@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: विदा होती गूंज

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

विदा होती गूंज

 पिंजरा और पंख-31

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

 जून का आखिरी सप्ताह में एक दिन अचानक बेसन को देसी घी में सेंकने की खुशबू घर में फैल गयी. सबको अहसास हो गया कि अब शगुन के बनस्थली जाने का वक्त आ गया है. तीन जुलाई से उसका सत्र आरंभ होने वाला था और उसे दो दिन पहले तीस जून को ही जाना था. जिससे वह दो दिन में खादी का कपड़ा खरीद कर विद्यापीठ में पहनने के लिए कुछ सूट सिलवा ले. आयुष के जाने के बाद शगुन अपने कमरे में अकेली थी. वह जानती थी कि उसके जाने के बाद यदि घर में कोई मेहमान आएगा तो उस के ठहरने के लिए इस कमरे की जरूरत पड़ेगी. इसलिए वह चाहती थी कि दीवार पर लगी तस्वीरों के अलावा शेष सामानों को अलमारी में संभाल कर रख रही थी. इस कमरे में रहते हुए उसने और आयुष ने मिल कर घर में कुछ बदलने की कोशिश की थी. उसे आशंका थी कि उसके जाने के बाद कहीं फिर से यह घर उसी पुराने ढर्रे पर न लौट आए.


अगले दिन दोपहर में, जब घर के लोग सुस्ता रहे थे, शगुन ने देखा कि चाचा बरामदे में अकेले बैठे तम्बाकू के साथ खाने के लिए सुपारी काट रहे थे. शगुन ने मन कड़ा किया और उनके पास जाकर बैठ गई.

"चाचा, दो-तीन दिन में मैं बनस्थली चली जाउंगी," शगुन ने स्वर को बहुत सहज और नरम रखते हुए कहा.

चाचा ने सुपारी का एक टुकड़ा मुहँ में डाला और चश्मा उतारकर शगुन की ओर देखा. उनके चेहरे पर एक कृत्रिम, चाशनी भरी ममता उभरी, "हाँ बेटा, तेरे जाने के बाद घर फिर सूना हो जाएगा. आयुष गया तो लगा कि हाथ कट गया, अब तुम भी चली जाओगी. मन तो नहीं है कि तुम्हें इतनी दूर भेजा जाए, पर पढ़ाई करना भी तो जरूरी है. आजकल उसके बिना लड़कियों को अच्छे वर कहाँ मिलते हैं."

"चाचा, मन तो मेरा भी नहीं है," शगुन ने उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा, "पर मैं चाहती हूँ कि मेरे पीछे घर में सब खुश रहें. खासकर चाची. उनकी सेहत अभी बहुत नाजुक है, उनकी बहुत देखभाल करनी होगी. और मैं देखती हूँ कि वे अक्सर तनाव में रहती हैं. हमें उन्हें थोड़ा और खुलापन देना चाहिए, जिससे वे तनाव मुक्त रहें. आखिर वे एक इंसान हैं, कोई अमानत नहीं जिसे ताले में सहेजकर रखा जाए."

चाचा ने एक लंबी आह भरी, जैसे शगुन की बात ने उन्हें बहुत गहरी चोट पहुँचाई हो. "बेटा, तुम अभी छोटी हो. तुम जिसे 'खुलापन' कहती हो, वह हमारे खानदान में 'मर्यादा' का उल्लंघन माना जाता है. खैर, तुम कह रही हो तो मैं ध्यान रखूँगा. अब मैं इतना भी पत्थर-दिल नहीं हूँ जितना तुम मुझे समझती हो. नीतू का ध्यान तो तुमसे ज्यादा मुझे है, आखिर हमारे वंश की बेल उसी के सहारे आगे बढ़ेगी. मेरा वंश तो उसी से आरंभ होने वाला है."

शगुन को उनके 'वंश' शब्द से कोफ्त हुई, पर उसने खुद को काबू में रखा. वह जानती थी कि यह 'समझने और न समझने' का नाटक मात्र है.

शाम को उसने मम्मी और पापा को अपने कमरे में बुलाया. पापा के चेहरे पर दरा घाटी वाला वह वादा अब भी एक झिझक बनकर टिका हुआ था.

"पापा, मैं जा रही हूँ, पर मेरा मन चाची में अटका रहेगा," शगुन ने पापा का हाथ थामते हुए कहा. "मैंने कल चाचा से बात की थी और कहा था कि वे चाची को कुछ खुलापन दें. उन्होंने हाँ तो कहा, लेकिन जैसी उनकी सोच बन चुकी है, वह इतनी आसानी से नहीं पिघल सकती. वे अभी मुझ से बात करते हुए नरम बन रहे थे और उसके बाद भी, पर मेरे जाने के बाद वे फिर से अपनी खुराफात शुरू करेंगे. मम्मा, आप कम से कम इतना तो कर सकती हैं कि जब चाचा उन पर दबाव डालें, तो आप चाची के साथ खड़ी हों. और पापा, आपने कहा था कि आप अब चाचा को 'प्रोत्साहन' नहीं देंगे. याद रखिएगा, आपकी चुप्पी ही चाचा की ताकत है."

पापा ने एक गहरी सांस ली और शगुन के सिर पर हाथ रखा, "तू बेफिक्र होकर पढ़ाई कर बेटा. मैंने अनिल से कह दिया है कि अब हर बात में उसकी जिद नहीं चलेगी. नीतू को कोई तकलीफ नहीं होगी."

शगुन बहुत अधिक तो नहीं पर थोड़ी तो आश्वस्त हुई. आखिर उसने कोशिश तो की थी. इससे उसे भी संतोष मिला.

विदाई की सुबह अजीब थी. चाचा सबसे ज्यादा सक्रिय थे. जब शगुन के बैग तैयार हुए और गुप्ताजी उन्हें मारुति 800 की डिक्की में रखने के लिए उठाने लगे तो चाचा दौड़ कर आए और शगुन के बैग उठा लिए. कहने लगे, "अरे भैया, आप रहने दो, मैं रख देता हूँ. बिटिया हमारी शान है, इसे कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए." वे ऐसा जता रहे थे जैसे वे ही शगुन के सबसे बड़े रक्षक और शुभचिंतक हैं.

जब शगुन चाची के पैर छूने झुकी, तो चाची ने उसे गले लगा लिया और कान में धीरे से फुसफुसाया, "तूने जो हिम्मत दी है, उसे मैं संभाल कर रखूँगी शगुन. तू अपनी चिंता करना, मेरी नहीं."

गाड़ी स्टार्ट हुई. चाचा खिड़की के पास आकर खड़े हो गए, "शगुन बेटा, वहाँ पहुँचकर फोन करना. और हाँ, कुछ भी चाहिए हो तो अपने इस चाचा को याद करना. तुरन्त किसी से भी भिजवा देंगे. हम हैं न!" उनके स्वर में एक ऐसी 'ओवर-एक्टिंग' थी जो शगुन को भीतर तक चुभी, फिर भी उनकी इस हरकत पर हँसी आयी, पर वह मुस्कुराकर रह गयी.

“हाँ चाचा, आप सक्षम हैं, बस आप चाची का ख्याल रखना.” शगुन ने कहा.

जैसे ही कार चली, शगुन ने पीछे मुड़कर उस पुराने घर को देखा. उसे लगा कि वह वहां से हारकर नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक चिंगारी' छोड़कर जा रही है. अब वहां 'अनुमान' और 'मर्यादा' के नाम पर होने वाले जुल्मों को एक 'प्रत्यक्ष' चुनौती मिलने वाली थी.

  ... क्रमशः

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