में तौलने लगी हैं, जबकि मजदूर विक्टिम है. सामाजिक न्याय का सिद्धांत पता नहीं कहाँ हवा हो चुका है. उधर क्लोजर वाले मामले में प्रबंधन ने हथियार नहीं डाले हैं, बस मोर्चा बदला है,"

“अब कोई नई सूचना मिली है क्या आपको?” प्रिया ने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा.”

"हमें खबर है कि प्रबंधन 'डीम्ड परमिशन' (Deemed Permission) का खेल खेलने की कोशिश में है. कानून कहता है कि यदि क्लोजर का आवेदन पेश होने से 60 दिनों के भीतर एएसएल आवेदन पर अपना निर्णय प्रबंधन को कम्युनिकेट नहीं करते हैं उसे स्वतः स्वीकृत मान लिया जाएगा. एएसएल को अचानक किसी 'इमरजेंसी' सरकारी ट्रेनिंग या मीटिंग में उलझाने की तैयारी है ताकि आदेश में देरी हो और उसका कम्युनिकेशन बाधित हो जाए और समय सीमा पार हो जाए."

"यह तो सरासर जालसाजी होगी!" प्रिया के भीतर की मध्यवर्गीय नैतिकता चीख उठी.

"यही पूँजी का असली चरित्र है प्रिया. वह कम मुनाफे से अधिक मुनाफे की ओर बहती है. जहाँ फैक्ट्री खड़ी है, उस जमीन की रियल एस्टेट वैल्यू बुक वैल्यू से सात गुना ज्यादा है. वे जमीन बेचकर मॉल और ऊँची बहुमंजिला इमारतें खड़ी करना चाहते हैं, मजदूरों के भविष्य की बलि देकर."

प्रिया ने महसूस किया कि अब एक्शन का वक्त है. "हमारे पास कितना समय है?"

"कल 26 अप्रैल है. प्रबंधन का आखिरी अवसर. हमें कल ही उनसे जिरह समाप्त करनी होगी. जिसके कारण हम अपनी साक्ष्य के लिए समय निकालें और एएसएल को अपना निर्णय लिखने और उसे कम्युनिकेट करने के लिए कम से कम दस दिनों का समय मिले. तुम्हारी टीम आज जितना सच खोज सकेगी, वही कल काम आएगा.”

प्रिया ने वहीं से राहुल को फोन किया कि ‘वह घर पहुँच रही है, प्रशांत बाबू चाहते हैं कि प्रबंधन के गवाहों से कल ही जिरह खत्म हो. हमें आज रात ही उन 'लायबिलिटीज' का सच तलाशना होगा जो प्रबंधन ने अपने अंतिम शपथ-पत्र में दी हैं. तुम स्नेहा और राहुल को भी कहो कि हमें काम में जुटना है.’

फोन करने के बाद वह प्रशांत बाबू की ओर मुखातिब हो बोली, “मैं घर पहुँच कर अपनी टीम के साथ काम पर जुटती हूँ.”

“बिलकुल, मैं चव्हाण साहब से फोन करके उन्हें सारी स्थिति बताता हूँ जिससे वे कल की तैयारी कर सकें.”

सुबह के चार बज रहे थे. प्रिया की आँखें लाल थीं, पर दिमाग साफ था. उसकी टीम ने वह 'चक्रव्यूह' ढूंढ निकाला था जिससे सरकार और प्रबंधन की जुगलबंदी को काटा जा सकता था. वह अब केवल एक मददगार इंजीनियर नहीं रह गयी थी; वह एक ऐसी सिपाही थी जिसने अपनी मध्यवर्गीय देहरी लांघकर मेहनतकश वर्ग के संघर्ष की असली जमीन पर लड़ने के लिए तैयार कर लिया था. उसकी टीम भी उसके साथ थी.

कल 26 अप्रैल थी. आखिरी मोर्चा. प्रिया ने डायरी में लिखा— "पूँजी के पास पैसा है, पर हमारे पास भी डेटा का सच है. अब देखते हैं चक्रव्यूह कौन तोड़ता है."
... क्रमशः

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

चक्रव्यूह में दरार

देहरी के पार, कड़ी - 32
ईसीआई फैक्ट्री के गेट से 100 मीटर परे पिकेटिंग के लिए लगाया गया शामियाना आखिर 44वें दिन हटा लिया गया. अगले दिन 23 अप्रैल को हड़ताल के दिनों का वेतन मजदूरों-कर्मचारियों के बैंक खातों में आने वाला था और 24 अप्रैल को उन्हें ड्यूटी पर उपस्थित होना था.

23 अप्रैल को ही क्लोजर की परमिशन के मुकदमे में एएसएल के यहाँ सुनवाई होनी थी. इतनी सारी घटनाओं के बाद इस सुनवाई में मजदूरों-कर्मचारियों की रुचि बढ़ गई थी. उनमें से हर कोई इस सुनवाई में हाजिर रहना चाहता था. सुबह साढ़े दस बजे ही एएसएल के दफ्तर के बाहर मजदूरों का हुजूम इकट्ठा हो गया. इतने लोगों के लिए न इजलास में जगह थी और न ही बाहर के गलियारों और दफ्तर के दालान में. धूप बहुत तेज थी और बाहर सड़क किनारे छाँह का कोई नामोनिशान नहीं. पौने ग्यारह बजे जब यूनियन के अध्यक्ष-सचिव, प्रशांत बाबू के साथ वहाँ पहुँचे तो इस विकट स्थिति को देखते हुए तुरन्त एएसएल से संपर्क किया और उनकी अनुमति लेकर दफ्तर के बाहर दिन भर के लिए शामियाना लगाने और पीने के पानी की व्यवस्था करवाई.

इसी वजह से आज एएसएल (Assistant Secretary Labour) के यहाँ कार्रवाई शुरू होने में एक घंटे की देरी हुई. हड़ताल खत्म हो जाने और फेयर वेजेज का मामला अब औद्योगिक न्यायाधिकरण के पास चले जाने से प्रबंधन दबाव मुक्त था. उनकी टीम के चेहरों पर एक कुटिल 'विजेता' वाली मुस्कान थी. वकील मनोज भट्ट आज बहुत आत्मविश्वास में दिखाई दे रहे थे.

एएसएल ने ठीक 12 बजे इजलास में प्रवेश किया. प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने खड़े होकर बोलना आरंभ किया, "हुज़ूर, जैसा कि आप जानते हैं, सरकार ने हड़ताल और तालाबंदी पर पाबंदी लगा दी है. हमारे क्लाइंट ने बड़ा दिल दिखाते हुए मजदूरों को हड़ताल अवधि का 'एडवांस वेतन' देना भी स्वीकार कर लिया है. दोपहर तक सभी मजदूरों-कर्मचारियों के खातों में यह राशि पहुँच जाएगी. अब जबकि फेयर वेजेज का विवाद ट्रिबुनल को रेफर हो चुका है और औद्योगिक शांति बहाल हो रही है, तो इस क्लोजर परमिशन को भी 'मानवीय आधार' पर देखा जाना चाहिए. हम फैक्ट्री चलाना चाहते हैं, लेकिन हमारे पास संसाधन नहीं हैं."

एएसएल ने अपनी फाइल पलटते हुए स्वर में पूछा, "मिस्टर भट्ट, संसाधन से आपका क्या तात्पर्य है? जरा समझाइए.”

“सर, मेरा कहना था कि पिछली आर्थिक हानियों के कारण कंपनी के एसेट्स के मुकाबले लाएबिलिटीज बहुत अधिक हैं. बैंकों के कर्जे ओवरड्यू हो चुके हैं. यह बकाया हमें तुरंत चुकाना है. जिसके कारण कुछ महीनों बाद कंपनी की स्थिति अपने एम्पलॉइज को वेतन चुकाने तक की नहीं रहेगी. हम चाहते हैं उसके पहले ही हमें उद्योग बंद कर देने की अनुमति दी जाए. जिससे हम अपने एम्पलॉइज को कानूनी रूप से देय राशियाँ दे सकें और वे अन्यत्र रोजगार तलाश सकें. यदि क्लोजर की अनुमति नहीं दी गयी तो फाइनेंशियल इन्स्टीट्यूशन हमें लिक्विडेशन में जाने को बाध्य कर देंगे.”

“वकील साहब, आप जो कुछ कह रहे हैं उसे आपको साक्ष्य से साबित करना होगा. केवल कहने से काम नहीं चलेगा. फिलहाल आप ये बताइए कि पिछली सुनवाई में आपसे कुछ विशिष्ट विसंगतियों पर स्पष्टीकरण मांगा गया था. क्या वे तैयार हैं?"

वकील रमेश चव्हाण तुरंत अपनी जगह से खड़े हुए. "सर! प्रबंधन 'मानवीय आधार' का मुखौटा पहनकर अदालत को गुमराह करना चाहता है. एडवांस वेतन देना उनकी महानता नहीं, बल्कि धारा 25-यू के आपराधिक मुकदमे से बचने की विवशता है. और जहाँ तक विसंगतियों की बात है..."

चव्हाण साहब ने प्रिया की ओर इशारा किया. प्रिया ने तुरंत तीन नई फाइलें एएसएल के रीडर को सौंपीं.

"हुज़ूर, प्रबंधन ने सोमवार को जो दस्तावेज इस अदालत में प्रस्तुत किए हैं, वे 'साइफनिंग' के आरोपों को झुठलाने के बजाय उन्हें पुख्ता करते हैं. इन्होंने मार्च के स्टॉक रजिस्टर में जो 5,000 वेफर्स गायब दिखाए थे, उन्हें अब 'प्रोसेस लॉस' (प्रक्रियात्मक हानि) बताया गया है. लेकिन हुज़ूर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट निर्माण में 80% का प्रोसेस लॉस असंभव है! यह नहीं हो सकता कि आप मनमाने लॉस बता दें. लॉसेस की भी कोई सीमा है, कारखाने और गोदाम में आग तो लगी नहीं थी. यह साफ़ तौर पर हेराफेरी है."

प्रिया ने अपनी डायरी से एक और बिंदु वकील साहब को धीरे से बताया. चव्हाण साहब मुस्कुराए और बोले, "एक और बात हुज़ूर. प्रबंधन ने दावा किया है कि उनके पास वर्किंग कैपिटल नहीं है. लेकिन कल ही इन्होंने 350 मजदूरों को एडवांस वेतन देने के लिए करीब 50 लाख रुपये का प्रावधान किया है. यदि पैसा नहीं था, तो यह अचानक कहाँ से आया? क्या यह वही पैसा नहीं है जिसे 'शेल कंपनियों' में डाइवर्ट किया गया था और अब जब फँसने का मौका आया तो उसे वापस लाया जा रहा है?"

एएसएल ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, "मैनेजमेंट का यह तर्क कि 'सब सामान्य हो रहा है', क्लोजर के आवेदन को वैध नहीं बनाता. यदि उत्पादन की क्षमता और कच्चा माल मौजूद था, तो क्लोजर का आवेदन 'दुर्भावनापूर्ण' (Mala fide) माना जाएगा. मिस्टर भट्ट आज आपके जीएम दिखाई नहीं दे रहे हैं. आज उनसे शेष जिरह होनी थी. क्या उनके सिवा आपके अन्य गवाह आज हाजिर हैं?”

“हुजूर, प्रबंधन का कल का पूरा दिन सेक्रेटेरिएट में बीता. शाम चार बजे बाद सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया. उस आदेश की पालना आज ही करनी है. जीएम साहब आज उसी व्यवस्था में लगे हैं. दूसरे दोनों गवाह भी मजदूरों के हड़ताल अवधि का वेतन बनाने और उसे उनके खातों तक पहुँचाने में व्यस्त हैं. इस कारण प्रबंधन आज अपनी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकेगा. हम अगली पेशी पर सभी गवाहों को हाजिर रखेंगे. हम चाहते हैं इस मामले का निर्णय हर हालत में 14 मई के पहले हो जाए.” वकील भट्ट ने अपनी सफाई पेश की.

“देखिए मैं आपको साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए अंतिम अवसर दे रहा हूँ. आप को 26 अप्रैल को सुबह 11 बजे के पहले अपने सभी गवाह हाजिर रखने हैं, वरना उस दिन आपकी साक्ष्य समाप्त कर यूनियन की साक्ष्य आरंभ कर दूंगा. मिस्टर चव्हाण आप उस दिन आप अपने गवाह और उनके शपथ पत्र तैयार रखिए.”

“जी, हम तैयार रहेंगे.” वकील चव्हाण ने कहा.

इजलास से बाहर निकलते समय प्रिया ने देखा कि मनोज भट्ट और एजीएम के बीच तीखी बहस हो रही थी. प्रशांत बाबू ने प्रिया के कंधे पर हाथ रखा, "प्रिया, तुमने सही पकड़ा था. एडवांस वेतन का दांव उन्हीं पर उल्टा पड़ गया. अब उनके पास छिपाने के लिए जगह नहीं बची है."

प्रिया ने आसमान की ओर देखा. 'चक्रव्यूह' अभी टूटा नहीं था, लेकिन उसकी दीवार में पहली दरार साफ़ दिखाई दे रही थी.
... क्रमशः

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

चक्रव्यूह

देहरी के पार, कड़ी - 31
क्लोजर परमिशन के मामले में 19 अप्रैल को हुई जिरह के बाद ईसीआई प्रबंधन बुरी तरह हड़बड़ा गया था. एएसएल के सामने सुनवाई के दौरान 'Siphoning' और 'बिजली खपत' का जो कच्चा चिट्ठा खुला था, उसने प्रबंधन के अहंकार को हिलाकर रख दिया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसका संकट केवल क्लोजर की परमिशन का आवेदन निरस्त हो जाने की संभावना तक सीमित नहीं था. मुख्य श्रम आयुक्त (CLC) के दफ्तर ने भी उसके सिर पर तलवार लटका रखी थी.

दस साल पहले जब मजदूरों ने वेतन बढ़ोतरी की मांग की थी, तब प्रबंधन ने यूनियन के साथ समझौता कर ट्रक सिस्टम लागू किया तभी उसने यूनियन को मान्यता दे दी थी. हर साल उसी के साथ वह बोनस का समझौता करता था. उसी मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियन के साथ लगातार तीन वार्ताओं में उपस्थित न होने को सीएलसी ने सामूहिक सौदेबाजी की उपेक्षा मानते हुए 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट' की पाँचवीं अनुसूची के भाग प्रथम के आइटम नं. 15 में अनुचित श्रम आचरण मान लिया था और धारा 25-यू में अपराधिक मुकदमा चलाए जाने के लिए प्रबंधन को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था.

कंपनी का कोई भी निदेशक नहीं चाहता था कि उनमें से किसी पर भी कोई अपराधिक मुकदमा चले. निदेशक मंडल की मीटिंग में कंपनी के लीगल मैनेजर मिस्टर दास को बहुत हड़काया गया था कि आपके रहते हुए यह स्थिति कैसे पैदा हुई? मीटिंग के दौरान ही कंपनी के वकील मनोज भट्ट से बात की गई तो उन्होंने पल्ला झाड़ लिया कि उनसे इस मामले में कोई सलाह नहीं ली गई. अब दोनों को जिम्मेदारी दी गयी थी कि किसी भी स्थिति में अपराधिक मुकदमा किसी निदेशक के विरुद्ध नहीं चलना चाहिए.

मुख्य श्रम आयुक्त ने समझौता वार्ता को असफल घोषित कर राज्य सरकार को जो गोपनीय रिपोर्ट भेजी थी, वह और भी घातक थी. उन्होंने स्पष्ट सिफारिश की थी कि वेतन वृद्धि और बोनस के विवाद को तुरंत 'एडजुडिकेशन' (न्याय-निर्णयन) के लिए लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण को प्रेषित कर दिया जाए और उद्योग में मौजूदा हड़ताल व तालाबंदी पर धारा 10 (3) के अंतर्गत तत्काल पाबंदी लगा दी जाए. यदि सरकार इस सिफारिश को मान लेती—जिसकी पूरी संभावना थी—तो प्रबंधन के पास मजदूरों को बाहर रखने का कोई विधिक बहाना नहीं था.

मामला राज्य सचिवालय तक पहुँच चुका था. प्रबंधन के प्रतिनिधि के रूप में फैक्ट्री जीएम मिस्टर सरकार, सोमवार 22 अप्रैल को लीगल मैनेजर मिस्टर दास और वकील मनोज भट्ट सुबह ठीक साढ़े दस बजे सेक्रेट्रिएट में थे. उन्होंने जैसे-तैसे श्रम मंत्री के निजी सचिव को प्रसन्न कर मंत्री जी से मुलाकात कराने का जुगाड़ किया. मंत्री जी ने उनसे मिलने के पहले श्रम सचिव को बुलाकर मंत्रणा की. उसके बाद ही प्रबंधन प्रतिनिधियों को भीतर बुलाया गया. माहौल में भारी तनाव था. श्रम सचिव ने मेज पर एक फाइल पटकते हुए कड़े लहजे में कहा, "मिस्टर भट्ट, आपकी कंपनी केवल कानून ही नहीं तोड़ रही, बल्कि सरकार की छवि भी खराब कर रही है. हड़ताल को 44 दिन हो चुके हैं. 350 परिवार सड़कों पर हैं और आपकी बैलेंस शीट में जो गड़बड़ियाँ सामने आई हैं, वे आपराधिक जांच का विषय बन सकती हैं."

प्रबंधन के पास अब सौदेबाजी की कोई ताकत नहीं बची थी. अंततः एक 'बीच का रास्ता' (Interim Arrangement) प्रस्तावित किया गया. श्रम सचिव ने दो टूक शब्दों में कहा, "सरकार मजदूरों के वेतन में वृद्धि का मामला औद्योगिक न्यायाधिकरण को एडजुडिकेशन के लिए संप्रेषित करने और उसके साथ ही हड़ताल व तालाबंदी पर पाबंदी का आदेश जारी करने की सोच रही है. लेकिन मजदूर तब तक काम पर नहीं लौटेंगे जब तक उनके हाथ में कुछ पैसा न हो. आपको हड़ताल की अवधि का वेतन 'एडवांस' के रूप में मजदूरों के बैंक खाते में हस्तांतरित करना पड़ेगा. यह वेतन मजदूरों के खातों में जाने के अगले दिन वे काम पर लौटेंगे. मजदूरों की हड़ताल वैध थी या अवैध और वे हड़ताल अवधि के वेतन के हकदार हैं या नहीं—यह प्रश्न भी वेतन वृद्धि के विवाद के साथ न्यायाधिकरण को प्रेषित किया जाएगा. जिसमें न्यायाधिकरण तीन महीने में अपना फैसला देगा."

आपराधिक मुकदमे में जेल जाने और क्लोजर के मामले में अपनी किरकिरी से बचने के लिए प्रबंधन ने कांपते हाथों सरकार के प्रस्ताव पर सहमति दे दी. अपरान्ह चार बजे सरकार ने औद्योगिक न्यायाधिकरण को रेफ्रेंस करने, हड़ताल-तालाबंदी पर पाबंदी का नोटिफिकेशन जारी कर दिया. इसके साथ ही यह आदेश पृथक से जारी किया कि हड़ताल अवधि के वेतन की राशि के बराबर राशि नियोजक एडवांस के रूप में मजदूरों के बैंक खाते में ट्रांसफर करेगी. अगले दिन से मजदूर काम पर लौट आएंगे. पाँच बजे के रेडियो और टीवी समाचारों में यह खबर सरकार की महत्वपूर्ण कार्यवाही के रूप में प्रसारित हुई.

प्रशांत बाबू ने यह खबर (IIDEA) ऑफिस में सुनी. सारा माहौल बदल गया था. उन्होंने वकील रमेश चव्हाण से फोन पर परामर्श किया. तय हुआ की तुरन्त फैक्ट्री गेट पहुँचा जाए. दोनों ने वहाँ ईसीआई एम्पलॉइज यूनियन की कार्यसमिति के उपस्थित सदस्यों के साथ मीटिंग की और आगे की रणनीति पर विचार किया. खबर मजदूरों तक कानोंकान पहुँच चुकी थी और वे पिकेटिंग स्थल पहुँच रहे थे. कार्यसमिति की मीटिंग चल ही रही थी कि श्रम मंत्रालय का एक क्लर्क विभागीय कार से वहाँ पहुँचा नोटिफिकेशन की एक प्रति यूनियन अध्यक्ष को थमा दी. हड़ताल प्रतिबंधित की जा चुकी थी. उसे तुरंत समाप्त करना आवश्यक हो चुका था. पिकेटिंग स्थल पर कारखाने के तीन चौथाई से अधिक मजदूर इकट्ठा हो चुके थे. रामजी को मेवाड़ भोजनालय पर यह समाचार मिला तो वे भी पहुँच गए. मीटिंग में तुरन्त आमसभा कर हड़ताल को समाप्त करने की घोषणा करना तय हुआ. उधर श्रम मंत्रालय का क्लर्क नोटिफिकेशन की एक प्रति फैक्ट्री में भी दे कर जा चुका था.

उपस्थित मजदूरों की आमसभा शुरू हुई. प्रशांत बाबू ने आमसभा में बोलते हुए बताया, “साथियों, हमारे संघर्ष के सामने सरकार और फैक्ट्री मालिकों को मजबूर होना पड़ा. उन्होंने हड़ताल और तालाबंदी दोनों पर पाबंदी लगा दी. इसलिए हड़ताल खत्म कर मजदूरों को काम पर जाना होगा. लेकिन उसके पहले हड़ताल की अवधि का वेतन मजदूरों के बैंक खातों में होगा. वेतन कितना और कब से बढ़ेगा, इसका फैसला अब औद्योगिक न्यायाधिकरण करेगा और तीन माह में निर्णय लेगा. ‘फेयर वेजेज’ की हमारी लड़ाई थमी नहीं है. यह अदालत में चली गई है. हम वहाँ भी पूरी मुस्तैदी से लड़ेंगे. अभी क्लोजर की तलवार हम पर लटकी हुई है. कल मंगलवार को फिर सुनवाई है. प्रबंधन का आवेदन निरस्त हो इसकी पूरी कोशिश है. लेकिन अभी हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि आगे क्या होगा.”

प्रशांत बाबू बोल ही रहे थे कि किसी ने उनके पास जाकर उनके कान में कुछ कहा. उसके बाद उन्होंने अपना भाषण जारी रखा. “फैक्ट्री प्रबंधन ने फैक्ट्री गेट नोटिस लगाया है कि’ वह हड़ताल अवधि का वेतन कल दोपहर तक सभी कर्मचारियों के बैंक खातों में हस्तांतरित कर देगा.’ कर्मचारियों को परसों की पहली शिफ्ट से ड्यूटी पर उपस्थित होने का आदेश दिया है.’ सभी मजदूर परसों ड्यूटी पर जाएंगे. कल ज्यादा से ज्यादा लोग एएसएल के दफ्तर में सुनवाई के वक्त पहुँचें. वहाँ मजदूरों की उपस्थिति हमारे मामले को मजबूत करती है. हम अगले शनिवार कार्यकारिणी की मीटिंग में आगे की रणनीति पर विचार करेंगे फिर अगले रविवार को आमसभा में आप सबसे विचार विमर्श करके आगे का निर्णय लेंगे.”

प्रिया, को यह समाचार अपने ऑफिस में मिला. उसने दूसरे साथियों को भी बताया. साढ़े सात बजे अपना काम पूरा कर ऑफिस से निकलने के पहले प्रिया ने प्रशांत बाबू से फोन पर बात की. पता लगा कि पिकेटिंग समाप्त कर दी गई है. अब वे और रामजी काका आठ बजे तक मेवाड़ भोजनालय पहुँचेंगे. प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य चारों मेवाड़ भोजनालय पहुँचे तब तक दोनों वहाँ पहुँच चुके थे. प्रशांत बाबू ने उन्हें विस्तार से सारी स्थिति बताई.

प्रिया ने सब कुछ गंभीरता से सुना. उसने महसूस किया कि यह जीत विधिक से ज्यादा रणनीतिक है. उसने प्रशांत बाबू से पूछा, "क्या यह एडवांस वेतन देना उनकी कोई नई चाल तो नहीं? क्या वे इसके जरिए क्लोजर वाले मामले को कमजोर करना चाहते हैं और फैक्ट्री मालिकों और सरकार के बीच की जुगलबंदी कोई चक्रव्यूह न रच रही हो?"

प्रशांत बाबू उसका सवाल सुन कर मुस्कुराए, “तुम बहुत होशियार हो, एकदम सही बिन्दु पर पहुँच जाती हो प्रिया. वे एएसएल के सामने कल यह कह सकते हैं कि 'देखिए, हमने तो मजदूरों को एडवांस दे दिया है, हम उनके भले की सोच रहे हैं, लेकिन घाटे के कारण अब हम चला नहीं सकते'. वे अपनी छवि सुधारने की कोशिश करेंगे. लेकिन हम कल उन्हें इस जाल में नहीं फंसने देंगे. कल हमें यह साबित करना ही होगा कि क्लोजर का आवेदन केवल एक ढोंग है."
... क्रमशः

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

कटघरे में झूठ

देहरी के पार, कड़ी - 30
19 अप्रैल, 2019 शुक्रवार.

असिस्टेंट सैक्रेटरी लेबर (ASL) के कार्यालय का सुनवाई वाला इजलास आज छोटा लग रहा था. आगे की दो बैंचों को छोड़कर बाकी सभी पर मजदूर बैठे थे. यहाँ तक कि इजलास की बैंचों के दाएँ, बाएँ और पीछे की ओर जो तीन-तीन फुट के करीब स्थान था उसमें भी मजदूर खड़े थे. इजलास के बाहर की गैलरी और उसके आगे जो खुली जगह थी वहाँ सभी ओर मजदूर ही मजदूर थे. आगे दो बैंचों में से दायीं ओर की बैंचों पर प्रबंधन के गवाह, फैक्ट्री का लीगल मैनेजर, वकील मनोज भट्ट और उसके दो सहायक थे. बायीं और की बैंचों पर वकील रमेश चव्हाण, एक सहायक और दूसरे सहायक के रूप में प्रिया अपने वकील वाले आउट फिट में, , प्रशांत बाबू और यूनियन के अध्यक्ष, सचिव बैठे थे. वकील रमेश चव्हाण अपनी फाइलों के साथ जिरह के लिए एकदम तैयार थे. प्रिया का दिल आज एक अलग ही लय में धड़क रहा था. यह डर नहीं, बल्कि उस सच को बाहर लाने का रोमांच था जिसे उसने दस्तावेजों के ढेर से खोद निकाला था. इजलास में उपस्थित लोगों की आपसी बातचीत से हॉल में मधुमक्खियों के झुंड जैसी आवाज गूंज रही थी.

एएसएल ने कमरे में प्रवेश करते ही यह आवाजों की गूंज थम गई. एएसएल कुर्सी पर बैठे, कार्यवाही शुरू हुई. “मिस्टर भट्ट आपके गवाह तैयार हैं.” एएसएल ने पूछा.

“हाँ बिलकुल तैयार हैं.” मिस्टर भट्ट ने कहा, और फैक्ट्री के जनरल मैनेजर (GM) को इशारा किया वह कटघरे में आकर खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर वही पुराना आत्मविश्वास था, जो फैक्ट्री में और पिछली कई सुनवाइयों से मजदूरों को डराने के काम आता रहा था.

वकील चव्हाण ने जिरह शुरू की. शुरुआती सवाल सामान्य थे, जैसे प्रबंधन को ढीला छोड़ने की रणनीति हो. उन्होंने इन सवालों के जवाबों से यह स्थापित कर लिया कि फैक्ट्री में सिलिकॉन वेफर्स कच्चे माल के रूप में काम में लिए जाते हैं. और कारखाने के कामों में जो भी काम किए जाते हैं उनके लिए ऊर्जा का एकमात्र स्रोत बिजली है. यहाँ तक कि बिजली चले जाने जैसी आपात स्थितियों के लिए कारखानों में दो डीजल जनरेटर स्थापित हैं जो काम कर रहे हैं.

अचानक चव्हाण साहब ने एसीएल से उनकी केस फाइल ली और उसमें से गवाह का शपथ-पत्र निकाल कर पूछा, "मिस्टर जीएम, यह आपका शपथ पत्र है आपने इसके पैरा 4 में कहा है कि पिछले तीन महीनों से कच्चा माल, विशेषकर सिलिकॉन वेफर्स की वैश्विक कमी के कारण उत्पादन पूरी तरह ठप है. क्या यह सही है?"

जीएम ने गला साफ किया, "जी, बिल्कुल सही है. माल ही नहीं था तो फैक्ट्री में उत्पादन कैसे होता?"

चव्हाण साहब ने एक ग्राफ एएसएल की मेज पर रखा, "देखिए मिस्टर जीएम यह दस्तावेज आपके उद्योग के स्टॉक का ही ग्राफ है?”

“जी हाँ, यह हमारे ही स्टॉक का ग्राफ है.”

“इस ग्राफ में मार्च 2019 के क्लोजिंग स्टॉक में सिलिकॉन वेफर्स की 5,000 यूनिट्स का बैलेंस दिख रहा है, उसका क्या हुआ? क्या वह हवा में गायब हो गया?”

सवाल सुन कर जीएम के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आई, गला सूख गया, हालाँकि एसीएल का इजलास पूरा एयरकंडीशंड था. उसने जेब से रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा और अपने सहायक को इशारा किया कि उसे पानी लाकर दे.

सहायक के पास टेबल के नीचे ही पानी की बोतल रखी थी. लेकिन या तो उसे उसकी याद नहीं आई, या फिर वह अधिक समय लेना चाहता होगा. उसने तुरन्त अपने साथ के एक क्लर्क को पानी लाने को कहा. क्लर्क तुरन्त उठकर पानी लेने बाहर भागा. चव्हाण के सहायक ने जीएम के सहायक को इशारा किया कि उनकी पानी की बोतल टेबल के नीचे रखी है. जीएम का सहायक सकपका गया. उसने टेबल के नीचे से पानी की बोतल निकाल कर जीएम को दी. जीएम ने पानी के चार-छह घूँट गले से नीचे उतारे. वे फिर सवालों के जवाब देने को तैयार थे.

चव्हाण ने एक और चार्ट फाइल से निकाल कर जीएम को दिखाया. “देखिए, क्या यह बिजली की खपत का चार्ट आपकी फैक्ट्री का ही है?”

“जी, हाँ हमारी फैक्ट्री का ही है.” जीएम ने उत्तर दिया.

“गौर से देखिए, क्या यह सही है कि, इसमें फैक्ट्री की मार्च 2019 में बिजली खपत जनवरी और फरवरी की बिजली खपत से कुछ अधिक ही दर्ज है?”

“जी, सही है.”

“तो फिर, आप अदालत को समझाएँ, कि यदि उत्पादन ठप था, तब भी मार्च 2019 में फैक्ट्री की बिजली की खपत 'पीक' पर कैसे थी? क्या आपकी मशीनें बिना उत्पादन के ही बिजली पी रही थीं?"

जीएम के माथे पर पसीने की पहली बूंद चमकी. उनके वकील, मनोज भट्ट ने आपत्ति जताने की कोशिश की, लेकिन एएसएल ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया.

चव्हाण साहब ने आवाज़ और बुलंद की, "हुज़ूर, असलियत यह है कि उत्पादन बंद नहीं था. उत्पादन को 'ऑफ द रिकॉर्ड' किया जा रहा था. यह साइफनिंग ऑफ स्टॉक (Siphoning of Stock!) है. तैयार आईसी (IC) को 'वेस्ट डिस्पोजल' के फर्जी बिलों के नाम पर फैक्ट्री से बाहर भेजा गया और मुनाफे को शेल कंपनियों में डाइवर्ट किया गया. यह घाटा प्राकृतिक नहीं है, इसे 'क्रिएट' किया गया है ताकि इन 350 मजदूरों की 'फेयर वेजेज' की मांग को कुचला जा सके."

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया. एएसएल ने चश्मा उतारकर जीएम की ओर देखा, "मिस्टर जीएम, क्या आपके पास बिजली के इन बिलों और गायब हुए 5,000 वेफर्स का कोई तार्किक जवाब है?"

जीएम अपने वकील की ओर देखने लगे, लेकिन भट्ट साहब खुद फाइलों में कुछ ढूंढने का नाटक कर रहे थे. प्रिया ने गौर किया कि जीएम के हाथ कांप रहे थे.

चव्हाण साहब ने अंतिम प्रहार किया, "हुज़ूर, यह मामला केवल क्लोजर का नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक अपराध और Siphoning of Funds का है. प्रबंधन ने पिछले तीन साल से अकाउंट्स को दूषित किया है ताकि मजदूरों को उनके स्वाभिमान की कीमत न चुकानी पड़े."

एएसएल ने गंभीर मुद्रा में नोटिंग की और आदेश दिया, "मैनेजमेंट सोमवार तक इन विसंगतियों पर चाहे तो अपना लिखित स्पष्टीकरण पेश कर सकता है."

कोर्ट रूम से बाहर निकलते समय मजदूरों ने चव्हाण साहब और प्रिया को घेर लिया. रामजी काका की आँखों में आँसू थे. उन्होंने प्रिया के सिर पर हाथ रखा, "बिटिया, आज तुम्हारी मेहनत ने उन चूल्हों में फिर से आग जला दी है जो बुझने वाले थे."

“नहीं काका, यह मेरी अकेले की मेहनत नहीं है. इसमें राहुल, स्नेहा और आदित्य का भी बराबर का योगदान है.”
... क्रमशः