@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: कंक्रीट का जंगल

मंगलवार, 24 मार्च 2026

कंक्रीट का जंगल

देहरी के पार कड़ी - 6
ड्यूटी से ऑफ होकर प्रिया गेस्ट हाउस पहुँची तब 9 बजे थे. सुबह 5 बजे सोकर उठने के बाद से अभी तक वह चल ही रही थी., आकाश के घर से शुरू करके कितने सफर कर लिए थे उसने आज? कार, प्लेन, टैक्सी, टैक्सी और टैक्सी. गेस्ट हाउस के अपने कमरे में पहुँचते ही उसने पर्स को बेड पर एक ओर फैंका और अपने शरीर को भी उसी बेड पर पटक दिया. कुछ देर आँखें मूंदे पड़ी रही. वह अपने पिछले और आने वाले जीवन के बारे में सोचना चाहती थी, लेकिन दिमाग साथ नहीं दे रहा था. उसे लगा कि यदि कुछ देर और ऐसे ही बिस्तर पर पड़ी रही तो उसे नींद आ जाएगी. फिर दो-तीन घंटे बाद खुलेगी और उसे जोर की भूख लगेगी. तब कुछ खाने को नहीं होगा. वह घर में तो थी नहीं कि किचन में जाकर कुछ बना ले. फिर सारी रात सो न सकेगी और कल दिन भर उबासियाँ लेती रहेगी. उसे याद आया सुबह प्लेन में नाश्ता किया था उसके बाद तीसरे पहर चाय के साथ कुछ बिस्कुट, लंच पूरी तरह स्किप हो गया था. अचानक उसे बहुत तेज भूख का अहसास हुआ. उसने इंटरकॉम पर रूम सर्विस का नंबर डायल किया और उठाने पर पूछा कि क्या गेस्ट हाउस में खाने की व्यवस्था है, और क्या खाना उसके रूम में भेजा जा सकता है?

“हाँ, मैम खाना आपके रूम पर पहुँच जाएगा, आप ऑर्डर कर दें.” सर्विस काउंटर से उसे उत्तर मिला तो वह खुश हो गयी. उसने दाल, चपाती, चावल और दही ऑर्डर किया और फ्रेश होने के लिए बाथरूम में घुस गयी.

खाना खाने के बाद सो जाना ठीक न समझ वह कुर्सी लेकर रूम की बालकनी में आ बैठी. वहाँ से दिख रही मुम्बई की रोशनियाँ जितनी सम्मोहक थीं, उतनी ही पराई भी. तभी उसे ध्यान आया कि आज का दिन जाया हो गया है. उसे यह गेस्ट हाउस केवल सात दिन उपलब्ध था. इस तरह तो ये दिन रेत की तरह फिसल जाएंगे. उसे कल से ही इस 'कंक्रीट के जंगल' में अपने लिए एक कोना तलाशना होगा.

मुम्बई में घर ढूँढना किसी हिमालय चढ़ने जैसा था. ऑफिस के सहकर्मियों ने उसे अंधेरी या मलाड में जगह देखने की सलाह दी. ब्रोकर उसे माचिस की डिबिया जैसा कमरा दिखाते जिसका किराया किसी महल की याद दिलाता. "मैडम, सिंगल वर्किंग वूमन? एनओसी (NOC) लगेगी, पुलिस वेरिफिकेशन होगा और हाँ, रात को 10 बजे के बाद एंट्री नहीं." एक अधेड़ उम्र के ब्रोकर ने अपनी शर्तें गिनाईं. प्रिया को हैरत हुई कि मुम्बई की आधुनिकता की परतों के नीचे भी पितृसत्ता की बेड़ियाँ पैर जमाए हुए थीं. अंत में, गोरेगांव ईस्ट की एक पुरानी बिल्डिंग के चौथे माले पर उसे एक छोटा सा 1BHK फ्लैट मिला. खिड़की से आरे कॉलोनी के पेड़ दिखते थे, जो उसे कोटा की याद दिलाते. उसने भारी मन से तीन महीने का डिपॉजिट और एक माह का रेंट ब्रोकरेज में दिया. यह घर 'मोहन विला' के हॉल जितना भी नहीं था, पर यहाँ की चाबी सिर्फ उसके पास थी.

शुक्रवार की शाम घर शिफ्ट किया. रात का खाना उसने जोमेटो के जरीए ऑर्डर कर दिया. खाने का इंतजार करते हुए प्रिया ने हिम्मत जुटाकर माँ का नंबर लगाया. पहली बार में किसी ने नहीं उठाया. दुबारा किया तो दूसरी ओर से माँ का स्वर सुनाई दिया, “कौन?”

“मम्मी, मैं प्रिया.”

"प्रिया? बेटा, तू ठीक है न? तूने एक बार भी माँ की सुध नहीं ली." उसका नाम लेते ही माँ का स्वर रुंधने लगा था.

माँ ने बताया कि पापा अब ज़्यादातर चुप रहते हैं और उन्होंने विक्रांत के परिवार से सारे रिश्ते तोड़ लिए हैं. लेकिन प्रिया के मन में एक गहरा संशय बैठा था. क्या पिता वाकई बदल गए हैं? या यह उसे वापस बुलाने की कोई नई भावनात्मक चाल है? माँ ने कहा, "तेरे पापा कहते हैं कि जो हुआ सो हुआ, अब वह तुझे अपनी मर्ज़ी से जीने देंगे." प्रिया ने शांत स्वर में जवाब दिया, "माँ, पापा की इस 'मर्ज़ी' की मैंने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. उन्हें कहना कि अभी मुझे समय चाहिए." उसे डर था कि कहीं यह नरमी केवल उसे वापस बुलाकर फिर से किसी और 'समझौते' में बाँधने की भूमिका तो नहीं?

ऑफिस में काम का बोझ प्रिया को व्यस्त रखने लगा था, पर 'विक्रांत' का डर उसके अवचेतन में घर कर गया था. उसे रह-रहकर उसकी वह आवाज़ गूँजती—"वह उसे देख लेगा." उसने ऑफिस की सिक्योरिटी को साफ़ निर्देश दिए थे कि कोई भी अजनबी बिना अपॉइंटमेंट के अंदर न आए. शाम को जब वह लोकल ट्रेन से उतरकर अपने फ्लैट की ओर बढ़ती, तो उसे लगता जैसे कोई पीछे चल रहा है. वह अपनी सोशल मीडिया प्राइवेसी को बार-बार चेक करती. वह जानती थी कि विक्रांत जैसे अहंकारी लोग इतनी आसानी से हार नहीं मानते.

फ्लैट फर्निश्ड था लेकिन कुछ ज़रूरी बर्तन, बेड के लिए चादर, तकिए के गिलाफ और कुछ किराना के सामान वह ले आई थी. पहली रात उसने खुद के लिए चाय बनाई. वह सोच रही थी कि उसे अपनी जरूरतों के लिए जो सामान चाहिए सुबह उनकी लिस्ट बनानी पड़ेगी. जिससे सप्ताहांत के इन दो दिनों में सारा जरूरी सामान खरीद ले. उसने सोने की कोशिश की लेकिन सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही सांसें सुनाई दे रही थीं. उसने उठ कर खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुम्बई कभी नहीं सोती. उसे समझ आया कि आज़ादी की सबसे बड़ी चुनौती 'अकेलापन' है. तभी फोन पर आकाश का मैसेज चमका— "फ्लैट कैसा है? तान्या कह रही है कि अब वह अपनी छुट्टियाँ मुम्बई में दीदी के साथ ही बिताएगी."

मैसेज पढ़कर प्रिया के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई. उसने महसूस किया कि वह एक साथ दो लड़ाइयाँ लड़ रही है—एक बाहर की दुनिया से और दूसरी अपने ही परिवार के प्रति उपजे उस 'अविश्वास' से, जो उसे अपनी ही जड़ों से दूर कर रहा था.
... क्रमशः

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