@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: शब्दों का संबल

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

शब्दों का संबल

 पिंजरा और पंख-39

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
मार्च का पहला ही सप्ताह था. वार्षिक परीक्षा के टाइमटेबल भी आ गए थे. शगुन का आखिरी पेपर छह अप्रैल को था. उसका मन कर रहा था कि उसी दिन शाम को या अगले दिन दुपहर होते होते वह बनस्थली से घर के लिए निकल ले. फिर उसे फौरन आयुष का ध्यान आया. वह अपने जीवन की पहली बड़ी परीक्षा की दहलीज़ पर खड़ा था. राजस्थान बोर्ड की सीनियर सेकेंडरी 12वीं कक्षा की परीक्षा मार्च के दूसरे सप्ताह से शुरू हो कर मार्च के अंत में समाप्त होनी थी और उसके करीब डेढ़ माह बाद, सात अप्रेल 2007 को वह तारीख थी जिसके लिए कोटा के हज़ारों बच्चे रातों की नींद और दिन का चैन बेच चुके थे—आईआईटी-जी (IIT-JEE).

शगुन ने सोचा क्यों न वह पापा से कहे कि वे सात अप्रेल की रात कार से बनस्थली आ जाएँ, फिर वे आठ अप्रैल को 10-11 बजे बनस्थली से निकलें तो 4, 4:30 बजे तक कोटा पहुँच जाएँ और फिर वहाँ से आयुष को साथ ले कर रामगंजमंडी जाएँ. उसने आयुष को फोन लगाया. दो-तीन रिंग के बाद आयुष ने फोन उठाया. उसकी आवाज़ में वही पुराना भारीपन था जो दिवाली की छुट्टियों के समय गायब हो गया था.

"तैयारी कैसी है आयुष? बोर्ड के एडमिट कार्ड मिल गए?" शगुन ने उत्साह भरने की कोशिश की.

"हाँ दीदी, बोर्ड की तैयारी बिलकुल ठीक है... पर 8अप्रेल वाली बात दिमाग से निकल ही नहीं रही. कोचिंग में अब रोज़-रोज़ 'मॉक टेस्ट' हो रहे हैं. रोहित की रैंक अब टॉप-50 में आने लगी है और वह कहता है कि जो आखिरी महीने में नहीं जी-जान लगाएगा, उसका एक साल सीधे बर्बाद होगा. दीदी, क्या सच में एक परीक्षा से साल बर्बाद हो जाता है?" आयुष का स्वर लड़खड़ाया.

शगुन ने गहरी सांस ली. उसने खिड़की से बाहर देखा जहाँ लड़कियां मैदान में खेल रही थीं. उसने डॉ. शास्त्री की उस क्लास को याद किया, जिसमें उन्होंने 'टाइम और वैल्यू' पर बात की थी.

"आयुष, मेरी बात ध्यान से सुन. समय कभी 'बर्बाद' नहीं होता, वह केवल 'अनुभव' में बदलता है. तूने अगस्त में मुझसे एक वादा किया था कि तू विज्ञान को 'अंगीकार' करेगा, उसे परीक्षा के लिए रटेगा नहीं. क्या तुझे अपनी समझ पर भरोसा है?"

"समझ तो है दीदी, पर जब टेस्ट पेपर सामने आता है और घड़ी की सुइयाँ भागने लगती हैं, तब सब धुंधला होने लगता है. ऐसा लगता है जैसे मैं फिर से वही 'एवरेज' लड़का बन रहा हूँ."

"नहीं आयुष!" शगुन ने दृढ़ता से कहा. "तूने दिवाली पर 'मुक्ति' को अपनी गोद में लिया था, याद है? तूने कहा था कि हम उसे लेबल्स से मुक्त रखेंगे. अगर तू खुद को 'एवरेज' के लेबल से मुक्त नहीं कर पाएगा, तो उसे क्या सिखाएगा? आठ अप्रैल एक युद्ध नहीं है, वह सिर्फ तेरे और उन सिद्धांतों के बीच की एक बातचीत है जिन्हें तूने पिछले छह महीनों में जिया है. तू बस उन सिद्धांतों को कागज़ पर उतार देना, परिणाम के बारे में सोचने पर समय खराब मत करना."

फोन के दूसरी तरफ थोड़ी देर सन्नाटा रहा. फिर आयुष की धीमी आवाज़ आई, "दीदी, यहाँ कोटा में सब कहते हैं कि, यही एक मौका है. इसके बाद ज़िंदगी खत्म है."

शगुन मुस्कुराई, "ज़िंदगी  'आठ अप्रैल' से शुरू होगी आयुष, उस पर खत्म नहीं होगी. तूने 'ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' पढ़ी है, क्या उसके लेखक ‘स्टीफन हॉकिंग’ ने हार मानी थी? तुझे बस 'आज' में रहना है. मार्च की बोर्ड परीक्षा को अपनी नींव बना और आठ अप्रैल को अपना शिखर. तू मेरा वही प्यारा साहसी भाई है जो सच्चाई की खोज में निकला है, न कि किसी रैंक की."

"दीदी... अब थोड़ा हल्का महसूस हो रहा है. मुक्ति न जाने कैसी होगी?" आयुष ने विषय बदलते हुए पूछा.

"मुक्ति अब पहचानने लगी है. कल मम्मा से बात हुई थी, वे कह रही थीं कि मुक्ति तेरी तस्वीर को देख कर मुस्कुराती है. वह अपने 'आईआईटी वाले भैया' का इंतज़ार कर रही है, लेकिन इसलिए नहीं कि तू उसे कोई रैंक दिखाए, बल्कि इसलिए कि तू घर लौटकर आए और उसे फिर से अपनी गोद में ले."

आयुष ने फोन रख दिया. वह अपनी मेज़ पर रखे उस पुराने चार्ट को देखने लगा. उसने टेबल से लाल स्याही का पेन उठाया और ‘आठ अप्रैल’ की तारीख के नीचे छोटे अक्षरों में लिखा—"मेरा सत्य से साक्षात्कार का दिन, युद्ध का नहीं."

आयुष ने पेन वापस मेज़ पर रखा. अजीब बात थी, हर बार, जब वह 'आठ अप्रैल' के बारे में सोचता था, उसके हाथ काँपने लगते थे, लेकिन आज उसकी हथेलियाँ स्थिर थीं. उसने कमरे की खिड़की खोल दी. सड़क पर कुछ छात्र भारी बैग टाँगे, झुके हुए कंधों के साथ जा रहे थे. आयुष को उन पर तरस आया; वे छात्र नहीं, 'रैंक के बोझे’ से दबे हुए लड़के लग रहे थे.

उसने अपनी फिजिक्स की किताब उठाई. इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म का एक जटिल सवाल, जो सुबह उसे उलझा रहा था, अब उसे एक 'दुश्मन' की तरह नहीं लगा, बल्कि 'सत्य' का एक हिस्सा लग रहा था. उसने अपनी आँखें मूँद लीं और फिजिक्स के नियमों को महसूस किया—जैसे वे नियम उसके आसपास की हवा में तैर रहे हों. शगुन ने सही कहा था, विज्ञान रटने की चीज़ नहीं, जीने की चीज़ है.

आयुष ने सवाल हल कर लिया था. सोने का समय था. उसने कमरे की लाइट बंद कर दी. कमरा फिर भी पूरा अंधेरा नहीं था. खिड़की के शीशों से रोशनी छन कर आ रही थी. दीवार पर चिपके फॉर्मूला चार्ट अब उसे डरावने विज्ञापनों जैसे नहीं, बल्कि पुराने परिचित दोस्तों जैसे लग रहे थे. उसे लगा जैसे 'मुक्ति' उसके बगल में सोई हुई है, और उसकी सांसों की लय के साथ उसके मन में भरा हुआ 'एवरेज' होने का तमाम शोर शांत हो गया है. उस रात, महीनों बाद आयुष कोई सपना नहीं देखा. वह बिना किसी डर के गहरी नींद सोया.

अगली सुबह जब उसकी नींद खुली तो वह पूरी तरह तरोताजा था.  'आठ अप्रैल' अब उसके लिए डर की रेखा नहीं रह गया था. अब उसे खुद को साबित करना था, और उसके लिए वह बिलकुल तैयार था.
... क्रमशः

कोई टिप्पणी नहीं: