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गुरुवार, 18 जून 2026

अदृश्य धागे

देहरी के पार, कड़ी - 68
प्रिया की व्यस्तता कम नहीं हुई थी. प्रोजेक्ट डेडलाइन पर था. पूरी टीम उसी पर लगी हुई थी. रविवार रात ‘एमबी’ से डिनर करके लौटने के बाद उसने मयंक को बताया कि उसकी टीम को जून माह के अंत तक अपना प्रोजेक्ट पूरा करके टेस्टिंग भी कर लेना है. इस कारण से अब सप्ताहांत के सिवा वह अपने ऑफिस में व्यस्त रहेगी.

“आप चिन्ता क्यों करती हैं दीदी, अब मुझे पोस्ट ग्रेजुएट होने में बस रिजल्ट की ही तो देरी है. मैं खुद घूम सकता हूँ. कल से जब आप ऑफिस के लिए निकलेंगी, मैं भी निकल पड़ूंगा, और शाम को नौ बजे तक लौट आऊंगा. तब तक आप भी आ जाएंगी.” मयंक ने कहा.

“मैं जानती हूँ कि मेरा भाई दुनिया भर में अकेला घूम कर आ सकता है. लेकिन दोपहर के खाने का क्या करेगा?” प्रिया ने पूछा.

“दीदी, आप भी न, मुझे आदत कहाँ है दिन में खाने की. कोटा में तो सभी की यही आदत है. दिन में भूख लगती है तो वहाँ तो हर नुक्कड़ पर कचौरी मिल जाती है.”

“तुझे तीन दिन में ही कोटा की कचौरी की याद भी आने लगी. यहाँ तो कचौरी मिलने से रही.”

“तो क्या हुआ, वैसे भी कचौरी तो कोटा की शान है, यहाँ मिलेगी भी तो वैसा स्वाद कहाँ होगा. पर मुंबई में अपने स्नैक्स की कोई कमी थोड़े ही है. यहाँ कचौरी नहीं तो वड़ा पाव, पाव भाजी, बॉम्बे सैंडविच, सेव-पूरी और रगड़ा-पैटिस पता नहीं क्या-क्या हैं. रोज एक-एक भी ट्राई करूंगा तो हफ्ता तो कट ही जाएगा.” मयंक ने मजा लेते हुए कहा.

“वाह, क्या बात है, मयंक. ऐसा लगता है तू इन सब पर कोटा से ही रिसर्च करके चला है?”

“और नहीं तो क्या, मैं यहाँ अपनी दीदी को परेशान करने थोड़े ही आया हूँ.” मयंक ने प्रिया को चिढ़ाते हुए उत्तर दिया.

“अच्छा, अब ऐसा लगता है तुझे दीदी की चपत खाए बहुत दिन हो गए, तुझे वही चाहिए क्या.”

“अरे, दीदी, ऐसा मत करना. वरना मुझे बाकी दिन आपके फ्लैट के बजाय आकाश जी.. आकाश भैया के यहाँ बिताने पड़ेंगे.”

इस बार प्रिया ने आगे बढ़कर मयंक का बायाँ कान पकड़ लिया और डाँटने के स्वर में बोली, “तू क्या बोलना चाह रहा था?

“कुछ नहीं दीदी, बस मन की बात होंठों पर आने वाली थी कि फिर मैंने रोक ली.”

प्रिया ने मयंक का कान छोड़ दिया. “अच्छा तो यह बात है. तू मुझे गलत समझ रहा है, मयंक. आकाश को मैंने घर छोड़ने से पहले देखा तक नहीं था. वह कंपनी की प्रोपर्टी लेने कोटा आया था. तब मैं उसके साथ कार में जयपुर गई और दो दिन- तीन रात मुझे जयपुर में उसके घर रहना पड़ा. उसके बाद करीब दो-तीन सप्ताह से वह मुंबई में है. इसके अलावा हम कभी मिले तक नहीं. हमारे बीच कुछ नहीं है. हाँ इतना जरूर है कि वह योग्य व्यक्ति है. मुझे लगता भी है कि शायद वह मेरा अच्छा जीवन साथी हो सकता है. संभव है कि वह भी ऐसा ही सोचता हो. लेकिन यह इतनी आसान बात नहीं है. अभी हमारे बीच बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम दोनों को समझना पड़ेगा. यदि हमने अभी यह नहीं सोचा और उस पर खुल कर बात नहीं की, तो हो सकता है हमारा साथ होना दोनों के लिए परेशानी का सबब बन जाए.”

इतना कहकर प्रिया चुप हो गई. उसके चेहरे और आँखों में मयंक को उदासी की परत दिखाई दी. उसे लगा कि दीदी को कुछ चुभा है. यह सोचकर वह खुद भी उदास हो गया. कुछ देर सोचकर बोला, “दीदी, आपको बुरा लगा हो तो मैं माफी चाहता हूँ. कल और आज के दो दिनों में मुझे लगने लगा था कि आप दोनों साथ हो जाएँ तो सोने में सुहागा हो जाए. मम्मी-पापा ने आकाश को देखा है, जब वह काली कार घर के आसपास खड़ी कर कोई उनकी रेकी कर रहा था, वह कोटा आया था. उसी ने मम्मी पापा को हिम्मत दी थी. तभी से वे सोचते हैं कि आकाश आपके लिए अच्छा जीवन साथी हो सकता है. दोनों इस बारे में आपस में चर्चा भी कर चुके हैं. पर वे आपसे कुछ भी कहने से डरते हैं.” मयंक इतना कहकर चुप होकर प्रिया को देखता रहा.

“चल छोड़ इन बातों को अब सो जा. सुबह मुझे समय से ऑफिस जाना है और तू भी तो घूमने जाएगा. एक बात और, यहाँ आने के दिन तेरी मम्मी से बात हुई थी. उसके बाद तुमने मम्मी-पापा से बात भी की या नहीं?”

“मम्मी से तो रोज ही बात हो रही है, एक बार पापा से भी कर चुका हूँ.” मयंक ने बताया.

“चल ठीक है, अब तू सोने जा, मैं भी सोती हूँ. कल ऑफिस में बहुत काम रहेगा.” मयंक उठकर हॉल में सोने चला गया.

अगले दिन से दोनों का यह रूटीन हो गया. प्रिया सुबह साढ़े दस बजे ऑफिस के लिए निकलती और मयंक घूमने. वह रात को साढ़े आठ तक लौटती, मयंक उसके बाद पहुँचता.

गुरुवार आ चुका था.
...
मंगलवार, 18 जून 2019 को ईसीआई यूनियन के सचिव शिंदे और एडवोकेट रमेश चव्हाण का एक सहायक इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल पहुँचा. उन्होंने मुंसरिम को स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और उसे साबित करने के लिए सभी जरूरी दस्तावेज पेश किए. प्रबंधन की ओर से उनके विधि विभाग का एक सीनियर क्लर्क पहले से ही वहाँ मौजूद था. उसने स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और दस्तावेजों की प्रतियाँ प्राप्त करके चला गया फैक्ट्री प्रबंधन को अपना लिखित जवाब (Written Statement) पेश करने के लिए महज दस दिन का समय देते हुए अगली तारीख 28 जून दे दी गई.
...
गुरुवार रात प्रिया ऑफिस से आकर फ्लैट का दरवाजा खोल ही रही थी कि मयंक भी आ गया. दोनों बैठकर चाय पी रहे थे. तभी आकाश की कॉल आ गई.

“हेलो प्रिया, कैसी हो? और मयंक के क्या हाल हैं?”

“मेरा तो तुम्हें पता है, मेरे प्रोजेक्ट की डेडलाइन 25 जून है. मुझे साँस कैसे आ सकती है.”

“हाँ, वह तो है. फिर मयंक क्या कर रहा है?”

“वह अकेले घूम रहा है. लोकल ट्रेन और बसें, पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम लिया है. पर मुंबई को समझने लगा है. महानगर का भय उसमें से जाता रहा. बेहतर है उसी से पूछो, फोन दे रही हूँ.” प्रिया ने फोन मयंक को थमा दिया.

“हाँ, आकाश भैया, मैं मयंक बोल रहा हूँ, आप कैसे हैं.”

“मैं ठीक हूँ मयंक. तुम्हारी बताओ तुम कहाँ-कहाँ घूम लिए हो?”

“कुछ अधिक नहीं, सुबह दीदी के साथ निकलता हूँ. अंधेरी स्टेशन से लोकल पकड़ता हूँ. जहाँ जमती है वहाँ निकल जाता हूँ. इतना जरूर है कि मैं मुंबई के लोगों को जानने लगा हूँ. यहाँ के ज्यादातर लोग सहयोग करते हैं. खाना-पीना सस्ता है.”

“वो तो है.” आकाश ने उससे सहमति जताई. “हाँ, शनिवार का क्या कार्यक्रम है?”

“अभी तक कुछ नहीं है. आप बताओ.”

“मैं सोचता हूँ, हम क्यों न शनिवार को एलीफेंटा केव्ज देखने चलें?”

“पर वे तो समंदर में किसी टापू पर हैं.”

“हाँ, टापू पर हैं. पर टापू अधिक दूर नहीं है. गेट-वे से सुबह नौ बजे से बोट लगती हैं, आधे घंटे में वहाँ पहुँचा देती हैं. इस बहाने थोड़ा बहुत समुद्र तुम अंदर से भी देख लोगे. और मुंबई के समुद्र का क्या हाल है यह भी देख लोगे. तुम्हें लंगर डाले बहुत से जहाज भी देखने को मिलेंगे.”

“तो फिर चलते हैं. पर दीदी चलेंगी तब है. बिना दीदी के चलने का तो कोई मतलब नहीं है.”

“तो तुम पूछो प्रिया से.”

“आप क्यों नहीं पूछते?”

“नहीं, तुम ही पूछो. मुझे अभी वह प्रोजेक्ट की डेडलाइन बता चुकी है. वही कहेगी तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं होगा.”

“फिर ठीक है. मैं फोन रखता हूँ.”

मयंक ने फोन काट कर प्रिया को देते हुए कहा, “आकाश भैया शनिवार को एलीफेंटा चलने की कह रहे हैं. लेकिन कह रहे हैं कि आप भी चलेंगी तो प्रोग्राम बना लेंगे.”

प्रिया कुछ पल के लिए सोच में पड़ गई कि आकाश ने ऐसा क्यों कहा? और उसने सीधे उससे क्यों नहीं कहा. फिर कुछ सोचकर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई. वह जानती थी कि आकाश उसके इन्कार से डर रहा है. उसने मयंक को कह दिया, “आकाश से कह दो चल चलेंगे. पर सारी तैयारी उसे ही करनी पड़ेगी. मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी.”

मयंक प्रिया की ‘हाँ’ सुनकर खुश हो गया और अपने फोन से आकाश को कॉल लगाने लगा.
... क्रमशः

सोमवार, 15 जून 2026

साझा संघर्ष

देहरी के पार, कड़ी - 67
प्रिया ने लैपटॉप की स्क्रीन पर 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' का फाइनल ड्राफ्ट पढ़ लिया. सब कुछ ठीक था. कुछ भी ऐसा न था जिसे जोड़े जाने का सुझाव वह दे सकती. उसने स्क्रीन से नजरें हटाकर मयंक की तरफ देखा, वह अभी भी बिस्तर पर अपने पैर फैलाए बेखबर सो रहा था. ‘मुंबई पहली बार हर किसी को थका डालती है.’ यह सोचकर वह मुस्कुराई और नहाने चली गई. वह तैयार होकर फिर से हॉल में आई, तब भी मयंक वैसे ही सो रहा था. रसोई में जाकर उसने नाश्ते के लिए मयंक की पसंद का पोहा तैयार करके दो प्लेटों में सजाया ऊपर से कोटा से मयंक के लाए रतलामी सेव से गार्निशिंग कर डाइनिंग पर रखे. फिर मयंक के कंधे को धीरे से हिलाकर उसे जगाते हुए कहा, "उठ भाई, निपट ले. सूरज कब का सिर पर आ गया है."

मयंक आँखें मलते हुए उठा और दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा. "ओह! नौ बज गए. दीदी, आज तो मैं वाकई घोड़े बेचकर सोया. कल की थकान ही ऐसी थी कि कुछ होश ही नहीं रहा."

"कोई बात नहीं, चाय और नाश्ता तैयार है. तुम जल्दी से ब्रश कर लो," प्रिया ने टेबल पर प्लेटें सजाते हुए कहा.

दोनों नाश्ते के बाद चाय पीते हुए बातें कर ही रहे थे कि प्रिया के फोन की रिंगटोन बज उठी. स्क्रीन पर आकाश का फोटो था. प्रिया ने कॉल रिसीव किया तो उधर से आवाज आई, "गुड मॉर्निंग प्रिया! संडे स्पेशल का क्या कार्यक्रम है आज?"

प्रिया ने हँसते हुए जवाब दिया, "गुड मॉर्निंग आकाश! कार्यक्रम का हाल यह है कि तुम्हारा मयंक भैया अभी-अभी सोकर उठा है और नाश्ता कर रहा है. उसे नहाने और तैयार होने में कम से कम एक घंटा लगेगा. तब तक ग्यारह बज चुके होंगे."

"फिर, आज दिनभर का क्या कार्यक्रम है?" आकाश ने पूछा.

"एक काम करो, मैं फोन मयंक को देती हूँ. तुम दोनों बात करके तय कर लो कि क्या करना है. जो भी तुम दोनों तय करोगे, मैं उसमें शामिल हो जाऊँगी," प्रिया ने फोन मयंक की तरफ बढ़ा दिया.

मयंक ने फोन कान से लगाया, "हेलो आकाश भैया! ..... भैया, कल की भागदौड़ और सफर मैं तो बुरी तरह थक गया. अभी सोकर उठा हूँ, दीदी न जगातीं तो न जाने कब तक सोता रहता. मेरा तो शरीर भी अकड़ा पड़ा है. आज दिनभर धूप में घूमने के बजाय क्यों न आराम किया जाए? घूमना अगले वीकेंड तक के लिए पोस्टपोन कर देते हैं. आज शाम को हम सब साथ मिलकर कहीं बढ़िया डिनर कर लेंगे."

आकाश भी तुरंत सहमत हो गया. उसने कहा, "तुम्हारा यह विचार बिल्कुल उत्तम है. तो फिर डिनर के लिए 'एमबी' (मेवाड़ भोजनालय) सबसे बढ़िया रहेगा. इसी बहाने तुम रामजी काका से भी मिल लोगे और वहाँ घर जैसा और स्पेशल दोनों तरह का खाना मिल जाएगा है." मयंक ने प्रिया की और देखकर बताया कि आकाश भैया कह रहे हैं कि दिन में आराम करें और शाम को एमबी में डिनर कर लें. प्रिया ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया. शाम का कार्यक्रम तय हो चुका था.

दिन भर के आराम के बाद मयंक ने शाम को स्नान किया और तैयार होने लगा. रात साढ़े आठ बजे आकाश का फोन आया कि वह विक्रोली से सीधे 'एमबी' के लिए निकल रहा है. इधर प्रिया और मयंक अपने फ्लैट नीचे आकर फुटपाथ पर किसी टैक्सी या ऑटो का इंतज़ार करने लगे. मुंबई की शाम ढल चुकी थी और सड़कों पर रात की रोशनियाँ बिखर गई थीं. तभी एक ऑटो रिक्शा की रफ्तार धीमी हुई और ठीक उनके सामने आकर रुक गया.

ड्राइवर की सीट पर बैठे अधेड़ शख्स ने अपना सिर ऑटो से बाहर निकाला और प्रिया से मुस्कुराकर पूछा, "नमस्ते दीदी! कहाँ चलना है?" वे बब्बन भाई थे.

"नमस्ते बब्बन भाई! हम 'एमबी' तक जा रहे हैं वहीं छोड़ दीजिए," प्रिया ने ऑटो में बैठते हुए कहा. मयंक भी उसके पीछे ही आ बैठा.

ऑटो जैसे ही मुख्य सड़क पर दौड़ा, प्रिया ने आगे झुककर पूछा, "और सुनाइए बब्बन भाई, आजकल सब कैसा चल रहा है?"

बब्बन भाई ने सामने देखते हुए ऑटो चलाते हुए बोले, "अपना तो बताता हूँ दीदी, पहले आप बताइए... आपके साथ यह छोटा भाई है न?"

"हाँ, बब्बन भाई, आपने सही पहचाना, यह मेरा छोटा भाई मयंक है, परसों कोटा से आया है," प्रिया ने मयंक की तरफ देखा और फिर मयंक से कहा, "मयंक, ये बब्बन भाई हैं. तुम्हें जो मैंने मुंबई ऑटो रिक्शा यूनियन के बारे में बताया था, ये उसके उपाध्यक्ष हैं." मयंक ने अचरज और गहरे आदर के साथ बब्बन भाई की तरफ देखा. एक आदमी मुंबई जैसे महानगर के हजारों ऑटो चालकों की यूनियन का उपाध्यक्ष है और खुद सभी की तरह आटो चला रहा है. ‘नमस्ते बब्बन भाई, मैं आपको नहीं जानता था इसलिए पहले नमस्ते नहीं किया.

बब्बन भाई ने मुस्कुराकर शीशे में मयंक को देखा और फिर बोले, “कोई बात नहीं मयंक भैया. अब आगे से मिलें तो पहचान लेना और नमस्ते भी कर लेना.” अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रिया से बोले "दीदी, मुंबई तमाम ऑटो रिक्शा चालकों और मालिकों के संगठनों ने मिलकर 'ऑटो रिक्शा चालक-मालक संघटना संयुक्त कृती समिती' के नाम से संयुक्त मोर्चा बना लिया है. हमने इसी 9 जून को सरकार को 'हड़ताल का नोटिस' दे दिया है. इस बार हम आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं हम लोग."

"9 जून को हड़ताल का नोटिस दे दिया है? और मुझे अभी तक पता नहीं लगा. प्रशान्त बाबू ने भी जिक्र नहीं किया. हो सकता है ट्रिब्यूनल के लिए ईसीआई का क्लेम तैयार करने की बात में भूल गए हों. खैर, बब्बन भाई, आपकी मांगें क्या हैं?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

बब्बन भाई ने विस्तार से समझाते हुए कहा, "मांगें बिल्कुल जायज और कानूनी हैं दीदी. पहली तो यह कि बढ़ती महंगाई के अनुपात में हमारी किराया दर (Fare Rate) तुरंत बढ़ाई जाए. दूसरी, हम चालकों के सामाजिक और आर्थिक भविष्य की सुरक्षा के लिए एक 'कल्याण बोर्ड' (Welfare Board) का गठन हो. और तीसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो निजी वाहन बिना कमर्शियल परमिट के, अवैध रूप से सार्वजनिक परिवहन का काम कर रहे हैं, उनके खिलाफ सरकार जिला स्तर पर एक गश्ती दल बनाए और उनका संचालन तुरंत रोके. वे हमारे पेट पर लात मार रहे हैं."

मयंक चुपचाप बब्बन भाई की बातें सुन रहा था. उसे अहसास हो रहा था कि इस चमक-दमक वाले महानगर का हर एक पहिया, चाहे वह मिल के चक्के हों या ऑटो रिक्शा के टायर, गहरे आर्थिक और विधिक संयोजनों के सहारे घूम रहे हैं. जैसे ही इनमें कोई संयोजन बिगड़ता है, ये चरमराने लगते हैं. उन्हें फिर से संयोजित करना पड़ता है.

'एमबी' आ गया था. बब्बन भाई ने अपना ऑटो रोक दिया. मीटर पढ़कर प्रिया ने भाड़ा चुकाया. तभी बब्बन भाई ने प्रिया से आग्रह किया, "दीदी, इस बार हमारी मीटिंग में आइए न. आपके आने से हमारे चालकों का हौसला बहुत बढ़ जाएगा."

प्रिया ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, "बब्बन भाई, मैं भी कंपनी की नौकरी करती हूँ. शनिवार और इतवार के अलावा मेरे लिए समय निकालना बहुत मुश्किल होता है."

बब्बन भाई ने तुरंत कहा, "दीदी, अगले रविवार को ही हमारे ऑफिस में हमारी यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक है. आप उसमें आ जाएँ तो हमारा उत्साह दोगुना हो जाएगा, आप हमारी कार्यकारिणी के बाकी मेंबरों से भी मिल लेंगी."

प्रिया ने मयंक की तरफ देखा और फिर बब्बन भाई से कहा, "अगले रविवार का कार्यक्रम मैं आपको शनिवार को ही पक्का बता पाऊँगी. आजकल मयंक भी यहीं आया हुआ है."

"कोई बात नहीं दीदी, मैं शनिवार को खुद आपको फोन करके पूछ लूंगा," बब्बन भाई ने हाथ की मुट्ठी बना कर अभिवादन किया प्रिया ने वैसे ही उसका जवाब दिया. बब्बन भाई अपना ऑटो लेकर आगे बढ़ गए.

प्रिया और मयंक जैसे ही 'एमबी' में दाखिल हुए, उन्होंने देखा कि आकाश पीछे एक बीच की टेबल पर पहले से मौजूद था. होटल में कदम रखते ही काउंटर पर बैठे रामजी काका के चेहरे पर वात्सल्य उभर आया. उन्होंने ज़ोर से कहा, "आओ बिटिया! आओ आज तो मयंक भैया भी साथ हैं." मयंक को आश्चर्य हुआ कि उन्होंने उसे पहचाना कैसे और उसका नाम कैसे याद है.

होटल में सिर्फ रामजी काका ही नहीं, पानी की बोतल लाने वाले लड़के से लेकर ऑर्डर लेने वाले वेटर तक, होटल का सारा स्टाफ प्रिया को देखते ही बेहद आदर से 'दीदी, नमस्ते' कहने लगा. उनके लहजे में वही अपनापन था, जो किसी सगे भाई की आवाज़ में होता है. वे कोने की टेबल पर आकाश के पास आ बैठे. उनके पीछे ही रामजी काका भी आए और कहने लगे. मयंक, बेटा, ‘एमबी’ को अपनी ही जगह समझो और मुझे अपना चाचा। मैं भी कोटा के पास भैंसरोड़गढ़ से ही हूँ.

मयंक अपनी डाइनिंग चेयर पर बैठा, चुपचाप चकित होकर चारों ओर देख रहा था. वह भीतर तक निःशब्द था. कोटा से अपनी अनचाही शादी को ठुकरा कर आधी रात को घर से निकल जाने वाली उसकी दीदी प्रिया इस अजनबी, विशाल और क्रूर माने जाने वाले मुंबई महानगर के आम मेहनतकशों, दुकानदारों और मज़दूरों के दिलों में अपने लिए इतना गहरा, सम्मान और स्थान बना लेगी, इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी. दीदी के इस वृहत और सम्माननीय व्यक्तित्व को देखकर मयंक को उस पर गर्व हो रहा था. वह सोच रहा था कि काश मम्मी-पापा यहाँ आएँ और देखें कि उनकी बेटी क्या है.
... क्रमशः

शनिवार, 13 जून 2026

मौन संकल्प

देहरी के पार, कड़ी - 66
मुंबई की सुबह हल्की धुंध में लिपटी थी. खिड़की से आती रोशनी ने कमरे की दीवारों पर सुनहरी परछाइयाँ बना दी थीं. प्रिया ने चाय का कप हाथ में लिया और बालकनी में आ खड़ी हुई. नीचे सड़क पर मजदूरों का एक छोटा समूह अपने औज़ारों के साथ जा रहा था — वही चेहरे, वही गति, वही उम्मीद.

उसके भीतर कुछ हिलने लगा. कल आकाश और मयंक के साथ बिताई वह सहज, हँसती हुई शाम अब किसी दूर के सपने जैसी लग रही थी. उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था, ‘क्या मैं उस राह पर चल सकती हूँ जहाँ प्रेम और संघर्ष दोनों साथ हों?’

प्रशांत बाबू का पार्टी की सदस्यता के लिए प्रस्ताव ने उसके मस्तिष्क में स्थान बना लिया था. हवा में नमक और धुएँ की मिली-जुली गंध थी. शहर जाग रहा था, और उसके भीतर भी कुछ जाग रहा था — एक निर्णय, जो शायद उसके जीवन की दिशा तय करेगा.

उसने धीरे से खुद से कहा, “हर चौराहा एक नई राह देता है... बस हिम्मत चाहिए उसे चुनने की.” कप की आखिरी चुस्की लेकर वापस हॉल में आ गई. अभी तक सो रहे मयंक को जगाया. “उठ भाई, निपट ले. नौ बजे आकाश टैक्सी लेकर पहुँच जाएगा, तब तक निपटकर तैयार रहना है.

आकाश सुबह टैक्सी लेकर अंधेरी पहुँचा तो सवा नौ हो रहे थे. प्रिया, मयंक और आकाश—सीधे गेटवे ऑफ इंडिया के लिए निकल पड़े. मयंक के लिए मुंबई की यह पहली सुबह कौतूहल से भरी थी. आकाश ने महाराष्ट्र पर्यटन (MTDC) की टूरिस्ट बस' मुंबई दर्शन' के टिकट पहले से ही बुक करवा लिए थे.

मयंक बस की खुली छत (Open Deck) वाली सीट पर बैठने के लिए बच्चों की तरह उत्साहित था. बस जैसे ही कोलाबा की विक्टोरियन इमारतों, मरीन ड्राइव के घुमावदार रास्तों और फोर्ट के ऐतिहासिक रास्तों से गुज़रने लगी, बस का गाइड हाथ में माइक सँभाले लाउडस्पीकर पर हर एक इमारत, राजाबाई क्लॉक टॉवर और इस महानगर के बनने का जीवंत इतिहास सुनाने लगा. आकाश और मयंक, दोनों ही इस शहर के लिए नए मुसाफिर थे, इसलिए वे बिना किसी औपचारिकता के एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाए गाइड की बातों को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे.

दोपहर में अपने ठहराव के दौरान बस कोलाबा में रुकी. सामने वही पुराना, धीमे संगीत वाला ईरानी कैफे था. वे उसमें दाखिल हो गए. बन-मस्का और कड़क ईरानी चाय का स्वाद लेते हुए, मयंक अपनी पारखी और शरारती नज़रों से चुपचाप अपनी दीदी और आकाश को नोटिस कर रहा था. उसने देखा कि जब भी गाइड ने रास्ते में मुंबई की किसी ऐतिहासिक मज़दूर चाल या गिरणी कामगारों के पुराने आंदोलनों का ज़िक्र करता था, तो प्रिया की आँखें चमक उठी थीं. और ठीक उसी पल, आकाश किस तरह अपनी सारी दुनिया भूलकर प्रिया के उस बदलते, प्रखर चेहरे को अगाध आदर और मौन प्रेम से निहार रहा था. मयंक अपनी दीदी को समझता था; वह भाँप गया कि उन दोनों के बीच अब केवल पुरानी कलीग वाली औपचारिकता नहीं रह गई थी. वे गहराई के साथ एक दूसरे से जुड़े महसूस हो रहे थे, उनमें आपस में गहरा प्रेम चुपचाप अपनी जड़ें जमाने लगा था.

शाम को बस का सफर खत्म हुआ. तीनों नरीमन पॉइंट पर समंदर के किनारे पत्थरों पर आकर बैठ गए. समंदर की ठंडी हवा के झोंके उनके चेहरों को छू रहे थे. मयंक पानी की बोतलें और कुछ स्नैक्स लेने के लिए थोड़ी दूर बनी एक दुकान की तरफ चला गया. आकाश और प्रिया वहीं बैठे रहे.

प्रिया एकटक समंदर की उठती-गिरती लहरों को देख रही थी. उसके चेहरे पर ढलते सूरज की मद्धिम लालिमा बिखर गई थी. आकाश ने उसकी ओर देखा. उसके भीतर पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सी छटपटाहट चल रही थी. प्रिया जिस तेज़ी से खुद को बदल रही थी, मज़दूरों के हक की लड़ाइयों और उसके अध्ययन के वैचारिक धरातल पर उसका जो व्यक्तित्व पनप रहा था, उसे देखकर आकाश के मन में एक अनकहा संशय पैदा होता था. वह सोच रहा था कि वह एक सीधा-सादा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, अपने और परिवार का जीवन चलाने के लिए दिनभर काम करता है, शाम को थककर निढाल हो जाता है. सुबह जब थकान उतरती है तो फिर से तैयार होकर काम में जुट जाता है. उसे अपने घर-परिवार से इतर देखने की फुरसत तक नहीं, वहीं प्रिया, वह बिलकुल उसका जैसा काम करते हुए भी खुद को कैसे मेहनतकशों के संघर्षों में पूरी ऊर्जा के साथ योगदान करती है. ऐसा लगता है उसने अपना जीवन चलाने के सिवा वर्गोत्थान को अपना लक्ष्य बना लिया है. वह खुद को इस योग्य कैसे बनाए कि प्रिया जैसी अद्भुत लड़की का जीवनसाथी बन सके? उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कुछ ठोस तो करना होगा. कुछ ऐसा जिससे वह कम से कम प्रिया के वैचारिक आधार को समझ सके. आकाश को फिलहाल इतना भी साहस नहीं हो पा रहा था कि वह अपने इस डर को प्रिया के सामने रख सके, इसलिए उसने कुछ नहीं कहा, बस मौन बैठा उसे निहारता रहा. लेकिन समंदर की लहरों की गूँज के बीच उसके भीतर खुद को बदलने का एक 'मौन संकल्प' आकार लेने लगा था.

प्रिया ने मुस्कुराकर आकाश की तरफ देखा. उसकी आँखों में आकाश के लिए निश्चल प्रेम था. वह केवल आकाश को नहीं चाहती थी, वह उसके उस सीधे-सादे और आत्मीय परिवार को भी उतना ही चाहती थी, जिसने मुसीबत के दिनों में जयपुर में उसे अपनी बेटी समझकर सँभाला था. उस सादगी से बड़ा कोई व्यक्तित्व नहीं होता. दोनों के बीच बिना कुछ कहे भी एक गहरी, आत्मीय खामोशी पसरी रही.

अगले दिन, रविवार की सुबह बेहद अलसाई हुई थी. मयंक अभी भी कारपेट पर बिछे बिस्तर पर गहरी नींद में सोया हुआ था. प्रिया ने रसोई में जाकर चाय बनाई और अपना लैपटॉप स्टार्ट किया. कल रात ही फोर्ट के एडवोकेट रमेश चव्हाण ने 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' के फाइनल ड्राफ्ट को हरी झंडी दे दी थी, और प्रशांत बाबू ने उसका फाइनल मसौदा प्रिया को ई-मेल कर दिया था और साथ में एक छोटी सी टिप्पणी थी, ‘इसे एक बार देख लेना.’ मंगलवार 18 जून, को यूनियन को इसे इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में पेश करना था. जिसमें उसकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी. लेकिन इस पूरे मामले की रीढ़ वही सांख्यिकीय सर्वे और डेटा था जिसे तैयार करने में प्रिया की भूमिका थी. शायद इसीलिए यह फाइनल ड्राफ्ट उसे भेजा गया था. वह लैपटॉप की स्क्रीन पर निगाहें जमाए स्टेटमेंट ऑफ क्लेम को शब्द-दर-शब्द पढ़ने लगी.

जैसे-जैसे वह उसे पढ़ती जा रही थीं, उसे ईसीआई फैक्ट्री के मज़दूरों के उस पूरे इतिहास, उनकी दशा, उनके जमीनी और कानूनी संघर्षों की थाह मिल रही थी. अनेक तथ्य ऐसे निकलकर आए थे जिनकी उसे जानकारी नहीं थी. वह समझ रही थी कि संगठित कामगारों का जीवन भी कितना संघर्षमय होता है, कैसे उन्हें उनके कानूनी हक देने में भी पूंजीपति को बहुत जोर आता है. बाजार भावों के उतार-चढ़ाव को तो वह किसी तरह सहन कर जाता है लेकिन अपने एम्पलॉई को एक रुपया भी अधिक देने में वह प्राणांतक दर्द महसूस करने लगता है, जैसे ही उसे लगता है इस उद्योग से दूसरा उद्योग बेहतर मुनाफा देगा, तो वह उस उद्योग में काम कर रहे सैंकड़ों-हजारों कर्मचारियों को बेरोजगार छोड़ अपना नया उद्यम सजाने लगता है. सीनियर वकील चव्हाण साहब के निर्देशन में सहायकों ने जो मसौदा तैयार किया था उसमें मज़दूरों का छिपा हुआ दर्द बखूबी स्पष्ट दिखाई देता था. सांख्यिकीय रिपोर्ट का कोई महत्वपूर्ण तथ्य ऐसा नहीं था जो छूट गया हो. यह दस्तावेज अब कोर्ट के रिकॉर्ड पर जाने के लिए तैयार था. वह जानती थी कि इस स्टेटमेंट ऑफ क्लेम के तथ्यों को साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज वे जुटा चुके हैं उन्हें प्रमाणित करने को यूनियन पदाधिकारियों और मजदूरों के बयान पर्याप्त होंगे. उसने ई-मेल का उत्तर देते हुए केवल एक वाक्य लिखा, ‘ऑल करेक्ट एण्ड सफिशियंट’ और सेंड पर क्लिक कर दिया.

प्रिया ने चाय का मग होंठों से लगाया और खिड़की से बाहर देखा, मुंबई की सुबह धीरे-धीरे जवान हो रही थी. उसने अंदर देखा, मयंक अभी भी गहरी नींद में था. शायद कल की थकान उसके लिए स्वाभाविक नहीं थी. सोमवार से उसे फिर से काम पर जाना था. उसके पास बस आज का दिन था जब वह मयंक को कुछ मुंबई घुमा सकती थी और उसे इतना निर्देशित कर सकती थी कि आने वाले सप्ताह के पहले पाँच दिनों में वह अकेले भी मुंबई की थाह ले सके.
... क्रमशः

गुरुवार, 11 जून 2026

अंतर्द्वंद

देहरी के पार, कड़ी - 65
प्रिया के फोन रख देने के बीस मिनट बाद ही मयंक को जयपुर मुंबई ट्रेन का थर्ड एसी टिकट ई-मेल से मिल गया, साथ ही टेक्स्ट मैसेज भी फॉरवर्ड होकर मिला. अब उसे गुरुवार की शाम मुंबई के लिए ट्रेन पकड़नी थी. उसने यह बात तब तक छिपाए रखी जब तक कि पापा फैक्ट्री के लिए न निकल गए. उनके जाते ही उसने टिकट का प्रिंट निकाला और लेकर मम्मी के पास पहुँच गया. “मम्मी, दीदी से आज सुबह ही बात हुई. पूछ रही थी कि ‘तेरी परीक्षा निपट गई?’. मैंने बताया कि रिजल्ट आने तक महीने भर मैं बिलकुल फ्री हूँ, तो कहने लगीं मुम्बई आ जा, मैं टिकट करवा देती हूँ. बीस मिनट बाद तो उन्होंने मुझे टिकट भी भेज दिया.”

“तूने प्रिया से बात कर ली, मुझे बताया भी नहीं. मैं भी उससे बात कर लेती. और फिर दो घंटे तक उस बात को छिपाए रखा. अच्छा ... ... मैं समझ गई. तू पापा के जाने का इंतजार कर रहा था. तू इतना डरता है पापा से?”

“नहीं मम्मी, मैं कहाँ डरता हूँ? बस प्रिया दीदी का नाम जुबान पर आते ही उनका चेहरे की चमक चली जाती है, वे उदास हो जाते हैं. इसीलिए सुबह-सुबह ध्यान रखा. उनका पूरे दिन का काम खराब हो जाता.”

“बड़ा आया पापा का ध्यान रखने वाला.”

“टिकट कब का है?”

“अगले गुरुवार का है. शुक्रवार सुबह मैं दीदी के साथ होऊंगा,” मयंक ने कहा.

रात गुप्ता जी लौटे तो पता लगने पर मयंक से पूछा, “प्रिया ने तुम्हारी माँ का टिकट नहीं बनवाया?”

“नहीं बनवाया, दीदी ने कहा, ‘फिर पापा अकेले रह जाएंगे’.” सुनकर गुप्ता जी ने चुप्पी साध ली.


शुक्रवार की सुबह ट्रेन मुंबई के बोरिवली स्टेशन पहुँच रही थी. मयंक अपने कंधे पर पिट्ठू बैग लटकाए और एक छोटा सूटकेस बाएँ हाथ में थामे अपने कोच के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ. खुले दरवाजे से आ रही तेज हवा ने उसके बालों को बिखेर दिया, वे हवा के साथ उड़ने लगे. ट्रेन रुकने के पहले ही उसे स्टेशन पर प्रिया दिखाई दे गई. वह उसे देखकर अपना हाथ हिला रही थी. महीनों बाद दीदी को देख उसके चेहरे पर खुशी दौड़ गई. ट्रेन रुकते ही वह उतरा और दौड़कर दीदी के पास पहुँचा, प्रिया ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. दोनों की आँखें नम हो आईं.

मुंबई जैसे महानगर में आने के बाद प्रिया अधिक दिन अकेली नहीं रही थी. रामजी काका और प्रशांत बाबू से भेंट के बाद उसकी मित्रता का दायरा बढ़ ही रहा था. मित्र यूनियनों के अनेक कार्यकर्ता उसे अपने परिवार के सदस्य समझने लगे थे. मेवाड़ भोजनालय (एमबी) के सारे स्टाफ के लिए वह दीदी थी. फिर भी सहोदर भाई को गले लगाना, उसे बाहों में लपेट लेना था ऐसा था, जैसे उसका समूचा परिवार उसकी बाहों में समा गया हो. फ्लैट पर पहुँचने के बाद चाय के मग हाथ में लिए दोनों भाई-बहन डाइनिंग टेबल पर बैठे, तो मयंक चाय की चुस्कियाँ लेते हुए कोटा के घर का पूरा हाल सुनाने लगा.

"दीदी, पापा भी अब पहले जैसे नहीं रहे," मयंक ने बिस्कुट का टुकड़ा दाँतों से काटते हुए कहा. "उनका गुस्सा अब पूरी तरह गायब हो चुका है. अब जब भी तुम्हारा ज़िक्र आता है, तो वे अड़ियल नहीं होते, बल्कि चुप हो जाते हैं. उनकी आँखों में अब एक दबी हुई फिक्र और तुम्हारे लिए एक अनकहा सम्मान दिखाई देता है. मम्मी तो बस उस दिन का इंतज़ार कर रही हैं जब पापा खुद कहेंगे कि चलो, मुंबई चलकर प्रिया से मिल कर आते हैं."

मयंक की बातें प्रिया के कानों में शहद घोल रही थीं. पारिवारिक संबंधों का यह सुख, अपनों की फिक्र और एक सहज, सुरक्षित घरेलू जीवन की आकांक्षा बेशकीमती होती है, इसका अहसास उसे आज बहुत गहराई से हो रहा था. लेकिन ठीक उसी क्षण, उसके अंतर्मन के किसी कोने में एक हल्की सी टीस उठी. वह सोचने लगी—उसके पिता ने विरासत में मिले एक मध्यम आढ़त के व्यवसाय से एक छोटे उद्योग के स्वामी होने तक का सफर तय किया था. तब वह बहुत छोटी थी. वे दिन पापा के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए संघर्ष और कभी-कभी अभाव के दिन थे. वे और उनके कर्मचारी सब एक जैसी स्थिति को जीते थे. मुश्किल से ये अच्छे दिन देखने को मिले थे. संघर्ष के दिनों में आढ़त और फैक्ट्री के कर्मचारियों के साथ जिए गए कष्ट के दिनों ने ही उसमें मेहनतकश बिरादरी के प्रति करुणा भाव जन्म लिया. उनमें से अनेक से उसे बेटी जैसा प्यार मिला था. उसी दौर ने प्रिया को उन्हें अपना परिवार समझने की सीख पैदा की थी, जिसने उसे मुंबई में मजदूरों के संघर्ष से जोड़ दिया.

प्रिया ने फुर्ती से नाश्ता बनाया और अपने लिए टिफिन तैयार कर लिया तथा मयंक के लिए भी लंच बना कर किचन में छोड़ दिया. मयंक को समय से लंच कर लेने की हिदायत दी और खुद अपने ऑफिस चली आई. यहाँ कंप्यूटर की स्क्रीन पर उंगलियाँ चलाते हुए भी उसके दिमाग में प्रशांत बाबू का पार्टी मेंबर बनने का प्रस्ताव बार-बार सामने आ रहा था. वह जानती थी कि वह बौद्धिक रूप से योग्य है; उसने साहित्य पढ़ा है, उससे सीखा है, अब वह खुद कर्मचारी है और श्रमजीवी होने का मतलब समझती है. फिर कमी कहाँ थी? कमी योग्यता में नहीं थी. शायद उसमें अभी उस साहस की कमी थी जो वक्त आने पर वर्ग के लिए खुद को पूरी तरह झौंक देने को चाहिए होता है.

उसके जेहन में कभी गोर्की के 'माँ' का नायक पावेल ब्लासोव की तो कभी आस्त्रोवस्की के अग्निदीक्षा उपन्यास के पावेल कोर्चागिन की छवियाँ आ खड़ी होती. कभी उसका ध्यान शहीद-ए-आजम भगत सिंह पर जा टिकता. तेईस साल की उम्र का वह लड़का, कितना कुछ पढ़ चुका था? कितनी दुनिया देख चुका था. दुनिया और समाज के बारे में उसने अपनी जो समझ सबके सामने रखी थी, शायद आज भी देश लगभग वहीं खड़ा है. उसने अपने लिए जो सामाजिक लक्ष्य निर्धारित किए थे वे आज भी नहीं बदले हैं. आज भी समाज, देश और दुनिया को वही चाहिए जो भगत सिंह चाहता था.

प्रिया ने की-बोर्ड छोड़कर कुर्सी के पीछे सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं. फाँसी के फंदे पर झूलने से महज कुछ मिनट पहले तक जेल की कोठरी में भगत लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था.. वह सोचने लगी कि आखिर वह क्या आदर्श था, जिसने उसे असेंबली में बम फेंकने और हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ जाने का साहस दिया था?

"क्या मुझमें कभी वैसा हौसला पैदा होगा?" प्रिया ने खुद से पूछा. "क्या मैं उस महान आदर्श के लिए अपने व्यक्तिगत सुखों को स्वेच्छा से पीछे धकेल सकती हूँ?" यह प्रश्न उसके मस्तिष्क में स्थाई रूप से खड़ा हो गया था.

शाम को वह ऑफिस से लौटी, तब आकाश पहले से उसके फ्लैट पर पहुँचा हुआ था और मयंक से गपबाजी में मशगूल था. प्रिया के घर छोड़ देने के बाद आकाश का प्रिया को अपनी कार से जयपुर ले लाना, होटल पर न ठहरने देना और उसकी सुरक्षा के लिए उसे अपने परिवार के साथ अपने घर ठहराना. उसके पूरे परिवार का उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना और विक्रांत से बचाना ऐसी घटनाएँ थी जिन्होंने मयंक के मन में आकाश के लिए गहरा आदर पैदा किया था. दोनों हॉल में बैठे अनौपचारिक, रूप से ऐसे बतिया रहे थे जैसे छोटे बड़े भाई हों.

प्रिया के कपड़े बदल कर तैयार होने पर पौने नौ बज रहे थे. यह खाने का समय था. वे निकट ही ‘चपाती’ रेस्टोरेंट पहुँचे, वहीं डिनर किया और फिर तीनों अंधेरी की एक हलचल भरी, रोशन सड़क पर टहलने निकले. मयंक और आकाश आगे-आगे चल रहे थे. मयंक चहकते हुए कोटा की बातें कर रहा था और आकाश मुस्कुराते हुए उसे मुंबई के तौर-तरीके समझा रहा था.

प्रिया उन दोनों से दो कदम पीछे, चुपचाप उनके साथ चल रही थी. सड़क की पीली बत्तियों की रोशनी में उसने आगे चलते आकाश के चौड़े कंधों और उसकी हँसती, खिलखिलाती आवाज़ को देखा. आकाश—एक ऐसा इंसान जो उसकी आज़ादी का सम्मान करता था, जो उसके जीवन में एक बेहद खूबसूरत, शांत और प्रेमपूर्ण भविष्य का प्रतीक बन सकता था. शायद उसके साथ ऐसा वैवाहिक जीवन वैसा हो सकता था, जिसका सपना हर लड़की देखती है.

लेकिन ठीक उसी पल, उसकी आँखों के सामने मिल के गेट पर खड़े लाचार मज़दूरों के चेहरे आ गए, जिनके बीच पिछले दिनों उसने पूरी शिद्दत के साथ काम किया था. मजदूर वर्ग की वेनगार्ड पार्टी का मेंबर होने का सीधा मतलब था—अपने व्यक्तिगत सुखों, अपनी सुख-सुविधाओं और यहाँ तक कि अपने प्रेम को भी मज़दूर वर्ग के व्यापक हितों से पीछे की पायदान पर रख देना. अगर कभी आंदोलन की ज़रूरत और इस व्यक्तिगत प्रेम के बीच चुनाव करना पड़ा, तो क्या वह बिना हिचकिचाए अपनी खुशियों को सेक्रिफाइस कर पाएगी? क्या वह इतनी मजबूत है?

अचानक आकाश ने पीछे मुड़कर देखा. प्रिया को पीछे चुपचाप चलते पाकर उसने अपनी रफ्तार धीमी कर दी और उसके करीब आते हुए बेहद अपनेपन से पूछा, "प्रिया, तुम कहाँ खो गई हो? देखो मयंक क्या कह रहा है."

प्रिया ने पलकें झपकाईं. उसने अपने भीतर के उस वैचारिक बवंडर को बहुत संभालकर अपने सीने में छिपा लिया और चेहरे पर एक गहरी, शांत और आत्मीय मुस्कान लाते हुए कहा, "कहीं नहीं आकाश, बस तुम दोनों की बातें सुन रही हूँ और सोच रही हूँ कि आज मुंबई की यह शाम कितनी सुंदर लग रही है."

उसने आगे बढ़ते हुए आकाश और मयंक के बीच अपनी जगह बनाई. वह जानती थी कि उसके अंतर्मन का यह संघर्ष इतनी जल्दी खत्म होने वाला नहीं है; यह रास्ता लंबा था और इसका फैसला उसे बहुत धीरज और परिपक्वता के साथ करना था.
... क्रमशः

बुधवार, 10 जून 2026

नया सिलसिला

देहरी के पार, कड़ी - 64
एसोसिएशन लाइब्रेरी से कुछ नई किताबें लेकर निकलते समय सूरज डूब चुका था. धूप गायब थी, जिससे गर्मी कम हो गयी थी. उसकी सोसायटी मुश्किल से दो किलोमीटर भी नहीं थी. वह पैदल ही चल दी. उसे फिर आकाश का ध्यान आया. पूरा हफ्ता बीत चुका था, लेकिन आकाश का फोन नहीं आया था. पिछले शनिवार की उस लंबी मुलाकात के बाद प्रिया ने मन ही मन तय किया था कि इस बार वह पहल नहीं करेगी; आकाश को खुद आगे बढ़कर फोन करना चाहिए. लेकिन जैसे-जैसे दिन गुज़रते गए, फोन की खामोशी उसके भीतर एक अजीब सी छटपटाहट पैदा करने लगी थी. क्या आकाश उसकी बातों से आहत हो गया था? या उसने प्रिया के उस गंभीर रुख को कोई आखिरी फासला समझ लिया था? सवालों का एक सिरा था जो थमता नहीं था. वह सौ मीटर भी नहीं चली थी कि पसीने में तर हो चुकी थी. मुंबई की उमस भरी गर्मी सबसे मुश्किल मौसम है. उसे शेयरिंग ऑटो जाता दिखा. वह उसे रोककर बैठ गई.

फ्लैट का दरवाजा खोल अंदर प्रवेश करते ही उसने एसी चालू किया. किताबें मेज पर रखकर सोफे पर पसर गई. दस मिनट बाद उसे गर्मी से कुछ राहत मिली. उसने घड़ी देखी, सवा सात बज रहे थे. अब सवाल शाम के खाने का था. आज सुबह सफाई और कपड़े धोने सुखाने के काम में लग जाने से दोपहर का खाना देर से, करीब ढाई बजे हुआ था. पेट में भूख कम थी, लेकिन थी कि कुछ न कुछ तो पेट में जाना ही चाहिए. वह रसोई की तरफ कदम बढ़ाने ही वाली थी कि ड्रॉइंग रूम में रखे फोन की घंटी बज उठी.

प्रिया ने लपककर फोन उठाया. स्क्रीन पर 'आकाश्' का नाम चमक रहा था. दिल की धड़कन ने एक हल्की सी रफ्तार पकड़ी, लेकिन अपनी आवाज़ को बेहद सामान्य रखते हुए कहा, "हेलो आकाश."

"हेलो प्रिया! कैसी हो? परेशान तो नहीं किया?" उधर से आकाश की वही परिचित, हिचकिचाती हुई आवाज़ आई.

"नहीं, बिल्कुल नहीं. बस अभी-अभी एसोसिएशन लाइब्रेरी से लौटी हूँ. सोच ही रही थी कि शाम के खाने का क्या किया जाए. तुम बताओ, पूरे हफ्ते भर से तुम्हारी कोई खबर नहीं? एक फोन कॉल तक नहीं. सब ठीक तो है?" प्रिया के उलाहने में भी अपनापन था.

उधर से आकाश थोड़ा हँसा, उसकी हँसी ने प्रिया को एक राहत दी. "हाँ, सब ठीक है प्रिया. असल में इस हफ्ते ऑफिस में एक नया मॉड्यूल डिप्लॉय होना था, रातों की नींद गायब थी. और... सच कहूँ तो थोड़ा समय खुद को भी देना चाहता था. पिछले वीकेंड की बातें दिमाग में घूम रही थीं. मुझे लगा तुम्हें भी थोड़ा स्पेस चाहिए."

प्रिया खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई. आकाश की इस परिपक्वता ने उसके मन के सारे संशयों को एक पल में पिघला दिया. "स्पेस तो ठीक है आकाश, पर इतनी खामोशी भी अच्छी नहीं. खैर, डिप्लॉयमेंट पूरा हो गया?"

"हाँ, कल रात ही साइन-ऑफ मिला है. आज दिनभर सोता रहा. अभी उठा तो तुम्हारी याद आई. खाना खा लिया तुमने?"

"नहीं, दोपहर का लंच लेट था, तो अभी भूख नहीं है. कुछ हल्का-फुल्का बना लूंगी. तुमने?" प्रिया ने पूछा.

"मैं बस अभी नीचे जा रहा हूँ, रामजी काका के 'एमबी' से कुछ पैक करवाकर लाऊँगा. तुम कहो तो तुम्हारे लिए भी पैक करवाकर उधर आ जाता हूँ, साथ में खाएंगे और बतियाएंगे," आकाश ने कहा.

"नहीं, मुझे इतनी भूख नहीं है, कुछ बना लूंगी. तुम्हारा ये हफ्ता काम में गुजरा है तो आज तुम भी खाना खाकर आराम करो, इधर आओगे तो बहुत रात हो जाएगी. अच्छा आकाश. गुड नाइट," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा और फोन रख दिया. उस एक छोटी सी बातचीत ने पूरे हफ्ते के सन्नाटे को दोनों के बीच से खदेड़ दिया था.

अगले दिन रविवार की सुबह बेहद अलसाई हुई थी. मुंबई के आसमान में हल्के बादल थे और खिड़की से आती हवा ठंडी थी. प्रिया सुबह आराम से सोकर उठी. उसे किसी काम की कोई जल्दी नहीं थी. उसने इत्मीनान से रसोई में जाकर अपने लिए अदरक वाली कड़क चाय बनाई. ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठकर, चाय की चुस्कियां लेते हुए वह अपने लैपटॉप पर ऑनलाइन अखबार पढ़ने ही लगी थी कि उसके फोन की रिंग बजी.

स्क्रीन पर 'मयंक' का नाम था. प्रिया के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई. उसने तुरंत कॉल रिसीव किया, "हाँ मयंक! आज सुबह-सुबह दीदी की याद कैसे आई?"

"गुड मॉर्निंग दीदी! याद तो रोज़ आती है, पर आज आपके लिए एक बहुत अच्छी खबर है," उधर कोटा से मयंक की उत्साह भरी आवाज़ गूँजी.

"अच्छा! क्या खबर है? तेरे एमबीए के एग्जाम्स खत्म हो गए?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

"हाँ दीदी! कल शाम ही फाइनल सेमेस्टर का आखिरी पेपर खत्म हुआ है. अब बस रिज़ल्ट और प्लेसमेंट का इंतज़ार है. बीच में तीन-चार हफ्ते का गैप है. मैं सोच रहा हूँ मुंबई घूमने आ जाऊँ? तुम्हारे पास रुकूंगा, मुंबई भी देख लूंगा और तुमसे मिले भी कितने दिन हो गए हैं!" मयंक ने अपनी पूरी योजना एक सांस में कह डाली.

प्रिया की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह इस महानगर में परिवार से महीनों से दूर थी. ऐसे में भाई का आना किसी उसके लिए उत्सव जैसा था. "यह तो बहुत बढ़िया आइडिया है मयंक! कब आना चाहते हो? बताओ. मैं तुम्हारा रिजर्वेशन करवा देती हूँ. तुम आ जाओ. यहाँ हम दोनों खूब घूमेंगे."

"दीदी, सच बताऊँ, आना तो मम्मी भी चाहती हैं. उनका बहुत मन है तुम्हारे पास आने का," मयंक का लहजा थोड़ा धीमा हुआ. "लेकिन अगर मम्मी भी आ जाएंगी, तो पापा घर पर बिल्कुल अकेले रह जाएंगे. पापा का तो तुम्हें पता ही है, गुस्सा भले ही ठंडा पड़ गया हो, पर अपनी ज़िद पर अभी भी अड़े हैं. इसलिए मम्मी ने कहा है कि ‘अभी तुम्हारी छुट्टियाँ हैं तुम हो आओ, फिर जब मैं वापस लौटूंगा, तब मम्मी और पापा दोनों एक साथ कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास मुंबई आएंगे."

मयंक की बात सुनकर प्रिया की आँखें थोड़ी नम हो गईं. पापा का सीधे फोन न करना, लेकिन मम्मी के ज़रिए मुंबई आने की इच्छा जताना—यह दिखा रहा था कि समय के साथ दूरियों की बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही है. देहरी लांघने का जो मलाल था, वह अब धीरे-धीरे स्वीकार्यता में बदलता जा रहा था.

"कोई बात नहीं मयंक. मम्मी-पापा को बाद में ले आना, अभी तुम आ जाओ. आने का दिन बताओ. मैं अभी टिकट बुक करवाती हूँ," प्रिया ने अपनी आवाज़ को सँभालते हुए कहा.

"ठीक है दीदी, मैं सोच रहा हूँ कि गुरुवार को यहाँ से रवाना होकर शुक्रवार पहुँच जाऊँ. उस दिन तुम ऑफिस जाना, मैं दिन भर आराम करूंगा. तुम शाम को लौटोगी तब मुंबई घूमने का प्लान बनाएंगे. हमें पूरे दो रोज लगातार घूमने को मिल जाएंगे," मयंक ने चहकते हुए कहा.

“ठीक है मयंक, मैं अभी टिकट बुक करवाकर तुम्हें मेल करती हूँ.” प्रिया ने फोन रख दिया और टिकट बुक करवाने के लिए लैपटॉप स्टार्ट करने का बटन दबा दिया.

प्रिया ने खिड़की से बाहर देखा. सुबह अब और खूबसूरत लगने लगी थी. एक तरफ आकाश के साथ बढ़ती हुई यह अनकही सहजता और दूसरी तरफ भाई का आगमन और माता-पिता के आने की सुगबुगाहट—जिंदगी में परिवार फिर से नजदीक लौट रहा था.
... क्रमशः

मंगलवार, 9 जून 2026

आत्मसंघर्ष

देहरी के पार, कड़ी - 63
ऑफिस से लौटकर प्रिया ने अपना पर्स मेज पर रखा, कपड़े बदले और बिस्तर पर ढेर हो गई. आज दिनभर बिना विश्राम के काम करना पड़ा था. लंच भी दस मिनट में अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही करना पड़ा. प्रोजेक्ट की डेडलाइन नजदीक थी, और उससे पहले के बहुत से छोटे-छोटे काम कतार में खड़े थे. लगातार कुर्सी पर बैठे रहने की एवज में शरीर को थकान और अकड़न दोनों बेमोल मिले थे. उसे भूख भी लगी थी लेकिन थकान उसे कुछ सोचने नहीं दे रही थी, खाना बनाए या ऑर्डर कर दे. उसने फैसला करने के पहले कुछ देर आराम करना उचित समझा. लेकिन कमबख्त दिमाग कब विराम लेता है?

कल शाम प्रशांत बाबू का अचानक उसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव देना, उसके लिए पूरी तरह अप्रत्याशित था. उनका यह कहना और भी विचित्र था कि पार्टी के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी ने खुद इसकी सिफारिश की है. मुंबई आने के बाद रामजी काका और प्रशांत बाबू से परिचय के बाद उनके साथियों की मदद से उसके मंगेतर विक्रांत के गिरफ्तार होने पर प्रिया का उससे पीछा छूटा था. बाद में उसे पता लगा था कि सभी मददगार साथी किसी न किसी ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता थे. प्रशांत बाबू खुद आईटी और टेक्निकल एम्पलॉइज की अखिल भारतीय एसोसिएशन के सेक्रेटरी थे. आईटी कर्मचारी होने के कारण वह और उसके तीन साथी भी इस एसोसिएशन के सदस्य बन गए थे. उन्हीं दिनों ईसीआई फैक्ट्री में आंदोलन शुरू हुआ तो उसने उसमें मदद करना अपना दायित्व समझा था. आंदोलन में अपनी भूमिका के कारण यह तो अपेक्षित था कि उसे अपनी यूनियन में कोई बड़ी जिम्मेदारी ऑफर की जाती, लेकिन पार्टी मेंबर बनने के प्रस्ताव की उसे बिलकुल अपेक्षा नहीं थी.


मजदूर वर्ग की वेनगार्ड पार्टी, एक कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता के बारे में उसकी जानकारी महज किताबी थी. जिस साल उसे सीनियर सेकेंडरी की परीक्षा देनी थी उसी साल वह ऋचा और उसकी दीदी के साथ दशहरा मेला घूमने गई थी. वहीं उन्होंने सोवियत पुस्तक प्रदर्शनी देखी. ऋचा की दीदी ने वहाँ से विश्व क्लासिक्स में से एक मैक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ खरीदा. उसे खुद भी कहानी उपन्यास पढ़ने का शौक था. उसने भी वह उपन्यास खरीद लिया. अगले शनिवार की रात सोने के पहले उसने वह उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो उसकी नींद काफूर हो गई. उपन्यास खत्म होने पर उसने घड़ी देखी तो रात के ढाई बजे थे. उस उपन्यास ने उसे इतना प्रभावित किया कि रविवार को जब पूरा परिवार मेला घूमने गया तो उसने गोर्की के जीवन के आरंभिक जीवन की कहानी कहने वाली तीन किताबें और एक कहानी संग्रह और खरीद लिया. जब बिल बनवाने के लिए उसने काउंटर पर किताबें रखीं तो अधेड़ सेल्समैन ने सिर उठाकर उसे देखा. “अभी दो-तीन दिन पहले आपने गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ खरीदा था न?” सेल्समैन ने पूछा.

“हाँ, खरीदा था.”

“आपको पसंद आया?”

“हाँ, मैं उसे एक बैठक में भी पढ़ गई थी. इसीलिए अब उसकी और पुस्तकें खरीद रही हूँ.”

सेल्समैन ने बिल बनाया, उसने मूल्य चुकाया. वह किताबों का बैग उठाकर चलने लगी तो सेल्समैन ने कहा, “रुकिए मैम, आप यह किताब मेरी ओर से ले जाइए.” उसने किताब ली और उसे देखा तो वह ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ का हिन्दी अनुवाद था. उसने उसे अपने बैग में रख लिया. उसने गोर्की की चारों किताबें जल्दी ही पढ़ लीं. सभी किताबों ने उसे बहुत कुछ सिखाया. उसने ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ भी पढ़ा, पर उसमें उसे अधिक कुछ समझ नहीं आया. सीनियर के साथ ही उसने प्री-इंजीनियरिंग टेस्ट भी दिया था, वह पहले ही प्रयत्न में चुनी गई और उसे कोटा के इंजीनियरिंग कॉलेज में कंप्यूटर साइंस एण्ड एप्लिकेशन ब्रांच मिल गई. अगले वर्ष मेले से उसने एक और प्रसिद्ध सोवियत उपन्यास ‘How the Steel Was Tempered’ का अनुवाद ‘अग्नि दीक्षा’ खरीदा. यह उसके लेखक निकोलोई आस्त्रोवस्की के खुद के जीवन पर आधारित था. इसके प्रकाशित होने के बाद उसके अनेक साथियों ने लिखा था कि उसने उपन्यास में अपने कारनामों को बहुत कम करके लिखा था.

इन दोनों पुस्तकों से उसे एक कम्युनिस्ट पार्टी क्या हो सकती है इसका अनुमान हुआ था. इन उपन्यासों के नायक पावेल व्लासोव और पावेल कोर्चागिन दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के आदर्श पात्र थे. उसके बाद भी उसने कुछ पुस्तकों में आदर्श कम्युनिस्ट चरित्रों को पढ़ा था. वे सभी उसे पसंद भी थे. वह उन जैसा बनने की सोचती भी थी. लेकिन जब कल उसे यह प्रस्ताव मिला तो उसे लगा कि उसके पास एक पार्टी मेंबर होने लायक न तो पर्याप्त योग्यता है और न ही फिलहाल उसमें इतना साहस है कि वह अपने जीवन में हमेशा मजदूर वर्ग के हितों को प्राथमिकता दे सके. नहीं, अभी वह मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी की मेंबर बनने लायक नहीं है. उसके अंदर बहुत कमजोरियाँ हैं. वह कोशिश करेगी कि ये कमजोरियाँ दूर हों. लेकिन क्या वह इन्हें दूर कर सकेगी? वह इसी प्रश्न से जूझ रही थी.

उसे बिस्तर पर पड़े सोचते हुए बहुत देर हो गई थी. उसने अपनी आँखें खोलीं, घड़ी देखी, वह सवा नौ बजा रही थी. वह उठ बैठी. अब उसे भूख सता रही थी. खाने के लिए कुछ बनाने का मन नहीं था. उसने फोन उठाया और ऑनलाइन खाना ऑर्डर कर दिया.

अगले शनिवार शाम जब वह यूनियन लाइब्रेरी की पुस्तकें लौटाने और कुछ नई लेने यूनियन ऑफिस पहुँची तो प्रशांत बाबू से भेंट हो गई. ट्रिबुनल में ईसीआई के मुकदमे में स्टेटमेंट ऑफ क्लेम तैयार करने के सिलसिले में वे सुबह ही चव्हाण साहब के चैम्बर गए थे. उनके जूनियर ने प्रारंभिक ड्राफ्ट बना दिया था, वे एक बार जाँच भी चुके थे. उन्होंने यह ड्राफ्ट यूनियन सचिव शिंदे और प्रशांत बाबू को भी पढ़वा दिया था. शिंदे ने कुछ नए तथ्य और चव्हाण साहब को बताए थे. जिनमें से कुछ को क्लेम में सम्मिलित करने के लिए उन्होंने अपने जूनियर को निर्देश दे दिया था. वे कह रहे थे कि यदि कुलकर्णी जी का लंबा अनुभव है, यदि वे भी इसे एक बार देख लें तो बेहतर है. उनका कहना था कि 16 जून को हर हालत में स्टेटमेंट ऑफ क्लेम ट्रिबुनल में पेश करवा देंगे जिससे प्रबंधन समय न ले सके. शिंदे को हस्ताक्षर करने और पेश करने के लिए ट्रिब्यूनल जाना होगा. प्रशांत बाबू ने बताया कि चव्हाण साहब तुम्हें भी याद करते हे कह रहे थे, “हमारी टेम्परेरी जूनियर प्रिया कैसी है?”

अंत में प्रशांत बाबू ने उससे पूछ ही लिया, “प्रिया, तुमने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या फैसला लिया?”

“नहीं सर, मैं अभी खुद को उस लायक नहीं समझती. मुझमें बहुत कमजोरियाँ हैं. मुझे उन पर काबू पाना होगा. क्या पता उसमें कितना समय लगेगा? यह भी पता नहीं कि मैं उन कमजोरियों पर कभी काबू भी कर पाऊंगी या नहीं?”

“कोई बात नहीं, तुम सोच लो. वैसे कमजोरियाँ किस में नहीं होतीं? तुम उन कमजोरियों से लड़ना चाहती हो, उन्हें दूर करना चाहती हो, इससे बेहतर क्या हो सकता है. यदि तुम उनसे निरंतर लड़ना चाहती हो तो तुम एक कम्युनिस्ट हो, तुम्हें पार्टी सदस्य बन जाना चाहिए.”

“आपकी बात सही हो सकती है. लेकिन मैं अपने बारे में अच्छी तरह जानती हूँ. मैं मेंबर बनने के लिए अपनी कमजोरियों से लड़ना चाहती हूँ, यदि मैंने मेंबरशिप ले ली तो हो सकता है मेरा अपना यह संघर्ष रुक जाए. मुझे सोचने के लिए अभी समय चाहिए. अभी रहने दें.” उसने कहा.

“ठीक है प्रिया, कोई बात नहीं. हम इस पर विस्तार से बात करेंगे. मैं किसी शाम तुमसे तुम्हारे घर मिलता हूँ.” प्रशांत बाबू ने कहा.

उसने लाइब्रेरी से नई किताबें लीं और लौट आई.
... क्रमशः

बुधवार, 3 जून 2026

प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 62

सुबह नींद टूटी तो कमरे में धूप प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया की निगाह सामने दीवार पर टंगी डिजिटल घड़ी की ओर गई. वह समय : साढ़े सात, दिन : रविवार 2 जून 2019 दिखा रही थी. उसे आज कहीं नहीं जाना था. आज वह खूब सोई थी, लगभग सात घंटे. उसने रसोई में जाकर दो गिलास पानी पिया और चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ाकर ब्रश करने लगी. आज उसे कहीं नहीं जाना था, कोई अपॉइंटमेंट नहीं था. आधे घंटे बाद सफाई वाली मेड आ जाएगी. आज उसे रोककर डस्टिंग करवाएगी. कपड़े न जाने कितने बिना धुले हो रहे होंगे? चाय पीने के बाद उन्हें छाँटकर धोने के लिए मशीन में डाल देगी. सब कामों से निपटने के बाद खाना बनाकर खाएगी और दिन में कम से कम दो घंटे जरूर सोएगी. फिर उठकर चाय पीएगी और शाम को कोई किताब पढ़ेगी.

पर सोचा हुआ कब होता है? मेड के जाने के बाद उसने स्नान किया. कुकर में दाल और चावल दोनों पकने के लिए छोड़ दिए. तभी फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे, “तुमसे तुम्हारे घर आकर मिलना है, कब आ सकता हूँ?”

“सर, कभी भी. आज दिनभर घर पर ही हूँ.”

“शाम सात बजे ठीक रहेगा?”

“हाँ, क्यों नहीं. पर सर, कुछ खास काम है?’

“नहीं, कुछ खास नहीं. पर तुमसे बातें करनी हैं. हम जब भी मिलते हैं हमेशा काम की बातें होती हैं, मैं तुमसे जो बातें करना चाहता हूँ वे रह जाती हैं. आज यूनियन ऑफिस से शाम छह बजे तक फ़ारिग हो लूंगा. फिर आता हूँ तुम्हारे यहाँ”

“सर, मैं इंतज़ार करूंगी.”

कॉल कट जाने के बाद वह सोचने लगी. आखिर क्या बात हो सकती है. प्रशांत बाबू आखिर उससे क्या बातें करना चाहते हैं? सवाल तो दिमाग में आते हैं यह दिमाग का उसूल है. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. फिर उसने इस पर सोचना बंद कर दिया और वाशरूम में वाशिंग मशीन संभालने चल दी.

खाने में दाल-चावल थे. उसने सलाद तैयार कर लिया था, अचार का मर्तबान भी उतारकर टेबल पर रख लिया और खाना खाने बैठी. अचानक उसे आकाश की याद आई. कल का पूरा दिन वह साथ था. उसके जाने के बाद वह उसके साथ अपने संबंध और आपसी व्यवहार के बारे में सोचती रही थी. पता नहीं आकाश ने उसके बारे में क्या सोचा होगा? उसकी इच्छा हुई कि वह आकाश को कॉल लगाकर बात करे. फिर रुक गई. अक्सर वही आकाश को पूछती रही है. इस बार आकाश को ही फोन करने दो.

शाम सवा सात बजे करीब प्रशांत बाबू प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया. एक ट्रे में पानी से भरे दो गिलास और ठंडे पानी की एक बोतल टेबल पर लाकर रखी और पूछा, “सर चाय या कॉफी कुछ बनाऊँ?”

“चलो बिना चीनी के ब्लैक कॉफी बना लो.”  प्रशांत बाबू ने कहा तो वह कॉफी बना लाई, साथ ही बिस्कुट भी ले आई.”

“प्रिया, तुम्हारी नौकरी कैसी चल रही है?” प्रशांत बाबू ने ही बात आरंभ की.

“ठीक है सर, कोई व्यवधान नहीं है. मैं हमेशा अपना काम समय से पूरा करती हूँ, तब भी जब मुझे बीच में किसी काम से अवकाश लेना पड़ता है. फिर देसाई साहब मैनेजर हैं तो कोई समस्या नहीं है.”

“फिर ठीक है. इस बीच तुमने ईसीआई  के आंदोलन में बहुत मदद की. उसके लिए अदालत तक जाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाई. मैं जानना चाहता था कि उससे तुम्हारी नौकरी में कोई परेशानी तो नहीं हुई.”

“नहीं सर, आप उसकी चिंता न करें. जब मैंने घर छोड़ा, माता-पिता और भाई से किसी तरह की मदद की कोई आशा भी उसी के साथ छोड़ दी थी. मैं जानती हूँ कि अपना जीवन मुझे ही चलाना है. यह नौकरी मुझे आत्मनिर्भर बनाती है, और यह आत्मनिर्भरता मुझे एक स्वतंत्र व्यक्ति बनाती है. मैं स्वतंत्रता का मूल्य जानती हूँ. मैं इसे खोने जैसा कोई काम जानबूझकर तो नहीं करूंगी.”

“तुम बहुत समझदार हो, प्रिया. फिर भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम खुद को नुकसान न पहुँचा लो.” प्रशांत बाबू ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा.

“नहीं सर ऐसा नहीं होगा. यदि कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो उससे पहले आपको पता लग जाएगा.”

“तुमने इस बीच यूनियन लाइब्रेरी से लाकर बहुत किताबें पढ़ी हैं, उनके बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?”

“सभी किताबें अच्छी हैं. बहुत कुछ सिखाती हैं. बस उन्हें समझने के लिए अक्सर कई बार पढ़ना पड़ता है. कुछ के बारे में ऐसा लगता है कि वे मेरे पास होनी चाहिए. मैंने ऐसी कुछ किताबें ऑनलाइन खरीद लीं है”

“हाँ, उनमें से अनेक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, मेरे पास भी बहुत किताबें हैं. वैसे इनमें से तुम्हें सबसे अधिक किस किताब ने प्रभावित किया?”

“मुझे ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति”  ने बहुत कुछ सिखाया. मैं समझ पाई कि कैसे मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद उसके परिवार का विकास हुआ है. असल में मार्क्सवाद के एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत को समझने के लिए यह सबसे बेहतरीन प्रारंभिक पुस्तक है. उसे पढ़ने के बाद मैंने एल.एच.मोर्गन की किताब “प्राचीन समाज” मंगा ली है, उसे पढ़ रही हूँ. मुझे इस किताब से समझ आया कि मनुष्य समाज लगातार विकसित हुआ है और उसका विकास जारी है. उसी से निजी संपत्ति की उत्पत्ति और उसके कारण समाज में वर्गों की उत्पत्ति समझ सकी. यह भी जाना कि वर्ग-संघर्ष ने समाज को कैसे उत्तरोत्तर उन्नत समाज व्यवस्थाओं तक पहुँचाया है.”

“तुमने ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ भी तो पढ़ी हैं.?”

“पढ़े हैं सर, घोषणापत्र तो मैंने पहले भी पढ़ा था, पर तब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. उनसे ही समझ आया कि मजदूर वर्ग की मुक्ति तमाम अन्य शोषित वर्गों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है. इस तरह मजदूर वर्ग को खुद अपनी मुक्ति के लिए तमाम वर्गों को मुक्त करना होगा. इस प्रक्रिया में वह मनुष्य समाज के वर्गों को समाप्त कर सकता है. तर्क के स्तर पर यह प्रस्थापना पूरी तरह उचित लगती है. उसी से मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी का महत्व समझ आता है.”

“यह अच्छी बात है कि तुम मजदूर वर्ग की पार्टी का महत्व समझा है.”

प्रशांत बाबू ने कॉफी का कप उठाया, लेकिन उसकी कॉफी समाप्त हो चुकी थी. प्रिया देखकर मुस्कुराई, “सर, एक कॉफी बनाऊँ.”

“नहीं उसकी जरूरत नहीं. खाने का समय हो रहा है, फिर भूख मर जाएगी.” प्रशांत बाबू ने मना किया और अपनी बात जारी रखी. “प्रिया, असल में मैं एक महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ. जब से ईसीआई के मजदूरों का आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से तुम उसमें शामिल रही हो और आंदोलन के महत्वपूर्ण काम किए हैं. कॉमरेड कुलकर्णी हमारी पार्टी के राज्य सचिव हैं उन्होंने तुम्हें परखा है. उनका कहना है कि मैं तुम्हें हमारी पार्टी की मेंबर बनने का प्रस्ताव दूँ.”

सुनकर प्रिया स्तब्ध रह गई और सोच में पड़ी बहुत देर तक प्रशांत बाबू के चेहरे की ओर देर तक देखती रही.

“सर मैं जानती हूँ कि मजदूर वर्ग की पार्टी के सदस्य होने का अर्थ क्या होता है. उसे मजदूर वर्ग के हितों को सर्वोपरि रखने की शपथ लेनी होती है और उस पर खरा उतरना होता है. उसका जीवन पूरी तरह मजदूर वर्ग को समर्पित होता है, उसे हमेशा बलिदान के लिए तैयार रहना होता है. मैं समझती हूँ कि वह आसान नहीं है. मैं उसके लिए अभी खुद को उसके लिए तैयार नहीं पाती. सर उसके लिए मुझे सोचना पड़ेगा.” प्रिया ने उन्हें बहुत स्पष्ट उत्तर दिया.

“तुम्हारा कहना बिलकुल सही है. हर व्यक्ति को जिसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिले उसे सोच समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए. मुझे कॉमरेड कुलकर्णी ने जिम्मेदारी दी थी. उसका एक हिस्सा मैंने पूरा कर दिया है. मैं आगे भी कोशिश करता रहूँगा.” यह कहते हुए प्रशांत बाबू मुस्कुराए.

प्रिया हँस पड़ी. “सर, आप कोशिश करते रहिए. मैं भी लायक बनने की कोशिश करती रहूँगी.”

“प्रिया, साढ़े आठ बज रहे हैं. खाने का क्या करोगी?” प्रशांत बाबू ने पूछा.

“बस अब बनाऊंगी. वैसे भी मैं ऑफिस से लौटते हुए यही समय हो जाता है. मेरे लिए नॉर्मल है.”

“मैं रोज की तरह अपना डिनर ‘एमबी’ में करूंगा. तुम भी साथ चलो. मेरे पास आज कार है. तुम्हें वापस छोड़ दूंगा. इस बीच कुछ बातें और हो जाएंगी.”

“ठीक है सर, आप रुकिए. मैं कपड़े चेंज करके आती हूँ.” प्रिया कह कर अंदर अपने कमरे में चली गई.

आधे घंटे बाद दोनों ‘एमबी’ में डिनर कर रहे थे. खाते हुए भी प्रशांत बाबू अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे. और प्रिया गंभीरता से उन्हें सुन रही थी.

... क्रमशः