लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
अस्पताल के लेबर रूम से बाहर आकर नर्स वहीं दरवाजे के बाहर खड़ी रह गयी. उसके चेहरे पर थकान के चिन्ह थे, साथ ही एक संतोष की मुस्कान भी. श्रीमती गुप्ता, अनिल चाचा, आयुष और शगुन उसे देख एक झटके में अपनी बेंच से उठ खड़े हुए. उनके चेहरे पर एक ही प्रश्न था.
"बधाई हो! दीवाली के दिन लक्ष्मी आई है... बहुत सुंदर स्वस्थ बिटिया हुई है,"नर्स ने अपनी आवाज़ में एक स्वाभाविक उत्साह भरने की कोशिश की.”
शगुन ने मम्मा के चेहरे की ओर देखा. उस एक पल के लिए मम्मा के चेहरे पर वही भाव आया जिसे डॉ. शास्त्री 'अनकही निराशा' कहते थे. यह वर्षों की उस कंडीशनिंग का स्वाभाविक प्रभाव था, जो 'लड्डू गोपाल' के आगमन की रट लगा रही थी.
अगले ही पल, नर्स ने कहा, “जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं”.
चाची की सलामती की खबर ने मम्मा के चेहरे पर आए उस निराशा भाव को ढक लिया.
कुछ ही देर में लेबर रूम से एक ट्रॉली बाहर निकली. उस पर चाची लेटी थीं, आँखें बन्द किए हुए. ट्रॉली को उन्हें एलॉट हुए कमरे की ओर ले जाया जाने लगा. नर्स ने बताया कि बच्ची को वे लेकर आ रहीं हैं.
कमरे में लाकर चाची को ट्रॉली से उनके बिस्तर पर शिफ्ट किया गया. कमरा अचानक डिटॉल की गंध से भर गया. चाची के चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जैसे वे बहुत बड़ा युद्ध जीत कर लौटी हों. श्रीमती गुप्ता ने पूछा, कैसी हो नीतू? चाची ने आँखें खोली ठीक हूँ, लेकिन मेरी बच्ची?
“चाची, उसे नर्स लेकर आ ही रही है.” शगुन की आवाज सुनकर चाची की आँखों में चमक आ गयी.
कुछ ही देर में नर्स एक गुलाबी कपड़े में लिपटे हुए शिशु को अपनी गोद में लेकर आयी और चाची की बगल में लिटा दिया. वह नन्हा सा वजूद बिलकुल चुप था.
मम्मा ने नर्स की ओर देखा. “खूब रो ली है, थक कर सो गयी है.” मम्मा ने संतोष की साँस ली.
तभी चाचा अंदर आ गए. श्रीमती गुप्ता ने पूछा, “अनिल जी, आपके भैया को फोन कर दिया कि नहीं?”
“कर दिया है पर वे तब आएंगे जब यहाँ से कोई घर जाएगा. दीवाली के दिन घर खाली कैसे छोड़ेंगे?” जवाब देते वक्त उनकी निगाहें बिस्तर की ओर थीं. चाचा, जो हमेशा 'खानदान के वारिस' की बातें करते थे, अपनी बेटी को देखकर सन्न रह गए थे. मम्मा समझ गयीं. उन्होंने नन्ही सी जान को बड़ी सलाहियत से उठाया और चाचा की गोद रख दिया. चाचा की भारी मूंछों के नीचे दबी मुस्कान और गीली होती आँखें बता रही थीं कि उनके भीतर का 'पितृसत्ता-जनित अहंकार' कुछ तो पिघला है.
शगुन ने आयुष की कोहनी को छुआ. आयुष मंत्रमुग्ध होकर उस बच्ची की मुड़ी हुई नन्ही उँगलियों को देख रहा था.
"देख रहे हो आयुष? यह इस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर इंसान है," शगुन ने फुसफुसाते हुए कहा.
"क्यों दीदी?" आयुष ने अपनी नज़रें बच्ची से बिना हटाए पूछा.
"क्योंकि इसके पास अभी कोई नाम नहीं है, कोई जाति नहीं है, और न ही कोई रैंक है. यह एक कोरी स्लेट है. न यह 'एवरेज' है, न 'एलीट'." शगुन की आवाज़ में एक दृढ़ता थी.
आयुष बुदबुदाया, "सच दीदी... पर क्या हम इसे ऐसे ही रहने देंगे? कल जब यह बड़ी होगी, क्या मम्मा और चाची इसे रसोई के सबक नहीं देंगी? क्या चाचा इसे भी किसी रेस का हिस्सा नहीं बनाएंगे?"
शगुन ने चाची की ओर देखा, जिन्होंने अपनी थकी हुई आँखों से शगुन को ही निहारा था. उन आँखों में एक मौन सहमति थी.
शगुन ने आयुष से कहा, "यह हमारे ऊपर है आयुष. हम इसे एक 'डिजिट' या 'लेबल' नहीं बनने देंगे. हम इसे 'इंसान' बनना सिखाएंगे."
तभी मम्मा ने पास आकर कहा, "नाम क्या सोच रखा है, अनिल जी? यह पहली संतान है, कुछ अच्छा सा नाम होना चाहिए."
चाचा ने अपनी रुँधी हुई आवाज़ में कहा, "शगुन बताएगी... आखिर इसके आने से सबसे ज़्यादा खुश वही है."
शगुन ने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ दीवाली की रात अब ढल रही थी. बिजली की रोशनियाँ बरकरार थीं, कुछ मिट्टी के दीपक अभी भी टिमटिमा रहे थे, सुबह का हल्का उजाला क्षितिज से बाहर निकलने लगा था. उसने मुस्कुराकर कहा, " चाचा, इसका नाम 'मुक्ति' कैसा रहेगा? पूर्वाग्रहों से मुक्ति, लेबल्स से मुक्ति."
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया. यह नाम घर के पुराने ढाँचे के लिए भारी था, लेकिन तभी नन्ही जान के पहली किलकारी निकली, जैसे उसने इस सन्नाटे को नामंजूर कर दिया. आयुष और शगुन की खुशी का कोई ठिकाना न था. उन्हें लगा, जैसे उनके मन में दीवाली के पटाखे फूट रहे हैं—खुशी के, उम्मीद के.
... क्रमशः
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें