@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: दरकती दीवारें

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

दरकती दीवारें

  पिंजरा और पंख-35

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

तीनों जब मेस से अपने रूम में लौटीं तो सब यही बात कर रही थीं कि प्रियंका उनके साथ नहीं खाना चाहती थी. उसका कारण शर्म थी या गुस्सा इसमें तीनों के बीच मतभेद था. प्रियंका जैसे ही खाना खाकर लौटी सब चुप हो गयीं. प्रियंका भी वापस लौट कर चुपचाप कपड़े ले बाथरूम चली गयी. कपड़े बदल कर लौटने पर ‘भगवद्गीता’ निकालकर अपने बिस्तर पर इस तरह करवट लेकर लेटकर पढ़ने लगी कि उसका चेहरा दीवार की ओर रहे.

शगुन ने गौर किया कि पिछले पंद्रह मिनट से प्रियंका ने एक भी पन्ना नहीं पलटा था. वह पढ़ नहीं रही थी, अपितु वह खुद को उस मानसिक हमले से बचाने की कोशिश कर रही थी जो डॉ. शास्त्री के लेक्चर ने उसकी 'पंडिताई' पर किया था.

शगुन अपनी मेज पर बैठी डायरी लिख रही थी, तभी सीमा उसके पास आकर धीरे से बैठ गई. आज उसकी आँखों में हमेशा वाली झिझक नहीं थी.

"शगुन," सीमा ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "आज पहली बार ऐसा लगा जैसे क्लास में मेरी ही ज़िन्दगी के बारे में बात हो रही है. मैम ने जब 'लेबल्स' की बात की, तो मुझे लगा जैसे मेरे कंधे से सदियों पुराना कोई बोझ उतर गया हो. क्या वाकई हम सिर्फ एक लेबल नहीं हैं?"


शगुन ने सीमा का हाथ थाम लिया. उसी पल दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई. फातिमा खड़ी थी, उसके चेहरे पर भी वैसे ही सवाल थे जो सीमा की आँखों में तैर रहे थे.

"क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" फातिमा ने पूछा और सीमा के पास ही शगुन के बिस्तर पर बैठ गई. "आज डॉ. शास्त्री ने जो कहा, उसने मुझे डरा दिया शगुन. अगर 'स्टीरियोटाइप्स' ही हमारी पहचान तय करते हैं, तो क्या फातिमा होना हमेशा एक संदेह के दायरे में रहना ही रहेगा? प्रियंका का आज मेस से भागना... क्या वह भी इसी स्टीरियोटाइप का हिस्सा था कि वह हमारे साथ बैठकर 'अशुद्ध' नहीं होना चाहती?"

वे तीनों फुसफुसा कर बातें कर रही थीं, फिर भी शायद उनकी फुसफुसाहट प्रियंका तक पहुँच गयी थी. उसके शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई, पर वह मुड़ी नहीं.

शगुन ने कहा, “बादल हो रहे हैं उससे यहाँ कमरे में उमस हो रही है, क्यों न हम बाहर टैरेस पर चल कर बैठें? दोनों समझ गयीं कि शगुन स्वतंत्रता से बातें करना चाहती है. तीनों बाहर टैरेस पर आ गईं और मुंडेर पर बैठ कर बातें करने लगीं.

"देखो फातिमा, सीमा... प्रियंका का भागना असल में उसका डर है. उसे डर है कि अगर उसने हमारी मौलिकता को पहचान लिया, तो उसकी अपनी 'श्रेष्ठता' का महल ढह जाएगा. डॉ. शास्त्री ने आईना दिखाया है, और आईना सबसे पहले उन्हें डराता है जिनके चेहरे पर नकाब होते हैं." शगुन ने कहा.

"मुझे तो डर लगता है शगुन," फातिमा ने लंबी सांस लेते हुए कहा. "यहाँ बनस्थली में खादी के वस्त्रों में भी मुझे अक्सर अपनी पहचान छुपानी पड़ती है जिससे कोई मुझे 'कट्टर' न समझ ले. मैं हर वक्त मुस्कुराती रहती हूँ ताकि कोई मेरे धार्मिक स्टीरियोटाइप से न डरे."

सीमा ने पहली बार फातिमा के कंधे पर हाथ रखा. "फातिमा, हम दोनों अलग-अलग वजहों से एक ही किनारे पर खड़ी हैं. मुझे अपनी जाति छुपानी पड़ती है ताकि कोई मुझे कमतर न समझे, और तुम्हें अपनी पहचान ताकि कोई तुम्हें पराया न समझे. शगुन सही कह रही है, कंडीशनिंग ने हमें दुश्मन नहीं, बल्कि 'कैदी' बना रखा है."

“पर किसी को अपनी आइडेंटिटी छुपाने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? दूसरे उसे उसी रूप में एक इंसान के रूप में स्वीकार क्यों नहीं कर सकते?” फातिमा ने सवाल रख दिया.

“मैं ठीक से नहीं बता सकती, लेकिन मुझे लगता है यह हमारी अपनी कंडीशनिंग के कारण भी है और पूरे समाज की कंडीशनिंग के कारण भी.” शगुन ने उत्तर देने का प्रयास किया. “लेकिन कल की क्लास में डॉ. शास्त्री से पूछने के लिए यह सबसे बेहतर सवाल जरूर है.

अगली सुबह जब वे अपनी क्लास के लिए निकलीं तो रास्ते में सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सामूहिक प्रार्थना के स्वर गूंज रहे थे. जब 'हिंद देश के निवासी...'. शगुन ने गौर किया कि खादी की एक जैसी रंग-योजना वाले वस्त्र पहने पंक्तियों में खड़ी एक सुर में गा रही थीं, पर उन पंक्तियों के बीच भी अदृश्य दीवारें थीं. प्रियंका को प्रार्थना का प्रकरण हमेशा प्रिय लगता. वह कहती भी थी कि आखिर कॉलेज में सुबह सामूहिक प्रार्थना क्यों नहीं होती?

क्लास में डॉ. शास्त्री ने कहा, “कल हमने पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता के बारे में जाना था. आप सभी ने उस पर विचार अवश्य किया होगा. कुछ प्रश्न भी जन्मे होंगे. यदि कोई प्रश्न पूछना चाहे तो पूछे.

शगुन ने रात वाला प्रश्न ही उनके सामने रख दिया. “मैम, हमारे समाज में और यहाँ भी क्यों कुछ लोगों को अपनी जातीय या वर्गीय आइडेंटिटी छुपाने की जरूरत पड़ती है?”

“यह बेहतर सवाल है. लेकिन इसका उत्तर मैं अभी नहीं दूंगी. आज मैं आप सबको एक असाइनमेंट दे रही हूँ, नोट कीजिए. आपको अपने स्वयं के तीन ऐसे पूर्वाग्रह (Prejudices) पहचानने हैं जो आपको अपने परिवार या समाज से मिले हैं, और उन पर एक ईमानदार रिपोर्ट लिखनी है. यह रिपोर्ट गुप्त रहेगी. इससे मुझे यह समझने में मदद मिलेगी कि हमें आगे की क्लासेज में किन चीजों पर अधिक ध्यान देना है."

शगुन ने प्रियंका की ओर देखा. उसने अपनी नोटबुक में खाली पृष्ठ पर सबसे ऊपर ऊँ लिखा. फिर नीचे ही जैसे वह तीन पूर्वाग्रह लिखने लगी उसके हाथ में पकड़ा हुआ पेन काँपने लगा. यह प्रोजेक्ट उसके लिए अपनी आत्मा के उन कोनों में झाँकने जैसा था जहाँ उसने 'अशुद्धता' और 'श्रेष्ठता' के भूत पाल रखे थे.

शगुन ने अपनी कॉपी में पहला वाक्य लिखा— "कंडीशनिंग को पहचानना ही उसे तोड़ने का पहला कदम है. मुझे अपने पूर्वाग्रहों की कोई जानकारी नहीं, जिनकी हुई उन्हें मैंने त्याग दिया. फिर भी मैं अपने तीन पूर्वाग्रह तलाश करूंगी और उन पर रिपोर्ट लिखूंगी."
... क्रमशः

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