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शनिवार, 14 मार्च 2026

पटकथा

'लघुकथा'
कोटा से बाराँ जाने वाली सड़क पर 50 किलोमीटर दूर बसे अंता कस्बे में भँवर का बचपन बीता. वहाँ घरों की बनावट कस्बे का माहौल ही ऐसा था कि मर्दानगी के लिए अलग से कोई पाठशाला नहीं खोलनी पड़ती थी; वह तो वहाँ की हवा और मर्दों की बैठकों के धुएँ में रची-बसी थी. भँवर ने बचपन से देखा कि घर के बड़े 'हुकम' उचारते थे और औरतों के स्वर घूंघट की ओट में कहीं लुप्त हो जाते थे.

भंवर की पूरी पढ़ाई एक 'लड़कों के स्कूल' में हुई. स्कूल एक ऐसा किला था जहाँ औरतों का प्रवेश वर्जित तो नहीं था, पर उनकी अनुपस्थिति एक 'सांस्कृतिक ज़रूरत' बना दी गई थी. स्कूल के लड़कों के लिए लड़कियां कोई हाड-माँस का इंसान नहीं, बल्कि 'इज्जत' या 'आफत' के दो खानों में बँटी हुई कल्पित आकृतियाँ थीं. वहाँ मर्दानगी का पैमाना था—बिना पलक झपकाए किसी की आँखों में देखना और अपनी जाति के रसूख को अपनी कमीज के कॉलर पर टांगे रखना.

फिर भंवर का सामना कुलदीप से हुआ. कुलदीप, जिसके पास अपनी जाति और अपने 'मर्दाना' होने का एक गहरा अहंकार था.

"देख भँवर, चंबल का पानी और हाड़ौती का खून... दोनों में उबाल रहना चाहिए," कुलदीप अक्सर अपनी बाइक को रेस देते हुए कहता. उसके लिए दबदबा ही एकमात्र सद्गुण था.

एक दिन, पुराने कस्बे के स्कूल से लौट रही लड़कियां कुएं की जगत पर बैठकर कुछ बातचीत करने लगी थीं. उनमें मास्टर जी की मंजरी भी थी. मास्टर जी कुछ चार साल कोटा में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के दफ्तर में सहायक रहे थे. मंजरी चार साल कोटा के किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ कर लौटी थी. उसकी चाल में दबी हुई सहम नहीं थी, होंठों पर मुस्कान बसती और आँखों में प्यार झलकता. उसकी काया में बेबसी की वह रेखा नहीं थी जिसे भँवर ने अपने घर की औरतों में देखा था. उसके बोल में 'हुकम' की गुलामी नहीं, बराबरी का आत्मविश्वास था. उसका स्वर कस्बे में पसरा सदियों का सन्नाटा तोड़ता लगता था. उस दिन कुलदीप ने उसे देखते ही अपनी बाइक का पहिया उसकी ओर मोड़ा और एक भद्दा मज़ाक उछाला.

"अरे भाई, ये तो शहर जाकर ज़्यादा ही पढ़ ली है," सड़क से गुजरते लड़के ठहर गए और ठहाका मारकर हँसे.

भंवर वहीं से गुजर रहा था. उसे लगा कि उसे भी इस ठहाके में शामिल होना चाहिए, क्योंकि यही उस 'पटकथा' की मांग थी जो उसे पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी गई थी. लेकिन उस पल मंजरी ने अपनी नज़रें नीचे नहीं कीं. उसने रुककर कुलदीप की आँखों में सीधे झांका. उस नज़र में नफरत से ज़्यादा एक गहरी 'घृणा' थी, ऐसी घृणा जो किसी ताकतवर को बौना बना दे और बरसती आग सा क्रोध.

मंजरी ने सिर्फ इतना कहा, "कुलदीपे, ये जो तुम 'मर्दानगी' दिखा रहे हो न... ये तुम्हारे भीतर का डर है. तुम डरे हुए हो कि अगर हम तुम्हारे बराबर खड़े हो गए, तो तुम्हारी ये विरासत पसर जाएगी."

कुलदीप तिलमिला गया. उसने हाथ उठाया, लेकिन भंवर में, न जाने कहाँ से हिम्मत आ गई, उसने आगे बढ़ कर कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.

"छोड़ दे कुलदीप," भँवर की आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें एक ठहराव था. उसे न जाने क्या हुआ था. जैसे ही मंजरी ने कुलदीप की मर्दानगी को डर कहा, उसका दिमाग झनझना उठा था. फिर उसका हाथ बढ़ा और उसने कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.

"तू पागल हो गया है? एक लड़की के लिए अपने दोस्त और अपनी बिरादरी के खिलाफ जाएगा?" कुलदीप की आवाज़ में पारंपरिक रोब था.

"बिरादरी के खिलाफ नहीं, खुद के खिलाफ जा रहा हूँ," भंवर ने जवाब दिया. "हम सालों से यही तो कर रहे हैं. चुप रहना, डराना और इसे ही मर्द होना समझना. पर हम ही तो डरते रहते हैं हर पल कि कोई बराबरी पर न आ खड़ा हो. मुझे अब ये डर का बोझ नहीं ढोना."

उस शाम भँवर जब घर लौटा, तो बैठक में सन्नाटा था. उसके पिता हुक्का पी रहे थे. भंवर ने पहली बार गौर किया कि उस सन्नाटे में कितनी घुटन थी. उसने अपनी माँ को देखा, जो रसोई की गर्मी में बिना पंखे के रोटियाँ बेल रही थी. वह अपनी माँ के पास जाकर बैठ गया, वहाँ, जहाँ अमूमन घर के 'मर्द' नहीं बैठते.

"माँ, आज से मैं स्कूल के बाद आपका हाथ बँटाऊँगा," उसने धीरे से कहा.

माँ ने रोटी बेलते बेलन को रोक कर भँवर की आँखों में देखा, वहाँ उसके प्रति शाब्दिक आदर नहीं बल्कि प्यार था.

उसके पिता ने चौंककर हुक्का छोड़ दिया. उनकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन भँवर की आँखों की 'भावनात्मक चुप्पी' टूट चुकी थी. उसे समझ आ गया था कि जिस मर्दानगी को वह अब तक अपना कवच समझता था, वह दरअसल उसके खुद के व्यक्तित्व की बेड़ियाँ थीं.

हाड़ौती की उस तपती दोपहर में चंबल के पानी ने भले अपना रास्ता न बदला हो, लेकिन भँवर ने पीढ़ियों से लिखी जा रही अपनी 'पटकथा' फाड़ दी थी. उसे अब समझ आ गया था कि असली मर्दानगी किसी को दबाने में नहीं, बराबरी से खड़े होने में है.

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

नेह का धागा

सूरज की तपिश जब झालरापाटन के सात सहेलियों के मंदिर की प्राचीन इमारतों के बारिश में भीगे पत्थरों से टकराती है, तो हवा में एक अजीब सी सोंधी गंध फैल जाती है. नई बन रही एक सरकारी कॉलोनी में 23 साल का सलीम, बन रही दीवार के लिए बनाए गए पेड़े पर खड़ा ईंटों पर सूत बाँध रहा था. वह मनोहरथाना के निकट के एक छोटे से गाँव से यहाँ राजमिस्त्री का काम करने आया था. जबकि नीचे से 19 साल की सपना नीचे बनाए हुए मसाले को तगाती में भरकर उसे ऊपर पकड़ा रही थी.

सपना का परिवार डग कस्बे के पास के गाँव से मजदूरी के लिए यहाँ डेरा डाले हुए था. कोरी परिवार की वह दुबली-पतली लड़की, जिसके हाथों की चूड़ियाँ सीमेंट की धूल से सफेद पड़ी हुई थीं.

"सपना, हाथ थोड़ा बचा के. मसाला तेज़ है, खाल काट देगा," सलीम ने दीवार से झुककर कहा.

सपना ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछा और उसे देखकर मुस्कुरा दी. "तुझे दीवार की पड़ी है, या मेरे हाथों की? जल्दी काम निबटाओ, अभी ठेकेदार आता होगा."

उनके बीच का यह रिश्ता किसी 'डेट' या 'कॉफी' का मोहताज नहीं था. वह दोपहर की तपती धूप में एक ही पेड़ की छाँव में बैठकर आधी-आधी रोटी बाँटने और काम के बीच आँखों ही आँखों में मुस्कुरा लेने से बना था. सलीम ने सपना के लिए शहर के मेले से एक बार हरे कांच की चूड़ियाँ लाकर दी थीं, जिन्हें वह काम के वक्त अपनी ओढ़नी के नीचे छिपाकर रखती थी. दोनों के बीच नेह का एक अदृश्य धागा बनने लगा था, जिसका शायद खुद उन्हें भी अहसास नहीं था. यह धागा उनके बीच किस रिश्ते को आकार देने वाला था यह उन्हें भी पता नहीं था.

लेकिन बन रही सरकारी इमारत की अधबनी दीवारों के भी कान थे.

सलीम का 'मियां' होना और सपना का 'कोरी' होना, पास के चाय के खोखे पर बैठने वाले कुछ 'स्थानीय रक्षकों' की आँखों में खटकने लगा था. उनके लिए यह दो मज़दूरों का साथ काम करना नहीं, बल्कि 'जनसांख्यिकीय हमला' था.

एक दोपहर, जब सलीम और सपना निर्माणाधीन छत के नीचे बैठकर गुड़-रोटी खा रहे थे, तभी तीन-चार मोटर साइकिलें धूल उड़ाती हुई वहाँ रुकीं. अगुआ विक्रम था, जो इलाके में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में अक्सर 'मुद्दों' की तलाश में रहता था.

"ओए मिस्त्री! नीचे उतर!" विक्रम की आवाज़ में नफ़रत का उबाल था.

सलीम घबराकर नीचे आया. "जी भाई साब, क्या हुआ?"

"क्या हुआ? ये लड़की कौन है? इसके साथ बैठ के क्या खिचड़ी पका रहा है?" विक्रम ने पास पड़ी एक ईंट को लात मारकर गिरा दिया.

"ये सपना है भाई साब, हमारे साथ कुली का काम करती है..." सलीम की आवाज़ धीमी पड़ गई.

"नाम पता है हमें! तेरा भी और इसका भी. मनोहरथाना से यहाँ मजदूरी करने आए हो या हमारी लड़कियों को बहलाने?" भीड़ में से एक ने सपना की तरफ इशारा किया, जो सहमी हुई एक कोने में खड़ी थी.

"भाई साब, हम तो गरीब लोग हैं, काम से काम रखते हैं..." सपना ने हिम्मत जुटाकर बोलना चाहा.

"चुप रह! तुझे समझ नहीं आता ये तुझे फँसा रहा है? कल को ये तेरा धरम बदलवा देगा, तब अक्ल आएगी?" विक्रम ने चिल्लाकर पास खड़े एक लड़के से कहा, "फोटो खींच इसकी और डाल ग्रुप पे. लिख दे कि झालावाड़ में भी 'वही' खेल शुरू हो गया है."

शाम होते-होते झालावाड़ जिले के व्हाट्सएप ग्रुपों में एक फोटो वायरल हो गई. फोटो में सलीम और सपना एक साथ बैठे थे, और नीचे कैप्शन था— "जिहाद का नया ठिकाना: मज़दूरी की आड़ में शिकार."

तनाव फैल गया. सपना के पिता को डराया-धमकाया गया. उसे काम पर आने से रोक दिया गया और समाज की 'इज्जत' का वास्ता देकर घर में कैद कर दिया गया. सलीम को ठेकेदार ने उसी रात हिसाब करके भाग जाने को कह दिया— "भाई, मुझे काम करना है, दंगा नहीं करवाना. तू निकल यहाँ से."

अगली सुबह, सलीम अपना झोला उठाकर बस स्टैंड की तरफ जा रहा था. उसके झोले में अब भी वो हरे कांच की चूड़ियाँ थीं जो वह सपना को देने वाला था क्योंकि पुरानी टूट गई थीं. उसने मुड़कर उस अधूरी दीवार को देखा जिसे उसने और सपना ने मिलकर उठाया था.

वह दीवार खड़ी थी, लेकिन वह नहीं जानता था कि उस पर चिपकाया गया 'नफ़रत का पलस्तर' अब न जाने कितने बरस वहाँ से नहीं उखड़ने वाला था.

दो युवाओं की पसंद, उनकी मर्जी और उनके पेट की भूख को एक 'राजनीतिक लेबल' ने कुचल दिया था. सलीम बस में बैठ गया, और सपना अपने घर की कोठरी में बैठी उस सीमेंट की धूल को देख रही थी जो अब उसकी चूड़ियों से उतर चुकी थी, लेकिन उसकी किस्मत पर जम गई थी.

सात सहेलियों के सूर्य मंदिर के पत्थरों का रंग वैसा ही था, पर उनके निकट ही कहीं बनता नेह का वह महीन धागा टूट कर वहीं कहीं बिखरे मसाले में विलीन हो चुका था.

गुरुवार, 12 मार्च 2026

रूपांतरण

पिंजरा और पंख-55

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

श्रृंखला फाइनल- अन्तिम कड़ी

शगुन का नियुक्ति पत्र देखने के बाद अनिल चाचा अवाक रह गए थे. उनकी पितृसत्ता वाली कंडीशनिंग को चोट लगी थी. वे एक-दो दिन मौन रहे, कुछ नॉर्मल हुए तो उन्होंने शगुन और आयुष से बात करना शुरू किया. वे शगुन से बनस्थली के बारे में और आयुष से आईआईटी गुवाहाटी के बारे में सवाल करने लगे. कई बार उनकी प्रतिक्रिया होती, “अच्छा ऐसा भी है?” ... “मतलब हम तो कुएँ के मेंढक ही रह गए" ... हमने जाना ही नहीं कि दुनिया कितनी बड़ी और विविध है, ... कहाँ थी और कहाँ जा रही है?” ... “हम तो सरकारी दफ्तरों में अपनी जान पहचान, कुछ व्यापारियों और कुछ नेताओं से रसूख को ही दुनिया समझे बैठे थे. तुमसे पता लगा कि वास्तविक ज्ञान के सामने वह सब महत्वहीन है.”  इस बातचीत से चाचा की ग्रंथियाँ शनै-शनै खुलने लगीं. अब वे शगुन और आयुष से अभिभावक जैसा नहीं, बल्कि दोस्तों जैसा व्यवहार कर रहे थे. देखते-देखते जून की बीस तारीख आ गई.

शगुन का सत्र 27 जून से आरंभ होना था. उस दिन उसे ‘टीचिंग असिस्टेंट’ के पद पर जॉइन भी करना था. वह चाहती थी कि 25 को ही बनस्थली पहुँच जाए. जिससे वह अपने एडमिशन और होस्टल आवंटन का काम पूरा कर सके. उसने पैकिंग शुरू कर दी थी. इस बार उसे नया होस्टल मिलने वाला था और जरूरत का सारा सामान ले जाना था. दो दिन वह चाची के साथ बाजार जाकर स्त्रियों के लिए जरूरी वस्त्र और दूसरे सामान खरीद लाई थी.

जाने के तीन दिन पहले रात को डिनर के बाद, जब चाचा पान खाने के लिए बाज़ार चले गए और गुप्ताजी ड्राइंग रूम में आकर बैठे, तभी शगुन उनके पास आकर बैठी और बतियाने लगी. करीब आधे घंटे इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने कहा.

“पापा, आप दिल पर न लें तो एक बात कहूँ?”

“बोल ना, कभी तेरी बात को दिल पर लिया है मैंने?”

 “सोचती हूँ कि मैं 25 जून को सुबह पाँच बजे वाली जयपुर एक्सप्रेस बस पकड़ूँ, वह 9:30 बजे मुझे निवाई उतारेगी. वहाँ से ऑटो रिक्शा लेकर मैं बनस्थली पहुँच जाऊंगी.”

गुप्ताजी ने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा दिए.

“अच्छा तुझे नौकरी मिल गयी तो इत्ती बड़ी हो गई है, अब हम तुझे बनस्थली छोड़ने भी नहीं जा सकते. तुझे हमारे छोड़ने आने से कोई तकलीफ है?”

“नहीं पापा, मुझे कोई तकलीफ नहीं है. पर आप जाते हैं, रात गेस्ट हाउस में रुकते हैं और अगले दिन वापस लौटते हैं. इतनी दूर कार चलाने से थकान भी तो होती है. फिर मैं सोच रही थी कि इस बार मैं अपना पहला जॉब शुरू करने जा रही हूँ... तो आत्मनिर्भर होने का अहसास घर से ही क्यों न शुरू करूँ?”

गुप्ता जी की आँखों में हल्की चमक, थोड़ा गर्व और थोड़ी शरारत थी. उन्होंने शगुन के कंधे पर हाथ रखा.

"शगुन, तुम एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हो, यह तुम साबित कर चुकी हो. लेकिन अभी तुमने नौकरी जॉइन नहीं की है. अभी तुम जॉइन करोगी, अगस्त के पहले सप्ताह में तुम्हारा पहला वेतन तुम्हारे हाथ में आएगा. उस दिन मैं मानूँगा कि मेरी बेटी सचमुच अपने पैरों पर खड़ी हो गई है. उसके बाद तुम अपनी फीस खुद भरना, अपनी पसंद के कपड़े खरीदना और शायद हमारे लिए भी कुछ लाना. पर अभी? अभी तो हम ही तुझे छोड़ने चलेंगे."

“पापा, आपने तो मेरा सारा प्लान ही ध्वस्त कर दिया.” शगुन हल्की मुस्कान के साथ बोली.

“अच्छा शगुन मेरी बात सुन.” अनिल चाचा की आवाज सुन कर शगुन चौंक कर आश्चर्य से उन्हें देखा. उसे इस बात का अहसास ही नहीं था कि वे वहाँ आ बैठे थे और उनकी बातें सुन रहे थे.

“चाचा, आप?

“शगुन मैं तो बहुत देर से तेरी और भाई साहब की बातें सुन रहा हूँ. अब मेरी बात सुन. आज मेरी 26 से 1 जुलाई तक की छुट्टी मंजूर हो गयी है, 2 को रविवार है. मेरे पास पूरे आठ दिन हैं. तेरी चाची भी जयपुर घूमना चाहती है. तो भाभी और भाई साहब की जगह तुझे छोड़ने मैं और चाची जा रहे हैं, साथ में मुक्ति भी होगी. आयुष से भी पूछेंगे, वह भी हमारे साथ घूम आएगा. कैसा रहेगा?”   

शगुन चाचा के इस प्रस्ताव से चकित थी. यह तो उसे पता था कि चाचा का रूपांतरण (Transformation) तेजी हो रहा है. लेकिन उसे यह अहसास नहीं था कि वे इस स्तर तक पहुँच जाएंगे. उसने पापा की ओर देखा तो वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे.

“मतलब पापा, ये बात आपको भी पता थी.” शगुन ने रुआँसा होने का अभिनय करते हुए कहा.

“मुझे भी अनिल ने शाम को ही बताया. मुझे प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा तो मैंने तुरन्त हाँ कर दी. तुझे मंजूर न हो तो यह नहीं जाएगा.”

“नहीं पापा, चाचा-चाची मुक्ति के साथ मुझे छोड़ने जाएँ, वहाँ दो-तीन दिन रुकें, सब कुछ देखें. इससे अच्छा क्या हो सकता है? आखिर कभी तो उन्हें भी मुक्ति के भविष्य के बारे में सोचना होगा.”

“मुक्ति की मुझे अब कोई चिन्ता नहीं. उसकी सोचने वाले यहाँ तुम और आयुष हो तो.” चाचा ने कहा.

 

25 जून की सुबह.

गुप्ता निवास के बाहर सुबह से ही चहल-पहल थी. हवा में रामगंजमंडी की वही परिचित महक थी, लेकिन शगुन को आज सब कुछ नया लग रहा था. गुप्ताजी की कोरल रेड मारूति-800 बनस्थली जाने को तैयार खड़ी थी.

चाचा ड्राइविंग सीट पर थे, शगुन आगे बैठी, पीछे चाची और आयुष, आयुष की गोद में थी मुक्ति. मम्मा-पापा ने उन्हें हाथ हिलाकर विदा किया. कार धीरे-धीरे गली से बाहर निकलने लगी. ताई-ताऊ की ओर देखते हुए मुक्ति उत्साह से हवा में हिला रही थी.

शगुन ने भी खिड़की से पीछे देखा कि उसका घर छोटा होता जा रहा है, लेकिन उसके अपने भीतर का आसमान बड़ा होता जा रहा था. उसने अपने छोटे बैग से अपनी ‘संबल’ नोटबुक निकाली और लिखना शुरू किया:

"स्वतंत्रता का अर्थ रिश्तों को तोड़ना नहीं, बल्कि रिश्तों में अपनी पहचान को ढूँढना है. संबल केवल सहारा नहीं, बल्कि वह विश्वास है जो आपको तब भी उड़ने की शक्ति देता है जब हवाएँ खिलाफ बह रही हों.

आज मेरे लिए पिंजरे का दरवाज़ा खुल चुका है…     अब सारा आसमान मेरा है."

 (समाप्त)

बुधवार, 11 मार्च 2026

रिजेक्शन?

पिंजरा और पंख-54

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

श्रृंखला फाइनल-4
मेहमानों की कार मुख्य सड़क पर जाकर मुड़ी और ओझल हो गयी. अनिल चाचा को ध्यान आया कि मेहमान होटल से रवाना हों उससे पहले उनसे मिल लेना चाहिए. उन्होंने जल्दी में घर के बाहर खड़ा अपना स्कूटर स्टार्ट किया और गुप्ताजी को कहा, “भाई साहब¡ मैं मेहमानों को छोड़ कर होटल का हिसाब करके आता हूँ.”

शगुन अपने कमरे में थी, लेकिन उसकी नज़रें सीढ़ियों की ओर थीं. वह जानती थी कि कुछ देर में कोई तो आने वाला है. तभी चाची कमरे में आईं. पूछने लगी, “शगुन ऐसा क्या हुआ जो वे अचानक चले गए.”

“कुछ नहीं चाची, बस हमारे बीच नॉर्मल बातें ही हुई थीं, वे और उनके परिवार को मुझ से क्या अपेक्षा है, और मैं क्या करना चाहती हूँ.”

“कोई बात नहीं शगुन, वे इन्दौर पहुँच कर जवाब दे देंगे. हमें कौन सी जल्दी है?”

“हाँ चाची, बस अनिल चाचा के सिवा किसी को जल्दी नहीं.”

“उनका तो तू कुछ मत कह, उन सा बिरला तो कोई नहीं.”

तब तक मुक्ति को गोद में उठाए आयुष भी आ गया.

“मैं नीचे चलूँ, बहुत कुछ समेटना है.” चाची इतना कह कर वापस नीचे चल दीं.

चाचा शाम को देर से लौटे. उन्होंने उस दिन किसी से कोई बात नहीं की.

सोमवार की शाम तूफान आया.

अनिल चाचा ऑफिस से लौटे. सीधे लिविंग रूम में आकर बैठ गए. उनका चेहरा गुस्से से लाल था. श्रीमती गुप्ता पानी का गिलास लेकर गयीं.

"देख लिया भाभी! हो गई न थू-थू? अभी दफ्तर से निकलने के पहले इंदौर वालों का फोन आया था. विवेक के पापा कह रहे थे कि 'लड़की हमारे घर में एडजस्ट नहीं कर पाएगी, हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं.' उन्होंने साफ़ कहा कि 'विवेक कह रहा है कि लड़की को अपनी पढ़ाई पर बहुत घमंड है, बहुत बोलती है, आपसी बातचीत में उसे तो बोलने ही नहीं दिया.' हमारी सात पुश्तों में आज तक किसी ने 'रिजेक्ट' होने का दाग नहीं सहा था, और आज मेरी भतीजी ने ही यह तोहफा दे दिया है.”

तब तक शगुन भी वहाँ आ गयी थी.

“शगुन! क्या कहा था तुमने उस लड़के से?"

चाचा चिल्ला रहे थे. मम्मा रसोई के दरवाज़े पर खड़ी होकर रोने लगीं.

तभी आयुष नीचे उतर कर आया और अनिल चाचा के सामने खड़ा हो गया. चाचा ने देखा कि वह शगुन के आगे एक कवर की तरह खड़ा है.

"चाचा जी, किसी की औकात नहीं कि दीदी को रिजेक्ट कर दें. असली रिजेक्शन तो उनके उस खोखले अहंकार का हुआ है जिसे वे 'संस्कार' और 'परंपरा' कहते हैं. वे रिजेक्ट हुए हैं, वह पूरा परिवार ही दीदी के काबिल नहीं!"

अनिल चाचा आयुष को घूरने लगे. वे उसे डांटने ही वाले थे कि अचानक अपने आँसू पोंछते हुए मम्मा सामने आ गयीं. उन्होंने अनिल चाचा के चेहरे की ओर देखा, “बस देवर जी, बहुत हो गया. बच्चे अब जवान हो गए हैं, आयुष तो आपके कंधे से ऊपर है, दोनों समझदार हैं. अपना भला बुरा समझते हैं. उन्हें भी बोलने का हक है. हमें उनकी बात सुननी चाहिए. उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते."

अनिल चाचा हक्के-बक्के रह गए. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि भाभी ऐसा बोल सकती हैं. उन्होंने एक बार आयुष और शगुन की ओर देखा और चुपचाप उठकर ऊपर अपने कमरे की और चल दिए.

चाची तब तक रोज की तरह सबके लिए चाय बना लायी थी और मिसेज गुप्ता के पीछे खड़ी थीं.

“भाभी, आयुष और शगुन सब बैठिए और चाय पी लीजिए. उनकी चाय मैं कमरे में दे आती हूँ.”

“अभी, इस वक्त, तू देवर जी को चाय देकर आएगी? सारा गुस्सा तुझपर निकल जाएगा.”

“नहीं निकलेगा भाभी, मुक्ति कमरे में ही सो रही है. उसके सामने कुछ नहीं कहेंगे. बस मुक्ति ही तो है जिसके सामने वे कुछ नहीं कह सकते.” इतना कहकर चाची मुस्कुराते हुए ट्रे में दो चाय लेकर जीना चढ़ने लगी.

शाम को डाइनिंग टेबल पर सब साथ थे. चाची रसोई में फुलके उतार रही थीं और श्रीमती गुप्ता परोस रही थीं.

“शगुन, अब तो बता आखिर तुम्हारे और विवेक के बीच बात क्या हुई थी?” अनिल चाचा ने पूछा, अभी वे पूरी तरह शान्त थे.

"कुछ नहीं चाचा, सच तो यह है कि मैंने ही उन्हें रास्ता दिखाया था. मैंने बालकनी में विवेक को साफ़ बता दिया था कि मैं उनके उस सुनहरे पिंजरे में नहीं रह सकती जहाँ मेरी पहचान सिर्फ एक बहू की हो, जो घर-परिवार संभाले और कपड़ों का बिजनेस देखे. मैंने उनसे कह दिया था कि मेरा भविष्य बनस्थली में है, रिसर्च में है."

शगुन की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी कि अनिल चाचा अवाक रह गए.

शगुन ने आगे कहा, "मैंने उनसे यह भी कहा था कि वे नीचे चलकर खुद मना कर दें ताकि उनकी गरिमा बनी रहे और उनके माता-पिता अपमानित महसूस न करें. मैंने उन्हें चुनाव दिया था, और उन्होंने 'अपमान के भय' को चुना. उन्होंने इंदौर पहुँचकर मना किया, क्योंकि वे 'रिजेक्ट' होना सह सकते थे, पर 'अपमान' नहीं." यह कहते हुए शगुन ने गुप्ताजी को अपना ‘टीचिंग असिस्टेंट’ के पद पर नियुक्ति का आदेश थमा दिया.

गुप्ताजी ने पत्र पढ़ा, फिर शगुन की आँखों में देखा, उन आँखों में वही 'संबल' था जो उन्होंने कभी अपनी माँ की आँखों में देखा था, पर पहचान नहीं पाए थे.

“हाँ पापा, मेरे आते ही मेहमानों के आने का उल्लेख चल निकला और मैं यह पत्र और आप सबको बता नहीं पायी. मेरी नियुक्ति बनस्थली विद्यापीठ में टीचिंग असिस्टेंट के पद पर हो गयी है. मैं इसके साथ ही एम.एससी. और पीएचडी कर सकती हूँ. बल्कि अपना खर्च उठाने के साथ ही कुछ बचा भी सकती हूँ.”

गुप्ताजी की आँखें सजल हो गयी थीं. गुप्ताजी ने पास बैठी शगुन को अपनी छाती से लगा लिया. अब शगुन की आँखें भी छलकने को थीं.

"अनिल, मैंने उस दिन होटल में उनकी बातें सुनी थीं... शायद मैं भी डर रहा था. पर आज मुझे गर्व है कि मेरी बेटी में वह कहने की हिम्मत है जो मैं नहीं कह पाया."

अनिल चाचा क्या कहते? वे अवाक, सब कुछ देख रहे थे.
... क्रमशः

मंगलवार, 10 मार्च 2026

उपहास-भय

पिंजरा और पंख-53

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-3
रविवार सुबह से ही गुप्ता निवास में हलचल शुरू हो गई थी. अनिल चाचा सुबह तैयार होकर नाश्ते के बगैर ही निकले और स्कूटर से होटल ऋतुराज का एक चक्कर लगा आए. वे दस बजे लौटे तब तक नाश्ते के बाद घर में सभी नहा-धो कर तैयार हो चुके थे. चाची और मम्मा मेहमानों के लंच की तैयारी में जुटी थीं. वापस लौटते ही चाचा ने घोषणा कर दी कि मेहमान साढ़े ग्यारह से बारह बजे के बीच यहाँ पहुँच जाएंगे. फिर वे ड्राइंग रूम की सजावट को परखने लगे, जिसे पहले ही उनके निर्देशानुसार किसी वीआईपी लाउंज की तरह सजा दिया था. मेज़ पर काजू-किशमिश के डोंगे, ताज़ा रसगुल्ले और नमकीन सजा दिए गए थे. पर वातावरण में एक अजीब सा तनाव भरा था. डेढ़ साल की मुक्ति इस तनाव से बेखबर सजावट से खुश होकर इधर से उधर और उधर से इधर दौड़ लगा रही थी. 

पौने बारह बजे इंदौर वाले मेहमानों की लंबी कार घर के बाहर रुकी. विवेक, उसके माता-पिता और उसकी विवाहित बहन नीचे उतरे. चाचा ने बाहर आकर उनका स्वागत किया और उन्हें ड्राइंग रूम में ले आए. औपचारिक बातचीत शुरू हुई. विवेक के पापा लगातार बोले जा रहे थे, जिसमें उनके बिजनेस के टर्नओवर, खानदान की शहर में प्रतिष्ठा, सरकारी अफसरों और राजनेताओं से उनके रिश्ते वगैरह का उल्लेख था जो खत्म नहीं हो रहा था. बीच-बीच में विवेक की माँ कुछ न कुछ अपनी ओर से जोड़तीं और हर बार अपने गहने और साड़ी ठीक करने का अभिनय करतीं. जबकि विवेक की नज़रें बार-बार अंदर के दरवाज़े की ओर उठ रही थीं, जो किसी को भी उसकी तरफ देखते देखकर वापस अपने पिता और बहिन की तरफ मुड़ जाती थीं. टेबल पर सजे महंगे नाश्ते की ओर किसी ने देखा तक नहीं. चाचा ने एक दो बार नाश्ते की और इशारा कर मेहमानों से कहा भी कि ‘कुछ तो लीजिए’. जवाब में सुनने को मिला कि ‘अब सीधे लंच ही करेंगे.’

वक्त हुआ तो सभी ने डाइनिंग में बैठे, लंच किया. इस बीच शगुन एक दो बार मिठाई परसने आई. उसने मेहमानों को अभिवादन किया और परस कर वापस चली गयी. मेहमानों ने उसे देख भी लिया. वह बिना किसी बनाव-श्रृंगार के, खादी के कुर्ते में वह किसी साधारण लड़की के बजाय एक सुशिक्षित प्रोफेशनल लग रही थी.

लंच के बाद फिर से सब ड्राइंग रूम में बैठे. विवेक की माँ ने शगुन को भी वहीं बुलाने को कहा. कुछ देर में वह कॉफी लेकर आयी और सर्व करने के बाद जब वह बैठने लगी, तो विवेक की माँ ने उसे अपने पास बिठा लिया. उससे कुछ किताबी सवाल पूछे. विवेक बेचैन था, उसने माँ को इशारा किया कि वह अकेले में शगुन से बात करेगा. उसकी माँ ने मुस्कुराकर कहा, "भाई साहब, अगर बुरा न मानें तो बच्चों को आपस में दस मिनट बात करने दें?"

“क्यों नहीं? जरूर.” कह कर गुप्ताजी ने अनुमति दी और शगुन विवेक को साथ लेकर ऊपर की छोटी बालकनी में आ गई. दरवाजा बंद होते ही बात शुरू हुई. परिचय की औपचारिक बातें करने के बाद विवेक बोला, “आपका बी.एससी. मनोविज्ञान में करना बहुत बढ़िया है. व्यापार और सभी तरह के संबंधों को बनाए रखने में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा. वैसे अब आपका आगे क्या करने का इरादा है?”

शगुन तो इसी सवाल का जैसे इन्तजार कर रही थी. उसने मेज पर रखी अपनी 'संबल' नोटबुक को हौले से हाथ से छुआ और बोली, "विवेक जी, मैं अपने भविष्य के बारे में निर्णय कर चुकी हूँ."

शगुन की आवाज़ में एक ऐसी स्पष्टता थी कि विवेक स्तब्ध रह गया.

"मेरा चयन बनस्थली में 'टीचिंग असिस्टेंट' के पद पर हो चुका है. मुझे जून के अंतिम सप्ताह में वहाँ जोइन करना है. इसके बाद मैं पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुकी होऊंगी. मुझे मनोविज्ञान में एम.एससी. करना है और सके बाद पी.एच.डी. करनी है. मेरा भविष्य अध्यापन और रिसर्च में है. मुझे बिजनेस में रत्ती भर भी रुचि नहीं है."

सुन कर विवेक हैरान था, एक लड़की जिसे वे देखने आए हैं, ऐसी बात कैसे कर सकती थी. शगुन ने आगे कहा, "नीचे आपके परिवार ने मेरे लिए एक 'पिंजरा' तैयार किया है जहाँ मुझे घर की बहू बनकर घर-परिवार के साथ कपड़ों का बिजनेस संभालना होगा. मैं उस पिंजरे में नहीं रह सकती. मैं नीचे सबके सामने मना करने वाली हूँ. इससे आपके माता-पिता अपमानित महसूस कर सकते हैं. मैं नहीं चाहती कि किसी का अपमान हो."

विवेक ने कुछ बोलना चाहा, पर शगुन ने हाथ के इशारे से उसे रोका. "बेहतर होगा कि आप नीचे चलकर कहें कि आप 'सोचकर बताएंगे' और यहाँ से निकल जाएँ. बाद में होटल या इंदौर पहुँचकर आप मना कर दीजिएगा. लेकिन यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो मैं खुद सबके सामने मना कर दूंगी. चुनाव आपका है."

विवेक ने शगुन के आत्मविश्वास को देखा. उसने ऐसी लड़की पहले कभी नहीं देखी थी जो इतनी विनम्रता से इतनी बड़ी चोट कर सकती थी. पाँच मिनट बाद जब वे नीचे उतरे, विवेक का चेहरा उतरा हुआ था. शगुन जानती थी कि अपमान के भय (Gelotophobia) का उसका प्रयोग सफल रहा था.

अनिल चाचा तिलक का थाल तैयार रखे थे, पर विवेक ने अपने पिता के कान में कुछ कहा. उसके पिता ने गला साफ़ करते हुए गुप्ता जी से कहा, "भाई साहब, बच्चे ने कहा है कि वह थोड़ा और सोचना चाहता है. हम इंदौर पहुँचकर आपको फोन करेंगे."

अनिल चाचा को कुछ नहीं सूझा, हड़बड़ाहट में उनका हाथ तिलक के थाल पर लगा और उसमें रखी रोली की कटोरी उछल कर टेबल के नीचे गिर गयी. सब अवाक थे. मेहमान इसके साथ ही उठ खड़े हुए. गुप्ता, अनिल और श्रीमती गुप्ता उन्हें छोड़ने के लिए बाहर सड़क तक आए. शगुन ऊपर अपने कमरे में चली गयी, चाची रसोईघर में. ड्राइंगरूम में बस आयुष और मुक्ति ही रह गए.  मुक्ति को बस यह पता लगा कि मेहमान जो आए थे, वे गए. उसने आयुष की ओर मुड़ कर कहा, "दादा...... गए" आयुष के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई. 

"हाँ, मुक्ति, गंदे वाले मेहमान गए." इतना कह कर आयुष ने मुक्ति को गोद में उठा लिया और बाहर आया. उसने देखा कि मेहमानो की कार रवाना हो रही थी.
... क्रमशः

सोमवार, 9 मार्च 2026

सन्नाटे की गूँज

पिंजरा और पंख-52

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-2
शनिवार की शाम हवा में एक अजीब सा भारीपन था. अनिल चाचा ऑफिस से जल्दी आ गए. झटपट चाय पी, कपड़े बदले और खड़े हो गए, “मैं होटल ऋतुराज जा रहा हूँ, मेहमान आने वाले होंगे. वहाँ उन्हें रिसीव करने वाला कोई होना चाहिए.”

करीब सात बजे इंदौर वाले मेहमान अपनी बड़ी गाड़ी के साथ होटल पहुँचे. अनिल चाचा होटल में मेहमानों को चाय पिला कर वापस घर पहुँचे तब तक गुप्ताजी भी फैक्ट्री से वापस आ चुके थे. चाचा का उत्साह सातवें आसमान पर था. "भाई साहब, मेहमान होटल पहुँच गए हैं. थोड़ी देर आराम करके वे डिनर के लिए तैयार हो जाएंगे. हमें नौ बजे तक डिनर के लिए होटल पहुँच जाना चाहिए. वहीं लड़का देख लेंगे और दोनों परिवार मिल लेंगे, बातचीत हो जाएगी. शगुन घर ही रहेगी, वैसे भी मेहमानों के सामने उसे कल सुबह ही आना चाहिए."

शगुन अपने कमरे की खिड़की से देख रही थी कि कैसे पापा, मम्मा, चाचा और आयुष होटल के लिए निकल रहे हैं. आयुष ने जाते-जाते एक नज़र शगुन की ओर देखा, उसकी आँखों में एक चेतावनी थी.

घर अब खाली था. शगुन के लिए यह सन्नाटा नया नहीं था, लेकिन आज इस सन्नाटे में एक अजीब सी ताकत थी. उसने रसोई में जाकर अपने लिए चाय बनाई. उसने सोचा, "वहाँ होटल में इस वक्त मेरे भविष्य के बारे में बातें हो रही होंगी. शादी कैसे करनी है? क्या लेन-देन होना है, सारी शर्तों पर बातें हो रही होंगी. वहाँ पूरा परिवार है, बस मैं ही नहीं हूँ, जिसके बारे में उन्हें निर्णय करने हैं. कितना विचित्र है यह? और बरसों से चला आ रहा है कि एक लड़की के भविष्य के बारे में पूरा परिवार विमर्श करता है बस उस लड़की को ही छोड़ दिया जाता है. क्या यही मैं भी होने दूँ? नहीं, मैं यह कैसे होने दे सकती हूँ? मैं अपने अस्तित्व को किसी अनजान के अस्तित्व में विलीन नहीं होने दूंगी. मुझे अपनी पहचान खुद बनाना है.”

रात ग्यारह बजे घर के बाहर कार रुकी. मम्मा के हाथ में शगुन के लिए खाने का बैग था. वे थकी हुई और उदास लग रही थीं. अनिल चाचा और पापा नीचे लिविंग रुम में ही बातें करने बैठ गए.

आयुष सीधे ऊपर शगुन के कमरे में पहुँचा. उसके हाथ में शगुन के खाने का बैग था. वह बहुत उत्तेजित और गुस्से में था. "दीदी, वहाँ जो हुआ वह अपमानजनक था. विवेक के पापा और चाचा तो ऐसे बात कर रहे थे जैसे आप कोई वस्तु हों. विवेक की माँ ने तो मम्मा से यहाँ तक कह दिया कि, 'शगुन को समझा दीजियेगा कि शादी के बाद उसे अपनी पढ़ाई और नौकरी की ज़िद छोड़नी होगी. उसे उसकी कोई जरूरत नहीं. हमारे घर में किसी बहू ने आज तक बाहर काम नहीं किया. घर में सब कुछ है. वह घर संभाले, वही उसके लिए बहुत बड़ा काम होगा.' और पापा? वे बस चुपचाप गर्दन झुकाए सुन रहे थे. उनके पास कोई जवाब नहीं था."

शगुन ने आयुष की बात शांति से सुनी. उसने आयुष का हाथ थाम लिया. "आयुष, पापा की चुप्पी उनका डर है, और विवेक की माँ का अहंकार उनकी कंडीशनिंग. उन्हें लगता है कि स्त्रियों का जीवन परिवार और घर के पिंजरे के लिए है. उन्होंने खुद इसे जिया है. उसी में वे खुद को और तमाम स्त्रियों को सुरक्षित समझती हैं. उन्होंने अपनी बहू के लिए अपने यहाँ सुन्दर 'पिंजरा' तैयार किया है. उस पिंजरे के गुण भी उन्होंने खूब बताए होंगे. पर उन्हें पता नहीं कि शगुन उस पिंजरे में रहने को तैयार नहीं है, वह उड़ना सीख चुकी है उसके पंख अब पेरालाइज नहीं हैं."

आयुष ने खाने का बैग मेज़ पर रख दिया. "मम्मा ने कहा है कि खाना खा लेना, लेकिन दीदी, कल सुबह वे लोग तुम्हें देखने आएंगे, और उसी समय दस्तूर के लिए तैयार रहेंगे. चाचा ने पापा को लगभग मना लिया है कि कल ही बात पक्की कर दी जाए और लड़के का तिलक कर दिया जाए. तुम खाना खा लो. मैं छत पर हूँ."

शगुन अपनी 'संबल' नोटबुक के पास गई. उसने फातिमा वाले उस सूखे गुलाब को हाथ में लिया. "कल सुबह का सूरज रामगंजमंडी के लिए एक सामान्य रविवार होगा, पर मेरे लिए यह अपनी मर्यादा और अस्मिता की लड़ाई होगी. आयुष मेरे साथ है, बाकी बात मैं खुद संभालूँगी."

आयुष के जाने के बाद मम्मा आईं. कहने लगी, “लड़का सुन्दर है, उनके कपड़े का होलसेल का बिजनेस है. लड़का भी पहले एमबीए करके एमपीएससी की तैयारी में लगा था. उसके लिए उसने कोचिंग भी की थी. लेकिन बिजनेस में पूरा परिवार लगता है, इसलिए बहुत समझाने पर वह तैयारी छोड़ कर बिजनेस में आ गया. उसके बाद उसने बिजनेस को बहुत बढ़ा लिया. उसके पापा कह रहे थे. ‘शगुन पढ़ी लिखी है. वह भी मनोविज्ञान से. वह लड़कियों और औरतों के वस्त्रों के बिजनेस को घर से ही देख सकती है.’ मुझे तो लड़का और परिवार पसंद आया है. तुम्हारा भविष्य सुरक्षित रहेगा. कल तुम भी उन सब से मिल लोगी. तब तुम्हारे लिए मना करना कठिन होगा.”

शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने इतना ही कहा, “माँ, कल का कल देखेंगे.”

माँ वापस नीचे चली गयीं, वह खाना खाकर ऊपर छत पर चली गयी.

देर रात तक भाई-बहन छत पर बैठे रहे. नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रवि-पुष्य योग में तिलक कर देने से शगुन का भविष्य सुघड़ होने की बात कर रहे थे, और ऊपर छत पर दोनों उस 'अदृश्य पिंजरे' की सलाखों को गिन रहे थे जिन्हें कल सुबह टूटना था.

शगुन ने नोटबुक में लिखा, "जब सन्नाटा बहुत गहरा हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि आवाज़ अब गूँजने वाली है."
... क्रमशः

रविवार, 8 मार्च 2026

मोर्चेबन्दी

पिंजरा और पंख-51

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-1
एम.एससी. मनोविज्ञान बनस्थली विद्यापीठ से करने की अंडरटेकिंग देने पर शगुन की टीचिंग असिस्टेंट के पद पर नियुक्ति पुख्ता हो गयी. अब उसे 27 जून को पदभार ग्रहण करना था.

बी.एससी. फाइनल का अन्तिम पेपर समाप्त हुआ. 20 मई को बाद मम्मा-पापा उसे लेने आ रहे थे, उसी दिन वापस लौटना था. बी.एससी. फाइनल हो जाने से शगुन होस्टल रूम रिटेन नहीं कर सकती थी. अगले साल उसे नया होस्टल मिलना था. शगुन ने अपना सारा सामान पैक करना शुरू कर दिया. आयुष भी 21 मई को सुबह गुवाहाटी से कामाख्या एक्सप्रेस पकड़ कर 23 को दोपहर होने तक रामगंजमंडी पहुँच रहा था. उसके घर पहुँचने के दो दिनों मे ही आयुष का वहाँ पहुँचना उसके लिए अच्छा था.

कार घर के बाहर पहुँचते ही एक-दो बार हॉर्न बजाने पर चाची बाहर आई, उन्होंने गेट खोला, गुप्ताजी ने कार अंदर खड़ी की. एसी कार से बाहर निकलते ही शगुन को रामगंजमंडी की तेज गर्मी का अहसास हुआ. वह चाची से गले मिली, लेकिन उसकी आँखें मुक्ति को तलाश रही थीं. तभी उसे ड्राइंग रूम के दरवाजे के परदे के पीछे वह छुपती हुई दिखाई दी.

“दो दिन से रट रही है शगुन दी आएंगी आयुष भैया आएंगे. अब तुम आ गयी हो तो परदे के पीछे छुप रही है.” चाची ने बताया.

मुक्ति अब डेढ़ साल की थी. अब दौड़ने और बोलने भी लगी होगी. शगुन का मन उसे गोद में उठाने और बातें करने का हुआ. शगुन ड्राइंग रूम में गयी तो मुक्ति परदे के पीछे से हंसती हुई भाग कर अंदर जाने लगी, तभी फिसल कर फर्श पर कालीन पर गिर गयी. उसे चोट नहीं लगी थी पर बच्चे का रुआँसा होना स्वाभाविक था. शगुन ने उसे गोद में उठा कर पुचकार लिया. तू दीदी से भाग रही थी तो गिर गयी. दीदी से भागी क्यों? दीदी को प्यार नहीं करेगी? प्यार में भीगे शब्द सुन कर मुक्ति मुस्कुराने लगी.

इस बीच मम्मा, चाची और पापा सामान निकाल लाए. चाची उन्हें लेकर जीने से ऊपर जाने लगी. शगुन ने रोका तो कहने लगी, “एक बैग तुम्हारे लिए रख छोड़ा है, उसे लेकर आओ.”

चाची ने शगुन और आयुष का कमरा तैयार कर रखा था. सामान वे रख चुकी थीं. शगुन ने भी बैग रखा. फिर चाची से बतियाने लगी. उन्होंने बताया कि “इंदौर वाले मेहमान 26 मई की शाम को रामगंज मंडी पहुँच रहे हैं.

उस रात किसी ने शगुन से मेहमानों का कोई जिक्र नहीं किया. पापा के पूछने पर शगुन ने इतना जरूर बताया कि बी.एससी. में उसके विद्यापीठ में प्रथम स्थान पर रहने की पूरी संभावना है कि. ऐसा हुआ तो उसे स्वर्ण पदक मिलेगा. तीसरे दिन सुबह ग्यारह बजे आयुष भी घर पहुँच गया. उसे देख शगुन की बाँछें खिल उठीं. अब घर में उसका एक मजबूत समर्थक मौजूद था, और वह अपनी बात मजबूती से कह सकती थी.

दो दिन शान्ति से गुज़र गए. नन्ही मुक्ति शगुन और आयुष से खूब हिल गई थी. वे बाहर जाते तो उनके साथ जाने की जिद करती, वे साथ ले भी जाते. अभी तक उनके सामने मेहमानों के आने का कोई जिक्र नहीं हुआ था. पच्चीस मई की शाम अनिल चाचा दफ्तर से लौट कर आयुष के साथ लिविंग रूम में चाय पी रहे थे. शगुन ऊपर अपने कमरे में थी. तभी चाचा ने बताया कि, "कल शाम इन्दौर वाले मेहमान यहाँ होंगे. उनके ठहरने का इंतजाम होटल ऋतुराज में कर दिया है. रात को शगुन के सिवा हम सब उनके साथ होटल में ही डिनर कर लेंगे, हम परिवार और लड़के को देख लेंगे. अगली सुबह वे शगुन को देखने घर आएंगे. लंच यहीं करेंगे. उसके बाद वे होटल लोटेंगे और यदि उन्होंने हाँ कर दी तो हम होटल चल कर टीका करके दस्तूर कर देंगे. शगुन का ग्रेजुएशन हो चुका है, अब और क्या इंतज़ार करना?"

आयुष चाचा को सुन कर मुस्कुरा कर रह गया.

रात को छत पर, आयुष और शगुन एक साथ बैठे. चाची ने शाम को ही छत पर पानी छिड़क दिया था, वह ठंडी थी. हवा में भी कुछ ठंडक आ चुकी थी. यह वही जगह थी जहाँ कभी उन्होंने बचपन के सपने साझा किए थे.

"दीदी, अपना नियुक्ति पत्र लाई हो न?" आयुष ने धीमी आवाज़ में पूछा.

"हाँ आयुष, वह मेरे पास नीचे बैग में रखा है. मुझे ‘रोका’ हो जाने का कोई डर नहीं है, मुझे डर पापा की चुप्पी का है. मैं नहीं चाहती कि मेरा स्वावलंबन उन्हें समाज के सामने छोटा महसूस कराए."

आयुष ने दीदी का हाथ थाम लिया. "पापा को छोटा आप नहीं, बल्कि चाचा के थोपे हुए थोथे तर्क बना रहे हैं. जब आप यह पत्र दिखाएंगी, तो आप सिर्फ एक नौकरी की बात नहीं करेंगी, आप उस 'पिंजरे' की सलाखों को भी हटा देंगी जिसे पापा भी महसूस करते हैं पर कह नहीं पाते."

सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आहट हुई. मम्मा ऊपर आ रही थीं. उन्होंने दोनों को साथ देखा और उनके पास आकर बैठ गईं. "परसों की तैयारी पूरी है. अनिल चाचा ने सब व्यवस्था कर दी है. पर शगुन, तेरे पापा कुछ बोल नहीं रहे हैं, वे अंदर ही अंदर बहुत बेचैन हैं."

शगुन ने मम्मा का हाथ पकड़ लिया. "मम्मा, क्या पापा को मुझ पर भरोसा नहीं है? क्या मेरी तीन साल की मेहनत इस एक दिन की रस्म से कमज़ोर पड़ जाएगी?"

मम्मा की आँखों में आँसू थे, पर वे मुस्कुराईं. "भरोसा तो बहुत है बेटा, बस वे उस दुनिया से डरे हुए हैं जहाँ उन्होंने जन्म लिया है, जिसमें हम सब रहते हैं."

उस रात शगुन को नींद नहीं आई. उसने अपनी नोटबुक निकाली. उसमें उसने आज कुछ नहीं लिखा. बस एक पुराना सूखा हुआ गुलाब देखा, वही गुलाब जो फातिमा ने उसे इंटरव्यू वाले दिन दिया था.

नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र होने से रवि-पुष्य योग के लाभ गिना रहे थे. उधर गुवाहाटी की ब्रह्मपुत्र की लहरों की याद और बनस्थली के संकल्प के बीच आयुष और शगुन खुद को मजबूत कर रहे थे. रविवार को उन्हें साबित करना था कि पंख अब उड़ान के लिए तैयार हैं.
... क्रमशः