@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: मंत्र

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

मंत्र


पिंजरा और पंख-19
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
रविवार की रात, 206 में हवा जैसे थम सी गई थी.

इंटरकॉम की घंटी ने खामोशी तोड़ी. फोन पर पापा थे.

“सब ठीक?"

"हाँ, पापा."

"शगुन का एडमीशन हो गया है. उसे साइंस स्ट्रीम में मनोविज्ञान मिल गया है. हॉस्टल आवंटन कल होगा. गया. तू ठीक है?"

“हाँ, पापा.” आयुष के मन में एक फीकी सी राहत थी. कम से कम शगुन को अपनी मरजी की जगह और स्ट्रीम मिला.

फिर माँ ने फोन लिया. हमेशा की तरह वही स्नेह और चिंता. "खाना तो ठीक से खा रहा है न? दूध पीता है?"

"हाँ, मम्मी."

"और... पढ़ाई? ज्यादा टेंशन तो नहीं ले रहा?"

"नहीं, मम्मी. सब ठीक है."

"शगुन ने कहा था न," माँ ने याद दिलाया, " तू छोटे-मोटे टेस्ट में मत उलझना. बस आईआईटी पर ध्यान देना. उसी की तैयारी करना."

आयुष ने सहमति दी. "हाँ, मम्मी."

कॉल खत्म हुई. कमरे में खामोशी फिर लौट आई, लेकिन कानों में माँ के शब्द गूँज रहे थे, "छोटे टेस्ट में मत उलझना." यह मंत्र इस सूनेपन में एक सुकून भरी याद था, पर उसकी धड़कनें कम न होती थीं. “तू नहीं जानती, शगुन, यहाँ क्या होता है”, उसने मन ही मन कहा, “यहाँ हर टेस्ट बड़ा होता है”.

सुबह पाँच बजे अलार्म ने उसे जगाया. शरीर बिस्तर से उठने को मना कर रहा था. कॉरिडोर में दूसरे कमरों के लड़के निकल रहे थे, चुपचाप. नाश्ते पर कोई बातचीत नहीं, सब या तो नोट्स देख रहे थे या आँखें बंद करके फॉर्मूले दोहरा रहे थे. हवा में स्पर्धा का मौन दबाव था.

फिजिक्स के टीचर बोर्ड पर समीकरण लिख रहे थे, उनकी आवाज़ लयबद्ध, नीरस गुनगुनाहट थी. आयुष की नज़र ब्लैकबोर्ड, पर दिमाग कोटा से दूर, शायद बनस्थली में भटक रहा था. तभी, जैसे दूर से कोई आवाज़ आई, "इन टेस्टों में मत उलझ... बस आईआईटी पर ध्यान दे."

उसने सिर को झटका दिया. ब्लैकबोर्ड पर उसकी कल्पना ने "IIT" का विशाल लोगो देखा, एक सेकंड के लिए. फिर वह सीधा बैठा, कलम उठाई, और नोट्स लेने लगा. पहली बार, उस मंत्र ने उसे डूबने से बचा लिया था.

दोपहर बाद, कोचिंग के नोटिस बोर्ड के चारों ओर भीड़ जमा थी. “संबल कोचिंग - साप्ताहिक टेस्ट - रैंक लिस्ट.” आयुष की छाती धड़कने लगी, सांसें थम गयी. आँखें रोल नंबर तलाशने लगीं, आखिर रोल नंबर 43 पर जाकर अटक गयीं. रैंक 56. उसका पेट भिंच गया. ग्यारहवीं में 220 छात्रों में भी वह टॉप-50 में नहीं था. इस बार वह लक्ष्य चूक गया.

आसपास आवाजें थीं. "मैं 9वें पर" लड़के की आवाज़ में गर्व था. "बाप रे... 102, मैं तो बर्बाद हो गया," यह टूटी हुई आवाज़ थी.

आयुष खामोश रहा. उसके कानों में गूँज रहा था, "छोटे टेस्ट... छोटे टेस्ट..."

यह गूंज बहुत हलकी थी. टॉप-50 भी नहीं! पापा को पता लगा तो? अगले टेस्ट में नीचे गया तो? आईआईटी कैसे क्रैक होगा?"

वह एक तरफ हट गया. मंत्र पर, भय जीतता दिखता था.

शाम को कैंटीन में, 205 वाला विशाल मिला, "टेस्ट कैसा रहा?” आयुष ने पूछा.

"क्या बताऊँ, यार... 86 रह गया. घर फोन करने तक का मन नहीं है. उनसे क्या कहूँगा."

आयुष ने एक गहरी सांस ली. खुद को समझाने के लिए, विशाल से कहने लगा, "यार, इतना मत सोच. यह तो... कोचिंग का अपना इंटरनल टेस्ट है. असली मुकाबला तो आईआईटी एंट्रेंस है न? उसी से हमें फर्क पड़ना चाहिए."

विशाल ने उसकी ओर देखा. उसकी आँखों में थकान और एक कड़वी हँसी थी. "इंटरनल टेस्ट? यहीं से तो 'असली' की तैयारी होती है, आयुष. यहाँ नीचे गए तो वहाँ का सपना तक दिखना बंद हो जाता है."

आयुष चुप रहा. विशाल का जवाब उसके मन में घर कर गया. शायद वह सही था. बाहरी दुनिया के लिए यह मंत्र सिर्फ एक आसान, भोली सी बात थी.

रात को सेल्फ-स्टडी के घंटे में, आयुष डेस्क पर बैठा. किताब खुली थी, पर उसे 56वीं रैंक दिखती थी. उसने गलत हुए सवाल देखे. हर गलती उसे शर्म और डर की ओर धकेलती थी. वह किताब बंद करने को था.

तभी अचानक, बिजली सी कौंधी.

शगुन ने कहा था, "छोटे टेस्ट में मत उलझ."

उसने यह नहीं कहा था, "छोटे टेस्ट को अनदेखा कर."

उलझना. अनदेखा करना. दो अलग चीजें थीं.

उसने अपनी कॉपी का कवर पलटा. एक कोने में, उसने पेंसिल से साफ-साफ लिखा:

लक्ष्य : आईआईटी.

हथियार : ये टेस्ट.

एक शब्द ने सब कुछ बदल दिया. 'उलझना' से 'हथियार' तक का सफर. उसने टेस्ट पेपर फिर से उठाया, इस बार निराशा से नहीं, एक एनालिस्ट की सूक्ष्म दृष्टि से. किस सवाल में कहाँ चूक हुई? कौनसा कॉन्सेप्ट क्लियर नहीं था? कौनसी गलती दोबारा हो सकती है? वह गलतियों को सुधारने लगा, हर गलती के आगे कारण लिखने लगा. उस पल, दिमाग में रैंक नहीं थी, अपनी कमजोरियाँ पढ़ रहा था. उनसे मुक्ति की पहली कवायद.

रात को फोन की घंटी बजी. पापा थे. आयुष ने गहरी सांस ली. उसने कॉपी के कवर पर लिखे शब्दों को देखा. हथियार : ये टेस्ट.

"हाँ, पापा."

"कैसा रहा आज का दिन? टेस्ट का रिजल्ट आया?"

"हाँ, पापा, आ गया." उसकी आवाज़ सपाट थी. " रैंक 56 आई है."

लाइन के दूसरी ओर एक पल की चुप्पी थी, आयुष की सांस रुकी हुई.

"पिछली बार तो शायद 49 थी? यह गिरावट क्यों." पापा के स्वर में चिंता थी.

आयुष इस सवाल के लिए तैयार था.

"कुछ नए टॉपिक थे, पापा... वो क्लियर नहीं थे. मैंने अपनी गलतियों को नोट किया है. उन पर काम करूँगा." उसने थोड़ा रुककर कहा, "यह कोचिंग का अपना इंटरनल टेस्ट है. इससे सीखकर ही तो एंट्रेंस की तैयारी होती है न?"

"ठीक है," पापा के स्वर में नाराजगी नहीं थी, बल्कि सजगता थी, "गलतियों से सीखो. हमें तुम पर भरोसा है. तुम कर सकते हो."

कॉल खत्म हुई. आयुष ने फोन नीचे रखा. उसने सच कहा था. और दबाव कम हुआ था. मंत्र ने उसे सच बोलने का साहस दिया था.

बिस्तर पर लेटे हुए, आयुष की आँखें अंधेरे में खुली थीं. उसके होंठ फड़के, मंत्र दोहराते हुए:
"लक्ष्य: IIT. हथियार: टेस्ट."

थकान और एक नई समझ के बीच, नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया.
... क्रमश:

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