@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: Closure
Closure लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Closure लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 26 अप्रैल 2026

कसौटी

देहरी के पार, कड़ी - 35
शनिवार 27 अप्रैल 2019 की रात 11 बजे सीनियर एडवोकेट चव्हाण का दफ्तर एक ऑपरेशन थिएटर बना हुआ था. ईसीआई फैक्ट्री के क्लोजर की परमिशन के केस की फाइल उनकी चार गुणा आठ फुट की टेबल पर खुली पड़ी थी. चव्हाण साहब के अतिरिक्त उनका एक सहायक, प्रशांत बाबू, प्रिया, ईसीआई यूनियन का सचिव और रामजी काका मौजूद थे. रामजी काका अभी-अभी सबके लिए कॉफी बनाकर लाए थे. प्रबंधन के आवेदन और साक्ष्य का 'पोस्टमार्टम' जारी था. मेज पर औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के बेयर एक्ट की किताब खुली रखी थी. धारा 25-ओ (2) वाले पन्ने पर क्लिपर लगा हुआ था. प्रबंधन के आवेदन में फैक्ट्री के क्लोजर के कारणों को पर्याप्त और संतोषप्रद 'Adequate and Sufficient' होने की पहली कसौटी पर जाँचा जा रहा था. सभी के चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में आत्मविश्वास चमकता था.

चव्हाण साहब ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, प्रबंधन ने 'वर्किंग कैपिटल' की कमी को मुख्य कारण बताया है. क्या हमारी ऑडिट रिपोर्ट इसे ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है?"

प्रिया ने फाइल आगे बढ़ाई. "सर, उनकी बैलेंस शीट में 'देनदारियाँ' (Liabilities) कृत्रिम रूप से गुब्बारे की तरह फुलाकर पेश की गई हैं. सिंगापुर वाला ट्रांजैक्शन साबित करता है कि फंड्स की 'कमी' कृत्रिम है. वरना उद्योग संचालन के लिए उनके पास संसाधन पर्याप्त 'Adequate' हैं, बस उन्हें कहीं और दफ्न कर दिया गया है. उद्योग घाटे में नहीं बल्कि मुनाफे में है और मुनाफा भी कम नहीं है."

अगली कसौटी थी 'Good Faith' (नेक नियत). क्या उद्योग बंद करने की अनुमति का आवेदन नेक नियत से पेश किया गया है. "यहाँ हम मार करेंगे," प्रशांत बाबू ने मेज थपथपाई. "हड़ताल के पहले जिस तरह से उन्होंने मजदूरों को 'ट्रक सिस्टम' में फँसाए रखा और अब 'डीम्ड परमिशन' की ताक में बैठे हैं, यह 'Good Faith' कतई नहीं है. यह पूरी तरह से 'Mala fide' (दुर्भावनापूर्ण) है." यूनियन सचिव ने जोड़ा, "और सर, जीएम का जिरह में झूठ बोलना और 80% प्रोसेस लॉस का तकनीकी रूप से असंभव तर्क देना भी उनकी बदनीयती को साफ़ करता है."

तीसरी कसौटी थी अत्यंत अनुचित या अन्यायपूर्ण 'Grossly Unfair or Unjust'. इस पर प्रिया ने संवेदनशीलता के साथ पक्ष रखा. "सर, प्रबंधन का यूनियन की ट्रक सिस्टम को समाप्त कर फेयर वेजेज की मांग पर बिलकुल तवज्जोह नहीं देना और उन्हें हड़ताल पर जाने को विवश करना. हड़ताल पर जाने के कुछ ही दिन बाद इस कारखाने को बंद करने की अनुमति प्राप्त करने के इस आवेदन को पेश करना पूरी तरह अनुचित और अन्यायपूर्ण है. जबकि एम्पलॉइज को फेयर वेजेज देकर भी मुनाफे में चलाया जा सकता है."

“अब हमें देखना है कि एक इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने वाले कारखाने का बंद होना किस तरह सामान्य जनता के हितों 'Interest of the General Public' के विपरीत हो सकता है.” चव्हाण साहब ने प्रश्न सबके सामने रख दिया.

“सर, हमारा कारखाना डिफेंस आर्म इंडस्ट्रीज के लिए ऑर्डर पर इंटीग्रेटेड सर्किट बनाता है, उस काम में हमारी फैक्ट्री को महारत हासिल है. हमारी कंपनी का टेंडर कभी कैंसल नहीं हुआ. कई विदेशी फर्में आयीं, पर हमारे उद्योग का मुकाबला नहीं कर सकीं.” यूनियन सचिव हिमांशु शिंदे ने कहा.

उसकी बात सुनकर सबके-सब पूरी मीटिंग में अब तक बिल्कुल चुपचाप रहे शिंदे की ओर देखने लगे. कुछ पल के लिए ऑफिस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया.

फिर सबसे पहले चव्हाण साहब बोले, “मग बाबा, तुम्ही आतापर्यंत गप्प का राहिलात, मला आधी का नाही सांगितलंत?” ("तो अब तक चुप क्यों रहा मेरे बाप, पहले क्यों नहीं बताया.") उन्हें मराठी में बोलते देख रामजी काका को हँसी आ गई. वे बोल पड़े, “तुम्ही अगदी बरोबर म्हणालात चव्हाण साहेब.” (“तुमने खूब कहा चव्हाण साहब.”)

इस बार चव्हाण साहब सहित सभी हँस पड़े. फिर चव्हाण साहब कहने लगे, “वाकई यह अत्यन्त गंभीर बात है, इसे तो मुकदमे के शुरुआत में बतानी चाहिए थी. यदि पता होता तो उनके गवाह से पूछते कि ‘क्या आप डिफेंस आर्म इंडस्ट्री के ऑर्डर्स पर आई.सी. बनाते हैं?’ उनके जवाब से यह तथ्य आसानी से स्थापित हो जाता. अब हमें खुद इस तथ्य को स्थापित करना पड़ेगा. उसके लिए कुछ दस्तावेज तलाशने पड़ेंगे. मौखिक बयान की अहमियत कम होती है.”

तभी प्रिया बोल पड़ी. “डिफेंस इंडस्ट्री को आई.सी. सप्लाई करना व्यवसाय में महत्वपूर्ण तथ्य है यह जरूर कंपनी के प्रोफाइल में दर्ज होगा. मैं अभी ढूंढ निकालती हूँ. पर मुझे आपके कंप्यूटर का हैंडल चाहिए.” तभी चव्हाण साहब का सहायक विनय बोल पड़ा, “इधर कंप्यूटर पर आ जाओ दीदी, कंप्यूटर चालू है और लॉग-इन भी कर रखा है.”

प्रिया उठकर दफ्तर के कोने में रखे डेस्कटॉप पर जाकर बैठी, उसने कंपनी की प्रोफाइल तलाश की जहाँ सब कुछ मिल गया. पास ही रखे कलर प्रिंटर से उसने तुरंत प्रोफाइल का प्रिंट निकाला और उसे किसी झंडे की तरह लहराते हुए वापस टेबल की ओर आई. “ये देखिए चव्हाण सर!”

“वाह, क्या कमाल का काम किया है प्रिया तुमने. पर इस का श्रेय हमें कॉमरेड शिंदे को देना पड़ेगा कि उन्हें देर से ही सही पर ठीक वक्त पर यह सब याद आ गया. अब हम साबित कर सकते हैं कि इंडस्ट्री के क्लोजर से डिफेंस इंडस्ट्री को भी फर्क पड़ेगा और फौज के लिए जरूरी हथियारों के निर्माण में देरी हो सकती है. यह हमारा सबसे मजबूत पक्ष होगा. 350 परिवारों का सड़क पर आना केवल उन मजदूरों की हार नहीं है, बल्कि यह उस पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ढांचे और देश की सुरक्षा के लिए भी घातक है. यह 'Prejudicial to the public interest' है."

सबके बीच लंबी बहस के बाद तय हुआ कि यूनियन की साक्ष्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि 'टेक्निकल और डेटा-ड्रिवन' होगी. तय हुआ कि यूनियन की ओर से प्रशांत बाबू एक 'एक्सपर्ट विटनेस' (Expert Witness) के रूप में अपना विश्लेषण पेश करेंगे. दूसरे गवाह सचिव शिंदे होंगे. ये दोनों केवल अपनी बातें नहीं कहेंगे, बल्कि उन दस्तावेजों को साक्ष्य में लाएंगे जो साबित करेंगे कि प्रबंधन ने रिकॉर्ड्स के साथ छेड़छाड़ की है.

चव्हाण साहब ने फाइल बंद करते हुए कहा, "प्रबंधन ने अपना जाल बिछाया था, लेकिन अब हम उनके ही दस्तावेजों को उनके खिलाफ हथियार बनाएंगे. 30 अप्रैल को इजलास में हमारे गवाह 'सर्जिकल स्ट्राइक' के मोर्चे पर होंगे."
... क्रमशः

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सत्य दस्तावेज

देहरी के पार, कड़ी - 34
फोन की घंटी की आवाज से प्रिया की नींद खुली, वह उठ बैठी. देसाई साहब का फोन था. बोल रहे थे आज राइट 11 बजे ऑफिस पहुँचना है. उसकी टीम के बनाए सॉफ्टवेयर सोल्यूशन में कोई गड़बड़ी आई थी और क्लाइंट तुरंत समाधान चाहता था. क्लाइंट सही था. उसके अनेक काम रुके पड़े होंगे तो जल्दी तो करेगा. अब वह एएसएल के ऑफिस में होने वाली सुनवाई में नहीं जा सकती थी. उसने घड़ी देखी, सुबह के साढ़े नौ बजे थे. वह पाँच घंटे सो चुकी थी. फौरन तैयार होकर वह ठीक सवा दस बजे चव्हाण साहब के ऑफिस में थी. उन्हें बताया कि वह सुनवाई में साथ नहीं रह सकेगी. उसने और उसके साथियों ने रात इंटरनेट पर खोजकर जिन जरूरी दस्तावेजों के प्रिंट निकाले थे वे उन्हें सौंपे और उनकी अहमियत बतायी. वह ऑफिस में अपनी सीट पर पहुँची तो ठीक 11 बजे थे.

एएसएल (ASL) के इजलास में आज सबसे महत्वपूर्ण सुनवाई थी, प्रबंधन के लिए साक्ष्य (Evidence) पेश करने का आखिरी मौका था. फिर भी मजदूरों की उपस्थिति बहुत कम थी. फैक्ट्री चालू हो जाने से ज्यादातर मजदूर ड्यूटी पर थे. चव्हाण साहब और यूनियन चाहती थी कि आज जिरह हो और अगली पेशी यूनियन की साक्ष्य के लिए नियत हो जाए. जिससे उन्हें डिफेंस करने का पर्याप्त अवसर मिले और एएसएल समय पर अपना निर्णय प्रबंधन को कम्युनिकेट कर सके.

सवा ग्यारह बज चुके थे. यूनियन की ओर से वकील चव्हाण प्रशांत बाबू और यूनियन के अध्यक्ष-सचिव ग्यारह बजे के पहले से मौजूद थे. लेकिन नियोजक पक्ष लापता था. प्रशांत बाबू ने रीडर को कहा कि ‘आज नियोजक की साक्ष्य का अंतिम अवसर है और वह अभी तक नहीं पहुँचा है, यह डिले टेक्टिक्स है.’

तभी प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने अपने सहायकों सहित इजलास में प्रवेश किया. उन्होंने रीडर को बताया कि फैक्ट्री कई दिन बाद शुरू हुई है. काम शुरू होने में समस्या आने से जीएम साहब को देरी हो गई है. लेकिन वे बारह बजे के पहले हर हालत में पहुँच जाएंगे. रीडर ने एएसएल के चैम्बर में जाकर उन्हें सूचना दी. कुछ देर बाद वे इजलास में थे.

एएसएल ने आते ही पूछा जीएम साहब को देरी हो रही है तो आप अपने दूसरे गवाह को जिरह के लिए प्रस्तुत करें, आपके दूसरे गवाह कहाँ हैं?

“हूजूर, हमारे सभी दस्तावेज जीएम साहब प्रूव करेंगे. इस कारण और समय बचाने के लिए हमने तय किया कि हम जीएम साहब के अलावा कोई और गवाह प्रस्तुत नहीं करेंगे. और जीएम साहब 12 बजे तक अवश्य आ जाएंगे.” वकील मनोज भट्ट ने कहा.

“अब अदालत साढ़े बारह बजे बैठेगी, उस वक्त आपके गवाह हाजिर रहें, वरना आपकी साक्ष्य बंद कर दी जाएगी. आज दोपहर डेढ़ बजे मध्यान्ह अवकाश नहीं होगा और अदालत जब तक जिरह होगी बैठेगी.” इतना कहकर एएसएल साहब फिर से अपने चैम्बर में चले गए.

अब सुनवाई में समय था. चव्हाण साहब, प्रशांत बाबू और उनके साथी मध्यान्ह की चाय के लिए कैंटीन आ गए.

ठीक साढ़े बारह बजे एएसएल साहब ने इजलास में कदम रखा. अपनी सीट पर बैठते ही. आदेश दिया: मिस्टर भट्ट, आपके गवाह को कठघरे में भेजें, जिरह शुरू की जाए. जीएम साहब उठे और चुपचाप कठघरे में जा खड़े हुए. इजलास में एसी चल रहे थे, फिर भी जीएम के माथे पर पसीने की बूंदें उनकी घबराहट बयाँ कर रही थीं.

वकील मनोज भट्ट ने कार्यवाही शुरू करते हुए कहा, "हुज़ूर, जीएम साहब ने अपने शपथ-पत्र में स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी के पास कच्चा माल खरीदने के लिए भी वर्किंग कैपिटल नहीं है. बैंकों ने हाथ खींच लिए हैं. क्लोजर ही एकमात्र रास्ता है."

वकील रमेश चव्हाण मुस्कुराए और धीरे से अपनी जगह से उठे और जिरह के लिए कठघरे के नजदीक जा खड़े हुए. "हुज़ूर! प्रबंधन कह रहा है कि वे कंगाल हैं. लेकिन मेरे पास ईसीआई के पिछले तीन महीनों के डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट है." चव्हाण साहब की आवाज़ में गूँज थी.

उन्होंने जीएम की ओर रुख किया, "मिस्टर जीएम, आप पहले शपथ ले लें, कि आप यहाँ अदालत के सामने जो भी कहेंगे सच कहेंगे, सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे.”

जीएम ने शपथ ली, फिर उनकी जिरह आरंभ हुई. जीएम के शपथ पत्रों में दिए गए तथ्यों के बारे में सवाल पूछने के बाद चव्हाण साहब ने प्रिया और उसके साथियों द्वारा रात भर जागकर निकाली गई डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट अपनी मेज से उठाई. उसकी एक प्रति अदालत के सामने रखी, दूसरी वकील भट्ट को दी. तीसरी प्रति गवाह को दिखा कर सवाल पूछने लगे.

“देखिए यह आपकी कंपनी द्वारा किए गए भुगतान का सही-सही रिकार्ड है. इस रिकॉर्ड को देखिए. क्या आप यहाँ शपथ पर यह कह सकते हैं कि पिछले महीने आपकी कंपनी ने सिंगापुर की 'ईस्टर्न कंसल्टेंसी' को 2 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया? और क्या यह सच नहीं है कि उस कंसल्टेंसी कंपनी का डायरेक्टर आपकी कंपनी के एमडी का ही सगा साला है?"

अदालत में सन्नाटा छा गया. जीएम के हाथ कांपने लगे. उन्होंने पानी की बोतल की ओर देखा, पर वह खाली थी.

प्रबंधन का वकील भट्ट आगे आया और उसने स्थिति संभालने की कोशिश की, "हुज़ूर, यह कंपनी के एमडी के विरुद्ध व्यक्तिगत आरोप हैं. उनके पीछे से ऐसे आरोप पर सवाल नहीं पूछा जा सकता. हम इस सवाल का जवाब देने के लिए एमडी साहब को अगली पेशी पर पेश कर सकते हैं. इसलिए इनसे यह सवाल पूछने के बजाय दूसरे सवाल पूछ लिए जाएँ.

चव्हाण साहब तुरंत गरजे, "नहीं सर! यह नहीं हो सकता. आज प्रबंधन की गवाही के लिए अंतिम अवसर है. जो गवाह आज उपस्थित है उससे जिरह के बाद प्रबंधन की साक्ष्य बन्द होगी. यह कोई आम मुकदमा नहीं बल्कि एक उद्योग को बंद करने की परमिशन देने और न देने का मामला है, एक दम टाइम बाउंड. 60 दिनों में सरकार को अपना निर्णय देना ही नहीं, प्रबंधन को कम्युनिकेट भी करना है. प्रबंधन तो यही चाहता है कि ये दिन निकल जाएँ और वे (Deemed Permission) मानकर उद्योग को ताला लगा दें. सर, हम आज ही अपनी जिरह खत्म कर देंगे. हम न्याय की मांग करते हैं, तारीख की नहीं!"

एएसएल ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा. उनकी नज़रें सीधे वकील भट्ट से मिलीं. "देखिए, मिस्टर भट्ट, मैनेजमेंट ने इस अदालत का वक्त बर्बाद किया है. 80% प्रोसेस लॉस का तर्क और यह सिंगापुर ट्रांजैक्शन—'मेलाफाइड इंटेंशन' (Mala fide intention) साफ दिखाई देता है. यदि गवाह जवाब नहीं देना चाहता है तो मैं समझूंगा कि पूछा गया तथ्य सही है.”

“नहीं हुजूर, जिरह जारी रखिए.” मनोज भट्ट ने कहा और अपनी सीट पर बैठ गया. आगे की जिरह में जीएम ने दो करोड़ के ट्रांजैक्शन को ही नहीं पूरी ‘डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट रिपोर्ट’ को सही स्वीकार कर लिया.

एएसएल ने प्रबंधन साक्ष्य बंद (Close) करके आदेश दिया, "यूनियन अपनी साक्ष्य के शपथ पत्र सोमवार तक हर हालत में पेश करे. अगले मंगलवार 30 अप्रैल 2019 को सुबह 11 बजे यूनियन अपने गवाह हाजिर रखे और प्रबंधन उनसे जिरह के लिए तैयार रहे.

इजलास से बाहर निकलने के बाद आज मजदूरों ने 'इंकलाब-जिन्दाबाद' के नारे नहीं लगाए, बल्कि एक-दूसरे की आँखों में देखा. आज पहली बार उन्हें लगा कि कानून की देवी केवल अंधी नहीं है, वह सच देख भी सकती है.
... क्रमशः