देहरी के पार, कड़ी - 52
आकाश को मैसेज करने के बाद प्रिया ने किचन में जाकर देखा. चाय तैयार थी, बल्कि कुछ ज्यादा उबल चुकी थी. चाय छानकर, मग हाथ में लिए वह बिस्तर पर आ गई. आज पूरे दिन उसे व्यस्त रहना पड़ा था. सुखद बात यह थी कि दिन के अधिक समय वह आकाश के साथ थी. उसने नोट किया था कि जितनी देर आकाश उसके साथ रहा, सकुचाता रहा. आखिर उसे किस बात का संकोच था? और मैसेज में वह डर वाली बात, आखिर वह किस बात से डर रहा था? उसने याद करने की कोशिश की कि वह जितनी देर आकाश के साथ रही, क्या-क्या हुआ था?
‘हो सकता है उसके अलसुबह जल्दी बोरिवली स्टेशन पहुँच जाने से वह आश्चर्यचकित हुआ हो. कोटा और जयपुर में एक अकेली लड़की का सुबह पाँच बजे किसी हमउम्र लड़के को रिसीव करने के लिए स्टेशन पहुँचना अजूबा होता. लेकिन मुंबई में तो यह सहज सामान्य बात थी. उसे अपने फ्लैट में ले आना और पाँच घंटों से अधिक एक साथ रहना भी शायद उसे अजीब लगा हो. वहाँ जयपुर या कोटा में यह निश्चित ही संभव नहीं होता. हो सकता है उसके फ्लैट में रहने के दौरान वह इस बात से डर रहा हो कि कहीं कोई उसके फ्लैट की घंटी न बजा बैठे और उन दोनों को अकेले देख उनके बारे में कुछ ऊट-पटांग न सोचने लगे..’ वह मन ही मन हँस पड़ी. ‘तब तो जब वे यहाँ से एमबी के लिए निकले तब आकाश ने ज़रूर राहत की साँस ली होगी. उसके बाद रामजी काका और उनके स्टाफ का व्यवहार, और फिर बब्बन भाई के साथ ऑटो का सफर, पता नहीं बब्बन भाई ने उससे न जाने क्या बातें की होंगी.”
‘तो क्या यहाँ यूनियन के लोगों के साथ उसके संबंध बनना और यूनियन के कामों में उसकी तन मन से संलिप्तता ने उसे डराया होगा? ... खैर वह इतना क्यों सोच रही है, मिलने पर सब कुछ साफ हो जाएगा. यदि उसने स्पष्ट नहीं किया तो वह खुद पूछ लेगी कि वह किस बात से डर रहा था.’
उसने उठकर चाय का प्याला सिंक में रखा. सोचने लगी शाम के खाने में क्या बनाए. फिर उसने थोड़े से चावल निकालकर कुकर में पकने के लिए गैस पर चढ़ाया और अरहर की दाल को कटोरी में भीगने के लिए छोड़ दिया.
वह वापस अपने बिस्तर पर पहुँची. उसे ध्यान आया कि कितने ही दिन हो गए हैं, माँ से बात नहीं हुई है. उसने फोन उठाकर माँ को लगाया. पूरी घंटी जाने पर भी फोन रिसीव न होने पर उसने फोन रख दिया. हो सकता है माँ किसी काम में व्यस्त हो और फोन न उठा पा रही हो. तभी फोन की घंटी बज उठी. माँ ही थी.
“हेलो मम्मी कैसी हैं?”
“मैं ठीक हूँ पर तुझे आज कैसे मेरी याद आ गई? पता है पूरे आठ दिन हो गए हैं बात किए हुए. लगता है तू मुझे तो बिलकुल भूल ही गई है.” माँ ने उलाहना दिया.
“कैसी बात करती हो मम्मी? अपनी माँ को कोई भूल सकता है क्या? बस कुछ कामों में व्यस्त रही तो बात नहीं कर पाई. अब आज मैंने ही तो फोन किया न?”
“हाँ हाँ ठीक है, जब तुझे याद आ जाती है तो फोन करती है. वैसे तो भूल ही गई है.” इस बात पर प्रिया को हँसी आ गयी.
“अच्छा ये बता, पापा कैसे हैं?”
“ठीक हैं, रोज मंडी जाते हैं. कारोबार पूरी तरह संभाल लिया है, मयंक को पढ़ाई के लिए बिल्कुल फ्री कर दिया है. आज दिनभर से घर पर ही थे. अभी शाम को सात बजे निकले हैं अपने दोस्तों से मिलने. अब आने में रात के दस बजेंगे.”
“और मयंक कैसा है?”
“बिलकुल ठीक है, वह भी घूमने गया है. वह भी वही दस बजे तक लौटेगा. तेने सबकी पूछ ली, अब तेरी भी बता. तेरा क्या चल रहा है? तेरी नौकरी कैसी चल रही है? मयंक ने बताया था कि तू किसी यूनियन के काम में पड़ गई है. उसमें किसी तरह के लड़ाई-झगड़े तो नहीं होते न? यहाँ पहले कारखानों में एक से ज्यादा यूनियनें थीं. वे आपस में लड़ते थे तो खून-खच्चर हो जाते थे. वैसा वहाँ तो नहीं है न? तू फालतू ही इस पचड़े में पड़ गई है. तुझे यूनियन से क्या काम? अच्छी खासी नौकरी करती है, बढ़िया तनखा है, जैसे भी हो इससे दूर ही रहना चाहिए.” माँ ने चिंता व्यक्त की.
“नहीं माँ ऐसा कुछ नहीं है. पता नहीं मयंक ने आपको क्या कह दिया है. जब मैं यहाँ आई और विक्रांत ने मुझे परेशान करने की कोशिश की तो इन्हीं यूनियन वालों ने बिना किसी स्वार्थ के मेरा साथ दिया और विक्रांत को जेल की हवा खानी पड़ी. अब वे अपने वेतन और नौकरी के लिए लड़ रहे हैं, तो मैं लिखने-पढ़ने में उनकी मदद कर देती हूँ. किसी तरह की कोई रिस्क नहीं है. तू चिन्ता मत कर. और हाँ, आप जयपुर वाले आकाश को जानती हैं न? वही, जो मेरा लैपटॉप लेने आया था.”
“हाँ, जानती हूँ. वह अभी कुछ दिन पहले भी आया था. जब एक काली गाड़ी अपने मकान के सामने खड़ी रहने लगी थी.”
“हाँ वही, अब वह वहाँ आपकी तसल्ली के लिए आया था न, बस ऐसे ही हम एक दूसरे की मदद करते हैं. आकाश ने कंपनी बदल ली है और यहाँ दूसरी कंपनी में जॉइन करेगा. आज ही मुंबई पहुँचा है.”
“यह तो अच्छा हुआ, कम से कम वहाँ एक आदमी तो जान पहचान का हुआ.” माँ ने ऐसे कहा जैसे उन्हें आकाश के मुंबई पहुँचने की खबर से उसे बहुत तसल्ली हो गयी हो. प्रिया की हँसी फूट पड़ी.
“मम्मी, तू भी न. यहाँ बहुत जान पहचान वाले हैं. तू मुम्बई आकर देख, सबसे मिलाऊंगी, तो तेरी पूरी तसल्ली हो जाएगी. अच्छा मम्मी मैं रखती हूँ, मयंक आए तो कहना मुझ से बात कर लेगा.”
माँ से बात करके प्रिया ने खुद को बहुत हल्का महसूस किया. कुकर ने पर्याप्त सीटी ले चुका था. उसने कुकर को गैस से उतारकर देखा. चावल पक गए थे. उसने उन्हें अलग बरतन में निकाल कर उसी कुकर में दाल पकने को चढ़ा दी.
सोमवार सुबह आकाश विक्रोली की उस ऊँची कॉरपोरेट बिल्डिंग के रिसेप्शन पर खड़ा था, जिसमें उसकी नयी एम्पलॉयर कंपनी का कार्यालय था. यहाँ पहुँचकर उसे अहसास हुआ कि अब उसके जीवन का एक और नया अध्याय शुरू हो चुका है. ग्यारह से आठ की शिफ्ट, बीच में घंटे भर का विश्राम—एक ऐसा चक्र जो अब उसकी रोज की जिन्दगी का हिस्सा बनने वाला था. नई कंपनी में नया प्रोजेक्ट, उसके लिए नई प्रोफेशनल चुनौतियाँ लाएगा. फिलहाल उस पर सबसे बड़ा दबाव—जल्द से जल्द एक स्थाई आशियाना तलाशना था. गेस्ट हाउस में न तो अधिक दिन रह सकते हैं और न ही वहाँ अपने घर जैसा अहसास होता है. उसे सुबह ऑफिस जाने से पहले ही किसी प्रॉपर्टी डीलर से मिलकर बताना होगा कि उसे किस तरह का आवास चाहिए.
... क्रमशः
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