@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: रोशनियों के बीच

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

रोशनियों के बीच

  पिंजरा और पंख-37

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

 दीवाली की छुट्टियाँ शुरु हो गयी थीं. घर के दोनों किशोर छुट्टियाँ बिताने और त्यौहार मनाने आ चुके थे. घर में हलचल बढ़ गयी थी और माहौल में उत्सुकता. पिछली मई-जून में आयुष और शगुन कोटा और वनस्थली गए तब घर की परिस्थितियाँ अलग थीं. घर की देहली पर खड़ी शगुन को सब कुछ पहले जैसा ही लग रहा था, लेकिन मन में डॉ. शास्त्री के समझाए हुए 'लेबल्स' और 'पूर्वाग्रह' शब्दों के अर्थ गूंज रहे थे.

चाची को नौवां महीना शुरू हो गया था. वे लिविंग रूम में सोफे पर बैठी बेसन के लड्डू बांध रही थीं. इस बीच मम्मा दो-तीन बार रसोई से निकलकर उनके पास आयी थीं. पहली बार उन्होंने चाची को डाँटा था, “ये लड्डू तुझे बांधने की क्या जरूरत है. तुझे आराम करना चाहिए.” चाची ने “काम में मन लगा है, और काम भारी नहीं है” कहकर वापस कर दिया. दूसरी बार आईं तो चाची को सीधे आराम की हिदायत दे डाली. तब चाची ने “बस थोड़े से और हैं इन्हें बांधकर चली जाऊंगी” कहा. तीसरी बार मम्मा गुस्सा हो गयीं, “तू उठ, बाकी के लड्डू शगुन बांध लेगी”. तब शगुन ने माँ को समझाया, “माँ थोड़ा बहुत काम करते रहना अच्छा होता है, पेशियाँ मजबूत बनी रहती हैं और डिलीवरी आसान हो जाती है. मैं उनका साथ दे ही रही हूँ.”

"अभी भारी काम मत कर, बस दो चार दिन की बात है. फिर घर में 'लड्डू गोपाल’ आएंगे, दीवाली की खुशियाँ चौगुनी हो जाएंगी.

'लड्डू गोपाल', बस यही शब्द शगुन को खटक गया. उसने देखा कि मम्मा जिस तरह चाचा और पापा से बातें करती उनसे होने वाले बच्चे का जेंडर तय कर दिया गया था. यदि लड़की हुई तो क्या उससे खुशियाँ कम हो जाएंगी? उसका मन खराब हो गया. उसने नीतू चाची की ओर देखा. आँखें मिलीं तो चाची समझ गयीं. बोलीं, “भाभी की बातों पर तू ध्यान मत दे. कंडीशनिंग झेलते उनकी उम्र गुजर गयीं, वे आदतन ऐसा कहती हैं. और मुझे इन बातों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता. तेरे चाचा भी अब मेरे सामने लड़का या लड़की होने की बात नहीं करते. हाँ, बाहर जरूर डींगें हाँकते होंगे.”

तभी आयुष जीने से नीचे उतरा. उसके हाथ में इस बार 'संबल' कोचिंग के नोट्स की जगह एक किताब थी, 'ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम'. शगुन ने उसे गौर से देखा; उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे लगभग गायब थे और वह पहले से कहीं अधिक शांत दिख रहा था.

"दीदी, मांडणा बहुत सुंदर बनाई है, आपने," आयुष ने शगुन की बनाई रंगोली देख कर मुस्कुराते हुए कहा.

"थैंक्यू आयुष! कोटा की क्या खबर है? इस बार रैंक क्या रही? डर तो नहीं लगा?" शगुन ने धीरे से पूछा.

"दीदी, रैंक अब बस एक नंबर है. आपने सही कहा था, जब से मैंने फॉर्मूले रटने के बजाय नियमों और सिद्धांतों को समझना शुरू किया, तब से फिजिक्स के प्रश्न पहेली लगने लगे हैं, जिन्हें सुलझाने में मज़ा आता है. मैं सच को अंगीकार कर रहा हूँ.”

“तू इधर-उधर की बातें करने के बजाय ये बता कि तेरी रैंक का क्या हाल है?

“बस दीदी, ये समझ लो कि रोहित अब मुझे 'एवरेज' नहीं कहता, और मुझे अब रैंक से कोई फर्क नहीं पड़ता.”

“मतलब, तू बताएगा नहीं?” यह कहते हुए शगुन खड़ी हो गयी, “पहले की तरह तेरे कान उमेठूँ”

“नहीं दीदी, उसमें बहुत दर्द होता है.” इतना कह कर वह शगुन के नजदीक गया और कान में फुसफुसाकर कहा, “89 आयी है.”

“अरे वाह, क्या बात? फिर तो आज डबल जश्न होगा.”

“हुआ क्या है? कुछ मुझे भी बताओगे?” चाची ने हाथ से लड्डू का चूरमा झाड़ते हुए पूछा.”

“अरे चाची, खबर ही ऐसी है कि आप नाचने लगेंगी.” शगुन की आवाज रसोई में मम्मा तक पहुँच गयी. वे बाहर निकलीं और दोनों को डाँटने लगीं. “तुम दोनों चाची को तंग मत करो. परेशानी हो जाएगी.”

“भाभी, कोई परेशानी नहीं होगी, हम केवल बातें कर रहे हैं.” चाची ने हँसते हुए कहा.”

शगुन बहुत खुश थी, उसका भाई न केवल चक्रव्यूह से निकल आया था, बल्कि प्रगति पर भी था.

शाम को घर दीयों और बिजली की रोशनियों से जगमगा उठा. सबने एक साथ बैठ कर लक्ष्मी पूजन करके भोजन किया. बाहर पटाखे चलने लगे. शगुन और आयुष सोच ही रहे थे कि शहर की रोशनी देख आएँ. तभी कमरे से चाची की चीख सुनाई दी. उत्सव पल भर में तनाव में बदल गया. चाची को दर्द शुरू हो गए थे.

आनन-फानन में चाचा ने मारुति बाहर निकाली. मम्मा ने सहारा दे कर चाची को पिछली सीट पर बिठाया और खुद साथ बैठ गयी. पापा ने स्टीयरिंग संभाली, चाचा पास बैठे. पटाखों के धमाकों के बीच कार अस्पताल की और बढ़ चली. घर पर आयुष और शगुन ही रह गए. कुछ देर बाद पापा ने लौटकर बताया कि डाक्टर ने कहा अभी कुछ घंटे लगेंगे. शगुन ने उनसे पूछा कि आप घर पर हैं तो मैं और आयुष अस्पताल चले जाएँ? गुप्ताजी ने, “वैसे भी वहाँ मेरी कोई जरूरत नहीं”, कहते हुए अनुमति दे दी.

थोड़ी देर बाद दोनों अस्पताल में चाची के बिस्तर के पास थे. चाची को दर्द तेज हुआ तो नर्स उनका हाथ पकड़ कर लेबर रूम ले गयीं. मम्मा उनके पीछे गयीं. वे दोनों भी लेबर रूम के बाहर की बैंच पर जा बैठे.

आयुष वहाँ दीवार पर लगा चार्ट देखने लगा जिसमें भ्रूण विकास की प्रक्रिया समझाई गई थी.

"डर लग रहा है आयुष?" शगुन ने पूछा.

"डर नहीं दीदी, बस सोच रहा हूँ कि जो अभी इस दुनिया में आने वाला है, उसे हम सबसे पहले कौन सा लेबल देंगे? क्या उसे भी हम अपनी उम्मीदों के बोझ तले दबा देंगे?"

शगुन ने आयुष का हाथ थाम लिया. उसे अहसास हुआ कि छह महीने पहले जो भाई संबल ढूँढ रहा था, आज वह खुद दूसरों के लिए संबल बन रहा है.

तभी लेबर रूम का दरवाज़ा खुला और नर्स बाहर आई. दोनों की साँसें थम गईं.

... क्रमशः 

कोई टिप्पणी नहीं: