देहरी के पार, कड़ी - 12
मुम्बई के अंधेरी वेस्ट के अपने एक्सपोर्ट दफ्तर में विक्रांत फाइलें पलट रहा था. वह यहाँ आते ही बुरी तरह फँस गया था. हिसाब में बहुत गड़बड़ियाँ थीं; खर्च अधिक दिखाए गए थे. बिलों की जाँच करने पर पता चला कि उसका अकाउंटेंट और मैनेजर दोनों मिलकर ग़बन कर रहे हैं. उसने कोटा से अपने अकाउंटेंट और मैनेजर के सहायकों को बुला लिया. ग़बन की रिपोर्ट कराकर दोनों बेईमान कर्मचारियों को गिरफ्तार करवाया. इन सब में उसे पूरा एक सप्ताह गुजर गया. थोड़ी राहत मिली तो उसे प्रिया का खयाल आया. बिजनेस की गड़बड़ी में वह उसे भूल ही गया था.
उसने अपने सबसे वफादार कारिंदे, शेखावत को बुलाया. मेज पर प्रिया की तस्वीरें रखते हुए उसने भारी आवाज़ में कहा, "यह रही लड़की. इसकी कंपनी का पता मैंने निकाल लिया है. कल सुबह तुम ऑफिस के बाहर रहोगे. मुझे यह देखना है कि यह मुम्बई में कितनी 'आज़ाद' घूम रही है. इसके फ्लैट का पता, इसके उठने-बैठने की जगह... सब मुझे कल शाम तक चाहिए."
प्रिया के लिए पिछला सप्ताह किसी तपस्या से कम नहीं था. प्रशांत बाबू के 'सामूहिक नेतृत्व' वाले सूत्र ने टीम के भीतर जो ऊर्जा फूँकी थी, उसका परिणाम साफ दिख रहा था. जिस प्रोजेक्ट का समय से पूरा होना असंभव लग रहा था, वह दौड़ पड़ा था. सुबह की पंद्रह मिनट की मीटिंग अब केवल काम की चर्चा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए प्रेरणा बन गई थी. राहुल, स्नेहा और आदित्य अब केवल अपने-अपने 'मॉड्यूल' पर काम नहीं कर रहे थे, बल्कि जहाँ भी कोई अटकता, पूरी टीम उसे सुलझाने में जुट जाती. प्रिया ने महसूस किया कि जब 'बॉस' का डर खत्म होता है, तो 'जिम्मेदारी' का भाव अपने आप जन्म लेता है. प्रोजेक्ट डेडलाइन से दो दिन पहले ही पूरा हो जाने की संभावना थी.
सोमवार सुबह आठ बजे ही उसके कोटा के मित्र समीर का फोन आया, “मैं सुबह मुम्बई पहुँचा हूँ. आज ही कोटा वापसी की ट्रेन भी है. तुम्हारे ऑफिस के नजदीक ही काम है, दोपहर दो बजे के तुम मिलोगी?”
कोटा से निकलने के बाद किसी मित्र से रूबरू मिलने का पहला अवसर था, प्रिया उसे कैसे गँवाती. उसने समीर को ऑफिस के निकट ही रेस्टोरेंट में लंच का न्यौता दे दिया. उसने अपनी टीम से सामूहिक लंच से गैरहाजिर रहने की छूट ली और दो बजे ऑफिस से निकल कर ऑटो लिया और रेस्टोरेंट पहुँची. वह ऑटो वाले को भुगतान कर रही थी, तभी उसकी नजर एक काले रंग की पुरानी फाइव-सीटर स्कॉर्पियो पर पड़ी. इस एसयूवी को उसने ऑफिस के गेट से कुछ दूर खड़े देखा था. उसका ऑटो रवाना होने तक वह वहीं थी. अब उसका ऑटो रुकते ही पीछे आकर रुकी हुई थी. उसका माथा ठनका. लेकिन वह उसकी उपेक्षा करके रेस्टोरेंट में घुस गई.
समीर वहाँ पहले से मौजूद था. दोनों ने साथ लंच किया. समीर ने कोटा से जयपुर और मुम्बई तक की उसकी कहानी सुनी और कोटा की जानकारियाँ दीं. उसने बताया कि विक्रांत ने उसके पिता ब्रज मोहनजी की मंडी में साख और उसके साथ होने वाले विवाह का लाभ उठा कर मंडी में अनेक सौदे कर लिए थे. उसने एक्सपोर्ट के लिए माल उठाया, लेकिन समय निकल जाने पर भी भुगतान नहीं किया था. जिससे उसकी मंडी में और उनकी बिरादरी में भारी बदनामी हो गई थी. विक्रांत कोटा छोड़कर मुम्बई आ चुका है और मंडी में किए गए सौदों के रुपए अदा करने की व्यवस्था किए बिना अब कोटा में मुहँ नहीं दिखा सकता. समीर ने उसे सावधान भी किया कि वह भी विक्रांत की हरकतों से सावधान रहे.
लंच के बाद वह रेस्टोरेंट से बाहर आई. काली स्कॉर्पियो वहीं रेस्टोरेंट से कुछ दूर खड़ी थी. उसने वहीं से समीर को विदा किया और एक ऑटो रोककर उसे अपने ऑफिस छोड़ने को कहा. आटो जैसे ही रवाना हुआ. काली स्कॉर्पियो भी उसके पीछे हो ली. शाम आठ बजे तक उसकी टीम काम करती रही.
ऑफिस से बाहर आई तो उसने देखा कि काली स्कॉर्पियो वहीं तैयार खड़ी है. उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गयी. वह आज सीधे अपने फ्लैट पर जाना चाहती थी. लेकिन उस स्कॉर्पियो ने उसका इरादा बदल दिया. वह ऑटो में बैठी और उसे मेवाड़ भोजनालय चलने को कहा. उस दिन वह ऑटो को कोई डेढ़ सौ मीटर पहले ही उतरकर एक छोटी गली में घुस गई. उसके पीछे आ रही स्कॉर्पियो का चालक कुछ समझे और उतरकर पैदल उसका पीछा करे, तब तक वह आगे चल कर एक और छोटी गली में मुड़ गयी. अब वह स्कॉर्पियो चालक की नजर से पूरी तरह दूर थी. उसे दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. पर वह घूम फिर कर मेवाड़ भोजनालय में थी.
साढ़े आठ बज चुके थे. भोजनालय में इक्का-दुक्का ग्राहक डिनर कर रहे थे. प्रशांत बाबू सदा की तरह कॉर्नर टेबल पर बैठे, अखबार के साथ कॉफी पी रहे थे. रामजी काका काउंटर पर बैठे अपने कर्मचारी को निर्देश दे रहे थे. काका को अभिवादन कर वह सीधी कॉर्नर टेबल पर पहुँची. अपना बैग टेबल पर रखकर प्रशांत बाबू को नमस्ते करते हुए बैठ गई.
“नमस्ते, प्रिया कैसी हो? आज ऑफिस से देर से छूटी? तुम्हारा प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है?
“बिलकुल ठीक हूँ, ऑफिस समय से ही छूटा है, बस कोई डेढ़ सौ मीटर पहले उतर कर पीछे की बस्ती में पैदल घूमकर आई हूँ, और मेरा प्रोजेक्ट तय समय से दो दिन पहले परसों पूरा हो जाएगा. आपका सामूहिक नेतृत्व का सूत्र बहुत काम आया.” प्रशांत बाबू ने एक साथ तीन सवाल किए थे; प्रिया ने उसी तरह उत्तर भी दे दिया. तभी रामजी काका खुद प्रिया के लिए कॉफी लेकर टेबल पर पहुँच गए.
“काका, आज आपको थोड़ी देर बैठना पड़ेगा. कुछ काम है.”
कॉफी टेबल पर रखकर रामजी प्रिया के पास बैठ गए. प्रिया ने काली स्कॉर्पियो का पीछा करने की बात दोनों को बताई. रामजी ने तुरन्त अपना एक नौकर स्कॉर्पियो की तलाश में भेजा. बीस मिनट बाद नौकर ने लौटकर बताया कि काली स्कॉर्पियो कोई डेढ़ सौ मीटर पहले खड़ी थी. फिर कोई दस मिनट बाद एक आदमी आकर उसमें बैठा और स्कॉर्पियो को मोड़कर चला गया.
... क्रमशः
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