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शनिवार, 13 जून 2026

मौन संकल्प

देहरी के पार, कड़ी - 66
मुंबई की सुबह हल्की धुंध में लिपटी थी. खिड़की से आती रोशनी ने कमरे की दीवारों पर सुनहरी परछाइयाँ बना दी थीं. प्रिया ने चाय का कप हाथ में लिया और बालकनी में आ खड़ी हुई. नीचे सड़क पर मजदूरों का एक छोटा समूह अपने औज़ारों के साथ जा रहा था — वही चेहरे, वही गति, वही उम्मीद.

उसके भीतर कुछ हिलने लगा. कल आकाश और मयंक के साथ बिताई वह सहज, हँसती हुई शाम अब किसी दूर के सपने जैसी लग रही थी. उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था, ‘क्या मैं उस राह पर चल सकती हूँ जहाँ प्रेम और संघर्ष दोनों साथ हों?’

प्रशांत बाबू का पार्टी की सदस्यता के लिए प्रस्ताव ने उसके मस्तिष्क में स्थान बना लिया था. हवा में नमक और धुएँ की मिली-जुली गंध थी. शहर जाग रहा था, और उसके भीतर भी कुछ जाग रहा था — एक निर्णय, जो शायद उसके जीवन की दिशा तय करेगा.

उसने धीरे से खुद से कहा, “हर चौराहा एक नई राह देता है... बस हिम्मत चाहिए उसे चुनने की.” कप की आखिरी चुस्की लेकर वापस हॉल में आ गई. अभी तक सो रहे मयंक को जगाया. “उठ भाई, निपट ले. नौ बजे आकाश टैक्सी लेकर पहुँच जाएगा, तब तक निपटकर तैयार रहना है.

आकाश सुबह टैक्सी लेकर अंधेरी पहुँचा तो सवा नौ हो रहे थे. प्रिया, मयंक और आकाश—सीधे गेटवे ऑफ इंडिया के लिए निकल पड़े. मयंक के लिए मुंबई की यह पहली सुबह कौतूहल से भरी थी. आकाश ने महाराष्ट्र पर्यटन (MTDC) की टूरिस्ट बस' मुंबई दर्शन' के टिकट पहले से ही बुक करवा लिए थे.

मयंक बस की खुली छत (Open Deck) वाली सीट पर बैठने के लिए बच्चों की तरह उत्साहित था. बस जैसे ही कोलाबा की विक्टोरियन इमारतों, मरीन ड्राइव के घुमावदार रास्तों और फोर्ट के ऐतिहासिक रास्तों से गुज़रने लगी, बस का गाइड हाथ में माइक सँभाले लाउडस्पीकर पर हर एक इमारत, राजाबाई क्लॉक टॉवर और इस महानगर के बनने का जीवंत इतिहास सुनाने लगा. आकाश और मयंक, दोनों ही इस शहर के लिए नए मुसाफिर थे, इसलिए वे बिना किसी औपचारिकता के एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाए गाइड की बातों को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे.

दोपहर में अपने ठहराव के दौरान बस कोलाबा में रुकी. सामने वही पुराना, धीमे संगीत वाला ईरानी कैफे था. वे उसमें दाखिल हो गए. बन-मस्का और कड़क ईरानी चाय का स्वाद लेते हुए, मयंक अपनी पारखी और शरारती नज़रों से चुपचाप अपनी दीदी और आकाश को नोटिस कर रहा था. उसने देखा कि जब भी गाइड ने रास्ते में मुंबई की किसी ऐतिहासिक मज़दूर चाल या गिरणी कामगारों के पुराने आंदोलनों का ज़िक्र करता था, तो प्रिया की आँखें चमक उठी थीं. और ठीक उसी पल, आकाश किस तरह अपनी सारी दुनिया भूलकर प्रिया के उस बदलते, प्रखर चेहरे को अगाध आदर और मौन प्रेम से निहार रहा था. मयंक अपनी दीदी को समझता था; वह भाँप गया कि उन दोनों के बीच अब केवल पुरानी कलीग वाली औपचारिकता नहीं रह गई थी. वे गहराई के साथ एक दूसरे से जुड़े महसूस हो रहे थे, उनमें आपस में गहरा प्रेम चुपचाप अपनी जड़ें जमाने लगा था.

शाम को बस का सफर खत्म हुआ. तीनों नरीमन पॉइंट पर समंदर के किनारे पत्थरों पर आकर बैठ गए. समंदर की ठंडी हवा के झोंके उनके चेहरों को छू रहे थे. मयंक पानी की बोतलें और कुछ स्नैक्स लेने के लिए थोड़ी दूर बनी एक दुकान की तरफ चला गया. आकाश और प्रिया वहीं बैठे रहे.

प्रिया एकटक समंदर की उठती-गिरती लहरों को देख रही थी. उसके चेहरे पर ढलते सूरज की मद्धिम लालिमा बिखर गई थी. आकाश ने उसकी ओर देखा. उसके भीतर पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सी छटपटाहट चल रही थी. प्रिया जिस तेज़ी से खुद को बदल रही थी, मज़दूरों के हक की लड़ाइयों और उसके अध्ययन के वैचारिक धरातल पर उसका जो व्यक्तित्व पनप रहा था, उसे देखकर आकाश के मन में एक अनकहा संशय पैदा होता था. वह सोच रहा था कि वह एक सीधा-सादा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, अपने और परिवार का जीवन चलाने के लिए दिनभर काम करता है, शाम को थककर निढाल हो जाता है. सुबह जब थकान उतरती है तो फिर से तैयार होकर काम में जुट जाता है. उसे अपने घर-परिवार से इतर देखने की फुरसत तक नहीं, वहीं प्रिया, वह बिलकुल उसका जैसा काम करते हुए भी खुद को कैसे मेहनतकशों के संघर्षों में पूरी ऊर्जा के साथ योगदान करती है. ऐसा लगता है उसने अपना जीवन चलाने के सिवा वर्गोत्थान को अपना लक्ष्य बना लिया है. वह खुद को इस योग्य कैसे बनाए कि प्रिया जैसी अद्भुत लड़की का जीवनसाथी बन सके? उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कुछ ठोस तो करना होगा. कुछ ऐसा जिससे वह कम से कम प्रिया के वैचारिक आधार को समझ सके. आकाश को फिलहाल इतना भी साहस नहीं हो पा रहा था कि वह अपने इस डर को प्रिया के सामने रख सके, इसलिए उसने कुछ नहीं कहा, बस मौन बैठा उसे निहारता रहा. लेकिन समंदर की लहरों की गूँज के बीच उसके भीतर खुद को बदलने का एक 'मौन संकल्प' आकार लेने लगा था.

प्रिया ने मुस्कुराकर आकाश की तरफ देखा. उसकी आँखों में आकाश के लिए निश्चल प्रेम था. वह केवल आकाश को नहीं चाहती थी, वह उसके उस सीधे-सादे और आत्मीय परिवार को भी उतना ही चाहती थी, जिसने मुसीबत के दिनों में जयपुर में उसे अपनी बेटी समझकर सँभाला था. उस सादगी से बड़ा कोई व्यक्तित्व नहीं होता. दोनों के बीच बिना कुछ कहे भी एक गहरी, आत्मीय खामोशी पसरी रही.

अगले दिन, रविवार की सुबह बेहद अलसाई हुई थी. मयंक अभी भी कारपेट पर बिछे बिस्तर पर गहरी नींद में सोया हुआ था. प्रिया ने रसोई में जाकर चाय बनाई और अपना लैपटॉप स्टार्ट किया. कल रात ही फोर्ट के एडवोकेट रमेश चव्हाण ने 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' के फाइनल ड्राफ्ट को हरी झंडी दे दी थी, और प्रशांत बाबू ने उसका फाइनल मसौदा प्रिया को ई-मेल कर दिया था और साथ में एक छोटी सी टिप्पणी थी, ‘इसे एक बार देख लेना.’ मंगलवार 18 जून, को यूनियन को इसे इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में पेश करना था. जिसमें उसकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी. लेकिन इस पूरे मामले की रीढ़ वही सांख्यिकीय सर्वे और डेटा था जिसे तैयार करने में प्रिया की भूमिका थी. शायद इसीलिए यह फाइनल ड्राफ्ट उसे भेजा गया था. वह लैपटॉप की स्क्रीन पर निगाहें जमाए स्टेटमेंट ऑफ क्लेम को शब्द-दर-शब्द पढ़ने लगी.

जैसे-जैसे वह उसे पढ़ती जा रही थीं, उसे ईसीआई फैक्ट्री के मज़दूरों के उस पूरे इतिहास, उनकी दशा, उनके जमीनी और कानूनी संघर्षों की थाह मिल रही थी. अनेक तथ्य ऐसे निकलकर आए थे जिनकी उसे जानकारी नहीं थी. वह समझ रही थी कि संगठित कामगारों का जीवन भी कितना संघर्षमय होता है, कैसे उन्हें उनके कानूनी हक देने में भी पूंजीपति को बहुत जोर आता है. बाजार भावों के उतार-चढ़ाव को तो वह किसी तरह सहन कर जाता है लेकिन अपने एम्पलॉई को एक रुपया भी अधिक देने में वह प्राणांतक दर्द महसूस करने लगता है, जैसे ही उसे लगता है इस उद्योग से दूसरा उद्योग बेहतर मुनाफा देगा, तो वह उस उद्योग में काम कर रहे सैंकड़ों-हजारों कर्मचारियों को बेरोजगार छोड़ अपना नया उद्यम सजाने लगता है. सीनियर वकील चव्हाण साहब के निर्देशन में सहायकों ने जो मसौदा तैयार किया था उसमें मज़दूरों का छिपा हुआ दर्द बखूबी स्पष्ट दिखाई देता था. सांख्यिकीय रिपोर्ट का कोई महत्वपूर्ण तथ्य ऐसा नहीं था जो छूट गया हो. यह दस्तावेज अब कोर्ट के रिकॉर्ड पर जाने के लिए तैयार था. वह जानती थी कि इस स्टेटमेंट ऑफ क्लेम के तथ्यों को साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज वे जुटा चुके हैं उन्हें प्रमाणित करने को यूनियन पदाधिकारियों और मजदूरों के बयान पर्याप्त होंगे. उसने ई-मेल का उत्तर देते हुए केवल एक वाक्य लिखा, ‘ऑल करेक्ट एण्ड सफिशियंट’ और सेंड पर क्लिक कर दिया.

प्रिया ने चाय का मग होंठों से लगाया और खिड़की से बाहर देखा, मुंबई की सुबह धीरे-धीरे जवान हो रही थी. उसने अंदर देखा, मयंक अभी भी गहरी नींद में था. शायद कल की थकान उसके लिए स्वाभाविक नहीं थी. सोमवार से उसे फिर से काम पर जाना था. उसके पास बस आज का दिन था जब वह मयंक को कुछ मुंबई घुमा सकती थी और उसे इतना निर्देशित कर सकती थी कि आने वाले सप्ताह के पहले पाँच दिनों में वह अकेले भी मुंबई की थाह ले सके.
... क्रमशः

गुरुवार, 11 जून 2026

अंतर्द्वंद

देहरी के पार, कड़ी - 65
प्रिया के फोन रख देने के बीस मिनट बाद ही मयंक को जयपुर मुंबई ट्रेन का थर्ड एसी टिकट ई-मेल से मिल गया, साथ ही टेक्स्ट मैसेज भी फॉरवर्ड होकर मिला. अब उसे गुरुवार की शाम मुंबई के लिए ट्रेन पकड़नी थी. उसने यह बात तब तक छिपाए रखी जब तक कि पापा फैक्ट्री के लिए न निकल गए. उनके जाते ही उसने टिकट का प्रिंट निकाला और लेकर मम्मी के पास पहुँच गया. “मम्मी, दीदी से आज सुबह ही बात हुई. पूछ रही थी कि ‘तेरी परीक्षा निपट गई?’. मैंने बताया कि रिजल्ट आने तक महीने भर मैं बिलकुल फ्री हूँ, तो कहने लगीं मुम्बई आ जा, मैं टिकट करवा देती हूँ. बीस मिनट बाद तो उन्होंने मुझे टिकट भी भेज दिया.”

“तूने प्रिया से बात कर ली, मुझे बताया भी नहीं. मैं भी उससे बात कर लेती. और फिर दो घंटे तक उस बात को छिपाए रखा. अच्छा ... ... मैं समझ गई. तू पापा के जाने का इंतजार कर रहा था. तू इतना डरता है पापा से?”

“नहीं मम्मी, मैं कहाँ डरता हूँ? बस प्रिया दीदी का नाम जुबान पर आते ही उनका चेहरे की चमक चली जाती है, वे उदास हो जाते हैं. इसीलिए सुबह-सुबह ध्यान रखा. उनका पूरे दिन का काम खराब हो जाता.”

“बड़ा आया पापा का ध्यान रखने वाला.”

“टिकट कब का है?”

“अगले गुरुवार का है. शुक्रवार सुबह मैं दीदी के साथ होऊंगा,” मयंक ने कहा.

रात गुप्ता जी लौटे तो पता लगने पर मयंक से पूछा, “प्रिया ने तुम्हारी माँ का टिकट नहीं बनवाया?”

“नहीं बनवाया, दीदी ने कहा, ‘फिर पापा अकेले रह जाएंगे’.” सुनकर गुप्ता जी ने चुप्पी साध ली.


शुक्रवार की सुबह ट्रेन मुंबई के बोरिवली स्टेशन पहुँच रही थी. मयंक अपने कंधे पर पिट्ठू बैग लटकाए और एक छोटा सूटकेस बाएँ हाथ में थामे अपने कोच के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ. खुले दरवाजे से आ रही तेज हवा ने उसके बालों को बिखेर दिया, वे हवा के साथ उड़ने लगे. ट्रेन रुकने के पहले ही उसे स्टेशन पर प्रिया दिखाई दे गई. वह उसे देखकर अपना हाथ हिला रही थी. महीनों बाद दीदी को देख उसके चेहरे पर खुशी दौड़ गई. ट्रेन रुकते ही वह उतरा और दौड़कर दीदी के पास पहुँचा, प्रिया ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. दोनों की आँखें नम हो आईं.

मुंबई जैसे महानगर में आने के बाद प्रिया अधिक दिन अकेली नहीं रही थी. रामजी काका और प्रशांत बाबू से भेंट के बाद उसकी मित्रता का दायरा बढ़ ही रहा था. मित्र यूनियनों के अनेक कार्यकर्ता उसे अपने परिवार के सदस्य समझने लगे थे. मेवाड़ भोजनालय (एमबी) के सारे स्टाफ के लिए वह दीदी थी. फिर भी सहोदर भाई को गले लगाना, उसे बाहों में लपेट लेना था ऐसा था, जैसे उसका समूचा परिवार उसकी बाहों में समा गया हो. फ्लैट पर पहुँचने के बाद चाय के मग हाथ में लिए दोनों भाई-बहन डाइनिंग टेबल पर बैठे, तो मयंक चाय की चुस्कियाँ लेते हुए कोटा के घर का पूरा हाल सुनाने लगा.

"दीदी, पापा भी अब पहले जैसे नहीं रहे," मयंक ने बिस्कुट का टुकड़ा दाँतों से काटते हुए कहा. "उनका गुस्सा अब पूरी तरह गायब हो चुका है. अब जब भी तुम्हारा ज़िक्र आता है, तो वे अड़ियल नहीं होते, बल्कि चुप हो जाते हैं. उनकी आँखों में अब एक दबी हुई फिक्र और तुम्हारे लिए एक अनकहा सम्मान दिखाई देता है. मम्मी तो बस उस दिन का इंतज़ार कर रही हैं जब पापा खुद कहेंगे कि चलो, मुंबई चलकर प्रिया से मिल कर आते हैं."

मयंक की बातें प्रिया के कानों में शहद घोल रही थीं. पारिवारिक संबंधों का यह सुख, अपनों की फिक्र और एक सहज, सुरक्षित घरेलू जीवन की आकांक्षा बेशकीमती होती है, इसका अहसास उसे आज बहुत गहराई से हो रहा था. लेकिन ठीक उसी क्षण, उसके अंतर्मन के किसी कोने में एक हल्की सी टीस उठी. वह सोचने लगी—उसके पिता ने विरासत में मिले एक मध्यम आढ़त के व्यवसाय से एक छोटे उद्योग के स्वामी होने तक का सफर तय किया था. तब वह बहुत छोटी थी. वे दिन पापा के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए संघर्ष और कभी-कभी अभाव के दिन थे. वे और उनके कर्मचारी सब एक जैसी स्थिति को जीते थे. मुश्किल से ये अच्छे दिन देखने को मिले थे. संघर्ष के दिनों में आढ़त और फैक्ट्री के कर्मचारियों के साथ जिए गए कष्ट के दिनों ने ही उसमें मेहनतकश बिरादरी के प्रति करुणा भाव जन्म लिया. उनमें से अनेक से उसे बेटी जैसा प्यार मिला था. उसी दौर ने प्रिया को उन्हें अपना परिवार समझने की सीख पैदा की थी, जिसने उसे मुंबई में मजदूरों के संघर्ष से जोड़ दिया.

प्रिया ने फुर्ती से नाश्ता बनाया और अपने लिए टिफिन तैयार कर लिया तथा मयंक के लिए भी लंच बना कर किचन में छोड़ दिया. मयंक को समय से लंच कर लेने की हिदायत दी और खुद अपने ऑफिस चली आई. यहाँ कंप्यूटर की स्क्रीन पर उंगलियाँ चलाते हुए भी उसके दिमाग में प्रशांत बाबू का पार्टी मेंबर बनने का प्रस्ताव बार-बार सामने आ रहा था. वह जानती थी कि वह बौद्धिक रूप से योग्य है; उसने साहित्य पढ़ा है, उससे सीखा है, अब वह खुद कर्मचारी है और श्रमजीवी होने का मतलब समझती है. फिर कमी कहाँ थी? कमी योग्यता में नहीं थी. शायद उसमें अभी उस साहस की कमी थी जो वक्त आने पर वर्ग के लिए खुद को पूरी तरह झौंक देने को चाहिए होता है.

उसके जेहन में कभी गोर्की के 'माँ' का नायक पावेल ब्लासोव की तो कभी आस्त्रोवस्की के अग्निदीक्षा उपन्यास के पावेल कोर्चागिन की छवियाँ आ खड़ी होती. कभी उसका ध्यान शहीद-ए-आजम भगत सिंह पर जा टिकता. तेईस साल की उम्र का वह लड़का, कितना कुछ पढ़ चुका था? कितनी दुनिया देख चुका था. दुनिया और समाज के बारे में उसने अपनी जो समझ सबके सामने रखी थी, शायद आज भी देश लगभग वहीं खड़ा है. उसने अपने लिए जो सामाजिक लक्ष्य निर्धारित किए थे वे आज भी नहीं बदले हैं. आज भी समाज, देश और दुनिया को वही चाहिए जो भगत सिंह चाहता था.

प्रिया ने की-बोर्ड छोड़कर कुर्सी के पीछे सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं. फाँसी के फंदे पर झूलने से महज कुछ मिनट पहले तक जेल की कोठरी में भगत लेनिन की जीवनी पढ़ रहा था.. वह सोचने लगी कि आखिर वह क्या आदर्श था, जिसने उसे असेंबली में बम फेंकने और हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ जाने का साहस दिया था?

"क्या मुझमें कभी वैसा हौसला पैदा होगा?" प्रिया ने खुद से पूछा. "क्या मैं उस महान आदर्श के लिए अपने व्यक्तिगत सुखों को स्वेच्छा से पीछे धकेल सकती हूँ?" यह प्रश्न उसके मस्तिष्क में स्थाई रूप से खड़ा हो गया था.

शाम को वह ऑफिस से लौटी, तब आकाश पहले से उसके फ्लैट पर पहुँचा हुआ था और मयंक से गपबाजी में मशगूल था. प्रिया के घर छोड़ देने के बाद आकाश का प्रिया को अपनी कार से जयपुर ले लाना, होटल पर न ठहरने देना और उसकी सुरक्षा के लिए उसे अपने परिवार के साथ अपने घर ठहराना. उसके पूरे परिवार का उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना और विक्रांत से बचाना ऐसी घटनाएँ थी जिन्होंने मयंक के मन में आकाश के लिए गहरा आदर पैदा किया था. दोनों हॉल में बैठे अनौपचारिक, रूप से ऐसे बतिया रहे थे जैसे छोटे बड़े भाई हों.

प्रिया के कपड़े बदल कर तैयार होने पर पौने नौ बज रहे थे. यह खाने का समय था. वे निकट ही ‘चपाती’ रेस्टोरेंट पहुँचे, वहीं डिनर किया और फिर तीनों अंधेरी की एक हलचल भरी, रोशन सड़क पर टहलने निकले. मयंक और आकाश आगे-आगे चल रहे थे. मयंक चहकते हुए कोटा की बातें कर रहा था और आकाश मुस्कुराते हुए उसे मुंबई के तौर-तरीके समझा रहा था.

प्रिया उन दोनों से दो कदम पीछे, चुपचाप उनके साथ चल रही थी. सड़क की पीली बत्तियों की रोशनी में उसने आगे चलते आकाश के चौड़े कंधों और उसकी हँसती, खिलखिलाती आवाज़ को देखा. आकाश—एक ऐसा इंसान जो उसकी आज़ादी का सम्मान करता था, जो उसके जीवन में एक बेहद खूबसूरत, शांत और प्रेमपूर्ण भविष्य का प्रतीक बन सकता था. शायद उसके साथ ऐसा वैवाहिक जीवन वैसा हो सकता था, जिसका सपना हर लड़की देखती है.

लेकिन ठीक उसी पल, उसकी आँखों के सामने मिल के गेट पर खड़े लाचार मज़दूरों के चेहरे आ गए, जिनके बीच पिछले दिनों उसने पूरी शिद्दत के साथ काम किया था. मजदूर वर्ग की वेनगार्ड पार्टी का मेंबर होने का सीधा मतलब था—अपने व्यक्तिगत सुखों, अपनी सुख-सुविधाओं और यहाँ तक कि अपने प्रेम को भी मज़दूर वर्ग के व्यापक हितों से पीछे की पायदान पर रख देना. अगर कभी आंदोलन की ज़रूरत और इस व्यक्तिगत प्रेम के बीच चुनाव करना पड़ा, तो क्या वह बिना हिचकिचाए अपनी खुशियों को सेक्रिफाइस कर पाएगी? क्या वह इतनी मजबूत है?

अचानक आकाश ने पीछे मुड़कर देखा. प्रिया को पीछे चुपचाप चलते पाकर उसने अपनी रफ्तार धीमी कर दी और उसके करीब आते हुए बेहद अपनेपन से पूछा, "प्रिया, तुम कहाँ खो गई हो? देखो मयंक क्या कह रहा है."

प्रिया ने पलकें झपकाईं. उसने अपने भीतर के उस वैचारिक बवंडर को बहुत संभालकर अपने सीने में छिपा लिया और चेहरे पर एक गहरी, शांत और आत्मीय मुस्कान लाते हुए कहा, "कहीं नहीं आकाश, बस तुम दोनों की बातें सुन रही हूँ और सोच रही हूँ कि आज मुंबई की यह शाम कितनी सुंदर लग रही है."

उसने आगे बढ़ते हुए आकाश और मयंक के बीच अपनी जगह बनाई. वह जानती थी कि उसके अंतर्मन का यह संघर्ष इतनी जल्दी खत्म होने वाला नहीं है; यह रास्ता लंबा था और इसका फैसला उसे बहुत धीरज और परिपक्वता के साथ करना था.
... क्रमशः

बुधवार, 10 जून 2026

नया सिलसिला

देहरी के पार, कड़ी - 64
एसोसिएशन लाइब्रेरी से कुछ नई किताबें लेकर निकलते समय सूरज डूब चुका था. धूप गायब थी, जिससे गर्मी कम हो गयी थी. उसकी सोसायटी मुश्किल से दो किलोमीटर भी नहीं थी. वह पैदल ही चल दी. उसे फिर आकाश का ध्यान आया. पूरा हफ्ता बीत चुका था, लेकिन आकाश का फोन नहीं आया था. पिछले शनिवार की उस लंबी मुलाकात के बाद प्रिया ने मन ही मन तय किया था कि इस बार वह पहल नहीं करेगी; आकाश को खुद आगे बढ़कर फोन करना चाहिए. लेकिन जैसे-जैसे दिन गुज़रते गए, फोन की खामोशी उसके भीतर एक अजीब सी छटपटाहट पैदा करने लगी थी. क्या आकाश उसकी बातों से आहत हो गया था? या उसने प्रिया के उस गंभीर रुख को कोई आखिरी फासला समझ लिया था? सवालों का एक सिरा था जो थमता नहीं था. वह सौ मीटर भी नहीं चली थी कि पसीने में तर हो चुकी थी. मुंबई की उमस भरी गर्मी सबसे मुश्किल मौसम है. उसे शेयरिंग ऑटो जाता दिखा. वह उसे रोककर बैठ गई.

फ्लैट का दरवाजा खोल अंदर प्रवेश करते ही उसने एसी चालू किया. किताबें मेज पर रखकर सोफे पर पसर गई. दस मिनट बाद उसे गर्मी से कुछ राहत मिली. उसने घड़ी देखी, सवा सात बज रहे थे. अब सवाल शाम के खाने का था. आज सुबह सफाई और कपड़े धोने सुखाने के काम में लग जाने से दोपहर का खाना देर से, करीब ढाई बजे हुआ था. पेट में भूख कम थी, लेकिन थी कि कुछ न कुछ तो पेट में जाना ही चाहिए. वह रसोई की तरफ कदम बढ़ाने ही वाली थी कि ड्रॉइंग रूम में रखे फोन की घंटी बज उठी.

प्रिया ने लपककर फोन उठाया. स्क्रीन पर 'आकाश्' का नाम चमक रहा था. दिल की धड़कन ने एक हल्की सी रफ्तार पकड़ी, लेकिन अपनी आवाज़ को बेहद सामान्य रखते हुए कहा, "हेलो आकाश."

"हेलो प्रिया! कैसी हो? परेशान तो नहीं किया?" उधर से आकाश की वही परिचित, हिचकिचाती हुई आवाज़ आई.

"नहीं, बिल्कुल नहीं. बस अभी-अभी एसोसिएशन लाइब्रेरी से लौटी हूँ. सोच ही रही थी कि शाम के खाने का क्या किया जाए. तुम बताओ, पूरे हफ्ते भर से तुम्हारी कोई खबर नहीं? एक फोन कॉल तक नहीं. सब ठीक तो है?" प्रिया के उलाहने में भी अपनापन था.

उधर से आकाश थोड़ा हँसा, उसकी हँसी ने प्रिया को एक राहत दी. "हाँ, सब ठीक है प्रिया. असल में इस हफ्ते ऑफिस में एक नया मॉड्यूल डिप्लॉय होना था, रातों की नींद गायब थी. और... सच कहूँ तो थोड़ा समय खुद को भी देना चाहता था. पिछले वीकेंड की बातें दिमाग में घूम रही थीं. मुझे लगा तुम्हें भी थोड़ा स्पेस चाहिए."

प्रिया खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई. आकाश की इस परिपक्वता ने उसके मन के सारे संशयों को एक पल में पिघला दिया. "स्पेस तो ठीक है आकाश, पर इतनी खामोशी भी अच्छी नहीं. खैर, डिप्लॉयमेंट पूरा हो गया?"

"हाँ, कल रात ही साइन-ऑफ मिला है. आज दिनभर सोता रहा. अभी उठा तो तुम्हारी याद आई. खाना खा लिया तुमने?"

"नहीं, दोपहर का लंच लेट था, तो अभी भूख नहीं है. कुछ हल्का-फुल्का बना लूंगी. तुमने?" प्रिया ने पूछा.

"मैं बस अभी नीचे जा रहा हूँ, रामजी काका के 'एमबी' से कुछ पैक करवाकर लाऊँगा. तुम कहो तो तुम्हारे लिए भी पैक करवाकर उधर आ जाता हूँ, साथ में खाएंगे और बतियाएंगे," आकाश ने कहा.

"नहीं, मुझे इतनी भूख नहीं है, कुछ बना लूंगी. तुम्हारा ये हफ्ता काम में गुजरा है तो आज तुम भी खाना खाकर आराम करो, इधर आओगे तो बहुत रात हो जाएगी. अच्छा आकाश. गुड नाइट," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा और फोन रख दिया. उस एक छोटी सी बातचीत ने पूरे हफ्ते के सन्नाटे को दोनों के बीच से खदेड़ दिया था.

अगले दिन रविवार की सुबह बेहद अलसाई हुई थी. मुंबई के आसमान में हल्के बादल थे और खिड़की से आती हवा ठंडी थी. प्रिया सुबह आराम से सोकर उठी. उसे किसी काम की कोई जल्दी नहीं थी. उसने इत्मीनान से रसोई में जाकर अपने लिए अदरक वाली कड़क चाय बनाई. ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठकर, चाय की चुस्कियां लेते हुए वह अपने लैपटॉप पर ऑनलाइन अखबार पढ़ने ही लगी थी कि उसके फोन की रिंग बजी.

स्क्रीन पर 'मयंक' का नाम था. प्रिया के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई. उसने तुरंत कॉल रिसीव किया, "हाँ मयंक! आज सुबह-सुबह दीदी की याद कैसे आई?"

"गुड मॉर्निंग दीदी! याद तो रोज़ आती है, पर आज आपके लिए एक बहुत अच्छी खबर है," उधर कोटा से मयंक की उत्साह भरी आवाज़ गूँजी.

"अच्छा! क्या खबर है? तेरे एमबीए के एग्जाम्स खत्म हो गए?" प्रिया ने उत्सुकता से पूछा.

"हाँ दीदी! कल शाम ही फाइनल सेमेस्टर का आखिरी पेपर खत्म हुआ है. अब बस रिज़ल्ट और प्लेसमेंट का इंतज़ार है. बीच में तीन-चार हफ्ते का गैप है. मैं सोच रहा हूँ मुंबई घूमने आ जाऊँ? तुम्हारे पास रुकूंगा, मुंबई भी देख लूंगा और तुमसे मिले भी कितने दिन हो गए हैं!" मयंक ने अपनी पूरी योजना एक सांस में कह डाली.

प्रिया की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह इस महानगर में परिवार से महीनों से दूर थी. ऐसे में भाई का आना किसी उसके लिए उत्सव जैसा था. "यह तो बहुत बढ़िया आइडिया है मयंक! कब आना चाहते हो? बताओ. मैं तुम्हारा रिजर्वेशन करवा देती हूँ. तुम आ जाओ. यहाँ हम दोनों खूब घूमेंगे."

"दीदी, सच बताऊँ, आना तो मम्मी भी चाहती हैं. उनका बहुत मन है तुम्हारे पास आने का," मयंक का लहजा थोड़ा धीमा हुआ. "लेकिन अगर मम्मी भी आ जाएंगी, तो पापा घर पर बिल्कुल अकेले रह जाएंगे. पापा का तो तुम्हें पता ही है, गुस्सा भले ही ठंडा पड़ गया हो, पर अपनी ज़िद पर अभी भी अड़े हैं. इसलिए मम्मी ने कहा है कि ‘अभी तुम्हारी छुट्टियाँ हैं तुम हो आओ, फिर जब मैं वापस लौटूंगा, तब मम्मी और पापा दोनों एक साथ कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास मुंबई आएंगे."

मयंक की बात सुनकर प्रिया की आँखें थोड़ी नम हो गईं. पापा का सीधे फोन न करना, लेकिन मम्मी के ज़रिए मुंबई आने की इच्छा जताना—यह दिखा रहा था कि समय के साथ दूरियों की बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही है. देहरी लांघने का जो मलाल था, वह अब धीरे-धीरे स्वीकार्यता में बदलता जा रहा था.

"कोई बात नहीं मयंक. मम्मी-पापा को बाद में ले आना, अभी तुम आ जाओ. आने का दिन बताओ. मैं अभी टिकट बुक करवाती हूँ," प्रिया ने अपनी आवाज़ को सँभालते हुए कहा.

"ठीक है दीदी, मैं सोच रहा हूँ कि गुरुवार को यहाँ से रवाना होकर शुक्रवार पहुँच जाऊँ. उस दिन तुम ऑफिस जाना, मैं दिन भर आराम करूंगा. तुम शाम को लौटोगी तब मुंबई घूमने का प्लान बनाएंगे. हमें पूरे दो रोज लगातार घूमने को मिल जाएंगे," मयंक ने चहकते हुए कहा.

“ठीक है मयंक, मैं अभी टिकट बुक करवाकर तुम्हें मेल करती हूँ.” प्रिया ने फोन रख दिया और टिकट बुक करवाने के लिए लैपटॉप स्टार्ट करने का बटन दबा दिया.

प्रिया ने खिड़की से बाहर देखा. सुबह अब और खूबसूरत लगने लगी थी. एक तरफ आकाश के साथ बढ़ती हुई यह अनकही सहजता और दूसरी तरफ भाई का आगमन और माता-पिता के आने की सुगबुगाहट—जिंदगी में परिवार फिर से नजदीक लौट रहा था.
... क्रमशः

मंगलवार, 9 जून 2026

आत्मसंघर्ष

देहरी के पार, कड़ी - 63
ऑफिस से लौटकर प्रिया ने अपना पर्स मेज पर रखा, कपड़े बदले और बिस्तर पर ढेर हो गई. आज दिनभर बिना विश्राम के काम करना पड़ा था. लंच भी दस मिनट में अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही करना पड़ा. प्रोजेक्ट की डेडलाइन नजदीक थी, और उससे पहले के बहुत से छोटे-छोटे काम कतार में खड़े थे. लगातार कुर्सी पर बैठे रहने की एवज में शरीर को थकान और अकड़न दोनों बेमोल मिले थे. उसे भूख भी लगी थी लेकिन थकान उसे कुछ सोचने नहीं दे रही थी, खाना बनाए या ऑर्डर कर दे. उसने फैसला करने के पहले कुछ देर आराम करना उचित समझा. लेकिन कमबख्त दिमाग कब विराम लेता है?

कल शाम प्रशांत बाबू का अचानक उसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव देना, उसके लिए पूरी तरह अप्रत्याशित था. उनका यह कहना और भी विचित्र था कि पार्टी के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी ने खुद इसकी सिफारिश की है. मुंबई आने के बाद रामजी काका और प्रशांत बाबू से परिचय के बाद उनके साथियों की मदद से उसके मंगेतर विक्रांत के गिरफ्तार होने पर प्रिया का उससे पीछा छूटा था. बाद में उसे पता लगा था कि सभी मददगार साथी किसी न किसी ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता थे. प्रशांत बाबू खुद आईटी और टेक्निकल एम्पलॉइज की अखिल भारतीय एसोसिएशन के सेक्रेटरी थे. आईटी कर्मचारी होने के कारण वह और उसके तीन साथी भी इस एसोसिएशन के सदस्य बन गए थे. उन्हीं दिनों ईसीआई फैक्ट्री में आंदोलन शुरू हुआ तो उसने उसमें मदद करना अपना दायित्व समझा था. आंदोलन में अपनी भूमिका के कारण यह तो अपेक्षित था कि उसे अपनी यूनियन में कोई बड़ी जिम्मेदारी ऑफर की जाती, लेकिन पार्टी मेंबर बनने के प्रस्ताव की उसे बिलकुल अपेक्षा नहीं थी.


मजदूर वर्ग की वेनगार्ड पार्टी, एक कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता के बारे में उसकी जानकारी महज किताबी थी. जिस साल उसे सीनियर सेकेंडरी की परीक्षा देनी थी उसी साल वह ऋचा और उसकी दीदी के साथ दशहरा मेला घूमने गई थी. वहीं उन्होंने सोवियत पुस्तक प्रदर्शनी देखी. ऋचा की दीदी ने वहाँ से विश्व क्लासिक्स में से एक मैक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ खरीदा. उसे खुद भी कहानी उपन्यास पढ़ने का शौक था. उसने भी वह उपन्यास खरीद लिया. अगले शनिवार की रात सोने के पहले उसने वह उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो उसकी नींद काफूर हो गई. उपन्यास खत्म होने पर उसने घड़ी देखी तो रात के ढाई बजे थे. उस उपन्यास ने उसे इतना प्रभावित किया कि रविवार को जब पूरा परिवार मेला घूमने गया तो उसने गोर्की के जीवन के आरंभिक जीवन की कहानी कहने वाली तीन किताबें और एक कहानी संग्रह और खरीद लिया. जब बिल बनवाने के लिए उसने काउंटर पर किताबें रखीं तो अधेड़ सेल्समैन ने सिर उठाकर उसे देखा. “अभी दो-तीन दिन पहले आपने गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ खरीदा था न?” सेल्समैन ने पूछा.

“हाँ, खरीदा था.”

“आपको पसंद आया?”

“हाँ, मैं उसे एक बैठक में भी पढ़ गई थी. इसीलिए अब उसकी और पुस्तकें खरीद रही हूँ.”

सेल्समैन ने बिल बनाया, उसने मूल्य चुकाया. वह किताबों का बैग उठाकर चलने लगी तो सेल्समैन ने कहा, “रुकिए मैम, आप यह किताब मेरी ओर से ले जाइए.” उसने किताब ली और उसे देखा तो वह ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ का हिन्दी अनुवाद था. उसने उसे अपने बैग में रख लिया. उसने गोर्की की चारों किताबें जल्दी ही पढ़ लीं. सभी किताबों ने उसे बहुत कुछ सिखाया. उसने ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ भी पढ़ा, पर उसमें उसे अधिक कुछ समझ नहीं आया. सीनियर के साथ ही उसने प्री-इंजीनियरिंग टेस्ट भी दिया था, वह पहले ही प्रयत्न में चुनी गई और उसे कोटा के इंजीनियरिंग कॉलेज में कंप्यूटर साइंस एण्ड एप्लिकेशन ब्रांच मिल गई. अगले वर्ष मेले से उसने एक और प्रसिद्ध सोवियत उपन्यास ‘How the Steel Was Tempered’ का अनुवाद ‘अग्नि दीक्षा’ खरीदा. यह उसके लेखक निकोलोई आस्त्रोवस्की के खुद के जीवन पर आधारित था. इसके प्रकाशित होने के बाद उसके अनेक साथियों ने लिखा था कि उसने उपन्यास में अपने कारनामों को बहुत कम करके लिखा था.

इन दोनों पुस्तकों से उसे एक कम्युनिस्ट पार्टी क्या हो सकती है इसका अनुमान हुआ था. इन उपन्यासों के नायक पावेल व्लासोव और पावेल कोर्चागिन दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के आदर्श पात्र थे. उसके बाद भी उसने कुछ पुस्तकों में आदर्श कम्युनिस्ट चरित्रों को पढ़ा था. वे सभी उसे पसंद भी थे. वह उन जैसा बनने की सोचती भी थी. लेकिन जब कल उसे यह प्रस्ताव मिला तो उसे लगा कि उसके पास एक पार्टी मेंबर होने लायक न तो पर्याप्त योग्यता है और न ही फिलहाल उसमें इतना साहस है कि वह अपने जीवन में हमेशा मजदूर वर्ग के हितों को प्राथमिकता दे सके. नहीं, अभी वह मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी की मेंबर बनने लायक नहीं है. उसके अंदर बहुत कमजोरियाँ हैं. वह कोशिश करेगी कि ये कमजोरियाँ दूर हों. लेकिन क्या वह इन्हें दूर कर सकेगी? वह इसी प्रश्न से जूझ रही थी.

उसे बिस्तर पर पड़े सोचते हुए बहुत देर हो गई थी. उसने अपनी आँखें खोलीं, घड़ी देखी, वह सवा नौ बजा रही थी. वह उठ बैठी. अब उसे भूख सता रही थी. खाने के लिए कुछ बनाने का मन नहीं था. उसने फोन उठाया और ऑनलाइन खाना ऑर्डर कर दिया.

अगले शनिवार शाम जब वह यूनियन लाइब्रेरी की पुस्तकें लौटाने और कुछ नई लेने यूनियन ऑफिस पहुँची तो प्रशांत बाबू से भेंट हो गई. ट्रिबुनल में ईसीआई के मुकदमे में स्टेटमेंट ऑफ क्लेम तैयार करने के सिलसिले में वे सुबह ही चव्हाण साहब के चैम्बर गए थे. उनके जूनियर ने प्रारंभिक ड्राफ्ट बना दिया था, वे एक बार जाँच भी चुके थे. उन्होंने यह ड्राफ्ट यूनियन सचिव शिंदे और प्रशांत बाबू को भी पढ़वा दिया था. शिंदे ने कुछ नए तथ्य और चव्हाण साहब को बताए थे. जिनमें से कुछ को क्लेम में सम्मिलित करने के लिए उन्होंने अपने जूनियर को निर्देश दे दिया था. वे कह रहे थे कि यदि कुलकर्णी जी का लंबा अनुभव है, यदि वे भी इसे एक बार देख लें तो बेहतर है. उनका कहना था कि 16 जून को हर हालत में स्टेटमेंट ऑफ क्लेम ट्रिबुनल में पेश करवा देंगे जिससे प्रबंधन समय न ले सके. शिंदे को हस्ताक्षर करने और पेश करने के लिए ट्रिब्यूनल जाना होगा. प्रशांत बाबू ने बताया कि चव्हाण साहब तुम्हें भी याद करते हे कह रहे थे, “हमारी टेम्परेरी जूनियर प्रिया कैसी है?”

अंत में प्रशांत बाबू ने उससे पूछ ही लिया, “प्रिया, तुमने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या फैसला लिया?”

“नहीं सर, मैं अभी खुद को उस लायक नहीं समझती. मुझमें बहुत कमजोरियाँ हैं. मुझे उन पर काबू पाना होगा. क्या पता उसमें कितना समय लगेगा? यह भी पता नहीं कि मैं उन कमजोरियों पर कभी काबू भी कर पाऊंगी या नहीं?”

“कोई बात नहीं, तुम सोच लो. वैसे कमजोरियाँ किस में नहीं होतीं? तुम उन कमजोरियों से लड़ना चाहती हो, उन्हें दूर करना चाहती हो, इससे बेहतर क्या हो सकता है. यदि तुम उनसे निरंतर लड़ना चाहती हो तो तुम एक कम्युनिस्ट हो, तुम्हें पार्टी सदस्य बन जाना चाहिए.”

“आपकी बात सही हो सकती है. लेकिन मैं अपने बारे में अच्छी तरह जानती हूँ. मैं मेंबर बनने के लिए अपनी कमजोरियों से लड़ना चाहती हूँ, यदि मैंने मेंबरशिप ले ली तो हो सकता है मेरा अपना यह संघर्ष रुक जाए. मुझे सोचने के लिए अभी समय चाहिए. अभी रहने दें.” उसने कहा.

“ठीक है प्रिया, कोई बात नहीं. हम इस पर विस्तार से बात करेंगे. मैं किसी शाम तुमसे तुम्हारे घर मिलता हूँ.” प्रशांत बाबू ने कहा.

उसने लाइब्रेरी से नई किताबें लीं और लौट आई.
... क्रमशः

बुधवार, 3 जून 2026

प्रस्ताव

देहरी के पार, कड़ी - 62

सुबह नींद टूटी तो कमरे में धूप प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया की निगाह सामने दीवार पर टंगी डिजिटल घड़ी की ओर गई. वह समय : साढ़े सात, दिन : रविवार 2 जून 2019 दिखा रही थी. उसे आज कहीं नहीं जाना था. आज वह खूब सोई थी, लगभग सात घंटे. उसने रसोई में जाकर दो गिलास पानी पिया और चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ाकर ब्रश करने लगी. आज उसे कहीं नहीं जाना था, कोई अपॉइंटमेंट नहीं था. आधे घंटे बाद सफाई वाली मेड आ जाएगी. आज उसे रोककर डस्टिंग करवाएगी. कपड़े न जाने कितने बिना धुले हो रहे होंगे? चाय पीने के बाद उन्हें छाँटकर धोने के लिए मशीन में डाल देगी. सब कामों से निपटने के बाद खाना बनाकर खाएगी और दिन में कम से कम दो घंटे जरूर सोएगी. फिर उठकर चाय पीएगी और शाम को कोई किताब पढ़ेगी.

पर सोचा हुआ कब होता है? मेड के जाने के बाद उसने स्नान किया. कुकर में दाल और चावल दोनों पकने के लिए छोड़ दिए. तभी फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे, “तुमसे तुम्हारे घर आकर मिलना है, कब आ सकता हूँ?”

“सर, कभी भी. आज दिनभर घर पर ही हूँ.”

“शाम सात बजे ठीक रहेगा?”

“हाँ, क्यों नहीं. पर सर, कुछ खास काम है?’

“नहीं, कुछ खास नहीं. पर तुमसे बातें करनी हैं. हम जब भी मिलते हैं हमेशा काम की बातें होती हैं, मैं तुमसे जो बातें करना चाहता हूँ वे रह जाती हैं. आज यूनियन ऑफिस से शाम छह बजे तक फ़ारिग हो लूंगा. फिर आता हूँ तुम्हारे यहाँ”

“सर, मैं इंतज़ार करूंगी.”

कॉल कट जाने के बाद वह सोचने लगी. आखिर क्या बात हो सकती है. प्रशांत बाबू आखिर उससे क्या बातें करना चाहते हैं? सवाल तो दिमाग में आते हैं यह दिमाग का उसूल है. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. फिर उसने इस पर सोचना बंद कर दिया और वाशरूम में वाशिंग मशीन संभालने चल दी.

खाने में दाल-चावल थे. उसने सलाद तैयार कर लिया था, अचार का मर्तबान भी उतारकर टेबल पर रख लिया और खाना खाने बैठी. अचानक उसे आकाश की याद आई. कल का पूरा दिन वह साथ था. उसके जाने के बाद वह उसके साथ अपने संबंध और आपसी व्यवहार के बारे में सोचती रही थी. पता नहीं आकाश ने उसके बारे में क्या सोचा होगा? उसकी इच्छा हुई कि वह आकाश को कॉल लगाकर बात करे. फिर रुक गई. अक्सर वही आकाश को पूछती रही है. इस बार आकाश को ही फोन करने दो.

शाम सवा सात बजे करीब प्रशांत बाबू प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया. एक ट्रे में पानी से भरे दो गिलास और ठंडे पानी की एक बोतल टेबल पर लाकर रखी और पूछा, “सर चाय या कॉफी कुछ बनाऊँ?”

“चलो बिना चीनी के ब्लैक कॉफी बना लो.”  प्रशांत बाबू ने कहा तो वह कॉफी बना लाई, साथ ही बिस्कुट भी ले आई.”

“प्रिया, तुम्हारी नौकरी कैसी चल रही है?” प्रशांत बाबू ने ही बात आरंभ की.

“ठीक है सर, कोई व्यवधान नहीं है. मैं हमेशा अपना काम समय से पूरा करती हूँ, तब भी जब मुझे बीच में किसी काम से अवकाश लेना पड़ता है. फिर देसाई साहब मैनेजर हैं तो कोई समस्या नहीं है.”

“फिर ठीक है. इस बीच तुमने ईसीआई  के आंदोलन में बहुत मदद की. उसके लिए अदालत तक जाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाई. मैं जानना चाहता था कि उससे तुम्हारी नौकरी में कोई परेशानी तो नहीं हुई.”

“नहीं सर, आप उसकी चिंता न करें. जब मैंने घर छोड़ा, माता-पिता और भाई से किसी तरह की मदद की कोई आशा भी उसी के साथ छोड़ दी थी. मैं जानती हूँ कि अपना जीवन मुझे ही चलाना है. यह नौकरी मुझे आत्मनिर्भर बनाती है, और यह आत्मनिर्भरता मुझे एक स्वतंत्र व्यक्ति बनाती है. मैं स्वतंत्रता का मूल्य जानती हूँ. मैं इसे खोने जैसा कोई काम जानबूझकर तो नहीं करूंगी.”

“तुम बहुत समझदार हो, प्रिया. फिर भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम खुद को नुकसान न पहुँचा लो.” प्रशांत बाबू ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा.

“नहीं सर ऐसा नहीं होगा. यदि कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो उससे पहले आपको पता लग जाएगा.”

“तुमने इस बीच यूनियन लाइब्रेरी से लाकर बहुत किताबें पढ़ी हैं, उनके बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?”

“सभी किताबें अच्छी हैं. बहुत कुछ सिखाती हैं. बस उन्हें समझने के लिए अक्सर कई बार पढ़ना पड़ता है. कुछ के बारे में ऐसा लगता है कि वे मेरे पास होनी चाहिए. मैंने ऐसी कुछ किताबें ऑनलाइन खरीद लीं है”

“हाँ, उनमें से अनेक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, मेरे पास भी बहुत किताबें हैं. वैसे इनमें से तुम्हें सबसे अधिक किस किताब ने प्रभावित किया?”

“मुझे ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति”  ने बहुत कुछ सिखाया. मैं समझ पाई कि कैसे मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद उसके परिवार का विकास हुआ है. असल में मार्क्सवाद के एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत को समझने के लिए यह सबसे बेहतरीन प्रारंभिक पुस्तक है. उसे पढ़ने के बाद मैंने एल.एच.मोर्गन की किताब “प्राचीन समाज” मंगा ली है, उसे पढ़ रही हूँ. मुझे इस किताब से समझ आया कि मनुष्य समाज लगातार विकसित हुआ है और उसका विकास जारी है. उसी से निजी संपत्ति की उत्पत्ति और उसके कारण समाज में वर्गों की उत्पत्ति समझ सकी. यह भी जाना कि वर्ग-संघर्ष ने समाज को कैसे उत्तरोत्तर उन्नत समाज व्यवस्थाओं तक पहुँचाया है.”

“तुमने ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ भी तो पढ़ी हैं.?”

“पढ़े हैं सर, घोषणापत्र तो मैंने पहले भी पढ़ा था, पर तब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. उनसे ही समझ आया कि मजदूर वर्ग की मुक्ति तमाम अन्य शोषित वर्गों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है. इस तरह मजदूर वर्ग को खुद अपनी मुक्ति के लिए तमाम वर्गों को मुक्त करना होगा. इस प्रक्रिया में वह मनुष्य समाज के वर्गों को समाप्त कर सकता है. तर्क के स्तर पर यह प्रस्थापना पूरी तरह उचित लगती है. उसी से मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी का महत्व समझ आता है.”

“यह अच्छी बात है कि तुम मजदूर वर्ग की पार्टी का महत्व समझा है.”

प्रशांत बाबू ने कॉफी का कप उठाया, लेकिन उसकी कॉफी समाप्त हो चुकी थी. प्रिया देखकर मुस्कुराई, “सर, एक कॉफी बनाऊँ.”

“नहीं उसकी जरूरत नहीं. खाने का समय हो रहा है, फिर भूख मर जाएगी.” प्रशांत बाबू ने मना किया और अपनी बात जारी रखी. “प्रिया, असल में मैं एक महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ. जब से ईसीआई के मजदूरों का आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से तुम उसमें शामिल रही हो और आंदोलन के महत्वपूर्ण काम किए हैं. कॉमरेड कुलकर्णी हमारी पार्टी के राज्य सचिव हैं उन्होंने तुम्हें परखा है. उनका कहना है कि मैं तुम्हें हमारी पार्टी की मेंबर बनने का प्रस्ताव दूँ.”

सुनकर प्रिया स्तब्ध रह गई और सोच में पड़ी बहुत देर तक प्रशांत बाबू के चेहरे की ओर देर तक देखती रही.

“सर मैं जानती हूँ कि मजदूर वर्ग की पार्टी के सदस्य होने का अर्थ क्या होता है. उसे मजदूर वर्ग के हितों को सर्वोपरि रखने की शपथ लेनी होती है और उस पर खरा उतरना होता है. उसका जीवन पूरी तरह मजदूर वर्ग को समर्पित होता है, उसे हमेशा बलिदान के लिए तैयार रहना होता है. मैं समझती हूँ कि वह आसान नहीं है. मैं उसके लिए अभी खुद को उसके लिए तैयार नहीं पाती. सर उसके लिए मुझे सोचना पड़ेगा.” प्रिया ने उन्हें बहुत स्पष्ट उत्तर दिया.

“तुम्हारा कहना बिलकुल सही है. हर व्यक्ति को जिसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिले उसे सोच समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए. मुझे कॉमरेड कुलकर्णी ने जिम्मेदारी दी थी. उसका एक हिस्सा मैंने पूरा कर दिया है. मैं आगे भी कोशिश करता रहूँगा.” यह कहते हुए प्रशांत बाबू मुस्कुराए.

प्रिया हँस पड़ी. “सर, आप कोशिश करते रहिए. मैं भी लायक बनने की कोशिश करती रहूँगी.”

“प्रिया, साढ़े आठ बज रहे हैं. खाने का क्या करोगी?” प्रशांत बाबू ने पूछा.

“बस अब बनाऊंगी. वैसे भी मैं ऑफिस से लौटते हुए यही समय हो जाता है. मेरे लिए नॉर्मल है.”

“मैं रोज की तरह अपना डिनर ‘एमबी’ में करूंगा. तुम भी साथ चलो. मेरे पास आज कार है. तुम्हें वापस छोड़ दूंगा. इस बीच कुछ बातें और हो जाएंगी.”

“ठीक है सर, आप रुकिए. मैं कपड़े चेंज करके आती हूँ.” प्रिया कह कर अंदर अपने कमरे में चली गई.

आधे घंटे बाद दोनों ‘एमबी’ में डिनर कर रहे थे. खाते हुए भी प्रशांत बाबू अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे. और प्रिया गंभीरता से उन्हें सुन रही थी.

... क्रमशः

सोमवार, 1 जून 2026

आकाश

देहरी के पार, कड़ी - 61
टैक्सी पवई की ओर आगे बढ़ी. प्रिया पीछे छूट गई. लेकिन आकाश की आँखों में फोर्ट एरिया की गोथिक इमारतों की छाँव से लेकर गेटवे ऑफ इंडिया पर आती समंदर की हवाओं तक, प्रिया के साथ बिताया गया आज का एक-एक पल किसी चलचित्र की तरह गतिशील था. उसने टैक्सी से बाहर की ओर देखा, वहाँ तमाम रोशनियाँ पीछे प्रिया की ओर दौड़ी जा रही हैं. कुछ ही देर में टैक्सी उसकी सोसायटी के गेट पर खड़ी थी. उसने टैक्सी को भाड़ा देकर विदा किया.

फ्लैट का दरवाज़ा खोला, तो वहाँ उसका स्वागत करने के लिए सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं था… दो सप्ताह पहले एक सुबह सूर्योदय के ठीक पहले बोरिवली स्टेशन पर उतरने के पहले तक वह सोच रहा था कि इस विशाल महानगर की दौड़ती हुई अजनबी भीड़ में वह तैरने के लिए अकेला होगा. लेकिन कुछ क्षण बाद प्लेटफॉर्म पर उतरते ही प्रिया का अपने किसी अजीज की तरह उसका स्वागत करना, जबरन उसे अपने फ्लैट ले जाना, वहाँ पहुंचते ही अपने हाथों चाय बनाकर देना. दैनिक प्रातःकालीन कर्मों से निवृत्त होने के बाद अपने हाथों पोहा और चाय बनाकर उसे देना, दोपहर एमबी ले जाकर लंच करना और फिर अपने परिचित ड्राइवर के आटो में बिठाकर कंपनी के गेस्ट हाउस भेजना. इन सबने उसे स्नेहसिक्त कर दिया था. उसके बाद इस नए फ्लैट का अंतिम चुनाव उसी ने किया. उसने जूते उतारे, कपड़े बदले और बालकनी में आकर खड़ा हो गया. सामने पवई झील का शांत पानी में लहरें बहुत हल्की उठ रही थीं. दूर हीरानंदानी की गगनचुंबी इमारतें रात के अंधेरे में जगमगा रही थीं. बदन में दिनभर की दौड़-भाग की वजह से अच्छी-खासी थकान थी, लेकिन आँखों से नींद कोसों दूर थी.

उसने रेलिंग पर हाथ टिकाए हुए गहरी साँस ली. आज वह खुद को बहुत अलग और अजीब-सी कशमकश में पा रहा था।

अपने घर से काम कर रही प्रिया एक बहुत ही शांत, गंभीर और अपने काम से काम रखने वाली कलीग थी. फिर अचानक उसे मुख्यालय के आदेश से उसे प्रिया के घर जाकर उसे आवंटित लैपटॉप लेने जाना पड़ा. उसके बाद उसकी सहेली ऋचा के फ्लैट पर पहली बार वह प्रिया से प्रत्यक्ष हुआ. तब उसकी आँखों में उसने बेबसी और छटपटाहट के साथ कुछ कर गुजरने का संकल्प भी देखा था. कोटा से जयपुर तक की चार घंटे की वह कार यात्रा आकाश को आज भी हूबहू याद थी, जहाँ प्रिया बाहरी दुनिया से बेखबर, चुपचाप अपने तमाम अहसासों को दबाए खिड़की से बाहर देखती रही थी, एकदम गुमसुम. वह उसकी खामोशी तोड़ने को उससे कुछ न कुछ कहता रहा. लेकिन वह केवल हाँ- हूँ करके जवाब देती रही.

जयपुर में तीन दिन दो रात वह उसके घर रही. तब उसे लगा था कि प्रिया मुसीबत में फंसी लड़की है जिसे सुरक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है और वह उसकी 'मदद' कर रहा है. उसका मंगेतर विक्रांत उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा भी, लेकिन पापा की सूझबूझ से उसे गिरफ्तार होना पड़ा. उसी दिन कंपनी ने उसकी पोस्टिंग मुख्यालय मुंबई में कर दी और अगली सुबह ही वह फ्लाइट लेकर मुंबई चली आई. इस बीच उसके अवचेतन में कहीं न कहीं प्रिया के रक्षक वाली भूमिका बनी रही.

"लेकिन आज..." आकाश ने बुदबुदाते हुए अपना सिर झटका.

यहाँ मुंबई में प्रिया का रूप कुछ और ही था. वह बिंदास तरीके से उसे लेने बोरिवली स्टेशन पहुँची और उसे अपने फ्लैट ले गई. चार घंटों में वहाँ उसने प्रिया का एक और रूप देखा. एक गृहस्थिन की तरह उसकी मेहमाननवाजी का, ‘एमबी’ में रामजी काका और फिर ऑटो ड्राइवर बब्बन के चरित्र, वे उसके क्या थे? मित्र, साथी या शुभचिंतक? वह उनके उस संबंध को अभी तक नहीं समझ सकता था. और आज, फोर्ट एरिया में उसने प्रिया का एक और बिल्कुल अलग और विराट रूप देखा. कंप्यूटर स्क्रीन पर मज़दूरों के शोषण के आंकड़ों को एक वैज्ञानिक हथियार में बदल देना, एडवोकेट रमेश चव्हाण जैसी कड़क और नामचीन शख्सियत से पूरी तार्किकता और आत्मविश्वास के साथ बात करना. वह लड़की जो कुछ महीने पहले अपने घर की देहरी लांघने के बाद सहमी हुई थी, आज मुंबई के इस ऐतिहासिक विधिक हलके में बड़े-बड़े दिग्गजों को प्रभावित कर रही थी.

कैफे मिलिट्री की दोपहर आकाश की आँखों के सामने तैर गई. चाय की चुस्कियों के बीच अचानक उसके मुंह से निकल गया था—‘एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं.’

आकाश ने बालकनी की दीवार पर हल्का सा मुक्का मारा. उसने खुद से सवाल किया कि आखिर उसके भीतर यह डर क्यों आया था? आया भी था तो उसने उसे उसके सामने अभिव्यक्त क्यों कर दिया था? तब उसका पुरुष वादी अहंकार कहाँ जा छिपा था. क्या वह प्रिया की इस बढ़ी हुई शख्सियत और उसकी अद्भुत प्रतिभा से सहम गया था? या फिर यह डर उस सम्मान से उपजा था जो उसके दिल में प्रिया के लिए पल-पल गहरा होता जा रहा था? क्या वह एक सच्चे इंसान का विस्मय था जो अपनी कलीग की इस ऊँचाई देखकर पैदा हुआ था?

उसे पलटकर दिया गया प्रिया का जवाब याद आया, जिसने उसके सारे संशयों को शांत कर दिया था—‘हम जीवनयात्रा में कहीं भी अपने आप को असहाय पा सकते हैं... वैसे, क्या हम एक दूसरे को सहारा नहीं दे सकते? हम कोई प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?’

आकाश ने सोचा कि प्रिया के इन शब्दों का असल अर्थ क्या था? उसने उसकी बात को, उस डर को किस रूप में लिया था. क्या वह एक मित्र की सांत्वना मात्र थी, या उसके अंतर्मन में भी अब आकाश को लेकर कोई नया अंकुर पनप रहा था? क्या प्रिया ने इसे भविष्य के किसी बंधन या विवाह के संकेत के रूप में तो नहीं देख लिया है?

विचारों का यह ताना-बाना उसे और गहरे ले गया. वह जानता था कि उसके मम्मी-पापा और छोटी बहन तान्या प्रिया को उन दो रातों से ही चाहने लगे थे. उसके मुंबई चले आने के बाद,माँ ने बार-बार उसकी सादगी और उसकी हिम्मत की सराहना की थी. लेकिन क्या प्रिया जैसी आज़ाद, स्वाभिमानी और बौद्धिक रूप से समृद्ध लड़की उसके सीधे-साधे, पारंपरिक परिवार के माहौल में पूरी तरह सहज होने के लिए स्वयं को तैयार कर पाएगी? और सबसे बड़ा और कड़वा सवाल—विक्रांत के उस कुरूप और थोपे गए रिश्ते के अनुभव के बाद, क्या प्रिया इतनी जल्दी किसी भी पुरुष पर दोबारा पूरा और अटूट भरोसा करने को तैयार होगी?

आकाश ने टेबल पर रखे फोन को देखा. मन हुआ कि अभी प्रिया को कॉल करे और पूछ ले कि वह सोई या नहीं. लेकिन उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया. वह जानता था कि प्रिया कोई साधारण लड़की नहीं है. उसे किसी भावुकता, जल्दबाजी या सतरंगी वादों से प्रभावित नहीं किया जा सकता. उसे समय चाहिए, और सबसे बढ़कर उसे एक ऐसा साथी चाहिए जो उसकी आत्मनिर्भरता की देहरी का सम्मान करे, न कि उसे विवाह के पवित्र बंधन के नाम पर किसी नए दायरे में बांधना चाहे.

घड़ी की घंटे की सुई बारह के अंक को पार कर चुकी थी. अचानक आकाश के चेहरे पर एक शांत और गंभीर मुस्कान छा गई. उसके मन का बवंडर अब थमने लगा था. उसने मन ही मन एक बेहद परिपक्व निर्णय लिया. वह प्रिया पर किसी भी बात का दबाव नहीं बनाएगा. वह उसकी राह का प्रतियोगी नहीं, बल्कि उसकी हर कठिनाई में उसका सबसे मजबूत सहारा बनने की कोशिश करेगा.

उसने बालकनी का दरवाज़ा बंद किया, कमरे की बत्ती बुझाई और बिस्तर पर लेट गया. पवई झील के पानी से टकराकर आने वाली हवा हल्के से खिड़की के परदों को सहलाए जा रही थी. उसके और प्रिया के बीच कोई वादा नहीं था, कोई इकरार नहीं था, लेकिन इस रात आकाश अपने अंतर्मन के समंदर को पार करने के लिए छलांग लगा चुका था.
... क्रमशः

रविवार, 31 मई 2026

उलझे सवाल

देहरी के पार, कड़ी - 60
टैक्सी हाईवे पर दौड़ी चली जा रही थी. दायीं ओर छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिखाई देने लगा. टैक्सी हाईवे से उतरकर अंधेरी ईस्ट में प्रवेश करने वाली थी. प्रिया ने घड़ी देखी, साढ़े आठ बजे थे. हल्की भूख महसूस होने लगी थी. दिनभर घूमते हुए वह इतनी थक चुकी थी कि फ्लैट पर जाकर खाना बनाना अब उसके बस का नहीं था.

“भूख लगने लगी होगी तुम्हें,” उसने आकाश से पूछा.

“हाँ, क्या तुम्हें भी?”

“हाँ, मुझे भी. तभी तो पूछा है. मन तो कर रहा था कि घर पहुँचकर कुछ हल्का बनाकर खाएँ. लेकिन थकान इतनी है कि नहीं बनेगा.” प्रिया ने कहा.

“तो फिर तुम्हारी सोसायटी के नजदीक किसी रेस्टोरेंट के पास टैक्सी छोड़ते हैं.” वहाँ कुछ खाकर तुम अपने फ्लैट चले जाना और मैं पवई के लिए टैक्सी या ऑटो ले लूंगा.”

“यह ठीक है.” प्रिया ने कहा. तब तक टैक्सी अंधेरी ईस्ट में प्रवेश कर चुकी थी. रास्ता प्रिया ने बताया फिर उसे रुकवाकर दोनों उतर लिए. सामने ही रेस्टोरेंट था, “चपाती”. एकदम सादा और आकर्षक नाम.

दोनों ने अंदर प्रवेश किया. सजावट और पुराने फर्नीचर से रेस्टोरेंट 50-60 साल पुराने जमाने का अहसास दिलाता था. साफ-सफाई में उसे अव्वल कहा जा सकता था. सभी टेबल भरी हुई थीं. वे काउंटर के सामने खड़े रह गए. काउंटर के सामने दो सोफे रखे थे. जिनमें से एक पर तीन लोग बैठे थे, दूसरा खाली था. काउंटर वाले ने कहा, “सर, आप सोफे पर बैठिए. टेबल थोड़ी देर में खाली हो जाएगी.”

तभी प्रिया ने आकाश को कहा, “तुम बैठो मैं अभी आती हूँ.” वह काउंटर से कुछ आगे जाकर दाहिनी और स्थित वाशरुम चली गई.

कुछ देर में टेबलें खाली हुईं. बेयरा उन्हें एक टेबल तक ले गया.

खाना स्वादिष्ट और सुपाच्य था. खाने के बाद बेयरे से बिल मांगा तो उसने बताया कि बिल काउंटर पर ही मिलेगा. दोनों ने काउंटर पर बिल का भुगतान किया. पूछने पर काउंटर वाले ने बताया कि, ‘वे नहीं चाहते कोई हमारे स्टाफ को कोई टिप दे. बिल बहुत वाजिब था, जितने की आकाश ने बिल्कुल अपेक्षा नहीं की थी.

वे ‘चपाती’ से बाहर आए और टैक्सी का इंतजार करने लगे. तब आकाश ने प्रिया से पूछा, “तुम ‘चपाती’ और ‘एमबी’ जैसी अच्छी जगहें कैसे तलाश कर लेती हो?”

प्रिया ने हँस पड़ी. उसने उत्तर दिया, “एक तो लड़की हूँ, दूसरे मजदूरों के साथ रहती हूँ. उन्हें अच्छी और किफायती जगहों का पता रहता है, वे बता देते हैं.” तभी प्रिया की निगाह एक खाली टैक्सी पर पड़ी, उसने आवाज देकर उसे रुकवाया और आकाश को विदा किया.

फ्लैट पहुँचकर प्रिया ने कपड़े बदले और बिस्तर पर ढेर हो गई. थकान बहुत थी. आज उसने और आकाश ने घूमने के चक्कर में अपने शरीरों के साथ अति कर दी थी. बदन दर्द कर रहा था. वह जानती थी कि आज जल्दी नींद नहीं आने वाली. उसे मम्मी-पापा और मयंक की याद आई, उनसे बात किए बहुत दिन हो गए हैं. आज बहुत देर हो गयी. लेकिन वह कल जरूर उनसे बात करेगी. फिर उसके जेहन में आकाश की तस्वीरें उभरने लगीं.

आकाश और प्रिया एक ही टीम का हिस्सा थे. काम के दौरान वे अक्सर कानों पर चढ़े हेडफोनों पर एक-दूसरे की आवाजें सुनते थे. जानते थे कि सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में वह अच्छा है. कामकाजी बातों के सिवा बातचीत का कोई सिलसिला नहीं था. फिर अचानक पापा ने उसकी शादी विक्रांत से तय कर दी, एक पारिवारिक समारोह में दोनों की सगाई हो गयी. वह विक्रांत के संपर्क में आई तो पता लगा कि उसके साथ जीवन नहीं निभाया जा सकता. माँ को बताया, माँ ने पापा को. पापा ने साफ मना कर दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता सगाई तोड़ने पर बदनामी होगी. शादी तो वहीं करनी पड़ेगी. जल्दी में शादी की तारीख तय हो गयी. दो दिन पहले तक वह प्रयत्न करती रही कि किसी तरह रिश्ता खत्म हो जाए, विवाह न हो. पर पापा टस से मस नहीं हुए. उसने घर छोड़ने का निर्णय किया. वह एक बैग में कपड़े लेकर घर से निकल आई. दोस्तों ने उसे सहारा दिया. वह अपनी सहेली ऋचा के घर रही. कंपनी का लैपटॉप घर छूट गया. कंपनी ने जयपुर से आकाश को उसका लैपटॉप लेने भेजा. वह लैपटॉप लाने के बाद ऋचा के यहाँ आया प्रिया की उससे प्रत्यक्ष भेंट हुई. वहाँ तय हुआ कि उसे आकाश के साथ ही कोटा छोड़ देना चाहिए. आकाश उसे अपनी कार से जयपुर अपने घर ले गया. वह होटल में ठहरना चाहती थी लेकिन आकाश के माता-पिता ने उसे होटल में नहीं ठहरने दिया, वह उनके यहाँ रुकी. वहीं उसकी मुलाकात आकाश की छोटी बहन तान्या से हुई. विक्रम ने जयपुर तक उसका पीछा किया और आकाश के घर पहुँच गया. आकाश के पिता की सूझ बूझ से विक्रम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. प्रिया को कंपनी ने मुंबई कार्यालय में काम करने का ऑफर मिला तो वह मुंबई आ गई. अकेले में दोनों का साथ केवल चार घंटे कोटा से जयपुर की कार यात्रा में और चार घंटे प्रिया के फ्लैट में कुल आठ घंटे का साथ था. उसमें वह उसे कितना जान सकती थी. उसने आकाश को फ्लैट तय करने में मदद की. आज अचानक उसने आकाश को अपने साथ घूमने का निमंत्रण दे डाला. दोनों खूब साथ घूमे, लंच और डिनर साथ किए.

जब आकाश ने उसे कहा था कि ‘एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं’ तब उसने पलटकर सवाल किया था कि ‘हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?’

क्या सोचा होगा आकाश ने? कहीं उसने इसे विवाह के प्रस्ताव के रूप में तो नहीं लिया होगा?

दिन का अंत होते-होते आकाश का यह कहना कि, ‘प्रिया, मैं जान गया हूँ कि तुम एक ऐसा व्यक्तित्व बन चुकी हो जो अपने जीवन में जो भी फैसले लेगी, उससे कोई भी उसे डिगा नहीं सकता.’ आखिर आकाश के इस कथन का क्या अर्थ हो सकता है? क्या उसने अपने आपको उसका जीवनसाथी बनने को तैयार होने का मन बनाना शुरु कर दिया है? उसने बहुत सोचा लेकिन बहुत सारे सवालों ने उसे घेर लिया.

‘क्या वह खुद आकाश को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करने को तैयार है?’ यह सवाल उसका खुद से था. उसके पास जवाब था कि वह इतनी जल्दी निर्णय नहीं ले सकती. उसकी आकाश के बारे में जानकारी अभी बहुत उथली है, और उसके परिवार के बारे में भी वह कितना कम जानती है. दो दिन के मेहमान के साथ तो हर कोई अच्छा व्यवहार करता है. मुसीबत में घर आए मेहमान की मदद भी कोई भी कर सकता है. लेकिन यदि वह आकाश की पत्नी होकर उस परिवार में जाए तो उनका व्यवहार क्या होगा? वह नहीं सोच सकती थी. अंत में उसने निर्णय लिया कि वह इस मामले में कोई भी निर्णय धीरज से लेगी. अभी उसे आकाश और उसके परिवार के बारे में बहुत कुछ जानना शेष है.

उसने घड़ी देखी, बारह बजने को थे. ओह! अब सोना होगा. सोचना छोड़ना होगा. वरना नींद नहीं आएगी. उसने उठकर दो घूंट पानी पिया, टॉयलेट होकर आई, कमरे की बत्ती बुझाई. अंधेरा हो गया था. लेकिन अधूरा. खिड़की के पर्दे से छन कर मुंबई की रोशनियों का नैनो अंश भीतर प्रवेश कर रहा था जिससे नींद के बाद अचानक खुली आँखें कमरे में सब कुछ देख सकती थीं.
... क्रमशः

सोमवार, 25 मई 2026

दिलों में पहुँच

 देहरी के पार, कड़ी - 59
आकाश के सवाल के जवाब में प्रिया मुस्कुराकर रह गई. आकाश ने दुबारा पूछा, “किधर ले चलने इरादा है इस नाचीज को आज.”

“बस चलते चलो मेरे साथ. तुम्हें किसी तिलिस्म में नहीं ले जा रही हूँ. बस यह इलाका महानगर मुंबई का दिल है और फिलहाल हम इसके अंदर हैं.” प्रिया ने मुस्कुराते हुए अपने बैग के स्ट्रैप को कंधे पर सँभालते हुए आकाश की ओर देखा. धूप अब तीखी होने लगी थी, इसलिए उसने आकाश का हाथ हल्के से थामते हुए कहा, "प्लान बहुत सिंपल है आकाश. धूप तेज़ है, तो सबसे पहले हम यहाँ के एक बहुत पुराने और ऐतिहासिक पारसी कैफे चलेंगे. वहाँ की कड़क ईरानी चाय और बन-मस्क खाए बिना दक्षिण मुंबई आना अधूरा माना जाता है."

वे दोनों टहलते हुए फोर्ट की एक शांत लेन में स्थित 'कैफे मिलिट्री' के भीतर दाखिल हो गए. कैफे के भीतर कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे वक्त का पहिया अचानक पीछे की ओर घूम गया है. दीवारों पर लगे पुराने शीशे, महोगनी की गोल मेजें, लकड़ी की मुड़ी हुई कुर्सियाँ और छत पर बेहद धीमे घूमते पुराने ज़माने के पंखे—सब मिलकर मुंबई के एक अलग ही दौर की दास्तान बयां कर रहे थे.

प्रिया ने दो ईरानी चाय, बन-मस्क और वेज पफ का ऑर्डर दिया. टेबल पर आते ही बन-मस्क की खुशबू हवा में तैर गई. प्रिया ने चम्मच उठाकर आकाश की चाय में चीनी घोलनी शुरू की, लेकिन आकाश चुपचाप उसे ही देखता रहा. उसके चेहरे पर अभी भी एक अनजानी खामोशी और विचारमग्नता थी.

"क्या बात है आकाश? चैंबर से निकलने के बाद से तुम बहुत शांत रहे हो. ऐसा लग रहा है कि कुछ गंभीर सोच रहे हो?" प्रिया ने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए पूछा.

आकाश ने चाय की एक चुस्की ली और खिड़की से बाहर देखते हुए बेहद संजीदगी से कहा, "प्रिया, सच कहूँ तो आज चव्हाण साहब के चैंबर में जो कुछ हुआ, उसे देखकर मुझे जो अहसास हुआ उससे मैं भीतर तक हिल गया हूँ. अब तक मैं तुम्हें सिर्फ एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर और कंपनी में अपने घर कोटा से काम कर रही अपनी कलीग के रूप में देखता था. लेकिन आज मैंने देखा कि कॉर्पोरेट की इस नौकरी के साथ तुमने मज़दूरों के इतने बड़े आंदोलन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को सहज ही संभाला हुआ है. सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण जैसी हस्ती तुम्हें लॉ ग्रेजुएट बनने की सलाह दे रहे हैं… मुझे एक पल के लिए लगा कि तुम मुझसे बहुत ऊपर निकल चुकी हो. तुम्हारी प्रतिभा की ऊँचाई के सामने मुझे अपनी कॉर्पोरेट के साथ काम करने की योग्यता बहुत बौनी लगने लगी. एक बार तो मैं सोचने लगा कि मैं तुम्हें छू भी पाऊंगा या नहीं."

प्रिया ने आकाश की आँखों में झाँका, वहाँ एक सच्चे मनुष्य का सहज असमंजस और आदर दिखाई दे रहा था. उसने मुस्कुराते हुए कहा, "आकाश, तुम अपनी तुलना मुझसे क्यों कर रहे हो? जयपुर से निकलकर सीधे मुंबई जैसे शहर में आने का साहसिक फैसला करना, एक बिल्कुल नई कंपनी में दो हफ्ते के भीतर अपनी जगह बनाना और अपनी पहचान साबित करना—क्या यह तुम्हारी काबिलीयत नहीं है? हम व्यक्तिगत जीवन में दो अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम प्रतिस्पर्धी हैं. हम दोनों में बहुत कमियाँ हो सकती हैं. हम जीवनयात्रा में कहीं भी अपने आप को असहाय पा सकते हैं. वैसे में क्या हम एक दूसरे को सहारा नहीं दे सकते? हम कोई प्रतियोगी या प्रतिस्पर्धी नहीं हैं. हम एक-दूसरे की कठिनाइयों में एक-दूसरे का साथ देने वाले क्यों नहीं बन सकते?”

प्रिया की इस आत्मीय और परिपक्व बात ने आकाश के मन के सारे संशयों को एक झटके में धो दिया. उसके चेहरे पर एक सहज और निश्चिंत मुस्कान लौट आई.

कैफे से निकलने के बाद वे दोनों 'काला घोड़ा' की तरफ बढ़ गए. सड़क किनारे फुटपाथ पर सजे हुए स्थानीय चित्रकारों के कैनवस देखते हुए वे 'जहाँगीर आर्ट गैलरी' के भीतर चले गए. गैलरी के शांत कमरों में लगी खूबसूरत कलाकृतियों को देखते हुए दोनों की बचपन की यादें ताजा होने लगीं. आकाश ने अपने बचपन में जयपुर में की गई अपनी किसी बेवकूफी वाली घटना सुनाई तो प्रिया ने उत्तर में कोटा की गई अपनी मूर्खता सुना दी. दोनों अपने बचपन की इन मूर्खताओं को याद कर खूब हँसे भी. दोनों ने मुंबई जैसे महानगर में अपने भविष्य को लेकर बहुत सारी बातें कीं. बीच में वे बिना बोले खामोशी से चलते भी रहे. ऐसा लगा जैसे दोनों एक-दूसरे के और करीब आ रहे हैं.

शाम ढलते-ढलते दोनों पैदल ही टहलते हुए 'गेटवे ऑफ इंडिया' के सामने आ पहुँचे. ढलते सूरज की लालिमा के बीच अरब सागर की लहरें ताज होटल की दीवारों से टकरा रही थीं. समंदर से आने वाली ठंडी और ताज़ा हवा ने दोपहर की सारी थकान को चंद लम्हों में सोख लिया. दोनों रेलिंग के सहारे खड़े होकर दूर समंदर के पानी में डोलती नावों को देखने लगे.

प्रिया ने समंदर की लहरों को देखते हुए अचानक थोड़े गंभीर स्वर में कहा, "जानते हो आकाश, चव्हाण साहब जो कह रहे थे, वो बात पूरी तरह गलत भी नहीं थी. इस सांख्यिकीय सर्वे को करते हुए मुझे पहली बार महसूस हुआ कि हमारे आईटी और सॉफ्टवेयर के ज्ञान का इस्तेमाल अगर उन मज़दूरों के जीवन को बदलने में हो जो अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी तरस रहे हैं, तो उससे मिलने वाला सुकून कॉर्पोरेट के किसी बड़े से बड़े इंसेंटिव या बोनस से कहीं बड़ा होगा."

आकाश ने प्रिया की तरफ देखा. उसकी आँखें इस समय समंदर की तरह ही गहरी और किसी बड़े संकल्प से भरी लग रही थीं. आकाश ने आगे बढ़कर पूरी आत्मीयता और हौसले के साथ प्रिया का हाथ थाम लिया और कहा, "प्रिया, मैं जान गया हूँ कि तुम एक ऐसा व्यक्तित्व बन चुकी हो जो अपने जीवन में जो भी फैसले लेगी, उससे कोई भी उसे डिगा नहीं सकता.”

गेटवे ऑफ इंडिया पर शाम की रोशनियाँ एक-एक कर जगमगाने लगी थीं. मुंबई की उस ढलती शाम में, समंदर की लहरों के शोर के बीच, उन दोनों ने एक-दूसरे से कोई वादा नहीं किया, लेकिन उन्होंने एक दूसरे के दिलों में अपनी पहुँच बना ली थी.
... क्रमशः

रविवार, 24 मई 2026

नया चेहरा

 देहरी के पार, कड़ी - 58

शनिवार सुबह सोकर उठने के बाद प्रिया रसोई में अपने लिए चाय बना रही थी कि प्रशांत बाबू का फोन आ गया. उसने फोन उठाया,  “प्रिया, हड़ताल के दिनों के वेतन और फेयर वेजेज का जो औद्योगिक विवाद राज्य सरकार ने इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल को रेफ्रेंस किया था, उसमें यूनियन को मंगलवार 18 जून तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम पेश करना है, इसे तैयार करने के लिए हमारे पास केवल दो सप्ताह हैं. कल कणिका की सांख्यिकीय रिपोर्ट भी मिल गई है. मैं जल्दी से जल्दी चव्हाण साहब से मिलना चाहता हूँ. उन्होंने आज ग्यारह बजे का समय दिया है. वे तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे कि प्रिया कैसी है, मैंने उन्हें कहा है कि हो सका तो वह भी मेरे साथ आएगी. तुम चल रही हो न?”

“चलना तो चाहती हूँ सर, पर आज आकाश से भी मिलना है. खैर मैं आपको आधे घंटे में बताती हूँ.” प्रिया ने इतना कहकर फोन काट दिया. उसने आकाश को फोन लगाया. देर तक घंटी जाने के बाद उधर से आवाज आई, “हेलो, कौन प्रिया? तुम बड़ी जल्दी उठ गई.” ऐसा लगा जैसे घंटी की आवाज सुनकर ही आकाश की नींद टूटी है.

“तो तुम अभी तक सो ही रहे थे?”

“हाँ तो, आज छुट्टी है, आज तो नींद निकालने का ही दिन है.” आकाश ने अलसाई आवाज में कहा.

“तो सुनो, मैं दस बजे फोर्ट के लिए निकल रही हूँ, वहाँ सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण का चैंबर है. उन्होंने ग्यारह बजे का समय दिया है. मैं सोचती हूँ तुम भी साथ चलो. आज हम दक्षिण मुंबई में घूमते हैं. वहीं कहीं लंच करेंगे और शाम तक लौट आएंगे. तुम चलोगे?” प्रिया ने अपने मन का बता दिया.”

“क्या? क्या? आज घूमने चलना है. वह तो सही है.  पर चव्हाण साहब के चैम्बर में मैं क्या करूंगा?”

“कुछ नहीं करना, बस सबसे मिलना और हमारी बातें सुनना. वहाँ आधे घंटे से अधिक नहीं लगेगा.”

“ठीक है, मैं तैयार होता हूँ, तुम मेरे फ्लैट पर आ रही हो या मुझे तुम्हारे फ्लैट पर आना है? आकाश ने पूछा.”

“वैसे तो तुम्हें ही आना चाहिए, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे इधर से पास है, यहाँ से फोर्ट जाना अधिक सही है.”

“ठीक है, मैं ही आता हूँ.” आकाश ने कहा.

“पर दस बजे के पहले पहुँच जाना. हम समय से चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच जाएँ.” प्रिया ने कहा और फोन काट दिया.

उसके बाद उसने प्रशांत बाबू को भी फोन करके बता दिया कि वह और आकाश सीधे चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच रहे हैं. ग्यारह बजने के पहले दोनों सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण के चैम्बर में थे.

चव्हाण साहब ने प्रिया का स्वागत किया और जानना चाहा कि उसके साथ कौन है?

“सर, ये आकाश हैं, मेरी कंपनी में मेरे कलीग थे. मैंने जब अपने घर से पलायन किया, तब इन्होंने मेरी बहुत मदद की. अब तक जयपुर अपने घर से काम कर रहे थे. अब इन्होंने कंपनी स्विच कर ली है और दो सप्ताह पहले मुंबई आ गए हैं. पवई में रह रहे हैं. आज मैं इन्हें साउथ मुंबई घुमाने ले आई.”

“वेलकम आकाश! प्रिया ने तुम्हारे बारे में पहले भी बताया था. उसने क्लोजर वाले केस में मेरी सहायक की भूमिका अदा की थी. यह बहुत प्रतिभाशाली है, यदि यह लॉ में ग्रेजुएशन कर ले तो मैं इसे स्थायी सहायकों में स्थान दे सकता हूँ. तुम्हें जब भी मेरी जरूरत हो, मुझे याद कर सकते हो. बेझिझक मुझसे मिल सकते हो.” चव्हाण साहब ने जो कुछ भी कहा, उससे आकाश असमंजस में आ गया. वह समझ ही नहीं पा रहा था कि, 'आखिर यह लड़की प्रिया है क्या?' जहाँ भी जाती है, अपने लिए जगह बना लेती है. उसने आकाश के दिल में स्थान बना लिया था. पर क्या वह भी उसके दिल में जगह बना सकेगा? यह सवाल मन में लिए ही उसने चव्हाण साहब को नमस्ते किया.

“नमस्ते सर, प्रिया ऐसी ही है. यह दो रात हमारे घर रुकी थी लेकिन आज भी मम्मी-पापा और छोटी बहन इसे याद करते ही रहते हैं.”

तभी प्रशांत बाबू और यूनियन सचिव शिंदे ने चैम्बर में प्रवेश किया. उन्होंने कणिका की तैयार की हुई सांख्यिकीय सर्वे की रिपोर्ट चव्हाण साहब को दी और कहा, “सर, फेयर वेजेज के केस में अठारह जून तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम प्रस्तुत करना है.”

चव्हाण साहब सर्वे रिपोर्ट लेकर उसके पन्ने पलटने लगे. रिपोर्ट के अंत में वे रिजल्ट पर रुके और उसे गंभीरता से पढ़ा. फिर बोले, “रिपोर्ट गंभीर है, 92 फीसदी मज़दूरों का कारखाने के नारकीय माहौल से पूरी तरह टूट जाने और 78 फीसदी का साहूकारों के भयंकर कर्ज़ के जाल में फँसे होने के पुख्ता आंकड़े हमारे इस केस में यह मजबूत साक्ष्य होंगे. बस कणिका को गवाही देने के लिए दो-तीन बार आना पड़ सकता है.”

“वह आ जाएगी सर, कॉमरेड कुलकर्णी जी की भांजी है. बस उसे आने की तारीख सप्ताह भर पहले मिल जाए जिससे वह इसके लिए समय रख सके.”

“ठीक है, पहले इस मामले में जो समझौता वार्ता हुई थी, उसका सारा रिकार्ड और हड़ताल के दौरान जो पत्राचार प्रबंधन, लेबर कमिश्नर, पुलिस, स्थानीय प्रशासन आदि से हुआ था वह सब मुझे चाहिए. लाए हो?”

“नहीं सर, अभी तो नहीं है. पर हम आज ही शाम तक या कल दोपहर तक भिजवा देंगे.”

“आप सोमवार को शाम सात से नौ बजे के बीच भिजवाएँ.” मेरा चैम्बर आज दो बजे के बाद सोमवार को ही खुलेगा. आपका रिकॉर्ड आने के बाद मैं यह सब अपने सहायकों को सौंप दूंगा जिससे वे स्टेटमेंट ऑफ क्लेम तैयार कर सकें.”

मुलाकात यहीं खत्म हो गई. वापस लौटते वक्त चव्हाण साहब ने आकाश को फिर कहा, “आप आते रहिएगा. और यदि प्रिया को लॉ ग्रेजुएट होने के लिए प्रेरित करें तो देश को एक बेहतरीन वकील मिल सकता है.”

सुनकर प्रिया हँस पड़ी. कहने लगी, “सर, आप मजाक अच्छा करते हैं. मैं कानून के सागर में गोता लगाने का कतई इरादा नहीं रखती. मैं सॉफ्टवेयर में अच्छी हूँ. मेरे लिए वही ठीक है.”

“प्रिया यह हँसने की बात नहीं, मैं कोई विनोद नहीं कर रहा. बल्कि सीरियसली कह रहा हूँ. तुम्हारा ये सॉफ्टवेयर और आईटी का अनुभव तुम्हें इस क्षेत्र का श्रेष्ठ वकील बना सकता है. एक बार सोचकर देखना.” चव्हाण साहब ने उसे फिर कहा.

“ठीक है सर, आपका आशीर्वाद बना रहे. आज तो मैं बिलकुल नहीं सोचूंगी. मुझे और आकाश को साउथ मुम्बई घूमना है.” प्रिया ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया. उसकी बात सुनकर चव्हाण साहब भी हँसने लगे.

चैंबर की सीढ़ियों से नीचे उतरते ही की दोपहर की धूप और समुद्री हवा ने आकाश और प्रिया का स्वागत किया. शनिवार की दोपहर होने के कारण फोर्ट की सड़कों पर दफ्तरों की भीड़ नहीं थी. ओल्ड विक्टोरियन गोथिक शैली और आर्ट डेको वास्तुकला की गर्व से खड़ी ऐतिहासिक इमारतें, चौड़ी सड़कें और शांत माहौल अब पूरी तरह उन नजरों के सामने था.

"चलो प्रिया, तुम्हारा आज का काम तो अच्छे से मुकम्मल हो गया," आकाश ने गहरी साँस लेते हुए मुस्कुराकर कहा. "अब बताओ, इस खूबसूरत फोर्ट एरिया को एक्सप्लोर करने का तुम्हारा क्या प्लान है?

प्रिया ने अपने बैग को कंधे पर सँभाला और आकाश की ओर देखकर आत्मीयता से मुस्कुरा दी.

... क्रमशः

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

नेह का धागा

सूरज की तपिश जब झालरापाटन के सात सहेलियों के मंदिर की प्राचीन इमारतों के बारिश में भीगे पत्थरों से टकराती है, तो हवा में एक अजीब सी सोंधी गंध फैल जाती है. नई बन रही एक सरकारी कॉलोनी में 23 साल का सलीम, बन रही दीवार के लिए बनाए गए पेड़े पर खड़ा ईंटों पर सूत बाँध रहा था. वह मनोहरथाना के निकट के एक छोटे से गाँव से यहाँ राजमिस्त्री का काम करने आया था. जबकि नीचे से 19 साल की सपना नीचे बनाए हुए मसाले को तगाती में भरकर उसे ऊपर पकड़ा रही थी.

सपना का परिवार डग कस्बे के पास के गाँव से मजदूरी के लिए यहाँ डेरा डाले हुए था. कोरी परिवार की वह दुबली-पतली लड़की, जिसके हाथों की चूड़ियाँ सीमेंट की धूल से सफेद पड़ी हुई थीं.

"सपना, हाथ थोड़ा बचा के. मसाला तेज़ है, खाल काट देगा," सलीम ने दीवार से झुककर कहा.

सपना ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछा और उसे देखकर मुस्कुरा दी. "तुझे दीवार की पड़ी है, या मेरे हाथों की? जल्दी काम निबटाओ, अभी ठेकेदार आता होगा."

उनके बीच का यह रिश्ता किसी 'डेट' या 'कॉफी' का मोहताज नहीं था. वह दोपहर की तपती धूप में एक ही पेड़ की छाँव में बैठकर आधी-आधी रोटी बाँटने और काम के बीच आँखों ही आँखों में मुस्कुरा लेने से बना था. सलीम ने सपना के लिए शहर के मेले से एक बार हरे कांच की चूड़ियाँ लाकर दी थीं, जिन्हें वह काम के वक्त अपनी ओढ़नी के नीचे छिपाकर रखती थी. दोनों के बीच नेह का एक अदृश्य धागा बनने लगा था, जिसका शायद खुद उन्हें भी अहसास नहीं था. यह धागा उनके बीच किस रिश्ते को आकार देने वाला था यह उन्हें भी पता नहीं था.

लेकिन बन रही सरकारी इमारत की अधबनी दीवारों के भी कान थे.

सलीम का 'मियां' होना और सपना का 'कोरी' होना, पास के चाय के खोखे पर बैठने वाले कुछ 'स्थानीय रक्षकों' की आँखों में खटकने लगा था. उनके लिए यह दो मज़दूरों का साथ काम करना नहीं, बल्कि 'जनसांख्यिकीय हमला' था.

एक दोपहर, जब सलीम और सपना निर्माणाधीन छत के नीचे बैठकर गुड़-रोटी खा रहे थे, तभी तीन-चार मोटर साइकिलें धूल उड़ाती हुई वहाँ रुकीं. अगुआ विक्रम था, जो इलाके में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में अक्सर 'मुद्दों' की तलाश में रहता था.

"ओए मिस्त्री! नीचे उतर!" विक्रम की आवाज़ में नफ़रत का उबाल था.

सलीम घबराकर नीचे आया. "जी भाई साब, क्या हुआ?"

"क्या हुआ? ये लड़की कौन है? इसके साथ बैठ के क्या खिचड़ी पका रहा है?" विक्रम ने पास पड़ी एक ईंट को लात मारकर गिरा दिया.

"ये सपना है भाई साब, हमारे साथ कुली का काम करती है..." सलीम की आवाज़ धीमी पड़ गई.

"नाम पता है हमें! तेरा भी और इसका भी. मनोहरथाना से यहाँ मजदूरी करने आए हो या हमारी लड़कियों को बहलाने?" भीड़ में से एक ने सपना की तरफ इशारा किया, जो सहमी हुई एक कोने में खड़ी थी.

"भाई साब, हम तो गरीब लोग हैं, काम से काम रखते हैं..." सपना ने हिम्मत जुटाकर बोलना चाहा.

"चुप रह! तुझे समझ नहीं आता ये तुझे फँसा रहा है? कल को ये तेरा धरम बदलवा देगा, तब अक्ल आएगी?" विक्रम ने चिल्लाकर पास खड़े एक लड़के से कहा, "फोटो खींच इसकी और डाल ग्रुप पे. लिख दे कि झालावाड़ में भी 'वही' खेल शुरू हो गया है."

शाम होते-होते झालावाड़ जिले के व्हाट्सएप ग्रुपों में एक फोटो वायरल हो गई. फोटो में सलीम और सपना एक साथ बैठे थे, और नीचे कैप्शन था— "जिहाद का नया ठिकाना: मज़दूरी की आड़ में शिकार."

तनाव फैल गया. सपना के पिता को डराया-धमकाया गया. उसे काम पर आने से रोक दिया गया और समाज की 'इज्जत' का वास्ता देकर घर में कैद कर दिया गया. सलीम को ठेकेदार ने उसी रात हिसाब करके भाग जाने को कह दिया— "भाई, मुझे काम करना है, दंगा नहीं करवाना. तू निकल यहाँ से."

अगली सुबह, सलीम अपना झोला उठाकर बस स्टैंड की तरफ जा रहा था. उसके झोले में अब भी वो हरे कांच की चूड़ियाँ थीं जो वह सपना को देने वाला था क्योंकि पुरानी टूट गई थीं. उसने मुड़कर उस अधूरी दीवार को देखा जिसे उसने और सपना ने मिलकर उठाया था.

वह दीवार खड़ी थी, लेकिन वह नहीं जानता था कि उस पर चिपकाया गया 'नफ़रत का पलस्तर' अब न जाने कितने बरस वहाँ से नहीं उखड़ने वाला था.

दो युवाओं की पसंद, उनकी मर्जी और उनके पेट की भूख को एक 'राजनीतिक लेबल' ने कुचल दिया था. सलीम बस में बैठ गया, और सपना अपने घर की कोठरी में बैठी उस सीमेंट की धूल को देख रही थी जो अब उसकी चूड़ियों से उतर चुकी थी, लेकिन उसकी किस्मत पर जम गई थी.

सात सहेलियों के सूर्य मंदिर के पत्थरों का रंग वैसा ही था, पर उनके निकट ही कहीं बनता नेह का वह महीन धागा टूट कर वहीं कहीं बिखरे मसाले में विलीन हो चुका था.

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

खाई

"लघुकथा" : दिनेशराय द्विवेदी

शहर में हुई ताज़ा बड़ी रैली के बाद, हवा का स्वाद बदल सा गया था. चाय की दुकान पर आवाज़ें ऊँची थीं, और व्हाट्सएप ग्रुप्स नोटिफिकेशन की बौछार से भरे हुए थे. रैली शांतिपूर्ण रही थी, पर उसके बाद मोहल्ले में एक अजीब सा सन्नाटा था, जैसे किसी आने वाली आंधी या तूफान की सूचना दे रहा हो.

अनन्या और ज़रीना हमेशा की तरह उस शाम छत पर बैठी थीं, इस साल उन्हें सैकण्डरी बोर्ड की परीक्षा देनी थी. बोर्ड के नाम का बड़ा आतंक था. उन्हें चिन्ता थी कि वे इस रेखा को ठीक से पार कर पाएंगी या नहीं. सात साल की दोस्ती उनकी आवाज़ों में, उनकी हँसी में रच-बस गई थी.

"कल से तेरे घर पढ़ना पड़ेगी" ज़रीना ने कहा, "मेरी अम्मी बीमार हैं."

"ठीक है," अनन्या ने इस प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया.

रात के खाने की मेज पर भाई विक्रम का चेहरा उत्तेजना से चमक रहा था. "आज तो लोगों की आँखें खुल गई होंगी! हमें अपने लोगों की सुरक्षा खुद करनी होगी." पिताजी मौन सिर हिला रहे थे.

तभी विक्रम का ध्यान अनन्या पर गया. "सुन, कल से उस ज़रीना को घर मत बुलाना."

"क्यों भैया? हमें साथ पढ़ना है," अनन्या हैरानी से बोली.

"उनकी संस्कृति अलग है, अनन्या. हम नहीं जानते उनके मन में क्या चल रहा है."

अनन्या को उसकी आवाज़ में एक नई, कठोर निश्चय की ध्वनि सुनाई दी. सुन कर अनन्या का गला सूख गया. "पर... वह तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है."

पिताजी ने आवाज़ दबाकर कहा, "बेटे, विक्रम की बात मान लो. तुझे कुछ हो गया तो? हमारी इज्ज़त का क्या होगा? उनसे दूर ही रहना ठीक है."

इज्ज़त शब्द हवा में झूल गया, जैसे कोई भारी पत्थर है और कभी भी उसके सिर पर गिर पड़ेगा.

अगले दिन जब ज़रीना किताबें लेकर आई, तो अनन्या ने दरवाज़ा आधा खोला. "ज़री... आज मैं ठीक नहीं हूँ. सिर दर्द है. तू चली जा."

ज़रीना की मासूम आँखों में चिंता तैर गई. "अच्छा? ठीक है... दवा ले लेना. पढ़ नहीं पाई तो परीक्षा कैसे देगी." उसने अपने बैग से चॉकलेट की एक पट्टी निकाली और अनन्या के हाथ में थमा दी, फिर चली गई.

दरवाज़ा बंद करते हुए अनन्या के हाथ काँप रहे थे. वह जो सिर्फ ज़रीना थी. उसकी हँसी, उसकी शैतानियाँ, उसके रहस्य, अचानक सब 'संभावित खतरा' बन गए थे. वह उसका चेहरा भूल रही थी, पर भैया के शब्द, "उनके मन में क्या चल रहा हैं," उसके कानों में गूँज रहे थे. पहली बार, उसने अपनी ही सहेली से तनिक भय महसूस किया. उसके सारे शरीर में एक सिहरन दौड़ गयी. फिर एक लंबी सांस अपने अंदर खींच कर उसने अपने विश्वास को मजबूत किया कि प्यारी सी ज़रीना उसके लिए खतरे का बायस कैसे बन सकती है.

एक हफ़्ते तक बहानेबाजी करती रही. फिर एक दिन, स्कूल गेट पर, ज़रीना ने उसका रास्ता रोक लिया.
"तू मुझसे नाराज़ है क्या? मैंने कुछ गलत कहा?"

"नहीं... बस... अब हम बड़े हो गए हैं. अलग-अलग रहना चाहिए."

ज़रीना स्तब्ध रह गई. उसकी आँखों की चमक धूमिल पड़ गई. "क्या मतलब? 'अलग' क्यों?"

एक क्षण के लिए स्तब्धता ने उसे रोका. फिर उसने धीरे से सवाल कर ही लिया, "क्योंकि मैं मुस्लिम हूँ?"

अनन्या मौन रह गयी. लेकिन उसके इस मौन ने उसे बहुत कुछ कह दिया था.

ज़रीना के चेहरे पर आघात, और फिर एक ठंडी, दुखद समझदारी उभरी.

"समझ गई. तेरे भैया ने कहा होगा न? मैंने सुना है उसका भाषण." वह एक कदम पीछे हटी, जैसे कोई अदृश्य रेखा खींच रही हो. "ठीक है. तू सुरक्षित रह."

और फिर सब कुछ थम गया.

अब अनन्या अपनी खिड़की से कभी-कभी ज़रीना के घर की ओर देखती है, जहाँ वह अपनी छत पर अकेली बैठी रहती है. पहले जहाँ दोनों के बीच एक खुला आंगन था, साझी हँसी थी, अब दो घरों के बीच की सड़क, अब सड़क नहीं रह गयी थी. वहाँ रातों रात एक गहरी खाई बन गयी थी, एक अदृश्य खाई. उसे लगता कि वह कभी इस खाई के पार न जा सकेगी. बहुत सारे लोगों को यह खाई कभी नहीं दिखी. वे इस पार से उस पार आते जाते रहे. पर यह खाई हर पल अनन्या के ज़ेहन में मौजूद थी.

एक शाम, अपना बैग खंगालते हुए अनन्या को चॉकलेट की पट्टी हाथ लगी. इसे ज़रीना ने उसे दिया था और वह बैग में डाल कर भूल गयी थी. उस पर ज़रीना ने ख़ुश ख़त में लिखा था, "हमेशा तेरी दोस्त."

जैसे ही अनन्या के हाथ ने उस चॉकलेट की पट्टी को छुआ, वैसे ही उसके अंतर से 'कुछ हो जाने' का डर पता नहीं काफूर हो गया. डर केवल उसे दिखाया गया था, वह कभी आया ही नहीं. कोई अनहोनी नहीं हुई. उलटा, कुछ और ही 'हो गया' था. उसकी दुनिया सिमट गई थी. उसके मन की कोमल पंखुड़ियों के बीच संदेह के काँटे उग आए थे. उसकी सबसे कीमती चीज़, निश्छल और बिना शर्त दोस्ती टूटकर बिखर गई थी.

उस रात अनन्या जब अपने कमरे में बिलकुल अकेली रह गयी, बहुत कुछ सोचती रही. फिर अचानक वह उठी, पानी के अधभरे गिलास में अपनी उंगली डुबोई और अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर उँगली से एक शब्द लिखा: "क्यों?"

उस रात उसका पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगा. वह ठीक से सो भी नहीं सकी. जैसे ही सुबह की रोशनी ने खिड़की से कमरे में प्रवेश किया. उनींदी सी वह उठी और उसने खिड़की खोल दी. उसे चिड़ियों की चहचहाट सुनाई दी. सामने की छत पर ज़रीना टहल रही थी. उसके मन ने बस चाहा कि ज़रीना उसे देखे. तभी ज़रीना ने उसकी खिड़की की और देखा. दोनों की निगाहें मिलीं. उसने ज़रीना की ओर अपना हाथ हिलाया. ज़रीना ने भी अपना हाथ हिला कर जवाब दिया. दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी. अनन्या ने महसूस किया कि उनके बीच की सड़क पर कभी कोई खाई थी ही नहीं.

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

उम्मीद

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

मॉल रोशनियों से नहाया हुआ था. लाल-सुनहरी गेंदें और टिमटिमाते सितारे हर किसी को अपनी ओर खींच रहे थे. बाहर लॉन में हजारों बल्बों से सजा क्रिसमस ट्री किसी सजीली दुल्हन की तरह मुस्करा रहा था. सड़क पार फुटपाथ पर राघव सुबह से अपने ठेले पर बच्चों के लिए सांताक्लॉज की लाल ड्रेसें बेच रहा था. उसकी अधिकांश ड्रेसें बिक चुकी थीं. बस चार-पाँच बची थीं. वह सोच रहा था कि ये भी बिक जाएँ तो सुकून से घर जाए; दो ड्रेसें तो वह अपने बच्चों, श्याम और सरिता के लिए ले ही जाएगा.

तभी एक स्कूटर वाला आकर रुका और ड्रेसें देखने लगा. राघव उम्मीद से बोला, “देख क्या रहे हैं बाबूजी, ले लीजिए. बस यही पाँच-छह बची हैं, आधी दर पर दे दूंगा.”

राघव आगे कुछ बोल पाता, तभी एक आटो रिक्शा उसके सामने आकर धीमा हुआ और ड्राइवर चिल्लाया— “सामान समेटो और भागो राघव! गुंडों की फौज आ रही है!”

राघव ने मुड़कर देखा, पंद्रह-बीस लोगों का हुजूम लाठी-डंडे लिए चीखता-चिल्लाता चला आ रहा था. ये वही लोग थे जो अक्सर त्यौहारों का उल्लास बिगाड़ने को ही अपना धर्म समझते थे. राघव ने फुर्ती से सांताक्लॉज की ड्रेसें चादर में लपेटकर गठरी बाँधी और ठेले को गली में धकेल दिया. स्तब्ध खड़ा स्कूटर वाला भी अपनी गाड़ी स्टार्ट कर राघव के पीछे उसी गली में घुस गया.

गली के सुरक्षित कोने से उन्होंने देखा—भीड़ मॉल में घुस चुकी थी. उन्होंने सजावटी ट्री को पीट-पीटकर गिरा दिया और उसमें आग लगा दी. गार्ड्स, जो सांता की ड्रेस में थे, उनके कपड़े फाड़ दिए गए. दस मिनट के तांडव में मॉल के शीशे चकनाचूर हो गए. कुछ लोग हाथों में कीमती सामान दबाए बाहर निकले और शोर मचाते हुए आगे बढ़ गए.
सन्नाटा छाने पर ग्राहक ने पूछा, “ये ड्रेसें कितने में दे रहे हो?” राघव की आवाज काँप रही थी, “सौ की एक है बाबूजी, आप जो दे दें. अब बस घर जाना चाहता हूँ.” “सौ में दो दोगे? मेरे पास पैसे कम हैं, बाकी से बच्चों के लिए कुछ मीठा लेना है,” ग्राहक ने मोल भाव किया. राघव ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “ले जाइए बाबूजी, कम से कम आपके बच्चे तो खुश होंगे.”

राघव ने नोट जेब में रखा और खाली सड़क को देखा. ग्राहक बोला, “मॉल में बहुत नुकसान कर गए ये लोग.” राघव ने लंबी सांस ली, “ये हर त्यौहार पर यही करते हैं. पुलिस भी सब बरबाद होने के बाद जमीन पर लाठियाँ बजाने आती है.”

राघव ठेला लुढ़काते हुए अपनी बस्ती की ओर चला, जो चर्च के पीछे नाले के किनारे थी. चर्च के पास पहुँचते ही उसके पैर ठिठक गए. तीन दिन से जगमगाती रोशनियाँ बुझ चुकी थीं. चर्च के एक कोने से धुआँ उठ रहा था. पता चला कि भीड़ ने पादरी जॉन साहब पर हमला किया, उनका सिर फट गया है और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. राघव की रूह काँप उठी— "क्या ईश्वर इतना कमजोर है कि उसे बचाने के लिए खुशियों का कत्ल करना जरूरी है?"

बस्ती पहुँचा तो देखा, अनीता की झुग्गी राख के ढेर में बदल चुकी थी. अनीता एक पुराने बक्से पर बैठी शून्य में ताक रही थी. उसका पति और बेटा पहले ही एक हादसे में गुजर चुके थे. पादरी  जॉन साहब की मदद से वह फिर से खड़ी हो सकी। उनकी सहृदयता को देख उसने ईसाई धर्म अपनाया था, और आज शायद इसी की कीमत उसने अपना आशियाना खोकर चुकाई थी. सलीम उसके पास खड़ा उसे ढाढ़स बँधा रहा था.

सलीम ने राघव को देखते ही बुझी हुई आवाज में कहा, "वाह! धर्म बच गया! किसी का सिर झुकाकर, किसी की छत छीनकर और किसी के दिल में नफरत भरकर... उन्होंने अपने भगवानों को खुश कर दिया." सलीम की आँखों में आक्रोश से ज्यादा शर्मिंदगी थी.

राघव ने आगे बढ़कर अनीता के सिर पर हाथ रखा और पूरी दृढ़ता से बोला, “अनीता बहन! घर लकड़ी और ईंटों का था, जो टूट गया. पर हम जो साथ खड़े हैं, वह 'विश्वास' है, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता. हम सिर्फ ईंटें नहीं जोड़ेंगे, हम टूटे हुए भरोसे को भी जोड़ेंगे. अदालत से लेकर सड़क तक, तुम अकेली नहीं हो. यह देश नफरत की आग में जलने के लिए नहीं बना है.”

अनीता ने सिर उठाकर दोनों भाइयों को देखा और खड़ी होकर बोली, “उन्होंने नफरत को धर्म मान लिया है, पर तुम दोनों ने प्यार का धर्म नहीं छोड़ा. वे कितना भी तोड़ें, मैं अपना विश्वास नहीं खोऊँगी.”

सलीम और राघव ने अनीता को सहारा दिया. जलते हुए चर्च की लपटें अब शांत हो रही थीं, लेकिन उस ढहे हुए घर के पास तीन दिलों की धड़कनें एक सुर में थीं. वहां न कोई हिंदू था, न मुसलमान, न ईसाई—वहां सिर्फ तीन 'इंसान' थे, जो एक नए सवेरे की नींव रख रहे थे.