@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: लहरों के बीच

शुक्रवार, 19 जून 2026

लहरों के बीच

देहरी के पार, कड़ी - 69
शुक्रवार रात घर लौटते वक्त ऑटो स्टैंड पर बब्बन भाई अपना ऑटो लिए मिल गए. “नमस्ते दीदी, घर चलना है?”

“हाँ, घर ही चलना है.” उसने ऑटो में बैठते हुए कहा.

“मीटिंग रविवार शाम छह बजे यूनियन ऑफिस में ही है. आपको आना ही है. हमारे ड्राइवरों का हौसला बढ़ जाएगा.” बब्बन भाई ने फिर आग्रह किया.

“बब्बन भाई, आपको पता ही है, मयंक यहीं है. वह बस एक-दो सप्ताह और रुकेगा. उसके साथ रहने या घूमने को बस शनिवार रविवार ही मिलते हैं. कल भी एलिफेंटा जा रहे हैं. परसों का पता नहीं.” प्रिया ने मना तो नहीं किया. लेकिन उसने आने का वादा भी नहीं किया.

“मयंक भैया अभी घर ही होंगे तो उनसे मैं बात कर लूंगा. आप उन्हें भी साथ ले आना.” बब्बन भाई ने अपना आग्रह नहीं छोड़ा.

“हो सकता है घर मिल जाए, वह रोज घूमने निकलता है और मेरे घर लौटने के वक्त ही लौटता है. वह शायद ही वहाँ मिले.”

“आप उनका फोन नंबर दे देना, मैं फौरन ही बात कर लूंगा.”

सोसायटी के गेट पर ऑटो रुका, प्रिया उतरी तो मयंक उसे गेट पर ही दिखाई दिया. उसने मीटर देखकर बब्बन भाई को भाड़ा देते हुए कहा, “मयंक भी यहीं है.”

तब तक मयंक भी निकट आ चुका था. बब्बन भाई भी ऑटो से उतर कर नीचे आ चुके थे.

“मयंक भैया, नमस्ते. पहचाना मुझे?”

“अरे, बब्बन भाई, आप?”

“अब पहचान तो लिया ही है आपने. परसों शाम यूनियन ऑफिस में हमारी यूनियन की मीटिंग है. प्रिया दीदी आएंगी, आप भी आइए. इस बहाने यूनियन ऑफिस देख लेंगे. वहाँ अच्छी लाइब्रेरी है और आप हमारे ऑटो ड्राइवरों से भी मिल लेंगे.”

अब मयंक उनसे क्या कहता, उसने कहा, “दीदी आईं तो मैं भी जरूर आऊंगा.”

“फिर ठीक है मैं चलता हूँ, परसों मिलते हैं.” इतना कहकर बब्बन भाई ऑटो में बैठ चल दिए.
...

शनिवार की सुबह मुंबई के मिज़ाज के हिसाब से बहुत सुहानी थी. समंदर की तरफ से आ रही हवाओं में एक हल्की सी ठंडक थी जिनके कारण जून की उमस दबी हुई थी. तय कार्यक्रम के अनुसार, आकाश सुबह टैक्सी लेकर प्रिया की सोसायटी आ गया था. पौने नौ बजे तीनों गेटवे ऑफ इंडिया की जेटी (घाट) पर इकट्ठा हो चुके थे. आकाश ने वादे के मुताबिक एलीफेंटा जाने वाली लॉन्च (बोट) के टिकट पहले से ही खरीद रखे थे. प्रिया ने आकाश को कहला तो दिया था कि बाकी व्यवस्था करना उसके बस का नहीं फिर भी उसने सुबह जल्दी उठकर तीनों के लिए लंच बना लिया था. पानी की बोतलें और कुछ हल्के स्नैक्स आकाश अपने बैग में साथ लेता आया था.

गेटवे ऑफ इंडिया का विशाल द्वार और उसके ठीक सामने खड़े भव्य ताज होटल को देखते हुए मंयक ने कहा, “क्या दृश्य है? इस भव्य निर्माण में कितने मैन-डेज लगे होंगे? तब तो निर्माण के लिए इतनी बड़ी मशीनें भी नहीं थीं.”

“मयंक, इसकी परिकल्पना 1911 में तब की गई जब ब्रिटिश सम्राट राजा-सम्राट जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी पहली बार भारत आए. तब सम्राट को एक कार्डबोर्ड का दरवाजा बनाकर बधाई दी गयी थी. 1913 में इसकी आधार शिला रखी गई और 1914 में इसकी डिजाइन तैयार हुई. पहले यहाँ स्थानीय मछुआरों की जेटी थी. 1915 और 1919 के बीच यहाँ समुद्री दीवार का निर्माण करके यह जमीन तैयार हुई जिस पर इसे बनाया जाना था. इसकी नींव 1920 में पूरी हुई जबकि निर्माण 1924 में पूरा हुआ.” प्रिया ने गेटवे का इतिहास बता दिया.

“दीदी, तुम्हें यह सब कैसे याद रह जाता है?” मयंक ने विस्मय से पूछा.

“कुछ नहीं. कल रात सोने से पहले वेब पर एलीफेंटा के बारे में खोज रही थी, तभी इसका इतिहास भी देखा. अब रात का पढ़ा सुबह तक याद न रहे तो किसी परीक्षा में पास होना मुश्किल हो जाए. हमें तो वैसे भी हजारों कोड्स याद रखने पड़ते हैं तो आदत हो गई है.”

“मतलब अब आप एलीफेंटा में भी वहाँ का इतिहास बताती चलेंगी?”

“हाँ, क्यों नहीं?” प्रिया ने मुस्कुराकर उत्तर दिया.

“अब इससे बढ़िया कुछ नहीं है. जब भी किसी ऐतिहासिक स्थान घूमने जाओ, प्रिया को साथ लेते जाओ. गाइड के पैसे बच जाएंगे.” आकाश ने मजाक में कहा. प्रिया और मयंक ठहाका लगाकर हँस पड़े.

पहली बोट लग चुकी थी. वे उसकी ऊपरी मंजिल (Upper Deck) पर जाकर बैठ गए, जहाँ से समंदर का नज़ारा बिल्कुल खुला हुआ था. बोट ने एक लंबा हॉर्न बजाया और जेटी छोड़कर गहरे पानी की तरफ बढ़ी, जेट इंजनों की आवाज़ के साथ लहरों पर उसका डोलना मयंक के भीतर एक रोमांच भर गया. धीरे-धीरे गेटवे ऑफ इंडिया और मुंबई की गगनचुंबी इमारतों का कोलाहल पीछे छूटने लगा और चारों तरफ नीले पानी का विस्तार फैलने लगा.

मयंक कौतूहल से कभी समंदर में लंगर डाले खड़े बड़े-बड़े माल-वाहक जहाजों को देखता, तो कभी भारतीय नौसेना के युद्धपोतों को. आकाश मयंक के पास ही खड़ा होकर उसे मर्चेंट नेवी और उन जहाजों के काम करने के तरीकों के बारे में कुछ बुनियादी बातें बहुत सरल भाषा में समझा रहा था. मयंक उसकी बातों को बहुत ध्यान से सुन रहा था. साथ ही सोच रहा था कि जानकारी में आकाश भी कम नहीं है.

प्रिया उन दोनों से थोड़ी दूरी पर, रेलिंग के सहारे हाथ टिकाए खड़ी थी.  उसे तेज़ हवाओं से उड़ते बालों को संभालना पड़ रहा था. उसकी आँखें दूर उस क्षितिज को निहार रही थीं जहाँ समंदर और आसमान आपस में मिलते हुए लग रहे थे. वह सोच रही थी कि समंदर ऊपर से कितना शांत और एक-सा दिखता है, पर इसके भीतर एक विशाल जैविक संसार भी पलता है.

लगभग पौने घंटे के सफर के बाद बोट टापू की जेटी पर जाकर लगी. घाट से मुख्य पहाड़ियों की तलहटी तक जाने के लिए एक छोटी सी टॉय-ट्रेन उपलब्ध थी, जो मयंक को बहुत मज़ेदार लगी. ट्रेन से उतरकर जब गुफाओं तक पहुँचने वाली सीढ़ियों की चढ़ाई शुरू हुई, तो रास्तों के दोनों तरफ लगी स्थानीय हस्तशिल्प की दुकानें और पेड़ों पर उछल-कूद करते बंदरों ने मयंक का ध्यान पूरी तरह भटका दिया.

मयंक अब जानबूझकर कभी तस्वीरें खींचने के बहाने पीछे रह जाता, तो कभी दुकानों पर कुछ देखने के लिए रुक जाता. वह बहुत अच्छी तरह समझ रहा था कि उसकी दीदी और आकाश को इस अजनबी भीड़ के बीच कुछ पल का सहज एकांत मिलना कितना ज़रूरी है. उसके मन की इच्छा थी कि उन दोनों के बीच पनपता मौन प्रेम जल्दी ही अपनी ऊँचाई छूने लगे.

वे जैसे ही एलीफेंटा की मुख्य गुफा के विशाल पत्थर के प्रवेश द्वार से भीतर दाखिल हुए, बाहर की चिलचिलाती रोशनी एक रहस्यमयी और ठंडी खामोशी में बदल गई. सातवीं सदी के कारीगरों द्वारा ठोस चट्टानी पहाड़ियों को भीतर से काटकर बनाई गई वह विशाल मूर्तिकला और स्तंभ देखकर तीनों निःशब्द रह गए. गुफा के केंद्र में स्थित भगवान शिव की 'त्रिमूर्ति' के सामने खड़े होकर मयंक और प्रिया स्तब्ध थे.

आकाश कुछ दूरी पर खड़ा प्रिया के चेहरे को देख रहा था. मूर्तियों की प्राचीन भव्यता के बीच प्रिया के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और आदर का भाव था. आकाश के अंतर्मन में फिर वही विचार कौंधा—इतिहास गवाह है कि जो भी चीज़ें अमर और बड़ी होती हैं, चाहे वे पत्थरों को तराश कर बनाई गई ये अमर कलाकृतियाँ हों या समाज को बदलने वाले महान आंदोलन, वे रातों-रात नहीं बनते. उनके पीछे पीढ़ियों का कड़ा अनुशासन, अटूट धीरज और चट्टानों को काटने जैसा अथक परिश्रम होता है. प्रिया जिस वैचारिक धरातल पर खड़ी होकर दुनिया को देखती है, उसे समझने के लिए उसे खुद को भी इसी तरह दृढ़ और परिपक्व बनाना होगा. यह बात उसने प्रिया से कही नहीं, बस उसकी आँखों का संकल्प और गहरा हो गया.

पूरा टापू एक बार में घूमना संभव नहीं था. लेकिन वे सभी मुख्य स्थानों, खास तौर पर कैनन पहाड़ी पर गए. जहाँ एक बड़ी पुरानी तोप स्थापित थी और टापू के चारों ओर का समुद्र दिखाई देता था. वे स्तूप पहाड़ी पर भी गए जहाँ उन्होंने बौद्ध गुफाएँ देखीं. पूरे टापू पर अनेक संस्कृतियों के चिह्न बिखरे पड़े थे. टापू का पुराना नाम घरापुरी था. यहाँ ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में ही बौद्ध भिक्षुओं ने अपनी बस्ती बना ली थी.

केनन पहाड़ी पर ही उचित स्थान देखकर प्रिया ने अपने बैग से चादर निकालकर बिछा दी। वहीं उन्होंने दोपहर का लंच किया. शाम ढले वे वापस मुंबई लौटने वाली बोट में सवार हुए. लौटते समय डूबते सूरज की आखिरी किरणें अरब सागर के पानी पर बिखरकर उसे सुनहरा बना रही थीं.

बोट की रेलिंग के पास बैठे हुए मयंक ने एक लंबी सांस ली और बोला, "दीदी, आकाश भैया... आज का दिन सचमुच बहुत अद्भुत था. ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया में घूमकर लौट रहा हूँ."

प्रिया ने मयंक की ओर देखते हुए मुस्कुराकर कहा, "हाँ मयंक, मुंबई में जब भागदौड़ से मन थकने लगे, तो यह समंदर ही है जो इंसान को दोबारा सँभालता है."

आकाश ने प्रिया की तरफ देखा. समंदर की लहरों पर डोलती बोट अब वापस मुंबई के गेटवे की रोशनियों की तरफ बढ़ रही थी. आकाश ने महसूस किया कि प्रकृति और एकांत में प्रिया और मयंक के साथ बिताया खूबसूरत वीकेंड उसे हमेशा याद रहेगा.
... क्रमशः

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