देहरी के पार, कड़ी - 37
तीस अप्रैल को जब इजलास में सुनवाई चल रही थी. दूसरी शिफ्ट के मजदूर फैक्ट्री में अपने काम पर पहुँच चुके थे. फैक्ट्री के भीतर एक अलग ही 'ऑपरेशन' शुरू हो चुका था. प्रबंधन ने अब अपनी रणनीति बदल दी थी. वह अपने चहेते सुपरवाइजर और मैनेजरों को अब मजदूरों को धमकाने के बजाय 'हमदर्द' बनकर उनके पास पहुँचने के लिए ट्रेंड कर रहा था.
दूसरी शिफ्ट शुरू होते ही कैंटीन और वर्कशॉप में काम के दौरान कुछ सुपरवाइजरों ने जुमले फेंकने शुरू किए. "अरे भाई, ये चव्हाण साहब और यूनियन के नेता तो अपनी राजनीति कर रहे हैं. आखिर में भुगतना तो हमें और तुम्हें ही है. सुना है एएसएल साहब को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को देनी है. लेकिन वहाँ तो पहले ही फैसला हो चुका है. मंत्री जी ने तो मौखिक परमिशन दे ही दी है, बस ये 15 मई की तारीख का इंतज़ार है."
मैनेजमेंट ने अब उन 'कमजोर कड़ियों' को निशाना बनाना शुरू किया जो कर्ज में डूबे थे या घर की मजबूरियों से परेशान थे. प्रोडक्शन फ्लोर के एक कोने में, मैनेजर खन्ना ने तीन मजदूरों को किनारे ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा. "देखो, तुम लोग पुराने और वफादार हो. मैं नहीं चाहता कि क्लोजर के बाद तुम सड़कों पर भटको. अगर तुम अपने साथ 10-15 मजदूरों की टोली तैयार कर लो, जो शांति से अपना हिसाब (Settlement) लेकर हटने को तैयार हों, तो मैं एमडी साहब से बात करके तुम्हें 'स्पेशल पैकेज' दिलाऊँगा. और हाँ, हर तैयार मजदूर के पीछे तुम्हें अलग से 'इनाम' भी मिलेगा."
मजदूरों के चेहरों पर दुविधा थी. एक तरफ सालों का साथ था, तो दूसरी तरफ सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य और हाथ में आने वाला पैसा. दीमक ने जड़ों पर वार करना शुरू कर दिया था.
...
एएसएल के यहाँ कार्यवाही समाप्त होने के बाद प्रिया ने राहत की एक लंबी सांस ली. उसे लगा कि आज का दिन जीत का दिन है. उसने उत्साह से चव्हाण साहब की ओर देखकर मुस्कुराना चाहा, लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. वे अपनी फाइलों को सहेजने में इतने मग्न थे जैसे उनके दिमाग में कोई और ही गणित चल रहा हो. प्रिया की नज़र प्रशांत बाबू पर पड़ी, उनके चेहरे पर भी उत्साह के स्थान पर चिंता की गहरी लकीरें दिखाई दीं. वह परेशान हो उठी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतनी शानदार जिरह और पुख्ता सबूतों के बाद भी ये लोग इतने गंभीर क्यों हैं?
शाम के छह बजने को थे. इजलास खाली हो चुका था, लेकिन प्रिया का अपने घर जाने का बिल्कुल मन नहीं हुआ. मन में उठते सवालों का जवाब चाहिए था. वह बाहर आई तो उसे रामजी काका दिखाई दिए. रामजी काका—जो इस पूरी विधिक यात्रा में बेनागा कार्यवाही में हाजिर होते थे और मजदूरों के सुख-दुख के साक्षी थे. वह उनकी ओर बढ़ गई.
“सुनवाई का क्या रहेगा काका? आप अपने अनुभव से बताएँ.” प्रिया ने सीधे मुद्दे की बात पूछी.
रामजी काका ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी टोपी ठीक करते हुए बोले, “बिटिया, यदि अंतिम फैसला इस एएसएल ने ही देना होता तो मजदूर ही जीतता. हमारे चव्हाण साहब ने उन्हें लाचार कर दिया है. लेकिन कानून का पेच समझो—यह केवल रिपोर्ट देगा, फैसला सेक्रेटरी और मंत्री करेंगे. सचिवालय सत्ता का गलियारा है बिटिया, वहाँ पूंजीपतियों और भूस्वामियों के एजेंट बैठे हैं जो हमेशा ध्यान रखते हैं कि उनके मालिकों को किसी तरह की हानि न हो. यदि होनी भी हो तो ऐसा रास्ता निकाला जाए कि कम से कम हो.”
रामजी की बात सुनकर प्रिया चिंतित हो उठी. उसे लगा कि वह जिस जीत को मुट्ठी में समझ रही थी, वह तो अभी कोसों दूर है. रामजी उसकी चिंता समझ गए. उन्होंने माहौल हल्का करने के लिए पूछा, “बिटिया, अब ऑफिस जाओगी?”
“नहीं काका, वहाँ से तो आज छुट्टी ली है. सोच रही हूँ घर चली जाऊँ.” प्रिया ने बुझे मन से कहा.
“वहाँ अकेले क्या करोगे? तुम ‘एमबी’ (मेवाड़ भोजनालय) चलो. गर्मी बहुत हो रही है. वहाँ बेहतरीन राजस्थानी ठंडाई पीएंगे. गर्मी से कुछ आराम मिलेगा.” रामजी काका ने स्नेह से कहा.
“आप ठंडाई के बहाने ले जाएंगे और डिनर के पहले आने नहीं देंगे.” प्रिया ने उलाहना दिया, पर उसके स्वर में एक अपनापन था.
“अब अपनी बेटी के लिए इतना तो करने का हक है काका को.” रामजी के इस तर्क के आगे प्रिया क्या कहती, उसे उनके साथ एमबी आना पड़ा.
मेवाड़ भोजनालय पहुँचते ही वहाँ के कर्मचारी खिल उठे. प्रिया इस जगह की पुरानी और चहेती ग्राहक थी. सब आते-जाते उसे नमस्ते करके कहने लगे, “दीदी अब के बहुत दिन में आई.” प्रिया भी अपनी चिंता भूलकर सबके हाल-चाल जानने में लग गई. कुछ देर में रामजी दो गिलास गाढ़ी और ठंडी ठंडाई बनवा कर ले आए. प्रिया को पता था कि साढ़े सात तक प्रशांत बाबू भी यहीं पहुँचते होंगे, वह उनसे बात करने के लिए रुकी रही.
प्रशांत बाबू आए, उनकी चाय आई तो प्रिया भी उनके साथ जा बैठी. इजलास की उस गर्माहट के बाद एमबी की शाम कुछ शांत थी.
“एएसएल के यहाँ हमारा परफॉर्मेंस बहुत अच्छा था. हमने प्रबंधक के आवेदन को हर काउंट पर ध्वस्त किया है. इसलिए उन्हें फैक्ट्री बन्द करने की परमिशन तो नहीं मिलेगी.” प्रिया ने चर्चा शुरू की.
प्रशांत बाबू ने चाय का घूँट लिया और धीमी आवाज़ में बोले, “परमिशन तो बिल्कुल नहीं मिलेगी, प्रिया. दो मई को बहस के बाद एक-दो दिन में एएसएल अपनी रिपोर्ट सचिवालय भेज देगा. बस वहीं असली चक्रव्यूह शुरू होगा. हमें अंदेशा है कि सचिवालय में जानबूझकर देरी करके मामले को डीम्ड परमिशन में बदलने का दुश्चक्र चलेगा. प्रबंधन का पूरा जोर अब इस बात पर होगा कि 14 मई की रात तक सरकार का आदेश प्रबंधन को न मिल पाए.”
प्रिया सन्न रह गई. "डीम्ड परमिशन? यानी अगर फैसला नहीं आया तो वे इसे अपनी जीत मान लेंगे?"
"हाँ प्रिया, और इसीलिए अब प्रबंधन अपनी रणनीति बदल रहा है. वे केवल मंत्रालय में फाइल नहीं रोकेंगे, बल्कि फैक्ट्री के भीतर कर्मचारियों के बीच भी दरार पैदा करने का पूरा प्रयत्न करेंगे." प्रशांत बाबू ने अपनी चिंता स्पष्ट की.
प्रिया ने एमबी की खिड़की से बाहर अंधेरे को देखते हुए पूछा, "तो अब हमारे पास रास्ता क्या है?"
प्रशांत बाबू ने गंभीर स्वर में कहा, "कानून के मैदान में हम तथ्यों से लड़ रहे थे, लेकिन अब मैनेजमेंट मजदूरों के 'जमीर' से लड़ रहा है. हमें दोनों मोर्चों पर लड़ना होगा—सचिवालय में फाइल की पल-पल की जानकारी रखनी होगी और फैक्ट्री के भीतर फैलने वाली इस दीमक को रोकना होगा. अगर मजदूर लालच में आकर टूट गए, तो एएसएल की यह जीत केवल कागजी रह जाएगी."
प्रिया ने देखा कि रामजी काका दूर खड़े होकर उन दोनों को देख रहे थे. उनकी आँखों में वही पुराना डर था जो सत्ता के गलियारों के नाम से आता है.
'चक्रव्यूह' अब इजलास से निकलकर मजदूरों के दिल और दिमाग तक पहुँच चुका था.
... क्रमशः
