@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: अदृश्य धागे

गुरुवार, 18 जून 2026

अदृश्य धागे

देहरी के पार, कड़ी - 68
प्रिया की व्यस्तता कम नहीं हुई थी. प्रोजेक्ट डेडलाइन पर था. पूरी टीम उसी पर लगी हुई थी. रविवार रात ‘एमबी’ से डिनर करके लौटने के बाद उसने मयंक को बताया कि उसकी टीम को जून माह के अंत तक अपना प्रोजेक्ट पूरा करके टेस्टिंग भी कर लेना है. इस कारण से अब सप्ताहांत के सिवा वह अपने ऑफिस में व्यस्त रहेगी.

“आप चिन्ता क्यों करती हैं दीदी, अब मुझे पोस्ट ग्रेजुएट होने में बस रिजल्ट की ही तो देरी है. मैं खुद घूम सकता हूँ. कल से जब आप ऑफिस के लिए निकलेंगी, मैं भी निकल पड़ूंगा, और शाम को नौ बजे तक लौट आऊंगा. तब तक आप भी आ जाएंगी.” मयंक ने कहा.

“मैं जानती हूँ कि मेरा भाई दुनिया भर में अकेला घूम कर आ सकता है. लेकिन दोपहर के खाने का क्या करेगा?” प्रिया ने पूछा.

“दीदी, आप भी न, मुझे आदत कहाँ है दिन में खाने की. कोटा में तो सभी की यही आदत है. दिन में भूख लगती है तो वहाँ तो हर नुक्कड़ पर कचौरी मिल जाती है.”

“तुझे तीन दिन में ही कोटा की कचौरी की याद भी आने लगी. यहाँ तो कचौरी मिलने से रही.”

“तो क्या हुआ, वैसे भी कचौरी तो कोटा की शान है, यहाँ मिलेगी भी तो वैसा स्वाद कहाँ होगा. पर मुंबई में अपने स्नैक्स की कोई कमी थोड़े ही है. यहाँ कचौरी नहीं तो वड़ा पाव, पाव भाजी, बॉम्बे सैंडविच, सेव-पूरी और रगड़ा-पैटिस पता नहीं क्या-क्या हैं. रोज एक-एक भी ट्राई करूंगा तो हफ्ता तो कट ही जाएगा.” मयंक ने मजा लेते हुए कहा.

“वाह, क्या बात है, मयंक. ऐसा लगता है तू इन सब पर कोटा से ही रिसर्च करके चला है?”

“और नहीं तो क्या, मैं यहाँ अपनी दीदी को परेशान करने थोड़े ही आया हूँ.” मयंक ने प्रिया को चिढ़ाते हुए उत्तर दिया.

“अच्छा, अब ऐसा लगता है तुझे दीदी की चपत खाए बहुत दिन हो गए, तुझे वही चाहिए क्या.”

“अरे, दीदी, ऐसा मत करना. वरना मुझे बाकी दिन आपके फ्लैट के बजाय आकाश जी.. आकाश भैया के यहाँ बिताने पड़ेंगे.”

इस बार प्रिया ने आगे बढ़कर मयंक का बायाँ कान पकड़ लिया और डाँटने के स्वर में बोली, “तू क्या बोलना चाह रहा था?

“कुछ नहीं दीदी, बस मन की बात होंठों पर आने वाली थी कि फिर मैंने रोक ली.”

प्रिया ने मयंक का कान छोड़ दिया. “अच्छा तो यह बात है. तू मुझे गलत समझ रहा है, मयंक. आकाश को मैंने घर छोड़ने से पहले देखा तक नहीं था. वह कंपनी की प्रोपर्टी लेने कोटा आया था. तब मैं उसके साथ कार में जयपुर गई और दो दिन- तीन रात मुझे जयपुर में उसके घर रहना पड़ा. उसके बाद करीब दो-तीन सप्ताह से वह मुंबई में है. इसके अलावा हम कभी मिले तक नहीं. हमारे बीच कुछ नहीं है. हाँ इतना जरूर है कि वह योग्य व्यक्ति है. मुझे लगता भी है कि शायद वह मेरा अच्छा जीवन साथी हो सकता है. संभव है कि वह भी ऐसा ही सोचता हो. लेकिन यह इतनी आसान बात नहीं है. अभी हमारे बीच बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम दोनों को समझना पड़ेगा. यदि हमने अभी यह नहीं सोचा और उस पर खुल कर बात नहीं की, तो हो सकता है हमारा साथ होना दोनों के लिए परेशानी का सबब बन जाए.”

इतना कहकर प्रिया चुप हो गई. उसके चेहरे और आँखों में मयंक को उदासी की परत दिखाई दी. उसे लगा कि दीदी को कुछ चुभा है. यह सोचकर वह खुद भी उदास हो गया. कुछ देर सोचकर बोला, “दीदी, आपको बुरा लगा हो तो मैं माफी चाहता हूँ. कल और आज के दो दिनों में मुझे लगने लगा था कि आप दोनों साथ हो जाएँ तो सोने में सुहागा हो जाए. मम्मी-पापा ने आकाश को देखा है, जब वह काली कार घर के आसपास खड़ी कर कोई उनकी रेकी कर रहा था, वह कोटा आया था. उसी ने मम्मी पापा को हिम्मत दी थी. तभी से वे सोचते हैं कि आकाश आपके लिए अच्छा जीवन साथी हो सकता है. दोनों इस बारे में आपस में चर्चा भी कर चुके हैं. पर वे आपसे कुछ भी कहने से डरते हैं.” मयंक इतना कहकर चुप होकर प्रिया को देखता रहा.

“चल छोड़ इन बातों को अब सो जा. सुबह मुझे समय से ऑफिस जाना है और तू भी तो घूमने जाएगा. एक बात और, यहाँ आने के दिन तेरी मम्मी से बात हुई थी. उसके बाद तुमने मम्मी-पापा से बात भी की या नहीं?”

“मम्मी से तो रोज ही बात हो रही है, एक बार पापा से भी कर चुका हूँ.” मयंक ने बताया.

“चल ठीक है, अब तू सोने जा, मैं भी सोती हूँ. कल ऑफिस में बहुत काम रहेगा.” मयंक उठकर हॉल में सोने चला गया.

अगले दिन से दोनों का यह रूटीन हो गया. प्रिया सुबह साढ़े दस बजे ऑफिस के लिए निकलती और मयंक घूमने. वह रात को साढ़े आठ तक लौटती, मयंक उसके बाद पहुँचता.

गुरुवार आ चुका था.
...
मंगलवार, 18 जून 2019 को ईसीआई यूनियन के सचिव शिंदे और एडवोकेट रमेश चव्हाण का एक सहायक इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल पहुँचा. उन्होंने मुंसरिम को स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और उसे साबित करने के लिए सभी जरूरी दस्तावेज पेश किए. प्रबंधन की ओर से उनके विधि विभाग का एक सीनियर क्लर्क पहले से ही वहाँ मौजूद था. उसने स्टेटमेंट ऑफ क्लेम और दस्तावेजों की प्रतियाँ प्राप्त करके चला गया फैक्ट्री प्रबंधन को अपना लिखित जवाब (Written Statement) पेश करने के लिए महज दस दिन का समय देते हुए अगली तारीख 28 जून दे दी गई.
...
गुरुवार रात प्रिया ऑफिस से आकर फ्लैट का दरवाजा खोल ही रही थी कि मयंक भी आ गया. दोनों बैठकर चाय पी रहे थे. तभी आकाश की कॉल आ गई.

“हेलो प्रिया, कैसी हो? और मयंक के क्या हाल हैं?”

“मेरा तो तुम्हें पता है, मेरे प्रोजेक्ट की डेडलाइन 25 जून है. मुझे साँस कैसे आ सकती है.”

“हाँ, वह तो है. फिर मयंक क्या कर रहा है?”

“वह अकेले घूम रहा है. लोकल ट्रेन और बसें, पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम लिया है. पर मुंबई को समझने लगा है. महानगर का भय उसमें से जाता रहा. बेहतर है उसी से पूछो, फोन दे रही हूँ.” प्रिया ने फोन मयंक को थमा दिया.

“हाँ, आकाश भैया, मैं मयंक बोल रहा हूँ, आप कैसे हैं.”

“मैं ठीक हूँ मयंक. तुम्हारी बताओ तुम कहाँ-कहाँ घूम लिए हो?”

“कुछ अधिक नहीं, सुबह दीदी के साथ निकलता हूँ. अंधेरी स्टेशन से लोकल पकड़ता हूँ. जहाँ जमती है वहाँ निकल जाता हूँ. इतना जरूर है कि मैं मुंबई के लोगों को जानने लगा हूँ. यहाँ के ज्यादातर लोग सहयोग करते हैं. खाना-पीना सस्ता है.”

“वो तो है.” आकाश ने उससे सहमति जताई. “हाँ, शनिवार का क्या कार्यक्रम है?”

“अभी तक कुछ नहीं है. आप बताओ.”

“मैं सोचता हूँ, हम क्यों न शनिवार को एलीफेंटा केव्ज देखने चलें?”

“पर वे तो समंदर में किसी टापू पर हैं.”

“हाँ, टापू पर हैं. पर टापू अधिक दूर नहीं है. गेट-वे से सुबह नौ बजे से बोट लगती हैं, आधे घंटे में वहाँ पहुँचा देती हैं. इस बहाने थोड़ा बहुत समुद्र तुम अंदर से भी देख लोगे. और मुंबई के समुद्र का क्या हाल है यह भी देख लोगे. तुम्हें लंगर डाले बहुत से जहाज भी देखने को मिलेंगे.”

“तो फिर चलते हैं. पर दीदी चलेंगी तब है. बिना दीदी के चलने का तो कोई मतलब नहीं है.”

“तो तुम पूछो प्रिया से.”

“आप क्यों नहीं पूछते?”

“नहीं, तुम ही पूछो. मुझे अभी वह प्रोजेक्ट की डेडलाइन बता चुकी है. वही कहेगी तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं होगा.”

“फिर ठीक है. मैं फोन रखता हूँ.”

मयंक ने फोन काट कर प्रिया को देते हुए कहा, “आकाश भैया शनिवार को एलीफेंटा चलने की कह रहे हैं. लेकिन कह रहे हैं कि आप भी चलेंगी तो प्रोग्राम बना लेंगे.”

प्रिया कुछ पल के लिए सोच में पड़ गई कि आकाश ने ऐसा क्यों कहा? और उसने सीधे उससे क्यों नहीं कहा. फिर कुछ सोचकर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई. वह जानती थी कि आकाश उसके इन्कार से डर रहा है. उसने मयंक को कह दिया, “आकाश से कह दो चल चलेंगे. पर सारी तैयारी उसे ही करनी पड़ेगी. मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी.”

मयंक प्रिया की ‘हाँ’ सुनकर खुश हो गया और अपने फोन से आकाश को कॉल लगाने लगा.
... क्रमशः

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