पिंजरा और पंख-27
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
ट्रेन धीमी हुई, आयुष खिड़की से बाहर झाँका. रामगंजमंडी का प्लेटफॉर्म निकट आता जा रहा था. वह अपना पिट्ठू बैग कंधे पर टांगे कोच के दरवाजे पर आ खड़ा हुआ. जैसे ही ट्रेन रुकी वह उतर गया.
स्टेशन से बाहर निकलते ही सब्जी की ठेली वाले रामसहाय मिल गए, “आ गए आयुष बेटा! रोज सब्जी देने जाता हूँ तो भाभी मिलती हैं. उन्हें बहुत उम्मीद है. कहती हैं, “आयुष आईआईटी जरूर जाएगा."
आयुष मुस्कुराया और आगे बढ़ गया.
पंद्रह मिनट में घर सामने था. दरवाजा खुला था. अंदर गया—माँ रसोई में थीं. आयुष को देख खुश हो गई. "आ गया बेटा? जा तेरा बैग रख आ अपने कमरे में. चाची ने कल ही साफ करके सजा दिया है, कह रही थी, आयुष-शगुन आने वाले हैं, उन्हें सब चकाचक मिलना चाहिए."
आयुष ऊपर अपने कमरे में गया. वही कमरा जो दस महीने पहले तक शगुन के साथ साझा था. दोनों के बिस्तरों पर एकदम नयी चादरें बिछी थीं. दीवार पर शगुन और उसकी साझा तस्वीर अभी भी टंगी थी. मेज पर मेजपोश नया था. खिड़की में एक ‘गुलदस्ता’ था, गुलाब- मोगरे के फूलों से सजा. जिनकी भीनी खुशबू महक रही थी.
उसने अलमारी खोल कर अपना बैग रखा. तभी नीचे से माँ की आवाज आ गई.
“चाय बन गयी है, आयुष¡ चाची को बुलाते आना.”
उसे आश्चर्य हुआ कि शाम की चाय माँ बना रही है, और चाची उन्हें बुलाने को कह रही है.
- - -
अगले दिन. शाम पाँच बजे. शगुन की ट्रेन स्टेशन पर रुकी. उसने अपना सूटकेस उठाया और डिब्बे से उतरी. प्लेटफॉर्म पर देखा तो अनिल चाचा खड़े थे, और आयुष भी साथ था.
"लो शगुन आ गई?" चाचा ने सूटकेस ले लिया. उसकी आँखें आयुष से मिलीं. और उसने आयुष को गले लगा लिया.
प्लेटफॉर्म से बाहर निकले तो पापा की कार दिखाई दी.
"चाचा, आप कार लेकर आए? घर तो पास ही है."
"भाई साहब का आदेश था— कार ले जाना, शगुन थकी हुई होगी. बेटी को कार से ही लाना. थकी हुई होगी."
तीनों कार में बैठे. कार स्टेशन से निकली. जल्दी से घर पहुँच गयी.
वह कार से उतर कर सीधे अंदर आ गयी. पापा लिविंग में बैठे थे. उनके पैर छू कर वह रसोई की तरफ बढ़ी. चाची और मम्मा दोनों वहीं मिलीं. माँ ने उसका माथा चूम लिया और चाची ने उसे गले लगा कर अपने अंक में भींच लिया. दोनों अलग हुईँ तो दोनों की आँखें नम थीं.
“तुम लिविंग में चलो. मैंने अभी पकौड़ियाँ तली हैं. लेकर आती हूँ. जब तक इन्हें खाओगी. चाय भी तैयार हो जाएगी.” चाची बोली.
शगुन ने देखा पकोड़ियों की प्लेट सजी हुई थी. “चाची तुम चाय बनाओ मैं इन्हें लेकर जाती हूँ.” वह पकौड़ियाँ ले कर लिविंग में आ गयी. तब तक चाचा और आयुष भी वहीं आ बैठे थे.
कुछ देर बाद मम्मा चाय लेकर आईं. चाय की ट्रे टेबल पर रखते हुए कहा. “खुशखबरी, है चाची को तीसरा महीना है, तुम एक बार फिर दीदी बनने वाली हो.”
सुनते ही आयुष चाचा से बोला. “चाचा ये बेईमानी है, बाप बनने वाले हो और हमें मीठे की जगह पकौड़ियाँ खानी पड़ रही हैं.”
“तसल्ली रखो, रात के खाने में मीठा होगा. मैंने तुम्हारी चाची को खास केसरिया खीर बनाने को कहा है.”
"हाँ बेटा, तुम्हारे चाचा बेटे के बाप बनेंगे. देख लेना बेटा ही होगा. मेरी माँ कहती थी, सुबह-सुबह जी मिचलाने लगे तो लड़का ही होता है. चाची को भी सप्ताह भर से ऐसा ही हो रहा है." माँ ने बोला.
गुप्ताजी की आँखें खुशी से चमक उठीं. "वाह! बहुत अच्छी खबर है! भगवान करे लड़का हो"
आयुष और शगुन ने एक-दूसरे की ओर देखा. बिना कुछ कहे, दोनों ने एक ही सवाल पूछा—क्यों?
माँ को कुछ समझ नहीं आया. वह शगुन से बोलीं, “तुम कुछ साँवली दिख रही हो. क्या बनस्थली में धूप में ज्यादा रहना पड़ता है?”
“नहीं मम्मा¡ ऐसा कुछ नहीं है. बहुत दिनों में आयी हूँ न तो आपको ऐसा लग रहा है.”
फिर कुछ रुक कर बोली, “माँ, मैं अपने कमरे में जाती हूँ, थोड़ी देर आराम करूंगी. सफर बहुत लंबा था.” इतना कहकर वह उठ गयी.
शगुन आधे घंटे लेटी होगी कि कमरे का दरवाजा खुला. उसने देखा चाची थीं. वह उठ बैठी.
दोनों बातें करने लगीं. थोड़ी देर बाद चाची नीचे चली गयीं.
- - -
शाम गर्म थी. कमरे का कूलर राहत नहीं दे रहा था. शगुन छत पर गई तो आयुष वहाँ पहले से टहल रहा था.
"तुम यहाँ हो," शगुन ने कहा.
आयुष ने देखा. "हाँ... यहाँ शांति है."
शगुन मुंडेर पर बैठ गई.
आयुष भी टहलना छोड़ उसके नजदीक मुंडेर पर आ बैठा.
"तुम्हारा पेपर कैसा रहा?" शगुन ने पूछा.
"ठीक था... पर शायद पापा की उम्मीदों पर शायद खरा न उतर सकूँ."
"क्यों?"
"मैंने... रट्टा न लगाया. सब कुछ समझ कर पढ़ा, जो समझा वही लिखा."
"और इससे क्या हुआ?"
"इससे अंक कम आ सकते हैं. और पापा... पापा समझेंगे नहीं."
एक क्षण की चुप्पी. फिर शगुन बोली, "मैंने भी अपने पेपर में वही लिखा जो सही लगा."
"तुम समझती हो. अच्छा "चाची के लिए क्या सोचती हो?" आयुष ने पूछा.
शगुन ने गहरी साँस ली. "मुझे लगता है... हम सब इतने कंडीशन्ड हैं कि लड़की की कल्पना भी नहीं कर पाते."
"हाँ... मैंने भी यही सोचा."
"क्या तुम्हें लगता है... हम भी कंडीशन्ड हैं?" शगुन ने पूछा.
आयुष ने आकाश की ओर देखा. "हाँ... हम भी. मैं कंडीशन्ड हूँ कि मुझे आईआईटी में जाना है. तुम कंडीशन्ड हो कि तुम्हें अच्छे दूल्हे से शादी करनी है."
"और अगर हम ऐसा नहीं करना चाहें तो?"
"तो हमें लड़ना पड़ेगा," आयुष ने कहा. "खुद से, परिवार से."
"क्या तुम लड़ोगे?"
"मैं कोशिश करूँगा. और तुम?"
शगुन मुस्कुराई. "मैं भी."
नीचे से आवाज आई—"आयुष! शगुन! नीचे आओ, खाना तैयार है!"
दोनों उठे और सीढ़ियाँ उतरने लगे.
- - -
रात.
शगुन अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी. आयुष सो चुका था.
उसने सोचा—आयुष की दुनिया में आईआईटी थी, उसकी दुनिया में शादी.
पर आज उन्होंने एक-दूसरे से कहा था—"हम लड़ेंगे."
शायद यही पहली जीत थी.
... क्रमशः
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