@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: सीख

शुक्रवार, 26 जून 2026

सीख

देहरी के पार, कड़ी - 71
प्रिया और मयंक यूनियन ऑफिस से बाहर निकले, तब तक मुंबई की रात गहरा चुकी थी. ऑटो में बैठते ही मयंक ने एक लंबी और गहरी सांस ली. उसके चेहरे पर अपनी दीदी के लिए गर्व का एक ऐसा भाव था, जिसे वह छुपा नहीं पा रहा था.

"दीदी, मुझे तो आज पता लगा, आप तगड़ी वाली स्पीच भी देती हैं. मैं तो सुनकर दंग ही रह गया. मैंने आपको कभी इस रूप में नहीं सोचा था. मुंबई जैसे महानगर की सबसे बड़ी ऑटो चालक यूनियन की वर्किंग कमेटी को आप सहज होकर संबोधित कर रही थीं. उन्हें उनके अधिकारों का अहसास तो कराया ही, वे जिस संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए हैं उसे पूरी ताकत से चलाने के लिए उन्हें प्रेरित भी किया. दीदी, यह सब आपने कब सीख लिया?”

“कहीं नहीं सीखा, मयंक, इसे सीखने की जरूरत ही नहीं थी. आज जो भी मैंने कहा, वह सब मेरे अंदर से स्वतः ही निकल पड़ा था. जब हम किसी के साथ दिल से जुड़ते हैं, उनकी तकलीफों को समझने लगते हैं, तब यह भी पता लगता है कि इन तकलीफों का कारण क्या है? और इनसे निकलने का रास्ता क्या है? मैं इनमें से किसी को नहीं जानती थी. लेकिन विक्रांत के दखल से निपटने के दौरान इन सबने मेरी तकलीफ को समझा. मुझे बिना जाने मेरे साथ दिया और मुझे उस बड़े संकट से निकाला. उन सबने मेरे साथ एक रिश्ता कायम किया था. मैं उनकी ऋणी हो गई थी. इस ऋण को केवल तकलीफों में और उनसे निकलने की लड़ाई में एक दूसरे का साथ देकर ही चुकाया जा सकता था. असल में यह ऋण जैसी चीज भी नहीं थी. यह एक दूसरे के कामों को सम्मान से देखने, किसी मेहनत करने वाले को कमतर न समझने और उनके साथ मिलकर एक हो जाने की बात है.” प्रिया ने उसे समझाने की कोशिश की.

“दीदी, वह सब तो ठीक है, लेकिन तुम एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो. दिनभर ऑफिस में बैठकर काम करती हो, सालाना 30-35 लाख कमाती हो. ये ऑटो ड्राइवर सड़कों पर ऑटो चलाते हुए मुश्किल से पाँच-सात सौ रोज का कमाते होंगे. आपका और उनका साथ कैसे हो सकता है?”

“क्यों नहीं हो सकता? उनके और हमारे श्रम में क्या फर्क है? यही नहीं कि हमें अपने श्रम का मूल्य अधिक मिलता है और उन्हें बहुत कम. हम भी श्रम करते हैं और वे भी. दोनों के श्रम एक ही हैं. हमारा श्रम शारीरिक कम और बौद्धिक अधिक है, उनका शारीरिक अधिक, बौद्धिक कम. उन्हें अपने श्रम का मूल्य कम मिलता है और हमें अधिक. तो यह सब हमारे सिस्टम का दोष है, यह हमारे सिस्टम का अन्याय है. सभी को श्रम का इतना मूल्य तो मिलना ही चाहिए कि वह अपने परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन दे सके.”

“दीदी, मुझे कुछ ज्यादा समझ नहीं आया. आपकी और ऑटो ड्राइवरों की लड़ाई में क्या समानता हो सकती है?”

“है, समानता है. तुम्हें मेरे जीवन में तो नौकरी से संबंधित कोई संघर्ष ही नहीं दिखाई दिया होगा. पर है. हम यहाँ रोज ऑफिस जाते हैं, वहाँ जाने का समय तो निश्चित है, लेकिन लौटने का नहीं. यदि किसी दिन कोई काम उलझ पड़ा तो रात भर चलता रहता है और रात को ऑफिस में ही रुकना पड़ता है. जब मैं घर से काम कर रही थी तो तुमने नोट किया होगा कि महीने में कम से कम चार पाँच दिन ऐसे होते थे जब मेरा काम रात में कब पूरा हुआ, तुम्हें पता नहीं लगता था. सुबह तुम पूछते थे, ‘दीदी रात को कितने बजे सोई?’ कभी-कभी तो रात को मैं और मेरी टीम दो-तीन बजे रेस्ट पर जाते थे और सुबह अलार्म लगाकर पाँच बजे फिर उठते और काम पर लग जाते थे. क्या हमारे काम की यह स्थितियाँ वाजिब हैं? क्या अधिक वेतन पाने से हमारा रोज 8 घंटे से अधिक और सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम नहीं करने का अधिकार समाप्त हो जाता है? ”

“नहीं, बिल्कुल नहीं.” मयंक ने जवाब दिया.

“हमारे पास यह अधिकार है, लेकिन हमारी ओर से इसके विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा जाता. हमारे काम की शर्तें भी अमानवीय हैं. यदि हमारी कंपनी के पास किसी कारण से काम कम हो जाए, तो तुरंत हजारों लोगों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया जाता है. एक इंजीनियर जो रोज दस हजार से अधिक कमा रहा था, अगले ही दिन बेरोजगार हो जाता है. कुल मिलाकर हम भी उजरती मजदूर ही हैं. हम भी अपने श्रम को ही बेचते हैं, जैसे कारखानों के मजदूर, जैसे आटो ड्राइवर. हम सभी की लड़ाई एक ही है. हमारे ज्यादातर सॉफ्टवेयर इंजीनियर ऐसा नहीं समझते. लेकिन मैं समझ गई हूँ. मेरे कुछ और साथी भी समझ गए हैं. वे यूनियन के मेंबर बने हैं. वक्त के साथ बाकी भी समझ जाएंगे. हमें भले ही वेतन अच्छा मिलता हो, लेकिन हैसियत हमारी भी मजदूर जैसी ही है. एक दिन वक्त बाकी को भी सिखा देगा. कि वे क्या हैं. उस दिन वे भी यूनियन के मेंबर होंगे और अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे.”

ऑटो प्रिया की सोसायटी पहुँच गया था. प्रिया ने ऑटो को रुकने को कहा. आटो रुका तो दोनों नीचे उतरे. प्रिया भाड़ा देने के लिए मीटर देखकर अपने पर्स को खंगालने लगी. तभी ऑटो चालक बोल पड़ा.

“दीदी., भाड़ा रहने दो. आज आपने आपस में बातें करते हुए मुझे बहुत कुछ सिखा दिया. मुझे पता था जहाँ से आप बैठी थीं वहाँ यूनियन ऑफिस है और वहाँ आज ऑटो चालकों की यूनियन की मीटिंग थी. मैं अभी तक यूनियन का मेंबर नहीं बना हूँ. मुझे समझ ही नहीं आता था कि यूनियन का मेंबर क्यों होना चाहिए. पर जब आपकी बातें सुनी कि आप एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर होते हुए भी एक ऑटो ड्राइवर में और खुद में भेद नहीं समझतीं और दोनों की लड़ाई एक है तो समझ में आया कि यूनियन से ही हमारी ताकत बनती है. अब मैं कल ही यूनियन का मेंबर बनूंगा. आज का भाड़ा, मुझे यह सब सिखाने की फीस समझ लें. मैं भाड़ा नहीं लूंगा.”

“नहीं भैया, आटो में पेट्रोल, डीजल भी जलता है और तुम्हारी मेहनत भी है. भाड़ा तो आपको लेना होगा.” इतना कहते हुए प्रिया ने पचास रुपए का नोट निकालकर आटो चालक को पकड़ाते हुए बोली. “ भैया आप कल सुबह यूनियन ऑफिस जाकर मेंबरशिप लेंगे और आने वाले आंदोलन में साथ देंगे तो मेरी फीस मुझे मिलेगी. इस फीस की कोई कीमत नहीं है.”

“दीदी, ठीक है. मैं ले लेता हूँ. पर ये पचास का नोट मैं अपने मोबाइल कवर में लगाकर रखूंगा. ताकि आपसे मिलना मुझे हमेशा याद रहे.”

दोनों फ्लैट में पहुँचे तो मयंक कहने लगा, “दीदी आज मम्मी-पापा से बात करते हैं. न जाने क्यों पापा की तरफ से अब डर लगने लगा है. उनका स्वास्थ्य अब उतना बढ़िया नहीं रहता, फिर भी आढ़त का काम वे खुद देखते हैं. फैक्ट्री तो अब बंद होने जैसी है. बाजार में कोटा स्टोन का क्रेज खत्म हो गया है. इलाके में अच्छा पत्थर कम रह गया है. एक दिन पापा कह रहे थे कि कारखाना ग्राहक मिलते ही बेच देना चाहिए. फिर पॉलिश मशीनों की कौड़ियाँ भी नहीं मिलेंगी. पर मम्मी उन्हें मना कर देती हैं. कहती हैं, ‘आपने फैक्ट्री खड़ी की, आप ही बेच दोगे. कुछ तो बच्चों के लिए भी रहने दो.’ फिर पापा कहते हैं, ‘आढ़त है तो.’ फिर मम्मी शुरू हो जाती हैं ... ‘इस आढ़त में क्या रखा है, आप हैं तो आढ़त है…’ वगैरा वगैरा.”

“अच्छा, मैं चाय बना रही हूँ. एक-एक कप चाय पीते हैं, फिर खाने की तैयारी करेंगे. तब तक तू चाहे तो पापा से फोन पर बात कर ले.” प्रिया कहते हुए रसोई में चली गई.
... क्रमशः

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