@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: इनकार

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

इनकार

पिंजरा और पंखा-48

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
नवंबर समाप्त होने को था. दिन में धूप अभी भी बर्दाश्त के बाहर थी. लेकिन सूरज के डूबते ही मौसम ठंडा हो जाता. रात को लोग गर्म कपड़ों में नजर आते. गुप्ता निवास के भीतर का माहौल आज गर्म था. गुप्ताजी फैक्ट्री से आठ बजे लौटे तो छोटा भाई अनिल उन्हें लिविंग रूम में ही मिला. वह अपनी जिद लिए बैठा था.

"भाई साहब, इंदौर वालों के पास रिश्ते आ रहे हैं, इतना अच्छा लड़का हाथ से निकल न जाए, इसलिए मैने उन्हें जुबान दे दी है. दिसंबर के आखिरी हफ्ते में हम सब बनस्थली चलेंगे. वहीं वे शगुन को देख लेंगे और हम कच्चा दस्तूर कर देंगे. लड़की की पढ़ाई अपनी जगह है, पर घर बसाना भी तो जिम्मेदारी है."

गुप्ताजी के मन में द्वंद्व का बवंडर फिर उठ खड़ा हुआ. फैक्ट्री में काम के दौरान वे सब भूले रहते. लेकिन घर आते ही पारिवारिक जिम्मेदारियों का अहसास होने लगता. जाति समाज में अधिकांश लड़कियों की शादियाँ ग्रेजुएट होने के पहले या फिर ग्रेजुएट होते ही हो जाती थीं. बाद में योग्य लड़के मिलने कठिन हो जाते. इस कारण से उन्हें अनिल की यह बात वाजिब ही लगती थी कि शगुन का भी अभी संबंध हो जाए और ग्रेजुएट होने के बाद उसकी शादी कर दें. लेकिन दूसरी और जब वे शगुन की मेहनत और उसका विकसित होता व्यक्तित्व देखते तो अत्यन्त प्रसन्न होते कि वह कितना सुंदर कर रही है. उन्हें लगता कि उसे अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर देना अधिक महत्वपूर्ण है. वे किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहे थे.

"पर अनिल, शगुन कह रही थी कि उसके प्रैक्टिकल और प्रेजेंटेशन हैं. इस समय हमारा वहां जाना..."

"अरे भाई साहब! ये पढ़ाई के बहाने कभी खत्म नहीं होंगे. एक दिन के कुछ घंटों में उसकी पढ़ाई का कुछ भी खराब नहीं होगा. हम वहाँ दोपहर तक पहुँचेंगे और शाम तक अपना काम समाप्त करके वापस लौट लेंगे. एक बार लड़के का तिलक कर दें. लड़का रुक जाएगा, उसके बाद शगुन को पढ़ाई में कोई बाधा नहीं होगी.” अनिल ने गुप्ताजी की बात काट दी.

मम्मा रसोई के दरवाजे पर खड़ी सब सुन रही थीं. उनकी आँखों में बेबसी थी. तभी घर के फोन की घंटी बजी. 

गुप्ताजी ने फोन उठाया. आयुष का फोन था.

 "कैसा है बेटा?"

"पापा, मैं ठीक हूँ. लेकिन शगुन दीदी से बात हुई थी, वह बहुत तनाव में है. उसने बताया कि चाचाजी मेहमानों को लेकर बनस्थली जाने की जिद कर रहे हैं. पापा, यह समय बिल्कुल ठीक नहीं है. दीदी का करियर इस समय सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर है. आपको पता है इस साल उनकी मेहनत कामयाब हुई तो वे विद्यापीठ में प्रथम स्थान हासिल कर सकती हैं. उन्हें इस समय जरा भी डिस्टर्ब करना ठीक नहीं. अगर आप जबरदस्ती वहाँ गए, तो न तो दीदी एकाग्र हो पाएगी और न ही उन मेहमानों के सामने हमारी कोई साख बचेगी. वहां कोई तमाशा हुआ तो वे लोग हमारी ही बदनामी करेंगे. अगर उन्हें इतनी ही जल्दी है, तो उन्हें साफ मना कर दीजिए."

आयुष की आवाज में एक नई मजबूती थी और बात तार्किक. उन्हें लगा कि उनके पैरों को डगमगाते देख बेटे ने मजबूती से उनका हाथ थाम लिया है. उनके आँखों में नमी उतर आई. उसने मम्मा से भी बात की और उन्हें भी यही समझाया. बेटे की इन दलीलों से गुप्ताजी के भीतर का असमंजस जाता रहा. उन्हें अहसास हुआ कि आयुष सही कह रहा है. शगुन का यह आखिरी साल है. मेहनत के बल पर वह ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम स्थान हासिल करने के निकट है. उसे डिस्टर्ब किया जाना ठीक नहीं. दूसरी ओर हम एक नया रिश्ता बनाने में इतनी जल्दी क्यों करें? जल्दबाजी मे तो कोई बढ़िया रिश्ता बनाया नहीं जा सकता. अचानक इस तरह बनस्थली जाना दोनों परिवारों के बीच वर्तमान संबंधों को भी खराब कर सकता है.

गुप्ताजी ने पलटकर अनिल चाचा की ओर देखा. उनकी आवाज़ एकदम शान्त और दृढ़ थी. "अनिल, मैंने सोच लिया है. हम दिसंबर में नहीं जाएंगे. शगुन को अपनी परीक्षा और प्रोजेक्ट बिना कोई बाधा उत्पन्न किए पूरा करने देंगे. इंदौर वालों से कहेंगे कि इस समय बनस्थली जाना ठीक नहीं. वे प्रतीक्षा करें. उन्हें ज्यादा ही जल्दी है, और उन्हें और रिश्ते मिल रहे हैं तो उनमें से किसी को देख लें. हम मई से पहले बात आगे नहीं बढ़ाएंगे. अभी हमें कोई जल्दी नहीं है."

अनिल चाचा अवाक रह गए. भाई साहब के मुंह से 'इनकार' सुनना उनके लिए अकल्पनीय था. वे बड़बड़ाते हुए बाहर निकल गए, लेकिन गुप्ताजी ने अपना रुख नहीं बदला.

उसी रात मम्मा ने शगुन को फोन किया. "बेटा, फिक्र मत कर. तेरे पापा ने मना कर दिया है. अब दिसंबर में कोई वहां नहीं आ रहा है. सब बातें मई तक टाल दी गई हैं. तू बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे."

फोन रखने के बाद शगुन ने एक गहरी और लंबी सांस ली. खिड़की के बाहर उतर आया अंधेरा अब उसे डरा नहीं रहा था. उसे पता था कि गुवाहाटी से आयुष के फोन ने और रामगंजमंडी में मम्मा ने पापा को निर्णय लेने में उसकी मदद की है. इस तरह उसे पापा का साथ मिल सका. यह साथ उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है. अब जनवरी का 'टीचिंग असिस्टेंट' का इंटरव्यू ही उसका अगला मोर्चा था.

उसने अपनी नई नोटबुक में लिखा, "वक्त मिल गया है.  अब उसे किसी भी हालत में स्वावलंबी बनना है."
... क्रमशः 

कोई टिप्पणी नहीं: