पिंजरा और पंखा-45
लघुकथा श्रृखंला : दिनेशराय द्विवेदी
'कामाख्या एक्सप्रेस' के कोटा जंक्शन से रवाना होते ही आयुष को विस्थापन का अहसास हुआ. वह घर से बहुत दूर, दो हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर गुवाहाटी जा रहा था. वहाँ उसे आईआईटी में कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग पढ़ना है. इससे उसे एक खास कुशलता मिलेगी जो एक अच्छी नौकरी हासिल करने में उसे मदद करेगी. उसके परिवार की आकांक्षाएँ पूरी होंगी. लेकिन उसकी खुद की आकांक्षाओं का क्या? तभी उसकी नजर उबासी लेते पापा पर पड़ी.
“पापा, आप लेट जाएँ, कुछ नींद ले लें, रात भर ठीक से सोए नहीं हैं.” आयुष ने सीट से खड़े होकर कहा.
“सही है, तुम भी मिडिल बर्थ खोल लो और लेट जाओ, दो-एक घंटे की नींद ले लेंगे तो सहज हो जाएंगे.”
आयुष ने मिडिल बर्थ खोल ली और वह उस पर चला गया. गुप्ताजी लोअर बर्थ पर लेट गए. दोनों पिता-पुत्र को दो दिन और दो रातों तक सफर करना था.
17 जुलाई की सुबह जब ट्रेन 'कामाख्या स्टेशन' पर रुकी, तो बाहर की नमी और पहाड़ियों की धुंध ने उन्हें चकित कर दिया. टैक्सी से ब्रह्मपुत्र का पुल पार कर जब वे अमिन्गाँव आईआईटी कैंपस पहुँचे, तो उसकी विशालता देख दोनों हतप्रभ रह गए.
उसे 'बराक' (Barak) हॉस्टल के बी-ब्लॉक में कमरा नंबर 112 मिला. इस होस्टल में सभी कमरे एक-एक स्टूडेंट के लिए बने थे. वह अपना सामान अपने कमरे में ले आया. पापा को कैम्पस के गेस्ट हाउस में स्थान मिला. 18 से 20 जुलाई के बीच 'एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक' की लंबी कतारों में खड़े होकर आयुष ने दस्तावेजी कार्रवाई पूरी की, गुप्ताजी उसके साथ लगे रहे. वे मन ही मन आयुष पर गर्व कर रहे थे कि आयुष ने खुद अपनी मेहनत से यहाँ तक पहुँचने की योग्यता हासिल की. उन्हें विश्वास था कि वह यहाँ भी अच्छा ही करेगा.
होस्टल में पास का कमरा नं. 111 कार्तिक को मिला था. वह हैदराबाद से था. कार्तिक की टूटी-फूटी हिंदी और आयुष की खामोशी के बीच पहले दो दिन केवल 'औपचारिक हेलो' में बीते. 23 जुलाई को पापा उसे गले लगाकर वापस राजस्थान के लिए रवाना होने लगे तो दोनों की आँखें नम थी. ट्रेन के रवाना होने के बाद पहली बार आयुष को अपने सीने पर एक भारी पत्थर जैसा महसूस हुआ. वह घर से हज़ारों मील दूर, बिल्कुल अकेला था. वह रात बहुत मुश्किल से गुजरी.
अगला दिन ओरिएन्टेशन का था. 'ऑडिटोरियम' में डीन का भाषण, परिचय का शोर. इन सबके बीच आयुष का ध्यान वहाँ के माहौल पर था. उसके स्कूल में अनुशासन का मतलब 'सजा' था, यहाँ अनुशासन का मतलब 'जिम्मेदारी' लग रहा था. लेकिन उसे सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात से हुई थी कि हर होस्टल का अपना रीडिंग रूम था, जहाँ हर तरह की सैंकड़ों ताजा पत्रिकाएँ हर समय उपलब्ध थीं. इसके साथ ही आईआईटी की अपनी सेंट्रल लायब्रेरी थी, जिसमें सवा लाख से ऊपर पुस्तकें थीं. केवल विज्ञान से संबंधित नहीं बल्कि विश्व के हर तरह के ज्ञान से भरपूर. इसके अलावा कम्प्यूटरों के जरीए वे दुनिया भर की डिजिटल लायब्रेरियों से जुड़ा जा सकता था.
शाम को मेस में कार्तिक ने उसे एक पुराने छात्र से मिलवाया. उससे चेतावनी मिली, "भाई, कल से असली खेल शुरू होगा. ड्राइंग बोर्ड और वर्कशॉप के जूते तैयार रखना." इस चेतावनी ने आयुष की धड़कनें बढ़ा दीं.
अगले दिन 25 जुलाई को सुबह 8:00 बजे पहली क्लास शुरू हुई, “मैथेमेटिक्स-I (MA101)”. लेक्चर हॉल (L-2) में करीब 200 छात्र थे. प्रोफेसर ने आते ही बोर्ड पर 'कैलकुलस' के ऐसे जटिल समीकरण लिखने शुरू किए कि आयुष को लगा कि उसकी 1176वीं रैंक भी शायद कम पड़ जाएगी.
दोपहर के सत्र में उसकी पहली लैब थी, “इंजीनियरिंग ड्राइंग (ME111)”. आयुष ने बड़े से 'ड्राइंग बोर्ड' पर अपनी सफेद शीट लगाई. उसे 'पेंसिल ग्रेड' और 'प्रोजेक्शन' की सूक्ष्मताओं को समझना था. राजस्थान की सूखी गर्मी में पलने वाले आयुष के लिए गुवाहाटी की उमस में पसीना पोंछते हुए 'टी-स्क्वायर' संभालना भारी पड़ रहा था.
"यार, ये सीएसई (CSE) वालों को ड्राइंग क्यों सिखा रहे हैं? हमें तो कोड लिखना है," कार्तिक ने बगल वाली टेबल से फुसफुसाकर कहा.
आयुष मुस्कुराया. उसे शगुन दीदी की बात याद आई, "विराट हर जगह है." उसने मन ही मन सोचा कि शायद ये बारीक लकीरें भी उस विराट सत्य का ही हिस्सा हैं. ये कोड भी ड्राइंग ही हैं. वह कार्तिक की ओर मुस्कुरा कर रह गया. तभी उसे जापानी इंजीनियर ‘मासाहिरो हारा’ का ध्यान आया जिसने ‘क्यूआर कोड’ जैसी भाषा का आविष्कार किया है, जो एक ड्राइंग ही होती है. वह सीधा हो गया.
“तुमने ‘क्यूआर कोड’ सुना है? वह एक ड्राइंग ही होता है.” आयुष ने कार्तिक को जवाब देते हुए सवाल कर डाला.”
“ओह¡ ‘मासाहिरो हारा’, समझ गया. ड्राइंग सीखनी ही होंगी.” यह कह कर कार्तिक फिर से अपनी ड्राइंग पर झुक गया.”
शाम को वह वर्कशॉप (ME110) देखने गया. वहां की 'फोर्जिंग' और 'फिटिंग' शॉप से आती लोहे की महक ने उसे रामगंजमंडी की याद दिला दी, जहाँ अक्सर कहीं न कहीं मरम्मत का काम चलता रहता था.
रात 9:00 बजे, मेस से खाना खाकर जब वह कमरे में लौटा, तो थकान से चूर था. उसने अपना कंप्यूटर चालू किया. कैंपस के LAN (लोकल एरिया नेटवर्क) की जादुई रफ्तार ने उसे एक नई दुनिया से जोड़ दिया. उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, यहाँ सब कुछ बहुत 'टेक्निकल' है. पहले दिन कोडिंग नहीं, बल्कि हाथ में पेंसिल और दिमाग में 'मैथेमेटिक्स' लेकर बैठा हूँ. गुवाहाटी की बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही, जैसे यहाँ की पढ़ाई भी कभी नहीं रुकेगी."
खिड़की के बाहर 'बराक' हॉस्टल के पीछे पहाड़ियों पर बादल मंडरा रहे थे. आयुष ने 'संबल' रजिस्टर खोला और आज की तारीख के नीचे लिखा, "सफलता का मतलब केवल कंप्यूटर नहीं, बल्कि हर विषय की गहराई को समझना है." उसे एहसास हुआ कि आईआईटी का पहला साल उसे सिखाएगा कि 'इंजीनियर' बनने से पहले एक 'मजदूर' होना जरूरी है.
... क्रमशः
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