देहरी के पार, कड़ी - 10
प्रिया को जिस प्रोजेक्ट का लीड बनाया गया था उसकी डेडलाइन निकट थी. फेक आईडी प्रकरण ने उसके काम को प्रभावित किया था. उसे लगा कि प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो सकेगा. टीम लीड के रूप में उसका यह पहला प्रोजेक्ट था. वह अब कर्मचारी के साथ एक 'लीडर' की भूमिका में थी. उसे अपनी टीम को साथ लेकर काम करना था. विक्रांत की हरकत ने उसका मनोबल तोड़ने की कोशिश की थी. यदि रामजी काका, प्रशांत बाबू, आकाश, उसके पापा और उसके मैनेजर देसाई ने उसका साथ नहीं दिया होता तो वह सफल हो ही गया था.
अब वह पूरी क्षमता से इस प्रोजेक्ट में लगना चाहती थी. लेकिन अभी भी ‘विक्रांत और उसे पिता के मौन समर्थन’ की बात उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. काम के दौरान यह याद आता और उसका सारा उत्साह शांत पड़ जाता और अवसाद हावी होने लगता. जैसा सोचा था, काम उसके हिसाब से नहीं हुआ. पूरी टीम में खुद वही सबसे सुस्त रही. इसका असर तमाम टीम मेंबरों पर भी पड़ा, वे भी धीमे हो गए. शाम तक वह लगभग हताशा की स्थिति में पहुँच गई. जैसे-तैसे आठ बजे, उसने अपना लैपटॉप ऑफ करके बैग में डाला और ऑफिस से निकल पड़ी.
बाहर आते ही उसे लगा कि अपने फ्लैट में वह अकेली होगी और अवसाद बढ़ेगा. उसने अपना इरादा बदल दिया. वह रामजी के भोजनालय जा पहुँची. आटो से उतरकर भोजनालय में प्रवेश करते ही उसने देखा, प्रशांत बाबू कॉर्नर टेबल पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे.
प्रिया ने ‘राम-राम काका’ कह कर काउंटर पर बैठे रामजी का अभिवादन किया और कॉर्नर टेबल पर जा बैठी. प्रशांत बाबू ने सिर उठा कर उसे देखा. “अरे तुम, लगता है तुम भी ऑफिस से सीधे इधर आ गई.”
“हाँ, सर!” मैंने आज दिनभर काम के बीच अवसाद महसूस किया. मेरी टीम का काम भी सुस्त रहा. मुझे लगा कि कुछ देर रामजी काका से बात करूंगी तो मन को तसल्ली मिलेगी. फ्लैट पर जाकर अकेले रहने से अधिक अवसाद में आ जाती. अब तो आप मिल गए हैं तो मेरे लिए यह सोने में सुहागा हो गया.”
प्रशांत बाबू ने हाथ का अखबार समेटकर साइड में रखा और कहने लगे, "प्रिया, जिसे तुम 'अवसाद' कह रही हो, दरअसल यह तुम्हारे भीतर का द्वंद्व है. तुम यहाँ मुम्बई में अपने लिए एक नई दुनिया गढ़ रही हो, लेकिन तुम्हारी पुरानी दुनिया, तुम्हारे पापा और उनका वर्चस्व तुम्हारे काम में लगातार बाधा बन रहे हैं.
तुम कहती हो कि 'विक्रांत की हरकतें' और उसे 'पापा का मौन समर्थन' तुम्हें कमजोर कर रहे हैं, तो समझो कि ऐसा क्यों है. विक्रांत ने तुम्हें एक 'इंसान' नहीं, केवल शरीर और 'संपत्ति' समझा. और जब संपत्ति किसी के हाथ से निकलती है, तो उसका स्वामी समझने वाला उसे वापस पाने के लिए हर हथकंडा अपनाता है. तुम्हारे पिता का मौन भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जहाँ बेटी की आज़ादी को 'कुल की मर्यादा' से तौला जाता है. तुम्हें आज ऑफिस में जो हताशा हुई, वह इसलिए कि तुमने अनजाने में उनकी उन आवाजों को अपने भीतर जगह दे दी, है जो कहती हैं कि 'तुम अकेले कुछ नहीं कर सकतीं'.”
“हाँ, यह तो है. मैं कोशिश करूंगी कि उन आवाजों को अपने भीतर से निकाल डालूँ.” प्रशांत बाबू की बात प्रिया को ठीक लगी. “लेकिन इस सबके बीच मेरे प्रोजेक्ट का पता नहीं क्या होगा? डेडलाइन में दो सप्ताह भी नहीं बचे.”
“ऐसा कुछ नहीं कि तुम्हारा प्रोजेक्ट समय सीमा में पूरा न हो सके. यदि एक दो दिन की देरी भी हो जाए तो हर प्रोजेक्ट के लिए कंपनी के पास कुछ स्पेयर समय होता है, और तुम्हारे मैनेजर तुम्हें समझते हैं. तुम्हारी टीम की तुम सिर्फ लीड हो, उनके ऊपर सुपरवाइजर नहीं. तुम्हारी टीम के सभी मेंबर, सीनियर या जूनियर महत्वपूर्ण हैं. प्रोजेक्ट के काम में सभी का योगदान है. तुम्हें हर मेंबर के अब तक के काम का उल्लेख करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा करनी चाहिए और उन्हें अहसास कराना चाहिए कि ‘वे सभी समान हैं, अब तक सबने बहुत अच्छा काम का किया है, सभी को मिल कर प्रोजेक्ट को समय सीमा से पहले पूरा करना है, इस प्रोजेक्ट की कामयाबी सभी टीम मेंबरों की होगी, केवल लीड की नहीं’. जब तुम्हारे टीम मेंबरों को अहसास होगा कि वे सब एक टीम हैं और टीम में सब समान हैं, तुम खुद को उनसे ऊपर नहीं समझती और सबसे अधिक काम करते हुए सबकी काम में मदद करती हो तो वे सब मेहनत से काम करेंगे. तुम्हारा प्रोजेक्ट समय से पहले पूरा हो लेगा. अब तुम तुम्हारे पिता और विक्रांत के बारे में सोचना बंद करो और अपने प्रोजेक्ट पर ध्यान दो.”
प्रिया तन्मयता से प्रशांत बाबू को सुन रही थी. तभी रामजी काका दो चाय लेकर खुद आ गए. “प्रशांत बाबू, हमारी बिटिया को लंबे लेक्चर से परेशान मत करो, वैसे ही ऑफिस से थकी हुई लौटी है. दोनों चाय पीजिए थोड़ी थकान उतरेगी.” वे चाय रख कर वापस अपने काउंटर की ओर बढ़ गए.
प्रशांत बाबू ने अपनी बात जारी रखी, “यह अवसाद नहीं, बल्कि तुम्हारी मानसिक थकान का प्रतिबिंब है. तुमने घर छोड़ दिया, आज तुमने अकेले फ्लैट में बंद होकर हार मानने के बजाय संवाद को चुना. यह तुम्हारी जीत है. विक्रांत और तुम्हारे पापा समाज के पुराने सामंती और पितृसत्ता के ढाँचे में ढले हुए लोग हैं. वे अपनी सोच और स्थिति के समान व्यवहार कर रहे हैं. जब तुम समझ लोगी कि तुम्हारी लड़ाई उस सोच के खिलाफ है जो तुम्हें 'वस्तु' मानती है, उस दिन तुम्हारा अवसाद ‘संकल्प’ में बदल जाएगा."
प्रशांत बाबू की बात तर्कपूर्ण थी. प्रिया को समझ आ रहा था कि जो कुछ उसके साथ हो रहा है, उसके पीछे गहरे सामाजिक और व्यवहारिक कारण हैं.
तभी रामजी आ गए. “सवा नौ बज रहे हैं बिटिया. प्रशांत बाबू के खाने का समय हो रहा है. तुम भी अब इतनी रात क्या बनाओगी. तुम्हारा भी लगवा देता हूँ.”
प्रिया ने सिर उठाकर रामजी की ओर देखा, उनकी बात प्रश्न नहीं बल्कि आदेश थी. वह क्या कहती, उसने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया.
उस रात प्रिया बहुत गहरी नींद सोई.
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