@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: नए रिश्ते

शुक्रवार, 22 मई 2026

नए रिश्ते

देहरी के पार, कड़ी - 56
प्रॉपर्टी डीलर संदीप ने आकाश को सोमवार सुबह नौ बजे पवई के उस सुसज्जित फ्लैट वाली बिल्डिंग पर बुलाया था. आकाश वहाँ दस मिनट पहले ही पहुँचकर बिल्डिंग के रिसेप्शन पर संदीप का इंतज़ार करने लगा. संदीप करीब आधे घंटे बाद फ्लैट ओनर के साथ पहुँचा, और आकाश को अपनी गाड़ी में बिठाकर दस्तावेज तैयार करने वाले ऑफिस पहुँचा. वहाँ करीब दस लोग कंप्यूटर पर बैठकर कुछ न कुछ टाइप कर रहे थे. संदीप ने उनमें से एक ऑपरेटर से पूछा, “कितनी देर लगेगी?”

“आप आ ही जाइए, मैं तो शाम को देने वाले दस्तावेज तैयार कर रहा हूँ.” ऑपरेटर ने कहा. संदीप ने आकाश से आधार कार्ड और दो फोटो मांगे, ऑपरेटर ने रिसेप्शन से एक दस्तावेजी स्टाम्प लेकर एग्रीमेंट टाइप कराया. वहीं एक अलग चैम्बर में बैठे नोटेरी के सामने दस्तावेज पर आकाश से दस्तखत कराए, नोटेरी ने अपने रजिस्टर में उसके और फ्लैट ओनर के दस्तखत करवाकर दस्तावेज को प्रमाणित कर दिया. डिपॉजिट की राशि फ्लैट ओनर को दी तो उसने आकाश को फ्लैट की चाबियाँ दीं. आधे घंटे बाद उसने गेस्ट हाउस से सूटकेस लाकर फ्लैट में प्रवेश किया और सूटकेस को टेबल पर रख दिया. अब उसे लग रहा था कि इस मुंबई जैसे बेगाने शहर में उसका भी एक 'ठिकाना' है. ठीक ग्यारह बजे वह विक्रोली के अपने ऑफिस के लिए निकल गया, जहाँ नए प्रोजेक्ट की चुनौतियाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं.

यूनियन ने जिन बीस कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी थी उनमें से नौ कार्यकर्ताओं की ड्यूटी सोमवार को सुबह की शिफ्ट में थी. सुबह दस बजे जब पहली शिफ्ट का विश्राम हुआ तब ये कार्यकर्ता अपने विभाग में श्रमिकों से सर्वे का फार्म भरवाने लगे. आधे घंटे में केवल इक्कीस मजदूर फार्म पूरा भर सके, कुछ के फार्म अधूरे रह गए. कुछ मजदूर जानना चाहते थे कि यूनियन आखिर ये फार्म क्यों भरवा रही है. उन्हें समझाने में समय लगा. कुछ मज़दूर फॉर्म देखकर कतराने लगे—"कॉमरेड, इस कागज़ पर हस्ताक्षर करने से हमारी नौकरी या मिलने वाले लाभों पर तो फर्क नहीं पड़ेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि मैनेजमेंट को पता लग जाए तो वे हमें गेट पर ही कार्ड पंच करने से न रोक दें." लेकिन जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि यह फॉर्म पूरी तरह गुप्त है और इसमें न तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत है और न ही उनका नाम कहीं उजागर होगा, बल्कि यह हम मजदूरों की कानूनी लड़ाई का कवच बनेगा. विश्राम के बाद मजदूरों में फार्म भरने की खबर आम हो गई. शिफ्ट छूटने के बाद कुछ कार्यकर्ता गेट के बाहर की चाय की दुकानों पर रुके तो बहुत सारे मजदूर भी रुक गए और वहीं फार्म भरवाने लगे.

फॉर्म भरते समय कारखाने के भीतर 'ट्रक सिस्टम' के जरिए होने वाले शोषण का वह खौफनाक यथार्थ सामने आया, जिसने मज़दूरों को भीतर तक निचोड़ दिया था. एक बुजुर्ग मज़दूर ने फॉर्म भरवाते हुए भर्राई आवाज़ में कहा, "कॉमरेड, इस नौकरी से तो मौत भली. वेतन के नाम पर मालिक अपनी दुकान का सड़ा हुआ अनाज और कूपन थमा देता है. महीने के अंत में जेब में एक रुपया नकद नहीं बचता. बच्चों की फीस और दवाइयों के लिए भी साहूकारों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है. अगर ये सेठ हमारे इतने बरस का हिसाब राजी-राजी दे दे, तो हम यह नौकरी कल छोड़ दें. कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. नहीं मिलेगी तो फुटकर मजदूरी कर लेंगे या अपना ही कोई काम कर लेंगे." लगभग हरेक मज़दूर का यही दर्द था. वे इस नारकीय स्थिति से बाहर निकलना चाहते थे.

प्रिया अपने ऑफिस का काम निपटाकर रात साढ़े आठ बजे घर लौटी. कपड़े बदल कर कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेटी सोच रही थी कि खाने में क्या बनाया जाए? तभी डोर-बेल बजी. उसने उठकर दरवाजा खोला तो वहाँ प्रशांत बाबू, कणिका और कॉमरेड कुलकर्णी खड़े थे. उसने उन्हें हॉल में बिठाया. वे पहले दिन दूसरी शिफ्ट के विश्राम-काल तक भरे हुए फॉर्म लेकर आए थे. पहले ही दिन करीब चौहत्तर फॉर्म भरे जा चुके थे. वे चाहते थे कि रोज के फार्मों को रोज ही कणिका की सुझाई एक्सेल शीट में फीड कर दिया जाए और यह काम प्रिया अपने लैपटॉप पर रोज कर ले. इससे तीन चार दिन में डाटा शीट विश्लेषण के लिए तैयार हो जाएंगी और जल्दी ही कणिका रिपोर्ट तैयार कर सकेगी. प्रिया ने अपने हॉल की डाइनिंग टेबल को जल्दी से 'डेटा सेंटर' में बदल डाला.

कणिका ने अपने पेन ड्राइव से प्रिया के लैपटॉप में तैयार एक्सेल शीट ट्रांसफर की. इस शीट में प्रत्येक मजदूर के लिए एक रो (Row) आवंटित की गयी थी, और प्रत्येक प्रश्न के दो कॉलम बने हुए थे. जिसमें मजदूर की रो में एक में हाँ या ना वाला उत्तर अंकित करना था और दूसरे कॉलम में उनके विशिष्ट उत्तर लिखने थे कणिका फार्मों को व्यवस्थित कर रही थी और यह देख रही थी कि मज़दूरों ने कर्ज, बीमारी और ट्रक सिस्टम से जुड़े कॉलम सही-सही भरे हैं या नहीं. प्रिया ने अपने लैपटॉप पर एक्सेल शीट खोलकर मज़दूरों के उस दर्द को आंकड़ों के रूप में दर्ज करना शुरू किया. जैसे-जैसे डेटा स्क्रीन पर उभर रहा था, यह साफ़ हो गया कि नब्बे फीसदी से अधिक मज़दूर इस कारखाने को तुरंत छोड़ना चाहते थे.

करीब नौ बजे प्रिया के फोन की स्क्रीन चमक उठी, आकाश का फोन था. उसने सबको कहा, “जरूरी फोन है, मैं बात करके लौटती हूँ.” वह बेडरूम में आ गई.

“हाँ आकाश, कैसे हो? फ्लैट का क्या किया?”

“सुबह पजेशन ले लिया था. मेरा सूटकेस रखकर ही ऑफिस गया था. अभी फ्लैट से फ्रेश होकर ‘एमबी’ आया हूँ खाने के लिए. तुमने खाने का क्या किया?”

“कुछ नहीं, आकर सोच ही रही थी क्या बनाऊँ? तभी प्रशांत सर, कणिका और कुलकर्णी जी आ गए. अब आज के कलेक्ट किए हुए फार्मों के डाटा मेरे कंप्यूटर की एक्सेल शीट में डाल रहे हैं.”

“ये बढ़िया है, मैं पाँच लोगों का खाना पैक करवाकर उधर ही आ जाता हूँ. मेरे फ्लैट का गृह प्रवेश सेलिब्रेट कर लेंगे.” आकाश ने कहा तो प्रिया फोन लिए हुए ही हॉल में आ गई. “आकाश का फोन है वह ‘एमबी’ से खाना लेकर आ रहा है. आप लोग खाना खाएंगे न.” उसने सभी से पूछा. प्रशांत बाबू ने कणिका और कुलकर्णी जी से पूछा तो उन्होंने हाँ कर दी.

“हाँ, ले आओ. सभी खाएंगे,” प्रिया ने आकाश को कह दिया और फोन बंद किया.”

प्रशांत बाबू ने तुरन्त रामजी काका को फोन लगाया. “हैलो रामजी, प्रिया का दोस्त आकाश आपके यहाँ हम सबके लिए खाना पैक करवा रहा है. उससे कहना भुगतान हो गया है.” इतना कहकर उन्होंने फोन काट दिया. प्रिया उन्हें असमंजस भरी नजरों से देखती रह गयी.

प्रशांत बाबू ने प्रिया को अपनी ओर इस तरह देखते हुए कहा, “प्रिया, आकाश तुम्हारा दोस्त है, उससे तुम्हारे भावनात्मक संबंध हैं. वह हमारे लिए उतना ही बेशकीमती है, जितनी तुम. आज उससे इसी तरह पहचान होने दो”

प्रिया सोच रही थी कि, आकाश को भी 'एमबी' अनजान नए रिश्ते मिलने वाले हैं.
... क्रमशः

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