@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: खादी का खोल

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

खादी का खोल

 पिंजरा और पंख-32

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
रामगंजमंडी से वनस्थली विद्यापीठ तक का सड़क दुरुस्त थी. बूंदी से बनस्थली तक कुछ बरसात भी हो चुकी थी. गुप्ताजी की कार को बनस्थली विद्यापीठ के गेट से अंदर पहुँची तब शाम के 5 बजने को थे. शगुन कार का गेट खोल कर नीचे उतरी तो बाहर की गर्म हवा महसूस की. यह रामगंजमंडी की बंदिशों से अलग थी, पर क्या वाकई आज़ाद थी? वह गेट ऑफिस पर प्रवेश दर्ज कराने के लिए बढ़ी तभी एक आटो रिक्शा आकर रुका और उससे किरण, उसकी माँ और पिता मंगलसिंह उतरे.


उतरते ही मंगलसिंह ने गेट ऑफिस के पास सहायक मैनेजर गुप्ताजी को देखा और अपना भारी बैग कंधे पर लटकाए लपककर पास आए. उनके चेहरे पर वही 'दफ्तर वाली विनम्रता' चिपकी थी.

"साहब, आप भी आ गए! हमें लगा आप कल निकलेंगे," मंगलसिंह ने झुककर अभिवादन किया. गुप्ताजी ने हमेशा की तरह अपनी 'साहब वाली गरिमा' बनाए रखते हुए सिर हिलाया. "हाँ, सोचा कि भीड़भाड़ से पहले बिटिया को छोड़ आएँ. आप भी ठीक समय पर आ गए. वापसी का तो तय है न? बस में क्यों धक्के खाना, हमारी कार में पर्याप्त जगह रहेगी."

शगुन ने एक नज़र किरण की ओर देखा. किरण अपनी माँ का हाथ पकड़कर खड़ी थी, उसकी आँखें ज़मीन पर गड़ी थीं. वह अपने पिता की उस "साहब-साहब" वाली रट से भीतर तक छिल रही थी. उसे लग रहा था जैसे उसके पिता की 'जीहुज़ूरी' उसके अपने वजूद को छोटा कर रही है. जब गुप्ताजी ने वापसी में उन्हें कार में बिठाने की पेशकश की, तो किरण के चेहरे पर एक क्षण के लिए नफरत की लकीर उभरी और फिर गायब हो गई. वह जानती थी कि उसके स्वाभिमानी क्षत्रिय होने के दावों के बीच उसके पिता की यह मजबूरी एक ऐसी गांठ थी जिसे वह चाहकर भी नहीं खोल सकती थी.

शाम के धुंधलके में जब शगुन ने रूम नंबर 106 का दरवाजा खोला, तो पुरानी परिचित गंध ने उसका स्वागत किया—मिट्टी, पुरानी किताबों और अगरबत्ती की मिली-जुली महक. कमरे में प्रियंका पहले ही पहुँच चुकी थी और अपनी 'शुद्धिकरण' की रस्म में व्यस्त थी.

"शगुन! आ गई तू? देख, इस बार मैंने मेज का मुख एकदम सटीक पूर्व की ओर रखा है. पिछले साल मुझे लगा कि वास्तु ठीक नहीं था, इसलिए शायद मनोविज्ञान के कुछ सिद्धांत समझ नहीं आ रहे थे," प्रियंका ने अपनी विशेष 'पंडिताइन' वाली मुस्कान के साथ कहा. उसके लिए शिक्षा भी धर्म के चश्मे से ही होकर गुज़रती थी. वह गंगाजल की एक बोतल साथ लाई थी और कमरे के हर कोने में उसका छिड़काव कर रही थी.

सीमा, जो हमेशा की तरह एक कोने में चुपचाप बैठी अपनी अलमारी ठीक कर रही थी, प्रियंका की इस हरकत पर बस एक फीकी नज़र डालकर रह गई. दलित समुदाय से आने वाली सीमा, इस कमरे की सबसे बड़ी 'खामोश गवाह' थी. वह जानती थी कि प्रियंका का यह गंगाजल दरअसल एक अदृश्य बाड़ थी, जो उसे और उसकी पहचान को बाकी सबसे अलग रखती थी.

तभी तमतमाई हुई किरण ने कमरे में प्रवेश किया. अपना बैग ज़ोर से मेज पर पटका. "प्रियंका, बंद कर यह पानी छिड़कना. हम यहाँ पढ़ने आए हैं या शुद्धि करने? और वैसे भी, बाहर जो 'अशुद्धि' मेरे स्वाभिमान के साथ हो रही है, उसे तेरा यह गंगाजल नहीं धो सकता."

अभी किरण की बात पूरी ही हुई थी कि फातिमा ने कमरे में कदम रखा. "सलाम! क्या बहस हो रही है पहले ही दिन?" फातिमा के हाथ में एक टिफिन था. "मैं घर से सेवइयाँ लाई हूँ, माँ ने सबके लिए भेजी हैं."

प्रियंका ने तुरंत अपनी पूजा की थाली को हाथ से ढँक लिया. "फातिमा, देख... बुरा मत मानना, पर अभी-अभी शुद्धि की है. और वैसे भी, हम ब्राह्मण सावन के महीने में बाहर का खाना..." प्रियंका की बात अधूरी रह गई, पर उसका संदेश साफ़ था.

किरण, जिसे अपना गुस्सा निकालने के लिए बस एक माध्यम चाहिए था, फातिमा की ओर मुड़ी. "फातिमा, तू भी क्यों अपनी पहचान हर जगह ले आती है? क्या ज़रूरी है कि हम हर बार खाने और धर्म के नाम पर ही मिलें? और तू प्रियंका, तेरी यह 'पंडिताई' तब कहाँ जाती है जब तू परीक्षा में नकल करने के लिए किसी की भी मदद लेने को तैयार रहती है?"

कमरे में एक भारी सन्नाटा पसर गया. सीमा ने पहली बार अपनी किताबें छोड़ीं और सिर उठाकर सबको देखा. "हम सब एक ही कमरे में हैं," सीमा की आवाज़ धीमी पर स्पष्ट थी, "पर हम सब अपनी-अपनी खिड़कियों से अलग-अलग दुनिया देख रहे हैं. किरण को अपने पिता की नौकरी की शर्म है, प्रियंका को अपनी जाति का अहंकार, और फातिमा को अपनी पहचान साबित करने की ज़रूरत. और मैं... मैं बस यह सोच रही हूँ कि क्या इस कमरे में कोई ऐसा कोना है जहाँ मैं सिर्फ 'सीमा' रह सकूँ, बिना किसी लेबल के?"

शगुन खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई. बाहर जून की शाम अब धीरे-धीरे काली पड़ रही थी. उसने महसूस किया कि वनस्थली के खादी-वस्त्र भ्रम मात्र हैं. इस खादी के नीचे वही पुराने घाव, उसी पुरानी श्रेष्ठता और हीनता के भाव छिपे थे.

"हम मनोविज्ञान के छात्र हैं," शगुन ने बिना पीछे मुड़े कहा. "परसों 3 जुलाई को जब हम क्लास में बैठेंगे, तो प्रोफेसर साहब हमें 'प्रेजुडिस' (पूर्वाग्रह) और 'स्टीरियोटाइप्स' के बारे में पढ़ाएंगे. वे बताएंगे कि कैसे समाज हमारी सोच को कंडीशन्ड करता है. पर क्या हममें इतनी हिम्मत होगी कि हम आईने में खुद को देख सकें? किरण, तेरा गुस्सा तेरे पिता की मजबूरी से है, प्रियंका तेरा डर तेरी शुद्धता से है. हम यहाँ शिक्षा लेने आए हैं, पर हम अपने साथ वही गाँवों और छोटे शहरों की सँकरी गलियां ले आए हैं."

रात को डायरी लिखते समय शगुन की कलम रुक-रुक कर चली— "आज मेरे और किरण के माता-पिता गेस्ट हाउस में होंगे. वहाँ क्या उनके बीच संवाद हुआ होगा. ऐसे संवाद क्या इस देश की असलियत हैं. और यहाँ रूम नंबर 106 में, हम चार लड़कियां चार अलग-अलग धाराओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. खादी का खोल शरीर पर चढ़ाना आसान है, मन पर, शायद नामुमकिन."

  ... क्रमशः

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