@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: मौन संकल्प

शनिवार, 13 जून 2026

मौन संकल्प

देहरी के पार, कड़ी - 66
मुंबई की सुबह हल्की धुंध में लिपटी थी. खिड़की से आती रोशनी ने कमरे की दीवारों पर सुनहरी परछाइयाँ बना दी थीं. प्रिया ने चाय का कप हाथ में लिया और बालकनी में आ खड़ी हुई. नीचे सड़क पर मजदूरों का एक छोटा समूह अपने औज़ारों के साथ जा रहा था — वही चेहरे, वही गति, वही उम्मीद.

उसके भीतर कुछ हिलने लगा. कल आकाश और मयंक के साथ बिताई वह सहज, हँसती हुई शाम अब किसी दूर के सपने जैसी लग रही थी. उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था, ‘क्या मैं उस राह पर चल सकती हूँ जहाँ प्रेम और संघर्ष दोनों साथ हों?’

प्रशांत बाबू का पार्टी की सदस्यता के लिए प्रस्ताव ने उसके मस्तिष्क में स्थान बना लिया था. हवा में नमक और धुएँ की मिली-जुली गंध थी. शहर जाग रहा था, और उसके भीतर भी कुछ जाग रहा था — एक निर्णय, जो शायद उसके जीवन की दिशा तय करेगा.

उसने धीरे से खुद से कहा, “हर चौराहा एक नई राह देता है... बस हिम्मत चाहिए उसे चुनने की.” कप की आखिरी चुस्की लेकर वापस हॉल में आ गई. अभी तक सो रहे मयंक को जगाया. “उठ भाई, निपट ले. नौ बजे आकाश टैक्सी लेकर पहुँच जाएगा, तब तक निपटकर तैयार रहना है.

आकाश सुबह टैक्सी लेकर अंधेरी पहुँचा तो सवा नौ हो रहे थे. प्रिया, मयंक और आकाश—सीधे गेटवे ऑफ इंडिया के लिए निकल पड़े. मयंक के लिए मुंबई की यह पहली सुबह कौतूहल से भरी थी. आकाश ने महाराष्ट्र पर्यटन (MTDC) की टूरिस्ट बस' मुंबई दर्शन' के टिकट पहले से ही बुक करवा लिए थे.

मयंक बस की खुली छत (Open Deck) वाली सीट पर बैठने के लिए बच्चों की तरह उत्साहित था. बस जैसे ही कोलाबा की विक्टोरियन इमारतों, मरीन ड्राइव के घुमावदार रास्तों और फोर्ट के ऐतिहासिक रास्तों से गुज़रने लगी, बस का गाइड हाथ में माइक सँभाले लाउडस्पीकर पर हर एक इमारत, राजाबाई क्लॉक टॉवर और इस महानगर के बनने का जीवंत इतिहास सुनाने लगा. आकाश और मयंक, दोनों ही इस शहर के लिए नए मुसाफिर थे, इसलिए वे बिना किसी औपचारिकता के एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाए गाइड की बातों को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे.

दोपहर में अपने ठहराव के दौरान बस कोलाबा में रुकी. सामने वही पुराना, धीमे संगीत वाला ईरानी कैफे था. वे उसमें दाखिल हो गए. बन-मस्का और कड़क ईरानी चाय का स्वाद लेते हुए, मयंक अपनी पारखी और शरारती नज़रों से चुपचाप अपनी दीदी और आकाश को नोटिस कर रहा था. उसने देखा कि जब भी गाइड ने रास्ते में मुंबई की किसी ऐतिहासिक मज़दूर चाल या गिरणी कामगारों के पुराने आंदोलनों का ज़िक्र करता था, तो प्रिया की आँखें चमक उठी थीं. और ठीक उसी पल, आकाश किस तरह अपनी सारी दुनिया भूलकर प्रिया के उस बदलते, प्रखर चेहरे को अगाध आदर और मौन प्रेम से निहार रहा था. मयंक अपनी दीदी को समझता था; वह भाँप गया कि उन दोनों के बीच अब केवल पुरानी कलीग वाली औपचारिकता नहीं रह गई थी. वे गहराई के साथ एक दूसरे से जुड़े महसूस हो रहे थे, उनमें आपस में गहरा प्रेम चुपचाप अपनी जड़ें जमाने लगा था.

शाम को बस का सफर खत्म हुआ. तीनों नरीमन पॉइंट पर समंदर के किनारे पत्थरों पर आकर बैठ गए. समंदर की ठंडी हवा के झोंके उनके चेहरों को छू रहे थे. मयंक पानी की बोतलें और कुछ स्नैक्स लेने के लिए थोड़ी दूर बनी एक दुकान की तरफ चला गया. आकाश और प्रिया वहीं बैठे रहे.

प्रिया एकटक समंदर की उठती-गिरती लहरों को देख रही थी. उसके चेहरे पर ढलते सूरज की मद्धिम लालिमा बिखर गई थी. आकाश ने उसकी ओर देखा. उसके भीतर पिछले कुछ दिनों से एक अजीब सी छटपटाहट चल रही थी. प्रिया जिस तेज़ी से खुद को बदल रही थी, मज़दूरों के हक की लड़ाइयों और उसके अध्ययन के वैचारिक धरातल पर उसका जो व्यक्तित्व पनप रहा था, उसे देखकर आकाश के मन में एक अनकहा संशय पैदा होता था. वह सोच रहा था कि वह एक सीधा-सादा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, अपने और परिवार का जीवन चलाने के लिए दिनभर काम करता है, शाम को थककर निढाल हो जाता है. सुबह जब थकान उतरती है तो फिर से तैयार होकर काम में जुट जाता है. उसे अपने घर-परिवार से इतर देखने की फुरसत तक नहीं, वहीं प्रिया, वह बिलकुल उसका जैसा काम करते हुए भी खुद को कैसे मेहनतकशों के संघर्षों में पूरी ऊर्जा के साथ योगदान करती है. ऐसा लगता है उसने अपना जीवन चलाने के सिवा वर्गोत्थान को अपना लक्ष्य बना लिया है. वह खुद को इस योग्य कैसे बनाए कि प्रिया जैसी अद्भुत लड़की का जीवनसाथी बन सके? उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कुछ ठोस तो करना होगा. कुछ ऐसा जिससे वह कम से कम प्रिया के वैचारिक आधार को समझ सके. आकाश को फिलहाल इतना भी साहस नहीं हो पा रहा था कि वह अपने इस डर को प्रिया के सामने रख सके, इसलिए उसने कुछ नहीं कहा, बस मौन बैठा उसे निहारता रहा. लेकिन समंदर की लहरों की गूँज के बीच उसके भीतर खुद को बदलने का एक 'मौन संकल्प' आकार लेने लगा था.

प्रिया ने मुस्कुराकर आकाश की तरफ देखा. उसकी आँखों में आकाश के लिए निश्चल प्रेम था. वह केवल आकाश को नहीं चाहती थी, वह उसके उस सीधे-सादे और आत्मीय परिवार को भी उतना ही चाहती थी, जिसने मुसीबत के दिनों में जयपुर में उसे अपनी बेटी समझकर सँभाला था. उस सादगी से बड़ा कोई व्यक्तित्व नहीं होता. दोनों के बीच बिना कुछ कहे भी एक गहरी, आत्मीय खामोशी पसरी रही.

अगले दिन, रविवार की सुबह बेहद अलसाई हुई थी. मयंक अभी भी कारपेट पर बिछे बिस्तर पर गहरी नींद में सोया हुआ था. प्रिया ने रसोई में जाकर चाय बनाई और अपना लैपटॉप स्टार्ट किया. कल रात ही फोर्ट के एडवोकेट रमेश चव्हाण ने 'स्टेटमेंट ऑफ क्लेम' के फाइनल ड्राफ्ट को हरी झंडी दे दी थी, और प्रशांत बाबू ने उसका फाइनल मसौदा प्रिया को ई-मेल कर दिया था और साथ में एक छोटी सी टिप्पणी थी, ‘इसे एक बार देख लेना.’ मंगलवार 18 जून, को यूनियन को इसे इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में पेश करना था. जिसमें उसकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी. लेकिन इस पूरे मामले की रीढ़ वही सांख्यिकीय सर्वे और डेटा था जिसे तैयार करने में प्रिया की भूमिका थी. शायद इसीलिए यह फाइनल ड्राफ्ट उसे भेजा गया था. वह लैपटॉप की स्क्रीन पर निगाहें जमाए स्टेटमेंट ऑफ क्लेम को शब्द-दर-शब्द पढ़ने लगी.

जैसे-जैसे वह उसे पढ़ती जा रही थीं, उसे ईसीआई फैक्ट्री के मज़दूरों के उस पूरे इतिहास, उनकी दशा, उनके जमीनी और कानूनी संघर्षों की थाह मिल रही थी. अनेक तथ्य ऐसे निकलकर आए थे जिनकी उसे जानकारी नहीं थी. वह समझ रही थी कि संगठित कामगारों का जीवन भी कितना संघर्षमय होता है, कैसे उन्हें उनके कानूनी हक देने में भी पूंजीपति को बहुत जोर आता है. बाजार भावों के उतार-चढ़ाव को तो वह किसी तरह सहन कर जाता है लेकिन अपने एम्पलॉई को एक रुपया भी अधिक देने में वह प्राणांतक दर्द महसूस करने लगता है, जैसे ही उसे लगता है इस उद्योग से दूसरा उद्योग बेहतर मुनाफा देगा, तो वह उस उद्योग में काम कर रहे सैंकड़ों-हजारों कर्मचारियों को बेरोजगार छोड़ अपना नया उद्यम सजाने लगता है. सीनियर वकील चव्हाण साहब के निर्देशन में सहायकों ने जो मसौदा तैयार किया था उसमें मज़दूरों का छिपा हुआ दर्द बखूबी स्पष्ट दिखाई देता था. सांख्यिकीय रिपोर्ट का कोई महत्वपूर्ण तथ्य ऐसा नहीं था जो छूट गया हो. यह दस्तावेज अब कोर्ट के रिकॉर्ड पर जाने के लिए तैयार था. वह जानती थी कि इस स्टेटमेंट ऑफ क्लेम के तथ्यों को साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज वे जुटा चुके हैं उन्हें प्रमाणित करने को यूनियन पदाधिकारियों और मजदूरों के बयान पर्याप्त होंगे. उसने ई-मेल का उत्तर देते हुए केवल एक वाक्य लिखा, ‘ऑल करेक्ट एण्ड सफिशियंट’ और सेंड पर क्लिक कर दिया.

प्रिया ने चाय का मग होंठों से लगाया और खिड़की से बाहर देखा, मुंबई की सुबह धीरे-धीरे जवान हो रही थी. उसने अंदर देखा, मयंक अभी भी गहरी नींद में था. शायद कल की थकान उसके लिए स्वाभाविक नहीं थी. सोमवार से उसे फिर से काम पर जाना था. उसके पास बस आज का दिन था जब वह मयंक को कुछ मुंबई घुमा सकती थी और उसे इतना निर्देशित कर सकती थी कि आने वाले सप्ताह के पहले पाँच दिनों में वह अकेले भी मुंबई की थाह ले सके.
... क्रमशः

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