@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: रिजेक्शन?

बुधवार, 11 मार्च 2026

रिजेक्शन?

पिंजरा और पंख-54

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

श्रृंखला फाइनल-4
मेहमानों की कार मुख्य सड़क पर जाकर मुड़ी और ओझल हो गयी. अनिल चाचा को ध्यान आया कि मेहमान होटल से रवाना हों उससे पहले उनसे मिल लेना चाहिए. उन्होंने जल्दी में घर के बाहर खड़ा अपना स्कूटर स्टार्ट किया और गुप्ताजी को कहा, “भाई साहब¡ मैं मेहमानों को छोड़ कर होटल का हिसाब करके आता हूँ.”

शगुन अपने कमरे में थी, लेकिन उसकी नज़रें सीढ़ियों की ओर थीं. वह जानती थी कि कुछ देर में कोई तो आने वाला है. तभी चाची कमरे में आईं. पूछने लगी, “शगुन ऐसा क्या हुआ जो वे अचानक चले गए.”

“कुछ नहीं चाची, बस हमारे बीच नॉर्मल बातें ही हुई थीं, वे और उनके परिवार को मुझ से क्या अपेक्षा है, और मैं क्या करना चाहती हूँ.”

“कोई बात नहीं शगुन, वे इन्दौर पहुँच कर जवाब दे देंगे. हमें कौन सी जल्दी है?”

“हाँ चाची, बस अनिल चाचा के सिवा किसी को जल्दी नहीं.”

“उनका तो तू कुछ मत कह, उन सा बिरला तो कोई नहीं.”

तब तक मुक्ति को गोद में उठाए आयुष भी आ गया.

“मैं नीचे चलूँ, बहुत कुछ समेटना है.” चाची इतना कह कर वापस नीचे चल दीं.

चाचा शाम को देर से लौटे. उन्होंने उस दिन किसी से कोई बात नहीं की.

सोमवार की शाम तूफान आया.

अनिल चाचा ऑफिस से लौटे. सीधे लिविंग रूम में आकर बैठ गए. उनका चेहरा गुस्से से लाल था. श्रीमती गुप्ता पानी का गिलास लेकर गयीं.

"देख लिया भाभी! हो गई न थू-थू? अभी दफ्तर से निकलने के पहले इंदौर वालों का फोन आया था. विवेक के पापा कह रहे थे कि 'लड़की हमारे घर में एडजस्ट नहीं कर पाएगी, हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं.' उन्होंने साफ़ कहा कि 'विवेक कह रहा है कि लड़की को अपनी पढ़ाई पर बहुत घमंड है, बहुत बोलती है, आपसी बातचीत में उसे तो बोलने ही नहीं दिया.' हमारी सात पुश्तों में आज तक किसी ने 'रिजेक्ट' होने का दाग नहीं सहा था, और आज मेरी भतीजी ने ही यह तोहफा दे दिया है.”

तब तक शगुन भी वहाँ आ गयी थी.

“शगुन! क्या कहा था तुमने उस लड़के से?"

चाचा चिल्ला रहे थे. मम्मा रसोई के दरवाज़े पर खड़ी होकर रोने लगीं.

तभी आयुष नीचे उतर कर आया और अनिल चाचा के सामने खड़ा हो गया. चाचा ने देखा कि वह शगुन के आगे एक कवर की तरह खड़ा है.

"चाचा जी, किसी की औकात नहीं कि दीदी को रिजेक्ट कर दें. असली रिजेक्शन तो उनके उस खोखले अहंकार का हुआ है जिसे वे 'संस्कार' और 'परंपरा' कहते हैं. वे रिजेक्ट हुए हैं, वह पूरा परिवार ही दीदी के काबिल नहीं!"

अनिल चाचा आयुष को घूरने लगे. वे उसे डांटने ही वाले थे कि अचानक अपने आँसू पोंछते हुए मम्मा सामने आ गयीं. उन्होंने अनिल चाचा के चेहरे की ओर देखा, “बस देवर जी, बहुत हो गया. बच्चे अब जवान हो गए हैं, आयुष तो आपके कंधे से ऊपर है, दोनों समझदार हैं. अपना भला बुरा समझते हैं. उन्हें भी बोलने का हक है. हमें उनकी बात सुननी चाहिए. उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते."

अनिल चाचा हक्के-बक्के रह गए. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि भाभी ऐसा बोल सकती हैं. उन्होंने एक बार आयुष और शगुन की ओर देखा और चुपचाप उठकर ऊपर अपने कमरे की और चल दिए.

चाची तब तक रोज की तरह सबके लिए चाय बना लायी थी और मिसेज गुप्ता के पीछे खड़ी थीं.

“भाभी, आयुष और शगुन सब बैठिए और चाय पी लीजिए. उनकी चाय मैं कमरे में दे आती हूँ.”

“अभी, इस वक्त, तू देवर जी को चाय देकर आएगी? सारा गुस्सा तुझपर निकल जाएगा.”

“नहीं निकलेगा भाभी, मुक्ति कमरे में ही सो रही है. उसके सामने कुछ नहीं कहेंगे. बस मुक्ति ही तो है जिसके सामने वे कुछ नहीं कह सकते.” इतना कहकर चाची मुस्कुराते हुए ट्रे में दो चाय लेकर जीना चढ़ने लगी.

शाम को डाइनिंग टेबल पर सब साथ थे. चाची रसोई में फुलके उतार रही थीं और श्रीमती गुप्ता परोस रही थीं.

“शगुन, अब तो बता आखिर तुम्हारे और विवेक के बीच बात क्या हुई थी?” अनिल चाचा ने पूछा, अभी वे पूरी तरह शान्त थे.

"कुछ नहीं चाचा, सच तो यह है कि मैंने ही उन्हें रास्ता दिखाया था. मैंने बालकनी में विवेक को साफ़ बता दिया था कि मैं उनके उस सुनहरे पिंजरे में नहीं रह सकती जहाँ मेरी पहचान सिर्फ एक बहू की हो, जो घर-परिवार संभाले और कपड़ों का बिजनेस देखे. मैंने उनसे कह दिया था कि मेरा भविष्य बनस्थली में है, रिसर्च में है."

शगुन की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी कि अनिल चाचा अवाक रह गए.

शगुन ने आगे कहा, "मैंने उनसे यह भी कहा था कि वे नीचे चलकर खुद मना कर दें ताकि उनकी गरिमा बनी रहे और उनके माता-पिता अपमानित महसूस न करें. मैंने उन्हें चुनाव दिया था, और उन्होंने 'अपमान के भय' को चुना. उन्होंने इंदौर पहुँचकर मना किया, क्योंकि वे 'रिजेक्ट' होना सह सकते थे, पर 'अपमान' नहीं." यह कहते हुए शगुन ने गुप्ताजी को अपना ‘टीचिंग असिस्टेंट’ के पद पर नियुक्ति का आदेश थमा दिया.

गुप्ताजी ने पत्र पढ़ा, फिर शगुन की आँखों में देखा, उन आँखों में वही 'संबल' था जो उन्होंने कभी अपनी माँ की आँखों में देखा था, पर पहचान नहीं पाए थे.

“हाँ पापा, मेरे आते ही मेहमानों के आने का उल्लेख चल निकला और मैं यह पत्र और आप सबको बता नहीं पायी. मेरी नियुक्ति बनस्थली विद्यापीठ में टीचिंग असिस्टेंट के पद पर हो गयी है. मैं इसके साथ ही एम.एससी. और पीएचडी कर सकती हूँ. बल्कि अपना खर्च उठाने के साथ ही कुछ बचा भी सकती हूँ.”

गुप्ताजी की आँखें सजल हो गयी थीं. गुप्ताजी ने पास बैठी शगुन को अपनी छाती से लगा लिया. अब शगुन की आँखें भी छलकने को थीं.

"अनिल, मैंने उस दिन होटल में उनकी बातें सुनी थीं... शायद मैं भी डर रहा था. पर आज मुझे गर्व है कि मेरी बेटी में वह कहने की हिम्मत है जो मैं नहीं कह पाया."

अनिल चाचा क्या कहते? वे अवाक, सब कुछ देख रहे थे.
... क्रमशः

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