@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: फ्रेक्शन मीटिंग

मंगलवार, 12 मई 2026

फ्रेक्शन मीटिंग

देहरी के पार, कड़ी - 50
वह आकाश के ऑटोरिक्शा को तब तक देखती रही जब तक कि वह आँखों से ओझल न हो गया. उसने अपनी घड़ी देखी, 1:35 हो चुके थे. उसे दो बजे आईआईडीईए ऑफिस पहुँचना था. वह तुरंत ऑफिस की दिशा में जाते हुए एक शेयरिंग ऑटो में बैठ गई.

रिसेप्शन में उसे बताया गया कि मीटिंग छोटे हॉल में है. यहाँ लकड़ी की पुरानी अंडाकार मेज हॉल के आधे भाग में रखी थी. मेज पर स्लेटी रंग का कपड़ा बिछा था. जिसके गिर्द प्लास्टिक की 12 कुर्सियाँ रखी थीं. प्रशांत बाबू, कॉमरेड कुलकर्णी, यूनियन अध्यक्ष उल्लास कामठे और सचिव शिंदे, पांच अन्य कार्यसमिति सदस्य आपस में बातचीत में मशगूल थे. यूनियन सचिव शिंदे के सामने एक रजिस्टर और दो सूचियाँ रखी थीं. जो संभवतः ईसीआई में काम करने वाले सभी मजदूरों की और यूनियन के सदस्यों की रही होंगी.

प्रिया के अंदर आते ही प्रशांत बाबू ने उसे बैठने का संकेत दिया. कुलकर्णी जी ने कहा, “प्रिया भी आ गयी है अब मीटिंग शुरू की जाए.”

“बिल्कुल ठीक.” प्रशांत बाबू ने कहा. “कॉमरेड शिंदे आप शुरू करें.”

शिंदे ने बोलना शुरू किया. “कॉमरेड, हमारी मूल समस्या वेतन की है. फैक्ट्री में जो भुगतान योग्य वेतन मजदूरों को मिलता है वह दूसरी फैक्टरियों से आधा भी नहीं होता. ट्रक सिस्टम में एम्पलॉइज शॉप से मिलने वाले सामानों की कीमतों और बाजार कीमतों के अंतर को जोड़ लें तब भी यह वे अन्य फैक्टरियों के मजदूरों के वेतन का 65 से 70 प्रतिशत रह जाता है. कम वेतन के कारण मजदूरों के परिवारों की आर्थिक हालत हमेशा कमजोर बनी रहती है और अक्सर वे कर्ज में रहते हैं. इससे मजदूरों की पत्नियों को अनिवार्य रूप से काम करना पड़ता है. अनेक के घरों में घर से किए जाने वाले काम कर रखे हैं, जिसमें बच्चे भी जुटे रहते हैं, उनकी पढ़ाई बाधित होती है. फैक्ट्री से छूटने के बाद घर पहुँच कर मजदूर खुद भी उसी काम में जुट जाता है. लोग अपने घरों में जो काम कर रहे हैं वह उन्हें अधिक मूल्यवान लगता है. अधिकांश परिवार यह समझते हैं कि यदि मजदूर नौकरी छोड़कर दूसरा काम करने लगे, या परिवार के में ही जुट जाए, तो इस नौकरी से होने वाली कमाई से अधिक कमा सकता है. मेरे खुद के परिवार तक में ऐसी ही स्थिति है. मुझे रोज इस दबाव को सहन करना पड़ता है. प्रिया दीदी और उनके साथी मेरे घर होकर आए हैं. वे खुद इसी नतीजे पर पहुँचे. हमने जब ट्रक सिस्टम समाप्त करने और फेयर वेजेज के लिए हड़ताल शुरू की थी तब सब इस बात पर उतारू थे कि मालिक फैक्ट्री बंद भी कर दे तो वे भुगत लेंगे. ऐसी हालत में कम से कम उन्हें ग्रेच्युटी, छंटनी का मुआवजा और प्रोविडेंट फंड तो मिल जाएगा. तब से लेकर आज तक मजदूरों की सोच में कोई बदलाव हुआ है, मुझे नहीं लगता. इसलिए यदि वीआरएस (स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति) का प्रस्ताव आया तो अधिकांश मजदूर उसे स्वीकार करने की स्थिति में होंगे. मुझे बस इतना ही कहना है, हो सकता है हम में से कोई इससे अलग राय भी रखता हो.”

कॉमरेड शिंदे ने अपनी बात समाप्त की और उनके बाद एक सदस्य कॉमरेड राम लुभावन को छोड़कर शेष सभी पार्टी सदस्यों ने कॉमरेड शिंदे की राय से सहमति प्रकट की. कॉमरेड राम लुभावन का कहना था कि “फैक्ट्री में करीब 25 से 50 मजदूर ऐसे हैं जिनकी उम्र 55 साल से ऊपर की है, उनमें से अधिकांश ये सोचते हैं कि यह नौकरी चलती रहे तो बेहतर है. इन मजदूरों के घरों में इनके बच्चे जॉब में लग गए हैं या खुद अपना काम करते हैं जिससे उन्हें अच्छी आय हो जाती है. इनमें से अधिकांश किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते. ट्रक सिस्टम समाप्त हो और मजदूरों को फेयर वेजेज मिलने लगे, ये तो वे भी चाहते हैं. यह तो साफ ही है कि ट्रक सिस्टम अब नहीं रहेगा. सारी बात इस तथ्य पर निर्भर करेगी कि अब उन्हें वेतन कितना मिलता है.”

प्रशांत बाबू ने अपनी बात जोड़ी, "बिल्कुल. मैनेजमेंट ने अब 'क्रेडिट वाउचर्स' देना और राशन की दुकान पर कुछ सामान बढ़ाकर जो छोटी-छोटी राहतें दे रहा है, वे दरअसल मजदूरों के उस गुस्से को शांत करने के लिए हैं जो 'ट्रक सिस्टम' के खिलाफ था. वे चाहते हैं कि मजदूर यह सोचने लगें कि मैनेजमेंट कुछ सुधार कर देगा, ट्रक सिस्टम न रहेगा लेकिन उसके बावजूद उन्हें फेयर वेतन नहीं देगा. सारा दारोमदार इस बात पर है कि इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल क्या फैसला देती है? और कब देती है? हमारी अदालतों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे जल्दी फैसला नहीं देतीं. प्रबंधन इधर-उधर के फिजूल के आवेदन पेश करके उसमें देरी करने की कोशिश करेगा. वह यही चाहता है कि जैसे-तैसे 30-35 प्रतिशत मजदूरों को वीआरएस लेने के लिए मना ले. यदि ऐसा हुआ तो यूनियन वीआरएस स्कीम में बेहतर शर्तों पर आज बारगेनिंग कर सकती है, तब नहीं कर सकेगी. स्थिति वाकई विकट है, इसलिए जरूरी है कि हमारे कार्यकारिणी सदस्य सभी मजदूरों तक जाएँ और जानें कि वे क्या चाहते हैं. उसके बाद ही हम आगे के संघर्ष की रूपरेखा बना सकते हैं. मेरे विचार में हमें रूपरेखा तय कर लेनी चाहिए कि यह सर्वे कैसे होगा?”

कॉमरेड कुलकर्णी ने प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, तुमने जो रैंडम सर्वे किया था, उसके आधार पर और तकनीक के क्षेत्र में परिवर्तनों के आधार पर तुम्हारी राय क्या है?"

प्रिया ने अपना टैबलेट खोला और डेटा दिखाते हुए कहा, "सर, आज स्थिति यह है कि इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने की तकनीक बहुत विकसित हो गयी है. इस फैक्ट्री ने पिछले चार-पाँच सालों से अपनी तकनीक में कोई विकास नहीं किया है. जिसके कारण इसका मुनाफा नई इकाइयों की अपेक्षा कम हुआ है. इसके ग्राहकों की संख्या कम हुई है, क्योंकि सब अपने उत्पादनों में एडवांस आई. सी. लगाना चाहते हैं. नयी इकाइयों के साथ बाजार में बने रहने के लिए इन्हें अपनी तकनीक का नवीनीकरण करना होगा, जिसमें इन्हें पूंजी लगाना होगा. संभवतः इसीलिए कंपनी इस इकाई को बंद करके इसकी जमीन को औद्योगिक आवासीय या व्यवसायिक में परिवर्तित करवाकर बिल्डरों की मदद से अच्छा मुनाफा काटना चाहती है. वह मामूली पूंजी लगाकर किसी नए औद्योगिक क्षेत्र में बैंकों से 70-80 प्रतिशत सस्ता ऋण लेकर नयी यूनिट लगाने की जुगत में है. वहाँ कंपनी को अच्छी सब्सिडी मिल जाएगी और अनेक प्रकार के टैक्सों से कम से कम पाँच साल के लिए छूट मिल जाएगी. कंपनी का यही प्लान है तो बहुत अच्छा है, वह इस प्लान को बदलने के लिए तैयार नहीं होगी. इस स्थिति में यूनियन ने ठीक से बारगेनिंग की तो वीआरएस पैकेज बढ़िया हो सकता है. अब स्थिति यह बन चुकी है कि इस फैक्ट्री को बंद होने से रोका नहीं जा सकेगा. बस उसे कुछ समय टाला जा सकता है.”

कॉमरेड कुलकर्णी के सिवा सभी अपनी राय प्रकट कर चुके थे. प्रशांत बाबू के कहने पर उन्होंने अपनी राय रखी. “कॉमरेड, सब कुछ स्पष्ट है. मैं प्रिया की राय से सहमत हूँ कि परिस्थिति ऐसी निर्मित हो चुकी है कि फैक्ट्री को बंद होने से नहीं रोका जा सकेगा. लेकिन यह बात हम मजदूरों से नहीं कह सकते. जब तक वे अपने अनुभव से इसे नहीं समझेंगे, इसे सच नहीं मानेंगे. ऐसी स्थिति में हम मजदूरों की राय जानना चाहते हैं, उसके लिए हमें प्रोफेशनल तरीका अपनाना पड़ेगा. मैं कुछ प्रोफेशनल एनालिस्टों को जानता हूँ जो आधुनिक रीति से विज्ञान सम्मत सर्वे कर सकते हैं. उनमें से हमें एक एनालिस्ट को बुक करना होगा. वह हमसे अधिक फीस नहीं लेगा. लेकिन वह हमारे लिए उचित प्रश्नावली तैयार कर देगा और हमारे कार्यकारिणी सदस्यों को एक संक्षिप्त ट्रेनिंग दे देगा. डाटा एकत्र होने के बाद एनालिस्ट उनका एनालिसिस करके हमें राय दे देगा. यह स्टडी कानूनी महत्व भी रखेगी. बस इसे हमें जल्दी से जल्दी करना पड़ेगा. इस स्टडी के बाद ही हम अपनी नीति तय कर पाएंगे.”

कॉमरेड कुलकर्णी की राय पर सभी सहमत थे. निर्णय लिया गया कि सचिव कार्यकारिणी मीटिंग में इस स्टडी के लिए प्रस्ताव रखेंगे. संभावना है कि यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो जाएगा, यदि कठिनाई हुई तो पार्टी सदस्य इसे बहुमत से पारित करवाने की कोशिश करेंगे.

प्रिया दंग थी. वह अब तक सर्वे को केवल 'डेटा कलेक्शन' समझती थी, लेकिन यहाँ उसे समझ आया कि इसे विज्ञान सम्मत होना चाहिए. आज उसने कुछ-कुछ यह भी समझा कि ‘वर्किंग क्लास की वेनगार्ड पार्टी’ कैसे काम करती है? उसने यह भी समझा कि भले ही प्रशांत बाबू उसे रेडीमेड पार्टी मेंबर कहते हों लेकिन उसे अभी पार्टी मेंबर बनने के लिए बहुत कुछ सीखना और पढ़ना होगा.
... क्रमशः

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