देहरी के पार, कड़ी - 46
गुरुवार 9 मई 2019.
प्रिया ने दिन में अनेक बार ट्रैक करके क्लोजर एप्लीकेशन की फाइल का मूवमेंट जानने की कोशिश की, लेकिन फाइल सीएमओ से श्रम सचिव के पास आकर वहीं अटक गयी थी.
उसने ऑफिस से अपने फ्लैट पहुँचकर प्रशांत बाबू को फोन करके पूछा तो उनसे पता लगा कि चीफ मिनिस्टर ने प्रबंधन की विद्ड्रॉल एप्लिकेशन पर आगे सुनवाई के लिए फाइल श्रम मंत्रालय भेज दी है. यूनियन सचिव शिंदे को फोन पर सूचना मिली है कि 10 मई को लेबर सेक्रेटरी एएसएल ऑफिस में सुबह 11 बजे सुनवाई करेंगे.
10 मई को सुबह एएसएल ऑफिस का गलियारा शांत था. ईसीआई कंपनी के एमडी के अहंकार पर सीएमओ पर जो 'चाबुक' चला था, उसका असर आज साफ़ दिख रहा था. एमडी और वकील भट्ट अपने अपने फॉर्मल आउट फिट में अपने-अपने सहायकों सहित समय से बीस मिनट पहले ही इजलास में आकर बैठे थे. लेकिन दोनों की आँखों से वह चमक गायब थी जो दूसरों को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल होती थी. 11 बजने से कुछ मिनट पहले कुलकर्णी जी, प्रशांत बाबू, यूनियन के सचिव शिंदे और वकील चव्हाण ने इजलास में प्रवेश किया.
जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, कुलकर्णी जी ने एक नया कानूनी पेच मेज पर रख दिया. "सर," कुलकर्णी जी ने सचिव की ओर देखते हुए कहा, "प्रबंधन ने फैक्ट्री के क्लोजर को बिना शर्त वापस लेने का आवेदन प्रस्तुत किया है, यह स्वागत योग्य है. लेकिन पिछले दो महीनों में इन मजदूरों ने जो मानसिक तनाव झेला है, और यूनियन ने इस अवैध बंदी के खिलाफ जो कानूनी लड़ाई लड़ी है, उसका क्या? मैनेजमेंट ने जानबूझकर यह विवाद खड़ा किया. हमारी मांग है कि प्रबंधन इस मुकदमे का खर्च यूनियन को दे."
एमडी के चेहरे पर झल्लाहट उभरी, लेकिन लॉ सेक्रेटरी ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया. उसने सीधे कंपनी वकील से पूछा, "मिस्टर भट्ट, यूनियन की मांग जायज है. मैनेजमेंट ने प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है. 'लिटिगेशन कॉस्ट' तो आपको देनी होगी. क्या आप तैयार हैं?”
“आपने बजा फरमाया सर, लेकिन इस पर मुझे कंपनी से सलाह करनी होगी.” वकील भट्ट ने अतिशय विनम्रता से उत्तर दिया. शायद उसके पास इस्तेमाल करने के लिए इसके सिवा कोई और युक्ति शेष नहीं बची थी.”
“कंपनी के एमडी आपके साथ हैं, आप चाहें तो उनसे अकेले में बात कर सकते हैं”
“जी सर.”
“मिस्टर कुलकर्णी, यूनियन कितना खर्चा चाहती है?” सेक्रेटरी ने पूछा. जवाब यूनियन के वकील चव्हाण साहब ने दिया.
“यहाँ कितने दिन सुनवाई हुई है? इसे मामले की फाइल पर देखा जा सकता है. खुद मिस्टर भट्ट जानते हैं कि उनकी और मुम्बई हाईकोर्ट के डेजिग्नेटेट सीनियर वकील की एक दिन की फीस क्या है. इसके अतिरिक्त कोर्ट आने जाने, स्टेशनरी, ड्राफ्टिंग, टाइपिंग आदि के खर्चे आप खुद अनुमान लगा सकते हैं. यह किसी भी हालत में बीस लाख से कम नहीं होगा. फिर भी जो वाजिब कॉस्ट आप तय कर देंगे वह हमें मान्य होगी.” कुलकर्णी जी ने कहा.
“मिस्टर भट्ट, आपका क्या कहना है?”
“सर, हम आपस में सलाह करके बताते हैं, दो मिनट का समय दिया जाए.” भट्ट ने निवेदन किया.”
“ठीक है, मैं चैम्बर में लौट रहा हूँ. आप आपस में सलाह कर लीजिए, हो सके तो कुलकर्णी जी और चव्हाण साहब से बात करके सहमति बनाइए. मुझे दस मिनट बाद चैम्बर में आकर बताइए.” इतना कह कर सेक्रेटरी इजलास से उठ कर अपने चैम्बर में चले गए.
वकील भट्ट और एमडी भी अपने सहायकों सहित इजलास से बाहर चले गए.
कोई दस मिनट बाद कोर्ट जमादार ने आकर चव्हाण साहब को सूचना दी कि आप चार लोगों को सेक्रेटरी साहब ने चैम्बर में आने को कहा है. भट्ट साहब और एमडी भी वहीं बैठे हैं. चव्हाण साहब, कुलकर्णी जी, प्रशांत बाबू और यूनियन सेक्रेटरी शिंदे लॉ सेक्रेटरी के चैम्बर में पहुँचे. सेक्रेटरी ने उन्हें बैठने को कहा.
“भट्ट साहब ने लिटिगेशन कॉस्ट के रूप में दस लाख देने का प्रस्ताव किया था. लेकिन प्रभावी सुनवाई के दिनों और चव्हाण साहब के सम्मान को देखते हुए मेरे कहने पर ये बारह लाख देने को तैयार हैं, इस पर आपको कोई एतराज तो नहीं?” लॉ सेक्रेटरी ने कुलकर्णी जी से पूछा.
कुलकर्णी जी ने चव्हाण साहब की और देखा. तब खुद चव्हाण साहब बोल पड़े. “ लिटिगेशन कॉस्ट एप्रूव करने का काम आपका है, आप जो भी फरमा देंगे वह यूनियन को मंजूर होगा.”
लॉ सेक्रेटरी ने एमडी की और मुखातिब होकर कहा. “मिस्टर एमडी, आप यह कॉस्ट कब तक अदा कर देंगे?”
“सर हम विवाद को शेष नहीं रखना चाहते. हम अभी दस मिनट में चैक आपको सौंप देंगे, आप इन्हें तुरन्त दे सकते हैं.” एमडी के चेहरे पर शांति थी, अब वह कुछ राहत महसूस कर रहा था. तभी कुलकर्णी जी बोल पड़े.
“एमडी साहब, अभी तो ट्रक सिस्टम की समाप्ति और फेयर वेजेज का विवाद इंडस्ट्रियल ट्रिबुनल में शेष है. बेहतर है कि उसे यूनियन से बात करके सैटल कर लें.”
“कुलकर्णी जी, आपकी बात सही है. मिस्टर एमडी, आपको इस पर सोचना चाहिए. मैं कुलकर्णी जी को जानता हूँ. उस मामले में आपको निगोशिएट करने में कोई परेशानी नहीं होगी. सचिव ने सलाह दी.
“जरूर, हम कोशिश करेंगे. यदि आपकी इजाजत हो तो मैं बाहर जाकर अपने असिस्टेंट को चैक बनाने के लिए कह दूँ. बात यहीं खत्म हो तो बेहतर है.” एमडी ने लॉ सेक्रेटरी को कहा. चैम्बर में मौजूद वकील भट्ट सहित सभी मुस्कुरा उठे.
कुछ देर में मिस्टर एमडी चैक लेकर चैम्बर में लौटे. सेक्रेटरी को चैक दिया, जिसे उसने तुरन्त कुलकर्णी जी को दिया, कुलकर्णी जी ने चैक यूनियन सचिव शिंदे को देकर, रसीद रीडर को देने को कहा.
सेक्रेटरी ने चैम्बर में ही चाय मंगवा ली थी. चाय समाप्त होने पर सब बाहर निकले. वहाँ फैक्ट्री की दूसरी शिफ्ट के 60-70 मजदूर आ गए थे. कुलकर्णी जी ने उन्हें आज की तमाम कार्यवाही के बारे में बताया. मजदूरों ने जब जाना कि मैनेजमेंट को 12 लाख रुपए मुकदमा खर्च के रूप में यूनियन को दिए हैं तो उनमें उल्लास छा गया. वे वहीं “इंकलाब जिन्दाबाद¡” का नारा लगाने लगे.
प्रिया को खबर प्रशांत बाबू ने फोन पर दी तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. मजदूरों की पूरी लड़ाई में उसका और उसके साथियों का भी योगदान था. उसे लग रहा था कि वह जीत गई है. उसने अपने साथियों को बताया और कहा कि आज का डिनर मेरी ओर से मेवाड़ भोजनालय में रहेगा.
... क्रमशः
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