@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: आत्मसंघर्ष

मंगलवार, 9 जून 2026

आत्मसंघर्ष

देहरी के पार, कड़ी - 63
ऑफिस से लौटकर प्रिया ने अपना पर्स मेज पर रखा, कपड़े बदले और बिस्तर पर ढेर हो गई. आज दिनभर बिना विश्राम के काम करना पड़ा था. लंच भी दस मिनट में अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही करना पड़ा. प्रोजेक्ट की डेडलाइन नजदीक थी, और उससे पहले के बहुत से छोटे-छोटे काम कतार में खड़े थे. लगातार कुर्सी पर बैठे रहने की एवज में शरीर को थकान और अकड़न दोनों बेमोल मिले थे. उसे भूख भी लगी थी लेकिन थकान उसे कुछ सोचने नहीं दे रही थी, खाना बनाए या ऑर्डर कर दे. उसने फैसला करने के पहले कुछ देर आराम करना उचित समझा. लेकिन कमबख्त दिमाग कब विराम लेता है?

कल शाम प्रशांत बाबू का अचानक उसे पार्टी सदस्य बनने का प्रस्ताव देना, उसके लिए पूरी तरह अप्रत्याशित था. उनका यह कहना और भी विचित्र था कि पार्टी के स्टेट सेक्रेटरी कॉमरेड कुलकर्णी ने खुद इसकी सिफारिश की है. मुंबई आने के बाद रामजी काका और प्रशांत बाबू से परिचय के बाद उनके साथियों की मदद से उसके मंगेतर विक्रांत के गिरफ्तार होने पर प्रिया का उससे पीछा छूटा था. बाद में उसे पता लगा था कि सभी मददगार साथी किसी न किसी ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता थे. प्रशांत बाबू खुद आईटी और टेक्निकल एम्पलॉइज की अखिल भारतीय एसोसिएशन के सेक्रेटरी थे. आईटी कर्मचारी होने के कारण वह और उसके तीन साथी भी इस एसोसिएशन के सदस्य बन गए थे. उन्हीं दिनों ईसीआई फैक्ट्री में आंदोलन शुरू हुआ तो उसने उसमें मदद करना अपना दायित्व समझा था. आंदोलन में अपनी भूमिका के कारण यह तो अपेक्षित था कि उसे अपनी यूनियन में कोई बड़ी जिम्मेदारी ऑफर की जाती, लेकिन पार्टी मेंबर बनने के प्रस्ताव की उसे बिलकुल अपेक्षा नहीं थी.


मजदूर वर्ग की वेनगार्ड पार्टी, एक कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता के बारे में उसकी जानकारी महज किताबी थी. जिस साल उसे सीनियर सेकेंडरी की परीक्षा देनी थी उसी साल वह ऋचा और उसकी दीदी के साथ दशहरा मेला घूमने गई थी. वहीं उन्होंने सोवियत पुस्तक प्रदर्शनी देखी. ऋचा की दीदी ने वहाँ से विश्व क्लासिक्स में से एक मैक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ खरीदा. उसे खुद भी कहानी उपन्यास पढ़ने का शौक था. उसने भी वह उपन्यास खरीद लिया. अगले शनिवार की रात सोने के पहले उसने वह उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो उसकी नींद काफूर हो गई. उपन्यास खत्म होने पर उसने घड़ी देखी तो रात के ढाई बजे थे. उस उपन्यास ने उसे इतना प्रभावित किया कि रविवार को जब पूरा परिवार मेला घूमने गया तो उसने गोर्की के जीवन के आरंभिक जीवन की कहानी कहने वाली तीन किताबें और एक कहानी संग्रह और खरीद लिया. जब बिल बनवाने के लिए उसने काउंटर पर किताबें रखीं तो अधेड़ सेल्समैन ने सिर उठाकर उसे देखा. “अभी दो-तीन दिन पहले आपने गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ खरीदा था न?” सेल्समैन ने पूछा.

“हाँ, खरीदा था.”

“आपको पसंद आया?”

“हाँ, मैं उसे एक बैठक में भी पढ़ गई थी. इसीलिए अब उसकी और पुस्तकें खरीद रही हूँ.”

सेल्समैन ने बिल बनाया, उसने मूल्य चुकाया. वह किताबों का बैग उठाकर चलने लगी तो सेल्समैन ने कहा, “रुकिए मैम, आप यह किताब मेरी ओर से ले जाइए.” उसने किताब ली और उसे देखा तो वह ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ का हिन्दी अनुवाद था. उसने उसे अपने बैग में रख लिया. उसने गोर्की की चारों किताबें जल्दी ही पढ़ लीं. सभी किताबों ने उसे बहुत कुछ सिखाया. उसने ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ भी पढ़ा, पर उसमें उसे अधिक कुछ समझ नहीं आया. सीनियर के साथ ही उसने प्री-इंजीनियरिंग टेस्ट भी दिया था, वह पहले ही प्रयत्न में चुनी गई और उसे कोटा के इंजीनियरिंग कॉलेज में कंप्यूटर साइंस एण्ड एप्लिकेशन ब्रांच मिल गई. अगले वर्ष मेले से उसने एक और प्रसिद्ध सोवियत उपन्यास ‘How the Steel Was Tempered’ का अनुवाद ‘अग्नि दीक्षा’ खरीदा. यह उसके लेखक निकोलोई आस्त्रोवस्की के खुद के जीवन पर आधारित था. इसके प्रकाशित होने के बाद उसके अनेक साथियों ने लिखा था कि उसने उपन्यास में अपने कारनामों को बहुत कम करके लिखा था.

इन दोनों पुस्तकों से उसे एक कम्युनिस्ट पार्टी क्या हो सकती है इसका अनुमान हुआ था. इन उपन्यासों के नायक पावेल व्लासोव और पावेल कोर्चागिन दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के आदर्श पात्र थे. उसके बाद भी उसने कुछ पुस्तकों में आदर्श कम्युनिस्ट चरित्रों को पढ़ा था. वे सभी उसे पसंद भी थे. वह उन जैसा बनने की सोचती भी थी. लेकिन जब कल उसे यह प्रस्ताव मिला तो उसे लगा कि उसके पास एक पार्टी मेंबर होने लायक न तो पर्याप्त योग्यता है और न ही फिलहाल उसमें इतना साहस है कि वह अपने जीवन में हमेशा मजदूर वर्ग के हितों को प्राथमिकता दे सके. नहीं, अभी वह मजदूर वर्ग की वैनगार्ड पार्टी की मेंबर बनने लायक नहीं है. उसके अंदर बहुत कमजोरियाँ हैं. वह कोशिश करेगी कि ये कमजोरियाँ दूर हों. लेकिन क्या वह इन्हें दूर कर सकेगी? वह इसी प्रश्न से जूझ रही थी.

उसे बिस्तर पर पड़े सोचते हुए बहुत देर हो गई थी. उसने अपनी आँखें खोलीं, घड़ी देखी, वह सवा नौ बजा रही थी. वह उठ बैठी. अब उसे भूख सता रही थी. खाने के लिए कुछ बनाने का मन नहीं था. उसने फोन उठाया और ऑनलाइन खाना ऑर्डर कर दिया.

अगले शनिवार शाम जब वह यूनियन लाइब्रेरी की पुस्तकें लौटाने और कुछ नई लेने यूनियन ऑफिस पहुँची तो प्रशांत बाबू से भेंट हो गई. ट्रिबुनल में ईसीआई के मुकदमे में स्टेटमेंट ऑफ क्लेम तैयार करने के सिलसिले में वे सुबह ही चव्हाण साहब के चैम्बर गए थे. उनके जूनियर ने प्रारंभिक ड्राफ्ट बना दिया था, वे एक बार जाँच भी चुके थे. उन्होंने यह ड्राफ्ट यूनियन सचिव शिंदे और प्रशांत बाबू को भी पढ़वा दिया था. शिंदे ने कुछ नए तथ्य और चव्हाण साहब को बताए थे. जिनमें से कुछ को क्लेम में सम्मिलित करने के लिए उन्होंने अपने जूनियर को निर्देश दे दिया था. वे कह रहे थे कि यदि कुलकर्णी जी का लंबा अनुभव है, यदि वे भी इसे एक बार देख लें तो बेहतर है. उनका कहना था कि 16 जून को हर हालत में स्टेटमेंट ऑफ क्लेम ट्रिबुनल में पेश करवा देंगे जिससे प्रबंधन समय न ले सके. शिंदे को हस्ताक्षर करने और पेश करने के लिए ट्रिब्यूनल जाना होगा. प्रशांत बाबू ने बताया कि चव्हाण साहब तुम्हें भी याद करते हे कह रहे थे, “हमारी टेम्परेरी जूनियर प्रिया कैसी है?”

अंत में प्रशांत बाबू ने उससे पूछ ही लिया, “प्रिया, तुमने पार्टी मेंबरशिप के बारे में क्या फैसला लिया?”

“नहीं सर, मैं अभी खुद को उस लायक नहीं समझती. मुझमें बहुत कमजोरियाँ हैं. मुझे उन पर काबू पाना होगा. क्या पता उसमें कितना समय लगेगा? यह भी पता नहीं कि मैं उन कमजोरियों पर कभी काबू भी कर पाऊंगी या नहीं?”

“कोई बात नहीं, तुम सोच लो. वैसे कमजोरियाँ किस में नहीं होतीं? तुम उन कमजोरियों से लड़ना चाहती हो, उन्हें दूर करना चाहती हो, इससे बेहतर क्या हो सकता है. यदि तुम उनसे निरंतर लड़ना चाहती हो तो तुम एक कम्युनिस्ट हो, तुम्हें पार्टी सदस्य बन जाना चाहिए.”

“आपकी बात सही हो सकती है. लेकिन मैं अपने बारे में अच्छी तरह जानती हूँ. मैं मेंबर बनने के लिए अपनी कमजोरियों से लड़ना चाहती हूँ, यदि मैंने मेंबरशिप ले ली तो हो सकता है मेरा अपना यह संघर्ष रुक जाए. मुझे सोचने के लिए अभी समय चाहिए. अभी रहने दें.” उसने कहा.

“ठीक है प्रिया, कोई बात नहीं. हम इस पर विस्तार से बात करेंगे. मैं किसी शाम तुमसे तुम्हारे घर मिलता हूँ.” प्रशांत बाबू ने कहा.

उसने लाइब्रेरी से नई किताबें लीं और लौट आई.
... क्रमशः

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