@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: अगस्त 2023

गुरुवार, 31 अगस्त 2023

रुक गए और पीछे को लौट रहे लोगों को साथ लेने की कोशिश भी जरूरी है

कल मैंने राखी बांधने के सन्दर्भ को लेकर मुहूर्तों की निस्सारता पर एक पोस्ट लिखी थी। उस पर मुझे दो गंभीर उलाहने मिले। पहला उलाहना मिला मेरे अभिन्न साम्यवादी साथी से। उनका कहना था कि पोस्ट बहुत अच्छी थी, लेकिन पोस्ट के अन्तिम पैरा से पहले वाले पैरा में जिसमें मैंने मुहूर्त चिन्तामणि ग्रन्थ का उल्लेख किया था उसकी बिलकुल आवश्यकता नहीं थी। उससे फिर से लोग उसी दलदल में जा फँसे।

साथी की बात कुछ हद तक सही थी। किन्तु मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि मानव विकास की यात्रा में अनेक पड़ाव हैं। मनुष्यों के अनेक दल हैं और ये सभी अलग अलग पड़ाव पर खड़े हैं या किन्हीं दो पड़ावों के मध्य यात्रा पर हैं। जो यात्रा पर हैं उनमें से अनेक प्रगतिशील हैं और हर समय कुछ न कुछ सीख रहे हैं, आगे बढ़ रहे हैं। अनेक ऐसे हैं जो किसी पड़ाव पर रुक गए हैं और आगे बढ़ने से डर रहे हैं या आगे बढ़ने की इच्छा त्याग चुके हैं। अनेक ऐसे भी हैं जो इतने भयभीत हैं कि उन्हें प्रस्थान-बिन्दु ही प्रिय लगता है और वे जहाँ तक आगे बढ़े थे वहाँ से भी पीछे हट कर उस पिछले पड़ाव पर हैं जिसे वे अपने लिए सुरक्षित समझते हैं। कुछ तो ऐसे भी होंगे जो प्रस्थान बिन्दु तक भी पहुँच गए होंगे, वे और पीछे जाना चाहते होंगे लेकिन उस बिन्दु से पीछे जाने का मार्ग जैविक रूप से ही बन्द हो चुका है। यह आगे बढ़ने और पीछे हटने की यात्राएँ हमे निरन्तर दिखाई पड़ती हैं। पीछे जाने वाले दक्षिणपंथी-पुरातनपंथी हैं। यह पंथ शोषक-सत्ताधारियों को बहुत पसंद आता है क्योंकि इससे उन्हें किसी तरह का भय नहीं महसूस होता है। न रुक कर आगे की यात्रा करने वाले प्रगतिशील और वामपंथी हैं, जो अपने अपने पड़ाव पर रुक गए हैं और जिन्हें वहीं स्थायित्व नजर आता है वे यथास्थितिवादी हैं।

मैं उन लोगों में हूँ जो इस विकास यात्रा में अपनी स्थिति से आगे बढ़ना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ सम्पूर्ण मानवजाति एक साथ आगे बढ़े। रुके हुए और पीछे जा रहे लोगों को अपने साथ लाने का काम भी बड़ा काम है। इस काम में जो व्यक्ति जिस स्थान पर रुका है या पीछे जा रहा है उसे उसी स्थान से लाकर साथ साथ लिया जा सकता है जहाँ वह अवस्थित है। जो अलग अलग स्थानों पर खड़े हैं उन्हें समझाने के तरीके भी भिन्न भिन्न होंगे। जिन्होंने मान लिया कि ये मुहूर्त वगैरह निरर्थक हैं, वे मेरे साथ आगे बढ़ने को तैयार थे, ऐसे लोगों को तो इस पोस्ट की बिलकुल भी जरूरत नहीं थी। बहुत लोग ऐसे थे जिनका दम इन परंपराओँ में घुट रहा है लेकिन अभी भी इस निस्सारता को समझने की स्थिति में नहीं हैं। मुझे लगा कि उनके लिए इस पोस्ट में कुछ न कुछ जरूर होना चाहिए जिससे उन्हें उनकी घुटन से कुछ तो राहत मिले और वे आगे की सोच सकें। क्योंकि इस पोस्ट को लिखा तो उन्हीं के लिए था। यह पोस्ट इस मामले में अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए स्वान्तः सुखाय तो बिलकुल भी नहीं लिखी थी।

मैं ने साथी की आपत्ति के बाद अपनी पोस्ट का पुनरावलोकन किया। मुझे लगा कि जहाँ मैंने मुहूर्त चिन्तामणि का उल्लेख किया वहीं इस बात का उल्लेख भी पुनः करना चाहिए था कि "यद्यपि अच्छे और मानवजाति के भले के लिए किए जाने वाले काम के लिए किसी मुहूर्त की कोई आवश्यकता नहीं फिर भी जो लोग अभी असमंजस में हैं उनके लिए मैं यह संदर्भ प्रस्तुत कर रहा हूँ।" इस संदर्भ की इसलिए भी आवश्यकता थी कि लोग जानते हैं मैं कम्युनिस्ट हूँ, और असमंजस वाले लोग यह न समझें कि मैं इसीलिए आलोचना कर रहा हूँ। जब कि मेरा वैचारिक परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। मुझे पंडताई वाली वे सब विद्याएँ बचपन और किशोरावस्था में सिखाई गयीं। घर में सभी तरह के धार्मिक, कर्मकांड सम्बन्धी और ज्योतिष ग्रन्थ बड़ी मात्रा में थे। मेरे पास उन्हें पढ़ने को पर्याप्त समय भी था। उन्हें पढ़ने और उनके अन्तर्विरोधों को भलीभाँति समझने और गुनने के बाद ही मुझे आगे की चीजें जानने की उत्कंठा हुई जिसके कारण मैं स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक विचार और वैज्ञानिक दर्शन "द्वंद्वात्मक भौतिकवाद" को जान सका। समझ सका कि यह दर्शन वास्तव में हमें स्पष्ट कर देता है कि दुनिया के तमाम व्यवहार किस पद्धति से चल रहे हैं और लगातार परिवर्तित हो रहे हैं। उस दर्शन को दैनंदिन घटनाओं पर अभ्यास करके परखा और फिर उस पर विश्वास किया। मेरा यह विश्वास हर दिन, हर पल, हर नयी जानकारी के साथ मजबूत होता है।

मेरी कल की कोशिश बस इतनी ही थी कि मैं अपने साथ वाले लोगों के कारवाँ के साथ ही आगे न बढ़ता रहूँ, बल्कि रुक गए और पीछे छूट गए लोगों को भी साथ लेता चलूँ। इसके बिना मंजिल पर पहुँचना शायद संभव भी नहीं। मुझे लगता है मेरी यह कोशिश कुछ तो कामयाब हुई ही है। दूसरे उलाहने का यहाँ उल्लेख नहीं करूंगा उसके बारे में अगली किसी पोस्ट में बात करूंगा।

बुधवार, 30 अगस्त 2023

मुहूर्तों की निस्सारता

लेकिन मुहूर्त देखने का व्यवसाय करने वाले ब्राह्मणों, गैर ब्राह्मणों और अखबारों, वेबसाइटों और मीडिया ने आज भी भद्रा -भद्रा का जाप करके भसड़ मचा रखी है।

मुझे भी अपनी किशोरावस्था में ज्योतिष और पंडताई का काम दादाजी ने सिखाया, उद्देश्य यही था कि यदि जीवन में कुछ सार्थक नहीं कर सका तो ब्राह्मण का बच्चा है यही सब करके पेट भराई तो कर ही लेगा।

उस समय जो सीखा और बाद में खोजबीन करके पढ़ा उसके हिसाब से मेरी समझ में यह सारा ज्ञान मिथ्या है और केवल डराने और रोजी रोटी चलाने का जरिया मात्र है।

मेरी एक कविता है...

क्या जोशी, क्या डाक्टर, क्या वकील
डरे को और डरावे,
फिर डर से निकलने का रास्ता बतावै,
जो ऐसा न करे तो घर के गोदड़े बिकावै।

ज्यादातर ब्राह्मणों को भद्रा के मामले में शास्त्रीय तथ्यों का ज्ञान तक नहीं है, वे भद्रा भद्रा करके लोगों को डराते हैं।

हालाँकि किसी भी ग्रंथ में रक्षाबंधन, प्रथम श्रावणी के अलावा बाद वाले श्रावणी कर्म और श्रवण पूजा हेतु शुभाशुभ देखने की जरूरत होने के बारे में कुछ भी नहीं कह रखा है। इसलिए कभी भी रक्षाबंधन मनाया जा सकता है।

महुर्त चिंतामणि ग्रन्थ कहता है, पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्थ में भद्रा रहती है, तथा तिथि के पूर्वार्ध में होने वाली भद्रा रात्रि में शुभ होती है। इस का सीधा अर्थ है कि आज 10.58 सुबह से पूर्णिमा आरंभ हो रही है उसमें पूर्वार्ध में अर्थात रात्रि 9.01 तक भद्रा रहेगी। लेकिन तिथि के पूर्वार्ध की भद्रा होने से रात्रि में शुभ है। जिसका अर्थ है कि सूर्यास्त के बाद वह शुभ है, सूर्यास्त के बाद रक्षाबंधन मनाया जा सकता है।

इसलिए जिन्हें रक्षाबंधन मनाना है मुहूर्त की टेंशन छोड़ो, मस्ती से पूरे दिन और रात कभी भी रक्षाबंधन मनाओ।


मंगलवार, 8 अगस्त 2023

पितृसत्ता खुद ही खुद को नष्ट करने के उपाय कर रही है

आज राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पृष्ठ पर समाज शास्त्री और स्तंभकार ऋतु सारस्वत का लेख छपा है "विवाह संस्था को कमजोर करेंगे लैंगिक आधार पर बने कानून"।

इस लेख में अन्य कारकों पर विचार किए बिना महिला सुरक्षा के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग के आधार पर यह निष्कर्ष आरोपित किया गया है कि ये कानून ही झगड़े की जड़ हैं। स्वर यह निकल रहा है कि स्त्री सुरक्षा के लिए तथा पुरुषों के अपराधों के लिए उन्हें दंडित किए जाने और अपराधों की रोकथाम के लिए बने कानून ही पुरुषों पर दमन के अपराधी हैं और इन्हें स्टेच्यूट बुक से हटा देना चाहिए।

इस लेख में जो निष्कर्ष निकाले गए हैं उनमें अन्य आधारों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। जब कि पिछले दिनों अनेक घटनाओं से यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि कानूनों में कोई खामी नहीं है बल्कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने और पुलिस जाँच में जो भ्रष्टाचार और राजनैतिक हस्तक्षेप व्याप्त है वही मूल रोग की जड़ है। आज भी पुलिस और राजनीति में पितृसत्ता का बोलबाला है। वहाँ हर बात का रुख पितृसत्ता तय करती है। पुरुषों के विरुद्ध जो गलत मुकदमे दर्ज होते हैं उनके पीछे पुरुषों की योजना और साधन काम करते हैं। लगभग सभी मामलों में स्त्रियाँ पितृसत्ता के लिए औजार बना दी जाती हैं।

कहने को लेखिका समाजशात्री हैं, लेकिन इस पूरे लेख में किसी सामाजिक अध्ययन का उल्लेख नहीं किया गया। तथ्यों और आँकड़े लेख से गायब हैं। इस का सीधा अर्थ है कि खोखले लेखों के जरीए प्रिंट मीडिया भी सत्ता और पितृसत्ता की सेवा में मुब्तिला है। यहाँ तक कि स्त्री सुरक्षा के लिए निर्मित इन कानूनों को परिवार तोड़ने वाला बता कर जो थोड़ी बहुत सुरक्षा और हिम्मत स्त्रियाँ इन कानूनों से प्राप्त करती हैं उसका अंत करने की तैयारी है। वैसे ही दुरुपयोग के आधार पर इन कानूनों के दाँत तोड़ दिए गये है।

मैं इस बात से इन्कार नहीं करता कि कानूनों का दुरुपयोग नहीं होता। वह होता है, और खूब होता है। लेकिन दुरुपयोग की जड़ हमारी पुलिस, सरकारी अफसर और राजनेता हैं जो पितृसत्ता को बनाए रखते हैं। इस समस्या का गंभीर रूप से सामाजिक अध्ययन होना चाहिए। प्रधानमंत्री गली-गली यूनिवर्सिटी खोलने की बातें करते हैं यहाँ तक कि विदेश तक में कर आते हैं। लेकिन इस लेख में किसी एक विश्वविद्यालय द्वारा किए गए सामाजिक अध्ययन या शोध का कोई उल्लेख नहीं है।

समस्या की सारी जड़ पितृसत्ता में है। आज जब संविधान स्त्री और पुरुष को समान अधिकार देता है, तब समाज हर अधिकार और व्यवहार को पितृसत्ता की कसौटी पर कसने को तैयार रहता है। हम अपने समाज में जनतांत्रिक मूल्यों का विकास ही नहीं कर पाए हैं और न ही उन मूल्यों को समाज में स्थापित करने के बारे में कोई तैयारी नजर आती है। इस लेख में विवाह संस्था के नष्ट होने का खतरा बहुत जोरों से बताया गया है जैसे शहर पर स्काईलेब गिरने वाली हो। लेकिन विवाह संस्था इन कानूनों की वजह से नहीं बल्कि पितृसत्ता के दासयुगीन और सामंती सोच के कारण टूट रही है। उसे खुद पितृसत्ता से खतरा है, किसी कानून से नहीं। हमारे समाज को सामाजिक व्यवहारों में और परिवार में जनतांत्रिक व्यवहार सीखना होगा, स्त्री-पुरुष के मध्य कागजी और कानूनी समानता के स्थान पर वास्तविक समानता स्थापित करनी होगी तभी ये समस्याएँ हल हो सकेंगी। उसके बिना इस समस्या से कोई निजात नहीं है। आज कम संख्या में ही सही पर स्त्रियाँ पितृसत्ता को चुनौती दे रही हैं। पितृसत्ता को यह खतरा सबसे बड़ा नजर आता है उसका परिणाम यह लेख है, जो एक स्त्री से लिखवाया गया है और एक स्त्री अखबार में नाम तथा मामूली पारिश्रमिक के लिए इसे लिख रही है। ऐसी लेखिकाओं को भी सोचना चाहिए कि वे आखिर एक स्त्री हो कर पितृसत्ता का टूल कैसे बन रही हैं।

आप इसी तथ्य से सोच सकते हैं कि पितृसत्ता कितनी घबराई हुई है कि एक मुख्यमंत्री ने यह कहा है वे इस बात पर शोध करवा रहे हैं कि लव मैरिज में कैसे मातापिता की सहमति को अनिवार्य किया जा सकता है। यानी अब एक वयस्क स्त्री और पुरुष से यह अधिकार भी छीन लिया जाएगा कि वह अपनी मर्जी से ऐसा जीवन साथी चुन कर विवाह करे जिसके साथ उसे पूरा जीवन बिताना है। ऐसा कानून बना कर आप विवाहेतर संबंधों को बढ़ावा तो दे ही रहे हैं लेकिन उसके साथ ही विवाह संस्था को क्षतिग्रस्त भी कर रहे हैं क्योंकि तब बहुत सारे स्त्री-पुरुष बिना विवाह किए साथ रहना अर्थात सहजीवन में (Live in) रहना पसंद करेंगे। जो बड़े पैमाने पर अब हमारे महानगरों में देखने को मिल रहा है। कुल मिला कर हालात ये हैं कि पितृसत्ता खुद ही खुद को नष्ट करने के उपाय कर रही है।



मंगलवार, 1 अगस्त 2023

नस्लीय और धार्मिक राष्ट्रवाद लोगों को हत्यारों में तब्दील कर देते हैं

 क्या आप जानते हैं साथ के इस चित्र में यह क्या है? इसे क्या कहते हैं?

इस औजार का नाम fasces है, यह एक लैटिन शब्द है और यह औजार प्राचीन रोम में पाया जाता था।
इस औजार में एक लकड़ी का डंडा है जिस पर कुछ छोटे डंडों का एक गट्ठर बंधा है, उसके भी सिरे पर एक कुल्हा़ड़ी जैसा धारदार औजार बंधा है। यह एक प्राचीन प्रतीक है जो सामुहिक दंडाधिकार को प्रकट करता है। लेकिन इसी अधिकार को यदि किसी नस्लीय, धार्मिक या जातीवादी राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाए तो वह मनुष्यता के लिए सबसे खतरनाक राजनैतिक विचार बन जाता है।
 
यह काम सबसे पहले इटली में मुसोलिनी ने किया और एक रोमन राष्ट्रवाद खड़ा करते हुए इस प्रतीक नाम का उपयोग किया और अपनी राजनैतिक विचारधारा को FASCISM फासीवाद नाम दिया। बाद में पड़ौसी देश जर्मनी में हिटलर ने इसी विचारधारा का उपयोग कर जर्मन राष्ट्रवादी पार्टी नेशनल सोशलिस्ट पार्टी खड़ी की जिसका प्रतीक स्वास्तिक को बनाया। नेशनल सोशलिज्म शब्दों के एन ए सोशलिज्म के इज्म को मिला कर इसे नाजिज्म नाम बना। दोनों ने आपस में गुट बनाया और यूरोप में कत्लेआम मचा दिया, जो दूसरे विश्वयुद्ध का एक आधार बना।

उस समय की वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों ने इस विचारधारा के लिए खाद पानी का काम किया। पूंजीवाद भयानक मंदी में फँसा था। साम्राज्यवादी देशों को नए बाजार चाहिए थे। जनता में असन्तोष था। उस असंतोष को दबाने के लिए शासकों को लगा कि राष्ट्रवाद का झुनझुना बढ़िया है और नासमझ जनता में बहुत बढ़िया तरीके से काम करता है।

मुसोलिनी से प्रेरणा प्राप्त कर लगभग एक सदी पहले भारत में भी एक संगठन खड़ा किया गया जिसे हम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नाम दिया गया। इसने भारत में हिन्दू धार्मिक राष्ट्रवाद को फैलाने की कोशिश की। बाद में जिस तरह नस्लीय राष्ट्रवाद को जर्मनी में नाजिज्म नाम दिया गया था, यहाँ भारत में उसी तरह इस विचारधारा को हिन्दुत्व नाम प्राप्त हुआ है, जो भारतीय सनातन धर्म की मूल शिक्षाओं के बिलकुल विपरीत विचार है।

यह विचारधारा लोगों को व्यक्तिगत रूप से एक हत्यारे के रूप में परिवर्तित कर देती है। इसका उदाहरण कल जयपुर मुंबई एक्सप्रेस में इसी विचार से प्रभावित आरपीएफ के एक सिपाही ने आरपीएफ के ही एक अधिकारी और तीन यात्रियों की हत्या कर दी है।