जैसे-जैसे वह उसे पढ़ती जा रही थीं, उसे ईसीआई फैक्ट्री के मज़दूरों के उस पूरे इतिहास, उनकी दशा, उनके जमीनी और कानूनी संघर्षों की थाह मिल रही थी. अनेक तथ्य ऐसे निकलकर आए थे जिनकी उसे जानकारी नहीं थी. वह समझ रही थी कि संगठित कामगारों का जीवन भी कितना संघर्षमय होता है, कैसे उन्हें उनके कानूनी हक देने में भी पूंजीपति को बहुत जोर आता है. बाजार भावों के उतार-चढ़ाव को तो वह किसी तरह सहन कर जाता है लेकिन अपने एम्पलॉई को एक रुपया भी अधिक देने में वह प्राणांतक दर्द महसूस करने लगता है, जैसे ही उसे लगता है इस उद्योग से दूसरा उद्योग बेहतर मुनाफा देगा, तो वह उस उद्योग में काम कर रहे सैंकड़ों-हजारों कर्मचारियों को बेरोजगार छोड़ अपना नया उद्यम सजाने लगता है. सीनियर वकील चव्हाण साहब के निर्देशन में सहायकों ने जो मसौदा तैयार किया था उसमें मज़दूरों का छिपा हुआ दर्द बखूबी स्पष्ट दिखाई देता था. सांख्यिकीय रिपोर्ट का कोई महत्वपूर्ण तथ्य ऐसा नहीं था जो छूट गया हो. यह दस्तावेज अब कोर्ट के रिकॉर्ड पर जाने के लिए तैयार था. वह जानती थी कि इस स्टेटमेंट ऑफ क्लेम के तथ्यों को साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज वे जुटा चुके हैं उन्हें प्रमाणित करने को यूनियन पदाधिकारियों और मजदूरों के बयान पर्याप्त होंगे. उसने ई-मेल का उत्तर देते हुए केवल एक वाक्य लिखा, ‘ऑल करेक्ट एण्ड सफिशियंट’ और सेंड पर क्लिक कर दिया.
शनिवार, 13 जून 2026
मौन संकल्प
जैसे-जैसे वह उसे पढ़ती जा रही थीं, उसे ईसीआई फैक्ट्री के मज़दूरों के उस पूरे इतिहास, उनकी दशा, उनके जमीनी और कानूनी संघर्षों की थाह मिल रही थी. अनेक तथ्य ऐसे निकलकर आए थे जिनकी उसे जानकारी नहीं थी. वह समझ रही थी कि संगठित कामगारों का जीवन भी कितना संघर्षमय होता है, कैसे उन्हें उनके कानूनी हक देने में भी पूंजीपति को बहुत जोर आता है. बाजार भावों के उतार-चढ़ाव को तो वह किसी तरह सहन कर जाता है लेकिन अपने एम्पलॉई को एक रुपया भी अधिक देने में वह प्राणांतक दर्द महसूस करने लगता है, जैसे ही उसे लगता है इस उद्योग से दूसरा उद्योग बेहतर मुनाफा देगा, तो वह उस उद्योग में काम कर रहे सैंकड़ों-हजारों कर्मचारियों को बेरोजगार छोड़ अपना नया उद्यम सजाने लगता है. सीनियर वकील चव्हाण साहब के निर्देशन में सहायकों ने जो मसौदा तैयार किया था उसमें मज़दूरों का छिपा हुआ दर्द बखूबी स्पष्ट दिखाई देता था. सांख्यिकीय रिपोर्ट का कोई महत्वपूर्ण तथ्य ऐसा नहीं था जो छूट गया हो. यह दस्तावेज अब कोर्ट के रिकॉर्ड पर जाने के लिए तैयार था. वह जानती थी कि इस स्टेटमेंट ऑफ क्लेम के तथ्यों को साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज वे जुटा चुके हैं उन्हें प्रमाणित करने को यूनियन पदाधिकारियों और मजदूरों के बयान पर्याप्त होंगे. उसने ई-मेल का उत्तर देते हुए केवल एक वाक्य लिखा, ‘ऑल करेक्ट एण्ड सफिशियंट’ और सेंड पर क्लिक कर दिया.
गुरुवार, 11 जून 2026
अंतर्द्वंद
शुक्रवार की सुबह ट्रेन मुंबई के बोरिवली स्टेशन पहुँच रही थी. मयंक अपने कंधे पर पिट्ठू बैग लटकाए और एक छोटा सूटकेस बाएँ हाथ में थामे अपने कोच के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ. खुले दरवाजे से आ रही तेज हवा ने उसके बालों को बिखेर दिया, वे हवा के साथ उड़ने लगे. ट्रेन रुकने के पहले ही उसे स्टेशन पर प्रिया दिखाई दे गई. वह उसे देखकर अपना हाथ हिला रही थी. महीनों बाद दीदी को देख उसके चेहरे पर खुशी दौड़ गई. ट्रेन रुकते ही वह उतरा और दौड़कर दीदी के पास पहुँचा, प्रिया ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. दोनों की आँखें नम हो आईं.
बुधवार, 10 जून 2026
नया सिलसिला
मंगलवार, 9 जून 2026
आत्मसंघर्ष
बुधवार, 3 जून 2026
प्रस्ताव
देहरी के पार, कड़ी - 62
सुबह नींद टूटी तो कमरे में धूप प्रवेश कर चुकी थी. प्रिया की निगाह सामने दीवार पर टंगी डिजिटल घड़ी की ओर गई. वह समय : साढ़े सात, दिन : रविवार 2 जून 2019 दिखा रही थी. उसे आज कहीं नहीं जाना था. आज वह खूब सोई थी, लगभग सात घंटे. उसने रसोई में जाकर दो गिलास पानी पिया और चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ाकर ब्रश करने लगी. आज उसे कहीं नहीं जाना था, कोई अपॉइंटमेंट नहीं था. आधे घंटे बाद सफाई वाली मेड आ जाएगी. आज उसे रोककर डस्टिंग करवाएगी. कपड़े न जाने कितने बिना धुले हो रहे होंगे? चाय पीने के बाद उन्हें छाँटकर धोने के लिए मशीन में डाल देगी. सब कामों से निपटने के बाद खाना बनाकर खाएगी और दिन में कम से कम दो घंटे जरूर सोएगी. फिर उठकर चाय पीएगी और शाम को कोई किताब पढ़ेगी.
पर सोचा हुआ कब
होता है? मेड के जाने के बाद उसने स्नान किया. कुकर में दाल और चावल दोनों पकने के
लिए छोड़ दिए. तभी फोन घनघना उठा. प्रशांत बाबू थे, “तुमसे तुम्हारे घर आकर मिलना
है, कब आ सकता हूँ?”
“सर, कभी भी. आज
दिनभर घर पर ही हूँ.”
“शाम सात बजे ठीक
रहेगा?”
“हाँ, क्यों नहीं.
पर सर, कुछ खास काम है?’
“नहीं, कुछ खास
नहीं. पर तुमसे बातें करनी हैं. हम जब भी मिलते हैं हमेशा काम की बातें होती हैं,
मैं तुमसे जो बातें करना चाहता हूँ वे रह जाती हैं. आज यूनियन ऑफिस से शाम छह बजे
तक फ़ारिग हो लूंगा. फिर आता हूँ तुम्हारे यहाँ”
“सर, मैं इंतज़ार
करूंगी.”
कॉल कट जाने के बाद वह सोचने लगी. आखिर क्या बात हो सकती है. प्रशांत बाबू आखिर उससे क्या बातें करना चाहते हैं? सवाल तो दिमाग में आते हैं यह दिमाग का उसूल है. कोई उन्हें रोक नहीं सकता. फिर उसने इस पर सोचना बंद कर दिया और वाशरूम में वाशिंग मशीन संभालने चल दी.
खाने में दाल-चावल
थे. उसने सलाद तैयार कर लिया था, अचार का मर्तबान भी उतारकर टेबल पर रख लिया और खाना
खाने बैठी. अचानक उसे आकाश की याद आई. कल का पूरा दिन वह साथ था. उसके जाने के बाद
वह उसके साथ अपने संबंध और आपसी व्यवहार के बारे में सोचती रही थी. पता नहीं आकाश
ने उसके बारे में क्या सोचा होगा? उसकी इच्छा हुई कि वह आकाश को कॉल लगाकर बात
करे. फिर रुक गई. अक्सर वही आकाश को पूछती रही है. इस बार आकाश को ही फोन करने दो.
शाम सवा सात बजे
करीब प्रशांत बाबू प्रिया के फ्लैट पर पहुँचे. उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया.
एक ट्रे में पानी से भरे दो गिलास और ठंडे पानी की एक बोतल टेबल पर लाकर रखी और
पूछा, “सर चाय या कॉफी कुछ बनाऊँ?”
“चलो बिना चीनी के ब्लैक
कॉफी बना लो.” प्रशांत बाबू ने कहा तो वह
कॉफी बना लाई, साथ ही बिस्कुट भी ले आई.”
“प्रिया, तुम्हारी
नौकरी कैसी चल रही है?” प्रशांत बाबू ने ही बात आरंभ की.
“ठीक है सर, कोई
व्यवधान नहीं है. मैं हमेशा अपना काम समय से पूरा करती हूँ, तब भी जब मुझे बीच में
किसी काम से अवकाश लेना पड़ता है. फिर देसाई साहब मैनेजर हैं तो कोई समस्या नहीं
है.”
“फिर ठीक है. इस
बीच तुमने ईसीआई के आंदोलन में बहुत मदद
की. उसके लिए अदालत तक जाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाई. मैं जानना चाहता था कि उससे
तुम्हारी नौकरी में कोई परेशानी तो नहीं हुई.”
“नहीं सर, आप उसकी
चिंता न करें. जब मैंने घर छोड़ा, माता-पिता और भाई से किसी तरह की मदद की कोई आशा
भी उसी के साथ छोड़ दी थी. मैं जानती हूँ कि अपना जीवन मुझे ही चलाना है. यह नौकरी
मुझे आत्मनिर्भर बनाती है, और यह आत्मनिर्भरता मुझे एक स्वतंत्र व्यक्ति बनाती है. मैं
स्वतंत्रता का मूल्य जानती हूँ. मैं इसे खोने जैसा कोई काम जानबूझकर तो नहीं करूंगी.”
“तुम बहुत समझदार
हो, प्रिया. फिर भी कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम खुद को नुकसान न पहुँचा लो.”
प्रशांत बाबू ने कॉफी का सिप लेते हुए कहा.
“नहीं सर ऐसा नहीं
होगा. यदि कभी ऐसा होने की नौबत आई भी तो उससे पहले आपको पता लग जाएगा.”
“तुमने इस बीच यूनियन
लाइब्रेरी से लाकर बहुत किताबें पढ़ी हैं, उनके बारे में तुम्हारा क्या सोचना है?”
“सभी किताबें अच्छी
हैं. बहुत कुछ सिखाती हैं. बस उन्हें समझने के लिए अक्सर कई बार पढ़ना पड़ता है.
कुछ के बारे में ऐसा लगता है कि वे मेरे पास होनी चाहिए. मैंने ऐसी कुछ किताबें ऑनलाइन
खरीद लीं है”
“हाँ, उनमें से
अनेक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, मेरे पास भी बहुत किताबें हैं. वैसे इनमें से
तुम्हें सबसे अधिक किस किताब ने प्रभावित किया?”
“मुझे ‘परिवार,
निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति” ने
बहुत कुछ सिखाया. मैं समझ पाई कि कैसे मनुष्य के अस्तित्व में आने के बाद उसके
परिवार का विकास हुआ है. असल में मार्क्सवाद के एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत को
समझने के लिए यह सबसे बेहतरीन प्रारंभिक पुस्तक है. उसे पढ़ने के बाद मैंने एल.एच.मोर्गन
की किताब “प्राचीन समाज” मंगा ली है, उसे पढ़ रही हूँ. मुझे इस किताब से समझ आया
कि मनुष्य समाज लगातार विकसित हुआ है और उसका विकास जारी है. उसी से निजी संपत्ति
की उत्पत्ति और उसके कारण समाज में वर्गों की उत्पत्ति समझ सकी. यह भी जाना कि वर्ग-संघर्ष
ने समाज को कैसे उत्तरोत्तर उन्नत समाज व्यवस्थाओं तक पहुँचाया है.”
“तुमने ‘कम्युनिस्ट
घोषणा पत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रांति’ भी तो पढ़ी हैं.?”
“पढ़े हैं सर, घोषणापत्र तो मैंने पहले भी पढ़ा था, पर तब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा था. उनसे ही समझ आया
कि मजदूर वर्ग की मुक्ति तमाम अन्य शोषित वर्गों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है.
इस तरह मजदूर वर्ग को खुद अपनी मुक्ति के लिए तमाम वर्गों को मुक्त करना होगा. इस
प्रक्रिया में वह मनुष्य समाज के वर्गों को समाप्त कर सकता है. तर्क के स्तर पर यह
प्रस्थापना पूरी तरह उचित लगती है. उसी से मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी का महत्व
समझ आता है.”
“यह अच्छी बात है
कि तुम मजदूर वर्ग की पार्टी का महत्व समझा है.”
प्रशांत बाबू ने
कॉफी का कप उठाया, लेकिन उसकी कॉफी समाप्त हो चुकी थी. प्रिया देखकर मुस्कुराई, “सर,
एक कॉफी बनाऊँ.”
“नहीं उसकी जरूरत
नहीं. खाने का समय हो रहा है, फिर भूख मर जाएगी.” प्रशांत बाबू ने मना किया और अपनी
बात जारी रखी. “प्रिया, असल में मैं एक महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ. जब से ईसीआई
के मजदूरों का आंदोलन आरंभ हुआ है, तब से तुम उसमें शामिल रही हो और आंदोलन के
महत्वपूर्ण काम किए हैं. कॉमरेड कुलकर्णी हमारी पार्टी के राज्य सचिव हैं उन्होंने
तुम्हें परखा है. उनका कहना है कि मैं तुम्हें हमारी पार्टी की मेंबर बनने का प्रस्ताव
दूँ.”
सुनकर प्रिया
स्तब्ध रह गई और सोच में पड़ी बहुत देर तक प्रशांत बाबू के चेहरे की ओर देर तक
देखती रही.
“सर मैं जानती हूँ
कि मजदूर वर्ग की पार्टी के सदस्य होने का अर्थ क्या होता है. उसे मजदूर वर्ग के
हितों को सर्वोपरि रखने की शपथ लेनी होती है और उस पर खरा उतरना होता है. उसका
जीवन पूरी तरह मजदूर वर्ग को समर्पित होता है, उसे हमेशा बलिदान के लिए तैयार रहना
होता है. मैं समझती हूँ कि वह आसान नहीं है. मैं उसके लिए अभी खुद को उसके लिए
तैयार नहीं पाती. सर उसके लिए मुझे सोचना पड़ेगा.” प्रिया ने उन्हें बहुत स्पष्ट
उत्तर दिया.
“तुम्हारा कहना
बिलकुल सही है. हर व्यक्ति को जिसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिले उसे सोच
समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए. मुझे कॉमरेड कुलकर्णी ने जिम्मेदारी दी थी. उसका
एक हिस्सा मैंने पूरा कर दिया है. मैं आगे भी कोशिश करता रहूँगा.” यह कहते हुए
प्रशांत बाबू मुस्कुराए.
प्रिया हँस पड़ी.
“सर, आप कोशिश करते रहिए. मैं भी लायक बनने की कोशिश करती रहूँगी.”
“प्रिया, साढ़े आठ
बज रहे हैं. खाने का क्या करोगी?” प्रशांत बाबू ने पूछा.
“बस अब बनाऊंगी.
वैसे भी मैं ऑफिस से लौटते हुए यही समय हो जाता है. मेरे लिए नॉर्मल है.”
“मैं रोज की तरह
अपना डिनर ‘एमबी’ में करूंगा. तुम भी साथ चलो. मेरे पास आज कार है. तुम्हें वापस
छोड़ दूंगा. इस बीच कुछ बातें और हो जाएंगी.”
“ठीक है सर, आप
रुकिए. मैं कपड़े चेंज करके आती हूँ.” प्रिया कह कर अंदर अपने कमरे में चली गई.
आधे घंटे बाद दोनों
‘एमबी’ में डिनर कर रहे थे. खाते हुए भी प्रशांत बाबू अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे.
और प्रिया गंभीरता से उन्हें सुन रही थी.
... क्रमशः
सोमवार, 1 जून 2026
आकाश
जयपुर में तीन दिन दो रात वह उसके घर रही. तब उसे लगा था कि प्रिया मुसीबत में फंसी लड़की है जिसे सुरक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है और वह उसकी 'मदद' कर रहा है. उसका मंगेतर विक्रांत उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा भी, लेकिन पापा की सूझबूझ से उसे गिरफ्तार होना पड़ा. उसी दिन कंपनी ने उसकी पोस्टिंग मुख्यालय मुंबई में कर दी और अगली सुबह ही वह फ्लाइट लेकर मुंबई चली आई. इस बीच उसके अवचेतन में कहीं न कहीं प्रिया के रक्षक वाली भूमिका बनी रही.
रविवार, 31 मई 2026
उलझे सवाल
सोमवार, 25 मई 2026
दिलों में पहुँच
रविवार, 24 मई 2026
नया चेहरा
देहरी के पार, कड़ी - 58
शनिवार सुबह सोकर उठने के बाद प्रिया रसोई में अपने लिए चाय बना रही थी कि प्रशांत बाबू का फोन आ गया. उसने फोन उठाया, “प्रिया, हड़ताल के दिनों के वेतन और फेयर वेजेज का जो औद्योगिक विवाद राज्य सरकार ने इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल को रेफ्रेंस किया था, उसमें यूनियन को मंगलवार 18 जून तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम पेश करना है, इसे तैयार करने के लिए हमारे पास केवल दो सप्ताह हैं. कल कणिका की सांख्यिकीय रिपोर्ट भी मिल गई है. मैं जल्दी से जल्दी चव्हाण साहब से मिलना चाहता हूँ. उन्होंने आज ग्यारह बजे का समय दिया है. वे तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे कि प्रिया कैसी है, मैंने उन्हें कहा है कि हो सका तो वह भी मेरे साथ आएगी. तुम चल रही हो न?”
“चलना तो चाहती
हूँ सर, पर आज आकाश से भी मिलना है. खैर मैं आपको आधे घंटे में बताती हूँ.” प्रिया ने
इतना कहकर फोन काट दिया. उसने आकाश को फोन लगाया. देर तक घंटी जाने के बाद उधर से
आवाज आई, “हेलो, कौन प्रिया? तुम बड़ी जल्दी उठ गई.” ऐसा लगा जैसे घंटी की आवाज सुनकर ही
आकाश की नींद टूटी है.
“तो तुम अभी तक सो
ही रहे थे?”
“हाँ तो, आज छुट्टी
है, आज तो नींद निकालने का ही दिन है.” आकाश ने अलसाई आवाज में कहा.
“तो सुनो, मैं दस
बजे फोर्ट के लिए निकल रही हूँ, वहाँ सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण का चैंबर है.
उन्होंने ग्यारह बजे का समय दिया है. मैं सोचती हूँ तुम भी साथ चलो. आज हम दक्षिण
मुंबई में घूमते हैं. वहीं कहीं लंच करेंगे और शाम तक लौट आएंगे. तुम चलोगे?” प्रिया
ने अपने मन का बता दिया.”
“क्या? क्या? आज
घूमने चलना है. वह तो सही है. पर चव्हाण
साहब के चैम्बर में मैं क्या करूंगा?”
“कुछ नहीं करना, बस सबसे मिलना और हमारी बातें सुनना. वहाँ आधे घंटे से अधिक नहीं लगेगा.”
“ठीक है, मैं तैयार
होता हूँ, तुम मेरे फ्लैट पर आ रही हो या मुझे तुम्हारे फ्लैट पर आना है? आकाश ने
पूछा.”
“वैसे तो तुम्हें
ही आना चाहिए, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे इधर से पास है, यहाँ से फोर्ट जाना अधिक सही
है.”
“ठीक है, मैं ही
आता हूँ.” आकाश ने कहा.
“पर दस बजे के पहले
पहुँच जाना. हम समय से चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच जाएँ.” प्रिया ने कहा और फोन
काट दिया.
उसके बाद उसने प्रशांत
बाबू को भी फोन करके बता दिया कि वह और आकाश सीधे चव्हाण साहब के चैम्बर पहुँच रहे
हैं. ग्यारह बजने के पहले दोनों सीनियर एडवोकेट रमेश चव्हाण के चैम्बर में थे.
चव्हाण साहब ने प्रिया का स्वागत किया और जानना चाहा कि उसके साथ कौन है?
“सर, ये आकाश हैं, मेरी कंपनी में मेरे कलीग थे. मैंने जब अपने घर से पलायन किया, तब इन्होंने मेरी बहुत मदद की. अब तक जयपुर अपने घर से काम कर रहे थे. अब इन्होंने कंपनी स्विच कर ली है और दो सप्ताह पहले मुंबई आ गए हैं. पवई में रह रहे हैं. आज मैं इन्हें साउथ मुंबई घुमाने ले आई.”
“वेलकम आकाश! प्रिया ने तुम्हारे बारे में पहले भी बताया था. उसने क्लोजर वाले केस में मेरी सहायक की भूमिका अदा की थी. यह बहुत प्रतिभाशाली है, यदि यह लॉ में ग्रेजुएशन कर ले तो मैं इसे स्थायी सहायकों में स्थान दे सकता हूँ. तुम्हें जब भी मेरी जरूरत हो, मुझे याद कर सकते हो. बेझिझक मुझसे मिल सकते हो.” चव्हाण साहब ने जो कुछ भी कहा, उससे आकाश असमंजस में आ गया. वह समझ ही नहीं पा रहा था कि, 'आखिर यह लड़की प्रिया है क्या?' जहाँ भी जाती है, अपने लिए जगह बना लेती है. उसने आकाश के दिल में स्थान बना लिया था. पर क्या वह भी उसके दिल में जगह बना सकेगा? यह सवाल मन में लिए ही उसने चव्हाण साहब को नमस्ते किया.
“नमस्ते सर, प्रिया
ऐसी ही है. यह दो रात हमारे घर रुकी थी लेकिन आज भी मम्मी-पापा और छोटी बहन इसे
याद करते ही रहते हैं.”
तभी प्रशांत बाबू
और यूनियन सचिव शिंदे ने चैम्बर में प्रवेश किया. उन्होंने कणिका की तैयार की हुई सांख्यिकीय
सर्वे की रिपोर्ट चव्हाण साहब को दी और कहा, “सर, फेयर वेजेज के केस में अठारह जून
तक स्टेटमेंट ऑफ क्लेम प्रस्तुत करना है.”
चव्हाण साहब सर्वे
रिपोर्ट लेकर उसके पन्ने पलटने लगे. रिपोर्ट के अंत में वे रिजल्ट पर
रुके और उसे गंभीरता से पढ़ा. फिर बोले, “रिपोर्ट गंभीर है, 92 फीसदी मज़दूरों का कारखाने के नारकीय माहौल से पूरी तरह टूट जाने और 78
फीसदी का साहूकारों के भयंकर कर्ज़ के जाल में फँसे होने के पुख्ता
आंकड़े हमारे इस केस में यह मजबूत साक्ष्य होंगे. बस कणिका को गवाही देने के
लिए दो-तीन बार आना पड़ सकता है.”
“वह आ जाएगी सर,
कॉमरेड कुलकर्णी जी की भांजी है. बस उसे आने की तारीख सप्ताह भर पहले मिल जाए
जिससे वह इसके लिए समय रख सके.”
“ठीक है, पहले इस
मामले में जो समझौता वार्ता हुई थी, उसका सारा रिकार्ड और हड़ताल के दौरान जो
पत्राचार प्रबंधन, लेबर कमिश्नर, पुलिस, स्थानीय प्रशासन आदि से हुआ था वह सब मुझे
चाहिए. लाए हो?”
“नहीं सर, अभी तो
नहीं है. पर हम आज ही शाम तक या कल दोपहर तक भिजवा देंगे.”
मुलाकात यहीं खत्म
हो गई. वापस लौटते वक्त चव्हाण साहब ने आकाश को फिर कहा, “आप आते रहिएगा. और यदि
प्रिया को लॉ ग्रेजुएट होने के लिए प्रेरित करें तो देश को एक बेहतरीन वकील मिल
सकता है.”
सुनकर प्रिया हँस
पड़ी. कहने लगी, “सर, आप मजाक अच्छा करते हैं. मैं कानून के सागर में गोता लगाने
का कतई इरादा नहीं रखती. मैं सॉफ्टवेयर में अच्छी हूँ. मेरे लिए वही ठीक है.”
“प्रिया यह हँसने
की बात नहीं, मैं कोई विनोद नहीं कर रहा. बल्कि सीरियसली कह रहा हूँ. तुम्हारा ये
सॉफ्टवेयर और आईटी का अनुभव तुम्हें इस क्षेत्र का श्रेष्ठ वकील बना सकता है. एक बार
सोचकर देखना.” चव्हाण साहब ने उसे फिर कहा.
“ठीक है सर, आपका
आशीर्वाद बना रहे. आज तो मैं बिलकुल नहीं सोचूंगी. मुझे और आकाश को साउथ मुम्बई
घूमना है.” प्रिया ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया. उसकी बात सुनकर चव्हाण साहब भी
हँसने लगे.
चैंबर की सीढ़ियों
से नीचे उतरते ही की दोपहर की धूप और समुद्री हवा ने आकाश और प्रिया
का स्वागत किया. शनिवार की दोपहर होने के कारण फोर्ट की सड़कों पर दफ्तरों की भीड़
नहीं थी. ओल्ड विक्टोरियन गोथिक शैली और आर्ट डेको वास्तुकला की गर्व से खड़ी ऐतिहासिक इमारतें,
चौड़ी सड़कें और शांत माहौल अब पूरी तरह उन नजरों के सामने था.
"चलो प्रिया,
तुम्हारा आज का काम तो अच्छे से मुकम्मल हो गया," आकाश ने गहरी साँस लेते हुए मुस्कुराकर कहा. "अब बताओ, इस खूबसूरत फोर्ट एरिया को एक्सप्लोर करने का तुम्हारा क्या प्लान है?
प्रिया ने अपने बैग को कंधे पर सँभाला और आकाश की ओर देखकर आत्मीयता से मुस्कुरा दी.
... क्रमशः
बुधवार, 20 जुलाई 2011
पेट का दर्द
मंगलवार, 28 जून 2011
"शाबास बेटी, तुमने ठीक किया"
वह ग्यारह वर्ष से जीएनएम यानी सामान्य नर्सिंग और दाई का काम कर रही है। ग्यारह साल कम नहीं होते एक ही काम करते हुए। इतना अनुभव हो जाता है कि कोई भी अधिक जटिलता के काम कर सकता है। वह भी चाहती है कि उसे भी अधिक जटिल काम मिलें, नौकरी में उस की पदोन्नति हो। पर इस के लिए जरूरी है कि वह कुछ परीक्षाएँ और उत्तीर्ण करे। उस ने प्रशिक्षण में दाखिला ले लिया। साल भर पढ़ाई की। जब परीक्षा हुई तो परीक्षक की निगाहें उस पर गड़ गईं। उस के काम में कोई कमी नहीं लेकिन फिर भी ... परीक्षक ने कहा पास नहीं हो सकोगी। होना चाहती हो तो कुछ देना पड़ेगा। उसे अजीब सा लगा, उस ने कोई उत्तर नहीं दिया। परिणाम आया तो वह अनुत्तीर्ण हो गई। फिर एक साल पढ़ाई, फिर परीक्षा और परिणाम की प्रतीक्षा ...
इस बार वही परीक्षक ट्रेनिंग सेंटर के आचार्य की पीठ पर विराजमान था, कामचलाऊ ही सही, पर पीठ तो आचार्य की थी। उस ने सविता को देखा तो पूछा
-तुम पिछले साल उत्तीर्ण नहीं हुई? उस ने उत्तर दिया
-कहाँ सर? आप ने मदद ही नहीं की।
-मैं ने तो तुम्हें उपाय बताया था।
-नहीं सर! वह मैं नहीं कर सकती। हाँ कुछ धन दे सकती हूँ।
-सोच लो, धन से काम न चलेगा।
-सोचूंगी।
कह कर वह चली आई। सोचती रही क्या किया जाए। आखिर उस ने सोच ही लिया। वह फिर आचार्य के पास पहुँची, कहा
-सर ठीक है जो आप कहते हैं मैं उस के लिए तैयार हूँ। पर मेरी दो साथिनें और हैं, उन की भी मदद करनी होगी। वे दो दो हजार देने को तैयार हैं। आचार्य तैयार हो गए। सविता को चौराहे पर मिलने के लिए कहा।
सविता चौराहे तक पहुँची ही थी कि स्कूटर का हॉर्न बजा। आचार्य मुस्कुराते हुए स्कूटर लिए खड़े थे। वह पीछे बैठ गई। स्कूटर नगर के बाहर की एक बस्ती की ओर मुड़ा तो सविता पूछ बैठी।
-इधर कहाँ? सर!
-वह तुम्हारी अधीक्षिका थी न? वह आज कल दूसरे शहर में तैनात है उस के घर की चाबियाँ मेरे पास हैं, वहीं जा रहे हैं। क्या तुम्हें वहाँ कोई आपत्ति तो नहीं?
-ठीक है सर! वहाँ मुझे कोई जानता भी नहीं।
कुछ देर में स्कूटर घर के सामने रुका। आचार्य ने ताला खोला अंदर प्रवेश किया। कमरा खोल कर सविता को बिठाया। सविता ने अपने ब्लाउज से पर्स निकाल कर चार हजार आचार्य को पकड़ा दिए।
-तुम बैठो! तुम बाहर का दरवाजा खुला छोड़ आई हो, मैं बंद कर आता हूँ।
आचार्य कमरे से निकल गया। सविता के पूरे शरीर में कँपकँपी सी आ गई। उसे लगा जैसे कुछ ही देर में उसे बुखार आ जाएगा। लेकिन तभी ..
आचार्य मुख्य द्वार बंद कर रहा था कि कुछ लोगों ने बाहर से दरवाजे को धक्का दिया। वह हड़बड़ा गया। उसे दो लोगों ने पकड़ लिया। अंदर कमरे में जहाँ सविता थी ले आए। इतने सारे लोगों को देख सविता की कँपकँपी बन्द हुई। आचार्य के पास से नोट बरामद कर लिए गए। उन्हें धोया तो रंग छूटने लगा। आचार्य के हाथों में भी रंग था।
सविता को फिर से कँपकँपी छूटने लगी थी। वह सोच रही थी, जब उस के पति और ससुराल वालों को पता लगेगा तो क्या सोचेंगे? उन का व्यवहार उस के प्रति बदल तो नहीं जाएगा? उस के और रिश्तेदार क्या कहेंगे? क्या उस का जीवन बदल तो नहीं जाएगा? और उस के परीक्षा परिणाम का क्या होगा? सोचते सोचते अचानक उस ने दृढ़ता धारण कर ली। अब कोई कुछ भी सोचे, कुछ भी परिणाम हो। उस ने वही किया जो उचित था और उसे करना चाहिए था। वह सारे परिणामों का मुकाबला करेगी। कम से कम कोई तो होगा जो यह कहेगा "शाबास बेटी, तुमने ठीक किया"।
आचार्य जी, जेल में हैं। पुलिस ने उन की जमानत नहीं ली। अदालत भी कम से कम कुछ दिन उन की जमानत नहीं लेगी। अच्छा तो तब हो जब उन की जमानत तब तक न ली जाए जब तक मुकदमे का निर्णय न हो जाए।
शुक्रवार, 27 मई 2011
देव विसर्जन .................... डाक्टर देवता-5
अब मुझे पता था कि दवाइयाँ क्या क्या असर दिखा सकती है? मैं सतर्क था, उन के असर से मुकाबला करते हुए आनंद ले सकता था। इन दवाओँ का असर यह तो हुआ था कि शरीर में किसी तरह का कोई दर्द नहीं था और हाथ में करंट का दौरा भी कम हो गया था। दिन में एक दो बार ही उस का सामना करना पड़ रहा था। मैं हाथ की स्थिति बदल कर उसे भगा सकता था। अदालत के गंभीर काम मैं ने दवाओं के चलते रहने तक के लिए मुल्तवी कर दिये थे। दो बजे घर पहुँच कर भोजन किया और बिना दफ्तर में घुसे बिस्तर पकड़ कर सो लिया। शाम नींद खुली तो मैं तरोताजा था। इसी तरह रात का भोजन करने के बाद मैं जल्दी ही बिस्तर पर पहुँच गया था। इस तरह दिनचर्या काबू में आ गई थी। यह आनंद शेष चार दिन तक चलता रहा। आठ दिनों में सारी दवाइयाँ मैं ले चुका था। लेकिन तीन के स्थान पर दो खुराक कर देने के कारण भोजन के साथ खाई जाने वाली एक-एक गोली बच गई थीं। मैं ने उन्हें सुबह नाश्ते के साथ नहीं लिया। मैं जानना चाहता था कि दवा समय से न लेने से क्या हो सकता है। नौ बजे अदालत पहुँचा तो सिर भारी होना आरंभ हो गया।
कुछ देर में सिर दर्द आरंभ हो गया। गर्मी वैसे ही बहुत अधिक थी, पसीना छूटने लगा। सहायक ने बोला कि शीला के मुकदमे में गवाह आया है, जिरह करनी है। अदालत दो बार बुलवा चुकी है। मैं अदालत तक गया लेकिन जज चाय के लिए उठ चुके थे। मैं भी चाय के लिए रवाना हो गया। कैंटीन पहुँचते ही मुरारी ने पूछा -दवाइयाँ खत्म हुई या नहीं?
-एक-एक गोली बची है और अभी ले कर नहीं आया हूँ। दोपहर के लिए रख छोड़ी हैं। पर सिर दर्द हो रहा है। मैं ने बताया।
-हाँ बाबू! ये हैंगोवर है। तुम नहीं जानते, कभी पी नहीं ना, इसलिए अब जान लो। अब ये सिर्फ फिर पीने से मिटता है।
-इसीलिए एक-एक गोली छोड़ दी है। मुरारी हँसने लगा। चाय के बाद पान की दुकान तक वह चूहल करता रहा। मैं वापस अदालत पहुँचा। लेकिन स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं गवाह से जिरह कर सकता। मैं ने विपक्षी वकील को बताया तो वह तारीख बदलवाने को तैयार हो गया। वह तो मुकदमे में वैसे ही देरी करना चाहता था और उसे इस का अवसर मिल रहा था। मुझे कुछ अपराध बोध हुआ। लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकता था। जैसे-तैसे दोपहर तक काम निपटाया। फिर मिस्टर पॉल मिल गए। मैं ने उन्हें बताया कि उन के बताए डाक्टर की दवाइयाँ खत्म हो गई हैं। घर पहुँच कर भोजन किया बची हुई आखिरी गोलियाँ लीं। दस मिनट बाद मैं नींद निकाल रहा था। शाम ठीक ठाक गुजरी। रात को नींद भी ठीक आई।
दसवें दिन मैं ठीक था। मुझे गोलियों से मुक्ति मिल गई थी। डाक्टर ने दवाइयाँ खत्म होने के बाद मिलने को कहा था। पर मेरा मन उस डाक्टर के पास फिर से जाने का नहीं था। पूरी दंत पंक्ति में हलका सा दर्द रहने लगा है। दोपहर तक पैर में जहाँ चोट लगी थी दर्द आरंभ हो गया। घर पहुँचा तो यह दर्द तेज हो गया। मुझे लगा कि अब तक चल रही दर्द निवारक दवाओं से वह रुका हुआ था। अब जोर मार रहा है। शाम तक लगने लगा कि कहीं वाकई कोई फ्रेक्चर तो नहीं है। अब शायद किसी हड्डी डाक्टर के यहाँ जाना पड़े। दूसरे दिन सुबह उठा तो पैर ठीक था लेकिन थोड़ा चलने फिरने में ही फिर दर्द करने लगा। ऐसा कि मैं लंगड़ाने लगा। बर्दाश्त नहीं हुआ तो नवानी को फोन किया। वह अभी बाहर ही था। मैं ने उसे सारी बात बताई, तो कहने लगा कोई फ्रेक्चर-व्रेक्चर नहीं है। कोई पेशी फट गयी है, घर जाकर बर्फ से सेको। घर आ कर बर्फ से सिकाई की तो दर्द में कमी आई। लेकिन शाम को फिर दर्द होने लगा। मैं ने फिर बर्फ सिकाई कर डाली। दो दिन की सिकाई के बाद लगने लगा कि अब पैर ठीक है। तभी पत्नी कहने लगी कि उस के पैर दर्द कर रहे हैं। मैं ने कहा आप की केल्सियम की गोलियाँ हैं कि खत्म हो गई हैं। उन्हें तो खत्म हुए महिने से ऊपर हो गया है।
-तो तुमने बताया नहीं, मैं ले आता। -मैं ने कहा था, पर आप को तो अपने दर्द के मारे फुरसत नहीं है। मुझे याद नहीं आ रहा था कि उस ने कब मुझे कैल्सियम की गोलियाँ खत्म होने के बारे में बताया था। मैंने पत्नी से वायदा किया कि कल अवश्य ले आउंगा। अगले दिन मैं कैल्सियम की गोलियाँ शैल कॉल खरीद रहा था तो मुझे ध्यान आया कि मुझे भी मल्टी विटामिन लिये कई महिने हो गए हैं। मैं ने अपने लिए भी न्यूरोबिअन फोर्ट खरीद लीं। नवानी को बताया तो उस ने कहा कि आप ये गोलियाँ कम से कम एक माह ले लो। मैं दो दिन में पहुँच रहा हूँ। फिर डाक्टर नवीन से मिलने चलते हैं। वह मेरा मित्र है। उसी से बात करेंगे। मैं सोच रहा था, उस देवता डाक्टर से यह मित्र डाक्टर ठीक है। इस से मिलने चला जा सकता है। डाक्टर देवता का यहीँ विसर्जन कर दिया जाए तो ठीक है। अब यदि कभी उस से मिलना होगा तो तभी मिलेंगे जब वह विटनेस बॉक्स में खड़ा होगा और मुझे उस से जिरह करनी होगी।






