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शुक्रवार, 22 मई 2026

नए रिश्ते

देहरी के पार, कड़ी - 56
प्रॉपर्टी डीलर संदीप ने आकाश को सोमवार सुबह नौ बजे पवई के उस सुसज्जित फ्लैट वाली बिल्डिंग पर बुलाया था. आकाश वहाँ दस मिनट पहले ही पहुँचकर बिल्डिंग के रिसेप्शन पर संदीप का इंतज़ार करने लगा. संदीप करीब आधे घंटे बाद फ्लैट ओनर के साथ पहुँचा, और आकाश को अपनी गाड़ी में बिठाकर दस्तावेज तैयार करने वाले ऑफिस पहुँचा. वहाँ करीब दस लोग कंप्यूटर पर बैठकर कुछ न कुछ टाइप कर रहे थे. संदीप ने उनमें से एक ऑपरेटर से पूछा, “कितनी देर लगेगी?”

“आप आ ही जाइए, मैं तो शाम को देने वाले दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ.” ऑपरेटर ने कहा. संदीप ने आकाश से आधार कार्ड और दो फोटो मांगे, ऑपरेटर ने रिसेप्शन से एक दस्तावेजी स्टाम्प लेकर एग्रीमेंट टाइप कराया. वहीं एक अलग चैम्बर में बैठे नोटेरी के सामने दस्तावेज पर आकाश से दस्तखत कराए, नोटेरी ने अपने रजिस्टर में उसके और फ्लैट ओनर के दस्तखत करवाकर दस्तावेज को प्रमाणित कर दिया. डिपॉजिट की राशि फ्लैट ओनर को दी तो उसने आकाश को फ्लैट की चाबियाँ दीं. आधे घंटे बाद उसने गेस्ट हाउस से सूटकेस लाकर फ्लैट में प्रवेश किया और सूटकेस को टेबल पर रख दिया. अब उसे लग रहा था कि इस मुंबई जैसे बेगाने शहर में उसका भी एक 'ठिकाना' है. ठीक ग्यारह बजे वह विक्रोली के अपने ऑफिस के लिए निकल गया, जहाँ नए प्रोजेक्ट की चुनौतियाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं.

यूनियन ने जिन बीस कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी थी उनमें से नौ कार्यकर्ताओं की ड्यूटी सोमवार को सुबह की शिफ्ट में थी. सुबह दस बजे जब पहली शिफ्ट का विश्राम हुआ तब ये कार्यकर्ता अपने विभाग में श्रमिकों से सर्वे का फार्म भरवाने लगे. आधे घंटे में केवल इक्कीस मजदूर फार्म पूरा भर सके, कुछ के फार्म अधूरे रह गए. कुछ मजदूर जानना चाहते थे कि यूनियन आखिर ये फार्म क्यों भरवा रही है. उन्हें समझाने में समय लगा. कुछ मज़दूर फॉर्म देखकर कतराने लगे—"कॉमरेड, इस कागज़ पर हस्ताक्षर करने से हमारी नौकरी या मिलने वाले लाभों पर तो फर्क नहीं पड़ेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि मैनेजमेंट को पता लग जाए तो वे हमें गेट पर ही कार्ड पंच करने से न रोक दें." लेकिन जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि यह फॉर्म पूरी तरह गुप्त है और इसमें न तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत है और न ही उनका नाम कहीं उजागर होगा, बल्कि यह हम मजदूरों की कानूनी लड़ाई का कवच बनेगा. विश्राम के बाद मजदूरों में फार्म भरने की खबर आम हो गई. शिफ्ट छूटने के बाद कुछ कार्यकर्ता गेट के बाहर की चाय की दुकानों पर रुके तो बहुत सारे मजदूर भी रुक गए और वहीं फार्म भरवाने लगे.

फॉर्म भरते समय कारखाने के भीतर 'ट्रक सिस्टम' के जरिए होने वाले शोषण का वह खौफनाक यथार्थ सामने आया, जिसने मज़दूरों को भीतर तक निचोड़ दिया था. एक बुजुर्ग मज़दूर ने फॉर्म भरवाते हुए भर्राई आवाज़ में कहा, "कॉमरेड, इस नौकरी से तो मौत भली. वेतन के नाम पर मालिक अपनी दुकान का सड़ा हुआ अनाज और कूपन थमा देता है. महीने के अंत में जेब में एक रुपया नकद नहीं बचता. बच्चों की फीस और दवाइयों के लिए भी साहूकारों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है. अगर ये सेठ हमारे इतने बरस का हिसाब राजी-राजी दे दे, तो हम यह नौकरी कल छोड़ दें. कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. नहीं मिलेगी तो फुटकर मजदूरी कर लेंगे या अपना ही कोई काम कर लेंगे." लगभग हरेक मज़दूर का यही दर्द था. वे इस नारकीय स्थिति से बाहर निकलना चाहते थे.

प्रिया अपने ऑफिस का काम निपटाकर रात साढ़े आठ बजे घर लौटी. कपड़े बदल कर कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेटी सोच रही थी कि खाने में क्या बनाया जाए? तभी डोर-बेल बजी. उसने उठकर दरवाजा खोला तो वहाँ प्रशांत बाबू, कणिका और कॉमरेड कुलकर्णी खड़े थे. उसने उन्हें हॉल में बिठाया. वे पहले दिन दूसरी शिफ्ट के विश्राम-काल तक भरे हुए फॉर्म लेकर आए थे. पहले ही दिन करीब चौहत्तर फॉर्म भरे जा चुके थे. वे चाहते थे कि रोज के फार्मों को रोज ही कणिका की सुझाई एक्सेल शीट में फीड कर दिया जाए और यह काम प्रिया अपने लैपटॉप पर रोज कर ले. इससे तीन चार दिन में डाटा शीट विश्लेषण के लिए तैयार हो जाएंगी और जल्दी ही कणिका रिपोर्ट तैयार कर सकेगी. प्रिया ने अपने हॉल की डाइनिंग टेबल को जल्दी से 'डेटा सेंटर' में बदल डाला.

कणिका ने अपने पेन ड्राइव से प्रिया के लैपटॉप में तैयार एक्सेल शीट ट्रांसफर की. इस शीट में प्रत्येक मजदूर के लिए एक रो (Row) आवंटित की गयी थी, और प्रत्येक प्रश्न के दो कॉलम बने हुए थे. जिसमें मजदूर की रो में एक में हाँ या ना वाला उत्तर अंकित करना था और दूसरे कॉलम में उनके विशिष्ट उत्तर लिखने थे कणिका फार्मों को व्यवस्थित कर रही थी और यह देख रही थी कि मज़दूरों ने कर्ज, बीमारी और ट्रक सिस्टम से जुड़े कॉलम सही-सही भरे हैं या नहीं. प्रिया ने अपने लैपटॉप पर एक्सेल शीट खोलकर मज़दूरों के उस दर्द को आंकड़ों के रूप में दर्ज करना शुरू किया. जैसे-जैसे डेटा स्क्रीन पर उभर रहा था, यह साफ़ हो गया कि नब्बे फीसदी से अधिक मज़दूर इस कारखाने को तुरंत छोड़ना चाहते थे.

करीब नौ बजे प्रिया के फोन की स्क्रीन चमक उठी, आकाश का फोन था. उसने सबको कहा, “जरूरी फोन है, मैं बात करके लौटती हूँ.” वह बेडरूम में आ गई.

“हाँ आकाश, कैसे हो? फ्लैट का क्या किया?”

“सुबह पजेशन ले लिया था. मेरा सूटकेस रखकर ही ऑफिस गया था. अभी फ्लैट से फ्रेश होकर ‘एमबी’ आया हूँ खाने के लिए. तुमने खाने का क्या किया?”

“कुछ नहीं, आकर सोच ही रही थी क्या बनाऊँ? तभी प्रशांत सर, कणिका और कुलकर्णी जी आ गए. अब आज के कलेक्ट किए हुए फार्मों के डाटा मेरे कंप्यूटर की एक्सेल शीट में डाल रहे हैं.”

“ये बढ़िया है, मैं पाँच लोगों का खाना पैक करवाकर उधर ही आ जाता हूँ. मेरे फ्लैट का गृह प्रवेश सेलिब्रेट कर लेंगे.” आकाश ने कहा तो प्रिया फोन लिए हुए ही हॉल में आ गई. “आकाश का फोन है वह ‘एमबी’ से खाना लेकर आ रहा है. आप लोग खाना खाएंगे न.” उसने सभी से पूछा. प्रशांत बाबू ने कणिका और कुलकर्णी जी से पूछा तो उन्होंने हाँ कर दी.

“हाँ, ले आओ. सभी खाएंगे,” प्रिया ने आकाश को कह दिया और फोन बंद किया.”

प्रशांत बाबू ने तुरन्त रामजी काका को फोन लगाया. “हैलो रामजी, प्रिया का दोस्त आकाश आपके यहाँ हम सबके लिए खाना पैक करवा रहा है. उससे कहना भुगतान हो गया है.” इतना कहकर उन्होंने फोन काट दिया. प्रिया उन्हें असमंजस भरी नजरों से देखती रह गयी.

प्रशांत बाबू ने प्रिया को अपनी ओर इस तरह देखते हुए कहा, “प्रिया, आकाश तुम्हारा दोस्त है, उससे तुम्हारे भावनात्मक संबंध हैं. वह हमारे लिए उतना ही बेशकीमती है, जितनी तुम. आज उससे इसी तरह पहचान होने दो”

प्रिया सोच रही थी कि, आकाश को भी 'एमबी' अनजान नए रिश्ते मिलने वाले हैं.
... क्रमशः

गुरुवार, 21 मई 2026

नया आशियाना

देहरी के पार, कड़ी - 55
शनिवार को यूनियन ऑफिस में कणिका के साथ मीटिंग समाप्त हुई, तब 3 बज चुके थे. सुबह उसने खाना बनाने के बाद धुलने वाले कपड़े मशीन में धुलने के लिए डाले थे. सोचा था खाना खाने के बाद उन्हें निकाल कर सुखा देगी. लेकिन मीटिंग का समय हो जाने पर वह निकल ली थी. उसे ध्यान आया कि कपड़े सुखाकर उन्हें इस्त्री के लिए डालना है वरना सोमवार को ऑफिस जाने के लिए कपड़ों का संकट हो सकता है. वह फौरन घर पहुँची, मशीन से कपड़े निकालकर उन्हें बालकनी में सूखने डाल दिया और कुछ देर विश्राम के लिए बिस्तर पर लेट गई.

उसकी आँखें खुलीं तो खिड़की के शीशे से आता हलका प्रकाश देख उसे लगा सुबह हो गई है. उसने समय देखने के लिए आदतन पास रखा मोबाइल उठाकर देखा, आकाश की अनेक मिस-कॉल थीं. ‘यह कैसे हुआ? उसे रिंग क्यों नहीं सुनाई दी? देखने पर पता लगा कि यूनियन ऑफिस में मीटिंग के पहले उसने मोबाइल साइलेंट मोड पर डाला था और बाद में मोड बदलना भूल गई. उसने तुरंत मोबाइल का मोड बदला. मोबाइल से ही पता लगा कि अभी सुबह नहीं हुई है, बल्कि सूरज डूब चुका है और रात होने वाली है. उसे ध्यान आया, ‘कपड़े सूख गए होंगे, उन्हें इस्त्री के लिए डालना है’. तभी मोबाइल पर रिंग बज उठी. आकाश का फोन था.

"हाँ आकाश, बताओ. फ्लैट देख लिए?" प्रिया ने फोन रिसीव करते हुए पूछा.

“फ्लैट की बात बाद में, पहले ये बताओ कि तुम्हें क्या हो गया है? डेढ़ बजे से अब तक बीस कॉल कर चुका हूँ, तुम फोन क्यों नहीं उठा रही थी?” आकाश की आवाज से लगा वह बुरी तरह झल्ला रहा था. प्रिया को हँसी आ गई.

“कुछ नहीं आकाश मीटिंग में फोन साइलेंट मोड पर डाल कर पर्स में रख दिया था. वहाँ से आई तो थकी थी. थोड़ी लेटी की आँख लग गई. अभी उठी हूँ तो समझ रही थी कि सुबह हो गई है.” प्रिया फिर हँस पड़ी. हँसते-हँसते ही बोला, “मोबाइल पर टाइम देखा तो पता लगा अभी तो शाम हुई है. इतने में तुम्हारी कॉल आ गई.”

आकाश का गुस्सा उसकी हंसी से पल भर में काफूर हो गया. उसे भी हँसी आ गई. दोनों की हँसी कम हुई तो आकाश बोला, "हाँ प्रिया, डेढ़ बजे तक संदीप ने मुझे करीब सात फ्लैट दिखाए. उन्हें देखने के बाद अब मैं एक अजीब असमंजस में हूँ. दो विकल्प बिल्कुल विपरीत हैं और मैं फैसला नहीं कर पा रहा हूँ कि किसे फाइनल करूँ? मैं चाहता हूँ कि पहले तुम एक बार दोनों फ्लैट देख लो," आकाश की आवाज़ में उलझन साफ़ महसूस हो रही थी.

"ऐसी भी क्या दुविधा है, आकाश?"

"एक फ्लैट पवई में है—पूरी तरह फर्निश्ड. ए.सी., पंखा, फ्रिज, वाशिंग मशीन, पर्दे, बेड से लेकर किचन के तमाम उपकरणों से लैस है. मुझे सिर्फ अपना सूटकेस लेकर जाना है और चादर बदलनी है. सबसे बड़ी बात है कि यह फ्लैट विक्रोली में मेरे नए ऑफिस के बिल्कुल पास है, एकदम वाकिंग-डिस्टेंस. वहाँ जाने-आने का समय और रोज़ का ऑटो का खर्चा बचेगा. लेकिन उसका रेंट थोड़ा अधिक है. दूसरा विकल्प मैंने अभी अंधेरी ईस्ट में देखा है—एक छोटा 1BHK, जिसका किराया मेरे बजट में है, लेकिन वह पूरी तरह कोरा है. एक बेड के सिवा सब कुछ जुटाना पड़ेगा. ऑफिस से दूर है लेकिन तुम्हारे फ्लैट के नजदीक है," आकाश ने दोनों विकल्प उसके सामने रख दिए.

प्रिया उसकी बात सुनकर मन ही मन मुस्कुराई. पवई की कॉरपोरेट चमक और आधुनिक सुविधाएँ एक तरफ थीं, और अंधेरी का बजट तथा उसका सामीप्य दूसरी तरफ. उसने कुछ पल सोचा और कहा, "ठीक है आकाश, तुम कल दोनों फ्लैट मालिकों से दोपहर दो बजे बाद का समय ले लो. मैं कल सुबह यूनियन ऑफिस की एक ज़रूरी मीटिंग के बाद सीधे मेरे फ्लैट पर पहुँचती हूँ, हम वहीं से दोनों फ्लैट देखने चलते हैं."

रविवार सुबह दस बजे आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर में ईसीआई यूनियन के करीब बीस कार्यकर्ता मौजूद थे. कणिका जोशी ने प्रश्नावली के फार्म न केवल तैयार कर लिए थे बल्कि उनकी करीब चार सौ प्रतियाँ करवा कर लाई थी और अब बोर्ड के पास खड़ी होकर सर्वे का 'प्रोटोकॉल' समझा रही थी. वह कार्यकर्ताओं को जो खुद भी उसी कारखाने के मजदूर थे, अपने साथी मज़दूरों से उनके मनोवैज्ञानिक स्तर पर जाकर बात करने, उनका भरोसा जीतने और बिना किसी पूर्वाग्रह के सांख्यिकीय डेटा दर्ज करने का तरीका सिखा रही थी. प्रिया वहाँ बैठकर कणिका को देखते हुए सीख रही थी कि सर्वे का वैज्ञानिक तरीका क्या है. वह जरूरी बिंदुओं को अपनी नोटबुक में नोट भी करती जा रही थी. बाद में उसने प्रश्नावली फार्मों को व्यवस्थित करने और प्रत्येक कार्यकर्ता को उसकी जिम्मेदारी सौंपने में कणिका की मदद की. ट्रेनिंग मीटिंग खत्म हुई तब एक बज चुका था.

प्रिया ने आकाश को फोन लगाकर पूछा, “दोनों फ्लैट मालिकों से समय तय हुआ?”

“हाँ मैं तुम्हारे फ्लैट पर डेढ़ बजे पहुँच रहा हूँ, पास वाले फ्लैट का मालिक दो बजे वहीं मिलेगा. लेकिन पवई वाले ने शाम साढ़े तीन बजे का टाइम दिया है.”

“ये तो बढ़िया है? तुमने लंच किया या नहीं?”

“नहीं, सोचा था साथ कर लेंगे.”

“फिर ऐसा करते हैं, हम पहले अंधेरी का फ्लैट देखेंगे. पवई के रास्ते में रामजी काका के ‘एमबी’ पर लंच करेंगे और फिर साढ़े तीन बजे पवई वाला फ्लैट देखेंगे. ठीक?”

“ठीक.” आकाश ने कहा.

“तो मैं अपने फ्लैट के लिए निकलती हूँ.”

ठीक दो बजे, प्रिया और आकाश ने अंधेरी ईस्ट की उस सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल वाला फ्लैट देखा. दिन के उजाले में वह 1BHK और भी छोटा लग रहा था. दीवारें खाली थीं और कमरा पूरी तरह सूना था. सामान रखने पर और भी छोटा दिखने लगता. दोनों ने ‘एमबी’ में लंच किया और वहाँ से निकलकर वे दोनों पवई वाले उस आधुनिक फ्लैट में पहुँचे. फ्लैट साफ-सुथरा था, खिड़की से बाहर का दृश्य बेहतर था. घर के सारे उपकरण चमचमा रहे थे. आकाश ने खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, "देखो प्रिया, यहाँ से मेरा ऑफिस सिर्फ दस मिनट की दूरी पर है. बस समस्या इसके थोड़े अधिक रेंट की है."

प्रिया ने फ्लैट का एक चक्कर लगाया, उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ और उसका इंजीनियरिंग बैकग्राउंड तुरंत सक्रिय हो गया. उसने अपने बैग से एक छोटा नोटपैड और पेन निकाला और आकाश के सामने खड़े होकर कहा, "आकाश, मेरे विचार से तुम्हें यह पवई वाला फ्लैट ही किराए पर लेना चाहिए."

आकाश ने चकित होकर उसे देखा, "लेकिन इसका किराया बहुत है, प्रिया?"

"यही तो मुंबई का भ्रम है, आकाश," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा. "अब मेरा गणित सुनो. यदि तुम अंधेरी में रहते हो, तो तुम्हें यहाँ से रोज़ पवई जाना और आना पड़ेगा. मुंबई के इस ट्रैफिक में रोज़ आने-जाने में तुम्हारे कम से कम दो से तीन घंटे सफर में बर्बाद होंगे. अगर तुम ऑटो का रोज़ का खर्च जोड़ो, तो महीने में कम से कम 3 से 5 हज़ार रुपये तो सिर्फ किराए और ट्रैवलिंग में ही अतिरिक्त खर्च हो जाएंगे."

प्रिया ने कमरे के खाली कोनों की तरफ इशारा करते हुए आगे कहा, "दूसरी बात, अंधेरी वाला फ्लैट पूरी तरह खाली है. वहाँ रहने लायक बुनियादी सुविधाएँ जुटाने के लिए—जैसे फ्रिज, वाशिंग मशीन, बेड और किचन का सामान—तुम्हें तुरंत अपनी जेब से कम से कम 50 हज़ार रुपये एकमुश्त खर्च करने पड़ेंगे. यहाँ पवई में वो सारा 'कैपेक्स' (कैपिटल एक्सपेंडीचर) बचा हुआ है. पवई का फ्लैट दिखने में महंगा है, लेकिन समय, ऊर्जा और तात्कालिक खर्च के हिसाब से यह तुम्हें बिल्कुल महंगा नहीं पड़ेगा. यहाँ रहना तुम्हारे लिए मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से बेहतर रहेगा और तुम अपनी नई नौकरी पर पूरा ध्यान दे सकोगे."

आकाश विस्मय से प्रिया को देखता रह गया. वह उसकी तार्किक क्षमता, वित्तीय समझ और इतनी बारीक व्यावहारिक सोच का कायल हो गया. उसके मन का सारा असमंजस और कशमकश पल भर में दूर हो गए. उसे समझ आ गया कि प्रिया ने भावुकता से ऊपर उठकर उसके आराम और भविष्य के हक में फैसला दिया था. अब उसका नया आशियाना लगभग तैयार था.

उसने तुरंत जेब से मोबाइल निकाला और प्रॉपर्टी डीलर संदीप का नंबर डायल किया, "हेलो संदीप, मैं पवई वाला फ्लैट फाइनल कर रहा हूँ. ओनर से बात करके सोमवार सुबह रेंट एग्रीमेंट तैयार रखिएगा."

फोन रखकर उसने प्रिया की ओर देखा. दोनों के चेहरों पर एक बड़ा काम मुकम्मल होने का अनकहा सुकून तैर रहा था.
... क्रमशः

बुधवार, 20 मई 2026

रिसर्च की तैयारी

देहरी के पार, कड़ी - 54
अकेले रहने वालों के लिए वीकेंड कुछ राहत लेकर आता है, उन्हें उन दो दिनों में ऑफिस नहीं जाना होता. लेकिन घर के काम भी बहुत होते हैं. फ्लैट की सफाई करनी है, कपड़े धोने हैं, यदि किचन, बाथरूम, वार्डरोब वगैरा में चीजें खत्म हो रही हैं तो उन्हें लाना है या किसी से मिलने जाना है. प्रिया की भी लगभग ऐसी स्थिति थी. फिर भी वह तमाम काम करते हुए अपनी रुचि के कामों के लिए समय निकाल लेती थी. इस शनिवार दोपहर एक बजे रिसर्च एनालिस्ट को आईआईडीईए (IIDEA) के दफ्तर आना था. वह उससे मिलने को उत्सुक थी. वह जानना चाहती थी कि आखिर ये दुनिया भर के अध्ययन (स्टडी) कैसे होते हैं? उसे पढ़ी हुई किताबें भी यूनियन लाइब्रेरी में लौटानी थीं और नई लानी थीं. वह आधे घंटे पहले ही वहाँ पहुँच गई. दफ्तर का माहौल शांत था. वह सीधे यूनियन की लाइब्रेरी वाले कमरे की ओर बढ़ गई. उसके हाथ में लौटाए जाने वाली तीन पुस्तकें थीं. इन किताबों को पढ़ने के बाद मनुष्य समाज और प्रकृति तथा उसके सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को देखने का उसके नजरिए में बहुत परिवर्तन आया था.

वह अभी अपनी पुस्तकें जमा ही करा रही थी कि तभी प्रशांत बाबू ने लाइब्रेरी में प्रवेश किया. प्रिया को देखकर वे मुस्कुराए. जमा कराए जाने वाली किताबें देखकर उन्होंने उत्साह से पूछा, “एंगेल्स की इन दोनों पुस्तकों को पढ़ने से कैसा लगा?”

“इन्हें पढ़ने का अनुभव बहुत ही जबर्दस्त है. मेरा नजरिया डार्विन और लुइस हेनरी मॉर्गन जैसा होता जा रहा है. मुझे मॉर्गन की Ancient Society हिन्दी में ऑनलाइन ‘प्राचीन समाज' के नाम से मिल गई है. मैंने इसे ऑर्डर भी कर दिया है.”

“क्या? यह किताब हिन्दी में उपलब्ध है तो मुझे भी बताओ, मैं एक अपने लिए और एक यहाँ लायब्रेरी के लिए मंगाता हूँ. यह मनुष्य और परिवार के विकास को समझने के लिए जरूरी किताब है. यहाँ होनी चाहिए.”

प्रशांत बाबू ने मेज पर हाथ टिकाते हुए बहुत आत्मीय स्वर में कहा, "और के. दामोदरन की किताब भारतीय चिंतन परंपरा कैसी लगी?”

“यह भी बढ़िया और जरूरी किताब है, पूरी नहीं पढ़ पायी, लेकिन यह मेरे पास होनी चाहिए, इसलिए मैंने इसे भी ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया है.”

“प्रिया, मुझे लगता है अब तुम्हें मार्क्स-एंगेल्स का ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’, कार्ल मार्क्स की 'फ्रांस में गृहयुद्ध' और लेनिन की 'राज्य और क्रांति' जरूर पढ़नी चाहिए. ये बुनियादी किताबें हैं जो मनुष्य समाज में वर्ग पैदा हो जाने से लेकर आज तक मौजूद रहे वर्ग संघर्ष को समझने में मदद करती हैं.”

प्रिया ने उत्सुकता से उनकी ओर देखा. प्रशांत बाबू ने शेल्फ से ये तीनों किताबें निकालीं और मेज पर रख दीं.

"इनको पढ़ने के बाद तुम जान सकोगी कि मज़दूरों की लड़ाई केवल वेतन और अपने लिए सुविधाएँ हासिल करने तक की नहीं है, अपितु यह व्यवस्था के चरित्र को बदलने के ऐतिहासिक दायित्व तक जाती है," प्रशांत बाबू ने कहा. प्रिया ने सम्मान और कौतुक के साथ उन किताबों को छुआ और तीनों पुस्तकें अपने नाम पर इश्यू करवा लीं. उन किताबों को अपने बैग में रखते हुए उसे महसूस हुआ कि ज्ञान अर्जित करने की कोई सीमा नहीं, मनुष्य जीवन में प्रत्येक समय ज्ञान अर्जित कर रहा होता है, यदि उसने अपनी ज्ञानेन्द्रियाँ ही अवरुद्ध न कर रखी हों.

एक बजे की बैठक के लिए प्रशांत बाबू, और सचिव शिंदे पहले से ही मेज के गिर्द कुर्सियों पर बैठे थे. प्रिया वहाँ आयी और बैठने को थी कि कॉमरेड कुलकर्णी ने करीब 25 वर्ष उम्र की साँवली लड़की के साथ कमरे में प्रवेश किया. उन्हें देख सभी खड़े हो गए, कॉमरेड कुलकर्णी को अभिवादन किया, वे कुर्सी पर बैठे और सबको बैठने को कहा. कुलकर्णी जी ने लड़की का परिचय दिया, “ये कणिका जोशी, मेरी भांजी है. इसने अभी साल भर पहले पॉपुलेशन साइंस (जनसंख्या विज्ञान) में मास्टर डिग्री की है और अपने इंस्टीट्यूट के ही एक प्रोजेक्ट में काम कर रही है. यह इस तरह की रिसर्च के लिए प्रोफेशनली ट्रेंड है. यह हमारे अध्ययन को पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से करने में हमारी मदद करेगी. यह खुद भी इस रिसर्च के लिए बहुत उत्सुक है.”

सभी ने कणिका को अभिवादन किया और फिर अपना-अपना परिचय उसे दिया. प्रिया का परिचय सुनकर कणिका के मुँह से निकला, “अरे वाह! आपसे तो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“अभी तो मैं यहाँ आपसे सीखने के लिए आई हूँ.” प्रिया ने उत्तर दिया. उसे लगा कि मुंबई में उसे एक स्थानीय मित्र मिलने वाली है.

कणिका ने सबसे पहले प्रशांत बाबू और कुलकर्णी जी से सर्वे के मूल उद्देश्य को समझा. उसने पूछा, "हमें यह डेटा सिर्फ आंतरिक रणनीति के लिए चाहिए या कोर्ट और इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में चल रहे मुकदमों में अपना पक्ष साबित करने के लिए भी?"

कुलकर्णी जी ने जवाब दिया, "दोनों के लिए, कणिका. लेकिन मुख्य उद्देश्य ट्रिब्यूनल में यह साबित करना है कि मैनेजमेंट मजदूरों की आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें जबरन वीआरएस (VRS) की तरफ धकेल रहा है."

इसके बाद प्रश्नावली पर चर्चा शुरू हुई. कणिका ने अपनी वैज्ञानिक समझ के हिसाब से कुछ बेहतरीन प्रश्नों का सुझाव दिया जो मजदूरों की जन-सांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति को सांख्यिकीय (Statistical) रूप से पुख्ता करते थे. प्रिया ने भी बीच में हस्तक्षेप करते हुए कुछ अत्यंत व्यावहारिक प्रश्नों का सुझाव दिया, जो उसने पिछले दिनों मज़दूरों की बस्तियों और रामजी काका के यहाँ बातचीत के दौरान महसूस किए थे—जैसे ट्रक सिस्टम के कारण उन पर बढ़ा साहूकारों का कर्ज और बच्चों की पढ़ाई का खर्च.

कणिका, प्रिया की इस जमीनी पकड़ से बहुत प्रभावित हुई. उसने अपने नोट्स समेटते हुए कहा, "उद्देश्य अब पूरी तरह स्पष्ट है. आज रात मैं इन सभी बिंदुओं को मिलाकर अंतिम प्रश्नावली और डेटा फॉर्म तैयार कर लूंगी. कल, यानी रविवार को, मैं सर्वे के लिए जाने वाले यूनियन के कार्यकारिणी सदस्यों के साथ बैठक करूंगी. मैं उन्हें यह फॉर्म सौंपूंगी और बाकायदा ट्रेनिंग दूंगी कि मज़दूरों के घरों या चालों में जाकर उनसे कैसे मिलना है, उनका भरोसा कैसे जीतना है और बिना किसी पूर्वाग्रह के इस प्रश्नावली को सही-सही कैसे भरवाना है."

दोपहर डेढ़ बजे आकाश अंधेरी ईस्ट में सातवाँ फ्लैट देखने के बाद नीचे सड़क पर आया. वह एक अजीब कशमकश और असमंजस में घिरा हुआ था. उसने आज दो बिल्कुल विपरीत विकल्प देखे थे. पहला विकल्प पवई में था—एक बेहद सभी जरूरी सुविधाओं और आधुनिक उपकरणों ए.सी., पंखे, फ्रिज, वाशिंग मशीन, बेड, किचन के सभी उपकरणों से लैस फ्लैट था जिसमें उसे केवल बेड के चादर बदलने थे और अपना सूटकेस जाकर रखना था. यह विक्रोली में उसके नए ऑफिस के बिल्कुल नजदीक था. वहाँ जाने-आने का समय और खर्चा बचता, लेकिन उसका रेंट अधिक था.

दूसरा विकल्प उसने अभी अंधेरी ईस्ट में देखा था—सीलन की हल्की गंध वाला छोटा 1BHK, जिसका किराया उसके बजट में था. हालांकि वह ऑफिस से दूर था, लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि यह इलाका प्रिया के फ्लैट के बेहद नजदीक था. पवई की सुख-सुविधाएं और ऑफिस की नजदीकी एक तरफ थीं, और प्रिया का सामीप्य तथा बजट दूसरी तरफ.

आकाश इस दुविधा का फैसला अकेले नहीं कर पा रहा था. वह चाहता था कि कोई भी निर्णय फाइनल करने से पहले वह ये दोनों फ्लैट एक बार प्रिया को दिखाए और उसकी राय ले. उसने अपनी इस कशमकश को साझा करने के लिए जेब से मोबाइल निकाला और प्रिया का नंबर डायल किया...
... क्रमशः

रविवार, 17 मई 2026

तलाश

देहरी के पार, कड़ी - 53
सोमवार सुबह प्रिया की आँखें खुलीं तो उसने आदत के मुताबिक बेड साइड टेबल पर रखा मोबाइल उठा कर समय देखा, ठीक छह बजे थे. उठने का समय हो गया था, लेकिन उसे लगा कि अभी शरीर से थकान पूरी तरह निकली नहीं है. अगले शुक्रवार तक उसके पास रूटीन कामों के सिवा करने को कुछ नहीं था. उसने फिर से करवट लेकर आँखें मूंद लीं. सोने की कोशिश करने पर भी दुबारा आँख नहीं लगी. आखिर आधे घंटे में ही उठकर चाय के लिए पानी चढ़ा दिया और खुद बाथरूम के बाहर वाले वाशबेसिन पर खड़ी होकर ब्रश करने लगी. आकाश को आज अपनी नई नौकरी पर जॉइन करना है. उसे अपने रहने के लिए जल्दी ही कोई फ्लैट भी देखना होगा. उसे ध्यान आया कि किचन और बाथरूम में बहुत से सामान समाप्त होने को हैं. पूरे सप्ताह वह घर से बाहर वाले कपड़े नहीं धो पाई थी, उन्हें धोना है. यूनियन ऑफिस की लायब्रेरी से वह कुछ पुस्तकें लाई थी, उन्हें भी पढ़कर लौटाना है. चाय का कप लेकर बैठी तो वह मन ही मन हँस पड़ी कि वह सोचती थी, इस सप्ताह खूब फुरसत रहेगी. लेकिन जब खुद अपने बारे में सोचा तो इतने काम निकल आए जो उसे पूरे सप्ताह व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त थे.

आकाश ने सोमवार सुबह जॉइन कर लिया. ऑफिस में अपने बैठने की जगह और कंप्यूटर संभाला, ऑफिस के सहकर्मियों से परिचय किया और काम की प्रकृति को समझने की कोशिश की. इसी में दिन पूरा हो गया. उसकी किस प्रोजेक्ट पर क्या भूमिका होगी, यह अगले कुछ दिनों में तय होना था. ऑफिस से निकलकर वह गेस्ट हाउस पहुँचा तो रात के नौ बज चुके थे. उसने कपड़े बदले, गेस्ट हाउस कैंटीन को फोन करके रात के खाने के लिए ऑर्डर किया. तभी फोन की घंटी बज उठी, प्रिया थी.

"नमस्ते आज का दिन कैसा रहा, आकाश?" दिनभर की थकान के बाद फोन पर प्रिया की आवाज़ सुनना ऐसा लगा जैसे अजनबियों के साथ यात्रा करते हुए बीच के किसी स्टेशन पर अचानक कोई परिचित सामने आ खड़ा हुआ हो.

“नमस्ते प्रिया, दिन बिलकुल वैसा ही था जैसा किसी भी नई नौकरी में होता है, बिलकुल रूटीन. ऐसा लगता है यह सप्ताह तो नई कंपनी और नए काम को समझने में निकल जाएगा. असली काम तो अगले सप्ताह तक ही शुरू होगा.” आकाश ने उत्तर दिया.

“फ्लैट के बारे में क्या सोचा?”

“ऑफिस के लोगों ने अंधेरी से पवई तक के बीच काम करने वाले दो प्रोपर्टी डीलरों के नंबर दिए हैं. सुबह आठ से नौ के बीच उनसे बात करूंगा, उसके बाद देखता हूँ कब फ्लैट देखने जा सकूंगा. मुझे लगता है यह शनिवार के पहले संभव नहीं होगा.” आकाश ने हंसते हुए कहा, लेकिन प्रिया ने उसकी आवाज़ में एक अनजानी घबराहट साफ़ की.

“तुमने कल रामजी काका का नंबर लिया था. उनसे फोन पर पूछना. वे उसी इलाके में काम करने वाला प्रोपर्टी डीलर बता देंगे. वे लंबे समय से इस इलाके में हैं, प्रोपर्टी डीलर उनका लिहाज भी करेगा.” प्रिया ने सुझाया.

“हाँ, यह ठीक है. मैं उनसे भी बात करता हूँ.” आगे बात हो पाती उससे पहले ही फोन वाइब्रेट करने लगा, जयपुर से माँ का फोन था. उसने प्रिया को कहा, “जयपुर से माँ का फोन आ रहा है. उसे लेता हूँ. हम कल बात करते हैं” और फोन काट दिया.

वह पूरे सप्ताह समय के पहिये के साथ चलता रहा. ग्यारह से आठ कॉर्पोरेट शिफ्ट को साधना, आकाश की पहली जरूरत थी. रात गेस्ट हाउस पहुँचकर खाने का ऑर्डर करना, फ्रेश होकर खाने के इंतजार में टीवी देखना. खाने के बाद पंद्रह मिनट में उसे नींद आने लगती. वह सो जाता फिर सुबह छह बजे ही उसकी आँखें खुलतीं. नया प्रोजेक्ट, नए कलीग और उनके बीच खुद को साबित करने की होड़. इस पूरे मशीनी चक्र के बीच, उसके भीतर एक छटपटाहट लगातार बनी हुई थी—जल्द से जल्द इस शहर में अपना एक खूँटा गाड़ना, एक अदद फ्लैट ढूँढना.

प्रिया की स्थिति उससे कुछ अलग नहीं थी. ऑफिस से लौटकर वह खाना बनाती, खाती तब तक रात के दस बज जाते. बरतन और किचन साफ करके वह किताब लेकर बिस्तर पर लेट जाती और नींद आने तक पढ़ती रहती. उसने सुबह के समय लगातार दो दिन अपने बाहर वाले कपड़ों की धुलाई करके उन्हें प्रेस के लिए दिया. सामानों की सूची बनाई जिन्हें उसे अगले शनिवार बाजार से लाना था. उसने इस सप्ताह फ्रेडरिक एंगेल्स की दो किताबें ‘वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका’ और ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ पढ़ डाली थी. इन दोनों किताबों ने उसकी आँखें खोल दीं. वह अब जानती थी कि श्रम ने ही मनुष्य को मनुष्य बनाया और कैसे मानव परिवार विकसित होते हुए आज के समाज में बदला. इन दो किताबों को पढ़कर उसने अपने सोचने के नजरिए में गहरा बदलाव महसूस किया था. दूसरी किताब का एक आधार अमरीकी नृवंशशास्त्री लेविस हेनरी मोर्गन की लंबे शोध के बाद लिखी पुस्तक ‘प्राचीन समाज’ (Ancient Society) थी. इनके साथ ही वह के. दामोदरन की पुस्तक ‘भारतीय चिंतन परंपरा’ भी लाई थी. लेकिन वह उसके दो ही अध्याय पढ़ सकी. उसे लगा कि ये चारों किताबें हमेशा पास होना चाहिए. चारों किताबें इंटरनेट पर उपलब्ध मिल गयीं. उसने चारों ऑर्डर कर दीं. अब वह इन किताबों को लौटाकर कुछ दूसरी किताबें और ला सकती थी. इस व्यस्त हफ्ते में आकाश और प्रिया के पास एक-दूसरे के लिए सिर्फ रात के साढ़े नौ बजे के बाद के कुछ मिनट ही होते थे, जब दोनों फोन पर मिलते.

आखिर शुक्रवार की शाम मुम्बई की नम और पसीना टपकाती गर्मी में ठंडी फुहार की तरह आई. दोनों ने समय निकाला और रात के नौ बजे 'मेवाड़ भोजनालय' में मिले. रामजी काका ने दूर से ही दोनों के चेहरों की थकान भाँप ली थी. उन्होंने बिना पूछे ही उनके लिए आमरस और भात के साथ सादा भोजन लगवा दिया. वहाँ कोई लंबी वैचारिक या दार्शनिक बातें नहीं हुईं. बस, अपने घर जैसे खाने, आत्मीयता भरी गपशप और एक-दूसरे के साथ का सुकून मिला. वहीं रामजी काका से आकाश के लिए फ्लैट तलाश करने और प्रोपर्टी डीलर बताने की बात भी हुई.

डिनर के बाद बाहर निकलते हुए आकाश ने कहा, "प्रिया, कल जब मैं फ्लैट देखने निकलूंगा, तो मुझे ऐसा लगेगा जैसे मैं इस शहर का नागरिक होने की कवायद कर रहा हूँ." प्रिया ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा, "कल ही यूनियन ऑफिस में एनालिस्ट आने वाला है. उसके साथ बैठकर मजदूरों की राय जाने के लिए होने वाले सर्वे का कायदा और प्रश्नावली तय करनी है. मुझे अनेक नई बातें सीखने को मिलेंगी.”

खाने के बाद जब वे अपने-अपने आशियाने के लिए रवाना हुए, तो दोनों के मन में शनिवार को लेकर एक अजीब सा प्रतीक्षा और परीक्षा का भाव था.

शनिवार की सुबह ठीक दस बजे, आकाश के फोन की घंटी बजी. कोई प्रोपर्टी डीलर संदीप था जिसे रामजी काका ने उसका नंबर दिया था. कुछ ही देर में वह हाथ में चाबियों का एक बड़ा गुच्छा लिए अपनी कार सहित गेस्ट हाउस में था.

"सर, बजट के हिसाब से कुछ 1BHK मैंने शॉर्ट लिस्ट किए हैं, वे इन्हीं तीनों इलाकों में हैं. मुंबई में जगह छोटी मिलती है, लेकिन यहाँ लाइफ बड़ी है" संदीप ने अपनी पेशेवर मुस्कान के साथ कहा.

आकाश को संदीप ने डेढ़ बजे तक तीनों इलाकों में करीब सात फ्लैट दिखाए. अंत में उसने अंधेरी की एक सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल के एक फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर भीतर कदम रखा. कमरा इतना छोटा था कि कोटा या जयपुर के किसी बड़े मकान का छोटे से छोटा कमरा भी इससे बड़ा होता. दीवारें सीलन की हल्की गंध और मुंबई की हवा की नमी से भरी थीं. उसने खिड़की खोलकर बाहर देखा—सामने इमारतों का एक अनंत जंगल था, जिसमें हर खिड़की के पीछे एक अलग संघर्ष चल रहा था.

आकाश ने गहरी सांस ली और सोचने लगा, "क्या इस माचिस की डिब्बी जैसे स्पेस में मैं अपना घर देख पाऊँगा? क्या यही वह देहरी है, जहाँ से मुझे अपने नए जीवन की शुरुआत करनी है?"
... क्रमशः

शुक्रवार, 15 मई 2026

माँ से बात

देहरी के पार, कड़ी - 52
आकाश को मैसेज करने के बाद प्रिया ने किचन में जाकर देखा. चाय तैयार थी, बल्कि कुछ ज्यादा उबल चुकी थी. चाय छानकर, मग हाथ में लिए वह बिस्तर पर आ गई. आज पूरे दिन उसे व्यस्त रहना पड़ा था. सुखद बात यह थी कि दिन के अधिक समय वह आकाश के साथ थी. उसने नोट किया था कि जितनी देर आकाश उसके साथ रहा, सकुचाता रहा. आखिर उसे किस बात का संकोच था? और मैसेज में वह डर वाली बात, आखिर वह किस बात से डर रहा था? उसने याद करने की कोशिश की कि वह जितनी देर आकाश के साथ रही, क्या-क्या हुआ था?

‘हो सकता है उसके अलसुबह जल्दी बोरिवली स्टेशन पहुँच जाने से वह आश्चर्यचकित हुआ हो. कोटा और जयपुर में एक अकेली लड़की का सुबह पाँच बजे किसी हमउम्र लड़के को रिसीव करने के लिए स्टेशन पहुँचना अजूबा होता. लेकिन मुंबई में तो यह सहज सामान्य बात थी. उसे अपने फ्लैट में ले आना और पाँच घंटों से अधिक एक साथ रहना भी शायद उसे अजीब लगा हो. वहाँ जयपुर या कोटा में यह निश्चित ही संभव नहीं होता. हो सकता है उसके फ्लैट में रहने के दौरान वह इस बात से डर रहा हो कि कहीं कोई उसके फ्लैट की घंटी न बजा बैठे और उन दोनों को अकेले देख उनके बारे में कुछ ऊट-पटांग न सोचने लगे..’ वह मन ही मन हँस पड़ी. ‘तब तो जब वे यहाँ से एमबी के लिए निकले तब आकाश ने ज़रूर राहत की साँस ली होगी. उसके बाद रामजी काका और उनके स्टाफ का व्यवहार, और फिर बब्बन भाई के साथ ऑटो का सफर, पता नहीं बब्बन भाई ने उससे न जाने क्या बातें की होंगी.”

‘तो क्या यहाँ यूनियन के लोगों के साथ उसके संबंध बनना और यूनियन के कामों में उसकी तन मन से संलिप्तता ने उसे डराया होगा? ... खैर वह इतना क्यों सोच रही है, मिलने पर सब कुछ साफ हो जाएगा. यदि उसने स्पष्ट नहीं किया तो वह खुद पूछ लेगी कि वह किस बात से डर रहा था.’

उसने उठकर चाय का प्याला सिंक में रखा. सोचने लगी शाम के खाने में क्या बनाए. फिर उसने थोड़े से चावल निकालकर कुकर में पकने के लिए गैस पर चढ़ाया और अरहर की दाल को कटोरी में भीगने के लिए छोड़ दिया.

वह वापस अपने बिस्तर पर पहुँची. उसे ध्यान आया कि कितने ही दिन हो गए हैं, माँ से बात नहीं हुई है. उसने फोन उठाकर माँ को लगाया. पूरी घंटी जाने पर भी फोन रिसीव न होने पर उसने फोन रख दिया. हो सकता है माँ किसी काम में व्यस्त हो और फोन न उठा पा रही हो. तभी फोन की घंटी बज उठी. माँ ही थी.

“हेलो मम्मी कैसी हैं?”

“मैं ठीक हूँ पर तुझे आज कैसे मेरी याद आ गई? पता है पूरे आठ दिन हो गए हैं बात किए हुए. लगता है तू मुझे तो बिलकुल भूल ही गई है.” माँ ने उलाहना दिया.

“कैसी बात करती हो मम्मी? अपनी माँ को कोई भूल सकता है क्या? बस कुछ कामों में व्यस्त रही तो बात नहीं कर पाई. अब आज मैंने ही तो फोन किया न?”

“हाँ हाँ ठीक है, जब तुझे याद आ जाती है तो फोन करती है. वैसे तो भूल ही गई है.” इस बात पर प्रिया को हँसी आ गयी.

“अच्छा ये बता, पापा कैसे हैं?”

“ठीक हैं, रोज मंडी जाते हैं. कारोबार पूरी तरह संभाल लिया है, मयंक को पढ़ाई के लिए बिल्कुल फ्री कर दिया है. आज दिनभर से घर पर ही थे. अभी शाम को सात बजे निकले हैं अपने दोस्तों से मिलने. अब आने में रात के दस बजेंगे.”

“और मयंक कैसा है?”

“बिलकुल ठीक है, वह भी घूमने गया है. वह भी वही दस बजे तक लौटेगा. तूने सबकी पूछ ली, अब तेरी भी बता. तेरा क्या चल रहा है? तेरी नौकरी कैसी चल रही है? मयंक ने बताया था कि तू किसी यूनियन के काम में पड़ गई है. उसमें किसी तरह के लड़ाई-झगड़े तो नहीं होते न? यहाँ पहले कारखानों में एक से ज्यादा यूनियनें थीं. वे आपस में लड़ते थे तो खून-खच्चर हो जाते थे. वैसा वहाँ तो नहीं है न? तू फालतू ही इस पचड़े में पड़ गई है. तुझे यूनियन से क्या काम? अच्छी खासी नौकरी करती है, बढ़िया तनखा है, जैसे भी हो इससे दूर ही रहना चाहिए.” माँ ने चिंता व्यक्त की.

“नहीं माँ ऐसा कुछ नहीं है. पता नहीं मयंक ने आपको क्या कह दिया है. जब मैं यहाँ आई और विक्रांत ने मुझे परेशान करने की कोशिश की तो इन्हीं यूनियन वालों ने बिना किसी स्वार्थ के मेरा साथ दिया और विक्रांत को जेल की हवा खानी पड़ी. अब वे अपने वेतन और नौकरी के लिए लड़ रहे हैं, तो मैं लिखने-पढ़ने में उनकी मदद कर देती हूँ. किसी तरह की कोई रिस्क नहीं है. तू चिन्ता मत कर. और हाँ, आप जयपुर वाले आकाश को जानती हैं न? वही, जो मेरा लैपटॉप लेने आया था.”

“हाँ, जानती हूँ. वह अभी कुछ दिन पहले भी आया था. जब एक काली गाड़ी अपने मकान के सामने खड़ी रहने लगी थी.”

“हाँ वही, अब वह वहाँ आपकी तसल्ली के लिए आया था न, बस ऐसे ही हम एक दूसरे की मदद करते हैं. आकाश ने कंपनी बदल ली है और यहाँ दूसरी कंपनी में जॉइन करेगा. आज ही मुंबई पहुँचा है.”

“यह तो अच्छा हुआ, कम से कम वहाँ एक आदमी तो जान पहचान का हुआ.” माँ ने ऐसे कहा जैसे उन्हें आकाश के मुंबई पहुँचने की खबर से उसे बहुत तसल्ली हो गयी हो. प्रिया की हँसी फूट पड़ी.

“मम्मी, तू भी न. यहाँ बहुत जान पहचान वाले हैं. तू मुम्बई आकर देख, सबसे मिलाऊंगी, तो तेरी पूरी तसल्ली हो जाएगी. अच्छा मम्मी मैं रखती हूँ, मयंक आए तो कहना मुझ से बात कर लेगा.”

माँ से बात करके प्रिया ने खुद को बहुत हल्का महसूस किया. कुकर पर्याप्त सीटी ले चुका था. उसने कुकर को गैस से उतारकर देखा. चावल पक गए थे. उसने उन्हें अलग बरतन में निकाल कर उसी कुकर में दाल पकने को चढ़ा दी.

सोमवार सुबह आकाश विक्रोली की उस ऊँची कॉरपोरेट बिल्डिंग के रिसेप्शन पर खड़ा था, जिसमें उसकी नयी एम्पलॉयर कंपनी का कार्यालय था. यहाँ पहुँचकर उसे अहसास हुआ कि अब उसके जीवन का एक और नया अध्याय शुरू हो चुका है. ग्यारह से आठ की शिफ्ट, बीच में घंटे भर का विश्राम—एक ऐसा चक्र जो अब उसकी रोज की जिन्दगी का हिस्सा बनने वाला था. नई कंपनी में नया प्रोजेक्ट, उसके लिए नई प्रोफेशनल चुनौतियाँ लाएगा. फिलहाल उस पर सबसे बड़ा दबाव—जल्द से जल्द एक स्थाई आशियाना तलाशना था. गेस्ट हाउस में न तो अधिक दिन रह सकते हैं और न ही वहाँ अपने घर जैसा अहसास होता है. उसे सुबह ऑफिस जाने से पहले ही किसी प्रॉपर्टी डीलर से मिलकर बताना होगा कि उसे किस तरह का आवास चाहिए.
... क्रमशः

बुधवार, 13 मई 2026

समानांतर मोर्चे

देहरी के पार, कड़ी - 51
आकाश को प्रिया ने आटोरिक्शा में बिठाकर विदा किया तो वह भी बाहर सिर निकालकर उसे ओझल होने तक देखता रहा. बब्बन भाई ने कुशलता से अपना रिक्शा अंधेरी की भीड़भाड़ वाली सड़क से निकालकर विक्रोली की ओर मोड़ दिया. आकाश की आँखों में उसे विदा करती प्रिया की छवि अब भी तैर रही थी.

प्रिया की छवि ने आकाश के मन में एक विचित्र हलचल पैदा कर दी थी. उससे पहली बार कोटा में प्रत्यक्ष मिलने के बाद तीन रात जयपुर में साथ बिताने के बीच प्रिया उसे अच्छी लगने लगी थी. लेकिन कंपनी के नियमों के चलते वह उसकी चाहत के उस दायरे से बाहर रही जो उसे जीवनसाथी बनाने की ओर बढ़ता.. लेकिन जैसे ही आकाश ने कंपनी स्विच की, प्रिया उसकी चाहत के उस दायरे में प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया को उसने अब तक केवल एक गंभीर प्रोफेशनल और संकट में घिरी एक युवती के रूप में देखा था, लेकिन आज मुंबई की सड़कों पर उसकी 'पहुँच' और लोगों का उसके प्रति 'सम्मान' देखकर वह चकित था. बब्बन भाई जैसे मेहनतकश का उसे 'दीदी' कहना और रामजी काका का उस पर अगाध भरोसा—आकाश को समझ आ रहा था कि प्रिया ने इस शहर में आकर सिर्फ नौकरी नहीं की थी, बल्कि अपने आचरण से एक स्थान हासिल कर लिया था. वह मुम्बई में रोजगार के लिए आकर रहने वाली सामान्य लड़की नहीं लगती थी, बल्कि ऐसा लगता था जैसे वह यहीं कहीं पैदा हुई, और पली बढ़ी थी. उसमें इस शहर के प्रति अजनबीपन पूरी तरह समाप्त हो चुका था. उसे ऐसा लगा कि वह जयपुर में उसके जितने निकट आई थी उतनी ही दूर चली गई थी.

विक्रोली के गेस्ट हाउस पहुँचते-पहुँचते आकाश के मन में यह विचार पुख्ता हो गया कि प्रिया के साथ जुड़ना आसान नहीं होगा. प्रिया के विस्तृत और संघर्षशील व्यक्तित्व को स्वीकार करना होगा. इसके लिए उसे प्रिया को और गहराई के साथ समझने की कोशिश करनी होगी. उसे खुद भी अपने व्यक्तित्व को विस्तार देना होगा और उसके व्यक्तित्व से दूरी कम करनी होगी. उसने अपना सामान कमरे में रखा और खिड़की से बाहर फैली मुंबई की इमारतों की ऊँचाइयाँ देखते हुए सोचा, "क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ? क्या मैं यह कर सकूंगा?"

आईआईडीईए के उस छोटे हॉल में कुछ कुर्सियाँ बढ़ा दी गई थीं, अब वहाँ 24 लोग बैठ सकते थे. कार्यसमिति के 21 में से 19 सदस्य ही आए थे. एक सदस्य के रिश्ते में किसी का देहान्त हो गया था और एक किसी जरूरी काम से मुंबई से बाहर था. बैठक में प्रशांत बाबू और कुलकर्णी जी सहित 21 व्यक्ति थे. कमरे में ज्यादा लोगों के कारण उमस बढ़ गई थी, पंखा अपनी पूरी रफ्तार से चलते रहने के बावजूद उसे कम करने में नाकाम था.

जैसे ही सचिव शिंदे ने 'प्रोफेशनल रिसर्च एनालिस्ट' बुक करने, उससे प्रश्नावली तैयार करवाने और कुछ घंटों की ट्रेनिंग के साथ 'साइंटिफिक सर्वे' का औपचारिक प्रस्ताव रखा, हॉल में विरोध के स्वर उभरने लगे. एक वरिष्ठ सदस्य ने मेज थपथपाते हुए कहा, "शिंदे, हमें इन बाहरी पढ़े-लिखे लोगों की क्या ज़रूरत है? हम बरसों से अपने मजदूर साथियों के साथ जी रहे हैं. हम जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं. यह सर्वे सिर्फ वक्त की बर्बादी है और इससे मैनेजमेंट को हमारी रणनीति का पता चल जाएगा."

बहस गरम हो गई. कुछ सदस्यों को लगा कि यह 'सर्वे' दरअसल उनकी अपनी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. प्रशांत बाबू शांत थे, वे जानते थे कि यह प्रतिरोध होना ही था. उन्होंने सभी सदस्यों को इस विषय पर अपने विचार रखने को कहा. फ्रेक्शन में उपस्थित सदस्यों सहित कुल 9 सदस्यों ने ही इस सर्वे के समर्थन में राय दी, बाकी सबने उसे व्यर्थ बताया. इस मुद्दे पर बहस इतनी तेज हो गई कि दो-तीन मेंबर एक साथ ऊँची आवाज में बोलने लगे.

कॉमरेड कुलकर्णी ने हस्तक्षेप कर ऊँचा बोलने वालों को चुप कराया. “यह बैठक कुछ निर्णय लेने के लिए बुलाई गयी है. उसके लिए विचार विमर्श सहज रीति से हो सकता है. सब अपनी राय शांति से रख सकते हैं. अब जिस बिंदु पर विवाद है, पहले हमें समझ लेने चाहिए उसके बाद हम फिर से राय कर सकते हैं. यहाँ कितने लोग हैं जो एक विज्ञान सम्मत रीति से किए जाने वाले सर्वे के लाभों और नुकसान के बारे में समझते हैं?”

इस प्रश्न से बैठक में एकदम शांति छा गई. उनमें से कोई भी सर्वे के तरीके के बारे में कोई जानकारी नहीं रखता था. कॉमरेड कुलकर्णी ने बोलना जारी रखा. “पहले तो आप सबको यह समझना चाहिए कि यह सर्वे हमारी राय बदलने के लिए नहीं, बल्कि हमारी राय को 'सबूत' में बदलने के लिए है. इसके दो उद्देश्य हैं. एक तो मजदूरों की राय स्पष्ट रूप से हमारे सामने आ जाए. दूसरे जब इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में बात हो तो हम मैनेजमेंट के तर्क का कि मजदूर खुश हैं हम जवाब दे सकें. तब हमारे पास सबूत होगा. यह सर्वे वह दस्तावेज़ बनेगा जिसे अदालत नकार नहीं सकेगी."

कॉमरेड कुलकर्णी के 'कोर्ट', 'सबूत' और स्पष्ट राय वाले तर्क से विरोधी कुछ शांत हुए. प्रशांत बाबू ने मौके का फायदा उठाते हुए जोड़ा, "अगर हम विज्ञान और डेटा का साथ नहीं लेंगे, तो पूंजीवाद हमें पुरानी तकनीकों की तरह ही कुचल देगा." काफी तर्क-वितर्क के बाद, प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया, हालांकि दो-तीन चेहरे फिर भी तने हुए नजर आते रहे.

फ्रेक्शन मीटिंग से घर लौटते समय शेयरिंग ऑटो में बैठी प्रिया ने अपनी आँखें मूँद लीं. वह आज के दिन के बारे में सोचने लगी. सुबह पाँच बजे उठना, स्टेशन पहुँचकर आकाश को रिसीव करना, उसका छह घंटों का साथ, उसे विदा करने के बाद फ्रेक्शन मीटिंग— सब कुछ उसके मस्तिष्क पटल पर किसी फिल्म के दृश्यों की तरह चल रहा था.

उसे महसूस हुआ कि उसका अपना जीवन अब दो समानांतर मोर्चों पर चल रहा था. एक मोर्चा 'व्यक्तिगत' था, जहाँ आकाश का साथ उसे एक शांत कोमलता से भर देता था, और दूसरा मोर्चा 'सामाजिक' था, जहाँ हर कदम पर वह सहज ही रणनीति का हिस्सा बन जाती थी.

फ्लैट का दरवाज़ा खोलते ही उसे उस सन्नाटे का अहसास हुआ जो आकाश के जाने के बाद और गहरा गया था. उसने चाय के लिए दूध, चीनी, पत्ती और पानी सब एक साथ पतीली में डाल गैस पर चढ़ा दिया और बालकनी में आकर खड़ी हो गई. आज उसने एक बहुत बड़ी जीत हासिल की थी—फ्रेक्शन को एक आधुनिक सोच के लिए मनाना आसान नहीं था.

तभी उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी. आकाश का मैसेज था. "प्रिया, तुम्हें आज मुंबई में फिर से देखा तुम्हारा सुबह जल्दी उठकर बोरिवली स्टेशन पर मुझे लेने आना, अपने घर ले जाना, फिर रामजी का मेवाड़ भोजनालय, तुम्हारा मीटिंग में समय से पहुँचने का जुनून और फिर वे बब्बन भाई जो मुझे छोड़ने आए. इन सब के बीच तुम्हारे व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू आज मैंने देखा, तुम कुछ अपरिचित सी लगने लगी. तुम्हारे इस रूप ने मुझे गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन उसे देख मन कुछ भय भी पैदा हुए. उनपर मिलने पर बात करेंगे. उम्मीद है तुम्हारी मीटिंग सफल रही होगी."

मुस्कुराते हुए मैसेज का जवाब टाइप करने लगी— "मीटिंग सफल रही, आकाश. हम बात करेंगे लेकिन ये मुंबई अभी तुम्हें और भी बहुत कुछ दिखाएगी."
... क्रमशः

मंगलवार, 12 मई 2026

फ्रेक्शन मीटिंग

देहरी के पार, कड़ी - 50
वह आकाश के ऑटोरिक्शा को तब तक देखती रही जब तक कि वह आँखों से ओझल न हो गया. उसने अपनी घड़ी देखी, 1:35 हो चुके थे. उसे दो बजे आईआईडीईए ऑफिस पहुँचना था. वह तुरंत ऑफिस की दिशा में जाते हुए एक शेयरिंग ऑटो में बैठ गई.

रिसेप्शन में उसे बताया गया कि मीटिंग छोटे हॉल में है. यहाँ लकड़ी की पुरानी अंडाकार मेज हॉल के आधे भाग में रखी थी. मेज पर स्लेटी रंग का कपड़ा बिछा था. जिसके गिर्द प्लास्टिक की 12 कुर्सियाँ रखी थीं. प्रशांत बाबू, कॉमरेड कुलकर्णी, यूनियन अध्यक्ष उल्लास कामठे और सचिव शिंदे, पांच अन्य कार्यसमिति सदस्य आपस में बातचीत में मशगूल थे. यूनियन सचिव शिंदे के सामने एक रजिस्टर और दो सूचियाँ रखी थीं. जो संभवतः ईसीआई में काम करने वाले सभी मजदूरों की और यूनियन के सदस्यों की रही होंगी.

प्रिया के अंदर आते ही प्रशांत बाबू ने उसे बैठने का संकेत दिया. कुलकर्णी जी ने कहा, “प्रिया भी आ गयी है अब मीटिंग शुरू की जाए.”

“बिल्कुल ठीक.” प्रशांत बाबू ने कहा. “कॉमरेड शिंदे आप शुरू करें.”

शिंदे ने बोलना शुरू किया. “कॉमरेड, हमारी मूल समस्या वेतन की है. फैक्ट्री में जो भुगतान योग्य वेतन मजदूरों को मिलता है वह दूसरी फैक्टरियों से आधा भी नहीं होता. ट्रक सिस्टम में एम्पलॉइज शॉप से मिलने वाले सामानों की कीमतों और बाजार कीमतों के अंतर को जोड़ लें तब भी यह वे अन्य फैक्टरियों के मजदूरों के वेतन का 65 से 70 प्रतिशत रह जाता है. कम वेतन के कारण मजदूरों के परिवारों की आर्थिक हालत हमेशा कमजोर बनी रहती है और अक्सर वे कर्ज में रहते हैं. इससे मजदूरों की पत्नियों को अनिवार्य रूप से काम करना पड़ता है. अनेक के घरों में घर से किए जाने वाले काम कर रखे हैं, जिसमें बच्चे भी जुटे रहते हैं, उनकी पढ़ाई बाधित होती है. फैक्ट्री से छूटने के बाद घर पहुँच कर मजदूर खुद भी उसी काम में जुट जाता है. लोग अपने घरों में जो काम कर रहे हैं वह उन्हें अधिक मूल्यवान लगता है. अधिकांश परिवार यह समझते हैं कि यदि मजदूर नौकरी छोड़कर दूसरा काम करने लगे, या परिवार के में ही जुट जाए, तो इस नौकरी से होने वाली कमाई से अधिक कमा सकता है. मेरे खुद के परिवार तक में ऐसी ही स्थिति है. मुझे रोज इस दबाव को सहन करना पड़ता है. प्रिया दीदी और उनके साथी मेरे घर होकर आए हैं. वे खुद इसी नतीजे पर पहुँचे. हमने जब ट्रक सिस्टम समाप्त करने और फेयर वेजेज के लिए हड़ताल शुरू की थी तब सब इस बात पर उतारू थे कि मालिक फैक्ट्री बंद भी कर दे तो वे भुगत लेंगे. ऐसी हालत में कम से कम उन्हें ग्रेच्युटी, छंटनी का मुआवजा और प्रोविडेंट फंड तो मिल जाएगा. तब से लेकर आज तक मजदूरों की सोच में कोई बदलाव हुआ है, मुझे नहीं लगता. इसलिए यदि वीआरएस (स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति) का प्रस्ताव आया तो अधिकांश मजदूर उसे स्वीकार करने की स्थिति में होंगे. मुझे बस इतना ही कहना है, हो सकता है हम में से कोई इससे अलग राय भी रखता हो.”

कॉमरेड शिंदे ने अपनी बात समाप्त की और उनके बाद एक सदस्य कॉमरेड राम लुभावन को छोड़कर शेष सभी पार्टी सदस्यों ने कॉमरेड शिंदे की राय से सहमति प्रकट की. कॉमरेड राम लुभावन का कहना था कि “फैक्ट्री में करीब 25 से 50 मजदूर ऐसे हैं जिनकी उम्र 55 साल से ऊपर की है, उनमें से अधिकांश ये सोचते हैं कि यह नौकरी चलती रहे तो बेहतर है. इन मजदूरों के घरों में इनके बच्चे जॉब में लग गए हैं या खुद अपना काम करते हैं जिससे उन्हें अच्छी आय हो जाती है. इनमें से अधिकांश किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते. ट्रक सिस्टम समाप्त हो और मजदूरों को फेयर वेजेज मिलने लगे, ये तो वे भी चाहते हैं. यह तो साफ ही है कि ट्रक सिस्टम अब नहीं रहेगा. सारी बात इस तथ्य पर निर्भर करेगी कि अब उन्हें वेतन कितना मिलता है.”

प्रशांत बाबू ने अपनी बात जोड़ी, "बिल्कुल. मैनेजमेंट ने अब 'क्रेडिट वाउचर्स' देना और राशन की दुकान पर कुछ सामान बढ़ाकर जो छोटी-छोटी राहतें दे रहा है, वे दरअसल मजदूरों के उस गुस्से को शांत करने के लिए हैं जो 'ट्रक सिस्टम' के खिलाफ था. वे चाहते हैं कि मजदूर यह सोचने लगें कि मैनेजमेंट कुछ सुधार कर देगा, ट्रक सिस्टम न रहेगा लेकिन उसके बावजूद उन्हें फेयर वेतन नहीं देगा. सारा दारोमदार इस बात पर है कि इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल क्या फैसला देती है? और कब देती है? हमारी अदालतों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे जल्दी फैसला नहीं देतीं. प्रबंधन इधर-उधर के फिजूल के आवेदन पेश करके उसमें देरी करने की कोशिश करेगा. वह यही चाहता है कि जैसे-तैसे 30-35 प्रतिशत मजदूरों को वीआरएस लेने के लिए मना ले. यदि ऐसा हुआ तो यूनियन वीआरएस स्कीम में बेहतर शर्तों पर आज बारगेनिंग कर सकती है, तब नहीं कर सकेगी. स्थिति वाकई विकट है, इसलिए जरूरी है कि हमारे कार्यकारिणी सदस्य सभी मजदूरों तक जाएँ और जानें कि वे क्या चाहते हैं. उसके बाद ही हम आगे के संघर्ष की रूपरेखा बना सकते हैं. मेरे विचार में हमें रूपरेखा तय कर लेनी चाहिए कि यह सर्वे कैसे होगा?”

कॉमरेड कुलकर्णी ने प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, तुमने जो रैंडम सर्वे किया था, उसके आधार पर और तकनीक के क्षेत्र में परिवर्तनों के आधार पर तुम्हारी राय क्या है?"

प्रिया ने अपना टैबलेट खोला और डेटा दिखाते हुए कहा, "सर, आज स्थिति यह है कि इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने की तकनीक बहुत विकसित हो गयी है. इस फैक्ट्री ने पिछले चार-पाँच सालों से अपनी तकनीक में कोई विकास नहीं किया है. जिसके कारण इसका मुनाफा नई इकाइयों की अपेक्षा कम हुआ है. इसके ग्राहकों की संख्या कम हुई है, क्योंकि सब अपने उत्पादनों में एडवांस आई. सी. लगाना चाहते हैं. नयी इकाइयों के साथ बाजार में बने रहने के लिए इन्हें अपनी तकनीक का नवीनीकरण करना होगा, जिसमें इन्हें पूंजी लगाना होगा. संभवतः इसीलिए कंपनी इस इकाई को बंद करके इसकी जमीन को औद्योगिक आवासीय या व्यवसायिक में परिवर्तित करवाकर बिल्डरों की मदद से अच्छा मुनाफा काटना चाहती है. वह मामूली पूंजी लगाकर किसी नए औद्योगिक क्षेत्र में बैंकों से 70-80 प्रतिशत सस्ता ऋण लेकर नयी यूनिट लगाने की जुगत में है. वहाँ कंपनी को अच्छी सब्सिडी मिल जाएगी और अनेक प्रकार के टैक्सों से कम से कम पाँच साल के लिए छूट मिल जाएगी. कंपनी का यही प्लान है तो बहुत अच्छा है, वह इस प्लान को बदलने के लिए तैयार नहीं होगी. इस स्थिति में यूनियन ने ठीक से बारगेनिंग की तो वीआरएस पैकेज बढ़िया हो सकता है. अब स्थिति यह बन चुकी है कि इस फैक्ट्री को बंद होने से रोका नहीं जा सकेगा. बस उसे कुछ समय टाला जा सकता है.”

कॉमरेड कुलकर्णी के सिवा सभी अपनी राय प्रकट कर चुके थे. प्रशांत बाबू के कहने पर उन्होंने अपनी राय रखी. “कॉमरेड, सब कुछ स्पष्ट है. मैं प्रिया की राय से सहमत हूँ कि परिस्थिति ऐसी निर्मित हो चुकी है कि फैक्ट्री को बंद होने से नहीं रोका जा सकेगा. लेकिन यह बात हम मजदूरों से नहीं कह सकते. जब तक वे अपने अनुभव से इसे नहीं समझेंगे, इसे सच नहीं मानेंगे. ऐसी स्थिति में हम मजदूरों की राय जानना चाहते हैं, उसके लिए हमें प्रोफेशनल तरीका अपनाना पड़ेगा. मैं कुछ प्रोफेशनल एनालिस्टों को जानता हूँ जो आधुनिक रीति से विज्ञान सम्मत सर्वे कर सकते हैं. उनमें से हमें एक एनालिस्ट को बुक करना होगा. वह हमसे अधिक फीस नहीं लेगा. लेकिन वह हमारे लिए उचित प्रश्नावली तैयार कर देगा और हमारे कार्यकारिणी सदस्यों को एक संक्षिप्त ट्रेनिंग दे देगा. डाटा एकत्र होने के बाद एनालिस्ट उनका एनालिसिस करके हमें राय दे देगा. यह स्टडी कानूनी महत्व भी रखेगी. बस इसे हमें जल्दी से जल्दी करना पड़ेगा. इस स्टडी के बाद ही हम अपनी नीति तय कर पाएंगे.”

कॉमरेड कुलकर्णी की राय पर सभी सहमत थे. निर्णय लिया गया कि सचिव कार्यकारिणी मीटिंग में इस स्टडी के लिए प्रस्ताव रखेंगे. संभावना है कि यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो जाएगा, यदि कठिनाई हुई तो पार्टी सदस्य इसे बहुमत से पारित करवाने की कोशिश करेंगे.

प्रिया दंग थी. वह अब तक सर्वे को केवल 'डेटा कलेक्शन' समझती थी, लेकिन यहाँ उसे समझ आया कि इसे विज्ञान सम्मत होना चाहिए. आज उसने कुछ-कुछ यह भी समझा कि ‘वर्किंग क्लास की वेनगार्ड पार्टी’ कैसे काम करती है? उसने यह भी समझा कि भले ही प्रशांत बाबू उसे रेडीमेड पार्टी मेंबर कहते हों लेकिन उसे अभी पार्टी मेंबर बनने के लिए बहुत कुछ सीखना और पढ़ना होगा.
... क्रमशः