@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: परीक्षा-पूर्व

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

परीक्षा-पूर्व

पिंजरा और पंख-25
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

मार्च का पहला सप्ताह था. आयुष की टेबल के ठीक सामने टंगे कैलेंडर पर कुछ तारीखों पर लाल घेरे लगे थे. प्रत्येक घेरे में उस दिन होने वाली परीक्षा के विषय का अंग्रेजी प्रथमाक्षर लाल स्याही से अंकित गया था. मेज पर किताबों का ढेर था: फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स. हर किताब पर पोस्ट-इट नोट्स चिपके हुए—लाल, पीले, हरे. लाल: महत्वपूर्ण. पीला: दोहराना. हरा: समझ नहीं आया.

रात के दस बजे थे, आयुष की नजर डेस्क के किनारे चिपके पोस्ट-इट पर थी. "शिक्षा? मुझे खुद ढूँढनी होगी."

यह लाइन आयुष ने महीनों पहले लिखी थी. आज उसे इसका अर्थ समझ आ रहा था. क्या वह जो ढूँढ रहा था—वह इन किताबों में था? या कहीं और?

सुबह कोचिंग में, अंतिम मॉक टेस्ट हुआ. तीन घंटे. साठ सवाल. एक सौ अस्सी मिनट.

टेस्ट खत्म होते ही रोहित शर्मा, उसका सहपाठी, आकर बगल में बैठ गया. "कैसा रहा?"

"ठीक-ठाक," आयुष ने कहा.

"मुझे तो पूरा विश्वास है," रोहित ने कहा, "पापा ने कहा था, यदि इस टेस्ट में 90% से कम आए, तो समझ लेना तैयारी अधूरी है."

आयुष ने रोहित की आँखों में देखा, आत्मविश्वास. वह आत्मविश्वास जो सिर्फ अच्छे अंकों से नहीं, बल्कि एक सुनिश्चित पृष्ठभूमि से आता है. रोहित के पिता आईआईटी से थे. उसकी बहन आईआईटी में थी. उसका घर शिक्षा से भरा था.

आयुष के पिता फैक्ट्री में सहायक मैनेजर थे. उनके लिए आईआईटी एक सपना था; एक ऐसा सपना जो वे अपने बेटे के माध्यम से पूरा देखना चाहते थे.

दोपहर को उसके पापा का भी फोन आया था. "कैसी चल रही है तैयारी?"

"ठीक है, पापा."

"याद रखना, तुम्हारी इन्दौर वाली मौसी का बेटा पिछले साल 95% लाया था. तुम्हें उससे बेहतर करना है."

आयुष ने फोन को कान से थोड़ा हटाया. तुलना... हमेशा तुलना. किरण और शगुन के बारे में सोचा, किरण के पिता उसके पिता के अधीनस्थ थे, पर सामाजिक रूप से ऊपर. क्या किरण के पिता भी ऐसे ही तुलना करते होंगे?

"पापा," आयुष ने कहा, "क्या जरूरी है; अंक या समझ?"

फोन के दूसरे छोर पर चुप्पी. फिर; "दोनों. पर पहले अंक. अंक के बिना कोई तुम्हारी समझ नहीं पूछेगा."

फोन रखने के बाद, आयुष को शगुन की जोरों से याद आई. वह बनस्थली में है. क्या उससे भी ऐसी ही तुलनाएँ की जाती होंगी? या फिर लड़की होने के नाते उसकी तुलना के मापदंड ही अलग होंगे.

शाम को लाइब्रेरी में, विशाल मिला, जो पहले हार मान चुका था. वह एक कोने में बैठा था, किताब खोले, पर आँखें बंद किए. उसके चेहरे पर हार थी.

"क्या हुआ?" आयुष ने पूछा.

विशाल ने आँखें खोलीं. "कुछ नहीं... बस... यह सब बेमानी लग रहा है."

"क्यों?"

" मैं जानता हूँ, मैं पास नहीं हो पाऊँगा. और पापा... वे माफ नहीं करेंगे."

आयुष ने देखा; विशाल की आँखों में डर था. पिता के कोप का डर. समाज के तिरस्कार का डर. क्या यह डर केवल विशाल का था? या हर उस लड़के का था जो इस प्रतिस्पर्धा में था?

रात को कमरे में, आयुष ने अपनी नोटबुक खोली. वही नोटबुक जिसमें उसने "युद्ध-योजना" लिखी थी. उसने एक नया पन्ना खोला और लिखने लगा.

मार्च 7, 2006.
परीक्षा से सात दिन पहले.

आज समझा कि परीक्षा सिर्फ ज्ञान की नहीं है. यह परीक्षा है; पिता की अपेक्षाओं की, समाज की नजरों की, स्वयं के आत्मविश्वास की और नैतिकता की. हर परीक्षा में कुछ परीक्षार्थी नकल का प्रयास अवश्य करते हैं.

रोहित के पास उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का आत्मविश्वास है, मेरे पास पापा की अपेक्षाओं का डर है,
विशाल के पास हार और पापा के माफ न करने का डर है. पर क्या इनमें से कोई भी "ज्ञान" है?

शगुन ने लिखा था: "एक जैसे वस्त्रों के नीचे, भेद के रंग."
क्या परीक्षा भी एक वस्त्र है? जो सबके लिए एक जैसी दिखती है, सब के लिए एक जैसे प्रश्न, एक जैसा समय.

पर वस्त्रों के नीचे... अलग-अलग कहानियाँ हैं. अलग-अलग डर. अलग-अलग सपने.

रोहित को पिता की परंपरा निभाना है, विशाल को पिता के कोप को टालना है, और मुझे? मेरा क्या?
पापा कहते हैं; आईआईटी, लेकिन क्या यह मेरा भी सपना है? या मैं केवल पापा, मम्मी, चाचा, चाची, के सपनों को पूरा करने में जुटा हूँ?

परीक्षा की तैयारी है. पर वह कभी पूरी नहीं होती. बस अचानक हम खुद को परीक्षा हॉल में पाते हैं और थोड़ी देर में हमारे हाथ में आंसर-बुक और क्वेश्चन-पेपर पकड़ा जाता है.

पर आज ......, आज मैं एक सवाल का जवाब ढूँढूँगा.

मेरा सपना क्या है?

जब मुझे इसका जवाब मिल जाएगा ...
तब सिर्फ परीक्षा रह जाएगी. एक कदम. एक दरवाजा न कि पूरी दुनिया.

आयुष ने नोटबुक बंद की. बाहर कोटा की रात एकदम शान्त थी. पास की किसी इमारत के किसी कमरे से किसी के रटने की आवाज आ रही थी. कोई जो शायद ऐसे ही सवाल से जूझ रहा था. जिसके पास एक मात्र हल था, दिमाग पचाने के बजाय रटने का उपयोग करो.

उसने खिड़की से बाहर देखा. आकाश में तारे थे. लाखों-करोड़ों और उनके गिर्द परिक्रमा करते ग्रह, हर तारा अलग, हर ग्रह अलग. हर तारे और ग्रह की अपनी कहानी.

क्या हम सब भी तारे या ग्रह हैं? अलग-अलग? पर एक ही आकाश में?

शायद. और शायद परीक्षा भी एक आकाश है, जिसमें हम सब चमकने की कोशिश कर रहे हैं.

पर असल बात यह नहीं कि हम कितना चमकते हैं.
असल बात यह है... कि हम किस रोशनी से चमकते हैं? चांद की तरह किसी और की रोशनी से?
या सूरज और दूसरे तारों की तरह अपनी रोशनी से?

आयुष ने तय किया कि कल सुबह जब वह उठेगा, तो वह पहले इस सवाल का जवाब ढूँढेगा, उसे इस नोटबुक में नोट करेगा. फिर किताबें खोलेगा.

जब तक मैं नहीं जानता कि मैं क्यों और किस लिए लड़ रहा हूँ?

जब तक जान नहीं लेता की मुझे कैसे लड़ना है — तब तक लडूंगा कैसे?

शायद यही है असली परीक्षा. परीक्षा से भी पहले की परीक्षा. सबसे कठिन, जिसका कोई सिलेबस नहीं,
कोई नोट्स नहीं.

केवल मैं हूँ, और
मेरा सवाल है.                                                                                                                               ... क्रमशः

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